संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : राघव चड्ढा वगैरह का भाजपा जाना संविधान की नजर में सही, या गलत?
सुनील कुमार ने लिखा है
26-Apr-2026 5:58 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : राघव चड्ढा वगैरह का भाजपा जाना संविधान की नजर में सही, या गलत?

आम आदमी पार्टी छोडक़र उसके नौजवान राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा संग 6 और सांसदों ने भाजपा में दाखिला ले लिया, और पंजाब से राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी से राज्यसभा में कुल एक सांसद बच गया है। राज्य के एक पर्यावरणशास्त्री बाबा बलबीर सिंह सीचेवाल अब वहां से राज्यसभा में अकेले बच गए हैं, और उन्होंने यह कहा कि उनसे किसी ने दलबदल की चर्चा करने की भी हिम्मत नहीं की। उन्होंने कहा कि उनसे पार्टी के भीतर, या पार्टी के बाहर कोई कुछ नहीं छीन सकते। खैर, यह तो पार्टी के प्रति वफादार बने रहे सांसद की बात है, जो कि खबरों में नहीं हैं, दलबदलू जरूर खबरों में हैं, और इस दावे के साथ हैं कि उन्होंने दलबदल नहीं किया है। राघव चड्ढा का कहना है कि चूंकि राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के जितने सदस्य हैं, उनमें से दो तिहाई से ज्यादा भाजपा में जा रहे हैं, इसलिए यह विलय है, दलबदल नहीं। इसी आधार पर कल हमारे अखबार के यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर इसी घटना से शुरू करके छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के करवाए हुए दलबदल पर एक चर्चा की गई थी।

कल रात तक कानूनी समाचारों की एक प्रमुख वेबसाइट, लाईव लॉ, पर  यह सवाल उठाया गया कि क्या किसी पार्टी के राज्यसभा के दो तिहाई सांसदों का दूसरी किसी पार्टी में चले जाना दलबदल से परे का काम रहेगा? इस पर एक जानकार ने संविधान के कुछ प्रावधानों को गिनाते हुए सवाल खड़े किए कि यह किस तरह दलबदल कानून से बच सकता है? हमने भारतीय संविधान की दलबदल विरोधी कानून की 10वीं अनुसूची के प्रावधान पढऩे की कोशिश की, तो वह दो आधारों पर किसी की सदस्यता को अयोग्य ठहराती है। पहला तो यह कि कोई सदस्य अपनी मर्जी से मूल पार्टी की सदस्यता छोड़ दे। दूसरा यह कि किसी पार्टी के कम से कम दो तिहाई सदस्य किसी अन्य पार्टी के साथ विलय कर लें। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के कुछ महत्वपूर्ण फैसले अच्छी तरह दर्ज हैं। 1992 में पांच जजों की संविधान पीठ ने एक मामले में कहा था-‘दलबदल विरोधी कानून सत्ता के लालच में, या किसी और फायदे के लिए दलबदल करने की बुराई को रोकने की नीयत रखता है। इससे भारतीय संसदीय लोकतंत्र का ताना-बाना मजबूत होगा।’ एक दूसरे मामले में 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- ‘10वीं अनुसूची के दूसरे पैराग्राफ के मुताबिक महज दो तिहाई संख्या के आधार पर किसी और पार्टी में विलय सिर्फ गणित होगा, एक वैध विलय नहीं। वैध विलय के लिए एक संसदीय पार्टी का दूसरी संसदीय पार्टी में औपचारिक विलय होना जरूरी है।’ एक तीसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था-‘दलबदल एक संवैधानिक पाप (बुराई) है। यह जनता के दिए हुए जनादेश के साथ धोखाधड़ी है। एक ऐसा विधायक (या सांसद) जो खुद होकर ऐसी पार्टी की सदस्यता छोड़ दे, जिस पार्टी की टिकट पर वह जीतकर आया था, वह अपात्रता से नहीं बच सकता।’ 2023 के एक और मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिर दुहराया- ‘दो तिहाई बहुमत काफी नहीं है, पार्टी की आंतरिक प्रक्रिया, और औपचारिक विलय जरूरी है।’

राघव चड्ढा का दावा मुख्य रूप से दो तिहाई संख्या पर टिका हुआ है, लेकिन संवैधानिक व्याख्या, और कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में लिखी गई व्याख्या बड़ी साफ है। विलय की घोषणा पर्याप्त नहीं है क्योंकि आम आदमी पार्टी के राज्यसभा के संसदीय दल ने इसके लिए औपचारिक प्रस्ताव पास किया था, या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। इसके बाद आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक, या पार्टी की आधिकारिक ईकाई ने इस विलय को मंजूरी दी है, या नहीं? अगर नहीं दी है, तो यह स्वेच्छा से सदस्यता त्याग माना जाएगा। एक और कानूनी व्याख्या कहती है कि चड्ढा का यह कहना- ‘हम बीजेपी में जा रहे हैं’, यह बयान इसी श्रेणी में आता है। अब तक चड्ढा ने राज्यसभा में आप संसदीय दल का कोई औपचारिक प्रस्ताव पेश नहीं किया है।

लाईव लॉ वेबसाइट पर मनु सेबस्टियन ने इस मामले की और कानूनी व्याख्या की है। उन्होंने संविधान का हवाला देते हुए लिखा है कि किसी दूसरी पार्टी में विलय उसी हालत में दलबदल नहीं है जब मूल पार्टी के भीतर इस विलय के लिए औपचारिकता पूरी की गई हो। उन्होंने लिखा कि अगर कोई सदस्य ऐसे किसी विलय से सहमत नहीं है, तो भी वह अलग सदस्य के रूप में पार्टी में एक अलग गुट के रूप में बने रह सकते हैं, फिर चाहे दो तिहाई से अधिक बाकी सदस्य विलय का फैसला लेकर किसी और पार्टी में विलय कर लें। उन्होंने लिखा है कि संविधान की 10वीं अनुसूची के चौथे पैराग्राफ में यह साफ लिखा है कि विलय की प्रक्रिया मूल राजनीतिक दल से शुरू होनी चाहिए, न कि संसदीय दल से। इसके साथ ही मूल राजनीतिक दल का दूसरे किसी राजनीतिक दल में विलय उसी हालत में माना जाएगा, जब मूल पार्टी के दो तिहाई संसदीय सदस्य वह विलय मानेंगे। इस तरह मूल पार्टी के दो तिहाई सदस्यों की सहमति दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए सिर्फ एक शर्त है, लेकिन इससे परे भी कुछ है। इस लेख में यह मुद्दा उठाया गया है कि आप और भाजपा के बीच जहां तक विलय की बात है, तो आप राष्ट्रीय पार्टी, अपने राष्ट्रीय मुखिया के माध्यम से ऐसे विलय की घोषणा करे, और उसके बाद सारे सदनों में दो तिहाई निर्वाचित व्यक्ति ऐसे विलय को स्वीकार करें, तो वह विलय वैध रहेगा। अन्यथा यह किसी सदन में कुछ निर्वाचित लोगों द्वारा अपनी पार्टी छोडक़र दूसरी पार्टी में जाने सरीखा रहेगा।

इस लेख में आगे व्याख्या की गई है कि महाराष्ट्र के शिवसेना के केस में एकनाथ शिंदे ने सिर्फ शिवसेना से अलग होकर भाजपा के साथ जाना तय नहीं किया था, इस केस में शिंदे ने यह दावा भी किया था कि वे ही असली शिवसेना हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में यह माना था कि कोई विधायक दल (या संसदीय दल) अपने राजनीतिक दल से परे स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि किसी विधायक-संसदीय दल को अपनी मूल पार्टी से अलग-अलग काम करने देना संविधान की 10वीं अनुसूची को शिकस्त देने जैसा होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर किसी राजनीतिक दल की परिभाषा को विधायक-संसदीय दल मान लिया जाएगा, तो यह परिभाषा काम नहीं आ सकेगी, यह 10वीं अनुसूची की भावना के खिलाफ होगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने यह भी माना था कि संसदीय-विधायक दल के बहुमत से यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि कौन सा गुट मूल पार्टी है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों की रौशनी में मनु सिबेस्टियन के लेख के इस निष्कर्ष को देखा जाना चाहिए कि राघव चड्ढा एवं अन्य लोगों द्वारा जिसे विलय कहा जा रहा है, वह संविधान की 10वीं अनुसूची के हिसाब से कोई मजबूत बचाव नहीं है। दूसरी तरफ हाईकोर्ट का एक फैसला ऐसा भी है जो ऐसे विलय को कानूनी ठहराता है, हालांकि इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की कोई राय नहीं आई है।

हम संविधान के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से परे एक दूसरी बात भी सोचते हैं जिसके लिए कानूनी समझ को मिटाकर प्राकृतिक न्याय की समझ का इस्तेमाल करना पड़ेगा। कोई भी राज्यसभा सदस्य जनता के बीच से चुनकर नहीं आते हैं। जब पार्टी किसी को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाती है, तो उस पार्टी के सांसद और विधायक उस उम्मीदवार को चुनते हैं। इसलिए ये उम्मीदवार राज्यसभा सदस्य बनकर अपने दम पर राज्यसभा पहुंचने का दावा नहीं कर सकते। जब किसी पार्टी के जनता द्वारा निर्वाचित सांसद और विधायक किसी को राज्यसभा सदस्य बनाते हैं, तो वह परोक्ष रूप से उन सांसदों और विधायकों को वोट देने वाली जनता का समर्थन भी रहता है। अब अगर ऐसे में किसी राज्यसभा सदस्य को पार्टी छोडऩी है, या उसके संसदीय दल के किसी हिस्से को, चाहे वह बहुमत के आधार पर ही क्यों न हो, किसी दूसरे दल में विलय करना हो, तो इसके लिए नैतिक आधार तो तभी बनेगा, जब वे राज्यसभा की सदस्यता छोड़ देंगे। राज्यसभा के लिए निर्वाचित होना जनता के बीच से चुनकर विधायक या सांसद बनने से बिल्कुल अलग बात रहती है। जनता के वोटों से निर्वाचित होने पर लोग यह दावा कर सकते हैं, कि वोटरों ने पार्टी निशान से परे उनका भी नाम और चेहरा देखकर वोट दिया था। लेकिन राज्यसभा का निर्वाचन को पार्टी द्वारा जारी व्हिप के आधार पर पार्टी के निर्वाचित विधायकों और सांसदों द्वारा होता है, इसलिए किसी पार्टी के कोई राज्यसभा सदस्य अपने दम पर जनता के बीच से चुनकर आने का दावा नहीं कर सकते। संवैधानिक व्यवस्था की अधिक जानकारी कभी-कभी प्राकृतिक न्याय के महत्व को कम आंकती है, हमारे साथ सहूलियत यह है कि हम संवैधानिक व्यवस्था के बहुत ही मामूली जानकार हैं, दूसरी तरफ प्राकृतिक न्याय की हमारी समझ थोड़ी सी अधिक मजबूत है, इसलिए हम इस तरह के दलबदल को विलय मानने के बजाय धोखाधड़ी और दलबदल ही मानेंगे, अदालत चाहे तो इसे कुछ और भी मान सकती है।

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