संपादकीय
अभी छत्तीसगढ़ में परिवार के भीतर एक भयानक हत्या हुई। एक व्यक्ति को जब पहली पत्नी से बच्चे नहीं हुए, तो दूसरी शादी की, उससे भी बच्चे नहीं हुए, तो एक बीवी पर जादू-टोना करने का शक हुआ। ऐसे में पति, सौत, और परिवार के दूसरे लोगों ने मिलकर एक पत्नी को इतनी बुरी तरह मारा कि उसका ब्यौरा यहां देना लोगों का दिल दहला देगा। पोस्टमार्टम में पता लगा कि मरने वाली के बदन में लकड़ी ठूंसकर उसे मार डाला गया। परिवार के भीतर इस तरह की हिंसा के बहुत सारे मामले सामने आ रहे हैं। फिर परिवारों से परे भी ऐसे कत्ल हो रहे हैं। ऐसा एक भी दिन नहीं गुजरता है जब किसी न किसी हत्या या बलात्कार के मामले में लोगों की गिरफ्तारी की खबर न आती हो। पुलिस अपने सोशल मीडिया पेज पर भी फोटो सहित ऐसी जानकारी डालती है, और प्रेस-टीवी से भी तकरीबन रोज लोगों तक पहुंचती है। इन दिनों दूसरे किस्म के समाचार-माध्यम भी बढ़ चले हैं, और लोगों को वॉट्सऐप पर घंटे भर के भीतर ही जुर्म, और गिरफ्तारी जैसी खबरें मिलती रहती हैं। अदालती खबरों से यह भी पता लगता है कि हत्या और बलात्कार जैसे मामलों में सात साल, दस-बीस बरस, या उम्रकैद सुनाई जाती है। इसके बावजूद लोगों के मन में जेल और कैद का खौफ नहीं दिखता!
कोई पेशेवर मुजरिम रहे, उनका जुर्म करना तो समझ आता है, लेकिन जो लोग जुर्म की कमाई पर जिंदा नहीं हैं, भाड़े के हत्यारे नहीं हैं, वे जब ऐसे बड़े जुर्म करते हैं, तो उन्हें तो अपने काम का अंत अच्छी तरह मालूम रहता है। इसके बावजूद लोग ऐसे संगीन जुर्म से कतराते नहीं हैं। यह सिलसिला बढ़ते चल रहा है, न सिर्फ खबरों में, बल्कि संगीन जुर्म के आंकड़ों में भी। और अब तो कत्ल और बलात्कार जैसे मामलों में नाबालिगों की हिस्सेदारी भी बढ़ती चल रही है। हर दिन कोई न कोई ऐसी खबर रहती है, जिसमें पकड़ाए गए लोगों में से कुछ के नाम और चेहरे कानूनी जरूरत के मुताबिक छुपाने पड़ते हैं, क्योंकि वे नाबालिग रहते हैं।
अब हम अलग-अलग वजहों पर जाने के बजाय यह सोचते हैं कि ये कैसे लोग हैं जिनके लिए अगले दस-बीस बरस खुली हवा में जीने, और जेल में कैद रहने में कोई फर्क नहीं है? ऐसा नहीं है कि इन लोगों को गिरफ्तारी और कैद का खतरा समझ न आता हो, क्योंकि कोई बड़ी मुजरिम अब गिरफ्तारी से बचते नहीं हैं, वे दिन हवा हो चुके हैं। तो क्या इन लोगों को अपनी जिंदगी की कोई कीमत नहीं रह गई है? यह सवाल कुछ परेशान करता है, इसलिए भी कि अगर लोगों में अपने भविष्य को लेकर कोई महत्वाकांक्षा नहीं है, और वे इस हद तक लापरवाह हो गए हैं, तो फिर वे किसी और तरह का भी जुर्म कर सकते हैं, अभी जितना भयानक जुर्म किया है, उससे भी भयानक। क्या इन लोगों की जिंदगी में परिवार और समाज के साथ सुख से जीने की संभावनाएं नहीं रह गई हैं, क्या इनके पास कोई महत्वाकांक्षाएं नहीं रह गई हैं, ऐसी बातों पर गंभीरता से सोचना चाहिए। लोग जुर्म से परे के कई पहलुओं पर बात करते हुए भी यह कहते हैं कि जिसे कमाई की परवाह न हो, उसे कारोबार नहीं करना चाहिए, जिसे राज-पाट जारी रखने की परवाह न हो, उसे राजा नहीं बनना चाहिए, और जिन लोगों के लिए उनकी तनख्वाह मायने नहीं रखती हो, उन्हें नौकरी नहीं करनी चाहिए। जब लोग बिना जरूरत के कोई काम करते हैं, तो वे एक खतरा खड़ा कर सकते हैं। हर किसी को अपने मिजाज का ही काम करना चाहिए। ऐसे में जब हिन्दुस्तान के आम लोगों का बेहतर जिंदगी जीने का मिजाज न रह गया हो, तो वे खतरनाक हो सकते हैं। जिन्हें आगे कोई संभावनाएं न दिखती हों, जिन्हें साख की परवाह न हो, जिन्हें एक आजाद दुनिया की खुली हवा में सांस लेने, और बरसों कैद रहने में कोई बड़ा फर्क न दिखता हो, वे ही लोग आपा खोकर, या सोच-समझकर, या शान दिखाने के लिए कत्ल कर सकते हैं, या बरसों की कैद का खतरा उठाकर बलात्कार कर सकते हैं।
हमारे पास किसी रिसर्च के नतीजे नहीं हैं, लेकिन हमारा अपना अंदाज यह है कि जिस समाज में लोग सुख-सुविधा से रहते हैं, खुशहाल रहते हैं, वहां उनके पास, उनके सामने जुर्म से दूर रहने की एक वजह भी रहती है। इसीलिए दुनिया में खुशियों के पैमाने पर जो देश ऊपर हैं, वे जुर्म में नीचे भी हैं। आसपास संगीन जुर्म होते रहें, तो लोग कभी खुशहाल नहीं रह सकते, फिर चाहे सीधे उन पर कोई हमला न हो रहा हो। समाज को लोगों के सामने संभावनाएं रखने की क्षमता भी रखनी चाहिए। और हम सिर्फ कमाने और भौतिक सुखों की बात नहीं कर रहे हैं, जिन देश-प्रदेशों में लडक़े-लड़कियों को एक-दूसरे के साथ स्वस्थ तरीके से उठने-बैठने की छूट रहती है, वहां पर उनके सामने जिंदगी को लेकर एक उत्साह बने रहता है। जहां पर नौजवान साथ में रह सकते हैं, अपनी मर्जी से दोस्ती और संबंध बना सकते हैं, पसंद की शादी कर सकते हैं, तो ऐसी बातें भी लोगों को आमतौर पर जुर्म से दूर रखने की एक वजह रहती है। जब लोगों के पास अपनी निजी जिंदगी में किसी को खुश रखने का मकसद हो, किसी से खुशी पाने की संभावना हो, तो उनके हिंसक और मुजरिम बनने के खतरे घट जाते हैं।
फिर यह भी है कि किसी देश-प्रदेश में समाज का कुल मिलाकर माहौल कैसा है, उसका भी बड़ा असर पड़ता है। जिस जगह धर्म या जाति के आधार पर, खानपान या पोशाक के आधार पर, उपासना पद्धति या आस्था के आधार पर लोगों से हिंसक भेदभाव होता है, उन जगहों पर लोग हिंसा को सामान्य मान लेते हैं, और नफरत को जीने का एक तरीका। फिर ऐसी नफरत राष्ट्रीयता, या क्षेत्रीयता, प्रादेशिकता, या भाषा की सरहदों को पार करके जिंदगी के हर दायरे तक पहुंचने लगती है। इस खतरे को कम नहीं आंकना चाहिए। जहां पर हिंसा नवसामान्य हो जाए, वहां पर हिंसा किसी भी पैमाने से परे जाकर घर के भीतर भी उतरने लगती है, लोगों के अवचेतन मन में यह बात बैठ जाती है कि हिंसा करने में कोई बुराई नहीं है, कुछ अटपटा नहीं है, और चारों तरफ तो हिंसा का माहौल है ही। हम हिंसा की मानसिकता पर चर्चा की जरूरत महसूस करते हैं। जो समाज संगीन जुर्म वाली हिंसा को सिर्फ थाने, कोर्ट, और जेल का मामला मान लेते हैं, उनके सामने ये तीनों ही जगहें कम और छोटी पडऩे लगती हैं, क्योंकि हिंसा और हिंसक सोच का विस्तार होते चलता है। हमारी बात कुछ लोगों को सरकारी आंकड़ों के मुकाबले कुछ अमूर्त लग सकती है, लेकिन दुनिया की हर दिक्कत, आसपास के हर खतरे, सिर्फ आंकड़ों में नहीं नापे जा सकते। इस बारे में सोचकर देखिएगा।


