संपादकीय
दुनिया में डॉनल्ड ट्रम्प जैसे बेवकूफों की कमी नहीं है जो जलवायु परिवर्तन को एक फर्जी दावा मानते हैं। और भी बहुत से लोग अपने सुख या दुख के घरौंदों के भीतर रहते हुए यह मानकर चलते हैं कि पर्यावरण शायद एक दिन अपने आप ठीक हो जाएगा, या कि यह महज सरकार की जिम्मेदारी है, और इसमें उनके करने का भला क्या है। लेकिन पूरी दुनिया में जगह-जगह जलवायु परिवर्तन से जो स्थाई नुकसान होना शुरू हो रहा है, वह आगे बढ़ते ही चलना है। मिसाल के लिए राजस्थान का गर्मी का यह मौसम देखें, तो वहां यूपी-बिहार से आए हुए लाखों खेतिहर मजदूर वापिस अपने गांव लौट रहे हैं, क्योंकि 48 से 50 डिग्री तक गर्म होने वाले राजस्थान की सूखी मिट्टी में पानी इतना नीचे जा चुका है, और जाते जा रहा है कि वहां के बहुत से हिस्सों में अब खेती मुमकिन नहीं रह गई है। जो खेतिहर मजदूर पिछले 10-15 बरस से वहां फल-सब्जी, और मसालों के खेतों में काम करते थे, वे वापिस जा रहे हैं कि राजस्थान के खेतों में अब फसल मुमकिन नहीं रह गई। इनमें खेतिहर मजदूरों से थोड़े ऊपर के ऐसे किसान भी हैं जो राजस्थान जाकर खेती करते थे, लेकिन अब वह मुमकिन नहीं रह गया।
राष्ट्रीय अप्रवासन सर्वेक्षण (एनआईएस, और आईआईएम अहमदाबाद) की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में राजस्थान से पिछले बरस करीब 13 लाख मजदूर यूपी-बिहार लौटे, इनमें से तीन चौथाई छोटे और सीमांत किसान थे, और बाकी खेतिहर मजदूर थे। राजस्थान के कई जिलों में, प्याज, जीरा, और ग्वारफल्ली की खेती करने वाले पूरब के ये मजदूर परिवार सहित रेलगाडिय़ों पर लदकर लौट रहे हैं। राजस्थान में पिछले तीन साल से मानसून करीब आधा ही रहा। नहरों में पानी नहीं है, ट्यूबवेल सूख गए हैं क्योंकि जमीन के नीचे पानी पांच-छह सौ फीट तक नीचे चला गया है। ऐसी सूखी हालत में जीरे की फसल एक तिहाई-एक चौथाई रह गई है। पशुओं के लिए भी चारा नहीं है, इसलिए दूध-दही का कारोबार भी ठप्प है, या खत्म है। जो मजदूरी बनती है, वह खाने-रहने में ही खर्च हो जाती है। एक वक्त बिहार और यूपी के कई जिलों से परंपरागत रूप से हर बरस राजस्थान आकर काम करने वाले किसान-मजदूर पहले तो यहां के भरोसे पीछे देश में भी घर चला लेते थे, लेकिन वे अब देश ही लौटकर पशुपालन या मनरेगा की मजदूरी पर चल रहे हैं। और यह सिलसिला अभी शुरू ही हुआ है, यह रिपोर्ट सिर्फ राजस्थान से आई है। देश भर में अगर ऐसा व्यापक सर्वे होगा, तो कई दूसरे प्रदेशों से कई दूसरे प्रदेशों में लोगों का यह बेबस-प्रवास बेहतर तरीके से दर्ज हो सकेगा। लोग सूखे-प्यासे राजस्थान से अपने यूपी-बिहार लौट तो रहे हैं, लेकिन उधर घर पर बाढ़ का एक अलग खतरा है जो हर बरस बहुत बड़े इलाकों डुबा देता है, और गाद-मिट्टी से खेत पट जाते हैं, बाढ़ के इलाकों में फसलें डूब या बह जाती हैं। जलवायु परिवर्तन से एक तरफ सूखा बढ़ रहा है, और एक तरफ अचानक कम वक्त में बहुत अधिक बारिश से बाढ़ बढ़ रही है।
कृषि अर्थशास्त्रियों की बात सुनें, तो प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, फसल बीमा, और मनरेगा जैसे कार्यक्रमों में जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाले जलवायु-प्रवास का कोई जिक्र नहीं है। अभी तक सरकारें इसे मौसमी-मजदूरी मानकर चल रही हैं, जबकि यह जलवायु परिवर्तन से होने वाले मजबूर-मजदूर-प्रवास का मामला है। यूपी और बिहार में जलवायु-प्रवास फंड बना जरूर है लेकिन उसमें इतना छोटा बजट रखा गया है कि 25 लाख से अधिक प्रभावित परिवार हैं, और रकम कुल 120 करोड़ है। आईआईटी गांधीनगर के जलवायु वैज्ञानिक प्रो.वीरेन्द्र सिंह का कहना है कि 2030 तक राजस्थान से 40 लाख लोग बिहार लौटेंगे, और 60 लाख लोग यूपी लौटेंगे। एक तरफ खेतिहर मजदूर गायब हो जाएंगे, क्योंकि खेतों में फसल गायब होती जा रही है, या इतनी घटती जा रही है कि उसमें भूस्वामी और किसान-मजदूर सबका गुजारा नहीं है। ऐसे में खेतिहर-मजदूर शहरी स्लम-मजदूर बनकर रह जाएंगे, शहरों में झोपड़पट्टियों की गिनती और आबादी बढ़ती जाएगी, दूसरी तरफ शहरों में गर्मी से जो बुरा हाल बढ़ते जाना है, बढ़ते ही जा रहा है, उसकी वजह से वहां साल के दर्जनों दिन काम ठप्प रहेगा, किसी तरह का काम खुले में हो नहीं सकेगा। शहरों की गर्मी में लोगों के मरने की नौबत अधिक आएगी, दूसरी तरफ शहरों में बढ़ती गर्मी की वजह से लोगों की उत्पादकता घटती जाएगी, और एक मजदूर की तरह वहां रहना मुश्किल हो जाएगा।
जब जलवायु से जुड़ी इन बातों को दिल्ली जैसे महानगर की प्रदूषित जहरीली हवा के असर से जोडक़र देखेंगे, तो समझ पड़ेगा कि वहां साल में कुछ महीने कंस्ट्रक्शन बंद रहता है, कारखाने बंद रहते हैं, गाडिय़ों की आवाजाही पर रोक रहती है, उस हवा में सांस लेकर जीने का मतलब एक औसत उम्र को 8-10 बरस घटा देना रहता है। ऐसे में वहां सालाना मजदूरी के दिन इस वजह से भी घटते जा रहे हैं। अब पिछले कई हफ्तों से गैस की कमी से छोटे-छोटे कारखाने बंद हैं, खाने-पीने से जुड़े कारोबार बंद हैं, और मजदूरों को निर्माण और उत्पादन के केन्द्र छोडक़र घर लौटना पड़ रहा है। जब इस तरह की जंग से पैदा आपदा को जलवायु-आपदा के साथ जोडक़र देखें, तो लगता है कि मजदूर की तो हर कहीं मौत है। अब ऐसे में केन्द्र और राज्य सरकारों के जिम्मे क्या आता है? ईरान की जंग और ऊर्जा-खाद के संकट पर तो सरकार का तात्कालिक काबू कुछ नहीं है, इससे जूझने-निपटने के लिए सरकारों को घरेलू आत्मनिर्भरता बढ़ाने के साथ-साथ निजी गाडिय़ों की खपत पर बुरी तरह रोक भी लगानी होगी, और उसके पहले सरकारों को सार्वजनिक परिवहन को बहुत आगे तक ले जाना होगा।
हम जलवायु के मुद्दे से पल भर के लिए हटकर शहरी मजदूरी के खतरों के मुद्दों पर आ गए थे क्योंकि इन दिनों ये दोनों मिलकर भारत में मजदूरी को प्रभावित कर रहे हैं। अब फिर से खेती, खेतिहर मजदूरी, और जलवायु परिवर्तन की वजह से मजदूरी पर दूसरे असर को देखें, तो इंटरनल डिस्प्लेसमेंट मॉनिटरिंग सेंटर के एक अनुमान के अनुसार भारत में जलवायु-संबंधी विस्थापन सबसे तेज रफ्तार से बढ़ रहा है। लोगों के लिए शारीरिक रूप से इतनी गर्मी में काम करना मुमकिन नहीं रह गया है। राजस्थान जैसे राज्य में फसलों पर गर्मी की मार भी है, और बदलते मौसम में उस पर ऐसे कीड़ों का हमला भी हो रहा है, जिसे ये फसलें झेल नहीं पाती हैं। इतनी गर्मी में विपरीत और विकराल परिस्थितियों में रहने वाले मजदूर परिवारों में गर्भवती महिलाओं में समय पूर्व प्रसव हो रहा है, दूसरी तरफ प्रदेश छोडक़र लौटने वाले मजदूर परिवार के बच्चों की पढ़ाई बीच में छूट रही है। यह समझने की जरूरत है कि मनरेगा जैसे रोजगार देने वाले कार्यक्रम में जो काम करवाए जाने हैं, उनमें पानी बचाने के काम अधिक करवाना जरूरी है, पेड़ लगाना अधिक जरूरी है, तभी जाकर इससे आने वाले वक्त में जलवायु परिवर्तन से कुछ राहत मिलेगी। सरकारें अगर कल्पनाशील हों तो मनरेगा के बजट को बढ़ाकर उसके तहत पानी इकट्ठा करने के ढांचे बढ़ाए जा सकते हैं, दूसरा यह भी किया जा सकता है कि पानी बचाने को मजदूरी से जोडक़र न देखा जाए, और उसे एक अलग योजना के तहत किया जाए।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम कई बार यह सुझाव देते आए हैं कि जिन प्रदेशों में भी जहां-जहां बारिश का पानी नदियों में चले जाता है, और बाढ़ बनकर तबाही भी करता है, उन नदियों के कैचमेंट एरिया में जगह-जगह पानी को रोकने के लिए बड़े-बड़े जलाशय चाहे मशीनों से ही बनवा दिए जाएं, जो कि भूजल की भरपाई करने के काम आएं। ऐसी जगहों की शिनाख्त अधिक मुश्किल नहीं है क्योंकि नदियों में पानी जहां से आता है वह तमाम स्थानीय लोगों को पता रहता है, और अगर रास्तों में ही गहरे और बड़े जलाशय बिना किसी निस्तारी पैमाने के बना दिए जाएं, तो उनसे भी धीरे-धीरे करके पूरे देश में भूजल स्तर ऊपर आने लगेगा, और बाढ़ घटने लगेगी। इससे हर प्रदेश के बंजर इलाकों में भी मिट्टी धीरे-धीरे उपजाऊ होने लगेगी, और नदियों के किनारे हर बरस होने वाली बर्बादी घटेगी। कुल मिलाकर यह सारा खेल जलवायु परिवर्तन का है, और इसमें सबसे बड़ा मुद्दा पानी का बन चुका है। चूंकि पानी भारत में हर बरस कुछ महीने गिरता है, और अब वह अचानक ही बहुत अधिक गिरने लगा है, जिसका बड़ा हिस्सा बाढ़ की शक्ल में समंदर तक पहुंच जाता है, इसलिए वैसी अनायास बारिश को नदियों तक पहुंचने के पहले री-चार्ज तालाबों में रोकने का एक इंतजाम करना चाहिए, यह सरकार की बाकी कई किस्म की योजनाओं के मुकाबले सस्ती योजना होगी, और सिर्फ मिट्टी खोदकर इसे किया जा सकेगा, इसमें कोई लोहा या कांक्रीट नहीं लगेगा, और इसी से खेती मरने से बच सकेगी, जानवर प्यासे मरने से बच सकेंगे, और गांव जिंदा रह सकेंगे। सरकारों को ग्रामीण विकास की परंपरागत धारणा से भी परे जाकर जल संरक्षण की एक नई धारणा को एक स्वतंत्र जरूरत बनाना पड़ेगा, चाहे तो उसके लिए एक अलग से विभाग, अलग से बजट बनाना पड़ेगा, तभी मजदूरों की जिंदगी बच सकेगी। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


