संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : दलित, और सांत्वना-पर्यटन पर टैक्स क्यों न लगाया जाए?
सुनील कुमार ने लिखा है
04-May-2026 5:18 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : दलित, और सांत्वना-पर्यटन पर टैक्स क्यों न लगाया जाए?

महाराष्ट्र के पुणे जिले में अभी चार बरस की एक बच्ची से बलात्कार के बाद उसे मार डाला गया। भीमाजी कांबले नाम के 65 बरस का बुजुर्ग इस बच्ची को बहला-फुसलाकर पास की गौशाला में ले गया, और वहां इस जुर्म के बाद उसने लाश को गोबर के ढेर में छिपा दिया। उसके खिलाफ पहले भी 2015 में पाक्सो का केस दर्ज था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है। इधर परिवार के लोग अस्थि विसर्जन के लिए बाहर गए हुए हैं, और उनके घर पर नेता हमदर्दी जताने पहुंच रहे हैं। ऐसे में इस बच्ची के पिता ने एक सार्वजनिक वीडियो संदेश जारी किया, और कहा- हम अभी अपनी बेटी की अस्थियों का विसर्जन करने आए हैं, इस दौरान रिश्तेदारों और दोस्तों से पता चला कि कई राजनीतिक नेता हमारे घर सांत्वना देने आ रहे हैं। मैं अपनी और पूरे परिवार की ओर से विनम्र अपील करता हूं कि जब तक मेरी बेटी को न्याय नहीं मिल जाता, और आरोपी को फांसी की सजा नहीं हो जाती, तब तक कोई भी राजनीतिक नेता हमारे घर न आएं। न्याय मिलने और फांसी हो जाने के बाद ही हम किसी से मिलेंगे। तब तक सांत्वना देने या फोटो खिंचवाने कोई न आएं, परिवार को सांत्वना नहीं, सच्चा न्याय चाहिए।

आमतौर पर सदमे से गुजरते हुए दुखी परिवार कुछ बोलते नहीं हैं, और अपने घर पहुंचने वाले लोगों को झेल लेते हैं। लेकिन ऐसे परिवारों के मन में ऐसे अतिथि-नेताओं को देखकर जो लगता होगा, वह इस बच्ची के इस पिता ने खुलकर कह दिया है। नेता जब किसी परिवार में हमदर्दी के लिए जाते हैं, तो वे एक किस्म से ग्लिसरीन के आंसू भी ले जाते हैं, क्योंकि दो उद्घाटन, तीन शादियां, दो जन्मदिन, और उसके बीच में ऐसे सांत्वना-प्रवास पर एकाएक तो आंसू निकल भी नहीं पाते होंगे। ऐसे सांत्वना-पर्यटन के खिलाफ किसी न किसी को तो मुंह खोलना था, और यह तो अच्छा हुआ कि ऐसे जुल्म और ऐसे जुर्म की शिकार इस बच्ची के पिता ने वीडियो संदेश जारी करके ऐसी अपील की है। लोगों को याद होगा कि अपने जन्मदिन पर अस्पताल जाकर किसी गरीब, बीमार, या दुर्घटना में जख्मी को एक-एक फल देकर दर्जन-दर्जनभर लोग फोटो खिंचवाते हैं, वीडियो बनवाते हैं, और फिर उसे अपनी शोहरत के लिए इस्तेमाल करते हैं। अभी कुछ महीने पहले ही एक वीडियो ऐसा भी आया था जिसमें किसी एक राजनीतिक दल का दुपट्टा-गमछा टांगे हुए लोग एक अस्पताल पहुंचते हैं, और वहां उनमें से एक नेता या नेत्री को देखा जा सकता है जिसने एक ही फल लोगों को थमाकर फोटो खिंचवाई, वीडियो बनवाया, और फिर उस फल को लेकर दो बिस्तर आगे सांत्वना-पर्यटन के अगले स्टेशन पर यही काम किया। उन मरीजों का चेहरा देखने लायक था जिनके हाथ में आया हुआ फल वापिस लेकर उसे अगले फोटोशूट के लिए इस्तेमाल किया गया।

ऐसे सांत्वना-पर्यटन के अलावा भारतीय राजनीति में एक दलित-पर्यटन का भी बड़ा चलन है। राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े नेता किसी दलित के घर खाने पहुंचते हैं। चूंकि जाति व्यवस्था के चलते हुए दलितों के घर खाने से कई लोग परहेज करते हैं, तो इस तरह वहां जाकर वहां खाना एक किस्म से उन्हें छुआछूत से बाहर गिनने जैसा रहता है, लेकिन ऐसे मौकों से जो फोटो-वीडियो बाहर आते हैं, उनमें दिखता है कि किस तरह वहां खाने के लिए थाली के नीचे लकड़ी की चौकियां सजी रहती हैं, थालियों में किसी भी संपन्न परिवार जैसे व्यंजन-पकवान सजे रहते हैं, और ऐसा लगता है कि दलित-पर्यटन पर्व के लिए इन घरों में मेहमान की तरफ से ही मेजबान की तरफ से दिखने वाले इंतजाम किए जाते हैं। जो सचमुच ही दलित हैं, वे भला इस किस्म का खाना कैसे खिला सकते हैं? और एक सामाजिक-नैतिकता का सवाल यह भी उठता है कि क्या अपनी शोहरत के लिए दलित परिवारों का ऐसा इस्तेमाल जायज है? नेताओं को अपनी राजनीति चलाने के लिए कई किस्म के शिगूफों की जरूरत पड़ती है, और इसके लिए बीमार, बलात्कार के शिकार, किसी हादसे के शिकार, किसी बीमारी से थोक में मारे गए लोगों के गांव या मुहल्ले, अस्पताल में भर्ती मरीज, ऐसे सब लोग बहुत ही माकूल बैठते हैं। बलात्कार जितना चर्चित होता है, सांत्वना-पर्यटन उतना ही अधिक होता है। राजनीतिक दलों की टीम बनाई जाती हैं, जो जाकर ऐसे परिवारों से मिलती हैं। फिर महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, बाल संरक्षण आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, एसटी-एससी के आयोग, ओबीसी आयोग, ऐसी सब संवैधानिक संस्थाओं के लोगों की तो जिम्मेदारी भी हो जाती है कि परिवार के जात-धरम को देखकर इनमें से किस-किसको टूर-प्रोग्राम बनाना है। हाल के बरसों में कुछ मौकों पर तो ऐसा भी हुआ कि बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला, और उसके परिवार की शिनाख्त भी ऐसे सांत्वना-पर्यटकों ने सार्वजनिक रूप से उजागर कर दी। अब जब खास मकसद खबरों और सोशल मीडिया के मार्फत शोहरत पाना है, तो उस नशे के बीच निजता और गोपनीयता के नियम-कानून का ख्याल भला कैसे रह सकता है?

चूंकि कानून में सांत्वना-पर्यटन, दलित-पर्यटन, और इस किस्म के दूसरे पर्यटनों के लिए न तो पासपोर्ट लगता है, और न ही वीजा, इसलिए इन पर कोई कानूनी रोक नहीं लगाई जा सकती। इतना जरूर किया जा सकता है कि सोशल मीडिया पर किसी के दुख को दुधारू गाय की तरह दुह लेने की ऐसी बेशर्म कोशिशों के खिलाफ एक जनमत तैयार किया जा सकता है। पुणे की इस बच्ची के पिता ने एक शुरूआत की है, और आम लोगों को लगातार यह लिखना चाहिए कि ऐसे परिवारों के घर जाकर, या अस्पताल जाकर हमदर्दी का ग्लिसरीन बहाने के बजाय नेता और सरकार अपने-अपने घर-दफ्तर से जो कर सकते हैं, वह करें। हो सके तो किसी विधायक या सांसद को विधानसभा या संसद में एक अशासकीय संकल्प लाना चाहिए कि सांत्वना-पर्यटन, और दलित-पर्यटन पर एक टैक्स लगाया जाए, जो कि ऐसे परिवारों को ही दिलवाया जाए। जिस दर्जे के नेता हों, उतना ही अधिक टैक्स हो, जितने लोग जाएं उनमें से हर व्यक्ति पर एक टैक्स लगे, जितनी फोटो खिंचवाएं, उन पर टैक्स लगे, और जितने मिनट के वीडियो बनवाएं, उन पर भी। कुल मिलाकर यह कि अगर नेताओं के मन में सचमुच ही हमदर्दी है, तो उससे दुखी-पीडि़त, दलित-कुचले लोगों का कुछ भला तो हो! या तो कम से कम इतना इंतजाम कर दिया जाए कि वहां पहुंचने वाले काफिले में जितनी गाडिय़ां हों, उनमें से कोई भी एक गाड़ी वह परिवार अपनी पसंद से रख सके, और इससे भी नेताओं की ऐसे परिवारों के प्रति हमदर्दी अधिक अच्छे से साबित हो सकेगी, गाड़ी की चाबी परिवार को देते हुए फोटो-वीडियो भी हो सकते हैं, और नेताजी तो काफिले की किसी दूसरी गाड़ी में लौट ही सकते हैं।

राजनीति को इतना बेशर्म नहीं होना चाहिए कि वह किसी के भी जख्म में से लहू दुह लेने में जुट जाए। उन तस्वीरों को भी याद रखना चाहिए जिसमें किसी बड़े संपन्न लोगों के संगठन के दर्जनभर लोग किसी सरकारी अस्पताल में जाकर किसी गरीब, बीमार के बिस्तर पर उसे एक केला थमाते हुए, हर कोई हाथ लगाते हुए तस्वीर खिंचवाते हैं। एक दर्जन लोगों को ऐसा पांच रूपए का केला अठन्नी-अठन्नी से भी कम का पड़ता है, और अब तो यह बात भी चलन में आ गई है कि फोटो खिंचने के बाद उसी केले को अगले बिस्तर पर फिर इस्तेमाल किया जा सकता है। हम यह भी सोचते हैं कि ऐसे लोगों में से जो लोग धर्मालु हैं, जिनका स्वर्ग-नर्क पर भरोसा है, वे ऊपर जाकर मुंह कैसे दिखाएंगे? या फिर जैसा कि हम मजाक में कहते हैं कि जो लोग मुंह दिखाने लायक नहीं हैं, उन्हें गहरे रंग के कवर वाले हेलमेट पहनकर चलना चाहिए। फिलहाल लोग इस बात को मुद्दा बनाएं कि ऐसे पर्यटन बंद हों।

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