संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बहती माहवारी के साथ छात्रा को परीक्षा हॉल में बिठाने वाली शिक्षिका थी!
सुनील कुमार ने लिखा है
26-Mar-2026 9:41 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : बहती माहवारी के साथ छात्रा को परीक्षा हॉल में बिठाने वाली शिक्षिका थी!

लड़कियों और महिलाओं की माहवारी का मामला लगातार किसी न किसी खबर में बने रहता है। यह एक किस्म से अच्छी नौबत है कि एक-दो पीढ़ी पहले जिस बात की चर्चा भी शर्मिंदगी मानी जाती थी, वह बात अब पहले के मुकाबले कुछ अधिक खुलकर की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दो अलग-अलग मामलों में माहवारी को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है, और टिप्पणी की है। एक मामले में उसने तमाम राज्य सरकारों को कहा है कि स्कूल-कॉलेज जाने वाली छात्राओं को मुफ्त सेनेटरी पैड दिए जाएं, और उनके लिए शैक्षणिक संस्थाओं में ऐसे अलग शौचालय बनाए जाएं, जहां पर वे माहवारी के दिनों में सहूलियत से पैड बदल सकें। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मानना राज्य सरकारों के लिए एक बंदिश है, यह एक अलग बात है कि ऐसे कई फैसलों पर अमल करने में राज्य सुस्ती दिखाते हैं, और आसानी से आदेश पूरा नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी कुछ लोगों को खटक सकती है कि कामकाजी महिलाओं को माहवारी के दिनों में अनिवार्य छुट्टी का प्रावधान बनाने से महिलाओं में हीनभावना भी आ सकती है, और नौकरी देने वाले लोग भी महिलाओं को काम पर रखने से कतरा सकते हैं। ये दोनों ही मामले अलग-अलग किस्म के थे, छुट्टी वाली याचिका अदालत ने खारिज कर दी, और कहा कि ऐसे स्वैच्छिक अवकाश की नीति बनाने पर सरकार विचार कर सकती है, लेकिन इसे कानूनी रूप से अनिवार्य बनाने का मतलब महिलाओं के कामकाज का नुकसान करना हो जाएगा।

आज इस पर चर्चा हम इसलिए कर रहे हैं कि महाराष्ट्र के नासिक का एक ताजा समाचार है कि वहां स्कूल की बोर्ड इम्तिहान दे रही एक छात्रा ने जब वहां मौजूद शिक्षिका को बताया कि उसकी माहवारी शुरू हो गई है, तो भी शिक्षिका ने उसे बाथरूम तक नहीं जाने दिया, और उसी हालत में उसे बाद के एक घंटे तक बैठना पड़ा। इस घटना की खबर उजागर होने पर बोर्ड के चेयरमैन ने इसे गलत फैसला बताया, और कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि परीक्षा दे रहे छात्र-छात्राओं को शौचालय न जाने दिया जाए। उन्होंने कहा कि शरीर की प्राकृतिक जरूरतों को नहीं दबाया जा सकता, और शिक्षकों को ऐसे नियम बनाने और थोपने का कोई अधिकार नहीं है। बोर्ड की तरफ से इस शिक्षिका को नोटिस भी जारी किया जा रहा है कि उसने इस छात्रा के कहने पर भी उसे बाथरूम तक जाने की छूट क्यों नहीं दी। छात्रा का कहना है कि माहवारी शुरू होने के बाद उसके लिए पर्चा लेकर बैठना मुमकिन नहीं था, और उसके पूरे कपड़े खून से भर गए। इम्तिहान के बाद भी उसे अपनी सहेलियों के घेरे में निकलना पड़ा, क्योंकि ऐसे कपड़े शर्मिंदगी की वजह थे। जब उसने स्कूल की एक कर्मचारी से सेनेटरी नेपकिन मांगा, तो उसने कहा कि स्कूल में इसे नहीं रखा जाता। परिवार ने इसकी शिकायत करते हुए कहा कि शिक्षिका को सजा दिलवाना नहीं चाहते, लेकिन वे बोर्ड के नियमों और निर्देशों को अधिक संवेदनशील बनवाना चाहते हैं।

महाराष्ट्र एक विकसित प्रदेश माना जाता है जहां पर साक्षरता, शिक्षा, जागरूकता, और संपन्नता सभी देश के औसत से अधिक होनी चाहिए। इसके बाद भी अगर सुप्रीम कोर्ट के कई तरह के फैसलों और निर्देशों के बाद भी इम्तिहान के दौरान अगर स्कूलों में पैड का इंतजाम नहीं है, शिक्षिका में संवेदनशीलता नहीं है, तो यह बड़ी ही फिक्र की बात है। कई शिक्षक-शिक्षिकाएं नियमों को कड़ाई से लागू करने के लिए अमानवीय हद तक चले जाते हैं। देश में जगह-जगह छोटे-छोटे बच्चों को भयानक अमानवीय सजा देने वाले टीचर्स गिरफ्तार भी होते हैं, लेकिन फिर भी हर किसी को समझ नहीं आती है। ऐसे में समाज के भीतर ही अपनी जिम्मेदारी, और दूसरों के अधिकार को लेकर एक बेहतर सामाजिक चेतना की जरूरत है। आज भारत का हाल यह है कि लोगों को अपने अधिकार, और दूसरों की जिम्मेदारी से परे कुछ नहीं सूझता है।

भारत में हर बरस लाखों लड़कियां इसलिए स्कूल छोड़ देती हैं कि उनकी माहवारी के दिनों में स्कूल में शौचालय का इंतजाम नहीं रहता, पानी नहीं रहता, और बदन से बहते हुए खून के साथ वहां बैठना कई बार शर्मिंदगी की वजह बन जाता है। यह समाज वैसे भी माहवारी जैसी प्राकृतिक-शारीरिक प्रक्रिया को लेकर एक निहायत ही नाजायज कुंठा और वर्जना से भरा हुआ है। समाज के एक हिस्से में अभी तक परिवारों के भीतर भी माहवारी से गुजर रही लडक़ी या महिला को अछूत मान लिया जाता है, उसे तमाम किस्म के पूजा-पाठ, रसोई, और शुभ कार्यों से दूर रखा जाता है। लड़कियों के मानसिक विकास में इस भेदभाव का बड़ा बुरा असर पड़ता है क्योंकि हर महीने वह कुछ दिनों के लिए अपने खाने-पीने के लिए भी परिवार में दूसरों की मोहताज हो जाती है, और परिवार के व्यवहार की वजह से वह अपने दस फीसदी दिन छुआछूत की हीनभावना में गुजारती है। इस देश में लड़कियों को बराबरी का हक देने के लिए कागज पर लिखा हुआ कानून बिल्कुल ही नाकाफी है। एक लडक़ी को जन्म से लेकर मरने तक अपने खुद के परिवार में, स्कूल, कॉलेज, और खेल के मैदान पर, उपासना स्थलों पर, और कामकाजी जगह पर तरह-तरह का भेदभाव झेलना पड़ता है। इन तमाम जगहों पर उसे यौन शोषण से लेकर मानसिक प्रताडऩा तक झेलनी पड़ती है। इन सबसे पढ़ाई-लिखाई, और कामकाज की उसकी संभावनाएं बहुत बुरी तरह प्रभावित होती हैं। जो देश अपनी आधी आबादी को मंदिर-मस्जिद से दूर रखता है, रसोईघर से दूर रखता है, लडक़ी के बदन की जिस प्रक्रिया की वजह से मानव जाति आगे बढ़ती है, उसी प्रक्रिया को हिकारत से देखकर लडक़ी की जरूरतों की हेठी करता है, वह देश संभावनाओं को खो भी देता है। कोई हैरानी की बात नहीं है कि भारत की कामकाजी गिनती में महिलाओं का अनुपात बहुत ही कम है। जब उनकी बुनियादी जरूरतों के लिए सहूलियतें नहीं रहेंगी, तो वे बराबरी से काम कैसे कर सकेंगी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने स्कूल-कॉलेज वाले फैसले में लड़कियों के हक को साफ कर दिया है, और समाज और सरकार की जिम्मेदारी तय कर दी है। अब यह सांसदों और विधायकों की भी जिम्मेदारी है कि वे सरकारों को घेरें, और अदालती फैसले पर अमल करवाएं। देश की आधी आबादी को लगातार हीनभावना में रखना, भेदभाव का शिकार बनाना, बहुत ही नाजायज बात है, और किसी भी जिम्मेदार लोकतंत्र को इस सिलसिले को तेजी से खत्म करना चाहिए।

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