संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सांसद-विधायक बनते ही आत्मा 5 बरस पार्टी के पास बंधक, यह कैसा लोकतंत्र!
सुनील कुमार ने लिखा है
13-Dec-2025 8:15 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : सांसद-विधायक बनते ही आत्मा 5 बरस पार्टी के पास बंधक, यह कैसा लोकतंत्र!

लोकसभा के कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भारतीय सांसदों पर पार्टी व्हिप के प्रावधान को खत्म करने, या कम से कम सीमित करने का एक निजी प्रस्ताव सदन में रखा है। उनका तर्क यह है कि सांसदों को पार्टी के निर्देशों के मुताबिक मतदान करने की मौजूदा बंदिश खत्म की जाए, क्योंकि अभी पार्टी के कहने के बाद अगर कोई उस निर्देश के खिलाफ वोट डालते हैं, तो उनकी सदन की सदस्यता पार्टी के नोटिस पर खत्म की जा सकती है। यह भारत के दलबदल कानून से पार्टी व्हिप को जोड़ देने की वजह से हुआ है कि कोई सांसद अगर पार्टीलाईन के खिलाफ वोट दे, तो उसे बागी करार दिया जाता है, और इसके दाम उस सांसद को सदस्यता की शक्ल में चुकाने पड़ सकते हैं। मनीष तिवारी सुप्रीम कोर्ट के एक वकील हैं, और कांग्रेस की राजनीति में लंबे समय से हैं। वे लोकसभा के निर्वाचित सदस्य हैं, और उनकी यह सोच पार्टी का अधिकृत सोच नहीं भी है, तो भी यह पार्टी का किसी तरह का विरोध भी नहीं है। भारतीय संसद में इस तरह के प्राइवेट मेंबर बिल सफल नहीं होते हैं, वे कानून नहीं बन पाते, लेकिन वे बहस का एक मुद्दा तो बन ही जाते हैं, और ऐसे मुद्दों पर सदन से सडक़ तक चर्चा होने लगती है।

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम भारतीय संसद में विचारों की विविधता खत्म होने पर कई बार पहले भी फिक्र जाहिर कर चुके हैं, और इसे हम देश की जनता की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नुकसान की शक्ल में भी देखते हैं। आज स्थिति यह है कि कोई सांसद मतदाताओं के सीधे वोट से लोकसभा पहुंचे, या सांसदों और विधायकों के वोटों से राज्यसभा पहुंचे, वे अपने मतदाताओं की सोच को सदन में नहीं रख सकते। आमतौर पर उन्हें पार्टी की सोच को ही आगे बढ़ाना पड़ता है। और जब किसी भी तरह के मतदान की नौबत आती है, तो पार्टी के सचेतक की जारी की गई नोटिस के मुताबिक ही मतदान करना पड़ता है। संसद के भीतर हालत यह रहती है कि जब किसी मुद्दे पर बहस के लिए पार्टी को उनकी सदस्य संख्या के मुताबिक समय दिया जाता है, तो अधिकतर सांसदों को अपनी पार्टी की सोच के मुताबिक ही कुछ बोलना पड़ता है। लाखों वोटरों की पसंद से जो सांसद बनकर पहुंचते हैं, वे न तो अपनी मर्जी की बातें रख पाते, और न ही वे अपनी मर्जी से किसी मतदान में वोट दे पाते। इस तरह सांसदों की मौलिक सोच भी किनारे धरी रह जाती है, और व्यापक महत्व के मुद्दों पर पार्टियां ही कई तरह की सौदेबाजी कर सकती हैं, अपने सांसदों को किसी भी वोट में समर्थन या विरोध करने को कह सकती हैं। इससे लोकतंत्र में विचारों के उन्मुक्त प्रवाह पर बड़ी आंच आती है, और एक व्यक्ति के रूप में, किसी प्रदेश या लोकसभा सीट के प्रतिनिधि के रूप में सांसद सदन में पार्टीलाईन से परे कुछ नहीं बोल पाते।

मनीष तिवारी का उठाया हुआ मुद्दा एकदम सही है। आज हम अमरीकी संसद में देखते हैं कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प अपनी ही पार्टी के हर सदस्य का समर्थन नहीं पाते, सदस्यों के लिए यह आम बात है कि वे अपनी पार्टी के नेता से असहमति रखें, या सदन में उसकी आलोचना करें। हमने दुनिया के कुछ प्रमुख लोकतंत्रों में संसद के भीतर दलबदल कानून के तहत पार्टी सोच से परे वोट डालने पर सदस्यता खत्म होने के खतरे को देखा, तो पता लगा कि ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, इन संसदों में ऐसा कोई खतरा नहीं रहता, यहां पर कोई दलबदल कानून नहीं है। दूसरी तरफ न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, और बांग्लादेश ही ऐसी संसदें हैं जहां पर दलबदल कानून की वजह से असहमत वोट पर सदस्यता जाने का एक सीमित खतरा रहता है। अकेला भारत ऐसा है जहां पर दलबदल कानून बहुत कड़ा बनाया गया है, और पार्टी के निर्देश के खिलाफ वोट डालने पर सदस्यता जाने का पूरा खतरा रहता है।

भारत में एक समय सदन में सरकार बचाने या गिराने की सौदेबाजी रोकने के लिए दलबदल कानून लाया गया था। लेकिन आज इसने सांसदों की मौलिक और निजी सोच की, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गुंजाइश ही खत्म कर दी है। इससे इतने विशाल लोकतंत्र की संसद में मौलिक विचारों की बहस की संभावना भी बहुत तंग हो गई है। मनीष तिवारी का प्रस्ताव यह सुझाता है कि जब सरकार पर विश्वास मत हो, यानी सरकार बचाने या गिराने की बात हो, तब तो पार्टी व्हिप के मुताबिक वोट डालना जरूरी रहना चाहिए, लेकिन बाकी विधेयकों पर सांसद को अपनी मर्जी से वोट डालने की छूट रहनी चाहिए। आज किसी विधेयक पर वोट के वक्त पार्टी का फैसला ही अंतिम होता है, और इसलिए संसद या विधानसभा में पार्टी के निर्देश के खिलाफ वोट देकर सदस्यता बचाने के लिए पार्टी में विभाजन साबित करना पड़ता है, और उसके लिए सदन में उस पार्टी के दोतिहाई सदस्य जरूरी रहते हैं। अब सदस्यों की व्यक्तिगत सोच के बजाय थोक में दलबदल करवाने की व्यवस्था हो गई है, और हमने कई प्रदेशों में ऐसे दलबदल से सरकारें बनते और गिरते देखा है।

आज भारतीय संसद में पार्टी के निर्देशों के मुताबिक ही वोट देने की जो शर्त है, उससे सांसद का व्यक्तित्व खत्म ही हो गया है। यह ऐसी व्यवस्था है कि मानो चुनाव में सांसद बेचेहरा और बेनाम, सिर्फ पार्टी के निशान पर जीतकर आए हों। ऐसा तो रहता नहीं है क्योंकि लोग जब वोट डालते हैं तो पार्टी का निशान, और उम्मीदवार का नाम दोनों पर वे मिलाजुला फैसला लेते हैं। अब सदन के भीतर व्हिप की व्यवस्था से वोटरों की पसंद में से विधायक या सांसद बने हुए व्यक्ति का महत्व खत्म हो जाता है, और वे सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाते हैं, सदन में अपनी पार्टी के सदस्य के रूप में। भारत का तजुर्बा यह रहा है कि दलबदल रोकने के लिए उसने सदन में पार्टी व्हिप को मानना जरूरी किया, और उसका नतीजा निकला कि अब एक-दो सदस्य असहमति में वोट नहीं डालते क्योंकि उनकी सदस्यता चली जाएगी, अब दोतिहाई सदस्य अलग होकर किसी और पार्टी में मिलकर थोक में वोट डालते हैं। दलबदल को रोकने के नाम पर किया गया यह इंतजाम अब थोक में दलबदल करवाने वाला हो गया है।

भारतीय संसद, और प्रदेशों की विधानसभाओं को इस मुद्दे पर जरूर सोच-विचार करना चाहिए क्योंकि आज पार्टियां इतनी ताकतवर हो गई हैं कि वे अपने सांसदों और विधायकों को भेड़-बकरी के रेवड़ की तरह हांककर किसी भी तरफ ले जाती हैं, और ये सदस्य पांच बरस के लिए पार्टी के बंधुआ मजदूर, या कैदी रहते हैं।

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