दन्तेवाड़ा

ज्ञानभारतम मिशन: दंतेवाड़ा में मिली 11वीं शताब्दी की धरोहर
28-May-2026 3:19 PM
ज्ञानभारतम मिशन: दंतेवाड़ा में मिली 11वीं शताब्दी की धरोहर

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

दंतेवाड़ा, 28 मई। केंद्र शासन के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संचालित ‘ज्ञानभारतम् मिशन’ के अंतर्गत दंतेवाड़ा जिले में भारतीय ज्ञान परम्परा और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धियां सामने आई हैं। इस मिशन का उद्देश्य देशभर में बिखरी प्राचीन पाण्डुलिपियों, ताड़पत्रों, हस्तलिखित पोथियों तथा शिलालेखों का सर्वेक्षण कर उन्हें संरक्षित करना है। जिससे भारत की समृद्ध बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत भावी पीढिय़ों तक सुरक्षित पहुंच सके।

कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव के मार्गदर्शन में जिले में मिशन के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु जिला नोडल अधिकारी एवं एसडीएम लोकांश एल्मा के नेतृत्व में जिला स्तर पर मास्टर ट्रेनर्स, विकासखंड स्तर पर नोडल अधिकारियों तथा संकुल स्तर पर शिक्षकों को सर्वेयर नियुक्त किया गया है। टीम द्वारा जिले के विभिन्न ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थलों में लगातार सर्वेक्षण और दस्तावेजीकरण का कार्य किया जा रहा है।

समलूर  में मिली अनेक धरोहर

इस अभियान के दौरान जिले में अब तक 05 प्राचीन शिलालेख तथा 02 महत्वपूर्ण पाण्डुलिपियां प्राप्त हुई हैं। इनमें 29 अप्रैल को शिव मंदिर समलूर से 11वीं शताब्दी का एक दुर्लभ शिलालेख प्राप्त हुआ, जो तेलुगु लिपि में उत्कीर्ण है। इसके बाद 16 मई को समलूर स्थित मंदिर परिसर में पंडित की कोठरी से 18वीं से 20वीं शताब्दी के मध्य की एक प्राचीन पाण्डुलिपि प्राप्त हुई, जो देवनागरी लिपि में लिखी गई है। समलूर क्षेत्र से ही 11वीं शताब्दी का एक अन्य शिलालेख भी मिला है, जो देवनागरी लिपि में अंकित है।

इसी क्रम में विगत् 21 मई को ऐतिहासिक मामा-भांजा मंदिर, बारसूर से 1060 से 1068 ईस्वी कालखंड के समतुल्य एक महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त हुआ। उक्त शिलालेख तेलुगु लिपि में उत्कीर्ण है। वहीं 25 मई को दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा से 13वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल के दो प्राचीन शिलालेख प्राप्त हुए, जिनमें तेलुगु एवं देवनागरी दोनों लिपियों का प्रयोग देखने को मिला।

इसी क्रम में जिले के आंवराभाटा संकुल क्षेत्र में इन्द्रजीत यादव के निवास से एक दुर्लभ ताड़पत्र पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है। प्रारंभिक अध्ययन के अनुसार यह पाण्डुलिपि लगभग 150 से 300 वर्ष पुरानी प्रतीत होती है। इसमें ओडिया लिपि का उपयोग किया गया है। विशेषज्ञों द्वारा इसके ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व का अध्ययन किया जा रहा है। ज्ञानभारतम् मिशन के तहत मिली ये धरोहरें न केवल जिले के गौरवशाली इतिहास को उजागर करती हैं। जिला प्रशासन द्वारा इन सभी पुरावशेषों के संरक्षण, अभिलेखीकरण एवं अध्ययन की दिशा में आवश्यक कार्यवाही की जा रही है।


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