संपादकीय
नेपाल में हाल ही में आई नई सरकार ने एक जांच आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पिछले प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली, और पिछले गृहमंत्री रमेश लेखक को गिरफ्तार कर लिया है। अभी नए नौजवान प्रधानमंत्री बालेन शाह ने शपथ ली थी। मंत्रिमंडल ने यह तय किया था कि ओली सरकार के दौरान हुए जनप्रदर्शनों पर जो सरकारी कार्रवाई हुई थी, और पिछली सरकार के दूसरे मामलों को लेकर एक आयोग की जो जांच रिपोर्ट आई थी, उसे लागू किया जाएगा। उसी के मुताबिक यह कार्रवाई की गई है। नेपाल के चुनावी नतीजों को जिन लोगों ने बारीकी से देखा है वे जानते हैं एक रैप सिंगर से राजनेता बने बालेन शाह ने चुनाव में ओली को भारी लीड से हराया था, और अपनी पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया था। नेपाल के चुनाव भ्रष्टाचार, और बेरोजगारी के अलावा एक बड़े भावनात्मक मुद्दे को लेकर भी हुए थे। वहां सत्तारूढ़ नेताओं की औलादें अपनी रईसी, ऐशोआराम, और देश-विदेश की फिजूलखर्ची सोशल मीडिया पर पोस्ट करती थीं, और उन्हें देख-देखकर नौजवान पीढ़ी अधिक भडक़ी हुई थी। पिछले बरस सितंबर के इस आंदोलन में 76 लोग मारे गए थे, जिनमें से कई मौतें पुलिस गोलियों से हुई थीं। ऐसे में एक जनक्रांति की तरह नेपाल में बहुत बड़ा आंदोलन हुआ, और जनता ने ही सरकार को बर्खास्त कर दिया, पिछली सरकार के सारे नेता किसी तरह जान बचाकर भागे थे। अब ऐसे में पिछले पीएम और गृहमंत्री को आपराधिक लापरवाही के आरोप में गिरफ्तार करने की चर्चा है, जांच आयोग ने इन दोनों को इस बात का दोषी ठहराया है कि इन्होंने जनआंदोलन को हिंसक तरीके से दबाने की अनुमति दी थी।
यह केवल नेपाल की बात नहीं है, दुनिया के दर्जनों देशों में अलग-अलग वक्त पर ऐसा होता है कि नई आई सरकार पिछली सरकार के खिलाफ कार्रवाई करती है। भारत में ही आपातकाल के बाद आई जनता पार्टी सरकार ने देश भर में कांग्रेस सरकारों के खिलाफ जांच आयोग बिठाए थे, और इंदिरा गांधी को गिरफ्तार भी किया था। अमरीका में अभी ट्रम्प ने पिछले राष्ट्रपति के कार्यकाल के जाने कितने ही बड़े-बड़े अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करवाई, जुर्म दर्ज करवाए, उन्हें बर्खास्त किया, क्योंकि पिछली डेमोक्रेटिक सरकार के कार्यकाल में इन लोगों ने ट्रम्प के तरह-तरह के जुर्म पर संवैधानिक और कानूनी कार्रवाई की थी। ऐसा बांग्लादेश में भी देखने आया, पाकिस्तान में भी, और श्रीलंका में भी। पाकिस्तान में तो हालत यह थी कि जनरल जिया उल हक की फौजी तानाशाह सरकार ने पिछले प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी ही दे दी थी। भारत के बहुत से प्रदेशों में भी नाटकीय से लेकर शर्मनाक तक घटनाएं सामने आई हैं। लोगों को तमिलनाडु का वह नजारा नहीं भूलता जब जयललिता की सरकार ने एक बुजुर्ग नेता, और पिछले मुख्यमंत्री एम.करूणानिधि को गिरफ्तार करवाया था, और रात दो बजे उनके घर में बड़ी संख्या में पुलिस घुसी थी, और 78 साल के करूणानिधि को बिस्तर से उठाकर घसीटते हुए, और फिर पूरा का पूरा उठाकर ले जाया गया था। इस दौरान उनके साथ बदसलूकी भी हुई थी, उन्हें गिरा भी दिया गया था, और वे दर्द से चीखते भी रहे थे। ऐसा कई देश-प्रदेश में होता है, और इनको गिरफ्तार होने वाले नेता बदले की भावना से की गई कार्रवाई करार देते हैं, और सरकार कहती है कि कानून अपना काम कर रहा है। कानून से परे भी बदले और अपमान की भावना से होने वाली कुछ घटनाएं भयानक तरीके से याद रहती हैं। तमिलनाडु में करूणानिधि की गिरफ्तारी के 12 बरस पहले, विधानसभा में विपक्ष की पहली महिला नेता जयललिता एक हंगामे के बीच चलती हुई चप्पलों से विचलित जब सदन से बाहर जा रही थीं, तो उनकी विरोधी पार्टी डीएमके के एक मंत्री ने उनकी साड़ी का पल्लू पकडक़र खींचा था, कंधे पर साड़ी से लगी सेफ्टी पिन अलग हो गई थी, खून निकलने लगा था, और फटी हुई अस्त-व्यस्त साड़ी, बिखरे हुए बालों सहित रोती हुई जयललिता ने सदन छोड़ा था। शायद करूणानिधि की गिरफ्तारी इसी का हिसाब चुकता करना था। जयललिता उस दिन कसम खाकर निकली थीं कि वे मुख्यमंत्री बनने के बाद ही सदन में लौटेंगी, और दो साल के भीतर ही 1991 में ऐसी नौबत आ गई थी।
लेकिन हम पिछली सरकारों के खिलाफ जांच और कानूनी कार्रवाई को गलत नहीं मानते, जरूरी मानते हैं। नेपाल की इस ताजा घटना के पहले भी हम अपने अखबार में इसी जगह पर कई बार लिख चुके हैं कि किसी भी नई सरकार को आते ही एक जांच आयोग बनाना चाहिए जो पिछली सरकार के कार्यकाल के सारे आरोपों और शिकायतों की जांच करे। यह बात राजनीतिक नफे या नुकसान की हो सकती है, जनता पार्टी सरकार के दौरान इंदिरा गांधी, और कांग्रेस सरकारों के खिलाफ बनाए गए जांच आयोगों से जनता पार्टी की ही सरकार को नुकसान हुआ था, ऐसा माना जाता है, लेकिन नफे-नुकसान से परे यह हर नई सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि सत्तारूढ़ हुई पार्टी और उसके नेताओं ने जिन आरोपों को लगाकर सत्ता पाई है, उन्हें साबित भी किया जाए, इसके अलावा जनता को भी यह हक मिलना चाहिए कि वह पिछली सरकार के खिलाफ मामले लाकर दे सके। इसे राजनीतिक दुर्भावना कहने वाले दुर्भावना कहते रहें, हम तो इसे हर सरकार की जिम्मेदारी मानते हैं कि पिछली सरकार के भ्रष्टाचार की खुली सुनवाई और जांच होनी चाहिए।
न सिर्फ नेपाल या भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश, बल्कि तकरीबन पूरी ही दुनिया में अब यह साफ हो गया है कि हर सरकार के कार्यकाल में सत्ता की मेहरबानी से बहुत से भ्रष्टाचार होते हैं। ऐसे में अगर सत्तारूढ़ नेताओं को यह पता रहेगा कि सरकार बदलते ही अनिवार्य रूप से उनके मामलों की जांच होगी, तो वे भ्रष्टाचार करने में शायद कुछ हिचकेंगे। और इसे एक नियमित व्यवस्था बना देने से राजनीतिक दुर्भावना का आरोप भी जाते रहेगा। हर सरकार को अपना कार्यकाल शुरू होते ही पिछली सरकार के पूरे कार्यकाल के लिए आयोग की घोषणा कर देना चाहिए, और जरूरत हो तो इसके लिए संसद या अलग-अलग राज्यों की विधानसभाएं भी एक कानून बना सकती हैं। ऐसे आयोग अभी लोकायुक्त, लोक आयोग, या लोकपाल की मौजूदा व्यवस्था से परे के हो सकते हैं, और वे जनसुनवाई करके शिकायतें और सुबूत इकट्ठे कर सकते हैं। लोकतंत्र में राजनीतिक शिष्टाचार निभाने के बजाय जनता को भ्रष्टाचार से बचाने का काम करना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


