दुर्ग

70 वर्षीय कनक ने अंगूठा लगाना छोड़, हाथों में ली कलम
18-Nov-2021 5:57 PM
70 वर्षीय कनक ने अंगूठा लगाना छोड़, हाथों में ली कलम

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
दुर्ग, 18 नवंबर।
ग्राम नंदकटठी के रहने वाले 70 वर्षीय कनक यादव ने अपने सीखने की ललक से एक अलग ही मिसाल कायम की है। पहले ग्रामीण अंचल में शिक्षा का विस्तार इतने बड़े पैमाने पर नहीं हुआ था जिसके चलते कनक यादव शिक्षा से वंचित रह गए थे। लेकिन आने वाली शिक्षित पीढिय़ों को देखकर उनके अंतर्मन में भी पढऩे की ललक थी। जब राज्य शासन द्वारा ‘पढऩा लिखना’ अभियान की शुरुआत ग्राम नंदकटठी में शुरू की तो स्वयंसेवी शिक्षिका दीपाली निषाद उनके घर पहुंची जहां उन्होंने शासन की योजना में कनक यादव को भागीदार बन शिक्षित होने का प्रस्ताव दिया।

उम्र की दहलीज को देखते हुए कनक को असहजता महसूस हुई और उन्होंने शुरूआत में पढऩे के लिए मना कर दिया। उनका कहना था कि इस उम्र में पढ़ाई करके मैं क्या करूंगा, लेकिन स्वयं सेवी शिक्षिका दीपाली ने उन्हें बताया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती, पढऩे-लिखने के कई फायदे हैं, सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि आप आने वाली पीढिय़ों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हैं।

कनक यादव अपने पोते-पोतियों को स्कूल जाते हुए देखते थे और यही कारण था कि सीखने की इच्छा उनके मन में कहीं दबी हुई थी। इसके पश्चात् उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए, पढऩे के लिए हामी भर दी। यह उनके जीवन का एक अनोखा अनुभव था, जिसे वह पूरी तरीके से जी रहे थे। वह साक्षरता केन्द्र मे सबसे पहले पहुँच जाते थे और मन लगाकर पढऩे की कोशिश करते थे। पढऩे की ललक और मेहनत ने आज उन्हें निरक्षर से साक्षर बना दिया।

पहले बैंक, शासकीय या अशासकीय कार्यों के फॉर्म में उन्हें अपने हस्ताक्षर की जगह अंगूठा लगाना पड़ता था, लेकिन अब उन्होंने हस्ताक्षर करना सीख लिया है।
उन्होंने इतना अक्षर ज्ञान अर्जित कर लिया है कि वह पढ़ भी लेते हैं। वह जब पढऩे साक्षरता केन्द्र में जाते हैं तो अपने अनुभव को अन्य असाक्षर साथियों के साथ साझा करते हैं। वह बताते हैं कि उनके समय में शिक्षा को लेकर इतनी जागरूकता नहीं थी लेकिन जो अवसर उन्हें बचपन में नहीं मिला आज राज्य शासन की योजना के द्वारा मिल रहा है।

कनक यादव आज भी मजदूरी करते हैं लेकिन उम्र के इस पड़ाव में भी राज्य शासन के ‘पढऩा लिखना’ अभियान ने उनके जीवन में  उजाला ला दिया है । उनके पढऩे की ललक में ‘पढऩा लिखना’ अभियान का बहुत बड़ा योगदान है। वो अपने दोस्तों को ‘पढऩा लिखना’ अभियान के बारे में बताते हैं। वो बताते हैं कि ‘आखर झांपी’ पुस्तक को उन्होंने सम्भाल कर रखा है, यह वह पुस्तक है जिसे वह शाम को पढऩे के लिए ले जाते हैं। वो छोटे-छोटे बच्चों को भी बताते हैं कि मै पढऩे जाता हूं। कनक यादव जी ने ‘परीक्षा महा-अभियान’ में भी पेपर दिया, जिसमें उन्होंने पूरे निर्धारित समय का उपयोग किया। ऐसा कहते हैं कि जो सीखना छोड़ देता है वो बूढ़ा है, चाहे बीस का हो या अस्सी का, जो सीखता रहता है वो जवान रहता है। वर्तमान में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कनक यादव अब अंगूठा न लगाकर हस्ताक्षर करते हैं।
 


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