संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : धान से परे की फसलों पर नगद प्रोत्साहन खराब नहीं
सुनील कुमार ने लिखा है
10-Jun-2026 9:12 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय :  धान से परे की फसलों पर नगद प्रोत्साहन खराब नहीं

छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल में आने वाली खरीफ फसल से एक नई नीति मंजूर की है जिसके तहत सरकार धान पर किसानों की निर्भरता कम करने के लिए एक नगद प्रोत्साहन देने वाली है। सरकार ने कल कहा है कि इस मानसूनी फसल से ही यह शुरू होगा कि धान की जगह पर दलहन, तिलहन, मक्का, कोदो, कुटकी, रागी, या कपास जैसी फसल लेने वाले किसानों को सरकार 15 हजार रूपए प्रति एकड़ की प्रोत्साहन राशि देगी। सरकार का यह मानना है कि इस फैसले से राज्य में धान से परे की दूसरी फसलों को भी मौका मिलेगा, किसानों की आय बढ़ेगी, साथ ही फसल विविधीकरण होगा। दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार बीते दो विधानसभा चुनावों में धान के दाम देश के समर्थन मूल्य से खासे अधिक बढ़ाकर अपने ऊपर बहुत बड़ा बोझ डाल चुकी है। 2018 के विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस पार्टी ने भी धान के खासे अधिक दाम देना तय किया था, और कांग्रेस की सरकार बनी तो कृषि कर्जमाफी के साथ-साथ यह अधिक दाम किसानों को दिया गया। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस से भी दस कदम आगे बढक़र धान के दाम 31 सौ रूपए क्विंटल करने की घोषणा की थी, साथ ही प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान खरीदने की भी। अभी बीते मानसूनी मौसम के बाद दीवाली के समय आई फसल सरकार पर एक बहुत बड़ा बोझ बनकर आई थी, और सरकार को यह निगरानी भी रखनी पड़ी थी कि पड़ोसी राज्यों से धान लाकर इस प्रदेश में बेचकर यहां की सरकारी अनुदान राशि का बेजा इस्तेमाल न हो। इन सबके बावजूद, और जगह-जगह सरकार ने धान खरीदी की प्रक्रिया में छेद बंद करने के लिए कई तरह की कार्रवाई भी की थी, फिर भी दूसरे प्रदेशों से आया हुआ धान जगह-जगह गाडिय़ों सहित पकड़ाते भी रहा। इसलिए राज्य मंत्रिमंडल का यह फैसला सरकार को आर्थिक मुसीबत से बचाने के लिए भी कोई घाटे का सौदा नहीं है। 15 हजार रूपए प्रति एकड़ देने की सरकार की घोषणा से 60-65 हजार रूपए प्रति एकड़ की धान खरीदी से सरकार बचेगी।

फसल का समर्थन मूल्य देश में एक बड़ा राजनीतिक और चुनावी मुद्दा बन चुका है। इसका देश की कृषि अर्थव्यवस्था से रिश्ता पूरी तरह टूट गया है। किसानों को अनुदान कई किस्म से मिलते हैं। उन्हें कृषि कर्ज बहुत मामूली ब्याज पर मिलता है, अधिकतर राज्यों में खेतों को बिजली रियायती या मुफ्त मिलती है। इसके साथ-साथ अब यह चुनावी चलन बढ़ते चल रहा है कि राष्ट्रीय समर्थन मूल्य से आगे जाकर राज्य फसल खरीदी करें। छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद ओडिशा के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को 31 सौ रूपए के ही धान खरीदी मूल्य की घोषणा करनी पड़ी थी, और इसके साथ वह वहां सत्ता पर आ पाई थी। लेकिन धान की फसल के साथ एक दूसरी दिक्कत और है। यह फसल ढेरों पानी मांगती है, और हर जगह न तो नहर का पानी रहता है, न हर वक्त मानसून का पानी जरूरत के वक्त मिलता है, इसलिए किसान पंप लगाकर खेतों को भूगर्भीय जल से लबालब भर देते हैं। बीती कुछ सरकारों के समय से यह भी चल रहा है कि खेती के पंपों को सोलर पैनलों से जोड़ दिया गया है, खेतों के पंप की बिजली मुफ्त कर दी गई है। इन सबके साथ-साथ जब फसल बाजार भाव से बहुत ऊंचे दाम पर खरीदी जाती है, तो यह सब कुछ किसान को एक अनुदान के रूप में ही दिया जाता है। दुनिया के तमाम देशों में किसानों को ऐसे अनुदान मिलते हैं, और आज ट्रम्प जिस अंदाज में दुनिया के देशों के साथ बंदूक की नोंक पर व्यापारिक समझौते कर रहा है, उनमें से बहुत सारी शर्तें अमरीकी किसानों की उपज दूसरे देशों पर थोपने की भी हैं। दुनिया के कुछ देश अपने किसानों को कोई उपज न लेने के लिए भी प्रति एकड़ नगद अनुदान देते हैं। छत्तीसगढ़ में भी अगर देखें, तो हर एकड़ पर सरकार जो करीब 65 हजार का धान खरीदने का वायदा कर चुकी है, उसकी आधे से अधिक उत्पादकता सरकार को शायद नहीं मिलती है। धान की खरीदी की प्रक्रिया, मिलिंग की प्रक्रिया, खुले में पड़े हुए धान की बर्बादी, और फिर उस धान की औने-पौने रेट पर बिक्री, इन सबको अगर देखें, तो सरकार की बहुत बड़ी सब्सिडी धान किसान को मिलती है।

अब अर्थव्यवस्था से परे जैव विविधता की बात करें, तो छत्तीसगढ़ जैसे गारंटीशुदा खरीदी वाले राज्य में एक बहुत बड़ा मुद्दा यह बन जाता है कि धान की जिस वेरायटी की उपज सबसे अधिक है, उसे छोडक़र और कोई धान नहीं उगाया जाता। इस तरह बाकी फसलें तो खत्म होती चल रही हैं, खुद धान के भीतर भी सिर्फ गिनी-चुनी किस्में जिंदा रह रही हैं, क्योंकि उनका सरकारी दाम किसान के फायदे का है। यह बात राज्य बनने के समय से चली आ रही थी कि फसल विविधता बहुत जरूरी है। उस वक्त इसे फसल चक्र परिवर्तन जैसे कुछ नामों से बहस में लाया भी गया था, लेकिन चुनावी नारों के सरलीकरण में जटिल फेरबदल की कोई गुंजाइश बची नहीं थी। एक के बाद दूसरा चुनाव, एक के बाद दूसरी फसल, धीरे-धीरे करके यह सब कुछ धान केन्द्रित होते चले गया, और बाकी किसी भी उपज में किसान की दिलचस्पी नहीं रही। यह भी हो सकता है कि कुछ और किस्म की फसलों में अधिक पूंजीनिवेश, और अधिक फायदा होता हो, लेकिन छत्तीसगढ़ी किसानों ने वह खतरा उठाना मुनासिब नहीं समझा, और धान की देखी, परखी, खरी फसल लोगों पर एकाधिकार कर चुकी है।

मंत्रिमंडल का फैसला आसान हैं, लेकिन किसानों को उस तरफ जाने के लिए प्रेरित करना उतना ही मुश्किल रहेगा। नए-नए किस्म की फसल, और उस फसल के संगठित बाजार का जब तक इंतजाम नहीं होगा, तब तक किसान खतरा उठाने की हिम्मत शायद ही दिखाएंगे। इसलिए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अगुवाई में मंत्रिमंडल ने यह जो फैसला किया है, यह कड़े दिल से लिया गया फैसला है, लेकिन राज्य के आर्थिक नुकसान का बिल्कुल नहीं है। लोग अगर धान से परे दूसरी फसलों की तरफ जाएंगे, तो इससे राज्य पर बोझ कम होगा, धरती और कुदरत पर भी बोझ कम होगा, और छत्तीसगढ़ी किसान विविधता का हौसला विकसित कर पाएंगे, जो कि लंबी जिंदगी के लिए एक जरूरी बात है।

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


अन्य पोस्ट