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नवादा, 23 अक्टूबर| बिहार विधानसभा चुनाव मैदान में शुक्रवार को कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी उतर आए। राहुल गांधी ने नवादा के हिसुआ में राजद नेता तेजस्वी के साथ एक संयुक्त चुनावी सभा को संबोधित किया और केंद्र सरकार पर जम कर हमला बोला। राहुल गांधी ने हाल में तीन कृषि कानूनों को लेकर कहा कि केंद्र सरकार ने किसानों पर आक्रमण करने के लिए तीन कानून बनाए हैं। बिहार में मंडियों और एमएसपी को पहले बंद कर दिया गया था, अब पूरे देश में बंद करने की योजना है। लाखों लोगों को बेरोजगार करने जा रहे हैं।
उन्होंने लोगों से बात को समझने की अपील करते हुए कहा कि बड़े उद्योगपतियों के लिए रास्ता साफ किया जा रहा है।
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा, वो आते हैं, कहते हैं कि किसानों के सामने सिर झुकाता हूं, सेना के सामने सिर झुकाता हूं, मजदूरों के सामने सिर झुकाता हूं, छोटे व्यापारियों के सामने सिर झुकाता हूं। फिर घर जाते हैं और उद्योगपतियों का काम करते हैं, सिर आपके सामने झुकाएंगे, लेकिन काम किसी और का करेंगे।
नोटबंदी पर चर्चा करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि, इससे आपको कितना फायदा हुआ, आप बैंक के सामने धूप, बारिश में खड़े थे। बैंक में पैसा डाला। आपका पैसा कहां गया? हिंदुस्तान की सबसे अमीर लोगों की जेब के अंदर।
उन्होंने कहा, हमारी सरकार थी तो 70 हजार करोड़ रुपये माफ किया। मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़, पंजाब में किसानों का कर्ज माफ किया।
उन्होंने लोगों से सच्चाई पहचानने की अपील करते हुए कहा कि इस बार बिहार सच्चाई को पहचानने जा रहा है और नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार को भगाने जा रहा है। इस बार नरेंद्र मोदी को जवाब मिलने जा रहा है।
राहुल गांधी ने चीन सीमा का जिक्र करते हुए कहा कि जब बिहार के युवा सैनिक शहीद हुए उस दिन प्रधानमंत्री ने क्या किया? प्रधानमंत्री ने सेना का अपमान किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री, ये बताइए कि चीन की सेना को हिंदुस्तान से कब बाहर करेंगे।
राहुल गांधी ने कहा, सियाचिन में हमारे युवा ठंड से मरते हैं, लेकिन वापस नहीं आते। सवाल ये है कि चीन की सेना भारत के अंदर है। हमारे प्रधानमंत्री ने झूठ बोला कि चीन की सेना भारत के अंदर नहीं है। बिहार के शहीदों के सामने पूरा देश सिर झुकाता है। सवाल ये नहीं है, सवाल ये है कि जिस दिन बिहार के जवान शहीद हुए, पीएम ने क्या कहा सवाल वह है।
इसी रैली में राजद नेता तेजस्वी यादव ने नीतीश सरकार पर हमला बोला और 10 लाख नौकरियों के अपने वादे को फिर से दोहराया।
राहुल भागलपुर के कहलगांव में भी एक चुनाव रैली को संबोधित करने वाले हैं। (आईएएनएस)
बात दोस्ती की हो तो इंसान उम्र के साथ थोड़ा चुनिंदा होता जाता है. चिम्पैंजियों के साथ भी यही बात है. उम्र बीतने के साथ उनके भी सच्चे मित्रों की संख्या घटती जाती है. दोस्तों के साथ उनका व्यवहार हैरान करने वाला है.
साइंस जर्नल में छपी एक रिपोर्ट उनके व्यवहार के बारे में कई बातें सामने लाई है. अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी की जंतु मनोविज्ञानी अलेक्जांड्रा रोसाती के नेतृत्व में हुई रिसर्च से जानवरों में उम्र के साथ सामाजिक चयन को दिखाने वाला पहला सबूत मिला है. इससे इंसान के रवैये को समझने में मदद मिल सकती है. रिसर्चरों ने इसके लिए यूगांडा के किबाले नेशनल पार्क में 78,000 घंटे तक जीवों पर नजर रख कर भारी मात्रा में आंकड़े जुटाए गए. रिसर्च के लिए यह निगरानी साल 1995 से 2016 के बीच की गई.
उन्होंने 21 नर चिम्पैंजियों के व्यवहार का अध्ययन किया जिनकी उम्र 15 से 58 साल के बीच थी. इस काम के लिए नर को इसलिए चुना गया क्योंकि आमतौर पर वो उसी समूह में रहते हैं जिनमें उनका जन्म होता है. मादा चिम्पैंजी यौन रूप से व्यस्क होने के बाद दूसरे समूहों में चली जाती हैं. मानव के करीबी रिश्तेदार होने के अलावा एक और वजह है जिसके कारण चिम्पैंजियों को इस काम के लिए चुना गया और वह है उनकी लंबी उम्र. आमतौर पर वे 60 साल से ज्यादा उम्र तक जीवित रहते हैं और अलग अलग दौर में उनके पास मित्र बनाने के लिए कई विकल्प होते हैं.

चिम्पैंजी की दोस्ती का मतलब
नर चिम्पैंजी एक दूसरे के साथ सीखते हैं, शिकार करते हैं, खाना बांट कर खाते हैं, सामूहिक रूप से अपने इलाके की पहरेदारी के लिए गश्त लगाते हैं और अपने समूह में उच्च पद पाने के लिए गठजोड़ करते हैं. इसके नतीजा उन्हें ज्यादा स्वतंत्र रूप से प्रजनन में सफल बनाता है. एक दूसरे के साथ उनके मेल मिलाप को समझने के लिए टीम ने एक "एसोसिएशन इंडेक्स" बनाया. इसमें यह देखा गया कि किसी एक पार्टी में कोई नर कितनी बार दूसरे के साथ रहता है और फिर ये दोनों समूह के बाकी सदस्यों के साथ कैसे रहते हैं. रिसर्चरों ने तीन वर्ग तैयार किए. एक वर्ग आपसी दोस्तों का है जिसमें दोनों दोस्ती करना चाहते हैं और साथ में उठते बैठते हैं, दूसरा वर्ग एकतरफा दोस्तों का है जिसमें एक तो दोस्ती चाहता है लेकिन दूसरा नहीं और तीसरा वर्ग है ऐसे चिम्पैंजियों का जो एक दूसरे से दोस्ती नहीं चाहते.
बुजुर्ग चिम्पैंजी क्या चाहते हैं
रिसर्च में पता चला है कि युवाओं की तुलना में उम्रदराज नरों के पास ज्यादा सच्चे मित्र हैं. उदाहरण के लिए 40 साल के नर के पास किसी 15 साल के नर की तुलना में तीन गुना ज्यादा और गहरे दोस्त थे. 35 साल से ज्यादा उम्र के नर अपने सच्चे दोस्तों को ट्रेन करते हैं. उम्र बढ़ने के साथ अपने समूह के दूसरे सदस्यों के साथ भी मार पीट, झगड़े, एक दूसरे को काटने या उन पर हमला करने जैसा व्यवहार कम होता जाता है. इसके बाद आखिर वो दौर आता है जब वो ज्यादा समय अपने आप में बिताने लगते हैं और उस समय वो सिर्फ अपने खास दोस्तों का ही साथ चाहते हैं.

रिसर्च रिपोर्ट के नतीजे बहुत हद तक मानवों के व्यवहार के समान ही है. उम्र बढ़ने के साथ इंसान भी नए दोस्त बनाने से बचने लगता है और अपना ज्यादा वक्त पुराने दोस्तों के साथ ही गुजारता है. सैद्धांतिक रूप से माना जाता है कि ऐसे इसलिए होता है क्योंकि बढ़ती उम्र के साथ इंसान को अपनी मृत्यु के पास आने का अहसास होने लगता है. मजबूत दोस्ती चिम्पैंजियों को ढलती उम्र और गिरते सामाजिक दर्जे के बावजूद खुश रहने में मदद करती है.
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 23 अक्टूबर। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के दर्जनों कार्यकर्ताओं ने आज यहां वीआईपी रोड स्थित राम मंदिर से राजभवन के लिए एक रैली निकाली, जिसे पुलिस ने बेरीकेड्स लगाकर मरीन ड्राइव तेलीबांधा के पास रोक लिया। इसके बाद वे सभी यहां मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता नंदकुमार बघेल की हिन्दू विरोधी टिप्पणी का विरोध करते हुए नारेबाजी करते रहे। बाद में उनके एक प्रतिनिधि मंडल ने राजभवन पहुंचकर राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा।
हिन्दू महासभा प्रदेश अध्यक्ष प्रकाश नारायण शुक्ला का कहना है कि नंद कुमार बघेल प्रभु श्रीराम, हिन्दू धर्म और ब्राम्हणों के विरूद्ध लगातार अपमानजनक टिप्पणी करते रहे हैं। इसके विरोध में वे सभी पुलिस मेें शिकायत दर्ज कराने गए थे, लेकिन यहां कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। ऐसे में हिन्दू महासभा प्रदेश अध्यक्ष प्रकाश नारायण शुक्ला, भारतीय राष्ट्रवादी समाज के समीर शुक्ला व समग्र ब्राम्हण समाज के अंकित द्विवेदी की ओर से बिलासपुर हाईकोर्ट में एक याचिका लगाई गई है। याचिका में अपराध दर्ज कर नंदकुमार बघेल को दशहरे तक नजरबंद रखने की मांग की गई है।
उनका कहना है कि नंदकुमार बघेल द्वारा समय-समय पर विभिन्न सभाओं के माध्यम से करोड़ों हिन्दुओं की आस्था को ठेस पहुंचाया जाता रहा है। इससे उनकी मंशा को हिन्दू समाज में विघटनकारी संदेश के रूप में देखा जा रहा है। उनके द्वारा विभिन्न सभाओं में दशहरे पर प्रभु श्रीराम का पुतला दहन करने की घोषणा की गई है। ऐसे में नंदकुमार बघेल के खिलाफ अपराध दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया जाए।
लखनऊ, 23 अक्टूबर| उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की दस सीटों के लिए सभी पार्टियों में जोर आजमाईश शुरू हो गयी है। भाजपा ने उम्मीदवारों के चयन के लिए मंथन तेज है। ऐसे में बहुजन समाज पार्टी द्वारा अपना उम्मीदवार उतारने के फैसले से निर्विरोध निर्वाचन की संभावना खत्म होती दिख रही है। पार्टी ने अपने नेशनल कोआर्डिनेटर रामजी गौतम को चुनाव मैदान में उतारने का फैसला लिया है। बसपा की इस चाल से भाजपा के नौ सदस्यों के जीतने की राह जहां कठिन होगी वहीं, सपा और कांग्रेस के सामने भी पशोपेश के हालत हो सकते हैं।
दरअसल, विधायकों की संख्या के आधार पर होने वाले इस चुनाव में भाजपा के आठ व सपा के एक सदस्य की जीत तय है। भाजपा का एक और सदस्य तब ही जीत सकता है जब विपक्ष साझा प्रत्याशी न खड़ा करे। न बसपा और न ही कांग्रेस खुद के दम पर अपना प्रत्याशी जिता सकती है। विधानसभा में मौजूदा सदस्य संख्या के आधार पर जीत के लिए किसी भी प्रत्याशी को 36 वोटों की आवश्यकता होगी। भाजपा ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन उसके आठ उम्मीदवारों की जीत तय है। बसपा द्वारा उम्मीदवार उतारने का फैसला किए जाने से ऊहापोह की स्थिति बन गई है।
समाजवादी पार्टी ने अपना एक उम्मीदवार प्रो. रामगोपाल यादव का नामांकन कराकर स्पष्ट कर दिया कि उसके पास दस वोट अतिरिक्त होने के बावजूद वह किसी और को खड़ाकर करने का संकेत नहीं दे रही है। सपा द्वारा केवल उम्मीदवार खड़ा करने से भाजपा को निर्विरोध निर्वाचन की आश थी। भाजपा को भरोसा था कि पर्याप्त वोट न मिलने से विपक्षी दलों की एकता को झटका लगेगा। ऐसे में भाजपा अपने 9 सदस्यों को राज्यसभा की दहलीज तक पहुंचाने में कामयाब हो जाएगी। ऐसी स्थिति में बसपा की प्रमुख मायावती पार्टी के नेशनल कोआर्डिनेटर रामजी गौतम को चुनाव लड़ाकर एक तीर से कई निशाना साधना चाह रही हैं।
बसपा विधानमंडल दल के नेता लालजी वर्मा ने बताया कि पार्टी ने बिहार के प्रभारी रामजी गौतम को अपना प्रत्याशी बनाया है। 26 अक्टूबर को उनका नामांकन किया जाएगा। विधानसभा में बसपा के पास 18 विधायक हैं। पार्टी को एक सीट निकालने के लिए करीब 39 प्रतिशत मतों की जरूरत होगी। इससे साफ है कि उसे दूसरे दलों से सहयोग लेना पड़ेगा।
गौरतलब है कि बहुजन समाज पार्टी के विधायकों की संख्या वैसे तो 18 ही हैं, लेकिन इनमें भी मुख्तार अंसारी, अनिल सिंह सहित दो-तीन और के वोट उसे मिलने की उम्मीद नहीं है। फिर भी मायावती प्रत्याशी उतारकर, भाजपा के नौवें उम्मीदवार के निर्विरोध निर्वाचित होने की संभावना को खत्म कर बड़ा संदेश देना चाह रही हैं। बसपा नेताओं का कहना है कि मायावती के इस फैसले से कांग्रेस, सपा व अन्य विपक्षी दलों द्वारा पार्टी को भाजपा की बी-टीम के रूप में प्रचार करने पर खुद-ब-खुद ब्रेक भी लग जाएगा।
दूसरी तरफ अगर बसपा प्रत्याशी को सपा व कांग्रेस समर्थन नहीं देंगी तो पार्टी को पलटवार करने का मौका मिलेगा। बसपा प्रत्याशी के हारने की स्थिति में पार्टी नेताओं द्वारा जनता के बीच यह सवाल उठाया ही जाएगा कि आखिर भाजपा का मददगार कौन है। वैसे सूत्रों का कहना है कि भाजपा को हराने के लिए सपा, कांग्रेस के साथ ही सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अलावा कई निर्दलीय का भी बसपा को समर्थन मिल सकता है। बसपा की नजर भाजपा के असंतुष्टों पर भी है। (आईएएनएस)
मनोज पाठक
पटना, 23 अक्टूबर| ऐसे तो आम तौर पर किसी भी चुनाव के पहले राजनीतिक दलों द्वारा वादों की झड़ी लगाई जाती रही है, लेकिन बिहार में इस साल हो रहे विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दल नौकरियों की बारिश कर रहे हैं। अगर सच में राजनीतिक दल इतनी नौकरियां उपलब्ध करा दें तो बिहार में पलायन की समस्या ही दूर हो जाए।
वैसे, सबसे मजेदार बात है कि पिछले 30 साल से बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस, जनता दल युनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सत्ता में रही है, लेकिन आज भी यहां के युवाओं को शिक्षा या नौकरी के लिए अन्य राज्यों में पलायन करना पड़ता है।
इस चुनाव में यही राजनीतिक दल अपने-अपने घोषणा पत्र में नौकरी और रोजगार की झड़ी लगाकर, युवाओं को आकर्षित करने में जुड़े हैं। हालांकि इस दौरान सभी राजनीतिक दल 'खुद की कमीज दूसरों से सफेद' बताने को लेकर एक-दूसरे की आलोचना करते हुए सवाल भी उठा रहे हैं।
महागठबंधन में शामिल होकर साथ में चुनाव मैदान में उतरे राजद और कांग्रेस ने जहां बिहार के 10-10 लाख युवाओं को नौकरी देने का वादा किया है वहीं, भाजपा ने 19 लाख युवाओं को रोजगार देने का वादा अपने घोषणा पत्र में किया है।
भाजपा की नेता और केन्द्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को पटना में भाजपा के '5 सूत्र, एक लक्ष्य, 11 संकल्प' के विजन डाक्यूमेंट को जारी किया। इस घोषणा पत्र में बीजेपी ने 19 लाख युवाओं को रोजगार देने का वादा किया है।
भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वादा किया है कि एक हजार नए किसान उत्पाद संघों को आपस में जोड़कर राज्यभर के विशेष सफल उत्पाद जैसे- मक्का, फल, सब्जी, चूड़ा, मखाना, पान, मशाला, शहद, मेंथा, औषधीय पौधों के लिए सप्लाई चेन विकसित करेंगे जिससे 10 लाख रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। इसके अलावा स्वास्थ और शिक्षा क्षेत्रों में भी रोजगार देने का वादा किया गया है।
इससे पहले काग्रेंस ने बुधवार को अपना घोषणा पत्र जारी किया था। कांग्रेस के इस घोषणा पत्र में 10 लाख युवाओं को रोजगार और जिन लोगों को रोजगार नहीं मिलेगा, उन्हें 1500 रुपये मासिक बेरोजगारी भत्ता देने का वादा किया गया है।
इधर, जदयू ने भी कौशल विकास कर लोगों को रोजगार देने का वादा किया है।
इधर, राजद नेता तेजस्वी यादव ने पार्टी का घोषणा पत्र जारी करते हुए संकल्प लिया है कि उनकी सरकार बनते ही पहली कैबिनेट में युवाओं को 10 लाख रोजगार देने पर मुहर लगेगी। इस मामले को वे सभी चुनावी सभाओं में जिक्र भी कर रहे हैं।
तेजस्वी के रोजगार देने के वादे को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने सवाल उठाए कि आखिर इतना पैसा कहां से आएगा।
सुषील मोदी ने कहा, यदि वास्तव में दस लाख लोगों को सरकारी नौकरी दी जाए तो राज्य के खजाने पर 58,415.06 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। इसके अलावा पूर्व से कार्यरत 12 लाख से ज्यादा कर्मियों के वेतन मद में होने वाले खर्च 52,734 करोड़ को इसमें जोड़ लें तो यह राशि 1,11,189.06 करोड़ होती है।
उन्होंने राजद के वादे को ढपोरशंखी तक बता दिया।
इधर, भाजपा के घोषणा पत्र में 19 लाख रोजगार देने को लेकर राजद नेता तेजस्वी यादव ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि राजद के 10 लाख नौकरियों पर सवाल उठाने वाले अब 19 लाख लोगों को रोजगार देने की बात कर रहे हैं। उन्होंने इसे छलावा बताते हुए कहा कि हमारे निर्णय के बाद इन्हें रोजगार देने की चिंता सता रही है।
इधर, सुशील मोदी कहते हैं, भााजपा और दूसरे दलों में यही फर्क है कि दूसरे जहां तारे तोड़ लाने जैसे वादे कर केवल सत्ता हथियाना चाहते हैं, वहां भाजपा सिर्फ वही बात करती है, जिसे जमीन पर लागू किया जा सके।
उन्होंने आगे कहा, हम कोरा वादा नहीं, सेवा का संकल्प करते हैं, इसलिए घोषणा पत्र में 19 लाख लोगों को रोजगार देने का निश्चय किया है। हमने इसका ब्योरा भी दिया है कि ये अवसर लोगों को कैसे दिलाएंगे।
बहरहाल, इस चुनाव में नौकरियों की बारिश हो रही है, अब देखने वाली बात है किस राजनीतिक दल के वादों पर लोग ज्यादा विश्वास करते हैं और उन्हें सत्ता तक पहुंचाते हैं। (आईएएनएस)
आज गोंड़ समाज की बैठक हो सकती है, भाजपा प्रत्याशी ने कहा-भय और आतंक का माहौल
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 23 अक्टूबर। मरवाही में उप-चुनाव की सरगर्मी के बीच जिला कांग्रेस अध्यक्ष के बेटे के पर एक आदिवासी महिला को उसके परिजनों से मारपीट कर घर से उठा ले जाने का आरोप लगा है। महिला के पति ने इसकी जानकारी पुलिस अधीक्षक को दी है। भाजपा ने इसे भय और आतंक का मामला बताया है। भाजपा प्रत्याशी डॉ. गंभीर सिंह ने गोंड समाज के अध्यक्ष पहलवान सिंह मरावी को तुरंत कार्रवाई करने के लिये कहा है। इस मुद्दे पर आज सामाजिक बैठक होने की जानकारी भी मिल रही है। नेता प्रतिपक्ष का कहना है कि वे गांव में पीडि़त परिवार से मिलना चाहते थे लेकिन वहां पर कोई नहीं मिला।

मरवाही थाना क्षेत्र के ग्राम सिवनी सिलवारी टोला निवासी दुर्गेश करियाम ने 22 अक्टूबर को पुलिस अधीक्षक गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही से शिकायत की कि मोहनीश गुप्ता उर्फ दीनू रात को करीब 12 बजे पहुंचा। दीनू ने उससे और उसके भाई से मारपीट की और उसकी पत्नी को भी मारपीट करते हुए उठाकर अपने साथ ले गया। शिकायत में दुर्गेश ने कहा है कि आये दिन मोहनीश गुप्ता उसके घर पहुंच जाता है और मारपीट तथा गाली-गलौच करता है। मारपीट से तंग आकर हमने मोहनीश से कहा कि और कितना बदनाम करोगे हम ज्यादा परेशान नहीं हो सकते, इसे ले जाओ।
पत्र में प्रार्थी ने अपहरण किए जाने का उल्लेख नहीं किया है लेकिन मारपीट कर पत्नी को ले जाने की बात कही है। प्रार्थी ने कहा कि पत्नी के नहीं लौटने पर वह सूचना दर्ज करा रहे हैं।
यह घटना ऐसे समय में हुई है जब मरवाही में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सहित कई मंत्री चुनाव प्रचार के लिये मौजूद हैं। आज वहां गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू भी पहुंचने वाले हैं।
पति का पत्र सोशल मीडिया में वायरल होने के बाद पूरे क्षेत्र में और कांग्रेस में हडक़म्प मच गया है। भाजपा प्रत्याशी डॉ. गंभीर सिंह ने कहा कि उन्होंने इस बात की जानकारी गोंड समाज के अध्यक्ष पहलवान सिंह मरावी को दी है और समाज की ओर से आवश्यक कदम उठाने कहा है। गोंड समाज इस घटना के सामने आने के बाद आज बैठक लेने वाली है, ऐसी खबर है। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा है कि वे घटना की जानकारी मिलने पर शिकायतकर्ता के परिवार से मिलने के उद्देश्य से उनके गांव गये थे पर घर पर कोई नहीं मिला।
मरवाही के थाना प्रभारी मनीष सिंह परिहार ने कहा कि पुलिस अधीक्षक के पास एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी की गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई है। महिला तथा मोहनीश गुप्ता की तलाश की जा रही है।
यह जानकारी मिल रही है कि गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही पुलिस के साथ-साथ कांग्रेस नेता दोनों को ढूंढ रहे हैं। चुनाव की सरगर्मी के बीच कांग्रेस अध्यक्ष के बेटे का नाम इस घटना में आने से वे चिंतित हो उठे हैं। वे जल्दी ही दोनों को सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि पीडि़त परिवार को भी गांव से हटा दिया है और कुछ लोग रायपुर लेकर गये हैं।
छत्तीसगढ़ के आबकारी मंत्री कवासी लखमा के लिए खास मौका दस्तूर एक साथ। स्थान - पेंड्रा
वीडियो पोस्ट किया है पत्रकार समरेंद्र शर्मा ने अपने फेसबुक पेज पर
मौतें-1680, एक्टिव-25238, डिस्चार्ज-143212
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 23 अक्टूबर। प्रदेश में कोरोना मरीज एक लाख 70 हजार पार हो गए हैं। बीती रात मिले 2 हजार 491 नए पॉजिटिव के साथ इनकी संख्या बढक़र 1 लाख 70 हजार 130 हो गई है। इसमें से 1680 मरीजों की मौत हो गई है। 25 हजार 238 एक्टिव हैं और इनका एम्स समेत अलग-अलग जगहों पर इलाज चल रहा है। 1 लाख 43 हजार 212 मरीज ठीक होकर अपने घर लौट गए हैं। सैंपलों की जांच जारी है।
राजधानी रायपुर समेत प्रदेश में कोरोना संक्रमण जारी है और फिलहाल करीब ढाई हजार नए पॉजिटिव मिल रहे हैं। बुलेटिन के मुताबिक बीती रात 8 बजे 2 हजार 491 नए पॉजिटिव सामने आए। इसमें बिलासपुर जिले से सबसे अधिक 274 मरीज पाए गए। रायपुर जिले से 240, रायगढ़ से 239 व कोरबा जिले से 208 मरीज मिले।
दुर्ग जिले से 122, राजनांदगांव-97, बालोद-98, बेमेतरा-37, कबीरधाम-46, धमतरी-88, बलौदाबाजार-83, महासमुंद-81, गरियाबंद-36, जांजगीर-चांपा-124, मुंगेली-61, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही-16, सरगुजा-47, कोरिया-48, सूरजपुर-41, बलरामपुर-48, जशपुर-20, बस्तर-93, कोंडागांव-57, दंतेवाड़ा-102, सुकमा-54, कांकेर-68, नारायणपुर-18, बीजापुर जिले से 36 व अन्य राज्य से 9 मरीज सामने आए हैं। ये मरीज आसपास के कोरोना अस्पतालों में भेजे जा रहे हैं। इनके संपर्क में आने वालों की जांच-पहचान जारी है।
दूसरी तरफ कल 6 लोगों की मौत हो गई। इसमें 1 की मौत कोरोना से और 5 की मौत अन्य गंभीर बीमारियों के साथ कोरोना से हुई है। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग को दुर्ग, कोरबा, रायपुर, बलौदाबाजार व बिलासपुर जिले के अस्पतालों से पूर्व में हुई 46 और मौतों की जानकारी मिली है। इसमें 11 की कोरोना और 35 की मौत अन्य गंभीर बीमारियों के साथ कोरोना से हुई है। इस तरह कल 52 लोगों की मौत दर्ज की गई है। स्वास्थ्य अफसरों का कहना है कि प्रदेशभर में पॉजिटिव आंकड़े पहले से कम हंै। नियमों के पालन और सावधानी से पॉजिटिव आंकड़े और कम हो सकते हैं।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
राजनांदगांव, 23 अक्टूबर। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘प्रसाद’ योजना में डोंगरगढ़ की आराध्य शक्ति मां ब लेश्वरी को भी शामिल कर राजनांदगांव जिले को पर्यटन की एक बड़ी सौगात दी है। इस योजना के जरिए देश के प्रतिष्ठित धार्मिक स्थलों और मंदिरों का कायाकल्प किया जाएगा। नए सिरे से मंदिर परिसर के मौजूदा ढांचों में व्यापक बदलाव किया जाएगा।
बताया जाता है कि केंद्र सरकार ने प्रसादी योजना में छत्तीसगढ़ से इकलौते डोंगरगढ़ को ही सूचीबद्ध किया है। केंद्र सरकार ने डोंगरगढ़ की सौंदर्यीकरण और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए 43 करोड़ की स्वीकृति दी है। बताया जाता है कि पर्यटन के क्षेत्र में बढ़ावा देने के लिए डोंगरगढ़ का नाम शामिल कराने के लिए राजनीतिक स्तर पर भी कोशिशें चल रही थी।
केंद्र की राशि से डोंगरगढ़ मंदिर और परिसर का स्वरूप भी बदल जाएगा। आकर्षक बदलाव होने से भक्तो और दर्शनार्थियों की बुनियादी सुविधाएं भी बेहतर होगी। बताया जाता है कि योजना से मंदिर की साढिय़ों, पार्किंग, तालाब सौंर्दयीकरण एवं तीर्थयात्रियों के लिए अत्याधुनिक सुविधा केंद्र का निर्माण किया जाएगा। यह पहला अवसर है कि जब प्रशासकीय स्तर पर करोड़ों रूपए दिए जाएंगे।
डोंगरगढ़ मंदिर का ज्यादातर विकास निजी और सामाजिक संगठनों की मदद से हुआ है। बताया जाता है कि प्रसादी योजना की राशि से कार्य होने के बाद डोंगरगढ़ न सिर्फ देश में बल्कि पर्यटन के वैश्विक मानचित्र में शामिल हो जाएगा।
इस संबंध में सांसद संतोष पांडे ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में कहा कि मेरे संसदीय कार्यकाल का यह एक प्रमुख अध्याय है। इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए मैं लगातार केंद्रीय पर्यटन मंत्री से संवाद कर रहा था। निश्चित तौर पर इस योजना से डोंगरगढ़ को वैश्विक पहचान बनेगी। इधर योजना से डोंगरगढ़ को रेल सेवा भी लाभ मिलना तय है।
देश के पर्यटन केंद्र में शामिल होने के बाद धार्मिक यात्रा के लिए स्वाभाविक रूप से श्रद्धालुओं की संख्या में बढ़ोत्तरी होगी। देश और विदेश से यात्रियों की आवाजाही बढऩे से रेल सेवा का विस्तार भी होगा। इस योजना के दूरगामी परिणाम आर्थिक और धार्मिक रूप से काफी कारगर साबित होंगे। बताया जाता है कि योजना के चलते मंदिर से जुड़े कारोबारियों की आय भी बढ़ेगी। वही ट्रस्ट और दुकानदारों के लिए नए आय के स्रोत भी खुलेगें।
- आरिफ़ शमीम
"नई जगहों पर जाना और शानदार दृश्य देखना तो बहुत अच्छा लगता है. लेकिन मैं आपको यह भी बता दूं कि साइकिलिंग एक ऐसा शौक़ है जिसमें कभी-कभी बहुत अकेलापन भी महसूस होता है. आप जंगलों और रेगिस्तान में सैकड़ों मील साइकिल चला रहे होते हैं. कभी-कभी तो जानवरों या पक्षियों की आवाज़ भी नहीं सुनाई पड़ती हैं. अकेलापन काटने को दौड़ता है. अगर आप इसे बर्दाश्त कर सकते हैं, तो आइए और पैडल चलाइये.'
ये कामरान अली के शब्द हैं जिन्हें आमतौर पर 'कामरान ऑन बाइक' के नाम से जाना जाता है. वो कहते हैं, "मैं सोच रहा हूं कि क़ानूनी तौर पर भी अपना नाम बदल कर कामरान ऑन बाइक रख लूं."
पिछले नौ वर्षों में कामरान ने 50 हज़ार किलोमीटर साइकिल चलाकर 43 देशों की यात्रा की है. आज कल कोविड-19 के कारण पाकिस्तान में रुके हुए हैं और इंतज़ार कर रहे है कि कब उन्हें हरी झंडी मिले और वो अपनी साइकिल के पैडल पर पैर रखें.
हालांकि, इस समय भी, वह ख़ाली नहीं बैठे हैं. अपनी पिछली यात्राओं में ली गई अनगिनत तस्वीरों में से, अच्छी तस्वीरों को अपने सोशल मीडिया अकॉउंट पर शेयर करते रहते हैं और उनके बारे में ब्लॉग लिखते रहते हैं. यानी यात्रा अभी भी नहीं रुकी है और "पिक्चर अभी बाक़ी है, मेरे दोस्त."
बीबीसी उर्दू के साथ एक वर्चुअल इंटरव्यू में कामरान ने अतीत की कुछ यादें साझा की हैं जो हम आपके सामने पेश कर रहे हैं.
साइकिल का जुनून और घर वालों की मार?
मेरा जन्म दक्षिण पंजाब के शहर लेह में हुआ था. मेरे पिताजी की पुराने टायरों की एक दुकान थी जहां वे टायर में पंक्चर लगाने का काम करते थे.
मैं भी दुकान पर उनका हाथ बंटाता था. मेरे पिता चाहते थे कि मैं पढ़ लिख जाऊं और उनकी तरह पंक्चर बनाने का काम न करूं. इसलिए मैंने लेह से ही इंटरमीडिएट किया और फिर मुल्तान चला गया. जहां मैंने बहाउद्दीन ज़करिया विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में बीएससी और फिर एमएससी की. उसके बाद जर्मनी में मेरा एडमिशन हो गया. वहां जाकर मैंने मास्टर्स की और पीएचडी पूरी की.

बचपन में जब मैं 12 या 13 साल का था, तो मैं एक बार अपने एक दोस्त के साथ साइकिल से 12 रबी-उल-अव्वल (अरबी महीना, इस दिन पैग़ंबर मोहम्मद का जन्म हुआ था और उनकी मृत्यु भी इसी दिन हुई थी) के दिन चौक आज़म गया. यह लेह से 26 किलोमीटर दूर एक छोटी सी जगह है. वहां 12 रबी-उल-अव्वल का एक प्रोग्राम हो रहा था.
इस यात्रा में एक और क्लासमेट भी शामिल हो गए. एक आगे बैठा और एक पीछे और मैं 12 साल की उम्र में दो लड़कों को साइकिल पर बिठा कर निकल पड़ा.
रास्ते में हम नहरों पर रुके, फल तोड़ कर खाये, बहुत मज़ा आया. इस तरह, मेरी पहली साइकिल यात्रा 52 किलो मीटर की थी, जिसमें आना और जाना शामिल था. इससे मुझे एक अजीब सा आनंद आया. और कहते हैं न कि, 'जैसे पर लग जाते हैं' मुझे भी ऐसा ही लगा.
उसके बाद मैंने घर वालों से छिप-छिप कर लेह से मुल्तान की यात्रा की, जो कि 150 या 160 किमी दूर था. उसके बाद मैं लेह से लाहौर भी गया जो दो दिन की यात्रा थी. हर एक यात्रा के बाद जब परिवार को पता चलता था तो मार भी पड़ती थी कि मैं पढ़ने के बजाय क्या कर रहा हूं.
उसके बाद मैंने बताना ही बंद कर दिया. वो कहते थे कि आपको अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए, हम आप पर इतना पैसा ख़र्च कर रहे हैं, और आप यह कर रहे हैं. सीधे हो जाओ नहीं तो, फिर दुकान पर ही बिठा देंगे.
जर्मनी की यात्रा
इसके बाद मेरा जर्मनी में कंप्यूटर साइंस में एडमिशन हो गया. हालात तो मुश्किल थे, लेकिन बड़ी मुश्किल से लोगों से पैसे मांग कर इकट्ठा किये और जर्मनी की यात्रा शुरू की.
यह 16 अक्टूबर 2002 की बात है. इस्लामाबाद से फ्रैंकफ़र्ट तक पीआईए की फ्लाइट थी. इस महीने 16 अक्टूबर को इस यात्रा को 18 वर्ष हो जायेंगे. जैसे ही विमान तुर्की के ऊपर से गुज़रा, खिड़की से बाहर देखते हुए, नदी, नाले, सड़क आदि सब कुछ मुझे आड़ी तिरछी लाइनों की तरह दिख रहे थे.
पहाड़ ऐसे लग रहे थे जैसे पुराने काग़ज़ों में सिलवटें पड़ी हुई हों. मुझे लगा कि इतना विशाल और सुंदर परिदृश्य है, लोग यहां कैसे रहते होंगे, वे किस बारे में बात करते होंगे, इनकी संस्कृति क्या होगी.

मैं सोचता रहा लेकिन मुझे उस समय इसका जवाब नहीं मिल रहा था. मैंने उस समय सोचा, क्यों न मैं इन रास्तों पर ख़ुद चल कर यह सब देखूं.
विमान अभी तक जर्मनी उतरा भी नहीं था. मैंने वहीं बैठे-बैठे ख़ुद से वादा किया कि एक दिन मैं जर्मनी से पाकिस्तान साइकिल पर जाऊंगा. जर्मनी में उतरने के बाद, अपने सपने को पूरा करने में नौ साल लग गए.
जर्मनी में ज़िन्दगी और ग़रीबों की सवारी
वहां पहुँचने के बाद, बस जीवन एक बार फिर से व्यस्त हो गया. पहले अपनी एम.एस.सी, की. इसके बाद जो क़र्ज़ लेकर आया था,धीरे धीरे वो क़र्ज़ चुकाया. फिर पीएचडी में दाख़िला मिल गया तो पीएचडी करने लगा. फिर परिवार की जिम्मेदारियों को पूरा करते करते नौ साल बीत गए.
जब मैंने अपने परिवार को बताया कि मैं साइकिल पर वापस आना चाहता हूं, तो उन्होंने कहा, "हमने आपको इतनी दूर जर्मनी इतना ख़र्च करके पढ़ने के लिए भेजा और आप वही ग़रीबों की सवारी साइकिल की ही बात कर रहे हैं.
मैंने फिर अपनी मां को इमोशनल ब्लैकमेल किया और इस तरह मुझे इजाज़त मिली.
जर्मनी से पाकिस्तान - एक सपना जो अधूरा रह गया
2011 में मैंने जर्मनी से पाकिस्तान की यात्रा शुरू की. पूरा यूरोप तो बस देखते देखते ही गुज़र गया. दिन में सौ दो सौ किलो मीटर और कभी-कभी तो 250 किलो मीटर भी हो जाते थे. जब मैं तुर्की पहुंचा तो मुझे मेरे भाई का फ़ोन आया कि मेरी माँ बहुत बीमार है और अस्पताल में है. उन्हें दिल का दौरा पड़ा है इसलिए मैं जल्दी घर पहुँचू.
मैंने वहां एक जगह अपनी साइकिल खड़ी की, इस्तांबुल पहुंचा और वहां से पाकिस्तान के लिए फ्लाइट ली. आने के बाद, मैं कुछ समय के लिए अस्पताल में रहा, फिर मेरी माँ का निधन हो गया. वह बहुत बड़ा दुख था क्योंकि एक सपना था कि साइकिल से पाकिस्तान जाऊंगा और मां से मिलूंगा. वह देखेगी कि बेटा जर्मनी से साइकिल पर भी आ सकता है.
इसलिए 2011 में जर्मनी लौटने के बाद, मेरा दिल इतना भारी हो गया था कि मैंने यह भी सोचा कि अब दोबारा साइकिलिंग नहीं करनी. माँ की मृत्यु और अधूरी यात्रा से एक तरह से दिल ही टूट गया था. लेकिन दिल का क्या करें, एक साल बाद फिर से सपने आने लगे.
अधूरा सपना बहुत परेशान करता था, जब मैं नक़्शे को देखता, तो ऐसा लगता था कि कुछ रह गया. हमारी रसोई में दुनिया का एक नक़्शा लगा हुआ था. जब भी मैं वहां खाना खाने बैठता था, तो ऐसा लगता था कि नक़्शे पर एक बिंदु चलना शुरू हो गया और जैसे ही वह चलता तो तुर्की में रुक जाता था. लेकिन यह बिंदु कुछ समय के लिए रुक कर फिर से चलना शुरू कर देता और चलता-चलता पाकिस्तान आकर रुकता.
इसी तरह, जब मैं ऑफ़िस जाता था, तो मेरे बॉस मुझे कंप्यूटर का कोई डायग्राम समझाते थे तो मुझे वहां भी वह बिंदु दिखना शुरू हो जाता था. धीरे-धीरे यह पागलपन जैसी स्थिति मुझे परेशान करने लगी और आख़िरकार मैं अपने बॉस के पास गया और कहा कि यह समस्या है और मुझे छुट्टी चाहिए.
उन्होंने मुझे छह महीने की छुट्टी देने से इंकार कर दिया और कहा कि वे मुझे केवल तीन महीने की छुट्टी दे सकते हैं.
उस छह और तीन महीने के चक्कर में, मैंने मार्च 2015 में उस नौकरी को ही छोड़ दिया. कुछ सामान को स्टोरेज में रखवा दिया, कुछ फेंक दिया था. एक छोटी सी कार थी वो भी बेच दी. यानी, चार साल बाद दोबारा सब कुछ छोड़ छाड़ कर मैं अपनी यात्रा की तैयारी कर रहा था. मैंने अपनी यात्रा दोबारा वहीं से शुरू की जहां पर मैं रुका था,रात भी तुर्की के उसी होटल में गुज़ारी जहां मैं 2011 में रुका था.
अधूरी यात्रा पूरी लेकिन रास्ता अलग
जब मैंने फिर से यात्रा शुरू की, तो सीधे ईरान जाने के बजाय, मैंने मध्य एशियाई देशों के रास्ते से पाकिस्तान जाने का फ़ैसला किया.
मैं मध्य एशिया से होते हुए खंजराब के रास्ते पाकिस्तान आया. ईरान से तुर्कमेनिस्तान, फिर उज़्बेकिस्तान, तज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान और फिर चीन और वहां से खंजराब दर्रे के रास्ते पाकिस्तान पहुँचा.
मैंने जुलाई 2015 को पाकिस्तान में प्रवेश किया. इस तरह, इस सपने के आने और इसे सच करने में कुल 13 साल लग गए.

'मैं गिरगिट की तरह रंग बदलता हूं'
जब लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मैं एक कंप्यूटर इंजीनियर हूं, एक पर्यटक हूं, एक साइकिल चालक या एक ब्लॉगर हूं, तो मेरा जवाब यह है, 'बुल्ला की जाना मैं कौन?' मैं जिस मोड़ में बैठा होता हूं वही बन जाता हूं.
कंप्यूटर क्षेत्र के लोगों से बात करते समय, कंप्यूटर इंजीनियर, जब फ़ोटोग्राफ़रों के बीच हूं तो फ़ोटोग्राफ़र और साइकिल चालकों के बीच हूं तो साइकिल चालक. इस तरह मैं भी गिरगिट की तरह अपना रंग बदलता रहता हूं.मैंने कभी अपनी कोई निश्चित पहचान नहीं रखी, क्योंकि मुझे लगता है कि यह आपकी एक निश्चित मानसिकता बना देती है. मैंने तो अपने इंस्टाग्राम "2015 से बेरोज़गार" भी लिख रखा है.
यात्रा का ख़र्च कौन उठाता है?
शुरुआत में, मैं अपनी सारी बचत इस पर ख़र्च करता था. पहली यात्रा और दूसरी यात्रा की शुरुआत 13 साल तक जर्मनी में रहते हुए की गई बचत से हुई थी, लेकिन बाद में जब मैंने दक्षिण अमरीका की यात्रा की तो, सारे पैसे ख़त्म हो गए थे.
यह यात्रा अर्जेंटीना से शुरू की और मुझे अपने ख़र्चों को पूरा करने के लिए बहुत सारे अजीब काम भी करने पड़े. कभी-कभी पत्रिकाएं मेरी तस्वीरें ख़रीद लेती हैं, कभी-कभी ऑनलाइन डाली हुई टी-शर्ट बिक जाती हैं, कभी-कभी मैं ट्रेवल या बाईसाइकिल मैगज़ीन्स के लिए लेख लिख देता हूं.
मुफ़्त खाने और मुफ़्त रहने के लिए सड़कों पर मजदूरी की है. उदाहरण के लिए, एक बार मुझे कहा गया था कि यदि आप चार घंटे काम करते हैं, तो मुफ़्त में रहने के लिए जगह मिलेगी. प्लेटें धोई हैं, वेटर की तरह खाना परोसा है और कंप्यूटर साइंस का काम भी फ्रीलांस किया है.
रास्ते में रुक कर ग्राफ़िक डिज़ाइनिंग और वेबसाइट डिज़ाइनिंग भी की है. और क्योंकि मैं यात्रा के दौरान अपनी पोस्ट डालता रहता था, तो लोगों को भी मेरे बारे में पता चलने लगा था, और कभी-कभी लोग चंदा भी दे देते थे. किसी ने 20 डॉलर भेज दिए तो किसी ने 50 डॉलर.
जब, मैं दक्षिण अमरीका की यात्रा समाप्त कर उत्तरी अमरीका की तरफ़ चला, तो मुझे वहां पहुंचने के लिए नाव से जाना था और मेरे पास नाव की यात्रा के लिए पैसे नहीं थे. वहां मैंने क्राउडफंडिंग शुरू की.
मैंने अपने फंडिंग कैंपेन में लिखा था कि 'मैं यात्रा कर रहा हूं, जिसके बारे में मैं लिख रहा हूं और इसके चित्र भी भेज रहा हूं, अगर आपको मेरी यह यात्रा पसंद आती है तो, मुझे फाइनेंस करें, इससे भी मुझे थोड़े बहुत पैसे मिलने शुरू हो गए.
इन यात्राओं के बारे में दिलचस्प बात यह है कि कई बार रास्ते में खड़े अजनबियों ने भी पैसे दिए.
अगर आप अर्जेंटीना के नक़्शे को देखें, तो यह दक्षिण अमरीका का सबसे दक्षिणी भाग है. वहां से बोलीविया और अन्य देशों से होते हुए पेरू और फिर चिली. यह जनवरी 2016 की बात है.
ऐसी हज़ारों घटनाएं हैं जिन्हें साझा किया जा सकता है, पन्नें ख़त्म हो जाएंगे, घटनाएं नहीं. इन देशों में जाने से पहले मुझे इनके बारे में कुछ नहीं पता था.जाने से पहले, मैंने डिक्शनरी से स्पेनिश भाषा में हैलो वगैरह सीखा था. जब वहां पहुंचा तो देखा कि यहां तो अंग्रेजी में कोई बात ही नहीं करता.फिर जल्दी जल्दी स्पेनिश सीखना शुरू की.
दक्षिण अमरीका में, अगर प्राकृतिक दृश्यों की बात करें तो वहां जैसा नज़ारा कहीं नहीं है. उनमें एक से बढ़ कर एक देश हैं, ऐसी सुंदरता जो आपको कहीं नहीं दिखती. लेकिन इससे भी ज़यादा, जिस तरह के लोग हैं उसकी कहीं और से तुलना नहीं की जा सकती.
शुरुआत करते हैं अर्जेंटीना से. अर्जेंटीना के जिस शहर में मैं उतरा,उसे ऐशवाया कहा जाता है और इसे दुनिया का सबसे दक्षिणी शहर कहा जाता है. जब हम रात में सड़कों पर घूम रहे थे, एक आदमी ने पूछा कि हम यहां क्या कर रहे हैं. हमने कहा हम यात्री हैं और यहां से साइकिल से यात्रा शुरू करनी है. उसने कहा, "मेरे साथ आओ." हम दो या तीन साइकिल चालक थे. उनके घर गए जहां उसने हमारा बहुत ख्याल रखा, मुझे पता भी वह कि उसने हमें क्या क्या बना कर खिलाया. यह हमारी यात्रा की बस अभी शुरुआत थी.
साइकिल चालकों के साथ समस्या यह है कि वे अपने साथ बहुत सारा भोजन नहीं ले जा सकते हैं. ज़यादा पानी नहीं ले जा सकते.रहने की भी हमेशा समस्या रहती है.दक्षिण का जो भाग है वहां के एक क्षेत्र को पम्पास कहा जाता है. पम्पा का अर्थ है तराई क्षेत्र और अर्जेंटीना में इसमें, ब्यूनस आयर्स, ला पम्पा, सांता फे, एंट्रे रोस और कॉर्डोबा के क्षेत्र शामिल हैं.
उनमें से एक, पेटागोनिया में एक ऐसा क्षेत्र है जहां कोई पेड़ नहीं हैं और वहां हवाएं सौ-डेढ़ सौ किलो मीटर की गति से चलती और अगर टेंट लगाएं तो, तुरंत उड़ जाता है. जिसका मतलब है कि वहां सिर छिपाने के लिए कोई जगह नहीं मिलती. वहां, अगर हमें कहीं दूर भी आबादी या कोई घर दिखाई देता, तो हम सीधे जाते और उनके दरवाज़े पर दस्तक देते थे कि हमें अपना सिर छिपाने के लिए थोड़ी जगह मिल सके.
वहां, जब भी मौसम की परेशानी की वजह से किसी के घर का दरवाज़ा खटखटाया, किसी को कभी बुरा नहीं लगता था. हमेशा अंदर आने को कहा और खाना भी खिलाया और रहने के लिए जगह भी दी.
ऐसी ही एक घटना याद आई. हम ख़राब मौसम से बचने के लिए किसी जगह की तलाश कर रहे थे कि एक घर दिखाई दिया. उस घरवालों ने हमें रहने के लिए जगह दी और गरम-गरम अपनी ख़ास चाय भी पिलाई. अब सुनिए चाय की कहानी. उनकी चाय को माते कहा जाता है. और वो इस तरह की नहीं होती कि अगर पांच मेहमान हैं तो पांच कप बनेंगे, नहीं, बल्कि केवल एक ही बड़ा कप होता है, जिसमें से हर कोई स्ट्रा से एक-एक करके चाय पीता है.
पहले मेज़बान ने तीन या चार घूंट लिए और फिर उन्हें एक दूसरे को घेरे के हिसाब से दे दिया. मेरी दक्षिण एशियाई मानसिकता के कारण, मुझे लगा कि यह बुरी बात है कि पहले मेज़बान पी रहा है और फिर मेहमानों को पेश की जा रही है.
मुझसे रहा नहीं गया और मैंने पूछा कि हमारी संस्कृति में, पहले मेहमानों को खिलाया जाता है और फिर मेज़बान खाता है. तब मेज़बान ने हंसते हुए कहा, "भाई, पहले कुछ घूंट हम इसलिए लेते हैं क्योंकि हमारी चाय की ऊपर की परत बहुत कड़वी होती है और कोई भी अजनबी इसे नहीं पी सकता. हम पहले उस कड़वाहट को पीते हैं ताकि दूसरा उसे आराम से पी सके."
एक घटना पेरू की भी है जो हमेशा याद रहेगी. वहां मैं एक बार साइकिल से जा रहा था मैंने देखा कि ऊपर पहाड़ पर हल्का-हल्का शोर हो रहा है.
जब मैं ऊपर गया, तो मैंने देखा कि कुछ लोग आग के चारों ओर खड़े थे, वो सब लंबे-लंबे कपड़े पहने हुए थे. उनके बाल भी बहुत लंबे थे और वो हाथ उठाकर दुआएं मांग रहे थे.
बाद में, जब उनसे बात की, तो उन्होंने बताया कि वे इसराइली हैं जो यीशु को मानते हैं और उनका विश्वास हैं कि यीशु यहां आएंगे. "हमारा येरूशलम यहीं पेरू में बनेगा."
उन्होंने कहा यहीं रुको, कल हम 24 घंटे का उपवास करेंगे और उसके बाद बली देंगे और दावत भी होगी. आप हमारे साथ रुको. मैंने भी कुछ नहीं खाया और 24 घंटे का उपवास किया.
वह एक ग़रीब समुदाय था. उनके पास छह भेड़ थी.उन्होंने मुझे बताया कि वे छह दिनों के धार्मिक उत्सव में छह भेड़ों की बली देंगे.
पहले दिन,उन्होंने एक भेड़ की बली दी, उसकी खाल उतारी, जैतून का तेल, जड़ी बूटी और नमक लगाया. इसे देखते ही मेरी भूख और तेज हो गई और मैं शाम को अपना उपवास तोड़ने के बाद एक स्वादिष्ट बारबेक्यू की प्रतीक्षा करने लगा. शाम को सभी लोग एक साथ आए और आग जलाकर उस पर भेड़ों को भूनने लगे.
आग से मीठी और सुगंधित गंध आने लगी और भूख तेज हो रही थी. लेकिन उसी समय मैंने देखा कि लोग एक-एक करके वापस जाने लगे. भेड़ आग पर थी और अब जलने लगी थी. मैंने सोचा कि शायद वे अधिक भुनी हुई या जली हुई भेड़ खाते होंगे. मेरी चिंता और भूख दोनों अपने चरम पर थे.
थोड़ी देर बाद सभी लोग चले गए और जलने की गंध और ज़्यादा आने लगी. मैं दौड़ते हुए एक आदमी के पास गया और उससे पूछा कि भाई भेड़ तो अब जल रही है, तो इसके साथ क्या करना है. उसने कहा कि हम ऐसे ही बली देते हैं. हम बली नहीं खाते हैं, यह भगवान के लिए है और यह धुएं के माध्यम से उस तक पहुंचता है.
ईश्वर को खाना तो नहीं, लेकिन उसकी सुगंध आकाश तक ज़रूर पहुंच जाती है. फिर वे मुझे एक रसोई में ले गए और बड़ी कढ़ाई से सारी बोटियां मेरी प्लेट में डाल दी और कहा कि खाना यहां है.
मैं बहुत शर्मिंदा था लेकिन उन्होंने कहा कि यह आपके लिए है आराम से खाओ. इतनी ग़रीबी के बावजूद, उन्होंने मुझे पेट भर के खिलाया और मुझे एक और रात बिताने के लिए भी जगह दी.
कमज़ोर नज़र को नहीं बनने दिया रास्ते की रुकावट
अगले दिन जाते समय, मैंने सोचा कि उन लोगों के अहसान के बदले, मुझे उनके लिए कुछ करना चाहिए और उन्हें कुछ पैसे देने चाहिए.
मैं दो रातों तक उनके साथ रहा और उन्होंने इतनी देखभाल की है. फिर मेरे मन में विचार आया कि पैसे तो मेरे पास भी बहुत कम बचे हैं, अगर मैं इन्हें दे दूं तो बिलकुल ही ख़त्म हो जायेंगे, इसलिए मैंने अपने दिल से पैसा देने का विचार निकाल दिया.
अगले दिन जब मैं जा रहा था तो, एक बूढ़ा व्यक्ति मेरे पास आया और हाथ मिलाया. जैसे ही उसने अपना हाथ हटाया, मैंने देखा कि उसने मेरे हाथ में कुछ छोड़ दिया है.
यह दस पेरुवियन सोलेस (पेरू की मुद्रा) का नोट था. मैंने कहा, "यह क्या है?" बूढ़े व्यक्ति ने उत्तर दिया, "यार, आप एक यात्री हैं और यह आपकी यात्रा के लिए एक छोटी सी रक़म है. इससे कुछ लेकर खा लेना." उन्होंने अपनी मेहरबानी और उदारता में मुझे पूरी तरह से हरा दिया.
साइकिल ने खोली नई उड़ान की राह ,पाकिस्तान की आयशा की कहानी
मैं अपनी नज़रों में बहुत शर्मिंदा हुआ. जिस विचार को मैंने कुछ समय पहले ख़ारिज कर दिया था, उन्होंने बड़ी सहजता से उसे आकार दे दिया. इसने मुझे एक बहुत अच्छा सबक सिखाया कि जब भी आप कुछ अच्छा करना चाहते हैं, उसे तुरंत करें, इंतजार न करें.
ग्वाटेमाला से प्यार क्यों?
ग्वाटेमाला मध्य अमरीका में मेरा पसंदीदा देश है, इसकी बुनियादी वजह इसका परिदृश्य है. जब तीन ज्वालामुखी एक छोटे से शहर के ऊपर खड़े होते हैं, तो ऐसा लगता है कि यह शहर एक राजा है और यह इसके रक्षक हैं. इन रक्षकों में से एक अक्सर डायनासोर की तरह आग भी उगल रहा होता है.
ग्वाटेमाला से प्यार करने का एक और कारण यह है कि मैं वहां लंबे समय तक रहा और स्पैनिश भाषा का कोर्स किया और स्थानीय परिवारों के साथ रह कर भाषा सीखी.
दो महिलाएं थीं जिन्होंने हमें पढ़ाया. एक के साथ मैं और कुछ लोग तीन घंटे तक स्पैनिश व्याकरण सीखते थे. और फिर दूसरी महिला के साथ हम तीन घंटे के लिए शहर जाते थे और इस व्याकरण का उपयोग करते थे. यानी जो कुछ सुबह सीखा तीन घंटे बाद उसे स्थानीय लोगों से बात करके उपयोग किया.
वहीं एक दिन जब मैं तस्वीरें ले रहा था, एक महिला मेरे पास आई और कहा कि क्या आप मेरी तस्वीर ले सकते हैं. उन्होंने कहा कि उनके पास उनके आईडी कार्ड के अलावा उनकी कोई तस्वीर नहीं है.
मैंने इनकी एक तस्वीर ली और अगले दिन इसे प्रिंट करके दे दी. वह वहां हाथों से बनाई हुई स्थानीय चीज़ें बेचने आया करती थीं. अगले दिन वह अपने साथ और लोगों को ले आई और धीरे धीरे, मैंने तीस या चालीस लोगों की तस्वीरें ले लीं.
इसका फ़ायदा यह हुआ कि इस छोटे से शहर में अपना माल बेचने के लिए दूर-दूर से आए सभी लोग मेरे मित्र बन गए. वो ज़िद करके मुझे अपने अपने गांव लेकर जाते रहे. जिससे मैंने उनकी संस्कृति को बहुत नज़दीक से देखा. शायद इसलिए मैं ग्वाटेमाला से प्यार करता हूं. मैं उनके धार्मिक, सामाजिक यहां तक कि सभी प्रकार की रस्मो रिवाज में शामिल हुआ.
ये ऐसे-ऐसे दूर दराज़ के क्षेत्र थे जहां पर्यटक भी नहीं जाते और न ही उन लोगों को बाहरी दुनिया के बारे में ज़्यादा जानकारी थी. पाकिस्तान की तो बिल्कुल नहीं. सैकड़ों दृश्यों, संस्कृति और बेहतरीन लोगों के कारण, मैं इस छोटे से देश के छोटे-छोटे क्षेत्रों में कुल तीन महीने तक रहा. वहां के लोग इतने मेहमान नवाज़ हैं कि, शायद ही कहीं और के लोग हों.
इसी तरह, अमरीका के ग्रांड कैन्यन में एक सुनसान पहाड़ पर एक महिला मिली, जो 800 मील के एरिजोना ट्रेल पर अपनी बहन की याद में यात्रा कर रही थी.
उन्होंने मुझे बताया कि उनकी बहन ने आत्महत्या कर ली थी और इसलिए उन्होंने फ़ैसला किया कि बहन की याद में घर बैठ कर शोक मनाने और फिर अवसाद में जाने से अच्छा है कि मैं अपनी बहन के लिए कुछ करूं.
उन्होंने अपनी बहन की अस्थियां ग्रैंड कैन्यन के अंत में कोलोराडो नदी में प्रवाहित करने का फ़ैसला किया. "ग्रैंड कैनियन उनकी पसंदीदा जगह थी. इसलिए मैं यहां आई हूं. यह उनके लिए है. "
उसने मुझे भी कुछ राख दी ताकि अगर मैं पहले वहां पहुंचू, तो मैं भी उसे नदी में प्रवाहित कर दूं. जब मैं कुछ दिन बाद नदी पर पहुंचा, तो मैंने राख नदी में प्रवाहित कर दी. देखिये मैं अपने शौक़ को पूरा करने और तस्वीरें लेने के लिए ग्रैंड कैन्यन गया था और इसने कैसे मुझे एक भावनात्मक कहानी का हिस्सा बना दिया.

कभी अकेले डर नहीं लगता?
मैंने अब तक कम से कम 50 हज़ार किलो मीटर की यात्रा की है. इसमें से लगभग दो हजार किलो मीटर लोगों के साथ, जबकि बाकी सब यात्रा अकेले ही की है. कहीं कहीं डर ज़रूर लगता है.
आबादी वाले इलाके में ट्रैफ़िक से डर लगता है और सुनसान बयाबान स्थान पर जानवरों और चोरों से डर लगता है. देखिए, साइकिल चालक बहुत कमज़ोर होता है, उसके साथ कुछ भी हो सकता है.
सड़क पर मेरे साथ कभी कुछ नहीं हुआ, लेकिन जब शहर में कहीं थोड़ी देर के लिए साइकिल छोड़ी तो, कुछ न कुछ ज़रूर हो जाता था.
उदाहरण के लिए, कोलंबिया में, मेरा लैपटॉप बैग जिसमें मेरा पासपोर्ट, क्रेडिट कार्ड और इमरजेंसी कैश था, चोरी हो गया था. मेरी क़िस्मत अच्छी थी कि वो मुझे बाद में वापिस मिल गया.
इसी तरह, कहीं जंगली शेरों का डर तो कहीं जंगली भालू का डर, चाहे आप कितने भी सावधान क्यों न हों, लेकिन अंधेरे में डर जरूर महसूस होता है. आपको बस ये बर्दाश्त करना आना चाहिए.
अगर किसी को साइकिल चलाने में दिलचस्पी है, तो वो कहां से शुरू करे?
शौक़ अपने रास्ते ढूंढ लेता है. मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं दुनिया के इतने ज़्यादा देशों में साइकिल चलाऊंगा. अगर आप पाकिस्तान में हैं तो आपके पास पाकिस्तान में भी साइकिल चलाने की जगहें हैं.
मैं तो बस यही कहूंगा कि छोटे से शुरू करें और बस फिर करते जाएं. लेकिन यह भी बता दूं कि यह एक बहुत ही अकेला और मानसिक और शारीरिक रूप से थका देने वाला शौक़ है.
यह भी सच है कि एक तरह से एक आज़ादी भी है. सैकड़ों मील के क्षेत्र में पहाड़, घाटियां और परिदृश्य आपके इंतजार में हैं. लेकिन साथ ही, इन हज़ारों मील में जो कठिनाइयां, सर्दी, गर्मी, बारिश, तूफान है वो भी एक हक़ीक़त हैं.
आप दस-दस दिनों तक स्नान नहीं करते हैं, खाना ख़त्म हो जाता है, पानी कम हो रहा है. बार-बार एक ही तरह का खाना खाना पड़ रहा है, पिज्जा के सपने आ रहे हैं. कई लोग तो इन्हें बर्दाश्त ही नहीं कर सकते हैं और बीच में छोड़ कर चले जाते हैं.
क्या साइकिल के अलावा किसी को साथी बनाने का इरादा हैं?
एक बार तो तज़ाकिस्तान में एक परिवार जिसके साथ मैं रुका था, उसने मुझे अपनी बेटी से शादी करने के लिए कहा. एक बार अफ़ग़ानिस्तान और तज़ाकिस्तान के बीच वखान घाटी में, पंज नदी के साथ जहां नदी बहुत सिकुड़ती है, नदी के उस पार से एक लड़के ने मुझे दर्री भाषा में आवाज़ दी कि, "क्या तुम शादीशुदा हो?" मैंने कहा नहीं. उसने पास खड़ी एक लड़की की ओर इशारा किया और कहा, "यह मेरी बहन है. इससे शादी कर लो."
पूरा परिवार वहां था, एक महिला, एक बच्चा, वो लड़की और उसका भाई. लेकिन उन्हें इसमें कुछ अजीब नहीं लगा. जब मैंने लड़की की तरफ़ देखा, तो उसने मुझसे दर्री भाषा में कुछ कहा जिसका मतलब था 'आई लव यू'. मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ और फिर मैंने हिम्मत करके उसी वाक्य को दोहरा दिया. बस बात यहीं पर ही ख़त्म हो गई. और मैं नदी के पार नहीं गया, और न ही वह मेरी सोहनी बानी. "आई लव यू" की आवाज़ मेरे दिमाग़ में कई दिनों तक गूंजती रही.
वैसे, मैंने तो साइकिल से ही शादी कर ली है.(bbc)
1977 में खेल से रिटायरमेंट लेने वाले पेले, आज भी दुनिया के सबसे मसहूर खिलाड़ियों में से एक हैं.
पेले तीन फ़ुटबॉल विश्व कप जीतने वाली टीमों का हिस्सा रहे हैं. ऐसा करने वाले वो दुनिया के इकलौते खिलाड़ी हैं. अपने करियर में 1363 मैच खेलने वाले पेले ने रिकॉर्ड 1281 गोल किए.
उनके खेल और रिकॉर्ड से जुड़े सैंकड़ों किस्से दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं लेकिन इतिहास के इस सबसे प्रसिद्ध खिलाड़ी से जुड़ी कुछ ऐसी बाते हैं जो कई लोगों को नहीं पता. पढ़िए ऐसे ही कुछ रोचक किस्से.
पेले के कारण रेफ़री को बाहर जाना पड़ा
18 जून 1968 को बोगोटा की बात है. पेले के क्लब सैंटोस और कोलंबियन ओलंपिक स्वॉड के बीच एक फ्रेंडली मैच चल रहा था. इस दौरान रेफ़री गूइलेरमों वेलासक्वेज़ ने पेले को मैदान से बाहर जाने के लिए कहा. (रेड कार्ड का इस्तेमाल 1970 में शुरू हुआ था). उन पर फाउल करने का आरोप था. वेलाक्वेज़ के मुताबिक पेले ने उनके साथ बदतमीज़ी की थी.

लेकिन रेफ़री के इस फ़ैसले पर बहुत बड़ा विवाद हो गया और इसका विरोध शुरू हो गया. सैंटोस के खिलाड़ियों ने रेफ़री को घेर लिया. मैच की तस्वीरों में देखा जा सकता था कि वेलाज़क्वेज़ की आंखे काली हो गईं थीं.
वहां मौजूद दर्शकों ने भी उनका विरोध किया. 2010 में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उन्हें मैदान से बाहर जाना पड़ा. अपनी सीटी उन्होंने एक लाइन्समैन को दे दी और पेले को गेम में वापस बुला लिया गया.
क्या पेले ने वाकई एक युद्ध रोका था?
1960 के दशक में पेले की सैंटोस एफ़सी दुनिया के सबसे मशहूर फ़ुटबॉल क्लबों में से एक थी. इसका फ़ायदा उठाकर ये टीम दुनियाभर में कई फ़्रेंडली मैच खेला करती थी. ऐसा ही एक मैच नाईजीरिया के युद्धग्रस्त क्षेत्र में 4 फ़रवरी 1969 को खेला गया था. इस मैच में सैंटोस क्लब ने बेनिनि सिटी के एक स्थानीय क्लब को 2-1 से मात दी थी.
उस वक्त नाईजीरिया में एक ख़ूनी गृहयुद्ध चल रहा था. इतिहासकार ग्यूहरमें गॉरचे के मुताबिक़ ब्राज़ील के खिलाड़ी और अधिकारी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे, इसलिए दोनों पक्षों ने युद्धविराम का फ़ैसला किया.

इस कहानी की सत्यता को लेकर अलग-अलग बातें कही जाती हैं. पेले की पहली आत्मकथा जो कि 1977 में छपी थी, उसमें इस बारे में कुछ नहीं लिखा गया था.
लेकिन 30 सालों के बाद छपी एक दूसरी आत्मकथा उन्होंने इसका ज़िक्र ज़रूर किया था. उन्होंने लिखा कि खिलाड़ियों को बताया गया था कि, "गृहयुद्ध एक एक्ज़ीबिशन गेम के लिए ख़त्म हो सकता था. "
पेले ने लिखा, "मुझे नहीं पता कि ये पूरी तरह से सही है या नहीं, लेकिन नाइजीरीया ने ये ज़रूर सुनिश्चित किया कि जिस वक़्त हम वहां मौजूद थे, उस समय वहां किसी तरह की घुसपैठ न हो."
कैसे पेले ने 'बीटल्स को नीचा दिखाया'
1975 में पेले न्यू यॉर्क कॉसमॉस के लिए खेलने अमरीका के न्यू यॉर्क चले गए. उन्होंने वहा अंग्रेज़ी सीखना शुरू किया.
एक बार वो बीटल्स के पूर्व गायक और गिटारिस्ट जॉन लेनन से टकरा गए. उनके बारे में पेले ने 2007 में लिखा, "लेनन उस समय जापानी भाषा सीख रहे थे."

पेले के मुताबिक़ लेनन ने बताया था कि वो और बीटल्स के उनके दूसरे साथियों ने एक बार इंग्लैंड के एक होटल में ब्राज़ील की टीम से मिलने की कोशिश की थी. पेले ने लिखा कि उन लोगों को ब्राज़ील फुटबॉल एसोशिएशन के डायरेक्टर ने मिलने से रोक दिया.
यूरोप के क्लब के लिए क्यों नहीं खेले पेले?
पेले के आलोचकों का कहना है कि उनका यूरोप के किसी क्लब के लिए नहीं खेलना, उनके लिए फ़ायदेमंद साबित हुआ.
दिक्कत ये थी कि ब्राज़ील के कई दूसरे छोटे-बड़े खिलाड़ियों की तरह जब वो अपने करियर के चरम पर थे, तब उन्हें विदेश जाने से रोका गया.
सैंटोस क्लब ने रियल मैड्रिड और एसी मिलान जैसे क्लब के ऑफ़र ठुकरा दिए थे. उस समय खिलाड़ी कहां खेलेंगे, ये फ़ैसला उनके हाथ में नहीं होता था.
उन्हें ब्राज़ील में ही रखने का दबाव सरकार की तरफ़ से भी था. 1961 में तत्कालीन राष्ट्रपति जैनियो क्वॉड्रोस ने ऐलान किया कि पेले एक "राष्ट्रीय संपत्ति हैं" और उन्हें "एक्सपोर्ट" नहीं किया जा सकता.
हालांकि 1975 पेले एक विदेशी क्लब का हिस्सा बने, उन्होंन न्यू यॉर्क कॉसमॉस नाम की टीम के लिए खेला.
50 साल की उम्र में बने ब्राज़ील के कप्तान
पेले सिर्फ़ एक बार ब्राज़ील के कप्तान बने, इससे पहले हर बार क्लब और देश दोनों की ही टीमों के कप्तानी के ऑफ़र उन्होंने ठुकरा दिए.
राष्ट्रीय टीम से रिटायर होने के 19 सालों के बाद, 1990 में उन्होंने बतौर कप्तान एक दोस्ताना मैच में हिस्सा लिया. ब्राज़ील का मुकाबला 'रेस्ट ऑफ़ द वर्ल्ड' टीम से हुआ.
ये मैच पेले के 50वें जन्मदिन पर खेला गया था. पेले मैच के पहले 45 मिनट के लिए मैदान पर उतरे थे.
जब पेले को 'किडनैप' कर लिया गया
सैंटोस क्लब के खिलाड़ी 5 सिंतबर 1972 को त्रिनिदाद और टोबैगो में खेले जाने वाले एक मैच को लेकर नाखुश थे.
टीम के डिफ़ेंडर ओबेरेदान ने ब्राज़ील के एक अख़बार को 2010 में बताया था, "हम लोग इस बात के लिए तैयार थे गेम को तेज़ी से खेलना है ताकि हम हम अपनी प्लेन में वापस जा सकें."
लेकिन पेले के 43वें मिनट में किए गए गोल के बाद पोर्ट ऑफ़ स्पेन स्टेडियम के दर्शक बेकाबू हो गए.
दर्शक मैदान के अंदर घुस गए और थोड़ी ही देर बार पेले को कंधे पर उठा कर सड़कों पर चलने लगे, जश्न के इस माहौल के बीच पेले को वहां से वापस लाना आसान नहीं था, इसमें कई मिनट लग गए.

सिलवेस्टर स्टेलॉन पड़े फ़ीके
1980 तक सिलवेस्टर स्टेलॉन एक मशहूर नाम बन चुके थे. उनकी फ़िल्म 'एस्केप टू विक्टरी' की शूटिंग 1980 में शुरू हुई थी. ये फ़िल्म दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाज़ियों और कैदियों के टीम के बारे में एक काल्पनिक कहानी थी.
कई पूर्व फ़ुटबॉल खिलाड़ी और तब खेलने वाले खिलाड़ियों के साथ पेले भी इसका हिस्सा था. पेले ने एक सीन में एक्रोबैटिक बाइसाइकिल शॉट भी मारा था.
पेले ने ब्राज़ील की वेबसाइट यूओएल को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि शॉट असल में स्टेलॉन को मारना था.
उन्होंने कहा, "स्क्रिप्ट के मुताबिक़ स्टेलॉन को शॉट मारना था और मैं गोलकीपर था."
पेले ने ज़ोर से हंसते हुए कहा, "लेकिन वो बॉल मार ही नहीं पाए."
गोलकीपर की तरह खेलते पेले
अगर पेले गोलकीपर बने होते, तब भी शायद निराश नहीं करते. सैंटोस क्लब के साथ खेलते हुए उन्होंने चार मैचों में ये भूमिका निभाई थी. इसमें 1964 में खेल गया ब्राज़ीलियन कप का सेमीफाइनल भी है. ब्राज़ील ने सारे मैच जीते, पेले ने किसी भी मैच में एक भी गोल नहीं होने दिया.
दुनिया में सिर्फ एक पेले नहीं है
पेले के फैन्स "देयर इज़ ओनली वन पेले" (दुनिया में पेले सिर्फ़ एक है) गाना गाते हैं लेकिन ये सच नहीं है.
पेले नाम के दुनियाभर में कई लोग हैं, फ़ुटबॉल के मैदान पर भी और बाहर भी. अफ़्रीका के मशहूर खिलाड़ी जिनका नाम अबेदी एयू है, वो अबेदी पेले के नाम से मशहूर है, वो घाना और यूरोप के कई क्लबों के लिए खेलते हैं.
इंग्लैंड के केप वर्डे के डिफेंडर पेड्रो मॉन्टेरो, जो 2006 में साउथ हैंप्टन से जुड़ गए थे, पेले नाम से जाते हैं. ये नाम उन्हें बचपन में दिया गया था.
पेले के मशहूर होने का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि एडसन, वो नाम जिससे पेले को बैप्टाइज़ किया गया था वो भी बहुत मशहूर हुआ.
ब्राज़ीलियन इंस्टीट्यूट ऑफ ज्योग्राफ़ी एंड स्टैटिस्टिक के मुताबिक ब्राज़ील में 1950 के दशक में 43,511 लोगो का नाम एडसन था. दो दशक बाद, जब पेले के गोल की संख्या 1000 पार कर चुकी थी, इस नाम की संख्या 1,11,000 हो गई थी.
एक 'राजा' जो राष्ट्रपति बन सकता था?
1990 में पेले ने ऐलान किया था कि वो 1994 के ब्राज़ील के राष्ट्रपति चुनाव में उतरने के बारे में सोच रहे हैं.
ये कभी सच नहीं हो पाया लेकिन पेले ने राजनीति में एंट्री ज़रूरी मारी. 1995 से 1998 तक वो ब्राज़ील के खेल मंत्री रहे.
उन्होंने उस कानून को बनाने में अहम भूमिका निभाई जो ब्राज़ील के फ़ुटब़ॉल खिलाड़ियों को क्लब चुनने की अधिक आज़ादी देता है - ऐसा जब वो खेलते थ, तब मुमकिन नहीं था.(bbc)
- शुज़ा मलिक
पाकिस्तान के पेट्रोलियम मामलों में प्रधानमंत्री के विशेष सलाहकार नदीम बाबर ने पाकिस्तान में बचे गैस भंडार के बारे में कहा है कि, 'यदि देश में कोई नए बड़े भंडार नहीं खोजे गए तो, केवल अगले 12 से 14 वर्षों की गैस बची है.'
बीबीसी के साथ एक विशेष इंटरव्यू में नदीम बाबर ने कहा कि, 'इस साल सर्दियों में गैस की क़ीमत बिलकुल नहीं बढ़ाई जाएगी. इस वित्तीय वर्ष के अंत तक यानी जून 2021 तक, उपभोक्ताओं को मौजूदा क़ीमत पर ही गैस उपलब्ध कराई जाएगी.'
नदीम बाबर ने कहा कि वर्तमान सरकार पिछली सरकार की तुलना में विश्व बाज़ार से सस्ती गैस ख़रीद रही है. यही वजह है कि, इस साल प्राकृतिक गैस के उपभोक्ताओं के बिलों में गैस के दाम नहीं बढ़ेंगे.
याद रहे कि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान पहले ही कह चुके हैं कि इस साल सर्दियों के मौसम में देश में गैस की कमी होगी.

इकोनॉमिक सर्वे ऑफ़ पाकिस्तान के अनुसार, पाकिस्तान में गैस का वार्षिक प्रोडक्शन चार अरब क्यूबिक फ़ीट है. जबकि इसकी खपत लगभग 6 अरब क्यूबिक फ़ीट है.
इस कमी को पूरा करने के लिए, देश एलएनजी (जोकि तरल रूप में होता है जिससे दोबारा गैस बनाया जाता है) का आयात करता है. लेकिन एलएनजी देश में गैस की कमी को पूरी तरह से समाप्त नहीं करती है.
पाकिस्तान में इस समय 1.2 बिलियन क्यूबिक फ़ीट की कुल क्षमता वाले दो एलएनजी टर्मिनल काम कर रहे हैं.
लेकिन पाकिस्तान में गैस की कमी क्यों है? इस सवाल के जवाब में नदीम बाबर का कहना है कि पाकिस्तान में स्थानीय गैस का उत्पादन बहुत तेज़ी से घट रहा है.
"पिछली सरकार ने एक अच्छा काम किया कि, एलएनजी को सिस्टम में शामिल किया और एक बुरा काम किया कि स्थानीय उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए था जो कि नहीं किया."
उन्होंने कहा, "पिछली सरकार के पांच वर्षों में कोई नया ब्लॉक एवार्ड नहीं किया गया और ड्रिलिंग की जितने तेज़ी से रिप्लेसमेंट होनी चाहिए थी उतनी तेजी से नहीं की गई." परिणामस्वरूप, स्थानीय उत्पादन में गिरावट आती रही और उधर मांग में वृद्धि होती रही. इस अंतर को अस्थायी रूप से बंद करने के लिए एलएनजी का आयात शुरू कर लिया गया था."
"लेकिन मांग तो बढ़ती जा रही है और एलएनजी की एक सीमा है कि हम कितनी एलएनजी ला सकते हैं. यही कारण है कि आपूर्ति और मांग के बीच फ़र्क़ बढ़ता जा रहा है. कोई भी ऊर्जा विशेषज्ञ आपको पांच साल पहले यह बता सकता था कि ऐसा होने जा रहा है. मैं ख़ुद यह बात तब से कह रहा हूं जब मैं सरकार में नहीं था. '
अगर विशेषज्ञों को पांच साल पहले पता था कि यह होने जा रहा है, तो पीटीआई को भी सत्ता में आये दो साल हो चुके हैं. इस बीच उन्होंने क्या क़दम उठाए हैं?
इस सवाल के जवाब में, नदीम बाबर ने कहा कि, "इस बीच, हमने (स्थानीय उत्पादन बढ़ाने के लिए) ई एंड पी यानी एक्सप्लोरेशन एंड प्रोडक्शन सेक्टर पर ध्यान दिया है. लेकिन इसके परिणाम तीन से चार साल बाद सामने आएंगे जब आप नई ड्रिलिंग शुरू करेंगे, नए भंडार की खोज करेंगे, इसमें कुछ साल लगते हैं."
इमरान ख़ान ने कहा है कि इस साल सर्दियों में गैस की क़िल्लत हो सकती है
"लेकिन इस बीच, आयात ही एकमात्र विकल्प बचा है. इस संबंध में, हमने कहा कि यह राज्य का काम नहीं है कि वह एलएनजी को ख़ुद से आयात करे और क़र्ज़ को बढ़ाते जाएं. हमने एलएनजी सेक्टर को खोल दिया है. पांच कंपनियों ने कहा कि वे टर्मिनल लगाना चाहती हैं, हमने पांचों को अनुमति दे दी है. इनमें से दो कंपनियां उस चरण में पहुंच गई हैं कि, अगले दो से तीन महीनों में उनके टर्मिनल पर ज़मीनी स्तर पर काम शुरू हो जाएगा.साल या सवा साल के अंदर अंदर ये दोनों टर्मिनल लग जाएंगे."
अगर टर्मिनल के निर्माण में एक साल या सवा साल ही लगना था तो, पीटीआई सरकार ने 2018 में सत्ता में आते ही यह कार्य क्यों नहीं किया, ताकि आज यह संकट न होता?
"देखिये एक दम से यह कार्य नहीं हो सकता. इसमें क़ानूनों को बदलने की आवश्यकता थी, अनुमतियां प्राप्त करने की आवश्यकता थी, नियामक संरचना को बदलने की आवश्यकता थी, लेकिन इसमें यह भी देखें कि पहले एलएनजी टर्मिनल जब लगे थे, उनके लगने में आठ साल लगे थे.
आमतौर पर, सर्दियों के आते ही पाकिस्तान में गैस की क़ीमत बढ़ा दी जाती है. क़ीमत की बात की जाये तो, वर्तमान सरकार ने पिछली सरकार के एलएनजी समझौतों की बहुत आलोचना की है. पूर्व प्रधानमंत्री शाहिद ख़ाक़ान अब्बासी भी इस संबंध में एनएबी की जांच का सामना कर रहे हैं. लेकिन क्या इस सरकार को सस्ती गैस मिल रही है?
नदीम बाबर का कहना है कि मौजूदा सरकार पिछले समझौतों की तुलना में सस्ता एलएनजी ख़रीद रही है.
"क़तर की सरकार के साथ हमारा जो समझौता है उसमें हम कच्चे तेल की क़ीमत का 13.37 प्रतिशत ख़रीद रहे हैं. लेकिन पिछली सरकार के समझौतों के अलावा, हम जो अतिरिक्त एलएनजी ख़रीद रहे हैं, वह सर्दियों में पांच से दस प्रतिशत सस्ता ख़रीद रहे हैं और गर्मियों में ये लगभग 40 प्रतिशत सस्ता रहेगी."
इसका मतलब तो यह हुआ कि, इस साल उपभोक्ताओं के लिए गैस महंगी नहीं होगी? बाबर कहते हैं, "बिल्कुल नहीं, अगले जुलाई तक पाकिस्तान में गैस की क़ीमतों में कोई अंतर नहीं होगा."
लेकिन पिछली सरकार के तहत लंबी अवधि के समझौतों के पक्ष में विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के समझौते वैश्विक बाज़ार में कीमतों में तेज़ उतार-चढ़ाव से आपको बचा लेते हैं. आज तो सरकार को सस्ती गैस मिल रही है, कल नहीं मिली तो?
इस संबंध में, नदीम बाबर का कहना है कि समझौतों की एक सूचकांक दर निश्चित होती है और दुनिया में बहुत कम एलएनजी समझौते होंगे जहां क़ीमत तय की गई हो. क़तर सरकार के साथ हमारे समझौते में भी कच्चे तेल की क़ीमत का 13.37 प्रतिशत मूल्य निर्धारित किया गया है. लेकिन कच्चे तेल की क़ीमत तो हर दिन ऊपर नीचे जा रही है.
इमरान ख़ान के ये नुस्खे कितने कारगर होंगे?
एक तरफ़, सरकार देश में निर्माण क्षेत्र को विकसित करने की कोशिश कर रही है और इस संबंध में, इस क्षेत्र को प्रोत्साहन दिया जा रहा है. दूसरी ओर, ऐसी रिपोर्टें हैं कि सरकार नए गैस कनेक्शनों पर प्रतिबंध लगा रही है? लेकिन नदीम बाबर का इस बारे में कहना है कि मुश्किलें हैं, लेकिन कोई प्रतिबंध नहीं.
"दुनिया भर में पाइप के माध्यम से गैस घर पर आना एक लग्ज़री होती है. आमतौर पर गैस की आपूर्ति सिलेंडर या अन्य स्रोतों से की जाती है. हमारे देश में, 27 प्रतिशत उपभोक्ताओं को पाइप के माध्यम से गैस मिलती है, लगभग 27 से 28 प्रतिशत ऐसे लोग हैं जो एलपीजी पर चलते हैं और बाकी अन्य प्रकार के ईंधन का उपयोग करते हैं."
उन्होंने कहा, "स्थानीय स्तर पर गैस का उत्पादन करने के लिए हमें 700 रुपये का ख़र्च आता है, जबकि हम उपभोक्ताओं से लगभग 275 रुपये से 300 रुपये वसूलते हैं. वर्तमान में, हमारे देश में 90 प्रतिशत उपभोक्ता सब्सिडी से लाभान्वित हो रहे हैं. दूसरी ओर, हमारी आपूर्ति घट रही है. अब इस मामले में, यदि हम नए कनेक्शन देते हैं, तो हम इसमें गैस कहां से डालेंगे? लेकिन फिर भी नए कनेक्शन पर प्रतिबंध नहीं है."
उन्होंने आगे कहा कि, "ओजीआरए ने घटती आपूर्ति के मद्देनजर प्रत्येक वर्ष के लिए एक सीमा निर्धारित की है कि आप इतने कनेक्शन दे सकते हैं. इस वर्ष की सीमा चार लाख हैं. जैसा कि आप जानते हैं कि, वर्तमान में हमारे पास 28 लाख कनेक्शन के आवेदन पड़े हैं. नई सोसायटी जितनी चाहें बना लें, उनसे एलएनजी की क़ीमत वसूल कर लें फिर तो कोई समस्या ही नहीं,जितनी चाहिए होगी आयात कर लेंगे ... हां, लेकिन उस स्थिति में उपभोक्ता को तीन गुना बिल देना होगा. हमें कीमतों, आपूर्ति और नए कनेक्शन सबको संतुलित करके चलना है."
पाकिस्तान में केवल 12 से 14 साल की गैस बची है
देश में बाक़ी बचे गैस भंडार के बारे में नदीम बाबर ने कहा कि. अगर देश में नए बड़े भंडार की खोज नहीं की गई तो, केवल अगले 12 से 14 वर्षों की गैस बची है.
उन्होंने बताया कि देश में पिछले दस से बारह वर्षों में कोई बड़ी खोज नहीं हुई है और पिछले पांच वर्षों में देश में 90 भंडार की खोज हुई है. इस सरकार में पिछले दो वर्षों में 26 भंडार की खोज हुई हैं, लेकिन वो सभी बहुत छोटे हैं.
"उनकी कुल मात्रा 250 मिलियन क्यूबिक फीट है, जबकि इसी दौरान अन्य भंडार की आपूर्ति में चार सौ मिलियन क्यूबिक फीट से अधिक की कमी आई है."
लेकिन नदीम बाबर का कहना था कि वह इससे निराश नहीं हैं क्योंकि पाकिस्तान में अभी भी इस संबंध में बहुत क्षमता हैं.
उन्होंने कहा कि सुरक्षा कारणों से पिछले एक दशक में देश के पश्चिमी हिस्से में कोई खोज नहीं हुई थी और तट के पास समुद्री इलाकों में भी कोई खोज नहीं हुई थी.
उन्होंने बताया कि, "हमारे देश में लगभग 30 से 35 प्रतिशत ऐसा क्षेत्र है जहां पर तेल और गैस की खोज की जानी चाहिए. लेकिन अभी तक हमने केवल 8 या 9 प्रतिशत क्षेत्र को ही लीज़ पर दिया है. जिस पर वास्तव में ज़मीन पर काम हो रहा है वह केवल 5 या 6 प्रतिशत है."
कराची इलेक्ट्रिक का कहना है कि सरकार उन्हें पूरी गैस उपलब्ध नहीं कराती है, इसीलिए उन्हें लोड शेडिंग करनी पड़ती है. लेकिन नदीम बाबर का कहना है कि यह सरकार कराची इलेक्ट्रिक को पूरी गैस दे रही है.
कराची में गैस की कमी की स्थिति यह है कि स्थानीय उत्पादन पिछले साल की तुलना में लगभग साढ़े नौ प्रतिशत कम है. सिंध सरकार और केपी सरकार कहती है कि संविधान के अनुच्छेद 158 के तहत, वे केवल स्थानीय गैस लेंगे. परिणामस्वरूप, जब तक एलएनजी को उनके सिस्टम में नहीं जोड़ा जायेगा, केवल स्थानीय गैस ही जा सकती है. जिसका मतलब है कि लगभग 160 मिलियन क्यूबिक फ़ीट गैस कम थी."
"इसका सबसे ज़्यादा नुक़सान कराची इलेक्ट्रिक को हुआ. लेकिन हमने इसे ठीक करने के लिए कराची इलेक्ट्रिक को एलएनजी देना शुरू कर दिया. हम उन्हें पिछले तीन महीनों से लगभग 100 से 150 मिलियन क्यूबिक फ़ीट गैस दे रहे हैं.''
उन्होंने कहा कि लोड शेडिंग की स्थिति यह है कि पिछले कई वर्षों से उनकी मांग बढ़ रही है. लेकिन ग्रिड से अधिक बिजली लेने के लिए जो 500 केवीए के स्टेशन उन्हें लगाने चाहिए थे, वो उन्होंने नहीं लगाए.
"आज हम ग्रिड से जितनी वो चाहें उतनी बिजली देना चाहते हैं. लेकिन उनके पास बिजली लेने की वो व्यवस्था ही नहीं है, जिससे वो बिजली उठा सकें. ग्रिड से बिजली प्राप्त करने में जो रुकावट है, वह कराची इलेक्ट्रिक को ख़ुद हटानी है, जिसे उन्होंने नहीं हटाई.(bbc)
वाशिंगटन, 23 अक्टूबर | वैश्विक स्तर पर कोरोनावायरस मामलों की कुल संख्या बढ़कर 4.15 करोड़ हो गई है, जबकि संक्रमण से होने वाली मौतें 1,135,880 हो गई हैं। यह जानकारी जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी ने शुक्रवार को दी।
विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सिस्टम साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसएसई) ने अपने नए अपडेट में खुलासा किया कि शुक्रवार की सुबह तक कुल मामलों की संख्या 41,595,980 हो गई, जबकि मृत्यु का आंकड़ा 1,135,880 तक पहुंच गया था।
सीएसएसई के अनुसार, अमेरिका कोविड-19 के 8,404,743 मामलों और 223,000 मौतों के साथ दुनिया का सबसे खराब स्थिति वाला देश है।
वहीं संक्रमण के मामलों के हिसाब से भारत 7,706,946 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि देश में मृत्यु का आंकड़ा 116,616 हो गया है।
सीएसएसई के आंकड़ों के अनुसार, अधिक मामलों वाले अन्य शीर्ष 15 देश ब्राजील (5,298,772), रूस (1,453,923), अर्जेंटीना (1,053,650), फ्रांस (1,041,991), स्पेन (1,026,281), कोलंबिया (990,373), पेरू (879,876), मेक्सिको (874,171), ब्रिटेन (813,451), दक्षिण अफ्रीका (710,515), ईरान (550,757), चिली (497,131), इटली (465,726), इराक (442,164) और जर्मनी (403,874) हैं।
संक्रमण से हुई मौतों के हिसाब से ब्राजील 155,403 मौतों के साथ दूसरे स्थान पर है।
वहीं 10,000 से अधिक मृत्यु वाले देश मेक्सिको (87,415), ब्रिटेन (44,437), इटली (36,968), स्पेन (34,521), फ्रांस (34,237), पेरू (33,984), ईरान (31,650), कोलम्बिया (29,637), अर्जेंटीना (27,957), रूस (25,072), दक्षिण अफ्रीका (18,843), चिली (13,792), इंडोनेशिया (12,959), इक्वाडोर (12,500), बेल्जियम (10,539) और इराक (10,465) हैं।(आईएएनएस)
मुंबई, 23 अक्टूबर | 'तैश' की रिलीज से पहले अभिनेता हर्षवर्धन राणे ने शहर के एक अस्पताल में अपना कोविड-19 उपचार कराने के दौरान फिल्म के टीजर की डबिंग को याद किया।
उन्होंने कहा, "मैं आईसीयू में था। वहां डब करना आसान नहीं था, लेकिन मैंने करीब 12 कंबलों का उपयोग करके इसे करने में कामयाबी हासिल की। जब मैंने इतने कंबल मांगे तो मेरे डॉक्टर घबरा गए। उन्हें लगा कि मुझे ठंड लग रही है। मैंने उन्हें नहीं बताया था कि मुझे डबिंग के लिए कंबल की जरूरत है। मैंने कमरे को बंद कर दिया और उन्हें बताया कि मैं कपड़े बदल रहा हूं।"
हर्षवर्धन ने आईएएनएस से कहा, "मैंने तुरंत कंबल का उपयोग करके एक गुफा बनाई और हार्ट-रेट मॉनीटर को बंद कर दिया, क्योंकि वह बहुत शोर कर रहा था। मैंने अपना फोन एयरप्लेन मोड पर डाल दिया और रिकॉडिर्ंग शुरू कर दी। बेजॉय नांबियार(निर्देशक) सर माफी मांग रहे थे। वह नहीं चाहते थे कि मैं अस्पताल से डब करूं। लेकिन, यह पूरी तरह से मेरी पसंद थी। मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से किसी को तकलीफ हो। मैं काम के लिए कुछ भी कर सकता हूं। यहां तक ??कि अगर आप मुझे बताते हैं कि मुझे अस्पताल से अभिनय करना है तो मैं खुशी से करूंगा।"
अपने डबिंग अनुभव को साझा करने के अलावा उन्होंने लोगों से सुरक्षित रहने और 'मानसिक रूप से मजबूत' होने का भी आग्रह किया।
उन्होंने आगे कहा, "यह काफी कठिन है, लेकिन इससे निपटने के लिए मानसिक रूप से मजबूत होना जरूरी है। खुद की उचित देखभाल करें और एहतियाती उपायों का पालन करें। तनाव न लें।"
बेजॉय नांबियार द्वारा निर्देशित 'तैश' एक रिवेंज ड्रामा है। इसमें पुलकित सम्राट, कृति खरबंदा, जिम सर्भ और संजीदा शेख भी हैं। यह जी5 पर 29 अक्टूबर को फिल्म के साथ-साथ वेब सीरीज के प्रारूप में रिलीज होगी।(आईएएनएस)
शारजाह, 23 अक्टूबर । तीन बार की विजेता चेन्नई सुपर किंग्स इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के 13वें सीजन के 41वें मैच में आज यहां शारजाह क्रिकेट स्टेडियम में बेहतरीन फॉर्म में चल रही मुंबई इंडियंस से भिड़ेगी। चेन्नई के लिए यह सीजन अब तक का सबसे बुरा सीजन साबित हुआ है। स्थिति यह है कि टीम प्लेऑफ की रेस से लगभग बाहर है। किस्मत के भरोसे वह दाव खेल सकती है, लेकिन इसके लिए उसे अपने बाकी बचे चारों मैच जीतने होंगे।
पिछले मैच में चेन्नई का जो प्रदर्शन रहा था वो बेहद निराशाजनक रहा। राजस्थान रॉयल्स ने उसे 125 रनों पर ही रोक दिया था और पांच विकेट से मैच अपने नाम कर लिया था।
बल्लेबाजी इस सीजन चेन्नई की सबसे बड़ी समस्या रही है। कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने लगातार इस बात को माना है कि उनकी बल्लेबाजी इस सीजन उनकी कमजोरी रही है और फील्डिंग भी।
फाफ डु प्लेसिस इकलौते ऐसे बल्लेबाज हैं जो रन बना रहे हैं और वह इस सीजन टीम के सर्वोच्च स्कोरर भी हैं। लेकिन उनके अलावा और बल्लेबाज कुछ नहीं कर पाए हैं। शेन वाटसन ने कुछ मैचों में जरूर अच्छी बल्लेबाजी की थी, लेकिन उनके प्रदर्शन में वो निरंतरता नहीं दिखा पाए हैं।
महेंद्र सिंह धोनी, रवींद्र जडेजा और अंबाती रायडू भी कुछ मैचों को छोड़कर विफल ही रहे हैं। ड्वेन ब्रावो चोट के कारण आईपीएल से बाहर हो गए हैं। उनके स्थान पर धोनी किसे लेकर आते हैं, यह देखना होगा। पिछले मैच में तो धोनी ने उनकी भरपाई के लिए जोश हेजलवुड को खेलाया था। अगर इस मैच में भी हेजलवुड खेलेंगे तो गेंदबाजी को मजबूती मिलेगी और मुंबई इंडियंस के मजबूत बल्लेबाजी क्रम के सामने वह एक अच्छा विकल्प साबित हो सकते हैं।
मुंबई की टीम संतुलित है। उसके बल्लेबाज और गेंदबाज दोनों फॉर्म में हैं। रोहित शर्मा, क्विंटन डी कॉक, सूर्यकुमार यादव, ईशान किशन जैसे अनुभवी और युवा बल्लेबाजों से सजा ऊपरी और मध्यक्रम टीम को मजबूती दे रहा है तो निचले क्रम में केरन पोलार्ड, हार्दिक पांड्या और क्रुणाल पांड्या जैसे तूफानी बल्लेबाज मौजूद हैं।
मुंबई को पिछले मैच में हार मिली थी। उसने किंग्स इलेवन पंजाब के खिलाफ दो सुपर ओवर खेले थे, लेकिन अंत मे हार गई ।
टीम की गेंदबाजी में भी जसप्रीत बुमराह, ट्रेंट बोल्ट, नाथन कुल्टर नाइल जैसे नाम हैं जो चेन्नई की कमजोर बल्लेबाजी को जल्दी समेटने का दम रखते हैं।
दोनों टीमों के बीच हुए पिछले मैच में चेन्नई को जीत मिली थी। वह सीजन का पहला मैच था, लेकिन उस मैच के बाद से चेन्नई और मुंबई दोनों की स्थिति बदली हैं। एक ने फर्श से अर्श तक का सफर तय किया है तो दूसरे ने राजा से रंक का।
प्लेऑफ में जाने की हल्की सी संभावना को जिंदा रखने के लिए भी चेन्नई को यह मैच जीतना जरूरी होगा। अब देखना होगा कि चेन्नई किस तरह से इस करो या मोर वाली स्थिति का सामना करती है।
टीमें (संभावित :)
सीएसके : महेंद्र सिंह. धोनी (कप्तान), केदार जाधव, रवींद्र जडेजा, पीयूष चावला, कर्ण शर्मा, शेन वाटसन, शार्दूल ठाकुर, अंबाती रायडू, मुरली विजय, फाफ डु प्लेसिस, इमरान ताहिर, दीपक चहर, लुंगी एनगिडी, मिशेल सैंटनर, केएम. आसिफ, नारायण जगदीशन, मोनू कुमार, रितुराज गायकवाड़, आर. साई किशोर, जोश हेजलवुड, सैम कुरैन।
मुंबई इडियंस : रोहित शर्मा (कप्तान), आदित्य तारे (विकेटकीपर), अनमोलप्रीत सिंह, अनुकूल रॉय, क्रिस लिन, धवल कुलकर्णी, दिग्विजय देशमुख, हार्दिक पांड्या, ईशान किशन, जेम्स पैटिनसन, जसप्रीत बुमराह, जयंत यादव, कीरन पोलार्ड, क्रुणाल पांड्या, मिशेल मैक्लेंघन, मोहसिन खान, नाथन कुल्टर नाइल, प्रिंस बलवंत राय, क्विंटन डी कॉक (विकेटकीपर), राहुल चहर, सौरभ तिवारी, शेरफाने रदरफोर्ड, सूर्यकुमार यादव, ट्रेंट बोल्ट।(आईएएनएस/ग्लोफैंस)
मुंबई, 23 अक्टूबर अभिनेत्री भूमि पेडनेकर अपनी आगामी फिल्म, जो कि नायिका केंद्रित है, 'दुर्गावती' के लिए कमर कस रही हैं। उनके लिए प्रतीक्षा रोमांचक होने के साथ-साथ घबराहट पैदा करने वाला भी है, क्योंकि यह पहली बार है जब फिल्म में वह अकेली स्टार हैं।
भूमि ने कहा, "यह पहली बार है कि मैं अकेले किसी फिल्म की शूटिंग कर रही हूं और यह रोमांचक होने के साथ-साथ घबराहट पैदा करने वाला भी है। मुझ पर बहुत सारी जिम्मेदारी है।"
उन्होंने हॉरर फिल्म में कास्ट किए जाने को लेकर कहा, "मेरी जिम्मेदारी को साझा करने के लिए हमेशा मेरे पास एक सह-कलाकार रहा है और अब मैं अकेले इस फिल्म में हूं। मैं वास्तव में यह देखने के लिए उत्साहित हूं कि लोग इस पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। मैंने ऐसा कभी नहीं देखा। लोगों ने मुझे कभी इस अवतार में नहीं देखा।"
भूमि 'बधाई दो' की शूटिंग शुरू करने के लिए भी तैयार हैं। यह फिल्म आयुष्मान खुराना-स्टारर 'बधाई हो' का दूसरा हिस्सा है। इससे पहले आयुष्मान और भूमि ने 'दम लगा के हईशा', 'शुभ मंगल सावधान' और 'बाला' जैसी हिट फिल्में दी हैं।
भूमि अब तक किए गए सार्थक सिनेमा का हिस्सा बनकर संतुष्ट हैं। उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि मैं कभी भी एक ऐसी फिल्म के सेट पर नहीं आई हूं, जहां मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं यहां क्यों हूं? मैं उस काम को करने से दुखी नहीं होना चाहती, जो कभी हुआ ही नहीं। मैं कभी भी ऐसी फिल्म का हिस्सा नहीं रही, जहां लगा कि यह सही नहीं है।"(आईएएनएस)
- सलमान रावी
दिल्ली नगर निगम द्वारा संचालित अस्पतालों के डॉक्टरों और पैरा-मेडिकल स्टाफ़ का आंदोलन 20वें दिन भी जारी है. ये सभी कर्मचारी चार महीने से लंबित अपने वेतन की माँग कर रहे हैं.
गुरुवार को दिल्ली के तीन प्रमुख अस्पतालों के रेज़िडेंट डॉक्टरों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना दिया.
अब कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में दिल्ली के दूसरे अस्पतालों के डॉक्टर भी इस आंदोलन में शामिल हो सकते हैं जो कोरोना काल में एक नई मुसीबत साबित हो सकती है.
दिल्ली के नामी अस्पताल - राजीव गाँधी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के साथ-साथ अन्य कई अस्पतालों के रेज़िडेंट डॉक्टरों की समितियों ने चेतावनी दी है कि 'अगर दिल्ली नगर निगम अपने द्वारा संचालित अस्पतालों के डॉक्टरों और अन्य मेडिकल कर्मचारियों के कई महीनों से बक़ाया वेतन का भुगतान नहीं करता तो फिर सभी रेज़िडेंट डॉक्टर हड़ताल पर चले जायेंगे.'
राजीव गाँधी अस्पताल के डॉक्टर हरदीप सिंह और डॉक्टर संदीप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे एक पत्र में इस विषय पर चिंता जताई है.
कोरोना महामारी के समय में अगर ऐसा हुआ तो कोविड-19 से जूझ रहे मरीज़ों पर क्या बीतने वाली है, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
कोरोना काल में दिल्ली के एक प्रमुख स्थल पर भूख हड़ताल कर रहे इन 'कोरोना योद्धाओं' के लिए पूरे भारत ने कभी फूल बरसाये थे, मगर यहाँ मौजूद कस्तूरबा गाँधी अस्पताल के डॉक्टर अभिमान का कहना है कि 'आज उनके पास एक गुलाब ख़रीदने तक के पैसे नहीं हैं.'
इस बीच कांग्रेस पार्टी के महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भारत के स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप करने की माँग की है, क्योंकि ये मामला दिल्ली नगर निगम और दिल्ली सरकार के बीच फँसा हुआ है.
भूख हड़ताल पर डॉक्टर
दिल्ली के जंतर-मंतर पर मौजूद राजन बाबू टीबी अस्पताल, कस्तूरबा गांधी अस्पताल और हिन्दू राव अस्पताल के डॉक्टर दिल्ली नगर निगम और दिल्ली सरकार को लिखे गये पत्रों की कॉपियाँ और पोस्टर लेकर भूख हड़ताल पर बैठे थे.
हिन्दू राव अस्पताल के डॉक्टर प्रवीण कहते हैं कि दिल्ली नगर निगम के अस्पतालों में काम कर रहे डॉक्टर और अन्य कर्मचारियों के लिए नौबत यहाँ तक आ पहुँची है कि उन्हें अब लोगों से पैसे उधार माँगने पड़ रहे हैं.
हिन्दू राव अस्पताल - जो कोविड अस्पताल था, वहाँ से कोविड-19 से पीड़ित मरीज़ों को दिल्ली सरकार द्वारा संचालित अस्पतालों में स्थानांतरित कर दिया गया है और पूरे अस्पताल को सैनीटाइज़ कर दिया गया है, मगर अब डॉक्टर वहाँ से नदारद हैं.
जिन डॉक्टरों को ऐसे अप्रत्याशित समय में अस्पतालों में होना चाहिए था, वो सड़कों पर हैं.
बीच में दिल्ली नगर निगम के वरिष्ठ डॉक्टरों के संगठन ने भी हड़ताल पर जाने की धमकी दी थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया.
धरना स्थल पर मौजूद डॉक्टरों का आरोप है कि ऐसा डॉक्टरों ने अधिकारियों और नगर निगम प्रशासन के दबाव में किया है. वरिष्ठ डॉक्टरों के संगठन के अध्यक्ष आर आर गौतम के अनुसार उन्होंने आंदोलन में शामिल नहीं होने का निर्णय नगर निगम के मेयर के आश्वासन के बाद लिया.
आंदोलन के दौरान ही नगर निगम के मेयर और दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों ने हड़ताल करने वाले डॉक्टरों और कर्मचारियों को एक महीने का वेतन देने की घोषणा की थी, मगर आंदोलनरत डॉक्टर और कर्मचारी इससे ख़ुश नहीं हैं.
जंतर-मंतर पर एक डॉक्टर पोस्टर लिए बैठे थे, जिस पर लिखा था- 'हमें भीख नहीं वेतन चाहिए.'
डॉक्टरों का कहना है कि पिछले चार सालों से नगर निगम डॉक्टरों और अस्पतालों में काम करने वाले दूसरे कर्मचारियों के साथ इसी तरह से पेश आ रहा है.
वो कहते हैं, "पिछले चार सालों से लगातार नगर निगम की आदत बन गयी है कि हर महीने वेतन ना देकर, उसे लटकाया जाये. कभी तीन महीने, तो कभी दो महीने तक. कई बार चार महीने तक भी वेतन रोका जाता है. हर बार डॉक्टरों को और कर्मचारियों को अपनी मेहनत के पैसे के लिए गिड़गिड़ाना पड़ता है."(bbc)
- ज़ुबैर अहमद
फ़्रांस इन दिनों एक गंभीर मंथन से गुज़र रहा है. इसका कारण 18 साल के चेचन मूल के एक लड़के की बर्बरता है जिसने 16 अक्टूबर को हाई स्कूल के एक शिक्षक की सिर काटकर हत्या कर दी. 47 वर्षीय शिक्षक सैमुअल पैटी छात्रों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में पढ़ा रहे थे और इसी सिलसिले में उन्होंने शार्ली एब्दो के कार्टूनों का ज़िक्र किया था.
फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इसे "इस्लामिक आतंकवादी" हमला कहा और उनकी सरकार ने "इस्लामिक आतंकवाद" के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ दी है. देश में इस समय कम ही लोग ऐसे होंगे जो राष्ट्रपति के इस बयान से असहमत हों. विपक्ष के एक नेता ने कहा "हमें आँसू नहीं, हथियार चाहिए". पूरे देश में भावनाएँ इस समय उफ़ान पर हैं.
पुलिस ने हमले के बाद कुछ 40 जगहों पर छापा मारा और 16 लोगों को हिरासत में ले लिया लेकिन बाद में छह को छोड़ दिया गया, सरकार ने एक मस्जिद भी बंद करने का आदेश दिया है. उस मस्जिद के ख़िलाफ़ आरोप है कि उसने पैटी की हत्या से पहले वहाँ से फ़ेसबुक पर वीडियो साझा किया गया और उस स्कूल का नाम-पता बताया गया जहाँ पैटी पढ़ाते थे.
पैग़ंबर मोहम्मद के ख़िलाफ़ बयान और उनके चित्र को दिखाना मुसलमानों के लिए धार्मिक रूप से संवेदनशील मामला है क्योंकि इस्लामिक परंपरा स्पष्ट रूप से मोहम्मद और अल्लाह (भगवान) की छवियों को दिखाने से मना करती है.

यह मुद्दा फ़्रांस में विशेष रूप से 2015 में उस समय से चर्चा में है जब से व्यंग्य पत्रिका 'शार्ली ऐब्दो' ने पैग़ंबर मोहम्मद के कार्टून प्रकाशित करने का निर्णय लिया, फ़्रांस में कार्टून के प्रकाशन के बाद पत्रिका कार्यालय पर हमला करके 12 लोगों को मार डाला गया था.
तथाकथित इस्लामिक स्टेट स्टाइल वाली हत्या के बाद फ़्रांस में राष्ट्रीय एकता का ज़ोरदार प्रदर्शन देखने को मिल रहा है. लेकिन विश्लेषक कहते हैं कि इस हत्या के बाद देश के कुछ हिस्सों में धर्मनिरपेक्षता और बोलने की स्वतंत्रता के मामले में सालों से दबा अंसतोष बाहर आ गया है.
फ़्रांस की राष्ट्रीय पहचान का केंद्र है सरकार की सख़्त धर्मनिरपेक्षता, ये उतना ही अहम है जितना कि "स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व" की अवधारणाएं जो फ़्रांसीसी क्रांति के बाद से देश, समाज और उसके संविधान का आधार रही हैं.
फ़्रांस में सार्वजनिक स्थान, चाहे स्कूल हों, अस्पताल या दफ़्तर, सरकारी नीति के हिसाब से वे किसी भी धर्म के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त होने चाहिए, फ़्रांस नीतिगत तौर पर मानता है कि किसी भी धर्म की भावनाओं की रक्षा करने की कोशिश, स्वतंत्रता और देश की एकता में बाधक है.
दरअसल, इस हत्या से दो सप्ताह पहले यानी दो अक्टूबर को राष्ट्रपति मैक्रों ने अपने एक भाषण में 'इस्लामिक कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ युद्ध' के तौर पर एक क़ानून का प्रस्ताव रखा था, अगर क़ानून पास हो गया तो विदेश के इमाम फ़्रांस की मस्जिदों में इमामत नहीं कर सकेंगे, और छोटे बच्चों को घरों में इस्लामी शिक्षा नहीं दी जा सकेगी.
दक्षिण फ़्रांस में एक हाई स्कूल की शिक्षिका मार्टिन जिब्लट को इस बिल के कुछ प्रावधानों पर सख़्त आपत्ति है. वो कहती हैं, "आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई के बारे में मैक्रों के भाषण से मुझे जो चोट लगी, वह थी घर के भीतर दी जाने वाली धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबंध. ये मुझे स्वतंत्रता की हत्या करने वाला प्रावधान लगा. मैं कई माताओं-पिताओं को जानती हूँ जो ऐसा करते हैं. उनके घरों पर नियमित रूप से शिक्षा अधिकारियों के दौरे होते हैं कि वो घर में अपने बच्चों को क्या पढ़ा रहे हैं."
उन्होंने सरकार और मीडिया पर झूठ फैलाने का आरोप लगाया, "सरकार से इतने झूठ सुनने को मिलते हैं कि मैंने पहले से ही फ़्रेंच मुख्यधारा के समाचार चैनल को देखना बंद कर दिया था, वे दर्शकों में डर पैदा करते हैं जो लोगों का ब्रेनवॉश करने का सबसे अच्छा तरीक़ा है."
लेकिन राष्ट्रपति मैक्रों के मुताबिक़, उनके क़ानून का मक़सद ये है कि "फ़्रांस में एक ऐसे इस्लाम को बढ़ाया जाए जो आत्मज्ञान के अनुकूल हो." तो क्या राष्ट्रपति के इस बयान का मतलब ये निकाला जाए कि फ़्रांस के स्टेट सेकुलरिज्म के साथ वहां के मुसलमानों के धार्मिक विचारों का तालमेल नहीं है?
अमरीका में सैन डिएगो यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और 'इस्लाम, अथॉरिटेरियनिज़्म एंड अंडरडेवलपमेंट' के लेखक अहमत कुरु कहते हैं कि ज़मीनी हक़ीक़त बहुत जटिल है. उनके मुताबिक़, "सेक्युलर फ़्रांस ने वास्तव में कैथोलिक लोगों के लिए कई अपवाद हैं, सरकार निजी कैथोलिक स्कूलों को पर्याप्त सार्वजनिक धन मुहैया कराती है, और फ़्रांस में 11 आधिकारिक छुट्टियों में से छह कैथोलिक महत्त्व वाले दिन हैं. वहाँ अक्सर धर्मनिरपेक्षता का मतलब मुसलमानों के धार्मिक मुद्दों को अस्वीकार करना होता है."
प्रोफ़ेसर कुरु के अनुसार पिछले कुछ सालों में फ़्रांस में एक ऐसे सेक्युलरिज़्म की मांग बढ़ी है जिसमे बहुसंस्कृतिवाद को जगह दी जाए. वो कहते हैं, "उदाहरण के तौर पर प्रख्यात विद्वान ज्यां बॉबरो एक "बहुलवादी धर्मनिरपेक्षता" की वकालत करते हैं, एक ऐसे सिस्टम की वकालत जो सार्वजनिक संस्थानों में कुछ धार्मिक प्रतीकों को सहन कर सके."
डेनमार्क की आरहूस यूनिवर्सिटी में भारतीय मूल के प्रोफ़ेसर और लेखक डॉक्टर ताबिश ख़ैर सालों से यूरोप में रह रहे हैं और भारत में इस्लामी कट्टरपंथ और यूरोप में इस्लाम विरोधी नस्लवाद दोनों की हिंसा का निजी तौर पर अनुभव कर चुके हैं. उन्होंने फ़्रांस में जारी संकट पर कहा, "हमें सबसे पहले फासीवादी हिंसा के किसी भी ऐसे कार्य की तुरंत निंदा करनी चाहिए जो किसी धर्म, राष्ट्र या विचारधारा के नाम पर हो. दूसरी बात यह है कि इस काम को कोई लेबल नहीं देना चाहिए."
फ़्रांस के राष्ट्रपति ने शिक्षक की हत्या को 'इस्लामिक आतंकवाद' का नाम दिया है जिसे ताबिश ख़ैर सही नहीं मानते, वो कहते हैं, "यह आतंक का एक कार्य है, आतंकवाद का नहीं, अगर किसी समूह ने इसकी योजना नहीं बनाई तो यह भ्रामक है. कुछ मायनों में, यह बदतर है. यह दिखाता है कि अचानक कोई भी व्यक्ति, जो धार्मिक कट्टरपंथी और क्रोध से प्रेरित है, इस तरह के घिनौने अपराध कर सकता है".
ताबिश मानते हैं कि इस तरह की घटनाओं के बाद किसी एक धर्म या समुदाय के लोगों को कटघरे में खड़ा करना किसी तरह से सही नहीं है. वे कहते हैं, "मुसलमानों को बलि का बकरा बनाने के पीछे राजनीतिक नेतृत्व का मक़सद अपनी नाकामियों को छिपाना ही होता है."
प्रोफ़ेसर अहमत कुरु के अनुसार, इस्लाम के सामने "संकट" मुस्लिम दुनिया की ऐतिहासिक और राजनीतिक विफलताओं में निहित है, इस्लाम धर्म में ही नहीं."
वो कहते हैं, "मिस्र, ईरान और सऊदी अरब जैसे कई मुस्लिम देशों में लंबे समय से स्थायी सत्तावादी शासन और पुराना पिछड़ापन है. दुनिया के 49 मुस्लिम बहुल देशों में से 32 में, ईशनिंदा के क़ानून के तहत लोगों को दंडित किया जाता है, छह देशों में, ईशनिंदा की सज़ा मौत है. ये क़ानून, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अवरुद्ध करते हैं, इस्लाम के रूढ़िवादी आलिमों और सत्तावादी शासकों के हितों में होते हैं, इस्लाम धर्म के हित में नहीं. वे वास्तव में क़ुरान की उन आयतों का उल्लंघन हैं जिनमें मुसलमानों से अन्य धर्मों के लोगों के ख़िलाफ़ ज़बरदस्ती या जवाबी कार्रवाई नहीं करने का आग्रह किया गया है."
दूसरी तरफ़, इस्लामोफ़ोबिया (इस्लाम से डर) भी आज फ़्रांस और यूरोप में एक हक़ीक़त है. दक्षिण फ़्रांस के शहर 'नीस' के निकट इटली की सरहद से सटे एक क़स्बे 'मोंतों' की रहने वाली एक फ़्रेंच युवती मार्गेरिटा मरीनकोला कहती हैं कि इस घटना को इस्लाम से जोड़ना ठीक नहीं है, "मेरा नज़रिया फ़्रांस में बहुत लोकप्रिय नहीं है, बेशक फ़्रांस में जो हुआ है उसकी मैं पूरी तरह से निंदा करती हूं और बोलने की आज़ादी के ख़िलाफ़ हिंसा की भी निंदा करती हूँ. लेकिन ये कार्य किसी भी तरह से इस्लाम और मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं और मुझे डर है कि यहाँ इस बात को अच्छी तरह से समझा नहीं गया है."
वो आगे कहती हैं, "एक फ़्रासीसी नागरिक के रूप में मैं पूरी तरह से बोलने की स्वतंत्रता का समर्थन करती हूं लेकिन किसी भी तरह से इसका लेना-देना व्यंग्य पत्रिका शार्ली ऐब्दो से नहीं है जो फ़्रेंच मॉडल से अलग हर चीज़ का लगातार अपमान करता है, बहुत अहंकार भरे तरीक़े से."
कुछ फ़्रांसीसी मुसलमानों का कहना है कि वे अपने धार्मिक विश्वास के कारण नस्लवाद और भेदभाव के निशाने पर लगातार रहे हैं और ये एक ऐसा मुद्दा है जिसने लंबे समय से देश में तनाव पैदा कर रखा है, कुछ कहते हैं कि जान-बूझ कर उन्हें उकसाने की कोशिश सालों से जारी है.
दिल्ली में फ़्रेंच दूतावास में काम करने वाली एक राजनयिक के अनुसार उनके देश में मामला पेचीदा है. वो कहती हैं, "फ़्रांस के दक्षिणपंथियों के अनुसार उन्हें समस्या उन मुसलमानों से है जो रहते फ़्रांस में हैं, पैदा वहाँ हुए लेकिन उनके रहने का अंदाज़ और उनकी विचारधारा उनके पूर्वजों के देशों से प्रेरित है, जो फ़्रांस के सेक्युलर माहौल से मेल नहीं खाता है."
लेकिन हाई स्कूल शिक्षक मार्टिन कहती हैं, "बोलने की आज़ादी का ये मतलब नहीं कि किसी के धार्मिक विचारों को जान-बूझ कर ठेस पहुँचाया जाए.
पश्चिमी यूरोप में मुसलमानों की सबसे अधिक आबादी फ़्रांस में रहती है जो देश की कुल आबादी का 10 प्रतिशत है. ये लोग मोरक्को, अल्जीरिया, माली और ट्यूनीशिया जैसे देशों से आकर फ़्रांस में आबाद हुए हैं, जहाँ फ़्रांस ने 19वीं और 20वीं शताब्दी में हुकूमत की थी. इनकी पहली पीढ़ी को नस्लवाद की समस्या को झेलना पड़ा लेकिन शायद बाद की पीढ़ियों ने इसे स्वीकार नहीं किया और अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए सिस्टम को चुनौती देना शुरू कर दिया. सेक्युलरिज़्म की पॉलिसी के अंतर्गत एक ऐसा फ़्रेंच मॉडल पनपा जिसमें अल्पसंख्यक आबादी को देश की मुख्यधारा में पूरी तरह से जोड़ने की कोशिश की गई.
जहाँ मार्गरीटा मरीनकोला रहती हैं उसके आस-पास के शहरों में मार्से और नीस शामिल हैं जो मुस्लिम अरबों की आबादी और संस्कृति के लिए जाने जाते हैं. वो कहती हैं कि एकीकरण का फ़्रेंच मॉडल काम नहीं कर रहा है. वे कहती हैं, "मेरे विचार में समस्या एकीकरण का फ़्रेंच मॉडल है, यह काम नहीं कर रहा है और अपराधी आसानी से ऐसे लोगों को ब्रेनवॉश कर रहे हैं, जो अब इस्लाम के बहाने इस्तेमाल हो रहे हैं."
एकीकरण की नीति काम नहीं कर रही है इसकी चिंता फ़्रेंच समाज को भी है. 16 अक्टूबर को शिक्षक पर हमला करने वाला चेचन शरणार्थी 18 साल का था. फ़्रांस में इस उम्र के लोगों के अंदर अपनी पहचान को लेकर सवाल हैं, काली नस्ल और अरब मुस्लिम बच्चों के दिमाग़ में ये सवाल बार-बार उठते हैं.
छह साल पहले नीस शहर के निकट मुझे एक हाई स्कूल के लड़के और लड़कियों से तीन दिनों तक क्लास में बातचीत करने का अवसर मिला था. मुझसे कहा गया कि मैं विद्यार्थियों से भारत के बहुसांस्कृतिक समाज में रहने के अपने अनुभव उनसे साझा करूँ, मैंने ये महसूस किया कि बच्चों के मन में अनेक सवाल थे और वो अधिकतर उनकी अपनी पहचान से जुड़े थे. और शायद स्कूल के अधिकारियों ने इसे महसूस किया और मेरे अनुभव से कुछ बच्चों को दिशा मिले, इसीलिए मुझे वहां बुलाया.
स्कूल के विद्यार्थी सभी नस्ल और सभी धर्मों के थे. अरब मूल के कुछ लड़कों ने मुझसे कहा कि वो भारत को इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि वहां सभी धर्मों को समानता दी जाती है. उन्होंने बॉलीवुड की फ़िल्में देख रखी थीं और एक ख़ुशहाल बहु-सांस्कृतिक भारत की उनकी कल्पना शाहरुख़ ख़ान की फ़िल्मों पर आधारित थीं. उन्होंने कहा कि उनके गोरे दोस्त इस्लाम के बारे में कुछ नहीं जानते और इस्लाम विरोधी विचारधारा रखते हैं एंटी-इस्लाम बातें अक्सर करते रहते हैं.

ऐसे माहौल में इस्लाम विरोधी बयान और काम इस्लामोफोबिया को हवा देते हैं और मुस्लिम समाज पर तंज़ और ताने बढ़ने लगते हैं, दूसरी तरफ़ प्रवासी अरब आबादी में भयंकर बेरोज़गारी और ग़रीबी की वजह से इस्लामी चरमपंथियों का काम आसान हो जाता है और वे उन्हें बरगला पाते हैं.
स्विट्ज़रलैंड में जीनेवा इंस्टीट्यूट ऑफ़ जियोपॉलिटिकल स्टडीज के अकादमी निदेशक एलेक्जेंडर लैम्बर्ट के विचार में न केवल फ़्रांस बल्कि यूरोप भर में ग़ैर-ईसाई धर्मों को बर्दाश्त करने की क्षमता कम होती जा रही है, "दरअसल, यूरोप में बहुसंस्कृतिवाद को अपनाने के लिए संवैधानिक-क़ानूनी ढांचे नहीं हैं, मध्य-पूर्व और दक्षिण-पूर्व यूरोप सहित कई देशों में, राष्ट्रीयता और नागरिकता किसी न किसी तरह से ईसाई धर्म, आम तौर पर कैथोलिक या ऑर्थोडॉक्स ईसाई धर्म से जुड़ी रहती है और बाहर से आए, दूसरे धर्मों को मानने वाले लोगों से वैचारिक टकराव होता ही है."
बराबरी के लिए प्रदर्शन करते फ़्रांस के मुसलमान
प्रोफ़ेसर एलेक्ज़ेंडर लैम्बर्ट स्विट्ज़रलैंड के नागरिक हैं, वे कहते हैं कि उनके देश में मस्जिदों की मीनारों के निर्माण पर सरकारी तौर पर पाबंदी लगी है. सरकार ने ये पाबंदी जनता से पूछकर लगाई है. हमारे देश में मुसलमान तुलनात्मक रूप से अच्छी तरह घुले-मिले हैं, और ग़ैर-मुस्लिमों के साथ उनका कोई तनाव नहीं है, स्वदेशी ईसाई बहुसंख्यक समुदायों के साथ भी नहीं. इसके अलावा, स्विट्ज़रलैंड में यहूदी समुदाय को ख़तरा नहीं है, जो दुर्भाग्य से फ़्रांस में फिर से उभर रहा है".
फ़्रांस में बुर्क़े पर लगाए गए प्रतिबन्ध को देश के मुसलमानों ने सकारात्मक तरीक़े से नहीं लिया और इसे इस्लाम पर और अपनी पहचान पर प्रहार के रूप में देखा.
प्रोफ़ेसर एलेक्जेंडर लैम्बर्ट कहते हैं कि यूरोप की (गोरी नस्ल की) आबादी घटती जा रही है. "यूरोपीय जनसंख्या सिकुड़ रही है. पूर्वानुमानों के अनुसार 2050 तक यूरोप में मुसलमानों की आबादी का काफ़ी बढ़ सकती है क्योंकि वास्तव में मूल यूरोपीय आबादी घट रही है जबकि मुस्लिम आबादी बढ़ रही है."
प्रोफ़ेसर लैम्बर्ट का कहना है कि इस सच को विश्वविद्यालयों में पढ़ाना चाहिए, ये यूरोप में रहने वालों के लिए असुरक्षा और चिंता का माहौल बनाता है जिसके नतीजे में मुस्लिम और यूरोपीय समाज में तनाव होना लाज़मी है. अब लोग ये कह रहे हैं कि फ़्रांस हो या यूरोप के दूसरे देश, मुस्लिम आबादी देश में इंटीग्रेट (एकीकृत) करने लिए एक कामयाब फ़ार्मूला निकालना वक़्त की ज़रुरत है.(bbc)
भारतीय कारोबारी पिछले पांच साल में इस बार सबसे अधिक माल त्योहारों के पहले स्टॉक कर रहे हैं. उनको उम्मीद है कि जिन लोगों की कमाई लॉकडाउन के दौरान प्रभावित नहीं हुई वे त्योहारों के इस मौसम में अधिक खर्च करेंगे.
देश में सबसे ज्यादा खरीदारी दुर्गा पूजा और दीवाली के त्योहार के समय होती है. पहले दुर्गा पूजा और उसके 20 दिन के बाद दीवाली मनाई जाती है. इस समय में घरों को सजाया जाता है और सामान खरीदे जाते हैं, जैसे टीवी, फ्रिज, कार और बाइक या फिर घर में इस्तेमाल होने वाले बर्तन, मिक्सर आदि. त्योहार के मौके पर लोग अपने करीबी संबंधियों को उपहार भी देते हैं. इस बार व्यवसायी और दुकानदार सामान्य से अधिक खरीदारी की उम्मीद कर रहे हैं. कई महीनों की तालाबंदी के बाद मांग में बढ़ोतरी हुई है. हालिया आंकड़े बताते हैं कि डीजल, ऊर्जा और कारों की मांग ने तेजी पकड़ी है. मोबाइल फोन से लेकर फर्नीचर तक में खुदरा खरीद में तेजी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक होगी क्योंकि जून में समाप्त पहली तिमाही में भारत की जीडीपी 23.90 फीसदी सिकुड़ गई थी.
ब्रोकरेज फर्म नोमुरा का कहना है कि लॉकडाउन के बाद भारत का बिजनेस इंडेक्स 18 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था. देश में कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए मार्च महीने में लॉकडाउन लागू किया गया था. बड़े रिटेलर जैसे कि क्रोमा और विजय सेल्स ने रॉयटर्स को बताया कि हाल के दिनों की बिक्री इस बात के संकेत दे रहे हैं कि यह साल पिछले साल के मुकाबले बेहतर साबित होगा. दोनों ही रिटेलर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बेचते हैं.
अखिल भारतीय व्यापारी संघ का कहना है कि उनके 7 करोड़ छोटे व्यापारी सदस्य इस साल 14 फीसदी बफर स्टॉक करने की योजना बना रहे हैं ताकि मांग बढ़ने पर स्टॉक खत्म नहीं हो जाए. पिछले साल व्यापारियों ने 10 फीसदी ही बफर स्टॉक किया था. व्यापारी संघ के सचिव प्रवीण खंडेलवाल कहते हैं, "आर्थिक दबाव के बावजूद हम अधिक माल स्टॉक कर रहे हैं इस सोच के साथ कि त्योहारों में अधिक लोग खरीदारी करने आएंगे."
खंडेलवाल कहते हैं, "हमारी उम्मीद है कि पिछले पांच साल में यह सबसे अच्छी दीवाली होगी. स्वाभाविक रूप से हमारे स्टॉक का स्तर उसी हिसाब से होगा."

"सतर्क के साथ आशावादी"
लेकिन हर कोई उत्साह से भरा नहीं है. राजस्थान के जयपुर शहर में दुकानें और शोरूम आमतौर पर स्थानीय और विदेशी पर्यटकों से भरी रहती थी लेकिन इस सप्ताह बहुत ही कम कारोबार हुआ. यहां के कारोबारियों का कहना है कि शहर की मुख्य आय का स्रोत पर्यटन है और अब भी लोग कम आ रहे हैं. कपड़ा व्यापारी सुरेश ताक कहते हैं, "जब तक टीका नहीं आ जाता हम कोरोना पूर्व स्तरों के 30-35 फीसदी पर ही संचालन करते रहेंगे." ताक की एक फैक्ट्री भी है जहां कपड़ों पर प्रिटिंग का काम होता है.
यहां से सैकड़ों किलोमीटर की दूरी पर स्थित सतारा जिले के निलेश कदम कहते हैं कि वे अधिक से अधिक बचत कर रहे हैं. हाल में वे दोबारा नौकरी पर जाने लगे हैं. वे कहते हैं, "जून से लेकर अगस्त तक फैक्ट्री ने मुझे ज्यादा काम नहीं होने की वजह से छुट्टी पर भेज दिया था." स्टील फैक्ट्री में काम करने वाले 35 साल के कदम कहते हैं, "इस साल मैं ज्यादा बड़ी खरीदारी नहीं करूंगा."
भारतीय व्यापारी संघ का अनुमान है कि भारतीयों ने अप्रैल से अब तक 1,500 अरब रुपये जमा किए हैं, जिसका एक बड़ा हिस्सा त्योहारों में खर्च हो सकता है.
ऑनलाइन रिटेलर्स अमेजन और फ्लिपकार्ट ने भी त्योहारों का देखते हुए सेल के जरिए भारी ऑफर्स ग्राहकों के लिए पेश किए. ऑनलाइन खरीद के शौकीन इस बार फोन, लैपटॉप, कैमरे और कपड़े खरीद रहे हैं.
एए/सीके (रॉयटर्स)(dw.com)
राजस्थान की राजधानी जयपुर में आईपीएल क्रिकेट मैच पर सट्टा पकड़ाया। पुलिस ने 4 करोड़ नगदी और नोट गिनने की मशीनों के साथ 19 मोबाइल फ़ोन भी जब्त किये हैं. (ANI)
- आसिफ एस खान
गोवा के उपमुख्यमंत्री चंद्रकांत कावलेकर के फोन से एक व्हाट्सएप ग्रुप में कथित तौर पर भेजी गई अश्लील वीडियो को लेकर प्रदेश की राजनीति गर्मा गई है। कांग्रेस समेत गोवा के विपक्षी दलों ने अश्लील व्हाट्सएप मैसेज विवाद पर उपमुख्यमंत्री कावलेकर से इस्तीफा देने की मांग की है।वहीं सत्तारूढ़ बीजेपी ने उनका बचाव करते हुए कहा कि पार्टी महिलाओं का सम्मान करती है और यह कावलेकर को बदनाम करने की कोशिश है।
इस मामले के तूल पकड़ते ही राज्य के उपमुख्यमंत्री चंद्रकांत कावलेकर ने सोमवार को गोवा पुलिस के साइबर सेल में एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें कहा गया था कि अज्ञात व्यक्तियों ने रविवार देर रात उनके स्मार्टफोन को हैक कर लिया और एक व्हाट्सएप ग्रुप में एक अश्लील संदेश भेजा गया। यह अश्लील संदेश कावेलकर के फोन से 'विलेजिस ऑफ गोवा' नामक व्हाट्सएप ग्रुप पर भेजा गया था।
हालांकि, कावेलकर के इस कदम के बाद भी उनके इस्तीफे की मांग तेज हो गई है। कांग्रेस की गोवा सोशल मीडिया सेल की प्रमुख प्रतिभा बोरकर ने कहा, "अगर बीजेपी 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' सिद्धांत को मानती है, तो मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत को कावलेकर को तत्काल बर्खास्त कर देना चाहिए और निष्पक्ष पुलिस जांच शुरू करनी चाहिए।" बोरकर ने भी गोवा पुलिस से शिकायत दर्ज कर संदेश की जांच करने की मांग की है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि संदेश कावेलकर ने 'विलेजिस ऑफ गोवा' नामक व्हाट्सएप ग्रुप पर भेजा है।
हालांकि, बीजेपी कावलेकर के बचाव में आ गई है, जो पिछले साल जुलाई में कांग्रेस से भगवा पार्टी में शामिल हुए थे। गोवा भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष सदानंद शेट तनावडे ने मंगलवार को कहा, "मंत्री ने मुझे उनकी शिकायत की एक प्रति भेजी है। उनकी आपराधिक शिकायत कहती है कि उनका मोबाइल फोन हैक हो गया है। उन्होंने अपराध शाखा में शिकायत दर्ज की है। पुलिस की जांच के बाद सच्चाई सामने आएगी।"
गोवा बीजेपी अध्यक्ष ने कावलेकर का बचाव करते हुए कहा कि नई विकसित तकनीक है, जिसके साथ मोबाइल फोन हैक करके कोई भी कुछ भी कर सकता है। बीजेपी ने हमेशा महिलाओं का सम्मान किया है। हमारे संगठन में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण है। हालांकि बीजेपी की इन कोशिशों के बावजूद सोशल मिडिया पर प्रमोद सावंत की सरकार लोगों के निशाने पर है।(navjivan)
तिरुवनंतपुरम, 23 अक्टूबर | मिजोरम के पूर्व राज्यपाल कुम्मानम राजशेखरन व आठ अन्य का नाम एक धोखाधड़ी मामले में सामने आया है। दरअसल पठानमथिटा में पुलिस ने एक ज्योतिषी की शिकायत पर यह मामला दर्ज किया है। उसने दावा किया कि उससे 35 लाख रुपये की ठगी की गई है। शिकायतकर्ता सी.आर. हरिकिशन ने कहा कि राजशेखरन के पूर्व करीबी सहयोगी प्रवीण ने एक व्यापार शुरू करने के नाम पर उससे पैसे लिए थे।
राजशेखरण का नाम मामले में इसलिए सामने आ रहा है क्योंकि उन्होंने इस व्यापार उपक्रम को सही बताया था, जिसके बाद ज्योतिषी ने पैसे सौंप दिए थे।
लेकिन कुछ वर्ष बाद, जब उसने पैसे मांगे तो उसे कुछ लाख रुपये ही दिए गए और कथित रूप से ज्योतिषि का अभी भी 28 लाख रुपये बकाया है।
पैसे वापस लेने के लिए कई प्रयास करने के बाद भी विफल रहने पर उसने स्थानीय पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करा दी।
शिकायत पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए, राजशेखरन ने कहा कि यह राजनीति से प्रेरित मामला है। उन्होंने कहा कि वह पलक्कड की कंपनी के बारे में जानते हैं, लेकिन उन्हें इसके वित्तीय मामलों की कोई जानकारी नहीं है।
राजशेखरण का पक्ष लेते हुए भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. सुरेंद्रन ने कहा, "यह और कुछ नहीं बल्कि सार्वजनिक जीवन में क्लीन ट्रैक रिकॉर्ड रखने वाले की छवि धूमिल करने का प्रयास है। हम इस मामले में कड़ा कदम उठाएंगे।"(आईएएनएस)
इस्लामाबाद, 23 अक्टूबर | आजाद जम्मू एवं कश्मीर (एजेके) उर्फ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के अध्यक्ष सरदार मसूद खान ने कहा है कि पाकिस्तान को यह सिद्धांत अपनाना चाहिए कि वह "भारत के साथ वार्ता संयुक्त राष्ट्र के तहत होनी चाहिए।"
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और भारत की एक वार्ता में कश्मीरियों की मौजूदगी जरूरी है।
उन्होंने कहा, "कश्मीर पर सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों को लागू करने के लिए वार्ता की संयुक्त राष्ट्र निगरानी आवश्यक है।"
मसूद खान ने भारत पर व्यंग्य करते हुए कहा कि नई दिल्ली ने "कश्मीर के अपने अवैध कब्जे को मजबूत करने और संयुक्त राष्ट्र एवं कश्मीरियों को बातचीत की प्रक्रिया से बाहर रखने के लिए द्विपक्षीय वार्ता का इस्तेमाल किया है।"
उन्होंने कहा, "और अब यह फिर से एक वार्ता के लिए अवैध रूप से भारतीय अधिकृत जम्मू एवं कश्मीर में अपने हाल के अवैध कार्यों से ध्यान हटाने के लिए ऐसा कर सकता है।"
मसूद खान ने यह भी सलाह दी कि कश्मीर विवाद पर वार्ता इस्लामाबाद या नई दिल्ली में नहीं होनी चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह न्यूयॉर्क में आयोजित की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा, "हालांकि कश्मीरियों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ये इस्लामाबाद, नई दिल्ली या मुजफ्फराबाद और श्रीनगर में भी आयोजित की जा सकती हैं।"
मसूद खान ने कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जहां भी बातचीत होती है, वहां वार्ता का एजेंडा केवल कश्मीर पर यूएनएससी के प्रस्तावों के ढांचे के अनुसार होना चाहिए।
कश्मीर विवाद पर इस्लामाबाद के रुख को दोहराते और सुरक्षित करते हुए मसूद खान ने कहा कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय विवाद नहीं है।
उन्होंने कहा, "पाकिस्तान का वार्ता पर रुख बहुत स्पष्ट है कि कश्मीर पाकिस्तान और भारत के बीच द्विपक्षीय विवाद नहीं है, बल्कि यह तो एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा है, जिसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा फिर से शुरू किया जाना चाहिए।"
उन्होंने कहा, "हालांकि, भारत इसे द्विपक्षीय भी नहीं मानता है और इसे अपना आंतरिक मामला बताता है।"(आईएएनएस)
अबू धाबी, 23 अक्टूबर | रॉयल चैलेंजर्स बेंगलोर के कप्तान विराट कोहली ने कोलकाता के खिलाफ खेले गए मैच में उस समय दो रन भागे जब टीम को जीतने के लिए सिर्फ एक रन की जरूरत थी और इस बात पर कोहली ट्विटर की दुनिया में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। दोनों टीमों के बीच बुधवार को खेले गए मैच में बेंगलोर को जीत के लिए सिर्फ 85 रन बनाने थे।
एक यूजर ने ट्वीट किया, "जब जीत को सिर्फ एक रन की जरूरत थी विराट कोहली ने दो रन भागे। दो रनों के प्रति उनका प्यार शानदार है।"
एक और यूजर ने लिखा, "विराट कोहली को दो रन भागने की आदत है। वो तब भी दो रन चाहते हैं जब जीतने को एक रन चाहिए होता है।"
एक और ट्वीट में लिखा, "विराट कोहली और दो रन की प्रेम कहानी से बेहतर कोई कहानी बताओ।"(आईएएनएस)


