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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 22 दिसंबर। अविभाजित मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और उत्तरप्रदेश के राज्यपाल रह चुके वरिष्ठ कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा को मंगलवार को राजधानी रायपुर के राजीव भवन में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सहित मंत्रिपरिषद के सदस्यों, संसदीय सचिवों, विधायकों, जनप्रतिनिधियों ने श्रद्धांजलि अर्पित की। अपने नेता के अंतिम दर्शन के लिए लोगों का तांता लगा रहा। मुख्यमंत्री श्री बघेल और प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम स्वर्गीय मोतीलाल वोरा की पार्थिव देह को कांधा देकर रथ तक ले गए और दुर्ग के लिए रवाना किया।

-रजनीश कुमार
चंद्रदेव सिंह 2004 में बिहार के औरंगाबाद में हाई स्कूल के हेडमास्टर से रिटायर हुए.
1965 में इन्होंने जब नौकरी जॉइन की थी तब इनकी सैलरी प्रति महीने 90 रुपए थी और गेहूं की कीमत थी प्रति क्विंटल 80 रुपए. 2004 में जब रिटायर हुए तो इनकी सैलरी 31 हज़ार थी और गेहूं की क़ीमत 700 रुपए प्रति क्विंटल. यानी सैलरी क़रीब 4000 गुना बढ़ी लेकिन गेहूं की कीमत क़रीब 10 गुना ही बढ़ी.
चंद्रदेव सिंह बिहार में खेती-किसानी के संकट को समझाने के लिए अपना ही उदाहरण देते हैं. वो कहते हैं कि अनाज की क़ीमत उनकी सैलरी की गति से नहीं बढ़नी चाहिए लेकिन कम से कम किसानों को इतना तो मिले कि लागत निकल जाए और अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए क़र्ज़ नहीं लेना पड़े. चंद्रदेव सिंह कहते हैं कि बिहार में अनाज और भूसे के भाव में कोई फ़र्क़ नहीं है.
मोदी सरकार के नए कृषि क़ानून का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि जो काम नरेंद्र मोदी ने प्रधानमत्री बनने के बाद अब किया है उसे नीतीश कुमार ने 14 साल पहले ही कर दिया था.
नीतीश कुमार ने 2005 में मुख्यमंत्री बनने के एक साल बाद ही बिहार में एपीएमसी यानी एग्रीक्लचर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी ख़त्म कर दिया था.
मतलब अभी तीन नए कृषि क़ानूनों के तहत केंद्र सरकार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी से बाहर अपनी उपज को बेचने की जो मंज़ूरी अभी दे रही है वो बिहार में 2006 से ही लागू है. .
नीतीश कुमार ने मंडी सिस्टम को ख़त्म कर दिया था. कहा जाता है कि इसका असर किसानों पर बहुत अच्छा नहीं हुआ जबकि उस वक़्त इसे कृषि सुधार के तौर पर देखा गया था. किसान बिहार में निजी व्यापारियों को अपना अनाज बेचते हैं लेकिन उनके लिए लागत निकालना भी चुनौती है.
जब नीतीश कुमार ने ये फ़ैसला लिया तो बिहार में कोई विरोध-प्रदर्शन नहीं हुआ था. तब कहा गया कि किसानों में जागरूकता नहीं थी और इस वजह से लोग समझ नहीं पाए. इसके अलावा बिहार में 97 फ़ीसदी छोटी जोत वाले किसान हैं और उनके पास बेचने के लिए बहुत अनाज नहीं बचता है.
भारत के उपभोक्ता मामले और खाद्य मंत्रालय के अनुसार जून 2020 में सरकार की अलग-अलग एजेंसियों ने 389.92 लाख मिट्रिक टन गेहूँ की ख़रीदारी की इसमें बिहार का गेहूं महज़ पाँच हज़ार मिट्रिक टन था जो कि पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की तुलना में न के बराबर है.
पटना यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर रहे नवल किशोर चौधरी कहते हैं, ''बिहार में छोटी जोत वाले किसान ज़्यादा हैं. यहाँ अनाज का सरप्लस उत्पादन नहीं होता है. 97 फ़ीसदी यहाँ वैसे किसान हैं जो अनाज अपने परिवार के खाने से ज़्यादा पैदा नहीं कर पाते हैं क्योंकि सीमित जम़ीन है. ऐसे में नीतीश कुमार ने जब सरकारी मंडियों को ख़त्म किया तो इसका किसानों पर बहुत असर नहीं पड़ा. बिहार में लोग अनाज बेचने से ज़्यादा खाने के लिए उगाते हैं. या फिर यूं कहें कि खाने से ज़्यादा नहीं उगा पाते हैं.''
एनके चौधरी कहते हैं कि बिहार में खेती-किसानी की समस्या पंजाब से बिल्कुल अलग है.

photo by barkhaa dutt, twitter
वो कहते हैं, ''पंजाब की खेती पूंजीवादी है जबकि बिहारी की खेती-किसानी अर्द्ध-सामंती है. पंजाब में उत्पादन का एकमात्र लक्ष्य है मुनाफ़ा कमाना. मुनाफ़े के लालच का असर वहाँ की मिट्टी और भूजल स्तर पर भी पड़ा है. बिहार में खेती की असली समस्या भूमि का स्वामित्व, सिंचाई, तकनीक, श्रम, बाढ़ और सूखा है. बिहार की खेती वहां के किसानों के लिए घाटे का सौदा इसलिए है क्योंकि यहाँ बुनियादी खेती करने वालों के पास ज़मीन नहीं है, सिंचाई की व्यवस्था नहीं है और बाढ़-सूखा को लेकर कोई तैयारी नहीं है.''
प्रोफ़ेसर चौधरी बिहार की खेती-किसानी को अर्द्ध सामंती कहने की वजह बताते हुए कहते हैं क्योंकि यहाँ भूमि पर मालिकाना हक़, श्रम को नियंत्रित करने की शक्ति और आर्थिक क्षमता एक ही वर्ग के पास है.
पटना स्थित एनके सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर कहते हैं कि अगर प्रधानमंत्री की बात सही होती कि कृषि क़ानून से किसानों की हालत अच्छी हो जाएगी तो बिहार में पिछले 14 सालों में किसानों की हालत बदतर क्यों हुई?
डीएम दिवाकर कहते हैं, ''बिहार में धान एक हज़ार रुपए प्रति क्विंटल बिक रहा है. देश भर में 94 फ़ीसदी किसान अपना अनाज मंडी से बाहर ही बेच रहे हैं. इन्हें कोई एमएसपी नहीं मिलता. ऐसे में तो इनकी हालत अच्छी हो जानी चाहिए थी.
"बिहार की खेती-किसानी की असली समस्या ये नहीं है कि उनके लिए बाज़ार नहीं है बल्कि समस्या ये है कि यहां के किसानों के पास भूस्वामित्व नहीं है, बाढ़ और सूखा को लेकर सरकार की कोई योजना नहीं है और सिंचाई की मुकम्मल व्यवस्था नहीं है. मैं ये नहीं कह सकता कि 2006 से पहले बिहार में किसानों की स्थिति अच्छी थी. उसके पहले भी बहुत बुरी थी लेकिन प्रधानमंत्री दावा कर रहे हैं कि कृषि क़ानून से किसानों की हालत सुधर जाएगी तो ये बिहार में पिछले 14 सालों से नहीं हो पाया.''
अरविंद पनगढ़िया मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में नीति आयोग के उपाध्यक्ष थे. वो अभी कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और एशियन डेवलपमेंट बैंक के चीफ़ इकनॉमिस्ट भी रहे हैं. अरविंद पनगढ़िया ने मोदी सरकार के कृषि क़ानूनों का समर्थन किया है. उन्हें लगता कि नीतीश कुमार ने बिहार को एपीएमसी से बाहर किया तो उसका असर वहाँ की कृषि पर सकारात्मक पड़ा.
अरविंद पनगढ़िया ने 19 दिसंबर को टाइम्स ऑफ इंडिया में एक लेख लिखा और बताया कि एपीएमएसी से बाहर होने वाले राज्यों में कृषि वृद्धि दर बढ़ गई.
पनगढ़िया ने अपने लेख में लिखा है, ''प्रधानमंत्री वाजपेयी ने पहली बार इसकी शुरुआत मॉडल-एपीएमसी एक्ट, 2003 से की थी. इसके बाद की सभी केंद्र सरकारों ने इन सुधारों को प्रोत्साहित किया. 20 राज्यों ने एपीएमसी एक्ट में संशोधन किया. इनमें से 16 राज्यों ने एक क़ानून लागू किया जिसमें कई और चीज़ें जोड़ी गईं. बिहार ने तो 2006 में एपीएमसी से ख़ुद को अलग कर लिया.''
''आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात और मध्य प्रदेश ने मॉडल एक्ट को अपनाया और इसका नतीजा कृषि वृद्धि दर में भी देखने को मिला. 2006-07 और 2018-19 के बीच इन राज्यों में औसत कृषि वृद्धि दर क्रमशः 7.1%, 5.3%, 3.9% और 6.8% रही जबकि पंजाब में वृद्धि दर महज़ 1.8% रही. कृषि क़ानून की आलोचना करने वाले बिहारी किसानों की ग़रीबी और पंजाबी किसानों की अमीरी के लिए एपीएमसी एक्ट को ज़िम्मेदार बता रहे है. इनका कहना है कि बिहारी किसान इसलिए ग़रीब हुए क्योंकि वहाँ की सरकार ने एपीएमसी एक्ट से ख़ुद को अलग कर लिया.''
पनगढ़िया कहते हैं, ''कृषि में उच्च वृद्धि दर के बावजूद बिहारी किसान पंजाबी किसानों की तुलना में इसलिए ग़रीब हैं क्योंकि बिहारी किसान पहले से ही बहुत ग़रीब थे और उन्होंने अपनी शुरुआत बहुत निचले स्तर से की है. 1992-93 तक पंजाब सकल घरेलू उत्पाद में भारत के सभी राज्यों में दूसरे नंबर था जो 2018-19 में दसवें नंबर पर आ गया.
अरविंद पनगढ़िया के इस तर्क को डीएम दिवाकर सिरे से ख़ारिज करते हैं. वो कहते हैं कि कृषि वृद्धि दर बढ़ने का मतलब ये क़तई नहीं है कि उसका फ़ायदा किसानों को मिला.
दिवाकर कहते हैं, ''बिहार में 20 से ज़्यादा ऐसे ज़िले हैं जहां लोगों की प्रति व्यक्ति आय हर साल 10 हज़ार रुपए से भी कम है जबकि पटना में प्रति व्यक्ति आय 65 हज़ार रुपए हैं. नालंदा में अच्छी फसल हुई इसका मतलब ये नहीं है कि पूरे बिहार में अच्छी फसल हुई. ग्रोथ का बेस इयर क्या है ये मायने रखता है. जहाँ ज़ीरो से शुरुआत होगी वहाँ प्रतिशत में डेटा ख़ूब बड़ा दिखता है.''

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एनके चौधरी कहते हैं कि बिहार की खेती-किसानी की समझ के लिए पनगढ़िया को बिहार आकर देखना होगा.
वो कहते हैं, ''पनगढ़िया कोलंबिया यूनिवर्सिटी से बिहार के किसानों के संकट को नहीं समझ सकते. बिहार और पंजाब के किसानों में जम़ीन आसमान का फ़र्क़ है. पंजाब के किसान इस बात के लिए लड़ रहे हैं कि मार्केट पर कंट्रोल विक्रेता का हो या ख़रीदार का. मोदी सरकार के क़ानून से बाज़ार पर नियंत्रण बड़े ख़रीदारों का हो जाएगा और एमएसपी जैसी व्यवस्था बिना मारे मर जाएगी. वहीं बिहार के किसान तो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. यहां तो जो काम आज़ादी के बाद हो जाने चाहिए थे वो अब तक नहीं हुए हैं.''
पनगढ़िया ने लिखा है, ''जो कह रहे हैं कि इस क़ानून से निजी कंपनियों को किसानों का शोषण करने की छूट मिल जाएगी उन्हें बताना चाहिए ये कैसे होगा? शोषण निजी कंपनियाँ करेंगी या एपीएमसी के भारी-भरकम एजेंट कर रहे हैं जो थोक होलसेलर्स मिले होते हैं और बिना कोई परामर्श के क़ीमत तय करते हैं. इसके साथ ही वो भारी कमीशन भी खाते हैं. ये तर्क दे रहे हैं कि कॉर्पोरेट घराना एपीएमसी मंडियों को ख़त्म कर देगा और फिर किसानों से वे औने-पौने दाम पर अनाजों की ख़रीदारी करेंगे. अर्थशास्त्री रमेश चाँद और अशोक गुलाटी जैसे अर्थशास्त्रियों ने बताया कि नेस्ले जैसी कंपनियाँ सालों से सरकारी सहकारी संगठनों के साथ मिलकर छोटे दूध उत्पादकों से दूध ख़रीद रही हैं. इन्होंने दूध उत्पादकों का शोषण करने के बजाय उनके दूध की माँग बढ़ाने और मार्केट को बड़ा बनाने में मदद की.''
इंडिया टुडे हिन्दी पत्रिका के संपादक और आर्थिक मामलों के जानकार अंशुमान तिवारी पनगढ़िया के इस तर्क से सहमत नहीं हैं.
वो कहते हैं, ''पनगढ़िया को पता होना चाहिए कि भारत में जिन पशुपालकों से दूध ख़रीदे जा रहे हैं उन्हें कोई अच्छी क़ीमत नहीं मिल रही है. लेकिन नेस्ले जैसी कंपनियाँ डेयरी उत्पाद मोटी क़ीमत पर बेच रही हैं. भारत में पैक्ड दूध विदेशों की तुलना में महंगा है. मतलब दूध का मार्केट बढ़ा लेकिन उसका फ़ायदा न तो दुग्ध उत्पादकों को मिल रहा है और न ही उपभोक्ताओं को. फ़ायदा बड़े कॉर्पोरेट घराने ले रहे हैं और यही डर इस कृषि क़ानून से भी है.''
तिवारी कहते हैं कि भारत में दूध का कारोबार अब भी सहकारी संस्थाओं के ज़रिए हो रहा है.
वो कहते हैं, ''अगर भारत में न्यूज़ीलैंड के डेयरी उत्पाद आ जाएं तो यहां के उपभोक्ताओं को फ़ायदा होगा. संभव है कि मार्केट में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी तो यहाँ के पशुपालकों को भी फ़ायदा हो लेकिन सरकार ऐसा नहीं होने दे रही. भारत ने आरसीईपी इसलिए जॉइन नहीं किया कि भारत का डेयरी उद्योग चौपट हो जाएगा. ऐसे में सवाल उठता है कि आपने अपने डेयरी उद्योग को अब तक ऐसा क्यों नहीं बनाया कि वो विदेशी कंपनियों को टक्कर दे सकें.''
मोदी सरकार के कृषि क़ानून का समर्थन करते हुए अरविंद पनगढ़िया ने कांग्रेस समर्थित अर्थशास्त्रियों पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि राजनीतिक पार्टियों का रुख़ तो समझ में आता है लेकिन जिन अर्थशास्त्रियों ने यूपीए सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार रहते हुए कृषि में नए बदलावों का समर्थन किया था वो भी अब कृषि क़ानून का विरोध कर रहे हैं.
हालाँकि कांग्रेस नेता इस पर कई बार सफ़ाई दे चुके हैं. पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम भी कह चुके हैं कि उनकी सरकार इस तरह के कृषि क़ानून के पक्ष में कभी नहीं थी.
अरविंद पनगढ़िया ने मनमोहन सिंह सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे कौशिक बासु और रिज़र्व बैंक के पूर्व अध्यक्ष रघुराम राजन पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि सरकार में रहते हुए इन दोनों अर्थशास्त्रियों ने नए कृषि क़ानून की वकालत की थी.
अरविंद पनगढ़िया को अर्थशास्त्री कौशिक बासु ने जवाब दिया है. इन्होंने लिखा है कि भारतीय कृषि में सुधार की ज़रूत है लेकिन छोटे किसानों की आजीविका की क़ीमत पर नहीं. कौशिक बासु ने ट्वीट कर कहा है, ''हमें राजनीति किनारे रख देनी चाहिए और नए सिरे से क़ानून बनाने पर विचार करना चाहिए, जिसमें व्यापक पैमाने पर विमर्श हो.''
अरविंद पनगढ़िया के जवाब में कौशिक बासु ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है, ''ये सही बात है कि मैंने और रघुराम राजन ने कहा था कि भारत के कृषि क़ानून पुराने पड़ गए हैं और एपीएमसी एक्ट में सुधार की ज़रूरत है. किसानों को विकल्प देने की ज़रूरत है लेकिन उससे पहले हमें ये सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि छोटे किसानों को शोषण से बचाया जा सके. मुक्त बाज़ार में छोटे किसानों की जो मुश्किलें हैं उनको गंभीरता से देखने की ज़रूरत है.''
''सरकार ने इसकी कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं है जिससे किसानों के शोषण को रोका जा सकेगा. एपीएमसी एक्ट में वर्तमान संशोधन बहुत प्रभावी नहीं है. इस सुधार में बड़े कॉर्पोरेट घरानों को व्यापक पैमाने पर स्टोर करने की अऩुमति दे दी गई है. इससे बड़े कॉर्पोरेट घराने सामने आएंगे और स्टोर व्यापक पैमाने पर करेंगे. इसके मार्केट पर इनका नियंत्रण बढ़ेगा. अगर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में किसानों के साथ किसी भी तरह का कोई विवाद होता है कि उनके मसले को सुलझाने के लिए कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं है.'' (bbc.com)
अभी कुछ महीने पहले अगस्त के पहले हफ्ते में ‘छत्तीसगढ़’ के संपादक सुनील कुमार ने छत्तीसगढ़ के कुछ नेताओं के बारे में अखबार के इंटरनेट संस्करण पर अपने संस्मरण लिखे थे। इनमें उन नेताओं के समग्र जीवन की अधिक बातें नहीं थीं, महज खुद के संपर्क की बातें थीं। इनमें दो किस्तों में मोतीलाल वोरा के बारे में भी लिखा गया था। उसे हम आज यहां प्रकाशित कर रहे हैं-संपादक
कांग्रेस पार्टी के छत्तीसगढ़ के सबसे बुजुर्ग नेता मोतीलाल वोरा एक बरगद की तरह बूढ़े हैं, और बरगद की तरह ही उनका तजुर्बा फैला हुआ है। भला और कौन ऐसे हो सकते हैं, जो राजस्थान से आकर छत्तीसगढ़ में बसे हों, और यहां के कांग्रेस के इतने बड़े नेता बन जाएं कि उन्हें अविभाजित मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया जाए, केन्द्रीय मंत्री बनाया जाए, और उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य का राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल बनाया जाए। वोराजी एक अद्भुत व्यक्तित्व हैं, और छत्तीसगढ़ी में एक कहावत है जो उनके बारे में कई लोग कहते हैं, ऐड़ा बनकर पेड़ा खाना।
मोतीलाल वोरा ने अपनी कामकाजी जिंदगी की शुरूआत रायपुर की एक बस कंपनी में काम करते हुए की थी। जैसा कि पहले किसी भी परंपरागत कारोबार में होता था, हर कर्मचारी को हर किस्म के काम करने पड़ते थे, न तो उस वक्त अधिक किस्म के ओहदे होते थे, और न ही लोगों को किसी काम को करने में झिझक होती थी। मुसाफिर बस चलाने वाली इस कंपनी में वोराजी कई किस्म के काम करते थे। लेकिन उनकी सरलता की एक घटना खुद उन्हें याद नहीं होगी।
यह बात मेरे बचपन की है, जिस वक्त हमारे पड़ोस में, बसों को नियंत्रित करने वाले आरटीओ के एक अफसर रहते थे। उनके घर पर मेरा डेरा ही रहता था, लेकिन 5-7 बरस की उस उम्र की अधिक यादें नहीं है, लेकिन बाद में पड़ोस के चाचाजी की बताई हुई बात जरूर याद है। उनके घर एक सोफा की जरूरत थी, और सरकारी विभागों के प्रचलन के मुताबिक आरटीओ अधिकारी के घर सोफा पहुंचाने का जिम्मा इस बस कंपनी पर आया था। ठेले पर सोफा लदवाकर किसी के साथ स्कूटर पर बैठकर बस कंपनी के कर्मचारी मोतीलाल वोरा पहुंचे और सोफा उतरवाकर, घर के भीतर रखवाकर लौटे। यह बात आई-गई हो गई, वक्त के साथ-साथ वोराजी राजनीति में आए, कांग्रेस में आए, विधायक बने, और अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनाए गए। इस बीच हमारे पड़ोस के चाचाजी बढ़ते-बढ़ते प्रदेश के एक सबसे बड़े संभाग के आरटीओ बने। लेकिन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा जब उनके शहर के दौरे पर पहुंचते थे, तो वे या तो छुट्टी ले लेते थे, या सामने पडऩे से बचने का कोई और जरिया निकाल लेते थे। ऐसा नहीं कि वोराजी को आरटीओ का कामकाज समझता नहीं था, लेकिन रायपुर के उस वक्त का सोफा इस वक्त झिझक पैदा कर रहा था, और चाचाजी उनके सामने नहीं पड़े, तो नहीं पड़े।
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मोतीलाल वोरा कुछ असंभव किस्म के व्यक्ति हैं। वे बहुत सीधे-सरल भी हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी के दाएं हाथ की तरह इतने बरसों से बने रहने के लिए सिधाई, और सरलता से परे भी कई हुनर लगते हैं, जिनमें से कुछ तो वोराजी के पास होंगे ही। प्रदेशों के कांग्रेस संगठनों की बात करना ठीक नहीं होगा, लेकिन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बारे में यह कहा जाता है कि इसका यह अनोखा सौभाग्य रहा कि इसके कोषाध्यक्ष ईमानदार रहे। मोतीलाल वोरा ने कांग्रेस कोषाध्यक्ष रहते हुए हजारों करोड़ रूपए देखे होंगे, लेकिन उन पर किसी बेईमानी का कोई लांछन कभी नहीं लगा। और तो और अभी दो चुनाव पहले जब उनका बेटा अरूण दुर्ग से चुनाव लड़ रहा था, और इस सदी में चुनाव के जिन खर्चों की परंपरा मजबूत हो चुकी है, उन खर्चों के लिए आखिरी के दो-तीन दिनों में उम्मीदवारों को पार्टी से पैसा मिलता है। मोतीलाल वोरा ने प्रदेश के सभी कांग्रेस उम्मीदवारों को जो पैसा भेजा था, वही पैसा अरूण वोरा को भी मिला था। पता नहीं क्यों उस चुनाव में मोतीलाल वोरा ने हाथ खींच लिया था, और मतदान के दो दिन पहले का पैसा नहीं पहुंचा, और वह भी एक वजह थी जो अरूण वोरा चुनाव हार गए थे।
पिछले 25-30 बरसों में दो-चार बार मेरा वोराजी के दुर्ग घर पर जाकर मिलना हुआ है। लकड़ी का वही पुराना सोफा, और कमरे में प्लास्टिक की 10-20 कुर्सियों की थप्पी लगी हुई थी। कोई शान-शौकत नहीं बढ़ी, कोई खर्च भी नहीं बढ़े। ताकत की जितनी कुर्सियों पर वोराजी रहे, और कांग्रेस पार्टी के हजारों करोड़ को उन्होंने यूपीए के 10 बरसों में देखा, कई आम चुनाव निपटाए, पूरे देश की विधानसभाओं के चुनाव निपटाए, लेकिन उनके परिवार का रहन-सहन ज्यों का त्यों बना रहा। आज के जमाने में यह सादगी छोटी बात नहीं है, और शायद इसी के चलते कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी के करीब और कोई विकल्प नहीं बन पाया।
15-16 बरस पहले जब मैंने अखबार की नौकरी छोड़ी, और इस अखबार, ‘छत्तीसगढ़’, को शुरू करना तय किया, तो कुछ विज्ञापनों की कोशिश करने के लिए दिल्ली गया। उस वक्त दिल्ली के मेरे एक दोस्त, संदीप दीक्षित, पूर्वी दिल्ली से कांग्रेस के सांसद बने थे, और अपनी मां शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री निवास से अलग रहने लगे थे। उनकी जिद पर मैं उनके घर पर ही ठहरा, और दिल्ली आने की वजह बताई, यह भी बताया कि कांग्रेस मुख्यालय में आज वोराजी से मुलाकात तय है। संदीप ने कहा कि वहां तो मजमा लगा होगा क्योंकि पंजाब विधानसभा चुनाव की टिकटें तय होना है, और चुनाव समिति में वोराजी भी हैं। इसके साथ ही संदीप ने आधे मजाक और आधी गंभीरता से कहा- आप भी कहां विज्ञापनों के चक्कर में पड़े हैं, पंजाब में एक-एक टिकट के लिए लोग पांच-पांच करोड़ रूपए देने को तैयार खड़े हैं, आप वोराजी से किसी एक को टिकट ही दिला दीजिए, आपका प्रेस खड़ा हो जाएगा।
जब मैं वोराजी से मिलने एआईसीसी पहुंचा, तो सचमुच ही सारे बरामदों में पंजाब ही पंजाब था। लेकिन बाहर सहायक के पास मेरे नाम की खबर थी, मुझे तुरंत भीतर पहुंचाया गया, और वैसी मारामारी के बीच भी वोराजी ने चाय पिलाई, पान निकालकर अपने हाथ से दिया, और कांग्रेस प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों के नाम विज्ञापनों के लिए चिट्ठियां टाईप करवाईं, उनकी एक-एक कॉपी मुझे भी दी कि मैं जाकर उनसे संपर्क कर लूं।
चिट्ठी आसान होती है, लेकिन उस वक्त के उतने कांग्रेस प्रदेशों में जाना अकेले इंसान के लिए मुमकिन नहीं होता, इसलिए वे सारी चिट्ठियां मेरे पास रखी रह गईं, और भला किस प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक चिट्ठी के आधार पर शुरू होने वाले अखबार के लिए विज्ञापन मंजूर करने का समय हो सकता है? बात आई-गई हो गई, लेकिन वोराजी ने पूरा वक्त दिया, और उन्हें जब मैंने संदीप दीक्षित की कही बात बताई तो वे हॅंस भी पड़े। टिकट दिलवाकर पैसे लेने या दिलवाने का काम वे करते होते, तो इतने बरसों में न बात छुपती, न पैसा छुपता।
वोराजी से मेरा अच्छा और बुरा, सभी किस्म का खूब तजुर्बा रहा। अच्छा ही अधिक रहा, और बुरा तो नाममात्र का था।
जब मोतीलाल वोरा अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब मैं पिछले अखबार में रिपोर्टिंग करता था। वोराजी तकरीबन हर शनिवार-इतवार रायपुर-दुर्ग आ जाते थे, और मैं दोनों जगहों पर उनके कई कार्यक्रमों में चले जाता था, और रायपुर की सभी प्रेस कांफ्रेंस में भी। ऐसी ही एक प्रेस कांफ्रेंस में मैंने उनसे पूछा- क्या रायपुर में आपके किसी रिश्तेदार को अफसर परेशान कर रहे हैं?
वे कुछ हक्का-बक्का रह गए, सवाल अटपटा था, और मुख्यमंत्री अपने रिश्तेदारों के बारे में ऐसी अवांछित बात सुनने की उम्मीद भी नहीं कर सकता था। उन्होंने इंकार किया।
लेकिन मेरे पास उससे अधिक अवांछित अगला सवाल था, मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्हें उनके अफसरों से ऐसी शिकायत मिली है कि उनके (वोराजी के) रिश्तेदार उन्हें परेशान करते हैं?
इस पर वे कुछ खफा होने लगे लेकिन उनकी सज्जनता ने उनकी आवाज को फिर भी काबू में रखा, और उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी कोई शिकायत नहीं मिली।
मैं उन दिनों रिपोर्ट लिखते हुए पत्रकारवार्ता के सवाल-जवाब भी बारीकी से सवाल-जवाब की शक्ल में लिखता था, और अपने पूछे सवालों के साथ यह भी खुलासा कर देता था कि ये सवाल इस संवाददाता ने पूछे थे, और उनका यह जवाब मिला था।
सवाल-जवाब की शक्ल में छपी प्रेस कांफ्रेंस की बात आई-गई हो गई। इसके कुछ या कई हफ्ते बाद उस अखबार के प्रधान संपादक मायारामजी सुरजन रायपुर लौटे। मुझे भनक लग गई थी कि वे किसी बात पर मुझसे खफा हैं, और मेरी पेशी हो सकती है। दफ्तर पहुंचते ही उन्होंने मुझे बुलाया, और कहा कि भोपाल में वोराजी ने उन्हें मेरी शिकायत की है। और यह कहकर शिकायत की है कि सुनील कुमार मुझसे (वोराजी से) इस टोन में बात करते हैं कि मानो वे मेरे मालिक हों। बाबूजी (मायारामजी) ने बताया कि वोराजी ने चाय पर बुलाकर अखबार की कतरन उनके सामने रख दी थी कि मैंने प्रेस कांफ्रेंस में ऐसे-ऐसे सवाल किए थे। बाबूजी ने उनसे यह साफ किया कि हमारे अखबार के रिपोर्टरों को यह हिदायत दी जाती है कि वे सवाल तैयार करके ही किसी प्रेस कांफ्रेंस में जाएं, और सवाल जरूर पूछें, महज डिक्टेशन लेकर न लौटें। इसलिए सुनील ने सवाल जरूर किए होंगे, लेकिन इन सवालों में कुछ गलत तो लग नहीं रहा।
अब यहां पर एक संदर्भ को साफ करना जरूरी है, वोराजी के एक रिश्तेदार और नगर निगम के एक कर्मचारी, वल्लभ थानवी बड़े सक्रिय कर्मचारी नेता थे। वहां के बड़े अफसरों से उनकी तनातनी चलती ही रहती थी। कुछ दिन पहले ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि म्युनिसिपल के बड़े अफसर उन्हें इसलिए परेशान करते हैं कि वे मुख्यमंत्री के रिश्तेदार हैं। इसके जवाब में निगम-प्रशासक या आयुक्त ने कहा था कि मुख्यमंत्री के रिश्तेदार होने की वजह से वल्लभ थानवी उन्हें परेशान करते हैं। इसी संदर्भ में मैंने प्रेस कांफ्रेंस में वोराजी से सवाल किया था।
लेकिन मुख्यमंत्री तो मुख्यमंत्री होते हैं, उन्हें अगर कोई बात बुरी लगी तो अखबार के मुखिया से शिकायत का उनका एक जायज हक बनता था। और बहुत लंबे परिचय की वजह से उन्होंने बाबूजी को बुलाकर ऐसी कुछ और कतरनों की भी फाईल सामने धर दी थी।
मुझे बाबूजी के शब्द अच्छी तरह याद हैं कि उन्होंने इन्हें पढकऱ वोराजी से कहा था कि उन्हें तो इसमें कोई बात आपत्तिजनक नहीं लग रही है, जहां तक मेरे बोलने के तरीके का सवाल है, तो मुख्यमंत्री का भला कौन मालिक हो सकता है। उन्होंने कहा कि सुनील के बात करने का तरीका कुछ अक्खड़ है, और वे मुझे उनसे (वोराजी से) बात करने भेजेंगे। वे तो चाय पीकर लौट आए थे, लेकिन मुझे रायपुर में यह जानकारी देते हुए बाबूजी ने कहा कि जब वोराजी अगली बार रायपुर आएं तो उनसे जाकर मैं मिल लूं, और पूछ लूं कि वे किसी बात पर नाराज हैं क्या। न मुझे खेद व्यक्त करने का निर्देश मिला, और न ही माफी मांगने की कोई सलाह दी गई, कोई हुक्म दिया गया।
वोराजी का कोई रायपुर प्रवास हफ्ते भर से अधिक दूर तो होता नहीं था, वे यहां आए, और मैं सर्किट हाऊस में जाकर उनसे मिला। भीतर खबर जाते ही उन्होंने तुरंत बुला लिया, मैंने कहा- बाबूजी कह रहे थे कि आप मेरी किसी बात से नाराज हैं?
वोराजी ने हॅंसते हुए पास आकर पीठ थपथपाई, और कहा- अरे नहीं, कोई नाराजगी नहीं है। और क्या हाल है? कैसा चल रहा है?
मुख्यमंत्री की नाराजगी महज एक वाक्य कहने से इस तरह धुल जाए, ऐसा आमतौर पर होता नहीं है, लेकिन वोराजी की सज्जनता कुछ इसी तरह की थी। उन्हें मैंने मन में गांठ बांधकर रखते नहीं देखा है, और राजनीति के प्रचलित पैमानों पर उनकी सज्जनता अनदेखी नहीं रहती।
सोनिया-राहुल के साथ एक नाव में सवार छत्तीसगढ़ से अकेले वोरा
मोतीलाल वोरा के बारे में कल बात शुरू हुई, तो किसी किनारे नहीं पहुंच पाई। दरअसल उनके साथ मेरी व्यक्तिगत यादें भी जुड़ी हुई हैं, और उनके बारे में बहुत कुछ सुना हुआ भी है। फिर उनका इतना लंबा सक्रिय राजनीतिक जीवन है कि उनसे जुड़ी कहानियां खत्म होती ही नहीं।
जब वे अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो उन्हें हटाने के लिए कांग्रेस के भीतर के लोग लगातार लगे रहते थे। वैसे में माधवराव सिंधिया उनके संरक्षक बनकर दिल्ली दरबार में उन्हें बचाए रखते थे। इस बात में कुछ भी गोपनीय नहीं था, और हर हफ्ते यह हल्ला उड़ता था कि वोराजी को हटाया जाने वाला है। नतीजा यह था कि उस वक्त एक लतीफा चल निकला था कि वोराजी जब भी शासकीय विमान में सफर करते थे, तो विमान के उड़ते ही उसका वायरलैस बंद करवा देते थे। उसकी वजह यह थी कि उन्हें लगता था कि उड़ान के बीच अगर उन्हें हटाने की घोषणा हो जाएगी, तो पायलट उन्हें बीच रास्ते उतार न दे।
वोराजी का पांच साल का पूरा कार्यकाल ऐसी चर्चाओं से भरे रहा, और वे इसके बीच भी सहजभाव से काम करते रहे। सिंधिया को छत्तीसगढ़ के अनगिनत कार्यक्रमों में उन्होंने बुलाया, और उस वक्त के रेलमंत्री रहे माधवराव सिंधिया ने छत्तीसगढ़ के लिए भरपूर मंजूरियां दीं। उस वक्त अखबारनवीसी कर रहे लोगों को याद होगा कि इनकी जोड़ी को उस समय मोती-माधव या माधव-मोती एक्सप्रेस कहा जाता था। माधवराव सिंधिया परंपरागत रूप से अर्जुन सिंह के प्रतिद्वंदी थे, और छत्तीसगढ़ के शुक्ल बंधुओं से भी उनका कोई प्रेमसंबंध नहीं था। ऐसे में केन्द्र में ताकतवर सिंधिया को राज्य में मोतीलाल वोरा जैसे निरापद मुख्यमंत्री माकूल बैठते थे, और ताकत में वोराजी की सिंधिया से कोई बराबरी नहीं थी। नतीजा यह था कि ताकत के फासले वाले इन दो लोगों के बीच जोड़ीदारी खूब निभी।
मुख्यमंत्री रहने के अलावा जब वोराजी को राजनांदगांव संसदीय सीट से उम्मीदवार बनाया गया, तब उन्होंने चुनाव प्रचार में उसी अंदाज में मेहनत की, जिस अंदाज में वे मुख्यमंत्री रहते हुए रोजाना ही देर रात तक काम करने के आदी थे। इस संसदीय चुनाव प्रचार के बीच मैंने उनको इंटरव्यू करने के लिए समय मांगा तो उनका कहना था कि वे सात बजे चुनाव प्रचार के लिए राजनांदगांव से रवाना हो जाते हैं, और देर रात ही लौटते हैं। ऐसे में अगर मैं मिलना चाहता था, तो मुझे सात बजे के पहले वहां पहुंचना था। मैं स्कूटर से रायपुर से रवाना होकर दो घंटे में 7 बजे के पहले ही राजनांदगांव पहुंच गया, वहां वे एक तेंदूपत्ता व्यापारी के पत्ता गोदाम में बने हुए एक गेस्टरूम में सपत्नीक ठहरे थे, और करीब-करीब तैयार हो चुके थे।
वे मेरे तेवर भी जानते थे, और यह भी जानते थे कि उनके प्रति मेरे मन में न कोई निंदाभाव था, और न ही प्रशंसाभाव, फिर भी उन्होंने समय दिया, सवालों के जवाब दिए, और शायद इस बात पर राहत भी महसूस की कि मैंने अखबार के लिए चुनावी विज्ञापनों की कोई बात नहीं की थी। चुनाव आयोग के प्रतिबंधों के बाद चुनावी-विज्ञापन शब्द महज एक झांसा है, हकीकत तो यह है कि अखबार उम्मीदवारों और पार्टियों से सीधे-सीधे पैकेज की बात करते हैं। वह दौर ऐसे पैकेज शुरू होने के पहले का था, लेकिन यह आम बात है कि अखबारों के रिपोर्टर ही उम्मीदवारों से विज्ञापनों की बात कर लेते थे, कर लेते हैं, लेकिन वोराजी से न उस वक्त, और न ही बाद में कभी मुझे ऐसे पैकेज की कोई बात करनी पड़ी, और नजरों की ओट बनी रही।
वोराजी खुद भी एक वक्त कम से कम एक अखबार के लिए तो काम कर ही चुके थे, और उनके छोटे भाई गोविंदलाल वोरा छत्तीसगढ़ के एक सबसे बुजुर्ग और पुराने अखबारनवीस-अखबारमालिक थे, इसलिए वोराजी को हर वक्त ही छत्तीसगढ़ के मीडिया की ताजा खबर रहती थी, भोपाल में मुख्यमंत्री रहते हुए भी, और केन्द्र में मंत्री या राष्ट्रपति शासन में उत्तरप्रदेश को चलाते हुए। जितनी मेरी याददाश्त साथ दे रही है, उन्होंने कभी अखबारों को भ्रष्ट करने, या उनको धमकाने का काम नहीं किया। वह एक अलग ही दौर था।
मोतीलाल वोरा मुख्यमंत्री रहे, अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे, लेकिन छत्तीसगढ़ में वे अपने कोई सहयोगी नहीं बना पाए। दुर्ग में दो-चार लोग, और रायपुर में पांच लोग उनके नाम के साथ गिने जाते थे। रायपुर में तो उनके करीबी पांच लोगों की शिनाख्त इतनी जाहिर थी कि उन्हें पंच-प्यारे कहा जाता था। इन लोगों के लिए भी वोराजी कुछ जगहों पर मनोनयन से बहुत अधिक कुछ कर पाए हों, ऐसा भी याद नहीं पड़ता। लेकिन उनकी एक खूबी जरूर थी कि वे छत्तीसगढ़ के हजारों लोगों के लिए बिना देर किए सिफारिश की चिट्ठी लिखने को तैयार हो जाते थे।
यूपीए सरकार के दस बरसों में देश में उनका नाम बड़ा वजनदार था। मेरे एक दोस्त की बेटी मुम्बई के एचआर कॉलेज में ही दाखिला चाहती थी। उस कॉलेज में दाखिला बड़ा मुश्किल भी था। उनके साथ मैं वोराजी के पास दिल्ली गया, दिक्कत बताई, तो वे सहजभाव से सिफारिश की चिट्ठी लिखने को तैयार हो गए। हम लोगों को कमरे में बिठा रखा, चाय और पान से स्वागत किया, पीछे के कमरे में जाकर अपने टाईपिस्ट के पास खड़े रहकर चिट्ठी लिखवाई उसे मुम्बई कॉलेज में फैक्स करवाया, और फैक्स की रसीद के साथ चिट्ठी की एक कॉपी मुझे दी, और कॉलेज के संस्थापक मुंबई के एक बड़े बिल्डर हीरानंदानी से फोन पर बात करने की कोशिश भी की, लेकिन बात हो नहीं पाई।
चिट्ठी के साथ जब मैं अपने दोस्त और उनकी बेटी के साथ मुंबई गया, तो एचआर कॉलेज के बाहर मेला लगा हुआ था। उस भीड़ के बीच भी हमारे लिए खबर थी, और कुछ मिनटों में हम प्रिंसिपल के सामने थे। इन्दू शाहणी, मुंबई की शेरिफ भी रह चुकी थीं। उनकी पहली उत्सुकता यह थी कि मैं वोराजी को कैसे जानता हूं, उन्होंने सैकड़ों पालकों की बाहर इंतजार कर रही कतार के बाद भी 20-25 मिनट मुझसे बात की, जिसमें से आधा वक्त वे वोराजी और छत्तीसगढ़ के बारे में पूछती रहीं। सबसे बड़ी बात यह रही कि जिस दाखिले के लिए 10-20 लाख रूपए खर्च करने वाले लोग घूम रहे थे, वह वोराजी की एक चिट्ठी से हो गया। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि बाद में उन्होंने कभी चुनाव के वक्त या किसी और राजनीतिक काम से कोई खर्च बताया हो। वे उसे सज्जनता के साथ भूल गए, और दीवाली पर मेरे दोस्त मेरे साथ सिर्फ मिठाई का एक साधारण डिब्बा लेकर उनके घर दुर्ग गए, तो भी उनका कहना था कि अरे इसकी क्या जरूरत थी।
मोतीलाल वोरा राजनीति में लगातार बढ़ती चली जा रही कुटिलता के बीच सहज व्यक्ति थे। वे बहुत अधिक साजिश करने के लिए कुख्यात नेताओं से अलग दिखते थे, और अभी भी अलग दिखते हैं। उनकी पसंद अलग हो सकती है, लेकिन अपनी पसंद को बढ़ावा देने के लिए, या नापसंद को कुचलने के लिए वे अधिक कुछ करते हों, ऐसा कभी सुनाई नहीं पड़ा।
छत्तीसगढ़ में अभी कांग्रेस की सरकार बनी, तो दिल्ली से ऐसी चर्चा आई कि वोराजी की पहल पर, और उनकी पसंद पर ताम्रध्वज साहू को मुख्यमंत्री बनाना तय किया गया था, और इस बात की लगभग घोषणा भी हो गई थी, लेकिन इसके बाद भूपेश बघेल और टी.एस. सिंहदेव ने एक होकर, एक साथ लौटकर जब यह कह दिया कि वे ताम्रध्वज के साथ किसी ओहदे पर कोई काम नहीं करेंगे, तो ताम्रध्वज का नाम बदला गया, और भूपेश बघेल का नाम तय हुआ। ये तमाम बातें वैसे तो बंद कमरों की हैं, लेकिन ये छनकर बाहर आ गईं, और इनसे मोतीलाल वोरा और भूपेश बघेल के बीच एक दरार सी पड़ गई।
अभी जब छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के कांग्रेस उम्मीदवार तय होने थे, तब मोतीलाल वोरा से जिन्होंने जाकर कहा कि उन्हें राज्यसभा में रहना जारी रखना चाहिए, तो आपसी बातचीत में उन्होंने यह जरूर कहा था कि भूपेश बघेल उनका नाम होने देंगे? और हुआ वही, हालांकि यह नौबत शायद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के दरवाजे तक नहीं आई, और कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली में ही यह तय कर लिया कि वोराजी का उपयोग अब राज्यसभा से अधिक संगठन के भीतर है, और केटीएस तुलसी जैसे एक सीनियर वकील की पार्टी को इस मौके पर अधिक जरूरत है।
वोराजी का बहुत बड़ा कोई जनाधार कभी नहीं रहा, वे पार्टी के बनाए हुए रहे, और जनता के बीच अपने सीमित असर वाले नेता रहे। लेकिन उनके बेटों की वजह से कभी उनकी कोई बदनामी हुई हो, ऐसा नहीं हुआ, और राजनीति में यह भी कोई छोटी बात तो है नहीं। छत्तीसगढ़ की एक मामूली नौकरी से लेकर वे कांग्रेस पार्टी में उसके हाल के सबसे सुनहरे दस बरसों में सबसे ताकतवर कोषाध्यक्ष और पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के सबसे करीबी व्यक्ति रहे, आज भी हैं। आज दिन सुनहरे नहीं हैं, कांग्रेस पार्टी, सोनिया परिवार, और इन दोनों से जुड़ी हुई कुछ कंपनियां लगातार जांच और अदालती मुकदमों का सामना कर रही हैं, और उनमें मोतीलाल वोरा ठीक उतने ही शामिल हैं, ठीक उतनी ही दिक्कत में हैं, जितने कि सोनिया और राहुल हैं। किसी एक नाव पर इन दोनों के साथ ऐसे सवार होना भी कोई छोटी बात नहीं है, और रायपुर की एक बस कंपनी के एक मुलाजिम से लेकर यहां तक का लंबा सफर खुद मेरे देखे हुए बहुत सी और यादों से भरा हुआ है, लेकिन उनके बारे में बाकी बातें बाद में फिर कभी।
जब हम पर्यावरण पर अपने पदचिन्हों की बात करते हैं तो हमारा ध्यान घर के कचरे तक ही सीमित रहता है. लेकिन उस कचरे और प्रदूषण का क्या करें जो हमारे इस्तेमाल की चीजों को बनाने के दौरान पैदा होता है?
ज्यादातर लोगों को लगता है उन्हें मालूम कि कचरा क्या होता है. वो अपनी ब्रोक्कोली पर से उतारी गई पन्नी या उनका नया लैपटॉप जिस गत्ते के डब्बे में आया था उसी को कचरा समझते हैं. कुछ लोग यह भी समझते हैं कि वो लैपटॉप खुद जब किसी काम का नहीं रहेगा तब कचरा बन जाएगा. हर साल दुनिया में करीब दो अरब मीट्रिक टन कचरा पैदा होता है, लेकिन ये सिर्फ वो कचरा है जो हम देख सकते हैं.
डिजिटल टेक्नोलॉजी को बनाने के वैश्विक असर पर एक किताब के लेखक जॉश लेपॉस्की कहते हैं, "बतौर उपभोक्ता हमारा जिस कचरे से आमना सामना होता है, वो दुनिया के पूरे कचरे के सिर्फ दो से तीन प्रतिशत के बराबर है." दुनिया भर के कचरे का सबसे बड़ा हिस्सा हम जिन चीजों को खरीदते हैं उन्हें बनाने में होने वाले संसाधनों के इस्तेमाल, उत्पादन, लाने-ले जाने और बिजली उत्पादन में छिपा हुआ रहता है और इसका आसानी से पता नहीं लगाया जा सकता.
इलेक्ट्रॉनिक उपकरण इस तरह के कचरे के लिए विशेष रूप से जिम्मेदार हैं. यह दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ कचरे का स्त्रोत है और अदृश्य कचरे के सबसे बड़े स्त्रोतों में से एक है. लेपॉस्की बताते हैं, "इलेक्ट्रॉनिक्स से निकलने वाला अधिकतर कचरा और प्रदूषण उन उपकरणों के लोगों के पास पहुंचने से बहुत पहले निकल चुका होता है."
इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बनाने में खतरनाक रसायन और ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं और बहुत पानी भी बहाना पड़ता है, लेकिन ये सब आम उपभोक्ता को दिखाई नहीं देता है और इसे परिमाणित करना भी मुश्किल है. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में कई तरह के पुर्जे होते हैं जिनमें से अधिकतर दुनिया के अलग-अलग कोनों में बनते हैं और फिर उन्हें एक जगह लाकर जोड़ा जाता है.
बहुमूल्य धातुओं का खनन
मिसाल के तौर पर एक स्मार्टफोन के अंदर 62 धातु हो सकते हैं. एक आईफोन के कई पुर्जों में सोना, चांदी और पैलेडियम जैसे धातु भी होते हैं. इन धातुओं का मुख्य रूप से एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में उत्खनन होता है. इन्हें खदानों में से निकालना पड़ता है.
स्वीडन के कचरा प्रबंधन और रीसाइक्लिंग संगठन एवफॉल स्वेरिज ने हिसाब लगाया है कि एक स्मार्टफोन को बनाने में करीब 86 किलो और एक लैपटॉप को बनाने में लगभग 1,200 किलो अदृश्य कचरा निकलता है. इस अध्ययन की सह-लेखक एना करिन ग्रिपवॉल कहती हैं, "इसमें पत्थर, कंकड़ और धातु का मैल जैसी चीजें भी शामिल हैं. इसमें इस्तेमाल किए गए ईंधन और बिजली भी शामिल है, हालांकि खनन से संबंधित कचरे के सामने ये बहुत ही काम मात्रा का कचरा है."
सर्वे किए गए सभी उत्पादों में ये सबसे ज्यादा है. इन उत्पादों में एक किलो बीफ और कॉटन की एक जोड़ी पतलूनें भी शामिल हैं, जो चार किलो और 25 किलो कचरा निकालते हैं.
एक गंदा उद्योग
बहुमूल्य धातुओं के खनन, कटाई, ड्रिल करना, धमाके करना और यहां से वहां ले जाने में नुकसानदेह धातुओं वाली धूल उड़ सकती है. रसायन भी उड़ कर हवा में और आस पास के पानी के स्रोतों में मिल सकते हैं. अमेरिका के इंडियाना में पर्ड्यू विश्वविद्यालय में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर फू हाओ ने बताया, "कच्चे धातु को निकाल लेने के बाद, आपको कॉन्सेंट्रेटेड पदार्थों को अलग करना पड़ता है.
इन्हें अलग करना मुश्किल होता है, इसलिए आपको रसायन और ऊंचे तापमान का इस्तेमाल करना पड़ता है." उन्होंने यह भी बताया कि यह जब बड़े स्तर पर करना हो तो यह विशेष रूप से जटिल हो जाता है. ठीक से निगरानी के बिना ये विषैले अंश भूजल को दूषित कर सकते हैं, घाटियों और नदी-नालों में उतर सकते हैं और मिट्टी, पौधों और पशुओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इस तरह ये इंसानी आबादी के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन सकते हैं.
अमेरिका के डेलावेर विश्वविद्यालय में ऊर्जा और पर्यावरण के प्रोफेसर सलीम अली का कहना है कि इसका यह मतलब नहीं है कि बहुमूल्य धातुओं का खनन हमेशा पर्यावरण के लिए बुरा ही होता है. उन्होंने कहा, "चुनौती इसे इस तरह से करने में है जिससे पर्यावरण को नुकसान ना पहुंचे. आपको ऐसे तरीके ढूंढने हैं जिनसे ये विषैले पदार्थ ग्राउंडवाटर सप्लाई में ना पहुंचे. इसके अलावा इन इलाकों में काम करने वाले लोगों को सुरक्षात्मक उपकरण दिए जाएं ताकि वो वाष्पशील पदार्थों को सूंघने से बच सकें."
अली का मानना है कि यह निवेश बढ़ा कर किया जा सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि एक और बेहतर उपाय यह है कि इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बनाने के लिए और ज्यादा नवीकरणीय ऊर्जा के स्त्रोतों का इस्तेमाल किया जाए.
अमेरिका से चीन, हांग कांग और फिर वापस
लेपॉस्की कहते हैं, "कुछ इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों को बनाने में जिन गैसों का इस्तेमाल होता है उनमें से कई "कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना ज्यादा शक्तिशाली होती हैं." इनमें स्क्रीनों को बनाने में इस्तेमाल की जाने वाली फ्लोरिनेटेड ग्रीनहाउस गैसें शामिल हैं. अब अधिकतर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उत्पादन चीन, हांग कांग, अमेरिका और दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में होता है.
अदृश्य कचरे का हिसाब लगाने में आने वाली मुश्किलों का एक कारण यह भी है कि विशेष रूप से इलक्ट्रोनिक जैसे कई आधुनिक उत्पादों की सप्लाई चेन लंबी और पेचीदा होती है. एप्पल 27 अलग अलग देशों में स्थित उसके चोटी के 200 सप्लायरों की सूची जारी करता है, लेकिन इनमें से अधिकतर सप्लायरों के ठिकाने ऐसे स्थानों पर हैं जहां विषैले प्रदूषकों पर नजर रखने वाले सार्वजनिक रजिस्टर नहीं है.
रिसाइकिल करने की सीमा
जहां तक उन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का सवाल है जिन्हें हम फेंक देते हैं, आजकल इनमें से सिर्फ 17.4 प्रतिशत इकट्ठा और रिसाइकिल किए जाते हैं. लेकिन लेपॉस्की का कहना है कि अगर सभी उपकरणों को भी सफलतापूर्वक रिसाइकिल कर लिया जाए तो भी उससे उत्पादन के समय पैदा हुए कचरे और प्रदूषण की भरपाई नहीं की जा सकती. वो कहते हैं कि इससे खनन के कचरे पर भी सिर्फ हल्का सा असर पड़ेगा.
चिली के रांकागुआ में मिनेरा वाले सेंट्रल माइनिंग कंपनी तांबे की एक खदान में से गंदा पानी एक झील में डाल रही है.
हां ई-वेस्ट के रिसाइकिल ना होने से समस्या का एक हिस्सा रेखांकित जरूर होता है. हाओ के अनुसार, "अगर आप इलेक्ट्रॉनिक्स को देखें, तो उन्हें फिर से इस्तेमाल करने या फिर से बनाने के लिए डिजाईन ही नहीं किया जाता है." एप्पल ने प्रण लिया है कि वो 2030 तक 100 प्रतिशत कार्बन न्यूट्रल हो जाएगी. कंपनी ने ई-वेस्ट को लेकर बढ़ रही चिंताओं को देखते हुए यह भी कहा है कि वो हर आईफोन के साथ इयरफोन और चार्जर नहीं बेचेगी.
उसने अपने उत्पादन में रिसाइकिल किए हुए पदार्थों के इस्तेमाल को बढ़ाने का भी वादा किया है. लेकिन हाओ का कहना है कि तकनीक में तेजी से बदलाव हो रहे हैं और इन्हें जटिल और मुश्किल से अलग करने वाले एक उपकरण में डालने से इन लक्ष्यों को हासिल करना एक चुनौती बन जाता है. वो कहते हैं कि आपका सेल फोन कुछ ही सालों में पुराना हो जाएगा और इस वजह से फिर से इस्तेमाल करना और फिर से बनाना लगभग असंभव हो जाता है.
- चार्ली शील्ड
भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी को बढ़ाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लीजन ऑफ मेरिट से सम्मानित किया गया है. राजदूत तरणजीत सिंह संधू ने पदक स्वीकार किया.
डॉयचे वैले पर आमिर अंसारी का लिखा-
प्रधानमंत्री मोदी को राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी को बढ़ाने में उनके नेतृत्व के लिए लीजन ऑफ मेरिट से सम्मानित किया गया है. वॉशिंगटन में अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट ओ' ब्रायन ने भारतीय राजदूत को मेडल सौंपा. लीजन ऑफ मेरिट एक शीर्ष सम्मान है जो किसी देश या सरकार के प्रमुख को दिया जाता है. मोदी को यह सम्मान उनके दृढ़ नेतृत्व, भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में उभारने के लिए गति देने, वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने और अमेरिका और भारत के बीच रणनीतिक साझेदारी को बढ़ाने के लिए दिया गया है. रॉबर्ट ओ' ब्रायन ने मेडल देने वाली तस्वीर ट्वीट कर लिखा, "राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लीजन ऑफ मेरिट से सम्मानित किया है. उन्होंने जिस तरह से भारत को वैश्विक मंच पर पहुंचाया है और भारत-अमेरिका के रिश्तों को मजबूत किया है उसके लिए ये सम्मान दिया गया है."
क्या है लीजन ऑफ मेरिट
यह मेडल अमेरिकी सेना के सदस्यों, विदेशी सैन्य सदस्यों और उन राजनीतिक हस्तियों को दिया जाता है, जिन्होंने उत्कृष्ट सेवाओं और उपलब्धियों का प्रदर्शन किया है. अमेरिकी संसद ने 20 जुलाई 1942 को इस मेडल की शुरुआत की थी. लीजन ऑफ मेरिट सर्वोच्च सैन्य पदकों में से एक है. गौरतलब है कि ट्रंप के कार्यकाल के दौरान दोनों देशों के बीच रिश्ते आगे बढ़े हैं और दोनों नेता एक साथ कार्यक्रम में भी नजर आ चुके हैं.
मोदी के अलावा इस बार ये सम्मान ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन और जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे को भी दिया गया है. ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ भी अमेरिका के रिश्ते बीते सालों में मजबूत हुए हैं. गौरतलब है कि अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया क्वाड सदस्य हैं जो कि चीन की रणनीति की काट के लिए बनाया गया है.
ब्रिटेन में तेजी से फैल रहे कोरोना वायरस के नए स्ट्रेन को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि इस पर काबू पाया जा सकता है. वैज्ञानिकों के बीच भी इस बात पर लगभग सहमति है कि वैक्सीनें इसके आगे बेअसर साबित नहीं होंगी.
कोरोना वायरस के नए स्ट्रेन से बचने के लिए दुनिया भर में दर्जनों देशों ने ब्रिटेन से यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिसकी वजह से कई जगह यात्री हवाई अड्डों पर ही फंस गए हैं. यूरोप में कई जगह राज्यमार्गों पर लंबी कतारें भी लग रही हैं. यूरोप के अलावा भारत, पाकिस्तान, सऊदी अरब, हांगकांग और कनाडा जैसे देशों ने भी ब्रिटेन से यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिए हैं.
ब्रिटेन के विशेषज्ञों का कहना है कि वायरस की यह नई किस्म 70 प्रतिशत ज्यादा तेजी से फैलती है, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि नए स्ट्रेन को रोकना संभव है. संगठन के स्वास्थ्य आपात काल प्रमुख माइक रायन ने जिनेवा में एक प्रेस वार्ता में बताया, "स्थिति काबू से बाहर नहीं है लेकिन इसे अपने पर छोड़ा भी नहीं जा सकता है."
उन्होंने सभी देशों को उन सभी कदमों को उठाने को कहा जिनकी सफलता साबित हो चुकी है. संगठन के अनुसार, नए स्ट्रेन से जिन्हें संक्रमण हो जाता है वो औसतन 1.5 और लोगों को संक्रमित करते हैं , जबकि ब्रिटेन में पहले से मौजूद स्ट्रेनों की रिप्रोडक्शन दर 1.1 है. वायरस-विज्ञानियों के बीच इस बात पर लगभग सहमति भी है कि इस के आगे मौजूदा वैक्सीनें बेअसर नहीं होंगी.
यूरोप में कई जगह राज्यमार्गों पर लंबी कतारें भी लग रही हैं. यूरोप के अलावा भारत, पाकिस्तान, सऊदी अरब, हांगकांग और कनाडा जैसे देशों ने भी ब्रिटेन से यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिए हैं.
वैक्सीन बनाने वाली जर्मनी की कंपनी बायोएनटेक के प्रमुख उगुर साहीन ने डीपीए को बताया कि उनकी कंपनी ने उनकी वैक्सीन की वायरस की 20 अलग अलग किस्मों के खिलाफ जांच कर चुकी है और उन जांचों में सफल इम्यून प्रतिक्रिया देखी गई है जिसने वायरस को निष्क्रिय कर दिया. साहीन ने यह भी बताया कि नया स्ट्रेन एक और मजबूत म्युटेशन का नतीजा है और अगले दो हफ्तों तक वैक्सीन की इसके खिलाफ भी जांच की जाएगी.
विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुख्य कोविड-19 वैज्ञानिक मारिया वान करखोव ने बताया कि ब्रिटेन के वैज्ञानिक यह पता करने की कोशिश कर रहे हैं कि रिप्रोडक्शन दर में आई इस बढ़ोतरी के लिए वायरस में आए बदलाव ज्यादा जिम्मेदार हैं या लोगों के बीच व्यवहारवादी फैक्टर. उन्होंने यह जोर दे कर कहा कि अभी तक इस बात का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है कि नए स्ट्रेन से और ज्यादा गंभीर या और ज्यादा घातक बीमारियां होती हैं.
संगठन ने बताया ब्रिटेन में पाई गई वायरस की किस्म ऑस्ट्रेलिया, आइसलैंड, इटली और नीदरलैंड्स में भी कुछ व्यक्तियों में पाए गए हैं. कुछ मामले डेनमार्क में भी सामने आए हैं. यूरोपीय संघ एक संयोजित प्रतिक्रिया की दिशा में काम कर रहा है. शेंगेन इलाकों में सीमाओं को खुला रखने की भी मांग उठ रही है.
इन मुद्दों पर मंगलवार को संघ के राजदूतों के बीच चर्चा होगी. कुछ देशों ने यात्रा संबंधी प्रतिबंधों को और विस्तृत रूप से लागू कर दिया है. तुर्की ने डेनमार्क, नीदरलैंड्स और दक्षिण अफ्रीका से भी उड़ानों पर प्रतिबंध लगा दिया है. इस्राएल ने पूरी तरह से विदेशी यात्रियों के आने पर प्रतिबंध लगा दिया है.
सीके/एए (डीपीए)
विधानसभा ने मोतीलाल वोरा को दी श्रद्धांजलि
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 22 दिसंबर। कांग्रेस के राष्ट्रीय महामंत्री दिवंगत मोतीलाल वोरा को मंगलवार को विधानसभा में श्रद्धांजलि दी गई। सत्ता और विपक्ष के कई सदस्यों ने उनसे जुड़े अपने संस्मरण सुनाए। श्री वोरा को किसी ने राजनीति का विश्वविद्यालय बताया, तो उन्हें अजातशत्रु भी कहा गया। तकरीबन सभी वक्ताओं ने श्री वोरा को मेहनती, ईमानदार और विनम्र राजनेता के रूप में याद किया।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपने उद्बोधन में श्री वोरा को याद करते हुए भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि सुबह से लेकर देर रात तक काम करना श्री वोरा की आदत थी। इस दौरान कभी मिलना होता था, तो उसी समय वे पूरी आत्मीयता से मिलते थे। थकान उनके शब्दकोश में नहीं था। उनमें लगन, परिश्रम और निष्ठा अद्वितीय था। उनका राजनीतिक परिवार बहुत बड़ा था। उनके जाने से देश और प्रदेश को क्षति पहुंची है।
जोगी पार्टी के नेता धर्मजीत सिंह ने कहा कि श्री वोरा के जाने से हम सब व्यथित हैं। वे न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश के लाल थे। वे बेहद मिलनसार, ईमानदार थे। वे अजातशत्रु थे। छत्तीसगढ़ के लिए हमेशा सोचते थे। वे जिस कुर्सी पर भी बैठे हमेशा ईमानदारी और निष्पक्षता से ही काम करते थे।
उन्होंने याद किया कि एक बार श्री वोरा के मुख्यमंत्रित्व काल में पांडातराई गोलीकांड हुआ था। जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना से श्री वोरा काफी दुखी थे। श्री वोरा ने बाद में वहां पहुंचकर सभी प्रमुख लोगों को बुलाया, विकास को लेकर चर्चा की। उन्होंने गोबरा डायर्वसन का काम स्वीकृत किया। श्री सिंह ने कहा कि श्री वोरा दुर्घटना को विकास से जोडक़र नॉर्मल करने की कोशिश की थी।
धर्मजीत सिंह ने कहा कि श्री वोरा राजनीति के विश्वविद्यालय थे। नई पीढ़ी के लोगों को उनसे सिखना चाहिए। वे हमेशा याद आते रहेंगे। गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने कहा कि उनका पूरा जीवन पाठशाला था, और उनसे बहुत कुछ सिखने को मिला। श्री साहू ने उनसे जुड़े कुछ संस्मरण सुनाए, और बताया कि राजनीति के शुरूआत में उनके पास काम से जाना होता था। एक बार उन्होंने वोराजी से चिट्ठी लिखवाई, फोन भी कराया, लेकिन काम नहीं हुआ। आखिरकार एक बार बोल दिया कि आपको काम नहीं करना है, तो बोल दिया करें। उस समय तो उन्होंने कुछ नहीं कहा।
बाद में एक दिन उन्होंने समझाईश दी कि दुख के समय मिलकर काटना चाहिए, और सुख के समय को मिल बांटकर काटना चाहिए। जब श्री वोरा मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने अपने से जुड़े सभी लोगों को कुछ न कुछ पद दिया। इसी तरह एक बार लोकसभा टिकट उनकी तय हो गई थी, प्रचार भी शुरू हो गया था। बाद में उनकी जगह चंदूलाल चंद्राकरजी को टिकट मिल गई। कुछ लोग दिल्ली जाकर राजीव गांधीजी से मिले। बाद में उन्होंने मुझसे कहा कि मैं जाकर राजीवजी से अनुरोध करता तो टिकट मिल जाती। मगर यह नेता की बेज्जती होती। यहां उनके नेता के प्रति आस्था को दिखाता है।
पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा कि राजनीति के क्षेत्र में वे मोती की तरह चमकते रहे। वे गंभीर राजनीतिज्ञ थे। उनके खिलाफ चुनाव लडऩे का मौका मिला। इस दौरान उन्हें जाना कि उनका व्यक्तित्व कितना बड़ा था। चुनाव प्रचार के दौरान एक बार मेरी गाड़ी खराब हो गई। वे वहांं से गुजर रहे थे, तो उन्होंने कार्यकर्ताओं से गाड़ी ठीक कराने कहा। मैं मजाक से उनसे कहा लोकसभा के लिए भी इसी तरह धक्का दे देते। पूर्व मुख्यमंत्री ने याद करते हुए कहा कि जन्मदिन के मौके पर हमेशा उनकी बधाई का इंतजार रहता था। वे हम सब के अभिभावक थे।
संसदीय कार्यमंत्री रविंद्र चौबे ने कहा कि वे बेहद विनम्र व्यक्ति थे। बड़े से बड़ा व्यक्ति उनके पास जाता था, तो उनसे भी उसी तरह आत्मीयता से पेश आते थे, जिस तरह स्वेच्छानुदान के लिए मिलने आए लोगों से पेश आते थे। श्री चौबे ने बताया कि उनके उच्च शिक्षा मंत्री रहते जो भी महाविद्यालय के लिए मांग करता था, सभी विधायकों के प्रस्ताव को मंजूरी दे दिया था।
बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि वोराजी के निधन से जो क्षति हुई है, उसकी पूर्ति नहीं हो सकती। वे धीर गंभीर थे, तो उनमें दृढ़ता भी थी। हमारी इस पीढ़ी ने उनसे बहुत कुछ सीखा। सत्यनारायण शर्मा ने कहा कि वोरा जी की सादगी और सरलता एक मिसाल है। धनेन्द्र साहू ने कहा कि वोराजी ने लम्बे समय तक राजनीति की। यह मेरा सौभाग्य रहा कि उनका स्नेह और विश्वास मुझे हासिल हुआ। हमने एक महान व्यक्तित्व को खोया है।
पुन्नू लाल मोहले ने कहा कि वे सत्ता पक्ष के साथ विपक्ष के लोगों की सहायता करते थे। अजय चंद्राकर ने कहा कि वोराजी ने जमीन से उठकर सर्वोच्च नेताओं के साथ काम किया। वे आदर्श मूल्यों को जीवंत करने वाले अजातशत्रु थे। नारायण चंदेल ने कहा कि उनसे सहजता और सरलता जैसे गुणों को सीखने की आवश्यकता है। शिवरतन शर्मा ने कहा कि वे छत्तीसगढ़ के गौरव थे। अमितेश शुक्ला ने कहा कि उनका निधन एक युग का अंत है। वे सिद्धांतों से समझौता नहीं करते थे।
नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक, प्रेमसाय सिंह सहित अन्य नेताओं ने उनके योगदान को याद किया।
गगन सभरवाल
पिछले कुछ हफ़्तों से भारत में चल रहे किसान आंदोलन की तस्वीरें और वीडियो दुनियाभर में प्रकाशित की गईं. दुनिया भर के कई नेताओं और भारतीय मूल के लोगों से इनपर अपनी प्रतिक्रियाएं दीं.
इस मुद्दे को ब्रिटेन की संसद में भी उठाया गया, सांसद तनमनजीन सिंह धेसी ने इससे जुड़ा सवाल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन से पूछा और ब्रिटिश प्रधानमंत्री के जवाब की काफ़ी चर्चा हुई.
मुद्दे से अनजान लग रहे पीएम बोरिस ने कहा था कि 'यह भारत-पाकिस्तान के बीच का कोई मुद्दा है और कहा कि दोनों देशों को द्विपक्षीय बातचीत के ज़रिए सुलझाना चाहिए'.
इसके अलावा ब्रिटेन के लंदन और बर्मिंघम जैसे शहरों में भी भारतीय मूल के ख़ासतौर पर सिख समुदाय के लोगों ने कई विरोध प्रदर्शन किए.
लेबर पार्टी के वीरेंद्र शर्मा एक ब्रिटिश राजनेता हैं जो कि लंदन के ईस्ट साउथॉल से सांसद हैं. वहां 31 प्रतिशत आबादी भारतीय मूल के लोगों की है और अंग्रेज़ी के बाद सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा पंजाबी है.
35 सांसदों ने उठाया मुद्दा
शर्मा समेत 35 सांसदों ने विदेश मंत्री डॉमिनिक राब से गुज़ारिश की है कि वो किसानों के मुद्दे को भारत सरकार के सामने उठाएं.
ब्रिटेन के लेबर पार्टी के सिख सांसद धेसी ने ये चिट्ठी लिखी और इसपर भारतीय मूल के वीरेंद्र शर्मा के अलावा लेबर सांसद सीमा मलहोत्रा और वैलेरी वाज़ ने भी दस्तखत किए.
बीबीसी से बात करते हुए वीरेंद्र शर्मा कहते हैं, "हम ब्रिटिश संसद के सदस्य हैं और एक ब्रिटिश सांसद के रूप में, भारत हमारे लिए एक विदेशी देश है और इसका प्रशासन एक आंतरिक मामला है. हम इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं और न ही हमें इसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए और न ही हम करेंगे, जैसे कि हम नहीं चाहते कि ब्रिटेन के मामलों में कोई दूसरा देश दखल दे."
"लेकिन इसके साथ ही, मैं यहां पहली पीढ़ी का भारतीय हूं जो पंजाब के एक गाँव में पैदा हुआ, पला-बढ़ा, ब्रिटेन चला गया और मैं यहाँ की राजनीति में शामिल हो गया. लेकिन मेरे संसदीय क्षेत्र के ज़्यादातर लोगों के भारत के साथ मज़बूत संबंध हैं, वैसे ही जैसे मेरे."
भारतीय मूल के लोगों का जुड़ाव
शर्मा जैसे पहली पीढ़ी के भारतीय आप्रवासी अच्छी तरह जानते हैं कि भारतीय मूल लोग भारत के मुद्दों से जुड़े हुए हैं. उनके इलाके के वोटर्स के परिवार अभी भी भारत में रहते हैं और इस मुद्दे को लेकर गंभीर हैं.
वो कहते हैं, "हम इस समस्या का समाधान नहीं दे रहे हैं और न ही हम यह कह रहे हैं कि भारत में जो कुछ भी हो रहा है वह सही है या ग़लत है. हम सभी चाहते हैं कि विदेश सचिव भारतीय उच्चायोग और दिल्ली में ब्रिटिश उच्चायोग से बात करें और उन्हें बताएं कि भारत में जो कुछ भी हो रहा है उसके बारे में हमारे संसदीय क्षेत्र के लोग कैसा महसूस कर रहे हैं?"
भारतीय किसानों के मुद्दे को उठाने वाले केवल यही 36 सांसद नहीं हैं.
हाउस ऑफ लॉर्ड्स के इंद्रजीत सिंह ने संसद के ऊपरी सदन में भी इस मुद्दे को उठाया. लेकिन ब्रिटेन के कैबिनेट कार्यालय मंत्री, लॉर्ड निकोलस ट्रू ने सदन में जवाब देते हुए किसी भी राष्ट्र की "व्यापक निंदा" से इनकार कर दिया.
उन्होंने कहा, "हमारे मूल्य लोकतांत्रिक हैं, वे बहुत व्यापक रूप से साझा किए जाते हैं और दुनिया भर में प्रचलित हैं. हम चाहते हैं कि उन्हें कायम रखा जाए."
इसके अलावा, लगभग 25 सामुदायिक और चैरिटी प्रतिनिधियों, धार्मिक और व्यापारिक नेताओं, भारतीय पृष्ठभूमि के पार्षदों और पेशेवर लोगों ने लंदन में भारतीय उच्चायुक्त गायत्री इस्सर कुमार और ब्रिटेन के विदेश मंत्री डॉमिनिक राब को एक संयुक्त पत्र भी भेजा है.
इस्सर कुमार को लिखे अपने पत्र में, उन्होंने भारतीय किसानों के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त की है और "उन किसान और मजदूरों पर प्रशासन द्वारा आंसू गैस और वॉटर कैनन के उपयोग की निंदा की है, जो दिल्ली पहुंच कर सिर्फ शांतिपूर्ण विरोध करना चाहते हैं."
ब्रिटेन के लोगों की क्या है राय?
लेकिन क्या ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मूल के लोग चाहते हैं कि ब्रिटिश सांसद इस मुद्दे को उच्चतम स्तर पर भी उठाएं? इस पर कोई आम सहमति नहीं है.
ओवरसीज़ फ्रेंड्स ऑफ़ बीजेपी यूके के अध्यक्ष कुलदीप शेखावत ने बीबीसी को बताया, "भारतीय किसान भारत में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं,ये उनका अधिकार है, और अगर उनके पास कोई मुद्दा है तो वे इसे भारत सरकार के साथ उठा सकते हैं. भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक राष्ट्र है जिसके पास एक बहुत ही जीवंत लोकतंत्र है और ब्रिटेन के सांसदों को यूके में भारतीय किसानों के बारे में बोलने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि यह एक संप्रभु राष्ट्र के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने जैसा है."
"डोमिनिक राब को लिखना या यूके के पीएम से भारत में विरोध कर रहे किसानों के बारे में एक सवाल पूछना अनुचित है. पीएम मोदी का किसानों की आय को दोगुना करने का एक स्पष्ट एजेंडा है और इस गलत सूचना वाले अभियान को जल्द ख़त्म कर दिया जाएगा."
लंदन निवासी और भारतीय मूल की रश्मि मिश्रा ने भी इसी तरह की चिंताओं को उठाया है. वो कहती हैं, "क्या ब्रिटिश सांसदों और पार्षदों ने किसान के बिल को पढ़ा है? क्या वे किसानों की पहले की पीड़ाओं को समझते हैं? क्या वे जानते हैं कि 1947 आजादी मिलने के बाद से भारतीय किसानों की आत्महत्या दर क्या है? क्या किसी ने इसे हल करने की कोशिश और मदद की? भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का उन्हें क्या अधिकार है?"
क्या अमीर देश कोविड वैक्सीन की जमाख़ोरी कर रहे हैं?
किसानों के विरोध प्रदर्शन पर क्या कह रहे हैं अन्य राज्यों के किसान
राब को लिखी चिट्ठी पर वकील वैशाली नागपाल कहती हैं,"यह उनके द्वारा गलत सूचना फैलाने और हस्तक्षेप करने वाला आधारहीन कार्य है. संभवतः उन्होंने भारत में नए खेती के बिल के बुलेट पॉइंट भी नहीं पढ़े हैं. उनका पत्र पंजाब पर केंद्रित है, उनके मुताबिक वहीं इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ेगा क्योंकि यह भारत की 'ब्रेड बास्केट' है. कृपया गूगल करें और इसकी जाँच कर लें क्योंकि भारत का सबसे अधिक कृषि उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश है और उत्तर प्रदेश के किसान विरोध प्रदर्शन में हिस्सा नहीं ले रहे."
वूल्वरहैम्प्टन में रहने वाले एंड्रयू थॉमस, उन लोगों में से एक हैं जो ब्रिटिश सांसदों द्वारा इस मुद्दे को उठाए जाने से खुश नहीं है.
वो कहते हैं, ''यूके में दूसरे अहम मुद्दे हैं जैसे कि कोरोना वायरस महामारी और ब्रेक्सिट. मुझे समझ में नहीं आता है कि हमारे राजनेता एक ऐसे मुद्दे को क्यों उठा रहे हैं जिसका संबंध दूसरे देश से है."
"हमारे सांसदों को हमारे लिए काम करना चाहिए और हमारे मुद्दों और चिंताओं को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए. हो सकता है कि वे अपने कुछ मतदाताओं को खुश रखने के लिए ऐसा कर रहे हों, लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह किसी अन्य देश को प्रभावित करने वाले मुद्दों से निपटने के लिए वो ब्रिटेन की संसद में बैठे है. यूके और यहां के लोगों की मदद उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए''
कुछ लोग सांसदों के कदम से खुश हैं, तो कुछ नाराज़
भारतीय व्यापारी संदीप बिष्ट कहते हैं, "भारतीय किसानों को ब्रिटेन सहित दुनिया भर से समर्थन मिलता देख अच्छा लगता है. किसानों के समर्थन में ब्रिटेन में जो कुछ भी हो रहा है, वह किसी तरह भारत सरकार पर दबाव डालेगा. भारत में जिस भी पार्टी की सरकार रही है, हमेशा किसानों की अनदेखी की जाती रही और यह पहला मौका है जब पूरे भारत के किसान एकजुट हुए हैं और एक साथ एक आम मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं."
"हमारे ब्रिटिश सांसदों को भी समर्थन करते हुए देखना अच्छा है, लेकिन मैंने सांसद तनमनजीत सिंह धेसी की टिप्पणियों को सुना, जहां वह किसानों का समर्थन करने से ज्यादा भारत सरकार पर आरोप लगा रहे थे. ये सही नहीं है. उन्हें संतुलित होना चाहिए और अच्छी कूटनीति बनाए रखनी चाहिए"
लीड्स के बलबीर सिंह को भी लगता है कि ब्रिटेन की सरकार को भारतीय अधिकारियों के साथ इस मुद्दे को उठाना चाहिए क्योंकि भारतीयों ने यूके और इसकी अर्थव्यवस्था के निर्माण में एक अहम भूमिका निभाई है.
उन्होंने कहा, "ब्रिटिश सरकार को किसानों के बारे में चिंतित होना चाहिए क्योंकि मेरे जैसे भारतीयों ने इस देश के लिए बहुत योगदान दिया है और ब्रिटेन के साथ भारत के व्यापार ने भी. इसके अलावा, भारतीयों ने इस देश में इस्पात और कार उद्योग को बचाया है"
वेस्ट मिडलैंड्स के इतिहासकार और क्यूरेटर राजविंदर पाल भारत में पैदा हुए थे.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "सांसद तनमनजीत सिंह धेसी खुद पंजाबी पृष्ठभूमि से हैं, उनके क्षेत्र में भी ऐसे ही लोग हैं, जिनका वो प्रतिनिधित्व करते हैं, इन मुद्दों को संसद में उठाना सही है. लेकिन हमारे पीएम को इस बात की जानकारी नहीं है कि ढेसी किस बारे में बात कर रहे हैं और यह बहुत ही शर्म की बात है."
भारत के मामलों में ब्रिटिश नेताओं को बोलना कितना सही?
लेकिन ब्रिटिश सांसद और स्थानीय पार्षद भारत के मामलों में खुद को शामिल करके क्या हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं और क्या वे ऐसा करने में सही हैं?
डॉ मुकुलिका बनर्जी, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. उनके पास भारत की कृषि पर 20 वर्षों से अधिक शोध का अनुभव है, वो कहती हैं कि भारत में विरोध प्रदर्शन चिंताजनक हैं.
डॉक्टर बनर्जी ने कहा, "ब्रिटिश राजनेताओं ने हमेशा दुनिया के मुद्दों को उठाया है,और इस मामले में, उनके क्षेत्र के लोग भारत में किसानों के परिवार के माध्यम से सीधे जुड़े हुए हैं. एक सांसद अपने क्षेत्र की लोगों की चिंताओं का जवाब देने के लिए बाध्य है, इसी तरह संसदीय लोकतंत्र काम करता है. इसके अलावा, ब्रेक्सिट के बाद, ग्लोबल ब्रिटेन को प्रत्येक राष्ट्र के साथ द्विपक्षीय संबंध बनाने होंगे और भारत के साथ संबंध ज़रूरी है. इंडियन डायस्पोरा दो देशों के बीच एक प्रमुख जीवित पुल है और भारत सरकार इसी कारण से अपने डायस्पोरा के साथ लगातार जुड़ी रहती है और काम करती है."
वह कहती हैं कि प्रदर्शनकारियों ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि भारतीय किसानों के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है जिसे हस्तक्षेप नहीं कहा जा सकता. डॉ बनर्जी ने बताया कि यहां रह रहे भारतीय मूल के लोगों ने भारत की सत्ताधारी पार्टी का चुनाव के दौरान पैसे और अभियानों की मदद से समर्थन किया था.
उन्होंने कहा, "भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों द्वारा व्यक्तिगत नेताओं और दलों को वित्तीय समर्थन देना, वो भी तब जब वो खुद उसका हिस्सा नहीं है, इसे विदेशी दखल समझा जा सकता है. लेकिन ब्रिटेन और भारतीय मूल के नागरिक जिनके भारत में परिवार और निवेश हैं, वे जाहिर तौर पर भारत में मामलों से जुड़े रहना चाहते हैं और विकास को करीब से देखेंगे."
2019 के बाद से भारतीय मुद्दों पर यूके में कई विरोध प्रदर्शन हुए हैं - चाहे वह कश्मीर पर हो या नागरिकता कानूनों पर. डॉ बनर्जी कहती हैं," यह अचानक नहीं हुआ है, और इस घटना के पीछे एक कारण है, हाल के वर्षों में ब्रिटेन में आने वाले छात्रों की एक बड़ी संख्या."
बनर्जी के मुताबिक " स्नातकोत्तर छात्र, विशेष रूप से जिन्होंने भारत में अपनी पहली डिग्री के लिए अध्ययन किया है, मुखर हैं और भारतीय होने पर गर्व करते हैं - ये जानकार भारतीय हैं जो भारत के समाचारों को बारीकी से देखते हैं. भारत में क्या हो रहा है इसकी परवाह करते हैं. वो भारत के नागरिकों के साथ अन्याय को नहीं स्वीकार सकते.छात्र हमेशा दुनिया भर में न्याय की लड़ाई में सबसे आगे रहे हैं" (bbc.com)
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
रायपुर, 22 दिसंबर। दिवंगत कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा के पार्थिव शरीर को मंगलवार को राजीव भवन में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया है। करीब पौने 12 बजे वोराजी का पार्थिव शरीर माना विमानतल पहुंचा। वहां प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम सहित अन्य नेता मौजूद थे।
श्री वोरा के पार्थिव शरीर को विशेष विमान से दिल्ली से रायपुर लाया गया। विमानतल पर पार्थिव देह को लेने के लिए प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम, गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष महंत रामसुंदर दास सहित अन्य नेता वहां पहुंचे थे और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता विमानतल पहुंचे थे।
विमानतल से उनके पार्थिव शरीर को राजीव भवन लाया गया, और वहां उनके अंतिम दर्शनों के लिए रखा गया। करीब एक घंटा रखने के बाद दुर्ग ले जाया जाएगा, और वहां उनके मोहन नगर स्थित निवास में अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा।
शाम साढ़े 4 बजे दुर्ग के शिवनाथ मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। श्री वोरा के अंतिम संस्कार में शामिल होने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के अलावा कांग्रेस के कई राष्ट्रीय नेताओं के यहां पहुंचने की संभावना है।
सीएम ने विधायक पांडेय के सवाल का विस में दिया जवाब
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 22 दिसंबर। चकरभाठा एयरपोर्ट से हवाई सेवा शुरू करने को लेकर विधायक शैलेष पांडेय ने विधानसभा में सत्र के पहले दिन प्रश्न उठाया। मुख्यमंत्री ने बताया है कि हवाईअड्डे की सर्वे रिपोर्ट नहीं मिली है जिसके कारण 3सी का आवेदन नहीं किया जा सका है। सुविधा किस तारीख से शुरू होगी यह बताना अभी संभव नहीं है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि 3सी कैटेगरी के लिये सर्वे का काम पूरा हो गया है। इसकी रिपोर्ट आनी अभी बाकी है। 3सी श्रेणी की आवश्यकता के अनुरूप सिविल, विद्युत व अन्य विभागों द्वारा आवश्यक कार्य किये जा चुके हैं। इसका ओएलएस सर्वे रिपोर्ट मिलने के बाद 3सी कैटेगरी के लिये आवेदन किया जायेगा।
ज्ञात हो कि बिलासपुर से महानगरों के लिये हवाई सेवा शुरू करने की मांग लम्बे समय से की जा रही है। इसके लिये नागरिकों की एक संघर्ष समिति भी अखंड धरना आंदोलन भी चला रही है। वर्तमान में बिलासपुर-भोपाल के बीच हवाई सेवा की घोषणा नागरिक उड्डयन मंत्री द्वारा की जा चुकी है पर वह सेवा भी प्रारंभ नहीं हो सकी है। पता चला है कि एलायंस एयर और केन्द्र सरकार के बीच यह तय नहीं हो सका है कि उड़ानें शुरू होने के बाद यदि घाटा होता है तो इसकी भरपाई कौन करेगा। नागरिक संघर्ष समिति की मांग दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद आदि बड़े शहरों के लिये साथ ही साथ हवाई सेवा शुरू करने की है लेकिन इसमें भी रियायत का पेंच फंसा हुआ है।
राज्य सरकार ने राशि खर्च नहीं की-साव
बिलासपुर के सांसद अरुण साव का कहना है कि केन्द्र सरकार ने चकरभाठा एयरपोर्ट के विकास के लिये पहले 52 करोड़ रुपये फिर 27 करोड़ रुपये दिये। यह राशि राज्य सरकार खर्च नहीं कर पाई। 3सी कैटेगरी के लिये तैयारी नहीं हुई है, उड़ान के लिये देरी उनकी ही तरफ से हो रही है।
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 22 दिसंबर। हाईकोर्ट के शीतकालीन अवकाश के बीच कल 23 दिसम्बर को अत्यावश्यक मामलों की सुनवाई वेकेशन कोर्ट में की जायेगी। इस बेंच में आरसीएस सामंत प्रकरणों की सुनवाई करेंगे। कोर्ट में सीआरपीसी की धारा 438 तथा 439 के तहत अर्जेंट हियरिंग के अलावा सिविल और क्रिमिनल दोनों तरह के मामले लिये जायेंगे।
हाईकोर्ट में 21 दिसम्बर से 31 दिसम्बर तक शीतकालीन अवकाश है। अवकाश के दौरान वेकेशन बेंच की व्यवस्था की गई है जिसके तहत 23 दिसम्बर का रोटेशन अभी जारी किया गया है। हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से बताया गया है कि अत्यंत आवश्यक मामलों में अवकाश के दौरान डबल बेंच में भी सुनवाई की जा सकेगी।
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
रायपुर, 22 दिसंबर। दिवंगत कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा के पार्थिव शरीर को करीब 12 बजे राजीव भवन में अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। शाम साढ़े 4 बजे दुर्ग के शिवनाथ मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार किया जाएगा।
श्री वोरा के पार्थिव शरीर को विशेष विमान से दिल्ली से रायपुर लाया जा रहा है। करीब साढ़े 11 बजे माना विमानतल पहुंचने की संभावना है। उसके बाद उनके पार्थिव शरीर को राजीव भवन लाया जाएगा, और वहां उन्हें श्रद्धांजलि दी जाएगी। करीब एक घंटा रखने के बाद दुर्ग ले जाया जाएगा, और वहां उनके मोहन नगर स्थित निवास में अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा।
शाम साढ़े 4 बजे दुर्ग के शिवनाथ मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। श्री वोरा के अंतिम संस्कार में शामिल होने कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के अलावा कांग्रेस के कई राष्ट्रीय नेताओं के यहां पहुंचने की संभावना है।
पश्चिम बंगाल में चल रहे राजनीतिक घटनाक्रम पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने कहा है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार को एनसीपी प्रमुख शरद पवार से बात की है और केंद्र सरकार द्वारा बंगाल की सरकार को अस्थिर करने के प्रयासों पर चर्चा की है। उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि बंगाल चुनाव से पहले केंद्र की तरफ से उन्हें निशाना बनाया जा रहा है।
शरद पवार की पार्टी एनसीपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्य मंत्री नवाब मलिक ने कहा कि ममता बनर्जी ने शरद पवार को बताया कि कैसे बीजेपी बंगाल को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है। केंद्र सरकार सरकारी अधिकारियों को अपनी मर्जी से वापस ले रही है और राज्य के अधिकारों का उल्लंघन कर रही है। बीजेपी जिस तरह से केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है वह सही नहीं है।"
उन्होंने कहा कि एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार पहले ही बनर्जी के साथ मुद्दों पर चर्चा कर चुके हैं और अन्य सभी राष्ट्रीय विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश करेंगे। उन्होंने कहा, "ममता बनर्जी और शरद पवार अन्य राष्ट्रीय नेताओं के साथ भी बैठक करेंगे। अगर जरूरत पड़ी तो पवार बंगाल भी जाएंगे।"
बता दें कि बंगाल चुनाव से चार महीने पहले राज्य का घटनाक्रम अचानक तेजी से बदला है। बीजेपी लगातार ममता बनर्जी की सरकार और पार्टी पर हमलावर है। हाल ही में बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमले को लेकर केंद्र सरकार ने राज्य के तीन आईपीएस अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर बुला लिया था, जिसे ममता सरकार ने राज्य में दखल बताया है। ममता बीजेपी पर किसी भी तरह सत्ता में आने की कोशिश करने और उनकी सरकार और पार्टी को कमजोर करने का आरोप लगाया है। (navjivan)
मृणाल पाण्डे-
हिंदी की पत्रकारिता स्वायत्त पैदा हुई और स्वायत्त रह कर ही वह लोकतांत्रिक राजनीति की सच्ची सहभागी बनी है | मोतीलाल वोरा जी उस परंपरा की एक दुर्लभ कड़ी थे। उनकी निकटता और मार्गदर्शन पाना मेरे लिए व्यक्तिश: और पत्रकारीय दोनों के नज़रिये से एक उपलब्धि रही | बढ़ती उम्र और क्षीण पड़ते शरीर के बावजूद आदरणीय वोरा जी हम सब एसोशियेटेड जर्नल्स के कर्मियों के लिए अंत तक एक बड़े और छांहदार वट वृक्ष बने रहे।
एक ऐसी सहज, मिलनसार और गर्माहट भरी आत्मीयता से भरपूर शख्सियत का चला जाना, जिसके दरवाजे अपने स्नेही जनों, मित्रों के लिए जब भी जरूरत हो, हमेशा खुले रहे, हम सब को एक ऐसे अकेलेपन के गहरे अहसास से भर गया है जो घर के सम्मानित बुजुर्ग का साया उठ जाने से होता है। अभी कुछ ही दिन पहले अपने करीबी दोस्त और सहकर्मी अहमद पटेल जी के निधन पर लिखी उनकी मार्मिक उदास सतरें लगता है एक तरह से हमारे बीच से उनकी अपनी खामोश विदाई की पीठिका बना रही थीं।
आज की मौकापरस्त राजनीति में जिसका जनता या साहित्य और विचारों की दुनिया से कोई नाता नहीं दिखता, एक पत्रकारीय जीवन से शुरुआत करने वाले साहित्य और साहित्यकारों के लिए गहरा सम्मान भाव रखने वाले वोरा जी एक दुर्लभ ऑर्किड की तरह थे। वर्ष 1993-96 तक जब वे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे मेरी माता शिवानी जी से लखनऊ में उनका बहुत सहृदय संपर्क रहा। 1996 में जब आंतरिक रक्तस्राव से शिवानी जी अचानक बेहद नाजुक दौर से गुजर रही थीं, उन्होंने जिस आत्मीय सहजता से अपना राजकीय हवाई जहाज उनको दिल्ली लाने के लिए उपलब्ध करा दिया, वह आज के माहौल में अकल्पनीय है।
बाद को उनकी स्थिति संभलने पर जब मैं वोरा जी को परिवार की ओर से धन्यवाद देने को मिली, उन्होने बहुत स्नेह से कहा, ‘देखो शिवानी जी सिर्फ तुम्हारी मां ही नहीं, हमारे हिंदी साहित्य की बहुत बड़ी विभूति भी हैं। यह तो मेरा कर्तव्य था।’ सच्चा साहित्यिक अनुराग किस तरह राजनीति का मानवीयकरण कर सकता है और राजनीति एक अच्छे मनुष्य से जुड़ कर किस हद तक मानवीय सरोकार बना सकती है, इसका प्रत्यक्ष रूप मैंने उसी दिन जाना।
हमारे प्रकाशन समूह और उसकी जननी, अपनी पार्टी के प्रति तो वोरा जी का अनुराग अनुपम था। उनके दिलो दिमाग के रास्ते कई दिशाओं, कई खिड़कियों में खुलते थे, इसलिए राजनीतिक विचारधारा की ज्यादतियों या संकीर्णता के वे कभी शिकार नहीं बने। जब कभी मिलते अपने से कहीं कम अनुभव और आयु वालों से भी वे हमेशा एक बालकोचित उत्सुकता से जानना चाहते थे कि हिंदी में इन दिनों क्या कुछ लिखा जा रहा है। पत्रकारिता की दिशा दशा पर हमारी क्या राय है?
आज जबकि रोज बरोज राजनीति में राज्य और शक्ति के उद्दंड बर्बर रूपों ने राजनीति के क्षेत्र में कला साहित्य पर किसी भी तरह की संवेदनशील बातचीत की संभावना को मिटा डाला है, वोरा जी का जाना एक अपूरणीय क्षति है। वे उस उदार राजनैतिक संस्कृति के चंद बच रहे झंडाबरदारों में से थे जिनका आदर्श गांधी, नेहरू, आचार्य नरेंद्र देव और कृपलानी जैसे बुद्धि की गरिमा वाले राजनेता रहे। वे मानते थे कि धर्म या पारंपरिक शिक्षा दीक्षा नहीं, राजनीति से ही आम आदमी की जिंदगी में सही तब्दीली लाई जा सकती है। और इसके लिए जरूरी है कि राज्य में कलाएं राजनीति की समांतर अनुपूरक धाराएं बनी रहें। उनको राजनीति की दब्बू मातहत या राजनेताओं की कृपा पर निर्भर नहीं समझा जाए।
राजनीति की सारी हड़बड़ी और आपाधापी के बीच भी अपनी टीम को निरंतर विवेक, दिमागी ताज़गी और खुलेपन का सुखद अहसास देने वाले अपनी संस्था के इस पितृपुरुष को हमारी विनम्र ॠद्धांजलि। (navjivan)
जब अमांडा क्लेमैन न्यूयॉर्क में थीं तो क्रेडिट कार्ड के कर्ज़ में इस तरह फंस चुकी थीं कि उन्हें कुछ समझ ही नहीं आ रहा था.
अमेरिका में फाइनेंशियल थेरेपिस्ट अमांडा बीबीसी मुंडो को बताती हैं, "उस हालत ने मुझे इतना शर्मिंदा किया कि मुझे लगा कि मेरी पेशेवर और निजी उपलब्धियां सब एक झूठ हैं."
एक दिन अमांडा ने अपनी मां से अपने बाल काटने के लिए कहा. लेकिन, मां ने जिस तरह बाल काटे वो बहुत ख़राब दिख रहे थे. तब मां ने बोला कि इसे ठीक कराने के लिए तुरंत अपने हेयरड्रेसर के पास जाओ.
लेकिन, अमांडा ने कहा, "मैं नहीं जा सकती. मैं वहां वापस नहीं जा सकती क्योंकि मैंने उसे बाउंस चैक दिया है."
तब अमांडा को अपनी मां को पूरी सच्चाई बतानी पड़ी. अमांडा ने बताया कि उन पर 19 हज़ार डॉलर (करीब 14 लाख रुपये) का कर्ज़ है.
फाइनेंशियल प्लान
सबसे ख़राब बात ये थी कि अमांडा को नहीं पता था कि इतने बड़े कर्ज़ से वो कैसे निकल पाएंगी.
हालांकि, तब मां की मदद से अमांडा ने अपने बिल चुकाए. इसके बाद उन्होंने महीने का एक बजट और फाइनेंशियल प्लान बनाया. अमांडा ने पहले कभी ऐसा नहीं किया था.
अमांडा क्लेमैन कहती हैं, "मैं हमेशा बजट बनाने से बचती थी क्योंकि मुझे लगता था कि इससे मेरी आज़ादी छिन जाएगी."
लेकिन, बजट बनाने से उन्हें पता चला कि इससे उनकी आज़ादी बढ़ गई है और धीरे-धीरे खर्चे भी कम हुए हैं. उनकी बचत हो रही है जिससे उन्होंने अपने कर्ज़ चुका दिए हैं.
अमांडा कहती हैं कि उस हेयरकट के कर्ज़ के कारण मुझे मेरा सही रास्ता मिल गया जहां मैं पैसों को लेकर ज़्यादा समझदार, सशक्त हो गई और मुझे मेरी ज़िंदगी का जुनून मिल गया.
कई सालों तक सोशल वर्क का काम करने के बाद अपने इस जुनून के कारण अमांडा क्लेमैन एक फाइनेंशियल थेरेपिस्ट बन गईं.

फाइनेंशियल एंग्ज़ाइटी (वित्तीय घबराहट) क्या है
अब क्लेमैन ऐसे लोगों की मदद करती हैं जिन्हें वित्तीय तनाव की समस्या है. वो कंपनियों के साथ जुड़ी हैं, कोर्सेज कराती हैं और इन विषयों पर लिखती हैं.
अमांडा बताती हैं कि घबराहट तब होती है जब हमारा शरीर और दिमाग हमें सिग्नल देता है कि कुछ ऐसा है जो सही नहीं है, उस पर ध्यान दें.
ये हमारे लिए ख़तरे की निशानी है कि अब उस मुश्किल स्थिति से निपटने का वक़्त आ गया है. हालांकि, अक्सर होता ये है कि जब लोग घबराहट महसूस करते हैं तो मुश्किलों पर ध्यान देना ही बंद कर दते हैं.
अमांडा कहती हैं कि इसलिए हम पैसों को लेकर घबराहट महसूस करते हैं. हम अमूमन इस बारे में नहीं सोचते हैं और हालत इतनी ख़राब हो जाती है कि हम आवेश में फैसले कर लेते हैं.
वह बताती हैं कि इन फैसलों के कारण स्थितियां और ख़राब हो जाती है जिससे घबराहट और बढ़ जाती है. इस तरह हम एक दुष्चक्र में फंसते चले जाते हैं. इसलिए सबसे पहले अपनी घबराहट पर ध्यान दें और गहराई से सोचें की आपके साथ क्या हो रहा है.
अमांडा फाइनेंशियल एंग्ज़ाइटी से निकलने के ये पांच तरीके बताती हैं:
1. अपनी उत्सुकता बढ़ाएं
पहला कदम ये है कि अपने पैसे को लेकर उत्सुक होना सीखें.
आपकी वित्तीय ज़िंदगी में क्या हो रहा है, ये उसमें असल दिलचस्पी लेने जैसा है बजाए कि आप सिर्फ़ मौजूदा कर्ज़ चुकाने के बारे में सोचें.
उसके लिए, एक सही तरीका ये है कि हम खुद से पूछें कि हमारे पैसों से हमारे बारे में क्या पता चलता है कि हम अपने समय का इस्तेमाल कैसे करते हैं और हमारे लिए क्या चीजें असल में महत्वपूर्ण हैं.
2. अपने पैसों पर लगातार ध्यान दें
महीने में कम से कम एक बार ये तीन चीजें करें:
- ये देखें कि आपके बैंक अकाउंट में कितना पैसा आता है और कितना बचता है.
- इस पर विचार करें कि आगे कैसी वित्तीय स्थिति आने वाली है.
- एक योजना बनाएं.
उदाहरण के लिए, अगर आपका किराया बढ़ रहा है तो आपको अपने बजट में कुछ चीजें बदलनी होंगी ताकि किराया देने का समय आने से पहले आप कुछ इंतज़ाम कर सकें.
ये समय से पहले की तैयारी करना है ना कि समय आने का इंतज़ार करना है.

3. आपने जो हासिल किया है, उसके लिए अपनी खूबियों को पहचानें
ये महत्वपूर्ण है कि आप पहचानें की आपने अपने लक्ष्य की तरफ़ कितनी प्रगति की है.
इस बात को लेकर परेशान ना रहें कि आप लक्ष्य तक क्यों नहीं पहुंचे.
भले ही आप छोटे-छोटे कदम उठा रहे हैं लेकिन ये भी महत्वपूर्ण बदलाव है जो दिखाता है कि आपमें इसकी क्षमता है.
फाइनेंशियल एंग्ज़ाइटी को ख़त्म करना एक ऐसी प्रक्रिया है जो रातों रात पूरी नहीं हो सकती.
4. प्रयोग करने की मौका
हम अक्सर चीजों को उनके ‘सही तरीक़े’ से ही करना चाहते हैं क्योंकि कुछ अलग करने पर हमें असफल होने का डर लगता है.
लेकिन, कई बार किसी चीज़ को करने का एक ही सही तरीक़ा नहीं होता.
अगर हम थोड़ा और सोचें तो कई और रास्ते खुले हो सकते हैं.
हमें अपने आप को और रचानात्मक होने का मौका देना चाहिए.
5. पैसे ना होना ‘अच्छी ख़बर’ है
भले ही ये सुनने में अजीब लगता है कि पैसा ना होना ‘अच्छी ख़बर’ है लेकिन, ये स्थितियों से निपटने के लिए सोचने के तरीक़े में बदलाव करने जैसा है.
यह कदम हमारे दृष्टिकोण को बदलने के महत्व को दिखाता है कि हम अपने जीवन में चुनौतियों का जवाब कैसे देते हैं और उनसे निपटने के लिए लचीलापन कैसे अपनाते हैं.
"हम वित्तीय परेशानियों से नहीं निपट सकते" ये सोचने की बजाए सोचें कि "इन परेशानियों से कैसे निकलें."
इस प्रक्रिया में हमें अपने बारे में कई दिलचस्प बातें पता चलेंगी और हम जानेंगे कि व्यक्तिगत मामले कैसे पैसों को संभालने के हमारे तरीके को प्रभावित करते हैं.

ये कोई जादू नहीं
अमांडा कहती हैं, "फाइनेंशियल थेरेपी और पैसों को लेकर जो व्यवहार हम विकसित करना चाहते हैं, ये सब किसी जादू की छड़ी जैसा नहीं है."
ये एक प्रक्रिया है जो ये स्वीकार करने से शुरू होती है कि हमारे सामने एक चुनौती है. खुद को जानने का ये सफर चलता रहता है ताकि ये पता चल सके कि वो सिग्नल हमसे क्या कहना चाहते हैं और हम कुछ आदतों में बदलाव के लिए योजना बना सकें.
इस प्रक्रिया में अपने आप से कई सवाल पूछना फायदेमंद होता है. जैसे कि आपके काम का मतलब क्या है, आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं, आपके लक्ष्य को क्या प्रभावित करता है, कौन-से रिश्ते आपकी वित्तीय सेहत को प्रभावित करते हैं, आप किन चीजों को बदल सकते हैं और किन्हें नहीं.
अगर आपकी नौकरी चली जाए
ऐसी स्थिति में फाइनेंशियल थेरेपिस्ट सलाह देते हैं कि आपको पहले शांति से बैठकर मौजूदा हालात का विश्लेषण करना चाहिए,
एक अच्छा तरीक़ा ये है कि आप उन लोगों के साथ बात करें जिनके साथ आपकी वित्तीय प्रतिबद्धताएं हैं जैसे मकान मालिक से बात करें और उसे किराये को लेकर थोड़ा समय देने के लिए कहें.
अगर नौकरी जाने से पहले आपकी कुछ बचत है तो योजना बनाएं कि आप उनसे ज़्यादा से ज़्यादा कितने दिनों तक अपना खर्च चला सकते हैं.
यह इस बारे में सोचने में भी मदद करता है कि आपको वैकल्पिक तरीकों से कैसे पैसे मिल सकते हैं.
भले ही उन पैसों से आपके सभी खर्चे पूरे ना हों लेकिन, कर्ज़ और उसके ब्याज़ से बचने के लिए ये तरीक़ा काफ़ी हद तक आपकी मदद कर सकता है. साथ ही अपने खर्चे कम करना ना भूलें
इस सबके ज़रिए ये जानने की कोशिश है कि किन चीज़ों पर आपका नियंत्रण है और कौन-सी चीजें आपके काबू से बाहर हैं. इससे हमें अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने में मदद मिलती है. (bbc)
नई दिल्ली, 22 दिसंबर | उत्तर प्रदेश के किसान नेता राकेश टिकैत ने किसान आंदोलन समाप्त करने को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि सरकार आंदोलन को लंबा खींचना चाहती है, इसलिए किसान नेताओं से बातचीत करना नहीं चाहती है। वह कहते हैं कि सरकार जहां भी चाहे वहां किसान नेता बातचीत के लिए आ जाएंगे। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) नेता राकेश टिकैत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के साथ गाजीपुर बॉर्डर पर डेरा डाले हुए हैं और उनका कहना है कि सरकार जब तक नये कृषि कानून को वापस नहीं लेगी, किसान तब तक वापस नहीं होंगे।
उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "ये (सरकार) कह रहे हैं कि हम कानून वापस नहीं लेंगे और हमने कह दिया है हम घर वापस नहीं जाएंगे।"
राकेश टिकैत कहते हैं कि, "देश का किसान कमजोर नहीं है और वह अपने हक की लड़ाई में पीछे नहीं हटने वाला है। सरकार ने किसान संगठनों के नेताओं को उनकी सभी मांगों के संबंध में बिंदुवार प्रस्ताव भेजा है और उन्हें अगले दौर की बातचीत के लिए बुलाने के लिए उनसे तारीख बताने को कहा है।"
इस संबंध में पूछे गए सवाल पर भाकियू नेता टिकैत ने आईएएनएस से खास बातचीत में कहा, सरकार के पास सारे तंत्र हैं वह जब जाहे बात कर सकती है, लेकिन सरकार बात नहीं करना चाहती है। उन्होंने इस संबंध में सरकार पर झूठ फैलाने का आरोप आरोप लगाया।
टिकैत से जब पूछा गया कि क्या फिक्की सभागार में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से किसान बातचीत करने को तैयार हैं। इस पर उन्होंने कहा, हमने कहा है कि हमें जहां भी कहेंगे हम वहां आ जाएंगे, लेकिन सरकार तो बात करना ही नहीं चाहती है।
भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत 26 नवंबर से शुरू हुए किसानों के इस आंदोलन में लाइम लाइट में रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वह देश में किसानों की सबसे बड़ी आबादी वाले प्रदेश से आते हैं और किसानों के हक की लड़ाई लड़ने वाले नेता की पहचान उनको विरासत में मिली है।
राकेश टिकैत के पिता और उत्तर प्रदेश में भाकियू के संस्थापक महेंद्र सिंह टिकैत की अगुवाई में 1988 में दिल्ली में हुई बोर्ट क्लब रैली, किसानों के आंदोलन के इतिहास में दर्ज है, जब केंद्र सरकार को किसानों की मागें माननी पड़ी थी।
राकेश टिकैत के बड़े भाई और इस समय भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत भी बीते दिनों किसानों के आंदोलन में हिस्सा लेने गाजीपुर बॉर्डर आए थे, लेकिन संगठन की ओर से यहां आंदोलन की कमान राकेश टिकैत ही संभाले हुए हैं। राकेश टिकैत को एक दिसंबर को विज्ञान-भवन में किसान संगठनों के साथ हुई मंत्रि-स्तरीय वार्ता में आमंत्रित नहीं किया गया, लेकिन बाद में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कृषि भवन में उसी शाम उनको आमंत्रित किया था। हालांकि बाद की वार्ताओं में वह शामिल रहे हैं।
राकेश टिकैत ने कहा कि सरकार जब फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है तो उस पर फसलों की खरीद भी होनी चाहिए। उन्होंने कहा, हम चाहते हैं कि सरकार तीनों नये कानूनों का वापस ले और किसानों को एमएसपी की गारंटी के लिए नया कानून बनाए।
--आईएएनएस
तिरुवनंतपुरम, 22 दिसम्बर | केरल के बहुचर्चित नन (सिस्टर) अभया 'हत्या' मामले में 28 साल बाद यहां सीबीआई की विशेष अदालत मंगलवार को अपना फैसला सुनाएगी। इस चर्चित मुकदमे का सामना कर रहे कैथोलिक पादरी थॉमस एम. कोट्टुर पहले आरोपी हैं और एक नन सेफी तीसरी आरोपी हैं।
साल 2018 में मामले के दूसरे आरोपी एक अन्य कैथोलिक पादरी जोस पूथृक्कयिल को अदालत ने बरी कर दिया था।
कोट्टायम में पायस एक्स कॉन्वेंट की एक नन अभया को 27 मार्च 1992 को परिसर के भीतर के कुएं में मृत पाया गया था।
इस मामले को क्राइम ब्रांच और सीबीआई ने शुरूआत में आत्महत्या करार देते हुए खारिज कर दिया था, लेकिन एक कार्यकर्ता जोमन पुथेनपुरकल ने एक एक्टन काउंसिल का गठन किया, जिसके बाद मामला आगे बढ़ा।
पुथेनपुरकल द्वारा मामले को दूसरी बार फिर से खोलने में कामयाब होने के बाद बदलाव आया, जिसके बाद सीबीआई अधिकारियों के 13वें बैच ने 19 नवंबर, 2008 को पूथृक्कयिल सहित तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।
पूथृक्कयिल पूर्व में कोट्टायम कॉलेज में एक मलयालम प्रोफेसर थे, जहां अभया ने अध्ययन किया था, जबकि कोट्टुर कोट्टायम में कैथोलिक चर्च के डायोकेसन चांसलर थे और सेफी कॉन्वेंट निवासी थी, जहां यह घटना घटी थी।
तीनों आरोपियों को एक जनवरी, 2009 को जमानत दे दी गई थी।
--आईएएनएस
अविभाजित मध्यप्रदेश शासन के पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा का आकस्मिक निधन हो जाने पर मंगलवार 22 दिसंबर 2020 को राजीव भवन रायपुर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया है इस दौरान अनुपम नगर चौक से श्रीराम नगर ओवरब्रिज तक मार्ग पर आवागमन पूर्णता प्रतिबंधित रहेगा! अतः इस मार्ग से आवागमन करने वाले जन सामान्य नागरिकों से अपील है कि वे असुविधा से बचने के लिए अन्य मार्ग का प्रयोग करें!
1. अनुपम नगर चौक से श्री राम नगर ओवरब्रिज होकर विधानसभा की ओर जाने वाले यातायात अनुपम नगर चौक से लोधी पारा अवंती बाई चौक होकर आवागमन कर सकते हैं!
अनुपम नगर चौक से श्री राम नगर ओवरब्रिज होकर विधानसभा रोड से बलोदा बाजार जाने वाली यातायात तेलीबांधा से राष्ट्रीय राजमार्ग 53 होकर राजू ढाबा रिंग रोड नंबर 3 से विधानसभा चौक होकर बलौदा बाजार की ओर आवागमन कर सकते हैं!
दुर्ग में यातायात व्यवस्था
मंगलवार 22 दिसंबर 2020 को वोरा जी के निवास, पद्मनाभपुर दुर्ग में श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया है तथा अंतिम यात्रा पद्मनाभपुर से मुक्तिधाम शिवनाथ नदी ऐनीकट के पास तक जायेगी। इस दौरान महाराजा चौक से जेल तिराहा चौक तक तथा अंतिम यात्रा मार्ग पर आवागमन पूर्णता प्रतिबंधित रहेगा! इन मार्ग से आवागमन करने वाले जन सामान्य नागरिकों से अपील है कि वे असुविधा से बचने के लिए अन्य मार्ग का प्रयोग करें :-
1. महाराजा चौक से जेल तिराहा होकर सिविल लाइन की ओर जाने वाले यातायात महाराजा चौक से कसारीडीह होकर सिविल लाइन की ओर आवागमन कर सकते हैं!
2. सेक्टर एरिया-तालपुरी से ठगडाबांधा होकर जेलतिराहा की ओर जाने वाली यातायात, 32 बंगला से होकर वाय शेप ब्रिज से दुर्ग की ओर आवागमन कर सकते है।
3. हिन्दी भवन(गाँधी मूर्ति) से जेल तिराहा की ओर जाने वाला यातायात, बस स्टैंड-मालवीय नगर चौक-वाय शेप ब्रिज होकर आवागमन कर सकते है।
4. दुर्ग शहर के भीतर भारी वाहन का प्रवेश पूर्ण: प्रतिबंधित रहेगा जिसमें भारी वाहनों को पंथी चौक सेक्टर10, गुरुद्वारा चौक नेहरू नगर, धमधा नाका ब्रिज, अंजोरा बायपास मोड़, पुलगांव चौक एवं महाराजा चौक से डायवर्ट किया जाएगा। अतः भिलाई से बालोद व राजनांदगाँव जाने वाले वाहन बायपास रोड से आवागमन कर सकते है।
बीजेपी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल के दो दिन के दौरे के आखिरी दिन क्या बाहरी का तमगा हटाने के लिए ही बीरभूम जिले में शांति निकेतन स्थित विश्वभारती विश्वविद्यालय पहुंचे थे?
क्या इसका एक मकसद रवींद्रनाथ टैगोर की प्रशंसा कर बीते लोकसभा चुनावों से पहले ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा टूटने से हुए नुकसान की भरपाई भी थी? शाह के दौरे से गरमाती राजनीति के बीच यहां राजनीतिक हलकों में यही सवाल उठ रहे हैं.
सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की मानें तो इसका जवाब 'हां' है और बीजेपी के नेताओं की सुनें तो इसका जवाब 'ना' है.
ध्यान रहे कि ममता बनर्जी और टीएमसी के तमाम नेता बीजेपी और उसके नेताओं को बाहरी बताते रहे हैं. ममता बार-बार कहती रही हैं कि बंगाल के लोग ही यहां राज करेंगे, गुजरात के नहीं.
माना जा रहा है कि अमित शाह अपने दौरे में इस रणनीति की काट के लिए ही राज्य की तमाम विभूतियों से जुड़ी जगहों का दौरा कर रहे हैं. इनमें विश्वभारती विश्वविद्यालय का स्थान सबसे ऊपर है.

सियासी फायदे के लिए दौरा
अपने दौरे के आखिरी दिन अमित शाह ने विश्वभारती में जाकर रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी के आवासों को देखा और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की.
उसके बाद उन्होंने उपासना गृह का दौरा किया और बाद में अपने सम्मान में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया. विश्वविद्यालय परिसर से बाहर निकलने से पहले पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कविगुरू की भूरि-भूरि सराहना की थी.
शाह ने पत्रकारों से कहा, "विश्वभारती में पहुंच कर दो महापुरुषों रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी के आवास को देखने और उनको श्रद्धांजलि अर्पित करने का सौभाग्य मिला. उन्होंने भारतीय ज्ञान, दर्शन, कला और साहित्य की गूंज पूरी दुनिया में पहुंचाई और विश्वभारती के जरिए इनके संरक्षण और संवर्धन में अहम भूमिका निभाई."
गृह मंत्री ने कहा कि रवींद्रनाथ ने दुनिया के कई देशों की भाषा, साहित्य, कला और संस्कृति के साथ भारतीय भाषाओं के सामंजस्य के लिए विश्वभारती को केंद्र बनाया.
शाह का रोड शो
वहां से निकलने के बाद उन्होंने पार्टी के कुछ अन्य नेताओं के साथ बाउल कलाकार बासुदेव दास के घर दोपहर का भोजन किया और उसके बाद रोड शो किया.
रोड शो में शाह ने दावा किया कि बंगाल में बदलाव की बयार तेज़ हो गई है और रोड शो में जुटी भीड़ इसका सबूत है. बाउल कलाकार के घर भोजन के बाद उन्होंने अपने एक ट्वीट में कहा, "बाउल कला बहुमुखी बांग्ला संस्कृति का सही प्रतिबिंब है."
लेकिन क्या शाह का बीरभूम दौरा बाहरी के तमगे से निजात पाने के लिए था? प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष ऐसा नहीं मानते. उनका कहना है कि रवींद्रनाथ सिर्फ बंगाल के ही नहीं पूरे देश के गौरव हैं. अमित शाह का दौरा सामान्य दौरा था. पहले दिन वे मेदिनीपुर गए और दूसरे दिन विश्व भारती गए. इसका कोई सियासी निहितार्थ नहीं था.
लेकिन दूसरी ओर, टीएमसी ने कहा है कि गुरुदेव के विचारों को जाने बिना बीजेपी अपने सियासी फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करने का प्रयास कर रही है.
पार्टी के नेता सुब्रत मुखर्जी कहते हैं, "बीजेपी बाहरी है. वह बंगाल के महापुरुषों का महत्व समझे बिना उनका राजनीतिक इस्तेमाल करने का प्रयास कर रही है. उसे बंगाल की संस्कृति की समझ नहीं है."
शांतिनिकेतन से दिल्ली
वैसे, शांतिनिकेतन से दिल्ली के लिए निकलने से पहले शाह ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो कहा उससे साफ हो गया कि पार्टी बाहरी के तमगे को हटाने के लिए जूझ रही है.
उनका कहना था, "बीजेपी अगर बंगाल की सत्ता में आती है तो मुख्यमंत्री इसी माटी का लाल बनेगा, कोई बाहरी नहीं."
शाह यहीं नहीं रुके. उन्होंने सवाल किया कि क्या ममता एक ऐसा देश चाहती हैं जहां एक राज्य के लोग दूसरे राज्य में नहीं जा सकें? क्या वे इंदिरा गांधी औऱ नरसिंह राव के बंगाल आने पर भी उनको बाहरी कहती थीं?
शाह ने कहा, "आप चिंता न करें. आपको हराने के लिए दिल्ली से कोई नहीं आएगा. बंगाल का ही कोई व्यक्ति राज्य का अगला मुख्यमंत्री बनेगा और वह बंगाली ही होगा."
केंद्रीय गृह मंत्री का कहना था कि राज्य सरकार की नाकामियों से ध्यान हटाने के लिए ममता और उनकी पार्टी बाहरी और स्थानीय का मुद्दा उठा रही है. उन्होंने आंकड़ों के हवाले कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य समेत विकास के तमाम सूचकांकों पर बंगाल का प्रदर्शन दयनीय रहा है.

निराधार आरोप
लेकिन रविवार को ही तृणमूल कांग्रेस ने आंकड़ें जारी करते हुए शाह की ओर से पेश आंकड़ों को निराधार और गलत करार दिया.
पार्टी के प्रवक्ता डेरेक ओ ब्रायन ने सोशल मीडिया पर जारी आंकड़ों में बंगाल में तीन सौ बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या के शाह के दावे को निराधार बताते हुए कहा है कि इनमें से ज्यादा लोग निजी दुश्मनी की वजह से मारे गए हैं. कई मामलों में तो आत्महत्या को भी हत्या में शामिल कर लिया गया है. इसके उलट 1997 से अब तक टीएमसी के 1027 कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है.
बीरभूम जिला तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष अणुब्रत मंडल कहते हैं, "बीजेपी के नेता चुनावों के समय नौटंकी करने लगते हैं. शाह का यह दौरा भी उसी नौटंकी का हिस्सा है. उनको बंगाल की संस्कृति और विभूतियों के बारे में कोई जानकारी नहीं है. बीजेपी कविगुरु जैसी हस्ती को भी सियासी हित में इस्तेमाल करने का प्रयास कर रही है."
टीएमसी नेता सुब्रत मुखर्जी कहते हैं, "बीजेपी बाहरी है. वह बंगाल के महापुरुषों का महत्व समझे बिना उनका राजनीतिक इस्तेमाल करने का प्रयास कर रही है. उसे बंगाल की संस्कृति की समझ नहीं है."
शांतिनिकेतन दौरे पर विवाद
शाह के शांतिनिकेतन दौरे पर विवाद भी पैदा हो गया है. दरअसल, शाह के दौरे से पहले एक स्थानीय संगठन की ओर से जो बैनर और कट-आउट लगाए गए थे उनमें रवींद्रनाथ से ऊपर शाह की तस्वीर थी.
विश्व भारती के छात्रों के विरोध के बाद हालांकि बाद में उनको हटा लिया गया था.
लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने इस मुद्दे पर शाह और बीजेपी पर जम कर हमले किए.
इसके विरोध में पार्टी की ओर से कविगुरु के जन्म स्थान जोड़ासांको में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया.
शांतिनिकेतन और विश्वभारती में तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद् और गैर-शिक्षक कर्मचारी संगठन की ओर से इसके विरोध में रैली निकाली गई.
बंगाल का अपमान
टीएमसी नेताओं ने इस मुद्दे पर शाह और बीजेपी पर हमला करते हुए उन पर टैगोर का अपमान करने का आरोप लगाया है.
ग्रामीण विकास मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने पत्रकारों से कहा, "जो लोग बंगाल की संस्कृति नहीं समझते और बंगाल के गौरव विद्यासागर और रवींद्रनाथ टैगोर का सम्मान नहीं करते, वही बंगाल पर कब्जा करने का सपना देख रहे हैं."
शहरी विकास मंत्री फिरहाद हकीम कहते हैं, "बीजेपी ने रवींद्रनाथ का ही नहीं बल्कि बंगाल की जनता का अपमान किया है. हम कविगुरु को माथे पर बिठा कर रखते हैं. लेकिन बैनरों में उनको अमित शाह के नीचे दिखाया गया है. यह बंगाल की संस्कृति का अपमान है."
उन्होंने कहा कि बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी कविगुरु का जन्मस्थान जोड़ासांको के बदले शांतिनिकेतन बताया था.
टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार कहती हैं, "बीजेपी की निगाहों में बंगाल की विभूतियों का कोई सम्मान नहीं है. इसलिए कभी वह विद्यासागर की प्रतिमा तोड़ती है तो कभी अपने नेता की तस्वीर कविगुरु से ऊपर लगाती है."
स्थानीय बनाम बाहरी विवाद
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार को अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में शाह की खिंचाई करते हुए कहा कि उन्होंने अपने दौरे में झूठों का पुलिंदा पेश किया है. केंद्रीय गृह मंत्री के पद पर बैठे किसी नेता को ऐसे झूठे दावे और बयान शोभा नहीं देते.
ममता ने भी बोलपुर में 29 दिसंबर को रैली का एलान किया है.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है इस बार बीजेपी के नेता समझ गए हैं कि ममता के बांग्ला राष्ट्रवाद का मुद्दा हिंदू राष्ट्रवाद की पार्टी की अवधारणा पर भारी पड़ेगा. इसलिए पार्टी के तमाम नेता चुन-चुन कर ऐसी जगहों पर जा रहे हैं. इससे एक तो बाहरी के तमगे से निजात मिल सकती है और दूसरे पार्टी यह दिखा सकती है कि राज्य के मनीषियों के प्रति उसके मन में भारी सम्मान है.
राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रहे सुनील कुमार कर्मकार कहते हैं, "बीते लोकसभा चुनावों में बीजेपी ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा टूटने का खामियाजा भर चुकी है. आखिरी दौर के मतदान से पहले कोलकाता में शाह के रोड शो के दौरान उस प्रतिमा के टूटने की वजह से उस दौर में पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका था. ममता ने उस मुद्दे को अपने सियासी हक में बेहतर तरीके से भुना लिया. यही वजह है कि पार्टी के नेताओं ने इस बार अपनी रणनीति में बदलाव किया है."
एक अन्य पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती भी कहते हैं, "बंगाल की सत्ता पर कब्जे के लिए पार्टी अब टीएमसी के बाहरी बनाम स्थानीय मुद्दे को गंभीरता से लेकर इसकी काट की रणनीति के तहत ही मनीषियों से जुड़ी जगहों का दौरा कर रही है. शायद उसने बीते साल की घटना से सबक सीखा है. क्या उसे इसका कोई फायदा मिलेगा, इस सवाल का जवाब तो आने वाले दिनों में मिलेगा. लेकिन चुनावों से पहले स्थानीय बनाम बाहरी विवाद के और गहराने की संभावना है." (bbc)
-सुदीप ठाकुर
मोतीलाल वोरा जी से जुड़ी बातें बचपन से सुनता आया हूं। राजनांदगांव के दिवंगत कवि और मुक्तिबोध के मित्र नंदूलाल चोटिया याद करते थे कि किस तरह वोरा जी एक समय साइकिल से चलते थे। तब वह समाजवादी राजनीति से जुड़े हुए थे। बाद में वह रहने के लिए राजनांदगांव से दुर्ग चले गए थे। राजनांदगांव के समाजवादी नेताओं मदन तिवारी, जेपीएल फ्रांसिस और विद्याभूषण ठाकुर से उनके काफी करीबी संबंध बन रहे। वोरा के मुख्यमंत्री बनने और इन नेताओं के विपक्ष में होने के बावजूद उनके संबंध बेहद सहज बने रहे। ये नेता उन्हें अक्सर राजनांदगांव के उन दिनों की याद दिलाते थे, जब वह भी वहां के श्रमिकों, किसानों और आदिवासियों के आंदोलन का हिस्सा हुआ करते थे। इन तीनों समाजवादी नेताओं का पहले ही निधन हो चुका है। वोरा जी राजनीति में आने से पहले राजनांदगांव से प्रकाशित अखबार सबेरा संकेत और रायपुर से प्रकाशित नवभारत से बतौर पत्रकार भी जुड़े थे। 1960 में जब रायपुर में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का अधिवेशन हुआ था, तो उसे उन्होंने बतौर पत्रकार ही कवर किया था। इस अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर कांग्रेस के सारे बड़े नेता शामिल हुए थे। इसी अधिवेशन के समय पुराने मध्य प्रदेश के दिग्गज आदिवासी नेता लालश्याम शाह तीस हजार से भी अधिक आदिवासियों के साथ महाराष्ट्र सीमा से सटे मानपुर मोहला से पैदल रायपुर पहुंच थे। अपनी किताब लाल श्याम शाह एक आदिवासी की कहानी के शोध के दौरान वोरा जी से कई बार मुझे मिलने का मौका मिला। इस पोस्ट के साथ की तस्वीर तब की है, जब मैंने उन्हें अपनी किताब भेंट की थी।
करीब पांच दशक पूर्व वोरा जी के प्रयास और उनकी सक्रियता से आम लोगों से चंदा लेकर राजनांदगांव के पुराने बस अड्डे में गांधी की एक प्रतिमा स्थापित की गई थी। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में उलझने के बाद छत्तीसगढ़ और राजनांदगांव उनसे दूर होते चले गए... सादर नमन
मुंबई, 22 दिसम्बर | अभिनेता विद्युत जामवाल अभिनीत फिल्म 'खुदा हाफिज' अब 27 दिसंबर को टेलीविजन पर प्रीमियर के लिए तैयार है। अभिनेता ने कहा, " 'खुदा हाफिज' एक ऐसे व्यक्ति की सच्ची जीवन पर आधारित, जो अपनी पत्नी को वापस लाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इस फिल्म से मिले प्यार से मैं बहुत खुश हूं। फिल्म का प्रीमियर अब टेलीविजन पर होगा, दर्शकों की प्रतिक्रिया देखने का इंतजार कर रहा हूं।"
फिल्म 'खुदा हाफिज' भारत के एक युवा की कहानी है, जिसकी शादी हाल ही में हुई है, जो बेहतर करियर के अवसरों की तलाश में विदेश जाने का फैसला करता है। लेकिन विदेश में उसकी पत्नी नरगिस रहस्यमय तरीके से लापता हो जाती है। और फिर समीर एक असहाय आम आदमी की तरह अपनी पत्नी को उसके साथ सुरक्षित वापस लाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार होता है।
फिल्म 'खुदा हाफिज' स्टार गोल्ड पर 27 दिसंबर को प्रसारित होगी।
--आईएएनएस
गुवाहाटी, 22 दिसंबर । दो साल पहले पांच साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के आरोपी को सोमवार को उत्तरी असम की एक जिला अदालत ने को फांसी की सजा सुनाई। आरोपी मंगल पाइक को विश्वनाथ जिला अतिरिक्त सत्र न्यायालय के न्यायाधीश दीपांकर बोरा ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (ए) के तहत पाइक को दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई। यह मामला धारा 302 (हत्या) के साथ यौन अपराधों से संबंधित है।
अदालत ने उसे प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंशन (पॉक्सो) एक्ट की धारा 6 के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई और 7,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
आईपीसी की धारा 363 (अपहरण) के तहत अदालत ने आरोपी को 3,000 रुपये का जुर्माना लगाने के अलावा सात साल की जेल की सजा भी सुनाई।
इस शख्स ने छोटी बच्ची को चॉकलेट देकर बहला-फुसलाकर एक चाय बागान (सूतेना थाना क्षेत्र के अंतर्गत) एक सुनसान जगह पर ले गया था, जहां नवंबर 2018 में गला घोंटकर उसके साथ दुष्कर्म किया।
पुलिस के अनुसार निकटवर्ती सोनितपुर जिले के लोहरा बुरहागांव क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाला दोषी पीड़िता का रिश्तेदार था और कुछ कामों के लिए कभी-कभार ही उसके घर आता था।
लोक अभियोजक जाह्न्वी कलिता ने मीडिया को बताया कि ट्रायल के दौरान डॉक्टर, पुलिसकर्मी और ग्रामीणों सहित सभी 16 गवाहों से पूछताछ की गई।
--आईएएनएस
जम्मू, 22 दिसंबर | जम्मू एवं कश्मीर के चुनाव आयुक्त (एसईसी) के. के. शर्मा ने सोमवार को कहा कि जिला विकास परिषद (डीडीसी) के चुनाव परिणामों को ऑनलाइन एक्सेस किया जा सकता है। वेबसाइट एचटीटीपी : सीईओजेके डॉट एनआईसी डॉट इन पर चुनाव परिणामों की उपलब्धता के बारे में मीडिया को जानकारी देते हुए एसईसी ने कहा कि राज्य चुनाव प्राधिकरण लोगों और मीडिया को समान रूप से एक गतिशील आधार पर चुनाव परिणामों और रुझानों तक पहुंचने की सुविधा प्रदान करेगा। जम्मू-कश्मीर में कई चरणों में हाल ही में संपन्न हुए डीडीसी चुनाव की मतगणना मंगलवार को होगी।
उन्होंने कहा कि रैंडमाइजेशन और टाइम-टेस्टिड प्रोटोकॉल के तुरंत बाद मतपेटियों को खोला जाएगा और मतगणना के लिए मतपत्रों को आपस में मिला दिया जाएगा और आगे की जानकारी वेबसाइट पर लोगों को दी जाएगी।
एसईसी ने कहा कि मंगलवार की गिनती 280 डीडीसी सीटों के लिए चुनावी मैदान में उतरे 2,178 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेगी।
उन्होंने यह भी बताया कि केंद्र शासित प्रदेश में सभी आठ चरणों में कुल 51.42 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया है और मंगलवार को मतगणना केंद्रों पर 30 लाख से अधिक मतों की गणना की जाएगी।
राज्य चुनाव आयोग के सचिव अनिल सलगोत्रा ने मीडियाकर्मियों को वेबसाइट के कामकाज के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि मीडिया के साथ सभी 280 डीडीसी निर्वाचन क्षेत्रों के लिए मतगणना के रुझानों, अंतिम परिणामों और पार्टी-वार रुझानों तक लोगों की पहुंच होगी।
उन्होंने कहा कि वेबसाइट को किसी दिए गए जिले में एक विशेष निर्वाचन क्षेत्र और एक विशेष पार्टी के संबंध में रुझानों के लिए भी एक्सेस किया जा सकता है, इसके अलावा शीर्ष दो प्रमुख उम्मीदवारों के लिए जानकारी और सभी उम्मीदवारों के लिए मतदान किए गए समग्र वोट भी एक्सेस किए जा सकते हैं।
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जयपुर, 22 दिसंबर | सीबीएसई बोर्ड के 12वीं कक्षा के छात्रों को मनोवैज्ञानिकों और काउंसलरों का दौरा करना पड़ रहा है, क्योंकि अभी तक परीक्षा की तारीख, परीक्षा पैटर्न और प्रैक्टिकल परीक्षा को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है।
12वीं कक्षा के लिए बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे एक छात्र की परिजन अंकिता ने कहा कि पिछले साल दिसंबर की तुलना में इस बार कोरोना महामारी के साथ चीजें काफी अनिश्चित हो गई हैं।
उन्होंने कहा कि अधिकांश समय छात्र व्हाट्सएप से जुड़े होते हैं, क्योंकि कोचिंग और अन्य अपडेट के लिए उन्हें वहां सभी लिंक मिल जाते हैं। जिस क्षण वे यह नहीं कर पाते, वे अपनी कक्षा नहीं ले पाते, जो उनके लिए बहुत बड़ा नुकसान है। अंकिता ने कहा, आखिरकार वे अपना सारा समय मोबाइल पर बिता रहे हैं, व्हाट्सएप अपडेट की जांच कर रहे हैं, कक्षाओं में भाग ले रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने कहा कि जब इससे छात्रों को कुछ फुर्सत मिलती है, तब वह वेब सीरीज देख रहे होते हैं।
जयपुर की मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक डॉ. अनामिका पापारीवाल ने कहा, ऐसे कई छात्र हैं, जो काउंसलिंग के लिए हमारे पास आते हैं और वे लॉकडाउन के बाद से व्यथित हैं। पिछले 10 महीनों से वे न तो दोस्तों से मिल पा रहे हैं और न ही शिक्षकों से अपनी शंकाओं को स्पष्ट करने के लिए मिल पा रहे हैं। वह बताती हैं कि परीक्षा की तारीखों, प्रश्नपत्रों के पैटर्न और प्रैक्टिकल के बारे में अनिश्चितता उनकी परेशानी में इजाफा कर रही है, जो उनके लिए तनाव जैसी स्थिति पैदा कर रही है।
उन्होंने कहा कि कई छात्र अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं और हार मानते हुए कहते हैं, अब जो भी होगा, देखा जाएगा, 'जो उनके माता-पिता को समान रूप से चिंतित कर रहा है और वे भी काउंसलिंग सत्र के लिए आ रहे हैं।
12वीं कक्षा में गणित के विद्यार्थी अंकित ने कहा, हमारी कक्षा बारहवीं की परीक्षा की स्थिति स्पष्ट नहीं है, जबकि कई इंजीनियरिंग संस्थानों ने अगले सत्र के लिए अपने प्रवेश पत्र पहले ही जारी कर दिए हैं।
छात्र ने परीक्षा को लेकर अस्पष्टता पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि सीबीएसई ने 30 प्रतिशत पाठ्यक्रम को कम कर दिया है, उनके लिए महत्वपूर्ण था और एक स्कोरिंग हिस्सा था। अंकित ने कहा, अब, जब हमने किसी भी कक्षा में भाग नहीं लिया है तो एक पूर्ण सत्र में हम किस तरह से प्रैक्टिकल में भाग लेंगे और बोर्ड परीक्षा देंगे। इसके बाद वर्तमान परिस्थितियों में प्रतिस्पर्धी और अन्य प्रवेश परीक्षाओं को पास करना भी एक चुनौती है।
डॉ. अनामिका कहती हैं, हम यहां आने वाले छात्रों की काउंसलिंग कर रहे हैं और उन्हें बता रहे हैं कि हर कोई मौजूदा चुनौतियों का हल ढूंढने की कोशिश कर रहा है। इसलिए वे भी लंबे समय में विजेता बनकर उभरेंगे।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ने 10 दिसंबर को एक लाइव इंटरेक्टिव सत्र में छात्रों को आश्वासन दिया कि वे जल्द ही स्कूल लौटेंगे, क्योंकि देश में कोविड-19 की स्थिति में सुधार हो रहा है। वर्तमान में 17 राज्यों ने स्कूलों को फिर से खोलने का फैसला किया है।
पोखरियाल अब 22 दिसंबर को शिक्षकों के साथ लाइव जुड़ेंगे।
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