संपादकीय
छत्तीसगढ़ के बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर में इस पल नक्सलियों के हथियार डालने का एक समारोह चल रहा है जिसमें प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने दोनों उपमुख्यमंत्रियों सहित मौजूद हैं, और 210 नक्सली भी संविधान की कॉपी हाथ में लिए हुए खड़े हैं। उनके डाले गए डेढ़ सौ से अधिक हथियार भी इस मौके पर नुमाइश में हैं, और सरकार ने इसे किसी रणनीति के तहत आत्मसमर्पण कहने के बजाय इसे पुनर्वास के लिए हथियार छोडऩे की बात कही है। साथ ही बस्तर के आदिवासी समुदाय के बुजुर्गों के हाथों से इन नक्सलियों का स्वागत फूल देकर करवाया गया है, जिससे यह प्रतीकात्मक माहौल बना है कि नक्सली जंगल और बंदूक छोडक़र आदिवासी समुदाय में लौट रहे हैं। आज के इन नक्सलियों में एक करोड़ के ईनाम वाला एक माओवादी रूपेश भी शामिल है। कल से अबूझमाड़ के अलग-अलग इलाकों से निकलकर ये नक्सली बसों तक पहुंच रहे थे, और वहां से जगदलपुर रवाना हो रहे थे। उनके साथ छत्तीसगढ़ के कुछ उत्साही पत्रकार भी चल रहे थे, और आज के इस हथियार डालने का कल से इंतजार चल रहा था।
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यह हथियारबंद नक्सलियों का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण है जिसे सरकार और नक्सली दोनों ही हथियार डालकर पुनर्वास की तरफ आगे बढऩा कह रहे हैं। हम अभी इस रणनीतिक शब्दावली की बारीकी और उसके पीछे की वजह पर जाना नहीं चाहते, क्योंकि यह पल लोकतंत्र की जीत का है, केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, गृहमंत्री विजय शर्मा की कामयाबी का है। यह एक बड़ी खबर इसलिए भी है कि पिछले 22 महीने में छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार आने के बाद जिस बड़े पैमाने पर मुठभेड़ों में नक्सलियों को मारा गया था, वह सिलसिला आज जारी रह सकता था क्योंकि नक्सल आंदोलन कमजोर हो गया है, और सुरक्षा बल आगे बढ़ते चले गए हैं, उन्होंने नक्सल कब्जे से कई इलाकों को छुड़ा लिया है। लेकिन लोकतंत्र में सरकार और संविधान के खिलाफ हथियारबंद आंदोलनकारियों को भी मारने के बजाय उन्हें लोकतंत्र की मूलधारा में लाना एक अधिक बड़ी कामयाबी रहती है। हम बीते दशकों में कई बार शांतिवार्ता से नक्सल हिंसा को खत्म करने की वकालत करते आए हैं, और अभी छत्तीसगढ़ सरकार ने पर्दे के पीछे की बातचीत से यह माहौल बनाया कि हथियारबंद नक्सलियों ने इतनी बड़ी संख्या में हथियार छोड़े। इस कार्यक्रम में अभी सरकार की तरफ से यह भी साफ किया गया है कि पुनर्वास के लिए आए इन नक्सलियों के सामने ऐसी कोई शर्त नहीं है कि उन्हें जिला पुलिस बल में शामिल होना है। गृहमंत्री विजय शर्मा ने यह साफ किया कि जिला पुलिस बल में कुल 10 फीसदी ही पूर्व नक्सली हैं, बाकी दूसरे लोग हैं। इस पुलिस बल में शामिल होने की शर्त किसी नक्सली के सामने नहीं रखी गई है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार बनने के बाद से 22 महीनों में नक्सल मोर्चे पर पौने पांच सौ से अधिक नक्सली मारे गए हैं, दो हजार से अधिक ने आत्मसमर्पण किया, और करीब 19 सौ लोग नक्सल आरोपों में गिरफ्तार हुए। हमने पहले भी इसी जगह कई बार इस बात को लिखा कि इतनी बड़ी संख्या में नक्सलियों के मारे जाने पर भी गिनती की कुछ मौतों को लेकर ही यह बात उठी कि मरने वाले नक्सली न होकर आम ग्रामीण थे। जबकि इसके पहले फर्जी मुठभेड़ों की शिकायतों से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, और सुप्रीम कोर्ट में मामले खड़े ही रहते थे, न्यायिक जांच में भी करीब डेढ़ दर्जन बेकसूर लोगों को मारने की बात साबित हो चुकी थी। इस बार मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई तो जमकर की, लेकिन ऐसे आरोप नहीं लग पाए, जो कि एक बड़ी कामयाबी की बात है। अब आज जो हथियार डाले गए हैं, वे बतलाते हैं कि सरकार के किसी न किसी स्तर से नक्सल लीडरशिप, और आम नक्सलियों की बातचीत चल रही थी, और उसी के चलते हुए आज से आत्मसमर्पण नहीं कहा गया, और आदिवासी समुदाय को बीच में रखा गया कि नक्सलियों ने उनके सामने हथियार डाले, और समुदाय ने पुनर्वास के लिए उनका स्वागत किया। हमें शब्दावली की ऐसी चतुराई में कुछ भी खराब नहीं लग रहा है क्योंकि इससे जो नतीजा निकल रहा है, वह लोकतंत्र की मजबूती का है। आज ये डेढ़ सौ से अधिक बंदूकें बस्तर में कभी सुरक्षाबलों को मार रही थीं, तो कभी बेकसूर ग्रामीणों को। इन बंदूकों से परे बस्तर के नक्सल इलाकों में चारों तरफ जमीनी सुरंगें भी लगी हुई थीं, और यह माना जाना चाहिए कि इन नक्सलियों से मिली जानकारी से अबूझमाड़ के इलाके में यह खतरा कुछ कम हो सकेगा।
दुनिया में छत्तीसगढ़ की पहचान नक्सल हिंसा से चली आ रही थी। यह एक बड़ा ऐतिहासिक मौका है कि दो दिन पहले ही महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में बस्तर इलाके में सक्रिय नक्सल पोलित ब्यूरो के एक सदस्य भूपति ने महाराष्ट्र मुख्यमंत्री के सामने समर्पण किया था, और दो दिन के भीतर ही बस्तर में हथियारों का यह बड़ा त्याग हुआ है। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक बस्तर, या बाकी देश से भी, नक्सल हिंसा खत्म करने का एक टार्गेट रखा था, रखा है। छत्तीसगढ़ इसे पूरा करने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। जिनका भी लोकतंत्र पर भरोसा है वे चाहेंगे कि नक्सली हथियार छोडक़र लोकतंत्र की मूलधारा में आएं, वे चाहें तो चुनाव लड़ें, और चाहें तो अहिंसक तरीके से समाज में कोई भी दूसरा काम करे। अमित शाह ने अभी कुछ दिन पहले ही छत्तीसगढ़ में एक अखबार से अनौपचारिक चर्चा में यह कहा था कि अगर माओवादी विचारधारा बिना हिंसा के रहती है, तो उसमें सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी क्योंकि लोकतंत्र में सभी तरह की विचारधाराओं के लिए जगह रहती है। आज जब नक्सल आंदोलन इस देश में खत्म होने की तरफ आगे बढ़ रहा है, तब अमित शाह की इस बात के महत्व को समझने की जरूरत है। दूसरी तरफ आज एक बड़ा सवाल कांग्रेस से बनता है कि पांच बरस इस राज्य में कांग्रेस की सरकार रही है, लेकिन न तो नक्सलियों का मुठभेड़ में सफाया हो सका, और न ही इस तरह से उनका आत्मसमर्पण हो सका। समाज में हिंसा कर रहे हथियारों को शांत करना निर्वाचित सरकार की जिम्मेदारी रहती है। छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने दोनों मोर्चों पर यह कर दिखाया है, पहले तो उसने बड़ी संख्या में नक्सलियों को मारा, और फिर जब नक्सलियों के हाथ से मोर्चे निकलने लगे, वे कमजोर होने लगे, तो फिर वे बातचीत के लिए तैयार हुए, और अघोषित, पर्दे के पीछे की बातचीत के चलते उन्होंने अभी हथियार डाले।
इस देश में लोकतंत्र का बहुत बड़ा खर्च नक्सल मोर्चे पर अभी भी जारी है, और इस हिंसा को खत्म करने में सफलता जिस केन्द्र सरकार या राज्य सरकार को मिले, वे तारीफ के हकदार रहेंगे। लेकिन पांच बरस छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस के भूपेश बघेल से यह सवाल तो बनता है कि उनके शासन में यह क्यों नहीं हो सका, क्यों नहीं हो सकता था? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


