संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अंग्रेज चले गए, लेकिन सामंती चाह छोड़ गए हैं
सुनील कुमार ने लिखा है
01-May-2026 10:03 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : अंग्रेज चले गए, लेकिन सामंती चाह छोड़ गए हैं

कोलकाता से पुणे जा रहा एक मुसाफिर विमान अचानक रायपुर में उतरा। इमरजेंसी लैंडिंग इसलिए करनी पड़ी कि एक महिला मुसाफिर बेहोश हो गई थी। ऐसे किसी भी रूकने से एयरलाईंस को लाखों रूपए का नुकसान होता है, और सैकड़ों मुसाफिरों का सफर भी लेट होता है। फिर भी इंसानी जिंदगी अधिक महत्वपूर्ण रहती है, और बहुत सी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भी किसी एक मुसाफिर को बचाने के लिए सबसे पास के देश या एयरपोर्ट पर उतरती ही हैं। लेकिन अभी दो दिन पहले की खबर थी कि भारत में ट्रेन में सफर कर रही एक लडक़ा चलती ट्रेन से गिर गया, उसकी बहन सहित कई लोगों ने ट्रेन रोकने की कोशिश की, लेकिन ट्रेन नहीं रूकी। चेन खींचने पर भी कुछ नहीं हुआ। कुछ और अलग-अलग खबरों से पता लगता है कि ट्रेन में झगड़ा होने पर किसी को फेंक दिया गया, लेकिन चेन खींचने पर ट्रेन नहीं रूकी। डिब्बे में गुंडागर्दी होती रही, लेकिन पुलिस या रेलवे को खबर करने पर भी कोई मदद नहीं मिली। किसी-किसी मामले में शिकायत करने पर मदद मिलने की भी खबरें आती हैं।

इन दो तरह की स्थितियों को देखें, तो लगता है कि हवाई सफर करने वाले लोगों को विमान से जल्दी पहुंचने के अलावा भी कई किस्म की सुविधाएं मिलती हैं, जिनमें सुरक्षा और साफ-सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएं भी हैं जो कि हर मुसाफिर, हर इंसान को मिलनी ही चाहिए। रेलवे स्टेशनों से लेकर रेलगाडिय़ों के डिब्बों, और खासकर डिब्बों के पखानों तक सब कुछ गंदा मिलता है। विमान मुसाफिर और ट्रेन मुसाफिर के बीच विमान और ट्रेन तक का फर्क समझ में आता है, लेकिन साफ-सफाई तो एक बुनियादी हक होना चाहिए, उसमें गरीब और अमीर में फर्क करना, कम किराए और अधिक किराए के सफर में सफाई का फर्क करना, यह तो बहुत बड़ी असभ्यता का सुबूत है। लेकिन इस देश में गरीब और अमीर के बीच ऐसी असभ्यता कदम-कदम पर दिखती है। शहरों में देखें, तो सत्तारूढ़ और विपक्षी नेताओं के रहने के इलाके, अफसरों के रहने के इलाके अलग किस्म से साफ-सुथरे दिखते हैं। वहां पर लाउडस्पीकर पर शोरगुल की इजाजत भी नहीं रहती, वहां ऐसे ट्रांसफॉर्मरों से बिजली आती है, जो आमतौर पर बंद नहीं होते, जो कि अस्पताल जैसे सबस्टेशन से जुड़े रहते हैं। इन इलाकों में सडक़ें खराब भी नहीं होती हैं, और उन पर दुबारा एक लेयर चढ़ा दी जाती है। दूसरी तरफ शहर के बाकी हिस्सों में सडक़ों पर गड्ढे पड़े रहते हैं। वीआईपी कहे जाने वाले इलाकों में खम्भों पर कोई बल्ब खराब नहीं रहते, वहां के बाग-बगीचों में पानी की कमी नहीं रहती। लेकिन आम लोगों के इलाके बदहाल रहते हैं।

अभी कहीं पर पढ़ा कि वे देश विकसित नहीं हैं जहां गरीब भी कारों पर चलते हैं, वे देश विकसित हैं जहां संपन्न लोग भी बसों या साइकिलों से चलते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले योरप के एक देश के प्रधानमंत्री का समाचार देखने मिला जिसमें वे नए प्रधानमंत्री को काम सौंपकर कार्यालय से बाहर निकलते हैं, कार्यालय के दो-चार लोग बाहर तक उन्हें छोडऩे आते हैं, और वहां वे अपनी साइकिल उठाकर चलाते हुए अपने घर चले जाते हैं। जिस तरह किसी भी प्रधानमंत्री के काम के आखिरी दिन को दिखाने के लिए मीडिया इकट्ठा होता ही है, इस प्रधानमंत्री को भी साइकिल से घर जाते दिखाने के लिए बहुत से फोटोग्राफर और कैमरापर्सन वहां पर थे। बिना किसी बयानबाजी के वे मुस्कुराते और हाथ हिलाते निकल गए। सभ्य देशों में सबसे ताकतवर लोग भी सबसे आम लोगों की तरह रहने की कोशिश करते हैं। भूटान जैसे बगल के छोटे से देश में तो प्रधानमंत्री साइकिल चलाते दिखें, तो अधिक हैरान नहीं होना चाहिए, लेकिन जब सबसे विकसित योरप के कई देशों में, कम से कम कुछ देशों में तो, प्रधानमंत्री या वहां के राजा या राजकुमार साइकिल पर दिखें, बसों पर चलते दिखें, तो लगता है कि ‘राजा’ और प्रजा के बीच फासला नहीं है। ब्रिटेन की बहुत सी तस्वीरें आती हैं जिनमें कभी कोई मंत्री, तो कभी संसद में प्रतिपक्ष के नेता मेट्रो ट्रेन में सफर करते हुए दिखते हैं। ऐसे में उन देशों पर तरस आता है जहां एक वार्ड मेंबर बनने पर भी लोग इतनी बड़ी गाड़ी में चलने लगते हैं जो उनके ही वार्ड की हर सडक़ पर घुस न सके।

भारत में भी कभी-कभी किसी जज, किसी अफसर, या किसी नेता ने यह कोशिश की है कि उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ें, और उसी से सरकारी स्कूलों की हालत सुधरेगी। कुछ लोग ऐसे भी मिले हैं जो सबसे अधिक खर्चीला इलाज पाने का हक रखने पर भी सरकारी अस्पताल जाकर इलाज कराते हैं, उससे सरकारी अस्पताल की विश्वसनीयता भी बढ़ती है, और गरीब निजी अस्पतालों की तरफ जाने को मजबूर भी नहीं होते। कोई-कोई ऐसे भी सत्तारूढ़ लोग होते हैं, जो लालबत्ती और सायरन के बिना चलते हैं, और कुछ लोग मध्यप्रदेश के एक सत्तारूढ़ विधायक के कुलकलंक सरीखे होते हैं जो अपनी महंगी गाड़ी से सडक़ पर लोगों को कुचलते हुए चले जाता है, और बाद में कहता है कि वह हूटर और सायरन बजा रहा था, लोग हटे क्यों नहीं?

आम और खास का फर्क हिन्दुस्तान की सोच में कदम-कदम पर दिखता है, जो सस्ती दारू है, उसे देसी कहा जाता है, और जो महंगी दारू है, उसे देश छोडक़र जा चुके अंग्रेजों के नाम पर अंग्रेजी कहा जाता है। जिन लोगों ने इस देश को गुलाम बनाकर रखा, आज भी महंगी दारू का नाम उन्हीं के नाम पर चलता है। अंग्रेजों के छोड़े गए गंदगी के टोकरे को सिर पर उठाकर चलना यहां खास माना जाता है। जब आम लोग हाथ जोड़े अदालतों या सरकारी दफ्तरों में खड़े रहते हैं, तब जज या अफसर अंग्रेजों के छोड़े हुए कोट और टाई में खास बने हुए सामंती अंदाज में बैठते हैं। आम और खास का फर्क, गरीब और अमीर का फर्क 21वीं सदी के इस दूसरे चौथाई हिस्से में भी सामंती अंदाज में जारी है। विमानों में चूंकि ‘राजा’ सफर करते हैं, इसलिए उनका साफ रहना जरूरी है, और ट्रेनों में चूंकि प्रजा चलती है, उनके नसीब में गंदगी रहना जरूरी है। यह देश अपने को मस्जिद की नमाज की तरह दिन में पांच बार विश्वगुरू कहता है, लेकिन इस गुरूकुल में ‘राजा’ के बच्चे शाही अंदाज में पढ़ते हैं, और प्रजा के बच्चे इन राजाओं की गंदगी साफ करते हैं। जब तक किसी देश में खास और आम के बीच ऐसा अमानवीय और हिंसक फासला बने रहेगा, तब तक वह विश्वशिष्य भी कहलाने के लायक नहीं है। सभ्यता का विकास इस तरह नहीं होता कि गरीब और कमजोर तबके के लोगों के बुनियादी अधिकार भी न माने जाएं, और चुनिंदा सत्तारूढ़ लोगों को मनमाने विशेषाधिकार दिए जाएं। अभी कुछ बरस पहले तक का हमें याद है कि विमानतलों पर सुरक्षा जांच की जगह पर एक बोर्ड लगे रहता था, जिस पर लिखा हुआ था कि प्रियंका गांधी एसपीजी सुरक्षा प्राप्त हैं, और उनके पति रॉबर्ट वाड्रा जब उनके साथ सफर करेंगे, तब उन्हें भी सुरक्षा जांच से छूट रहेगी! पूरे देश के विमानतलों पर एक दामाद के लिए इस तरह का खास इंतजाम किया गया था, जो कि निहायत गैरजरूरी और अलोकतांत्रिक था। अगर कतार में लगकर कोई अपनी जांच करवा ले, तो न तो उससे उसकी हिफाजत पर आंच आती, न ही उसकी इज्जत पर। उसके अहंकार पर जरूर आंच आती है। किसी भी सभ्य लोकतंत्र को अपने भीतर के ‘राजा’ और प्रजा के बीच के फासले को पाटना चाहिए, इसके बिना बीच में जो खाई रहती है, उसकी जो गहराई रहती है, उस देश का विश्वगुरू बनने का सपना उस तलहटी की उस गहराई में पड़ा रहता है।

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