दुर्ग
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
दुर्ग, 22 अगस्त। किसानों और पशुधन से जुड़ा महत्वपूर्ण लोक पर्व पोला इस वर्ष 23 अगस्त को बड़े ही उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। यह पर्व मुख्य रूप से छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के ग्रामीण क्षेत्रों में मनाया जाता है। पोला पर्व का सीधा संबंध खेती-बाड़ी और बैलों से है। किसान सालभर खेतों में मेहनत करने वाले अपने बैलों को इस दिन विश्राम देते हैं और उन्हें परिवार का हिस्सा मानकर सम्मानित करते हैं। बैलों को स्नान कराकर उनके सींगों पर रंग लगाया जाता है, गले में फूलों की माला और घंटियां पहनाई जाती हैं। गांव-गांव में बैलों की शोभायात्रा भी निकाली जाती है।
शहरों और जिन घरों में बैल नहीं होते वहां मिट्टी के बैलों की पूजा करते हैं। बाजारों में मिट्टी और लकड़ी से बने खिलौनों की खूब खरीदारी हो रही है। इस बार बाजार में मिट्टी के बैल 80 रुपये जोड़ी, लकड़ी के बैल 70 रुपये में तथा मिट्टी के छोटे-छोटे खिलौने 10-10 रुपये में उपलब्ध हैं। बच्चे इन खिलौनों से खेलते हैं और परिवारजन इन्हें देवी-देवताओं को अर्पित कर अच्छी फसल व समृद्धि की कामना करते हैं।
इस अवसर पर घरों में पारंपरिक व्यंजन जैसे ठेठरी, खुरमी, पूरणपोली और खीर बनाए जाते हैं।
पहले भगवान को भोग लगाया जाता है और फिर बैलों को भी खिलाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में मान्यता है कि इसी दिन ‘अन्न माता’ गर्भधारण करती हैं, यानी धान के पौधों में दूध भर जाता है। इसी कारण इस दिन खेतों में जाने की मनाही रहती है। गांवों में पोला पर्व को लोक-संस्कृति का प्रतीक मानते हुए बैल सजाने और बैल दौड़ की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं।


