संपादकीय
किसी राजनीतिक अटकल पर लिखना बड़ी समझदारी की बात तो नहीं होती, लेकिन कभी-कभी मजे के लिए ऐसा कर लेना चाहिए। कई बार अखबार भी ऐसी खबरें बना लेते हैं, और ऐसी ही एक खबर को पढक़र आज हमें भी यह सूझ रहा है कि उस पर कुछ सोच-विचार लिया जाए। खबर यह है कि कांग्रेस पार्टी ममता बैनर्जी को वापिस घर बुला रही है। ममता की अपनी पार्टी तकरीबन खत्म हो गई है, उनके घर के अधिकतर कमरों में सपाट सतह पर उल्लू बैठे हैं, और छतों में जहां-जहां कोई हुक लगे हैं, कोई तार बंधे हैं, उन पर चमगादड़ लटके हैं। पार्टी के विधायक, सांसद, मेयर, और पार्षद सब छोड़-छोडक़र भाग रहे हैं। उनके पार्टी दफ्तर में बचे हुए नेताओं को एक-एक को दो-दो, तीन-तीन कमरे भी दिए जा सकते हैं। ऐसे में अभी जब इंडिया गठबंधन की बैठक में ममता बैनर्जी पहुंचीं, तो सोनिया गांधी ने उन्हें खूब जोरों से गले लगाकर शायद बिना शब्दों के ही हमदर्दी जाहिर कर दी। और हो सकता है कि बिना किसी आग के यह धुआं निकला हो कि ममता को कांग्रेस में आकर संगठन में उपाध्यक्ष बनने का न्यौता दिया है। साथ ही यह भी भरोसा दिया है कि उनके भतीजे को भी कांग्रेस में सम्मानजनक जगह दी जाएगी।
अब अगर देखें, तो एक और प्रमुख विपक्षी पार्टी, एनसीपी भी कांग्रेस से ही निकली हुई है, और विदेशी मूल की सोनिया गांधी की अगुवाई के खिलाफ ही शायद शरद पवार कांग्रेस छोडक़र गए थे। यह अलग बात है कि बीते कई बरसों से दोनों के बीच ठीक-ठाक तालमेल चल रहा है, और बंगाल में ममता की पार्टी जिस तरह उजड़ गई है, तकरीबन उसी तरह महाराष्ट्र में एनसीपी उजड़ गई है, शरद पवार के भतीजे ने पार्टी तोडक़र भाजपा के साथ सत्ता में शामिल रहना तय किया, और टूटी-फूटी खंडहर पार्टी को लेकर शरद पवार महाराष्ट्र में एक ऐसे विपक्ष में हैं जिसमें उन्हें बीच-बीच में मोदी की तारीफ करना भी जरूरी लगता है। ऐसे में अगर कांग्रेस पार्टी ममता को वापिस आने कहती है, तो फिर शरद पवार में ही कौन से कांटे लगे हुए हैं? शरद पवार भी तो इसी घर से निकले हुए हैं, और ममता के मुकाबले तो पवार का तालमेल कांग्रेस से काफी अधिक रहा है। ममता ने तो बंगाल में कांग्रेस की जड़ों में आणंद से मट्ठे के टैंकर बुलवा-बुलवाकर डाले, और कांग्रेस का तिनका भी नहीं छोड़ा। अब अगर ऐसी ममता के लिए सोनिया गांधी के मन में ममता है, तो फिर पवार ने ही क्या बिगाड़ा है? वे तो अपनी पीढ़ी के डूबते हुए सूरज हैं, और उनकी बेटी सुप्रिया सुले कांग्रेस के साथ लंबी पारी निभा सकती है।
लेकिन मजे की इन बातों के बीच यह याद रखना चाहिए कि जो साथी गठबंधन में साथ नहीं निभा पाए, जिनके साथ राज्यों के चुनाव में भाजपा से सीधी टक्कर के लिए भी कोई तालमेल नहीं हो पाई, उन साथियों और पार्टियों के साथ विलय कैसे हो सकता है? ममता बैनर्जी अपने तेवरों को लेकर, अपने मिजाज के साथ किसी भी दूसरी पार्टी के लिए कुछ वैसी ही साबित हो सकती हैं जिस तरह कोई जमालघोटा किसी पेट में जाकर वहां सहअस्तित्व से रह सकता है। यह कल्पना ही बड़ी मजेदार है कि ममता बैनर्जी कांग्रेस में लौटें, उपाध्यक्ष बनें, और कुछ दिनों के भीतर उनके बागी तेवरों के निशाने पर कांग्रेस पार्टी रहे। कांग्रेस पार्टी के भीतर वैसे भी जमालघोटों की कोई कमी नहीं है जो कि पार्टी के पेट में खलबली मचाते ही रहते हैं। ऐसे में अगर इस खबर में कोई सच्चाई है, और ममता बैनर्जी को सचमुच ही कांग्रेस में लाने की बात चल रही है, तो फिर यह भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, और अफगानिस्तान को मिलाकर अखंड भारत बनाने सरीखा काम होगा। आज इन देशों में से कई देश अपने भीतर के मुद्दों को नहीं सुलझा पा रहे हैं, तरह-तरह के धार्मिक और साम्प्रदायिक तनाव इन देशों में चल रहे हैं, लेकिन कुछ लोग हैं कि जो अखंड भारत का सपना छोडऩे के लिए तैयार नहीं हैं। अब अखंड भारत का जो नक्शा वे दिखाते हैं, उनमें बाकी तमाम देशों में तो मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, और आज के हिन्दुस्तान के साथ अगर उसे जोड़ा जाएगा, तो भारत में मुस्लिम आबादी का अनुपात एकदम से आसमान पर पहुंच जाएगा। खैर, आज का मुद्दा अखंड भारत नहीं है, लेकिन हमें ममता बैनर्जी की कांग्रेस वापिसी की चर्चा या अफवाह जो भी हो, उसे सुनकर, पढक़र अखंड भारत के सपने की ही याद आई है।
एक वक्त था जब पूर्वी और पश्चिम जर्मनी का एकीकरण हुआ था। एक देश से दो देश बने हुए इन दोनों जर्मनियों का एक साथ आना, बर्लिन की उस विश्वविख्यात दीवार का टूटना, यह सब कुछ लोगों के लिए एक सपने सरीखा था। कुछ ऐसा ही सपना भारत में कांग्रेस पार्टी से अलग होने वाली पार्टियों के कांग्रेस में लौटने का होगा, या इस तरह के कुछ और राजनीतिक ध्रुवीकरण दूसरे दलों के बीच हो सकते हैं, तो वह होगा। आज चुनावी राजनीति में इस देश में सिर्फ केरल तक प्रासंगिक रह गए वामपंथी दलों को देखें, तो देश की विचारधारा के बड़े कैनवास पर ये सब दल बिल्कुल आसपास और एक कोने में सीमित हैं। लेकिन विचारधारा का बहुत महीन सा फर्क इन सबको अलग रखता है, और इन्हीं का एकीकरण नहीं हो पा रहा है। ममता बैनर्जी जैसी बागी और तानाशाह तेवरों वाली नेता की आज की दुर्गति को देखते हुए उनके साथ हमदर्दी तो ठीक है, लेकिन किसी मंदअक्ल राजनीतिक रणनीतिकार को भी यह सपना नहीं देखना चाहिए कि कांग्रेस ममता को पचा सकेगी। जिस तरह यूपीए-1 सरकार में वामपंथी दल बाहर से समर्थन दे रहे थे, भीतर शामिल नहीं हुए थे, कुछ उसी तरह का रिश्ता ममता और कांग्रेस के बीच हो सकता है, कांग्रेस और शरद पवार के बीच हो सकता है। समझदारी इसमें रहती है कि जो रिश्ते कुछ दूर से निभना अधिक आसान हैं, उन रिश्तों को एकदम करीब का शादी जैसा रिश्ता नहीं बनाना चाहिए। कुछ बहुत करीबी दोस्त अपने बच्चों की आपस में शादी कर देते हैं, और अपनी खुद की दोस्ती आंखों को बंद रखती है, इसलिए ऐसी शादी अच्छी लगती है। लेकिन बाद में कई मौकों पर न ऐसी शादी टिकती, न ही दोनों गहरे दोस्तों के बीच की दोस्ती। इसलिए घरोबा उतना ही रहना चाहिए जितना कि निभ सके। आज ममता को खुद एक ममतामयी साथ की जरूरत है, जो कि सोनिया गांधी ने गले लगाकर दे दिया है। अभी तुरंत न कांग्रेस को, और न ही ममता को किसी राजनीतिक गठबंधन की जरूरत है, इसलिए फिलहाल बाहरी समर्थन की तरह बाहरी हमदर्दी तक ही इसे सीमित रखना समझदारी होगी। वैसे भी बंगाल के भीतर अगर देखा जाएगा, तो ममता के बचे-खुचे कार्यकर्ताओं के साथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को सांप-नेवले जैसे रिश्ते हैं, उनके चलते ममता तो कांग्रेस में लाई जा सकती हैं, लेकिन जमीनी स्तर की गहरी हो चुकी दुश्मनी उतनी आसानी से मिटाई नहीं जा सकेगी।


