संपादकीय
भारत में जब-जब मानसून में किसी शहर में बाढ़ की नौबत आ जाती है, तो श्मशान वैराग्य की तरह पॉलीथीन-कचरे पर रोकथाम की बात होने लगती है। फिर जैसे-जैसे बाढ़ का पानी उतरता है, शहरी घरों से कीचड़ धुल जाता है, सडक़ों पर आवाजाही शुरू हो जाती है, लोग फिर से कचरा फैलाने लगते हैं, ठीक उसी तरह जैसे कि किसी तीर्थ से लौटते ही लोग नए उत्साह के साथ पाप करने में जुट जाते हैं। आज शहरों की हालत यह होती जा रही है कि नालियों को लोग घूरों की तरह इस्तेमाल करते हैं, हर नाली में तरह-तरह का कचरा पटा हुआ रहता है। लोग प्लास्टिक के कचरे को अधिक खतरनाक मानते हैं क्योंकि पतली झिल्लियां जगह-जगह फंस जाती हैं, और पानी आगे बढऩा बंद हो जाता है। लेकिन न सिर्फ सिंगल यूज प्लास्टिक कही जाने वाली ऐसी पतली झिल्लियों का खतरा है, बल्कि हर वह कचरा खतरा है जो कि नालियों में डाल दिया जाता है। इसके पीछे की अलग-अलग वजहों को समझने की जरूरत है।
एक तो यह कि भारत में निर्वाचित स्थानीय जनप्रतिनिधियों में जनता में अनुशासन लागू करने का हौसला नहीं रहता। महापौर या निगम-पालिका अध्यक्ष न किसी अवैध निर्माण को रोक पाते, न अवैध कब्जे को, और ऐसे में नालियों में कचरा फेंकने वाले लोगों को, या कि हर रात दुकान बंद करते समय बाहर सडक़ों पर पैकिंग का अपार कचरा छोडक़र जाने वाले लोगों पर किसी कार्रवाई की चर्चा भी औसत शहर में नहीं होती। हो सकता है कि देश के कुछ चुनिंदा शहरों में निर्वाचित प्रतिनिधि, और म्युनिसिपलों में तैनात अफसर दिल कड़ा करके कचरा फैलाने वालों पर कुछ सख्ती दिखाने की सोचते भी हों, लेकिन स्थानीय शासन की कुर्सियों पर बैठे अधिकतर लोगों को समझाने, और उनसे अमल करवाने के बजाय सरकारी खर्च पर कचरा इकट्ठा करवाने को अधिक सहूलियत का पाते हैं। नतीजा यह होता है कि जब जनता जिम्मेदार नहीं होती, तो घरों और बाजारों से निकलने वाले कचरे को अलग-अलग छांटने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। जिस कचरे को सड़ाकर खाद बनाई जा सकती है, या जो सडक़र खुद ही खत्म हो सकता है, ऐसे बायोडीग्रेडेबल कचरे के भी प्लास्टिक और दूसरे कचरे के साथ मिलाकर जब कचरा गाडिय़ों में डाला जाता है, तो फिर उसमें से प्लास्टिक अलग करके उसकी री-साइकिलिंग की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है।
कुछ आंकड़े बताते हैं कि भारत में सालाना करीब एक करोड़ टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, और इसमें से सिंगल यूज प्लास्टिक, जिस पर प्रतिबंध लगाया गया है, वह सिर्फ दो-तीन फीसदी रहता है। बाकी सारा कचरा अलग-अलग किस्म की पैकिंग का रहता है, जो अभी भी बिना रोक-टोक धड़ल्ले से चल रही है। अभी सरकार ने एक कानून बनाकर इतना जरूर किया है कि प्लास्टिक के अलग-अलग ग्रेड की पैकिंग इस्तेमाल करने वाली कंपनियों को अपने इस्तेमाल जितनी मात्रा के उन ग्रेड के प्लास्टिक की री-साइकिलिंग के लिए भुगतान करना पड़ता है। इसके लिए सरकार की रजिस्टर्ड री-साइकिलिंग यूनिट्स हैं, लेकिन यह पूरा सिलसिला सरकारी फर्जीवाड़े से घिरा हुआ है, और जिस तरह गाडिय़ों के प्रदूषण वाले सर्टिफिकेट फर्जी तरीके से बन जाते हैं, वैसे ही प्लास्टिक री-साइकिलिंग के सर्टिफिकेट खरीद लिए जाते हैं।
शहरों में घरों से निकलने वाले कचरे को ही अलग-अलग करने का अभियान छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक उत्साही कलेक्टर के रहते हुए हुआ था, और वहां पर बड़ी संख्या में महिला स्व-सहायता समूह की सदस्यों को रोजगार भी मिल गया था। लेकिन खुद छत्तीसगढ़ में ही बाकी जगहों पर कभी ऐसी योजना का विस्तार नहीं हुआ। अंबिकापुर के प्रयोग की देश में राष्ट्रीय स्तर पर तारीफ हुई थी, लेकिन देश में जिस तरह किसी एक जगह की कामयाबी को दूसरी जगह उपयोग करने की परंपरा नहीं है, उसके चलते अंबिकापुर गार्बेज सेग्रिगेशन के कामयाब प्रयोग का एक टापू बनकर रह गया। अभी कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई सुनाई पड़ी थी जिसमें जजों ने ठोस कचरे के निपटारे में सरकार की नाकामयाबी पर फिक्र और नाराजगी दोनों ही जाहिर की थी, लेकिन मोटेतौर पर यह नाकामयाबी स्थानीय जनप्रतिनिधियों की दहशत से उपजी रहती है, वे वोटरों को नाराज करने वाला कोई काम करना नहीं चाहते, और सरकारी खर्च पर वोटरों की आदत उसी तरह बिगाडऩा जारी रहता है, जिस तरह किसी बारात के जनवासे में बारातियों की आदतों को बिगाड़ा जाता है।
इस मामले में एक आखिरी मुद्दा और है, जो कि कम महत्वपूर्ण नहीं है, फिर चाहे हम उसकी चर्चा आखिर में क्यों न कर रहे हैं। भारत में सफाई कर्मचारियों को जाति व्यवस्था के तहत पीढ़ी-दर-पीढ़ी परंपरागत रूप से उसी काम में जोते रखा जाता है। यह मान लिया जाता है कि बाकी समाज नालियों को घूरे की तरह इस्तेमाल करे, जितना चाहे उतना कचरा फैलाए, गटर साफ करते हुए मरने के लिए कुछ खास जातियों के सफाई कर्मचारी तो अगली कई सदियों तक रहेंगे ही। गरीब और नीची समझी जाने वाली जातियों के सफाई कर्मचारियों की अगली कई पीढिय़ों की गारंटी से लोगों में सफाई के लिए एक हिकारत पैदा होती है, और कचरा फैलाने के लिए उन्हें एक अपार आत्मविश्वास मिलता है। ऐसा लगता है कि भारत के सफाई कर्मचारियों को दस दिन के लिए छुट्टी पर भेज दिया जाए, और देश के सारे नागरिक यह देख लें कि कोई दिन ऐसा भी आ सकता है जब चारों तरफ इतना कचरा रहेगा, और सफाई कर्मचारी यह तय कर लेंगे कि वे इससे बेहतर कोई दूसरा काम कर लेंगे, तो उस दिन इस गंदगी को कौन साफ करेंगे, कौन कचरा उठाएँगे, या हटाएंगे, इसकी एक झलक कचरा फैलाने वाले लोगों को दिख जाना चाहिए। इससे कम में यह देश सुधरते नहीं दिख रहा है, यहां के स्थानीय संस्थाओं के निर्वाचित जनप्रतिनिधि, और वहां नियुक्त अधिकारी लोगों की आदतों को सुधारने पर कोई भरोसा नहीं करते, भला क्यों लोगों को नाराज किया जाए। यह सिलसिला थमना जरूरी है क्योंकि कोई न कोई ऐसा दिन आएगा जब सफाई कर्मचारी इस काम को करने से मना कर देंगे, या इतना भुगतान मांगेंगे कि म्युनिसिपलों के होश ठिकाने आ जाएंगे। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


