संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : नीतीश को एक चिट्ठी लिक्खो, और उसमें लिक्खो लानत है!
सुनील कुमार ने लिखा है
17-Dec-2025 3:45 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : नीतीश को एक चिट्ठी लिक्खो, और उसमें लिक्खो लानत है!

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आमतौर पर एक गंभीर नेता माने जाते हैं, यह एक अलग बात है कि मुख्यमंत्री पद की शपथ 10वीं बार लेने के लिए वे समय-समय पर गठबंधन बदलते रहे हैं, लेकिन बातचीत होश-हवास की करते हैं। ऐसे में अभी सरकारी डॉक्टरों को नियुक्ति पत्र देने के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच पर से जब वे एक मुस्लिम डॉक्टर को कागज सौंप रहे थे, तो कैमरों के सामने ही वे झुके, हाथ बढ़ाया, और यह क्या है कहते हुए इस डॉक्टर का हिजाब खींच दिया। कहीं भी मुख्यमंत्री जो भी करते हैं, उनके आसपास के लोग उसे स्थाई रूप से तारीफ के लायक पाते हैं, और नीतीश की इस हरकत के वीडियो में बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय, और मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव दीपक कुमार हँसते हुए दिखते हैं। ऐसा तो है नहीं कि नीतीश अपने इतने लंबे राजनीतिक जीवन में इफ्तार-दावते करते हुए भी मुस्लिम महिला की पोशाक के इस कपड़े को जानते नहीं होंगे। इस राज्य में 17 फीसदी से अधिक मुस्लिम हैं, इसलिए नीतीश हिजाब को भी जानते हैं, उसके धार्मिक रीतिरिवाज से भी वाकिफ हैं, और 75 बरस के भारतीय होने की वजह से वे भारतीय महिला के साथ किसी पुरूष की सीमाओं को भी जानते हैं। इसके बाद भी उन्होंने ऐसी हरकत क्यों की, यह हैरानी की बात है। ऐसा लगता है कि उनका दिमाग 15 बरस लेट सठियाया है।

दिक्कत यह है कि जिस एनडीए का वे हिस्सा हैं, उस एनडीए के यूपी के एक मंत्री संजय निषाद से मीडिया के एक कैमरे पर जब पूछा गया कि नीतीश ने ऐसा क्यों किया होगा, तो इस अधेड़-बुजुर्ग मंत्री का कहना था- अरे वो भी तो आदमी है न, छू दिया तो इतना पीछे नहीं पड़ जाना चाहिए। कहीं और छू दिया होता, तो क्या होता? इस पर माइक थामे हुए रिपोर्टर भी टक्कर से हँसते हुए पूछता है- तो आपको क्या लगता है, कि कहीं और भी छू लेते क्या? इस पर यह मंत्री कहता है- नकाब छूने पर इतना कहा जा रहा है, तो कहीं और छू देते, चेहरा छू देते, या उंगली कहीं और लग जाती, तो क्या कहते? नकाब को छूना तो लाजिमी है।

जो मर्दों के दबदबे वाली सोच है उसे इस बात पर हैरानी हो रही है कि एक सरकारी डॉक्टर का हिजाब मुख्यमंत्री ने खींच लिया, तो इसमें उनकी आलोचना क्यों होनी चाहिए? एक तो महिला, जिसकी कि इस देश में सैकड़ों बरस से ऐसी ही स्थिति है। दूसरी बात यह कि वह एक मुस्लिम महिला है, जिसके साथ शायद आज के भारत में कुछ और हद तक आजादी ली जा सकती है। फिर अगर वह महिला मुस्लिम धर्म या रीति-रिवाज के मुताबिक कोई हिजाब पहनी हुई है, तो उसे तो खींचा ही जा सकता है। नीतीश के मंत्री अब सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि चेहरा ढांके हुए हिजाब लगाने से तो मरीजों को डॉक्टर की सिर्फ आंखें ही दिखाई देंगी, ऐसे में काम कैसे चलेगा? कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर ऐसी फूहड़ बातों के जवाब में यह लिखा है कि उनके जितने ऑपरेशन हुए उनमें डॉक्टर और नर्स सभी ने चेहरों पर मास्क बांध रखा था, और उनकी सिर्फ आंखें ही दिख रही थीं।

जिस बिहार में मुस्लिम वोट मायने रखते हैं, वहां पर नीतीश की यह हरकत बुढ़ापे में बचकानी है, सठियाई हुई है, और मुस्लिम महिला के प्रति हिकारत से भरी हुई भी है कि उसे जैसा चाहे वैसा छुआ जा सकता है। अब इस हिकारत में उसका मुस्लिम होना अधिक मायने रखता है, या उसका महिला होना, यह तो तभी पता लग सकेगा जब नीतीश अपनी हरकत के बारे में मुंह खोलेंगे। फिलहाल तो देश में जो लोग सही या गलत के बारे में सोचने के लिए किसी का मुस्लिम होना या न होना काफी मानते हैं, उनके लिए नीतीश की हरकत में कोई बुराई नहीं है, जैसा कि यूपी का यह मिनिस्टर हँसते हुए कैमरे पर कहता है। अब जब विपक्षी पार्टियां इस हरकत के लिए औपचारिक रूप से नीतीश को बेशरम लिख रही हैं, कांग्रेस यह पूछ रही है कि बिहार के सबसे बड़े पद पर बैठा आदमी जब ऐसी हरकत कर रहा है, तो सोचिए कि राज्य में महिलाएं कितनी सुरक्षित रहेंगी? कांग्रेस ने मांग की है कि नीतीश को इस घटिया हरकत के लिए तुरंत इस्तीफा देना चाहिए। यह घटियापन माफी के लायक नहीं है। आरजेडी ने लिखा है कि नीतीशजी की मानसिक स्थिति अब बिल्कुल ही दयनीय स्थिति में पहुंच चुकी है। देवबंदी मौलवी कारी इसहाक गोरा ने कहा है कि इसे देखकर केवल मेरा ही नहीं, पूरे देश की जनता का खून खौल उठा होगा। उन्होंने कहा कि इस मामले में नीतीश को पूरे देश की महिलाओं से माफी मांगनी होगी।

नीतीश कुमार असल राजनीति को अच्छी तरह समझने वाले नेता हैं। बिहार पर्याप्त मुस्लिम आबादी वाला राज्य है, और नीतीश कुमार भारत के राजनीतिक पैमाने पर मुस्लिमों से हमदर्दी रखने वाली आरजेडी के साथ भी गठबंधन में रह चुके हैं, और भाजपा के साथ भी। वे आज पूरे देश में मुस्लिम समुदाय के साथ हो रहे सुलूक को भी समझते हैं, और वे तनावपूर्ण मुस्लिम भावनाओं से भी वाकिफ हैं। जब कोई समाज आहत चल रहा हो, तो उसके रिवाजों के साथ इस तरह की निहायत गैरजरूरी आजादी लेना परले दर्जे की गैरजिम्मेदारी भी है। हिन्दू-मुस्लिम से परे भी किसी महिला के कपड़ों के साथ, उसके बदन के साथ किसी तरह की आजादी उसके बहुत करीबी परिचित भी नहीं लेते। नीतीश को बुढ़ापे में आकर कम से कम इतनी अक्ल तो आ जानी थी कि सरकारी डॉक्टर बन रही एक मुस्लिम महिला आज मुख्यमंत्री की इस चुहलबाजी के मुकाबले कर भी क्या सकती है? उसे तो इसी सरकार में, इसी व्यवस्था में जिंदा रहना है, और वह मुख्यमंत्री के मुकाबले किसी टकराव में इंसाफ पाने की कोई उम्मीद तो रख नहीं सकती।

आज देश का माहौल ऐसा नहीं है कि ऐसी चुहलबाजी की जाए। वैसे भी जो उम्र के लिहाज से पितातुल्य क्यों न हों, उन्हें भी भारतीय संस्कृति के मुताबिक महिलाओं और लड़कियों से एक सम्मानजनक फासला बनाकर रखना चाहिए। नीतीश को अपनी इस बेजा हरकत के लिए बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए, और उसमें देर भी नहीं करनी चाहिए। बहुत देर से मांगी गई माफी कोई खानापूरी करने के लिए की गई है, ऐसा लगता है। पहली आपत्ति आते ही उन्हें खुद होकर एक साफ-साफ बयान देकर सभी महिलाओं से माफी मांगना था, और यह खुलासा भी करना था कि इस हरकत के पीछे उनकी क्या नीयत थी। इसके साथ-साथ किसी राज्य के शासन प्रमुख को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि राज्य के अल्पसंख्यकों, और महिलाओं के प्रति उसका क्या नजरिया है, और उसकी क्या संवैधानिक जिम्मेदारियां हैं। मुख्यमंत्री और एक सरकारी मुस्लिम महिला डॉक्टर के बीच ऐसी अवांछित हरकत का कोई रिश्ता बनता नहीं है, और नीतीश ने अपनी सीमा से बहुत बाहर जाकर खुद अपना बुढ़ापा खराब किया है। कई लोगों को लग सकता है कि इस मुद्दे को आया-गया मान लेना चाहिए। ऐसी बात सोचने वालों के बारे में हम दो बातें शर्तियां कह सकते हैं, एक यह कि वे मुस्लिम नहीं होंगे, और दूसरी यह कि वे महिला नहीं होंगे।

एक बेशरम हरकत के बाद बेशरम चुप्पी उस हरकत के इतिहास को एकदम पुख्ता तरीके से दर्ज कर देती है। नीतीश के नाम के साथ यह बात उसी वक्त कुछ धुंधली हो सकती थी, जब वे आनन-फानन माफी मांगते, और प्रदेश की महिलाओं को, अल्पसंख्यकों को हिफाजत का भरोसा दिलाते। ऐसा करने के बजाय वे अपना बुढ़ापा खराब करने पर आमादा हैं, तो क्या कहा जा सकता है। हम तो यही कह सकते हैं कि पटना के पते पर नीतीश को एक चिट्ठी लिक्खो, और उसमें लिक्खो लानत है।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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