संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : घुटनों पर गिड़गिड़ाते ट्रम्प ने आखिर पाया एक समझौता
सुनील कुमार ने लिखा है
15-Jun-2026 5:13 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय :  घुटनों पर गिड़गिड़ाते ट्रम्प ने आखिर पाया एक समझौता

अमरीका और ईरान के बीच एक समझौते की घोषणा पाकिस्तान ने आज सुबह-सुबह की है। पाक पीएम की यह पोस्ट बताती है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत में पाकिस्तान की बड़ी भूमिका रही है। इसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने समझौते की घोषणा की, और फिर ईरान ने भी। ट्रम्प पिछले दो दिनों से लगातार कह रहे थे कि इतवार को समझौते पर दस्तखत हो जाएंगे, लेकिन ईरान हमलावर ट्रम्प को उसके जन्मदिन पर यह तोहफा देना नहीं चाहता था, और उसने सोशल मीडिया पर इस बात को साफ-साफ लिख भी दिया था कि वह इस समझौते के ऐसे इस्तेमाल का मौका ट्रम्प को देना नहीं चाहता। खैर, शुक्रवार को इस पर स्विटजरलैंड में दस्तखत होंगे, लेकिन अभी से ही ईरान और लेबनान सहित तमाम मोर्चों पर फौजी हमले थम जाएंगे, ऐसा लग रहा है। अभी इजराइल की कोई प्रतिक्रिया इसे लेकर सामने नहीं आई है, और वह अमरीकी राष्ट्रपति को नाराज करने की कीमत पर भी लेबनान पर कुछ हमले कल तक करते रहा है, और इसके पहले ईरानी हमले के जवाब में उसे हमला न करने की सलाह ट्रम्प ने दी थी, लेकिन इजराइल ने उसे भी अनसुना कर दिया था। इसलिए अभी यह साफ नहीं है कि इस समझौते के बाद इजराइल के तेवर क्या रहेंगे, लेकिन यह ट्रम्प का सरदर्द है कि उसकी मदद पर जिंदा इस देश को काबू में रखे। फिलहाल तो दुनिया के अधिकतर प्रमुख पश्चिमी देशों की प्रतिक्रियाएं आई हैं जिन्होंने स्वागत के साथ ही यह भी उम्मीद जताई है कि तेल की आवाजाही में रोक-टोक और अड़ंगे खत्म होने से अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की बर्बादी थमेगी, और मध्य-पूर्व में चल रहा फौजी तनाव भी खत्म होगा।

दुनिया के विश्लेषक इस समझौते को लेकर हैरान हो रहे हैं कि अगर इन्हीं शर्तों पर बातें होनी थीं, तो अमरीका ने इजराइल के उकसावे में आकर यह जंग ही क्यों छेड़ी? अब अगर इन शर्तों पर समझौता हो रहा है कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा, उसे कुछ प्रतिबंधों में ढील मिलेगी, जलडमरूमध्य खुलेगा, और अगले 60 दिन की बातचीत में बाकी शर्तें तय होंगी, तो ये तमाम बातें तो बिना जंग के भी हो सकती थीं, बेहतर तरीके से हो सकती थीं। यह सोचने वाले विश्लेषकों का मानना है कि इससे तेल और गैस का बाजार बर्बाद हुआ, पूरी दुनिया का कारोबार चौपट हुआ, क्षेत्रीय तनाव बढ़ा, मध्य-पूर्व के देशों के बीच आपस में अविश्वास बढ़ा, और कुल मिलाकर समाधान बातचीत से ही निकला, चाहे वह कतर ने करवाई, चाहे पाकिस्तान ने। कुछ दूसरे फौजी विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प ने हमला शुरू करने की रणनीति तो बना ली थी, जो कि इजराइल ने उसे झांसे में रखकर बेच दी थी, लेकिन जंग लंबा खींचने पर आगे क्या करना है, इसकी कोई स्पष्ट योजना ट्रम्प के पास नहीं थी। ट्रम्प के सामने यह धर्मसंकट था कि अगर वह ईरान पर हमले और तेज करता, जारी रखता, तो मध्य-पूर्व में क्षेत्रीय युद्ध का खतरा था, ईरान उन देशों पर भी हमले कर रहा था, जिनमें अमरीका के फौजी अड्डे हैं। ट्रम्प ने जंग को सीमित रखकर बातचीत की, तो यह बातचीत तो पहले भी हो सकती थी। अभी ईरान के मोर्चे पर अमरीका को जो मुंह की खानी पड़ी, दुनिया की सबसे बड़ी फौज को लेकर हमला करने के बाद भी ट्रम्प के पास जलडमरूमध्य को खुलवाने का कोई रास्ता नहीं था, और ईरान ने एक किस्म से विश्व अर्थव्यवस्था का गला ही दबाकर रखा था, पूरी दुनिया ट्रम्प को कोस रही थी। इसके अलावा इस मोर्चे की वजह से नाटो फौजी संगठन में अमरीका पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया। वह बाकी नाटो देशों के सामने गिड़गिड़ाते रहा कि जलडमरूमध्य की नाकाबंदी खोलने के लिए वे अपनी नौसेना भेजें, लेकिन किसी भी देश ने अमरीका के छेड़े हुए इस अवांछित युद्ध में शामिल होने से मना कर दिया, और अमरीका को बेसहारा छोड़ दिया। हक्का-बक्का ट्रम्प नाटो के साथी देशों के खिलाफ सार्वजनिक बदजुबानी करते रहा, उन्हें धमकाता रहा, लेकिन किसी देश ने उसका साथ नहीं दिया। बल्कि नाटो के कुछ देशों ने तो अमरीकी फौजी विमानों को अपने देश में उतरने से भी रोक दिया, जो कि ईरान तक जाने के रास्ते में अमरीकी फौज की जरूरत थी। एक-एक करके बहुत से पश्चिमी देशों, नाटो देशों ने ट्रम्प के इस अवांछित हमले का विरोध किया, खुद अमरीकी संसद में ट्रम्प मतदान के पहले तक खूब आलोचना झेलते रहा, और अमरीकी अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गई। नवंबर में अमरीका में मध्यावधि चुनाव है जिसमें ट्रम्प की अग्निपरीक्षा होगी, और उसी को ध्यान में रखकर ट्रम्प ईरान के सामने एक किस्म से समझौते के लिए इन महीनों में गिड़गिड़ाते रहा, और ईरान था कि उसने दुनियाभर में बिखरे हुए अपने दूतावासों के सोशल मीडिया अकाऊंट्स पर ट्रम्प के खिलाफ भयंकर तीखे कार्टून बना-बनाकर उसकी खिल्ली उड़ाई।

इस पूरे मोर्चे पर ईरान एक विजेता की तरह सामने आया है जिसने अमरीका को घुटनों पर ला दिया, नाटो के भीतर गहरी दरार खड़ी कर दी, और इजराइल को एक किस्म से अमरीका से कुछ अलग भी कर दिया। ईरान ने इन चार महीनों में मध्य-पूर्व के अमरीकी-पिट्ठू देशों को यह भी दिखा दिया कि एक समझौते के लिए अमरीका किस तरह उन सबके कारोबारी, और सुरक्षा संबंधी हितों को कचरे की टोकरी में डाल सकता है। इस तरह मध्य-पूर्व में अमरीका की एक संरक्षक या दादा जैसी साख को भी ईरान ने गहरी चोट पहुंचाई है, और अब वहां के अलग-अलग देश अमरीका से परे भी अपनी जिंदगी के बारे में सोचेंगे। एक मजे की बात यह है कि अमरीकी राष्ट्रपति, और उसके जंग मंत्री पहले दिन से ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात भी कर रहे थे। लेकिन इतने भयानक हमलों के बाद भी, वहां के सुप्रीम लीडर को, सारे फौजी सेनापतियों को मार डालने के बाद भी ईरान की सरकार ज्यों की त्यों बनी हुई है, वहां कोई सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ, बल्कि सरकार के खिलाफ वहां जो घरेलू नाराजगी चल रही थी, वह भी कुछ हद तक कम हुई है कि अमरीकी हमलों के सामने देश को एक रहना है।

ट्रम्प को नवंबर के मध्यावधि चुनावों के पहले अपनी इज्जत बचानी थी, जो कि जंग के इन महीनों में लंगोटी से भी घटकर बस उसकी लाल टाई से ढंकी रह गई थी, इसके लिए उसने पाकिस्तान का सहारा लिया, और किसी तरह घुटनों के बल आकर एक समझौते तक पहुंचा। अब अगले 60 दिनों में ईरान के साथ समझौते की बारीक बातें जब तय होंगी, तब पता लगेगा कि एक पिछले डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति, बराक ओबामा के ईरान के साथ किए गए जिस परमाणु समझौते को ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में फाडक़र फेंक दिया था, क्या अब होने जा रहा समझौता उसके मुकाबले अमरीका के हित में कुछ अधिक होगा? फिलहाल तो दुनिया के समझदार लोगों के बीच ट्रम्प मखौल का सामान बन गया है कि उसने अमरीकी जनता पर अंधाधुंध बोझ डालकर, उनके हक के करीब सौ बिलियन डॉलर ईरान के मोर्चे पर झोंक दिए हैं, जिस मोर्चे की कोई जरूरत ही नहीं थी। इसी जंग के चलते ट्रम्प के कुछ सबसे करीबी और महत्वपूर्ण सदस्य सरकार छोडक़र निकल गए, संसद में उसकी पार्टी के कई सांसद उसके खिलाफ हो गए, और दुनिया की नजरों में वह परले दर्जे का बेवकूफ भी साबित हुआ। ट्रम्प के खिलाफ यह बात भी जाती है कि पिछली आधी सदी से इजराइल अमरीकी राष्ट्रपतियों को ईरान पर हमले के लिए तैयार करने की कोशिश करते आ रहा था, लेकिन कोई भी उसके झांसे में नहीं आया था। ट्रम्प ऐसा पहला बेवकूफ था जो कि नेतन्याहू के जाल में फंसकर इस जंग में उलझ गया, जिसके चक्रव्यूह से बाहर निकलना उसने माँ के पेट में सीखा नहीं था। इस पूरी जंग से ईरान एक विजेता की तरह उभरकर सामने आया है कि अमरीका और इजराइल की मिली हुई फौजी ताकत भी उसके खिलाफ इतने भयानक हमलों को जारी नहीं रख पाई, और उन्हें एक किस्म से मुंह की खानी पड़ी। अगले 60 दिन की बातचीत का नतीजा भी अमरीका के मध्यावधि चुनावों के नवंबर के पहले ही आ जाएगा, और ट्रम्प हर हाल में अपने इस समझौते को ओबामा के समझौते से बेहतर साबित करने की कोशिश करेगा, आने वाले दो महीने, अगर यह युद्धविराम कायम रहा तो, देखने लायक मोलभाव के रहेंगे।

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