संपादकीय
भारत में हाल के दशकों में ऐसे नेताओं की गिनती बढ़ती चल रही है जो एक चुनाव एक पार्टी से लड़ते हैं, और ठीक अगला चुनाव किसी दूसरी पार्टी से। कुछ नेता तो ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने दूसरी पार्टी में जाते हुए अपनी निर्वाचित सीट से इस्तीफा दे दिया, और उसी उपचुनाव में दूसरी पार्टी की टिकट पर लडक़र फिर जीत गए। पंजाब में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा के सदस्य थोक में भाजपा में चले गए, जबकि उन्हें चुनने वाले आम आदमी पार्टी के विधायक और सांसद थे। दलबदल की ऐसी अलग-अलग कई किस्म की कहानियां हैं, और हर बार कुछ लोग यह नैतिक सवाल उठाते हैं कि क्या दलबदल करने वालों को सदन की सदस्यता से इस्तीफा भी देना चाहिए क्योंकि वे दूसरी पार्टी के समर्थक मतदाताओं के वोटों से भी जीतकर आए रहते हैं। भारत में पहले किसी पार्टी को छोडऩे वाले सांसद या विधायक सदन में एक तिहाई से अधिक रहने पर उसे दलबदल नहीं माना जाता था, और उसे विभाजन माना जाता था। एक तिहाई से कम के दलबदल पर सदन की सदस्यता भी चली जाती थी। लेकिन जब एक तिहाई का दलबदल करवाना धन-बल से आसान काम हो गया, तो कानून बदलकर इस सीमा को दो तिहाई किया गया। लेकिन जैसा कि अभी पंजाब के राज्यसभा के मामले में हुआ है दो तिहाई सदस्यों का दलबदल करवाना भी मुश्किल काम नहीं रह गया। इसके पहले महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन के वक्त भी दलबदल के कई संवैधानिक पहलू सामने आए थे।
नेताओं के वैचारिक रूप से बिल्कुल ही विपरीत पार्टियों में भी जाकर वहां भी पार्टी टिकट पाकर निर्वाचित हो जाने को देख-देखकर जनता थकी हुई है। कुछ लोग सोशल मीडिया पर यह भी लिख रहे हैं कि ऐसे लोगों पर 20 बरस के लिए चुनाव लडऩे पर रोक लगा देनी चाहिए। हम भी अपने अखबार में बीते दशकों में बार-बार यह बात लिखते आए हैं कि एक पार्टी टिकट पर चुनाव जीतने वाले लोग अगर उस कार्यकाल के बीच में ही किसी दूसरी पार्टी में चले जाते हैं, तो वे अपने मतदाताओं को भी धोखा देते हैं, और उनके अगले चुनाव लडऩे पर रोक लगनी चाहिए। हमारी यह सोच कुछ उसी तरह की है जो कि रिटायर्ड जज, फौजी अफसर, या बड़े सरकारी अफसर के रिटायर होने के तुरंत बाद किसी निजी कंपनी में काम करने पर रोक की है। लोगों को सांस लेने का वक्त मिलना चाहिए। मछली अगर पेड़ पर जीना तय करे, तो उसे रातोंरात पेड़-प्राणियों का मुखिया बनाना ठीक नहीं होगा। इसी तरह पेड़ पर पीढिय़ों से जीने वाले पंछी अगर पानी के भीतर जाकर जीना तय करें, तो उन्हें कुछ मौका देना चाहिए, और जलचर संघ का मुखिया तुरंत नहीं बनाना चाहिए। लोग वैचारिक आधार पर दूसरे दल में जाएं इसमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन प्राकृतिक न्याय के नजरिए से भी देखें तो दशकों से किसी पार्टी में दरी उठाने और पानी पिलाने वाले पुराने कार्यकर्ताओं को छोडक़र नए-नवेले, बीती रात ही पार्टी में आए नेताओं को उम्मीदवार बनाना तो नैतिकता के हिसाब से भी गलत है। और राजनीति में सिर्फ चुनावी नजरिए से संभावनाओं को लचीला रखने के लिए नैतिकता की ऐसी अनदेखी भी ठीक नहीं है। हम वकालत करते आए थे कि दलबदलुओं को दूसरी पार्टी से अगला चुनाव लडऩे न मिले, वे अगर चाहें तो उस दूसरी पार्टी के संगठन में काम करने के लिए अपनी क्षमताओं को दे सकते हैं।
लेकिन अभी जब हम इस बारे में दुनिया के अलग-अलग देशों की व्यवस्था देख रहे हैं, तो जिन्हें हम बड़ा परिपक्व लोकतंत्र मानते हैं, उनमें भी दलबदलुओं को लेकर कोई कड़े कानून नहीं हैं। शायद इसलिए भी ऐसा हो सकता है कि उन देशों में भारत की तरह बड़े पैमाने पर दलबदल नहीं होता होगा। ब्रिटेन, अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, जापान, न्यूजीलैंड इनमें से किसी देश में दलबदल करने वालों पर अगला चुनाव लडऩे की रोक नहीं है। बल्कि हैरानी की बात यह है कि जिन्हें विकासशील देश माना जाता है, ऐसे देशों, पाकिस्तान, बांग्लादेश, और कुछ अफ्रीकी देशों में दलबदल करने वालों के अगला चुनाव लडऩे पर कुछ-कुछ रोक है। और वहां पर इसे ठीक उसी तरह का कूलिंग-ऑफ पीरियड कहा गया है, जिस तरह की बात ऊपर हमने अफसरों, जजों, और फौजियों के बारे में लिखी है। जब इस बारे में हमने अलग-अलग देशों के राजनीतिक विचारकों की सोच ढूंढने की कोशिश की, तो 18वीं सदी के एक पश्चिमी राजनीतिक विचारक, एडमंड बर्के ने एक भाषण में कहा था कि सांसद पार्टी के गुलाम नहीं होते, बल्कि वे अपने विवेक से फैसले लेते हैं। इस एक बात को दलबदल के पक्ष में एक मजबूत तर्क मान लिया जाता है। बाद के दशकों में, या बाद की सदियों में अलग-अलग देशों ने संसद के भीतर किसी पार्टी के लिए मतदान में उसके सदस्यों के साथ देने को अनिवार्य भी बनाया, जैसा कि भारत ने। और इससे विवेक की बात जाती रही। कुछ दूसरे विचारकों ने सांसदों के दलबदल को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मा की आवाज के आधार पर छूट देने की वकालत की। एक अन्य विचारक का कहना था कि बहुत सख्त पार्टी अनुशासन लोकतंत्र को कमजोर करता है। भारत की संविधान सभा में डॉ.बी.आर. अंबेडकर ने दलबदल विरोधी कानून के विचार का विरोध किया था, और उनका मानना था कि इससे असहमति खत्म हो जाएगी। एडमंड बर्के की बात से हमने यह चर्चा शुरू की, और उनका मानना था कि सांसद को पार्टी व्हिप, या पार्टी के दबाव में नहीं आना चाहिए। अगर उसे ईमानदारी से यह लगे कि उसकी पार्टी गलत है, तो उसे पार्टी के खिलाफ वोट देना चाहिए।
इस तरह हम देखते हैं कि संसदीय व्यवस्थाओं में हमारे अखबार की सोच की कोई मिसाल दिखती नहीं है। हमें दलबदलू के अगले चुनाव लडऩे पर रोक की जो बात सूझती है, उसे किसी दूसरे लोकतंत्र में अमल में नहीं लाया गया। शायद ही कोई परिपक्व लोकतंत्र भारत की तरह दलबदल का शिकार रहा हो, या 18वीं सदी से अब तक के जिन विचारकों की बात हम अभी पढ़ ही रहे हैं, उन्हें दलबदल की इस जंगल की आग का अंदाज भी नहीं रहा होगा। जो भी हो, राजनीतिक विचारधाराएं कई बार इतिहास के पन्ने पलटकर देखती हैं कि उन्हें किसी मिसाल से कुछ सीखने के लायक मिलता है, या उनके सामने खुद एक नई मिसाल बनने की चुनौती है। ऐसे में दुनिया की अधिकतर संसदीय व्यवस्थाओं में उनके स्तर के दलबदल पर तो वही सोच हावी दिखती है कि सांसदों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता ऊपर रहनी चाहिए, और फिर वे अगर दलबदल करते हैं, तो उन्हें जनता पर छोड़ देना चाहिए जो कि अगले चुनाव में चाहे तो दलबदलू को हरा भी सकती है। अब चुनाव लडऩा अपने आपमें भारत में जितनी भ्रष्ट व्यवस्था हो चुकी है, उसमें क्या सचमुच ही जनता को अपनी स्वतंत्र और निष्पक्ष राय देने का कोई माहौल रह गया है? पता नहीं अलग-अलग देशों का राजनीतिक माहौल बिल्कुल अलग-अलग रहते हुए उनकी राजनीतिक और चुनावी व्यवस्थाओं की दूसरे देशों से तुलना ठीक है, या नहीं है। जो भी हो, जब हमें अपनी सोच के खिलाफ इतने सारे देशों से इतने सारे तर्क मिले, तो उन्हें भी पाठकों के सामने रख देना ठीक है कि हम अपनी अधिक नैतिकता की उम्मीदों के साथ शायद अकेले ही है।


