संपादकीय
यूरोपीय यूनियन के साथ भारत का हुआ नया व्यापार समझौता अमरीका से होने वाले, और हो चुके नुकसान की कुछ या अधिक हद तक भरपाई करने वाला माना जा रहा है। इससे भारत में योरप से आने वाले कई सामान सस्ते होंगे, हालांकि सरकार को टैक्स का कुछ नुकसान होगा। फिर भी यह हिसाब-किताब आसान नहीं रहता है कि पहली बात तो यह कि आयात टैक्स कम होने से सामान की खपत बढ़ेगी, और टैक्स कुल मिलाकर रकम की शक्ल में तो उतना ही आ जाएगा। दूसरी बात यह कि ऐसा आने वाला सामान क्या भारत में बनने वाले सामानों की बिक्री की संभावना की कीमत पर आएगा? ये तो जटिल मुद्दे तो हमारे सरीखे आम लोगों को सूझते ही हैं, लेकिन इसके साथ-साथ एक मुद्दा और सूझता है कि भारत और योरप का कारोबार बढऩे से भारत से जो निर्यात योरप के देशों में होगा, उससे भारत की कमाई कितनी बढ़ेगी? और बढऩे की बात तो दूर रही, अभी तो ट्रंपियापे के टैरिफ से भारत से जो निर्यात खतरे में पड़ चुका है, भारतीय कंपनियों का उत्पादन कम हो चुका है, वह योरप में टैरिफ घटने से वहां बढ़ेगा, और इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को इस देश में किए गए हवन से मिले ट्रंप से मिला नुकसान घटेगा। मतलब यह कि किसी देश और देशों के समूह के बीच होने वाला ऐसा व्यापार समझौता आर्थिक जटिलता का तो रहता ही है, लेकिन इसके साथ-साथ वह एक रणनीतिक फैसला भी रहता है कि अमरीका जैसे किसी दगाबाज देश के मोहताज हुए बिना भी किस तरह हिंदुस्तान जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था जिंदा रह सकती है। यूरोपीय यूनियन के साथ अभी तो यह व्यापार समझौता हुआ है, लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरा समझौता और हो सकता है, अमरीका में बेरोजगार होने वाले भारतीय कामगारों के लिए योरप में काम की कोई संभावना निकलने का। अमरीका से भारतीय छात्र घट गए हैं, भारतीय कामगार घट गए हैं, और मोटी तनख्वाह वाले ये विदेशी रोजगार कोई और जरिया नहीं ढूंढ पाए हैं, ऐसे में भारत-ईयू समझौता आगे के लिए भी एक उम्मीद बंधाता है। यह भी देखना दिलचस्प है कि किस तरह 8 बरस बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री चीन गए हैं, और चीन के साथ तनाव घटा है, कई तरह के नए समझौते या तो हुए हैं, या होने की राह पर आ गए हैं। यह देखना कुछ और अधिक दिलचस्प है कि बीते दशकों में एकध्रुवीय हो चुकी वैश्विक व्यवस्था किस तरह आज अमरीका के बिना अपने पैरों पर खड़ी हो रही है, चाहे वह योरप हो, नाटो हो, या भारत जैसे अमरीका के दशकों के दोस्त हों। यह पूरा सिलसिला ट्रंप की मारी गई लात से उठे दर्द से बिलबिलाने के बाद अब अपने पैरों पर संभलने का है, और यह अमरीका का एक विकल्प हर देश के लिए, हर अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के लिए खड़ा करते चल रहा है। यह बात ऐसे सभी लात खाए लोगों के लिए भी फायदे और काम की है कि अमरीका के बिना जीना लोग सीख रहे हैं, और यह सीखते हुए एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं।
इस बात की चर्चा आज हम इसलिए भी कर रहे हैं कि दुनिया अब चीन से उतना परहेज नहीं कर रही है, जितना कि वह अमरीकी असर में बीते दशकों में कर रही थी। ब्रिटिश प्रधानमंत्री की चीन यात्रा उसी का एक बड़ा संकेत है, और कल तक के अमरीकी खेमे के माने जाने वाले कुछ और देश भी चीन के साथ अपनी कटुता कम करने की राह पर हैं। खुद हिंदुस्तान जो कि अमरीकी खेमे में तो नहीं था, लेकिन चीन के साथ जिसकी फौजी और सरहदी तनातनी चल रही थी, उसने भी बीते महीनों में घायल की गति घायल जाने के अंदाज में चीन से अपने रिश्ते बेहतर किए हैं। लेकिन आज इस पर चर्चा करने का एक और मकसद यह है कि हम भारत और चीन की बहुत बड़ी कारोबारी भागीदारी रहते हुए भी, उसका बहुत अधिक भविष्य बढ़ाना नहीं चाहते। आज जरूर भारत कच्चे माल और पुर्जों के लिए पूरी तरह से चीन पर टिका हुआ है, और दीवाली पर बिजली की झालरों के बहिष्कार जैसी फूहड़ हरकतों को छोड़ दें, तो भारतीय अर्थव्यवस्था चीन से होने वाले अंधाधुंध आयात के बिना न देश का काम चला सकती, न विदेशों को कुछ निर्यात कर सकती। ऐसे में भारत और चीन कोई आर्थिक गठबंधन तो नहीं बन सकते, लेकिन भारत को चीन का एक विकल्प बनने की कोशिश जरूर करना चाहिए।
जो लोग अंतरराष्ट्रीय मामलों को लगातार पढ़ते हैं, उन्हें मालूम है कि वैश्विक कारोबार में पिछले कई बरस में, खासकर कोरोना-लॉकडाउन के दौर के बाद, चाईना प्लस वन की नीति चल रही है। मतलब यह कि दुनियाभर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन में अपनी मैन्युफैक्चरिंग करवाने के साथ-साथ भारत में भी यह काम शुरू कर चुकी हैं, जैसे आईफोन बनाने के कारखाने भारत में चीन की टक्कर के चल रहे हैं। ऐसे में भारत के सामने आज अमरीकाविहीन जितने तरह के व्यापार-समझौते हो रहे हैं, उनका फायदा उठाने का एक बड़ा मौका है। अभी ईयू के साथ जो समझौता हुआ है, उसके बाद की पहली खबर यह है कि उससे भारत के पड़ोसी बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग पर बड़ी मार पड़ चुकी है। भारत का बना हुआ सामान अगर योरप के देशों में कम टैक्स पर बिकेगा, तो जो-जो सामान दूसरे देश बनाते हैं, उन्हें भारत का कुछ मुकाबला तो झेलना ही पड़ेगा, इनमें बांग्लादेश भी एक रहेगा जिसे दुनिया के कई देश अपने सामान बनवाने के लिए एक अच्छी जगह मानकर चल रहे थे। कुछ तो बांग्लादेश अपनी राजनीतिक अस्थिरता की वजह से विश्व-कारोबार का भरोसा खो चुका है, और कुछ अभी भारत और योरप के ताजा समझौते की वजह से भी उसका और नुकसान होगा।
भारत को इस मौके पर एक समझदार और जिम्मेदार देश की तरह काम करना होगा, और अपनी सारी निर्माण-क्षमता का हुनर लगातार बढ़ाना होगा, उसे देश की अर्थव्यवस्था को राजनीतिक मुद्दों के ऊपर प्राथमिकता देनी होगी, सभी समाजों का एक समावेशी माहौल बनाना होगा, महिला कामगारों को बराबरी से सामने लाना होगा, और देश के कारोबारियों को मैन्युफैक्चरिंग में तेजी से आगे बढऩे के लिए बढ़ावा देना होगा। ये सारी बातें आसान नहीं हैं, खासकर देश में अगर अराजकता का माहौल है, सामाजिक तनाव है, धर्म का उन्माद गैरजरूरी हद तक बढ़ा हुआ है, सांप्रदायिकता सिर चढक़र बोल रही है, लोग एक-दूसरे समुदाय का आर्थिक बहिष्कार सोच रहे हैं, तो भारत के लोगों को यह समझ लेना होगा कि जिस चीन के मुकाबले भारत की संभावनाएं दिख रही हैं, वह चीन इनमें से तमाम दिक्कतों से मुक्त है। चीन में इस तरह की कोई भी प्रतिउत्पादक हरकतें नहीं हैं। वहां पर लोगों का हुनर सिर चढक़र बोलता है।
भारत में अभी-अभी आई कुछ ताजा रिपोर्ट बताती हैं कि भारत में कौशल प्रशिक्षण और कौशल विकास के नाम पर जो अपार बजट खर्च किया गया है, उसका बहुत बड़ा हिस्सा फर्जीवाड़े में चले गया है। एक-एक अप्रशिक्षित को कई-कई प्रदेशों में प्रशिक्षण देना बताया गया है, एक-एक बैंक खाते में हजारों लोगों का भत्ता जाना बता दिया गया है, और ऐसा संगठित भ्रष्टाचार इस मामले में हुआ है कि चीन होता तो अब तक कुछ दर्जन लोगों को मौत की सजा हो चुकी रहती। हम मौत की सजा को बढ़ावा देने की बात नहीं कर रहे हैं, लेकिन अगर भारत में सरकार की इतनी बड़ी महत्वाकांक्षी योजना में भ्रष्टाचार इतना संगठित और व्यापक है, तो फिर भारत में निर्माण बढ़ाने के लिए प्रशिक्षित कामगार आएंगे कहां से? वे कागजों पर तो दिखेंगे, लेकिन जमीन पर नहीं रहेंगे, और ऐसे फर्जी प्रशिक्षित कामगारों के भरोसे क्या भारत जैसा देश चीन का कोई मुकाबला कर सकेगा? इसलिए यह बात समझने की जरूरत है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों से भारत के सामने जो नई संभावनाएं खड़ी हो रही हैं, वे अपनी सरहदों के भीतर उतनी ही बड़ी चुनौतियां भी हैं। भारत में उद्योग व्यापार जिस तरह राजनीतिक पसंद-नापसंद के शिकार हैं, जिस तरह कारोबारियों के सामने बराबरी का एक खुला मैदान आज नहीं है, उन सबको भी देखना होगा। सिर्फ सरकार-संरक्षित या सरकार-प्रोत्साहित कारोबारियों के भरोसे पूरा देश चीन सरीखा मैन्युफैक्चरिंग-हब नहीं बन सकता। यह मौका भारत के सामने ऐतिहासिक संभावनाओं, और ऐतिहासिक चुनौतियों का है। केंद्र और राज्य सरकारों को अपने-अपने स्तर पर देश के माहौल को बेहतर करना होगा। जब समाज के अलग-अलग तबके एक-दूसरे से दुश्मनी निकालने को ही जिंदगी का सबसे बड़ा हासिल मानकर चलते हों, तो ऐसे तबकों वाली अर्थव्यवस्था को विकसित देशों से निर्यात का काम भला कैसे हासिल हो सकता है? गैरजरूरी सामाजिक तनाव आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के बीच किस तरह किसी देश को पीछे घसीट सकता है, या उसे पूरी संभावनाओं तक पहुंचने से कैसे पीछे रख सकता है, यह भारत के संदर्भ में आज देखने की जरूरत है। क्या यह देश आत्ममंथन करेगा?


