संपादकीय
भारत में पूरे देश के रोजगार के आंकड़ों को एक साथ मिलाकर देखने पर बेरोजगारी की सही तस्वीर नहीं मिलती। अभी कुछ आर्थिक आंकड़े सामने आए हैं जो बताते हैं कि इस देश में ग्रेजुएट बेरोजगारी करीब 30 फीसदी है, और अनपढ़ मजदूरों में बेरोजगारी करीब 3 फीसदी है। यह बेरोजगारी देश के सबसे उत्कृष्ट, और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थानों से निकले हुए ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट के साथ भी है। इसलिए इस देश में अनपढ़ मजदूरों के रोजगार के आंकड़ों को पढ़े-लिखे ग्रेजुएट बेरोजगारों के साथ मिलाकर देखना बड़ा गड़बड़ होगा। अर्थव्यवस्था और रोजगार के जानकार लोगों का यह मानना है कि अब देश के अच्छे से अच्छे विश्वविद्यालय से पढक़र निकलने के बाद भी कोई ढंग का रोजगार मिल जाना तय नहीं है। सफेदपोश, दफ्तर में टेबल-कुर्सी पर बैठकर काम करने वाले कामों का अब कोई ठिकाना नहीं है। दूसरी तरफ हैरान करने वाला एक और आंकड़ा भी है। अच्छे-अच्छे ग्रेजुएट 25-30 हजार रूपए की तनख्वाह पाने के लिए तरसते रहते हैं। दूसरी तरफ प्लंबर या बिजली मिस्त्री जैसे हुनर के लोग हर महीने इससे बहुत अधिक कमा लेते हैं, उन्हें किसी नौकरी से बंधकर भी नहीं रहना पड़ता, वे अपनी मर्जी के दिनों में, मर्जी के घंटों में काम करते हैं, और सफेदपोश बाबुओं के मुकाबले अधिक कमाते हैं। उनके सामने नौकरी छिन जाने का खतरा भी नहीं रहता, उनके सिर पर कभी छंटनी की तलवार भी नहीं मंडराती, और एक बड़ा फायदा इस तरह के काम का यह रहता है कि ऐसे हुनरमंद कारीगर या मिस्त्री अपनी अगली पीढ़ी को यह काम सिखा सकते हैं, काम का विस्तार कर सकते हैं, और अगली पीढ़ी को पिछली पीढ़ी के बंधे-बंधाए ग्राहक भी मिल जाने की बड़ी संभावना रहती है।
आज इस विषय पर लिखना इसलिए सूझा कि चार-छह दिन पहले एक पॉडकास्ट में भारत के ये आंकड़े सुनने मिले, जो कि चौंकाने वाले थे। ग्रेजुएट बेरोजगार, और अनपढ़ कामकाजी! इसे सुनते हुए याद आया कि हम कई बरस से अपने अखबार के इसी कॉलम में यह बात लिखते आ रहे थे कि कॉलेजों की किताबी पढ़ाई को कम करने की जरूरत है। नेताओं ने गांव-गांव तक कॉलेज खोल दिए हैं, उनमें लडक़े-लड़कियों के दाखिले हो जाते हैं, और ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल करने के अकेले मकसद से वे कुछ विषय छांटकर उसे पढऩे जैसा कुछ करते हैं, इम्तिहान देते हैं, और एक ऐसी डिग्री हासिल करते हैं जो उसके कागज के वजन से भी कम वजन की होती है। वह किसी काम की नहीं रहती। अभी सोशल मीडिया पर एक नौजवान कारोबारी ने जब यह लिखा कि उसे जब लोगों को नौकरी पर रखना होता है, तो वह 15-20 मिनट उनसे बात करता है, यह देखता है कि उनमें काम का उत्साह कितना है, बातचीत में कितनी एनर्जी निकल रही है, और उनके परिचय के पन्ने देखे बिना वह उन्हें काम पर रख लेता है, या मना कर देता है। बहुत से लोगों ने इसके खिलाफ लिखा कि लोग बरसों कॉलेज-यूनिवर्सिटी में पढक़र काबिलीयत लेकर निकलते हैं, और यह कल का छोकरा कारोबारी उसे देखे बिना सिर्फ बातचीत के आधार पर अपना नतीजा निकालकर उन्हें रखता है, या वापिस कर देता है, यह बड़ा अन्याय है। ऐसी प्रतिक्रियाएं आने के बाद भी यह कारोबारी अपने तरीकों पर अड़े रहा, और उसने कहा कि उसे डिग्री से कोई खास लेना-देना नहीं रहता, वह तो यही देखता है कि नौकरी के लिए आने वाले में काम का उत्साह कितना है? हमारा भी अपने अखबार में जरूरत पडऩे पर किसी पत्रकार को काम पर रखते हुए कभी उसकी डिग्री पूछने-समझने की जरूरत नहीं रही। लोगों का काम बोलता है, उनकी बातचीत से समझ में आता है कि उनकी समझ कितनी है। डिग्री सचमुच ही एक कागज का टुकड़ा है, जिसे हासिल करते हुए अमूमन विश्वविद्यालयों में कोई बड़ी मेहनत नहीं करनी पड़ती, और वह डिग्री किसी हुनर या काबिलीयत का सुबूत भी नहीं रहती। बेहतर यही रहता है कि लोगों से काम करवाकर उसका नमूना देखा जाए, काम का उनका उत्साह देखा जाए, और उस पर फैसला लिया जाए। हमें कभी पत्रकारिता की डिग्री की वजह से अच्छे पत्रकार नहीं मिले। अच्छे पत्रकार डिग्रीधारी भी हो सकते हैं, और बिना डिग्री वाले भी हो सकते हैं। हम शिक्षा के महत्व को कम नहीं आंक रहे, लेकिन शिक्षा की बड़ी सीमित उपयोगिता रह गई है।
अब यहां पर हमें एआई के अपने पसंदीदा विषय पर आना ही पड़ेगा। अभी लोगों ने इस जुबान में लिखा नहीं है कि जिन लोगों का काम किसी कम्प्यूटर की-बोर्ड पर है, मोबाइल फोन की स्क्रीन पर है, इंटरनेट से जुड़े हुए किसी और किस्म के उपकरण पर है, उन सबका काम एआई की वजह से खतरे में पड़ा हुआ है। यह सिर्फ वक्त की बात है कि एआई आकर कब की-बोर्ड और स्क्रीन छीन ले, कब माइक्रोफोन या दूसरे उपकरण झपट ले। आज जिन कामों को सफेदपोश काम कहा जाता है, वे सारे काम बड़े पैमाने पर ऊंचे दर्जे के खतरे में हैं। ये तमाम वही काम हैं जिनमें ग्रेजुएशन जैसी डिग्री जरूरी रहती है, जो आज भारत में 70 फीसदी, या उससे कम ग्रेजुएट-रोजगार के दायरे में आते हैं। इसका मतलब यह है कि आने वाले वक्त में ग्रेजुएट-बेरोजगारी 30 फीसदी से बढ़ती चली जाएगी। आज ग्रेजुएशन करने वाले छात्र-छात्राओं की गिनती बढ़ती जा रही है, इसलिए उनमें बेरोजगारी का अनुपात बढ़ते चले जाएगा। दूसरी तरफ प्लंबर, राजमिस्त्री, ड्राइवर, हमाल, बिजली मिस्त्री जैसे हजारों तरह के काम हैं जिन पर एआई का हमला अभी अगले कुछ दशक तो नहीं दिख रहा है। इसलिए हम अपने एक पुराने सुझाव पर लौटते हैं कि मिडिल स्कूल के बाद से छात्र-छात्राओं की पढ़ाई-लिखाई सीमित करना चाहिए। जो पढ़ाई-लिखाई में बहुत अच्छे नहीं हैं, उन्हें किसी हुनर का प्रशिक्षण देना चाहिए। वे साक्षर तो हो जाएं, लेकिन इसके बाद वे रोजगार की तरफ बढ़ें, न कि डिग्री की तरफ। स्कूल की पढ़ाई पार करने की जो उम्र रहती है, उस उम्र तक अधिकतर बच्चों को अधिकतर किस्म के हुनर सिखाए जा सकते हैं, उनका प्रशिक्षण दिया जा सकता है। यही प्रशिक्षण आगे जाकर उन्हें रोजगार दिला सकेगा।
आज भारत में जो 70 फीसदी से कम कामकाजी ग्रेजुएट हैं, उनमें से अधिकतर की तनख्वाह शहरी हुनरमंद कारीगरों की कमाई से खासी कम है। इसलिए लोगों को सफेदपोश नौकरी के मेहनतकश-हुनरमंद विकल्प की तरफ बढऩा चाहिए। एआई का हमला सफेदपोश कामों पर इस रफ्तार से हो रहा है कि आज काम के बाद कम्प्यूटर बंद करने वाले लोगों को अगली सुबह कम्प्यूटर शुरू करने का मौका मिलेगा या नहीं, इसका कोई ठिकाना नहीं है। सोचकर देखिएगा कि अब वक्त बेरोजगार बदन पर सफेद शर्ट के सम्मान का नहीं है, क्योंकि दाग-धब्बे वाले कपड़ों वाले मिस्त्री-कारीगर के परिवार अधिक संपन्न और सुखी हैं, एआई का खतरा उनके सिर पर नहीं मंडरा रहा है।


