संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : गाय दूध दे तब तक ही माँ, उसके बाद काटने लायक!
सुनील कुमार ने लिखा है
26-May-2026 6:14 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : गाय दूध दे तब तक ही माँ, उसके बाद काटने लायक!

बंगाल में भाजपा की सरकार आने के बाद दुबारा जारी किया गया एक सरकारी आदेश बड़ा बवाल खड़ा कर रहा है। इसमें नया कुछ नहीं है, पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम 1950 को ही कड़ाई से लागू करने के लिए कहा गया है। इसे चुनौती देते हुए कुछ राजनीतिक दल, और कई पशु कारोबारी संगठन हाईकोर्ट तक पहुंचे, लेकिन हाईकोर्ट ने इसमें कोई दखल देने से मना कर दिया। यह आदेश गौवंशीय पशुओं को काटने को लेकर 1950 के एक कानून को दुहराता है जिसमें कहा गया है कि गाय, बैल, बछड़े, भैंस, आदि गौवंशीय पशुओं का वध तभी किया जा सकेगा जब उसके लिए सरकारी डॉक्टर की तरफ से सर्टिफिकेट जारी होगा। यह इजाजत तभी मिलेगी जब ऐसे पशु की उम्र 14 वर्ष से अधिक हो, वह कोई काम करने के लायक न हो, आगे बच्चे पैदा करने में अयोग्य हो, या स्थाई रूप से विकलांग या रोगग्रस्त हो। डॉक्टर के सर्टिफिकेट के बाद भी ऐसे पशुओं को म्युनिसिपल द्वारा निर्धारित बूचडख़ानों में ही काटा जा सकेगा। यह कानून 1950 का है, आज की भाजपा सरकार का बनाया हुआ नहीं है। इस पौन सदी में किस सरकार ने इसका कितनी कड़ाई से इस्तेमाल किया, वह इतिहास तो अब न कहीं दर्ज होगा, और न ही अब किया जा सकता। फिर भी भाजपा सरकार ने इसे सख्ती से लागू करने भर का काम किया है।

बकरीद एक ऐसा मुस्लिम त्यौहार है जिसमें बड़ी संख्या में अलग-अलग जानवरों की कुर्बानी देने की परंपरा है, और इस कड़ाई के कारण इस बार की बकरीद पर गौवंश के पशुओं की कुर्बानी सरकारी डॉक्टर की इजाजत से ही दी जा सकेगी, वह भी किसी बूचडख़ाने में। मतलब यह कि धार्मिक रूप से, कई जगहों पर सार्वजनिक स्तर पर जो कुर्बानी दी जाती थी, वह अब गौवंश के साथ तो इस बकरीद नहीं हो सकती। इससे गौवंश, और भैंसवंश के पशुओं की खरीद-बिक्री एकदम ठप्प हो गई है, और पशु कारोबारियों में बड़ी संख्या ऐसे गैरमुस्लिम लोगों की है जिन्होंने इस मौके के कारोबार के लिए खासा पूंजीनिवेश कर रखा था, और पशु इकट्ठा कर रखे थे। लेकिन अब जब सरकार ने पिछले कानून को सख्ती से लागू करना तय कर लिया है, हाईकोर्ट ने तमाम याचिकाओं का तेजी से निपटारा करते हुए यह तय कर लिया है कि गाय की कुर्बानी इस्लाम में अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। मुस्लिम समाज के बहुत से नेताओं ने यह सार्वजनिक अपील की है कि गौवंश की कुर्बानी न दी जाए। मुस्लिम नेताओं ने केंद्र सरकार से यह भी मांग की है कि पूरे देश में गौवंश को मारने पर कानूनी रोक लगाई जाए। ऐसे में अब कुछ राजनीतिक दल, कुछ मुस्लिम संगठन, और कुछ पशु कारोबारी हाईकोर्ट में कुर्बानी की ऐसी प्रथा को जारी रखने की याचिकाओं को खारिज पा चुके हैं, और धंधा मंदा जरूर रहेगा, लेकिन गौवंश की कुर्बानी अब सजा की हकदार रहेगी।

बकरीद के निपट जाने के बाद भी बंगाल में बूचडख़ानों में जानवरों को काटने के लिए 1950 के नियम को देखें, तो राज्य में गौवंश को काटने पर कोई अलग से रोक नहीं है। यह बात सत्तारूढ़ भाजपा की देश भर की रीति-नीति के साथ कुछ विरोधाभास वाली है, और इसे कानून के साथ-साथ जानवरों की जिंदगी से जोडक़र भी देखने की जरूरत है। हमने जब भारत में गौवंशीय पशुओं, गाय और भैंस की उम्र और उत्पादकता का रिश्ता देखा, तो आंकड़े बताते हैं कि देसी गाय की उत्पादक उम्र 8 से 12 साल रहती है, क्रॉस ब्रीड गाय की उत्पादक उम्र 6 से 9 साल, और भैंस की उत्पादक उम्र 10 से 14 साल। इन जानवरों की उत्पादक उम्र का मतलब इनके दूध देने से है। अब इसके बाद इन जानवरों की औसत और अधिकतम संभावित उम्र अगर देखें, तो देसी गाय की औसत उम्र 15-20 साल रहती है, अधिकतम उम्र 22-25 साल। क्रॉस ब्रीड गाय की औसत उम्र 12 से 16 साल, और अधिकतम आयु 18-20 साल। भैंस की औसत उम्र 18-22 साल, और अधिकतम उम्र 25-28 साल। जानवरों के जानकार तथ्य बताते हैं कि बोलचाल में गाय-भैंस की औसत उम्र 15-20 साल कही जाती है। हमने यह पता लगाने की कोशिश की कि औसत उत्पादक उम्र के बाद ये जानवर औसत और कितना जी सकते हैं। देसी गाय दूध देना बंद करने के बाद औसत 4-8 साल रह सकती है, और अधिकतम उम्र 8 से 10 साल भी। क्रॉस ब्रीड गाय दूध देना बंद करने के बाद 4 से 7 साल औसतन जीती है, लेकिन वह अधिकतम 7 से 9 साल भी जी सकती है। भैंस उत्पादक उम्र के बाद 6 से 10 साल औसतन जी सकती है, लेकिन उसकी अधिकतम उम्र 10-12 साल भी हो सकती है।

अब इन पशुओं के जो मालिक हैं, उनके लिए उत्पादकता खत्म होने के बाद 8-10 साल इन्हें पालना बड़ा भारी पड़ेगा, यह समझा जा सकता है। चूंकि सरकार का कानून अभी अपनी पहली बकरीद के पहले खुलासे से सामने आया है, और उसने गोवध पर कोई पूरी पाबंदी नहीं लगाई है, इसलिए यह माना जाना चाहिए कि गाय-भैंस को काटने की इजाजत कुछ शर्तों के साथ जारी रहेगी, और इन शर्तों को हम ऊपर गिना चुके हैं। अब सवाल यह उठता है कि 8 से 12 बरस तक जो गाय गऊमाता रहेगी, वह बाद के बरसों में किस तरह काटी जा सकेगी, क्या उत्पादकता खत्म होने से गऊमाता का उसका दर्जा खत्म हो जाएगा? और क्या भैंसी-मौसी के साथ भी दूध बंद होने के साथ-साथ लगाव खत्म हो जाएगा, और सरकारी इजाजत से उसे काटा जा सकेगा? सरकार का ताजा आदेश चूंकि हाईकोर्ट में काफी सख्त जांच और आंच झेल चुका है, इसलिए हम उसमें कोई कमजोरी नहीं देख रहे हैं। उस आदेश के तहत यह इजाजत है कि उत्पादकता खत्म होने, या 14 बरस की उम्र हो जाने, या स्थाई विकलांगता या बीमारी की वजह से इन पशुओं को बूचडख़ाने में काटा जा सकेगा।

अब एक बुनियादी सवाल हमारे मन में यह उठता है कि गाय से माँ जैसा रिश्ता, उससे एक धार्मिक और भावनात्मक लगाव, यह सब क्या उसकी उत्पादकता से जुड़ा हुआ है? क्या जब तक दूध मिले, तभी तक वह माँ रहेगी? आज देश में ऐसे इंसानों को सार्वजनिक रूप से सोशल मीडिया पर कोसा जाता है, जो अपने बूढ़े माँ-बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं। तो क्या बंगाल में अब भाजपा की सरकार आने के बाद भी गऊमाता दूध देने तक माता रहेगी, और उसके बाद बूढ़ी हो जाने, सूख जाने, बीमार या विकलांग हो जाने पर वह काट दी जाएगी? बात सुनने में कुछ दिक्कत की लग सकती है, लेकिन जब कभी किसी सैद्धांतिक ईमानदारी का कोई सवाल उठाया जाएगा, तो वह नुकीले कांटों की तरह कुछ असुविधा का तो रहेगा ही। विनायक दामोदर सावरकर ने गाय को एक आम पशु लिखा था, और उसकी उत्पादकता खत्म हो जाने के बाद उसे काट देने की खुली सार्वजनिक वकालत की थी। उनके लिखे हुए लेख निर्विवाद रूप से मौजूद हैं, और उन्होंने गाय को पशु से अधिक कुछ मानने को मूर्खतापूर्ण कहा था। आज बंगाल में नई सरकार के लागू किए जा रहे पुराने कानून से सावरकर की सोच मजबूती से लागू हो रही है। लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा के सामने इससे कुछ नैतिक सवाल भी उठ खड़े होते हैं कि दूध देना बंद हो जाने पर गऊमाता का माता रहना भी जिस तरह खत्म कर दिया जा रहा है, उससे क्या ऐसा नहीं लग रहा कि इंसान गऊमाता के लिए भी उतना ही अहसानफरामोश हो रहा है, जितना कि वह अपने इंसानी माँ-बाप के लिए फायदा पूरा निचोड़ लेने के बाद हो जाता है?

यह एक अलग बात है कि भारत अपने आपमें एक योरप की तरह बहुत सी अलग-अलग संस्कृतियों वाले प्रदेशों का देश है। भाजपा के ही केन्द्रीय मंत्री, और कुछ मुख्यमंत्री अरूणाचल, गोवा, या केरल जैसे राज्यों में गोमांस के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन गौवंश के साथ जिस तरह की भावनाएं बाकी राज्यों में जुड़ गई हैं, उनसे यह असुविधाजनक सवाल खड़ा ही रहेगा कि गाय कहां-कहां माँ है, किस उम्र तक माँ है, किस मकसद से माँ है, और कब उसे माँ की कुर्सी से रिटायर करके पशु बना दिया जाएगा। सोचकर देखिए!

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