संपादकीय
चीन की खबर है कि सरकार ने एक औपचारिक बयान जारी करके अमरीका की एक ताजा हेठी की है। उसने कहा है कि वह ईरानी तेल खरीदने वाली पांच कंपनियों पर लगाई गई अमरीकी पाबंदियों को नहीं मानेगा। उसका तर्क है कि ये पाबंदियां अन्य देशों के साथ सामान्य आर्थिक और व्यापारिक कामकाज करने से चीनी कंपनियों को रोकती हैं। इसके साथ-साथ ये पाबंदियां अंतरराष्ट्रीय कानून, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ हैं। इसलिए चीन अमरीकी रोक-टोक को नहीं मानता, और चीन की कंपनियों और संस्थानों को इन पाबंदियों को लागू नहीं करना चाहिए। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने इस बयान में आगे कहा है- चीनी सरकार हमेशा उन एकतरफा पाबंदियों का विरोध करती है, जो संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बिना, और अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित नहीं होतीं। कल ही अमरीका ने एक और चीनी कंपनी पर पाबंदी लगाई थी, और कहा था कि इसने लाखों बैरल ईरानी तेल खरीदा, जिससे ईरान को अरबों डॉलर की कमाई हुई। चीन का यह रूख उस वक्त होना अधिक मायने रखता है, जब इसी महीने अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प चीन की बहुप्रतीक्षित यात्रा पर जा रहे हैं।
पिछले खासे अरसे से योरप में अमरीका के लिए, खासकर ट्रम्प की मनमानी के लिए अपना बर्दाश्त धीरे-धीरे खो दिया है। एक-एक करके देश ट्रम्प के हमलावर रूख के खिलाफ खड़े होते जा रहे हैं। योरप के एक अविभाज्य हिस्से ग्रीनलैंड के नाटो का हिस्सा रहते हुए भी उसे फौजी ताकत से कब्जाने का ट्रम्प का तानाशाही रूख योरप के देशों ने मिलकर कुचल डाला, और ट्रम्प को फौजी कार्रवाई के फतवे वापिस लेने पड़े। अभी ईरान के खिलाफ जंग को लेकर जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, और स्पेन समेत अधिकांश यूरोपीय देशों ने शामिल होने से साफ मना कर दिया, और कुछ देशों ने तो ईरान पर हमले के लिए उड़ान भरने वाले अमरीकी फौजी विमानों को अपनी जमीन पर उतरने देने से भी मना कर दिया। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी एक वक्त ट्रम्प की बड़ी प्रशंसक रहीं, लेकिन आज उनका हाल यह है कि पोप लियो के खिलाफ ट्रम्प के बयानों पर मेलोनी ने कहा- मैं पोप के प्रति ट्रम्प की बातों को मंजूर करने लायक नहीं पाती। पोप कैथोलिक चर्च के मुखिया हैं, और शांति की अपील करना, और हर किस्म के जंग की निंदा करना उनके लिए उचित और सामान्य है। ईरान के साथ जंग को लेकर जब ट्रम्प ने मेलोनी पर हौसले की कमी का आरोप लगाया, तो मेलोनी ने सार्वजनिक रूप से ट्रम्प को जवाब दिया- सहयोगी होने का मतलब यह नहीं होता, कि कोई सीमारेखा ही न हो। सहयोगी होने का मतलब गुलाम या मातहत होना तो बिल्कुल ही नहीं होता। मेलोनी ने ट्रम्प को जवाब देते हुए कहा- सहयोगियों के बीच ईमानदार-मतभेद होने चाहिए, जब हम सहमत नहीं होते, तो हमें इसे साफ-साफ कहना चाहिए। मेलोनी ने ईरान पर अमरीकी-इजराइली कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे के बाहर, और खतरनाक रुझान का हिस्सा बताया।
हमने इस पूरे संदर्भ में यह ढूंढने की कोशिश की कि अपने इस दूसरे कार्यकाल के सवा साल में ट्रम्प ने क्या कोई भी नया दोस्त बनाया? तो भारी तलाश के बाद भी ऐसा एक भी देश नहीं मिला, बल्कि यह बात जरूर सामने आई कि ट्रम्प ने अमरीका को इजराइल के हाथों गिरवी रख दिया है। उसने कनाडा को अमरीका का एक राज्य बन जाने को कहा, मेक्सिको के साथ व्यापार-युद्ध की बात कही, दुनिया के तकरीबन हर देश के साथ टैरिफ का जंग छेड़ दिया, पूरे के पूरे मध्य-पूर्व को बिना किसी वजह, बिना किसी मौके के भयानक अस्थिरता में झोंक दिया, अमरीका के सबसे पुराने फौजी साथी, नाटो को छोडऩे की धमकियां दीं, नाटो सदस्यों पर कब्जे की धमकियां दीं, और एक-एक करके अपने सारे दोस्तों को खो दिया। उसका यह मिजाज अपने खुद के देश में अपनी सरकार में, अपने बड़े-बड़े साथियों के साथ भी रहा, और उसने अपनी सरकार के सबसे बड़े ओहदो पर बैठे हुए कई सबसे बड़े लोगों को निकाल फेंका। प्रवासियों को निकालने की ट्रम्प की नीति से असहमत, गृह सुरक्षा मंत्री को ट्रम्प ने हटाया, अटार्नी जनरल को हटाया, श्रम मंत्री को हटाया, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, थलसेना प्रमुख, नौसेना प्रमुख जैसे बहुत से लोगों को हटाने के अलावा ट्रम्प ने हटाए गए कुछ लोगों के खिलाफ मुकदमे भी छेड़ दिए। जिस आदमी का मिजाज उस डाल को काटने का है जिस पर वह बैठा हुआ है, तो वह इस काम को देश के भीतर भी कर रहा है, और देश के बाहर भी। जब ऐसे अस्थिरचित्त वाले, और ऐसे बीमार या विक्षिप्त दिमाग वाले के हाथ दुनिया की सबसे बड़ी फौजी और आर्थिक ताकत, परमाणु बम की बटन, सब कुछ दे दी जाए, तो उसका इतना तानाशाह हो जाना स्वाभाविक ही है।
लेकिन इस सिलसिले से बाकी दुनिया का एक भला भी हो रहा है। कई देश जो अमरीकी खेमे का हिस्सा बने हुए थे, वे अपनी खो चुकी स्वायत्तता को वापिस पा रहे हैं, उन्हें अपना राष्ट्रीय स्वाभिमान जरूरी लग रहा है, और जो अमरीकी मनमानी के सामने, अपनी रीढ़ की हड्डी का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। आज कई देश ऐसे हो गए हैं जो इजराइल के जनसंहार के खिलाफ उस पर पूरे योरप के आर्थिक प्रतिबंध की खुली मांग कर रहे हैं, उससे रिश्ते पूरी तरह तोड़ देने की मांग कर रहे हैं, जो कि एक किस्म से ट्रम्प की हुक्मउदूली है, उसकी मनमानी शान के खिलाफ बात है। दुनिया के कई देश अमरीकायुक्त जिंदगी जीते चले आ रहे थे, और अब वे पहली बार अमरीकामुक्त दुनिया की न सिर्फ कल्पना कर रहे हैं, बल्कि अमरीका से परे की अर्थव्यवस्था, फौजी हिफाजत, उससे परे की विदेश और वैश्विक नीति के बारे में भी सोच रहे हैं, उस तरफ आगे बढ़ रहे हैं। ट्रम्प के चीन जाने के कुछ हफ्ते पहले चीन का यह ताजा रूख बगावत से कम क्या कहा जाएगा? एक नौबत ऐसी बन रही है कि यूक्रेन के बाद ईरान की मिसाल का इस्तेमाल करते हुए चीन भी ताइवान पर अपने हक के पुराने दावे पर अमल करने पर उतर जाए, तो हैरानी नहीं होगी। ईरान के मोर्चे पर खोखला हो चुका अमरीका ताइवान को बचाने के लिए चीन के बगल जाकर कितनी फौजी ताकत झोंक सकेगा, इस पर थोड़ा शक होता है। ट्रम्प ने विश्व व्यवस्था को जिस तरह, जिस हद तक तहस-नहस कर दिया है, वह ऐतिहासिक है। विश्व इतिहास में इतनी आर्थिक तबाही लाने, इतना वैश्विक अविश्वास स्थापित करने वाला कोई दूसरा नेता नहीं हुआ था। अभी इसका कार्यकाल ढाई-तीन बरस बाकी है, और इतने वक्त में बाकी दुनिया की तबाही के साथ-साथ, अमरीका अपनी अर्थव्यवस्था, अपने घरेलू लोकतंत्र, और अंतरराष्ट्रीय दबदबे, और असर, अपने दुनिया भर के दोस्तों, इन सबको खोकर ऐसा देश साबित हो चुका रहेगा जिसे दुनिया में कोई भी भरोसे के लायक नहीं मानेंगे। हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि अमरीका ने दुनिया में जिन दसियों लाख बेकसूर लोगों को मारा है, उन सबकी बद्दुआ अब असर दिखा रही है, यह असर दुनिया के बेताज तानाशाह बने इस देश को और कमजोर, और खोखला कर दे, पूरी तरह अकेला कर दे, तो वह बाकी दुनिया के हित में होगा। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


