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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बेमेतरा, 13 मार्च। नेशनल हाईवे-30 में शुक्रवार दोपहर को चारपहिया वाहन व मालवाहक की आमने-सामने इतनी जोरदार टक्कर हुई कि उसमें सवार दो लोगों की मौके पर ही जान चली गई व दो अन्य गंभीर रूप से घायलों को प्राथमिक उपचार के बाद मेकाहारा रायपुर भेज दिया गया है। दुर्घटना के बाद बोलेरो में फंसे युवकों को बड़ी मशक्कत के बाद बाहर निकाला गया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार बेमेतरा से 15 किमी दूर ग्राम जौंग और रांका के बीच की है। शुक्रवार को सिमगा की ओर से आ रही बोलेरो व बेमेतरा से सिमगा-रायपुर की ओर जा रही मालवाहक में भिड़ंत हो गई। बोलेरो में चार व्यक्ति सवार थे, जिसमें से दो व्यक्ति की मौके पर ही मौत हो गई। मृतकों में दीपक कौशिक (30) निवासी नारधा जिला दुर्ग व नरेंद्र हिरवानी ग्राम मुगेसर जिला रायपुर है। मृतकों के साथ बैठे मोंटू वर्मा ग्राम मुगेसर व राहुल लहरे दोनों गंभीर रूप से घायल हुए हंै। दोनों को सिमगा के शासकीय अस्पताल में भर्ती किया गया। जहां से प्राथमिक उपचार के बाद दोनों को मेकाहारा रायपुर भेज दिया गया।
बोलेरो सवार लोग बेमेतरा जिले के घर पथर्रा में बारात आए हुए थे, जो किसी काम से सिमगा गए थे। वहां से वापस आते समय दुर्घटना के शिकार हो गए। बोलेरो के सामने का हिस्सा पूरी तरह चकनाचूर हो गया है। मालवाहक महाराष्ट्र पासिंग का है, जिसमें अंगूर की पेटी लदा हुआ है। हादसे के बाद चालक फरार है।
सरगुजा में ईसीएस अस्पताल खोलने का निर्णय
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर,13 मार्च। श्रम कल्याण मंडल की छात्रवृत्ति योजना पुन: शुरू कर दी गयी है। 31 मार्च के पूर्व सभी पात्र हितग्राहियो को छात्रवृत्ति वितरीत कर दी जाएगी। दन्तेवाड़ा की तर्ज पर सरगुजा और रायपुर में अत्याधुनिक सिलाई प्रशिक्षण केंद्र और सरगुजा में ईसीएस अस्पताल खोलने का निर्णय लिया गया है।
राज्य श्रम कल्याण मण्डल के अध्यक्ष शफी अहमद ने मण्डल के कार्यों की समीक्षा की। मण्डल के अस्तित्व में आने के बाद से पहली बार सात हजार से अधिक संस्थानों को नोटिस जारी किया गया था, जिसका बेहतर परिणाम सामने आया है,इसे और प्रभावी बनाने 9 से अधिक मजदूरो वाले संस्थानों की पहचान कर पंजीयन और अभिदाय वसूली तेज करने निर्देशित किया।औधोगिक क्षेत्र में संचालित दाल भात सेंटर को 4 घण्टे खोलने, भोजन में चावल की मात्रा दो सौ से बढ़ा कर तीन सौ ग्राम करने का निर्णय लिया गया।
अध्यक्ष शफी अहमद ने बताया दन्तेवाड़ा कलेक्टर ने स्वयं सिलाई सेंटर को कार्पोरेट बिजनेस का रूप दिया है।महिलाओ को प्रशिक्षण उपरांत काम दिलाने के लिए बैंगलोर की कम्पनी से एमओयू किया गया है। डी नेक्स्ट के ब्रांड नाम से अच्छी क्वालिटी के रेडीमेड कपड़े तैयार किये जा रहे हैं,इसी तर्ज पर रायपुर और अम्बिकापुर में पायलट प्रोजेक्ट तैयार किया जा रहा है।सभी औद्योगिक जिलो में श्रमिक भवन, दाल भात केंद्र और सिलाई केंद्र के लिए राज्य सरकार से भूमि मांगी गई है।आबंटन मिलते ही वहां कार्य आरंभ किया जाएगा। मजदूरों के बच्चों के बीच खेल गतिविधियों को बढ़ावा देने खेल सामग्री का वितरण, प्रतियोगिता का आयोजन किया जाएगा।
अध्यक्ष श्री अहमद ने मण्डल के कार्यो की प्रगति से सन्तुष्टि जाहिर करते हुए इसे और तेज करने पर बल दिया।उन्होंने कहा कुछ माह पूर्व तक शिकायत हेल्पलाइन पर एक भी शिकायत दर्ज नही होती थी, आज प्रतिदिन शिकायत दर्ज हो रही है।आगामी दिनों में सरकार द्वारा श्रमिको को दी जाने वाली सुविधाओं की जानकारी हाईटेक माध्यम से दी जाएगी।
समीक्षा बैठक में श्रम कल्याण आयुक्त, श्रम कल्याण निरीक्षकों सहित मैदानी अमला उपस्थित रहे।
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वित्त और विदेश मंत्री रहे यशवंत सिन्हा शनिवार को कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए.
2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से यशवंत सिन्हा बीजेपी से नाराज़ चल रहे थे. इसी नाराज़गी के दौरान उन्होंने पार्टी भी छोड़ दी थी.
हालाँकि यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा अब भी बीजेपी में हैं और वे झारखंड के हजारीबाग लोकसभा सीट से सांसद हैं. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में वे मंत्री भी बनाए गए थे. यशवंत सिन्हा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगातार हमला बोलते रहे हैं.
टीएमसी में शामिल होने से पहले यशवंत सिन्हा ने ममता बनर्जी से उनके आवास पर मुलाक़ात की. मुलाक़ात के बाद सिन्हा ने केंद्र की मोदी सरकार पर जमकर हमला बोला.
सिन्हा ने कहा, ''देश दोराहे पर खड़ा है. हम जिन मूल्यों पर भरोसा करते हैं, वे ख़तरे में हैं. न्यायपालिका समेत सभी संस्थानों को कमज़ोर किया जा रहा है. यह पूरे देश के लिए एक अहम लड़ाई है. यह कोई राजनीतिक लड़ाई नहीं है बल्कि लोकतंत्र बचाने की लड़ाई है.''
यशवंत सिन्हा ने कहा, ''ममता जी और मैंने साथ में मिलकर अटल जी के सरकार में काम किया था. ममता जी शुरू से ही फ़ाइटर रही हैं. आज मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण हो गया था और जब उसे आतंकवादी कंधार ले गए थे तो एक दिन कैबिनेट में चर्चा हो रही थी. उसी चर्चा में ममता जी ने कहा कि वो स्वयं बंधक बनकर जाएंगी वहाँ पर लेकिन शर्त ये होगी जो बाकी बंधक हैं उन्हें छोड़ दिया जाए.''
तब ममता बनर्जी अटल सरकार में रेल मंत्री थीं.

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यशवंत सिन्हा टीएमसी जॉइन करने के मौक़े पर कहा, ''आप सभी को आश्चर्य हो रहा होगा कि क्यों इस उम्र में आकर मैंने दलगत राजनीति से ख़ुद को अलग कर लिया था तो फिर किसी पार्टी में शामिल होकर सक्रिय हो रहा हूँ. आज के समय में देश एक अद्भुत बदलाव की स्थिति से गुज़र रहा है. अभी तक जिन मूल्यों को हम महत्व देते थे और ये सोचकर चलते थे कि इस पर प्रजातंत्र में हर कोई अमल करेगा ही, वो मूल्य आज ख़तरे में हैं. हम सभी इस बात से परिचित हैं कि प्रजातंत्र की ताक़त प्रजातंत्र की संस्थाएं होती हैं. जो आज लगभग, हर संस्था कमज़ोर हो चुकी है और इस बात का बेहद अफ़सोस है कि इसमें न्यायपालिका भी शामिल है.''
सिन्हा ने कहा, ''सरकार के मनमानेपन पर अंकुश लगाने वाला कोई नहीं है. हमारे देश के लिए यह सबसे बड़ा ख़तरा पैदा हो गया है. प्रजातंत्र का मतलब सिर्फ़ पाँच साल में चुनाव और वोटो से नहीं है. इसका मतलब है कि जो लोग चुनकर आए वो लोगों के लिए काम करें. किसान आज परेशान हैं लेकिन किसी को कोई चिंता नहीं. मज़दूर पलायन करके कैसे गए वो हम सबने देखा. शिक्षा, स्वास्थ्य ये सब आज दुर्दिन से गुज़र रहे हैं और सरकार को कोई चिंता नहीं है.''
सिन्हा ने कहा, ''बंगाल में चुनाव होने जा रहे हैं और इसमें कोई शक नहीं है कि टीएमसी बहुमत के साथ वापस आएगी और बंगाल से एक संदेश जाना चाहिए कि देश अब इसको बर्दाश्त नहीं करेगा. मोदी और शाह दिल्ली से जो चला रहे हैं, उसे देश अब बर्दाश्त नहीं करेगा.''
नौकरशाह से राजनेता
यशवंत सिन्हा 1960 में आईएएस के लिए चुने गए और पूरे भारत में उन्हें 12वाँ स्थान मिला. आरा और पटना में काम करने के बाद उन्हें संथाल परगना में डिप्टी कमिश्नर के तौर पर तैनात किया गया.
यशवंत सिन्हा ने 2009 का चुनाव जीता, लेकिन 2014 में उन्हें बीजेपी का टिकट नहीं दिया गया. धीरे-धीरे नरेंद्र मोदी से उनकी दूरी बढ़ने लगी और अंतत: 2018 में 21 वर्ष तक बीजेपी में रहने के बाद उन्होंने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया.
यशवंत सिन्हा ने कहा था, 'हाँलाकि मैंने इस बात की हिमायत की थी कि मोदी जी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया जाए लेकिन 2014 का चुनाव आते-आते मुझे इस बात का आभास हो गया था कि इनके साथ चलना मुश्किल होगा. इसलिए मैंने तय किया कि मैं चुनाव लड़ूंगा ही नहीं.''
यशवंत सिन्हा भारतीय जनता पार्टी में न संघ से आए थे और न ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से. 24 साल आईएएस की भूमिका निभाने के बाद वो 1984 में राजनीति में आए. 1990 में वो चंद्रशेखर की सरकार में वित्त मंत्री बने.
हालांकि यशवंत सिन्हा ख़ुद इस बात को मानते हैं कि अर्थव्यवस्था में उनकी कोई विशेषज्ञता नहीं थी. सिन्हा ने अपनी किताब 'कन्फेशन्स ऑफ अ स्वदेशी रिफॉर्मर' में लिखा है कि उन्होंने केवल 12वीं क्लास में ही अर्थव्यवस्था पढ़ी थी.
वित्त मंत्रालय पंसद नहीं
सिन्हा ने इतिहास में ग्रैजुएशन किया था और मास्टर्स में राजनीति शास्त्र को चुना था. इसके बाद उन्होंने सिविल सेवा को अपना करियर बना लिया था. यशवंत सिन्हा ने ख़ुद लिखा है आर्थिक मुद्दों को समझना और वित्त मंत्रालय की चुनौतियों से निपटना दोनों अलग चीज़ें हैं.
इस पृष्ठभूमि को जानने-समझने के बावजूद चंद्रशेखर ने यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री बनाया. तब भारत की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में थी. 1990 और 91 में भारत जिन आर्थिक संकटों से जूझ रहा था उसे लेकर जाने-माने अर्थशास्त्री और रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर आइजी पटेल ने कहा था कि यह आज़ाद भारत का सबसे बड़ा आर्थिक संकट है.
चंद्रशेखर के कार्यकाल में वित्त मंत्री
यशवंत सिन्हा ने अपनी किताब में लिखा है कि तब सुब्रमण्यन स्वामी वित्त मंत्री बनना चाहते थे, लेकिन कई लोग उनके ख़िलाफ़ थे. सिन्हा ने लिखा है कि स्वामी को मनाने के लिए तब वाणिज्य के साथ क़ानून-न्याय जैसे दो-दो मंत्रालय उन्हें दिए गए थे.
सिन्हा ने लिखा है कि वो ख़ुद भी वित्त मंत्री नहीं बनना चाहते थे. उनका मन विदेश मंत्री बनने का था, लेकिन चंद्रशेखर चाहते थे कि देश की अर्थव्यवस्था जिस संकट में है, उससे यशवंत सिन्हा ही निकाल सकते हैं.
हालांकि चंद्रशेखर की सरकार एक साल भी नहीं रही और फिर इस आर्थिक संकट से पीवी नरसिम्हा राव और उनके वित्त मंत्री मनमोहन सिंह को जूझना पड़ा. जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में 1998 में सरकार बनी तो एक बार फिर से यशवंत सिन्हा वित्त मंत्री बने.
यह सरकार भी 13 महीने तक ही चली. 1999 में फिर से वाजपेयी की वापसी हुई और यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्रालय मिला. (bbc.com)
भाजपा में है भारी गुटबाजी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 13 मार्च। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक बार फिर केन्द्र सरकार पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार नहीं चाहती है कि किसानों का भला हो। किसानों को किसी तरह का लाभ पहुंचे, यह बर्दाश्त नहीं हो रहा है। श्री बघेल ने साफ किया कि किसानों से समर्थन मूल्य पर ही धान खरीद की गई है।
सिरपुर रवाना होने से पहले मीडिया से चर्चा में श्री बघेल ने उन खबरों का खंडन किया जिसमें कहा गया कि प्रदेश सरकार ने 25 सौ रूपए क्विंटल में धान खरीद की गई है। उन्होंने कहा कि सरकार ने समर्थन मूल्य 1868 रूपए की दर से ही धान खरीदी की गई है। सरकार राजीव गांधी न्याय योजना के माध्यम से किसानों को अंतर की राशि दे रही है, और 31 मार्च से पहले अंतिम किश्त जारी कर दी जाएगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि केन्द्र सरकार सिर्फ 24 लाख टन चावल लेने की बात कह रही है। नए बारदाने में चावल जमा करने के लिए कहा गया है। जब केन्द्र सरकार ने नए बारदाने ही नहीं उपलब्ध कराए हैं, तो बारदाना कहां से आएगा। उन्होंने कहा कि धान को सड़ाया नहीं जा सकता है। ऐसे में इसका डिस्पोजल करना जरूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने एथेनॉल बनाने की अनुमति भी मांगी थी, लेकिन केन्द्र ने अब तक इसकी अनुमति नहीं दी है। उन्होंने कहा कि धान खरीदी पर अड़ंगा लगाया गया है।
विधानसभा का बजट सत्र जल्द खत्म होने के सवाल पर कहा कि भाजपा चर्चा में हिस्सा नहीं लेना चाहती थी। भाजपा में भारी गुटबाजी है। कोरोना के बढ़ते मामलों के चलते लॉकडाउन की संभावना पर मुख्यमंत्री ने कहा कि लॉकडाउन से गरीब, व्यापारी और आम लोगों को नुकसान होता है। उन्होंने अपील की कि कोरोना से बचाव के लिए मास्क लगाएं, और सेनिटाइजर का उपयोग करें। यह ऐसी बीमारी नहीं है, जिसका बचाव नहीं हो सकता है। उन्होंने असम चुनाव पर कहा कि वहां कांग्रेस की सरकार बनेगी।
चेंबर चुनाव के लिए मतदान जारी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
भिलाई नगर, 13 मार्च। शनिवार को चैंबर ऑफ कॉमर्स में पदाधिकारी चयन के लिए मतदान जारी है। आज चैंबर ऑफ कामर्स चुनाव में भिलाई, दुर्ग और बेमेतरा के वोटर्स को मतदान का अवसर दिया गया है। प्रदेश अध्यक्ष, प्रदेश महामंत्री और प्रदेश कोषाध्यक्ष के लिए तथा जिला से प्रदेश उपाध्यक्ष और प्रदेश मंत्री के लिए लगभग 3100 व्यापारी वोटर्स मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे।
विदित हो कि रायपुर क्षेत्र के बाद भिलाई में चैंबर सदस्यों की संख्या सर्वाधिक है। मतदान करने वाले व्यापारियों ने बताया कि यह चैंबर ऑफ कॉमर्स के चुनाव का सेमीफाइनल मुकाबला है, क्योंकि भिलाई-दुर्ग के वोटर्स ही लीड फैक्टर्स तय करेंगे।
ये चुनाव दोनों ही पैनलों के लिए महत्वपूर्ण है। भिलाई के अग्रसेन भवन में सुबह से ही चुनाव के लिए गजब का उत्साह व्यापारियों में देखने को मिल रहा है। हालांकि वोटर्स स्पष्ट नहीं कर रहे हैं कि रूझान जय व्यापार पैनल की तरफ है या एकता पैनल। दोनों ही पैनल एक दूसरे को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।
मुंह की सफाई और सांसों को ताज़ा रखने के लिए कुछ लोग माउथवॉश का सहारा लेते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं की माउथवॉश के इस्तेमाल के और क्या फायदे हैं, या ये आपको किस तरह से नुकसान पहुंचा सकता है और इसके इस्तेमाल का सही तरीका क्या है? आइये आपको माउथवॉश के फायदे और नुकसान के बारे में यहां बताते हैं और इसके इस्तेमाल का सही तरीका क्या है इस बारे में भी जानकारी देते हैं. माउथवॉश के इस्तेमाल के ये हैं फायदे-
कैविटीज़ को बढ़ने से रोकता है
माउथवॉश का इस्तेमाल करने से आपके दांतों में कैविटीज़ होने की सम्भावना कम होती है. साथ ही पहले से मौजूद कैविटीज़ को बढ़ने से रोकने में भी ये सहायता करता है.
प्लाक को बनने से रोकता है
माउथवॉश का इस्तेमाल मसूड़ों और दांतों में जमने वाले प्लाक को बनने से रोकने में सहायक है.
मुंह के छालों को दूर करता है
माउथवॉश का रोज़ाना इस्तेमाल करने से मुंह के छालों को दूर करने में मदद मिलती है.
बैक्टीरिया को ख़त्म करता है
माउथवॉश के इस्तेमाल से मुंह में मौजूद बैक्टीरिया ख़त्म होते हैं. इसके साथ ही ये मुंह में बनने वाले सभी ढीले कणों को भी साफ़ करने में मदद करता है.
मुंह की दुर्गन्ध दूर करता है
मुंह की दुर्गन्ध को दूर करने में माउथवॉश ख़ास भूमिका निभाता है. इसके इस्तेमाल से मुंह की दुर्गन्ध दूर होने के साथ ही सांसो की ताजगी भी बढ़ती है.
माउथवॉश के इस्तेमाल से ये हो सकते हैं नुकसान
माउथवॉश के इस्तेमाल से किसी-किसी को मुंह का स्वाद खराब रहने की दिक्कत हो सकती है.
माउथवॉश के इस्तेमाल से किसी-किसी को एलर्जी होने का खतरा भी रहता है.
इसके इस्तेमाल से मुंह में अल्सर होने और मुंह में लाली आ जाने की समस्या भी हो सकती है.
माउथवॉश के इस्तेमाल से दांतों में धब्बे होने की शिकायत हो सकती है.
इसके इस्तेमाल से मुंह में सूखेपन (मुंह सूखना) की परेशानी भी हो सकती है.
ये है माउथवॉश को सही तरह से इस्तेमाल करने का तरीका
माउथवॉश इस्तेमाल करने से पहले दांतों को अच्छी तरह से ब्रश करें.
फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट इस्तेमाल करने की स्थिति में ब्रश करने के तुरंत बाद माउथवॉश का इस्तेमाल न करें.
इसको बॉटल से सीधा मुंह में न डालें बल्कि मेजरिंग कप का इस्तेमाल करें.
माउथवॉश से कुल्ला करने के साथ ही इससे गरारे भी करें, लेकिन ध्यान रहे कि इसको निगलना नहीं है.
-रामगोपाल द्विवेदी
गोरखपुर. धर्मनगरी वाराणसी के रहने वाले स्वामी शिवानंद 125 साल की उम्र में पूरी तरह से स्वस्थ्य हैं. उनके शिष्यों का मनाना है कि वो विश्व के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति हैं और पूरी तरह से स्वास्थ्य हैं. विश्व के सबसे उम्रदराज व्यक्ति के रूप में उनका नाम दर्ज कराने के लिए शिष्यों ने गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड में आवेदन भी किया है. गोरखपुर के आरोग्य मंदिर में अपने शिष्यों के साथ घुमने आये स्वामी शिवानंद यहां पर प्रकृतिक चिकित्सा के बारे में जानना चाहते थे. पासपोर्ट और आधार कार्ड पर उनका जन्मतिथि 8 अगस्त 1896 दर्ज है. जिसके आधार पर वो 125 साल के हो गये.
इस उम्र में भी वो पूरी तरह से स्वास्थ्य हैं. स्वामी शिवानंद इसका राज इंद्रियों पर नियंत्रण, संतुलित दिनचर्या, सादा भोजन और योग को बताते हैं, स्वामी जी का मूल मंत्र है कि मिजाज कूल लाइफ व्यूटीफुल और नोट ऑयल ओनली बॉयल. यानी वो हमेशा शांत रहते हैं और खाने में तेल का प्रयोग नहीं करते हैं. साथ ही सुबह 3 बजे वो सोकर उठ जाते हैं और रात में 9 बजे के पहले ही सो जाते हैं. नाश्ते में लाई चूरा और दोपहर और रात के खाने में दाल रोटी व उबली हुई सब्जी खाते हैं.
स्वामी शिवानंद कहते हैं कि अगर स्वास्थ्य रहना है तो उबला हुआ खाना खाए. साथ ही खाने में तेल का कम से प्रयोग करें. उनका कहना है कि नमक और चीनी जितना कम हो सके उतना कम खाए. वहीं स्वामी के शिष्य सुब्रोतो ने बताया कि स्वामी जी माता पिता बहुत गरीब थे. इसलिए उन्हे बचपन में एक साधु को सौंप दिया था. जिसके बाद से स्वामी जी उनके के साथ रहे और तभी से वो संयमित जीवन जीते हैं. स्वामी जी दूध और फल नहीं खाते हैं वो कहते हैं कि देश में बहुत से ऐसे गरीब हैं जिन्हे ये नसीब नहीं होता है इसलिए वो भी इसे नहीं खाएंगे.
रायपुर, 13 मार्च| रोड सेफ्टी वल्र्ड सीरीज के अपने अगले मैच में इंडिया लेजेंड्स का सामना आज यहां शहीद वीर नारायण सिंह इंटरनेशनल स्टेडियम में दक्षिण अफ्रीका लेजेंड्स से होगा। यह मुकाबला जीतकर सचिन तेंदुलकर की कप्तानी वाली इंडिया लेजेंड्स टीम सेमीफाइनल में पहुंचना चाहेगी लेकिन इंडिया लेजेंड्स की चिंता यह है कि उसके कई स्टार बल्लेबाजों के बल्ले चुप हैं। कप्तान सचिन भी उनमें से एक हैं।
इस बीच, दक्षिण अफ्रीका लेजेंड्स गुरुवार को अपने तीसरे मुकाबले में इंग्लैंड को हराकर अच्छी स्थिति में पहुंच गई है और अब वह भी एक और जीत के साथ नॉकआउट में जगह पक्की करना चाहेगी।
इंडिया लेजेंड्स के खाते में चार मैचों से 12 अंक हैं और वह अंक तालिका में दूसरे स्थान पर है। श्रीलंका की टीम 16 अंकों के साथ पहले स्थान पर है। दक्षिण अफ्रीकी टीम आठ अंकों के साथ तीसरे स्थान पर है।
अब भारत की टीम अपने प्रदर्शन में सुधार करते हुए अपनी स्थिति मजबूत करना चाहेगी। इंग्लैंड के खिलाफ हालांकि भारतीय टीम का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था और उसे टूर्नामेंट में पहली हार मिली थी।
भारत ने इरफान पठान के नाबाद 61 रनों और मनप्रीत गोनी के नाबाद 35 रनों की मदद से लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश की थी लेकिन उसे अंत में छह रनों से हार का सामना करना पड़ा था।
भारतीय कप्तान तेंदुलकर बल्ले के साथ अपना जलवा नहीं दिखा पा रहे हैं। वह भी फार्म में वापसी चाहेंगे। अब तक टूर्नामेंट में उनका व्यक्तिगत सर्वोच्च योग नाबाद 33 रन रहा है, जो उन्होंने बांग्लादेश लेजेंड्स के खिलाफ बनाया था।
भारतीय टीम के अन्य बल्लेबाज, जो संघर्ष कर रहे हैं,उनमें युवराज सिंह, मोहम्मद कैफ और यूसुफ पठान हैं। ये तीनों भी बल्ले के साथ अपनी मौजूदगी दिखाना चाहेंगे।
भारत के लिए गेंदबाजी में सबसे बड़ी चिंता स्पिनर प्रज्ञान ओझा हैं, जो इंग्लैंड के खिलाफ काफी महंगे साबित हुए थे। ओझा ने चार ओवर में 43 रन दिए थे और एक भी विकेट नहीं हासिल कर सके थे। ओझा का फार्म खुद उन्हें भी परेशान कर रहा होगा, क्योंकि इसी विकेट पर मोंटी पनेसर और थांडी साबालाला जैसे स्पिनर अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं।
दक्षिण अफ्रीकी टीम की बात की जाए तो जोंटी रोंड्स की कप्तानी वाली यह टीम ऊंचे मनोबल के साथ भारत से भिड़ेगी। इस टीम ने इंग्लैंड के जिस आसानी से हराया था और उससे लगता है कि वह भारत को कड़ी टक्कर देगी।
दक्षिण अफ्रीकी टीम ने न सिर्फ बल्ले के साथ अपना फार्म वापस पाया है बल्कि गेंद के साथ भी वह प्रभावशाली दिखाई दे रही है।
टीमें इस प्रकार है :
इंडिया लेजेंड्स : सचिन तेंदुलकर (कप्तान), वीरेंद्र सहवाग, मोहम्मद कैफ, एस बद्रीनाथ, युवराज सिंह, यूसुफ पठान, इरफान पठान, मुनाफ पटेल, मनप्रीत सिंह गोनी, प्रज्ञान ओझा, आर. विनय कुमार, नोएल डेविड, नमन ओझा।
दक्षिण अफ्रीका लेजेंड्स : जोंटी रोड्स (कप्तान), अल्वारो पीटरसन, लॉयड नॉरिस जोन्स, लूट्स बोसमैन, गार्नेट क्रुगर, मखाया एंटिनी, मोंडे जोंडेकी, नैंटी हेवर्ड, रोजर टेलीमाकस, थांडी साबालाला, जस्टिन केंप, जेंडर डी ब्रुइन, एंड्रयू पुटीक (आईएएनएस)
केंद्र सरकार उज्ज्वला योजना के तहत एलपीजी कनेक्शन मुहैया करा आम लोगों का जीवन स्तर बेहतर बनाने के साथ ही पर्यावरण की सुरक्षा के दावे तो कर रही है. लेकिन शहरों में झुग्गियों बस्तियों के सारे घरों के पास एलपीजी नहीं है.
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के एक ताजा सर्वेक्षण से पता चला है कि छह भारतीय राज्यों में शहरी झुग्गियों में रहने वाले परिवारों में से लगभग आधे ही एलपीजी का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में, ग्रामीण इलाकों की तस्वीर का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है. बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के शहरी झुग्गी बस्तियों में रहने वाले आधे परिवार ही पूरी तरह एलपीजी का इस्तेमाल करते हैं.
ऐसा इस तथ्य के बावजूद है कि इन शहरी झुग्गियों में 86 प्रतिशत परिवारों के पास एलपीजी कनेक्शन है. भारत की झुग्गी बस्तियों में रहने वाली कुल आबादी का एक चौथाई हिस्सा इन्हीं छह राज्यों में रहता है. इसके अलावा ऐसे घरों में से 16 प्रतिशत आज भी प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन का इस्तेमाल करते हैं.
सर्वेक्षण रिपोर्ट
सीईईडब्ल्यू के ‘कुकिंग एनर्जी एक्सेस सर्वे 2020' के नतीजे हाल में जारी किए गए हैं. यह सर्वेक्षण छह राज्यों की शहरी झुग्गियों में किया गया था. इसके लिए देश के 58 अलग-अलग जिलों की 83 शहरी झुग्गी बस्तियों के 656 घरों को चुना गया था. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इन बस्तियों के 86 फीसदी घरों में एलपीजी कनेक्शन होने के बावजूद विभिन्न वजहों से लगभग आधे लोग ही रसोई गैस का इस्तेमाल करते हैं. इनमें से 37 फीसदी घरों को समय पर रीफिल की डिलीवरी नहीं मिलती. इसके साथ ही इन बस्तियों के 16 फीसदी घरों में अब भी खाना पकाने के लिए लकड़ी, गोबर के उपले और केरोसिन जैसे प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है. इससे घर के अंदर प्रदूषण बढ़ जाता है और उसमें रहने वाले लोग प्रदूषित हवा में सांस लेने पर मजबूर हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, सर्दियों में प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों का इस्तेमाल बढ़ जाता है. उस दौरान खाना पकाने के साथ ही लोगों को सर्दी से बचने के लिए भी आग की जरूरत पड़ती है. बस्तियों के लगभग दो-तिहाई घरों में ऐसे ईंधन का इस्तेमाल घर के भीतर किया जाता है और उनमें से 67 फीसदी घरों में धुआं बाहर निकलने के लिए कोई चिमनी नहीं है.
सर्वेक्षण रिपोर्ट में संगठन ने सरकार को प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत उपभोक्ताओं की तादाद बढ़ाने की सलाह दी गई है. इसमें कहा गया है कि इस योजना के दूसरे चरण में सरकार को शहरी झुग्गी बस्तियों में उपभोक्ताओं की तादाद बढ़ाने पर जोर देना चाहिए. इसकी वजह यह है कि अब भी काफी घर ऐसे हैं जहां एलपीजी का कनेक्शन नहीं है. रिपोर्ट में उज्ज्वला योजना को स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण संबंधी दूसरी केंद्रीय योजनाओं के साथ जोड़कर लोगों में स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल के प्रति जागरुकता फैलाने की सिफारिश की गई है ताकि लोग अधिक से अधिक तादाद में रसोई गैस का इस्तेमाल करें.
सरकार को सलाह
सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी होने के मौके पर सीईईडब्ल्यू के सीईओ अरुणाभ घोष ने कहा, "सरकार को शहरी बस्तियों के उन घरों की पहचान कर एलपीजी कनेक्शन मुहैया कराना चाहिए जिनके पास अब तक यह सुविधा नहीं है. इसके साथ ही तेल कंपनियों और वितरकों से बात कर डिलीवरी नेटवर्क को दुरुस्त करना जरूरी है ताकि समय पर घर बैठे सिलेंडर की सप्लाई सुनिश्चित की जा सके. इसके अलावा रसोई गैस की बढ़ती कीमतों को ध्यान में रखते हुए उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के अलावा इन बस्तियों के दूसरे परिवारों को भी सब्सिडी की रकम बढ़ानी चाहिए.”
इस सर्वेक्षण का नेतृत्व करने वाली शैली झा ने कहा, "शहरी झुग्गी बस्तियों का एक बड़ा हिस्सा खासकर बढ़ती कीमतों और महामारी की वजह से एलपीजी के इस्तेमाल में समस्याओं से जूझ रहा है. शहरी झुग्गियों में उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों की तादाद कम होने की वजह से वहां रहने वाले ज्यादातर परिवार पीएम गरीब कल्याण योजना के तहत मुफ्त सिलेंडर के रूप में राहत सहायता के हकदार नहीं हैं.” सीईईईडब्ल्यू ने सुझाव दिया है कि नेशनल अर्बन लाइवलीहुड मिशन और आवास जैसे प्रमुख सरकारी कार्यक्रमों का इस्तेमाल रसोई के लिए साफ ईंधन मुहैया कराने के लिए भी किया जाना चाहिए. इससे जरूरतमंद गरीबों को उनकी आर्थिक पहुंच के भीतर साफ ईंधन मिल सकेगा.
सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि इन बस्तियों में रहने वाले सिर्फ आधे परिवारों में महिलाएं तय करती हैं कि एलपीजी रीफिल कब खरीदा जाए और खरीदा भी जाए या नहीं. इससे पता चलता है कि निर्णय लेने में महिलाओं की भागीदारी सीमित है. ऐसे परिवारों को और सब्सिडी और जागरुकता की जरूरत है.
कोलकाता के समाजशास्त्री शैवाल कर कहते हैं, "सरकार ने उज्ज्वला योजना के तहत कनेक्शन मुहैया कर ही अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है. लेकिन इस बात की निगरानी का कोई ठोस तंत्र विकसित नहीं हो सका है कि लोग दोबारा रीफिल खरीदते हैं या नहीं. और नहीं तो इसमें क्या दिक्कतें हैं. वितरण और निगरानी तंत्र को दुरुस्त किए बिना इस योजना का खास फायदा नहीं होगा.”
महाशक्ति बनने का सपना देखने वाले चीन ने अपने रक्षा बजट को बढ़ाकर 209 अरब डॉलर कर दिया है. चीन अपनी सैन्य क्षमता को लगातार धारदार बनाने में जुटा है. लेकिन इससे भारत और जापान जैसे चीन के पड़ोसियों की चिंता बढ़ सकती है.
डॉयचे वैले पर राहुल मिश्र की रिपोर्ट
किसी भी देश का रक्षा बजट उसकी सेनाओं और सुरक्षा एजेंसियों के लिए बहुत मायने रखता है. इससे ना सिर्फ सेनाओं के रख-रखाव की नीतियों और हथियारों की खरीद के मसूबों का संकेत मिलता है बल्कि इससे देशों की सुरक्षा चिंताओं और भविष्य में लिए जाने वाले सामरिक निर्णयों की भनक भी लगती है. यही वजह है कि देशों के रक्षा बजट पर हर किसी की पैनी नजर होती है.
इस सिलसिले में चीन का हाल ही में सार्वजनिक किया गया 2021 रक्षा बजट महत्वपूर्ण स्थान रखता है. पिछले कई वर्षों से चीन के रक्षा बजट में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है. और इस साल भी इसमें इजाफा ही हुआ है. 5 मार्च को चीन की नेशनल पीपल्स कांग्रेस की सालाना बैठक में रक्षा बजट के मसौदे पर चर्चा हुई और ऐलान किया गया कि इस साल रक्षा क्षेत्र में 209 अरब डालर खर्च किए जाएंगे. यह राशि पिछले साल के 196 अरब डालर से लगभग 7 फीसदी ज्यादा है. आंकड़ों के मायाजाल से परे हट कर अगर इसे देखा जाय तो साफ है कि बजट में 13 अरब डालर की बढ़ोत्तरी हुई है.
चीन की प्राथमिकता
जाहिर है, चीन के इस कदम से पड़ोसी देशों में हलचल मच गई है. इसमें खास तौर पर जापान, वियतनाम, इंडोनेशिया, भारत और ताइवान जैसे देश आते हैं जिनके साथ चीन की सीमा विवाद और अन्य मुद्दों को लेकर अनबन है. चीन का कुल रक्षा बजट इन तमाम देशों के कुल जमा बजट से भी ज्यादा है.
चीन के भारत समेत लगातार एक के बाद एक कई देश के साथ बढ़ते तनाव के बीच यह तय ही था कि चीन अपने रक्षा बजट को और बढ़ाएगा. जानकारों के बीच अटकलें सिर्फ इस बात को लेकर थीं कि यह राशि कितनी होगी. दूसरे देशों के मुकाबले कोविड महमारी के कठिन समय में भी चीन की अर्थव्यवस्था में बढ़ोत्तरी हुई है. इसका फायदा भी चीन को उठाना लाजमी ही था.
आम तौर पर चीन अपने रक्षा बजट का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा सिर्फ हथियारों की खरीद और उन्हें अपग्रेड करने पर लगाता है. शायद इस बार उस पर और अधिक खर्च की भी योजना हो लेकिन फिलहाल इन विवरणों को चीन ने सार्वजनिक नहीं किया है. दुनिया के तमाम देशों के विपरीत, चीन ना अपने बजट के एक-एक पैसे का हिसाब सार्वजनिक करता है और न ही सुरक्षा से जुड़ी हर चीनी एजेंसी रक्षा बजट के अंदर आती है. इसलिए चीन से पारदर्शिता की उम्मीद करना बेमानी है.
चीन ने अपनी 14वीं पंचवर्षीय योजना में नई तकनीकों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमी कंडक्टर चिपों, गहन समुद्र, गहन आकाश और पोलर एक्सप्लोरेशन पर खास ध्यान देने की योजना बनाई है. 2021 से 2025 तक चले वाली इस पंचवर्षीय योजना का भी रक्षा बजट पर व्यापक असर होने की संभावना है.
तकनीक का सहारा
वैसे पिछले कई वर्षों से चीन अपनी सेनाओं को क्षमतावान और टेक्नोलोजी से लैस लेकिन हल्की-फुल्की बनाने में लगा है लेकिन अब उसने अत्याधुनिक उन्नत तकनीकों पर खास जोर देना शुरू कर दिया है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक पर चीन ने पिछले कुछ समय में खास पकड़ बनाई है और दक्षिण चीन सागर में स्वार्म और ड्रोन तकनीक का प्रभावशाली इस्तेमाल भी बढ़ाया है.
चीन इस सदी के मध्य तक पीपल्स लिबरेशन आर्मी को दुनिया की सर्वोत्कृष्ट और अत्याधुनिक सेना बनाने के प्रयास में लगा हुआ है. लेकिन साथ ही उसकी यह भी कोशिश रही है कि दुनिया को इस बात की भनक भी न लगे कि इन प्रयासों में वह कितना पैसा, समय और ऊर्जा लगा रहा है. लेकिन जहां आग है वहां कभी ना कभी धुआं तो उठेगा ही. ऐसा ही हो रहा है दक्षिण चीन और पूर्वी सागर में.
पिछले कुछ सालों में चीन ने दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीपों के निर्माण और उन द्वीपों पर सैन्य साजोसामान तैनात करने में काफी तकनीक और पैसा लगाया है. इस सबके पीछे उसका सबसे बड़ा उद्देश रहा है कि वह ऐसी क्षमता विकसित कर सके जिसके तहत वह अपने प्रतिद्वंदद्वी को जब चाहे किसी खास क्षेत्र में प्रवेश या कुछ खास गतिविधियां करने से रोक सके.
टकराव के आसार
एंटी एक्सेस/एंटी डिनायल (ए.2/एडी) जैसी क्षमता विकसित करने की चाह के पीछे सबसे बड़ा कारण है अमेरिका के साथ चीन की बढ़ती अनबन. चीन अमेरिका की किसी भी सैन्य गतिविधि को अपने खिलाफ उठाया गया अमेरिकी कदम समझता है. हालांकि अमेरिका की दक्षिणपूर्व और पूर्व एशिया में उपस्थिति कोई नई बात नहीं है है लेकिन अपनी ताकत और रुतबा बढ़ने के साथ ही चीन अब अमेरिका को रास्ते का रोड़ा समझने लगा है. यह वही चीन है जिसने अपने निहित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अमेरिका से शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के खिलाफ हाथ मिला लिए थे.
उधर चीन की बढ़ती सैन्य ताकत और आक्रामक रवैया जापान और भारत जैसे इसके कई पड़ोसियों के गले की फांस बन गया है. इस समस्या से कूटनीतिक ढंग से निपटने और अगर जरूरत पड़े तो सैन्य सहयोग से पीछे ना हटने के उद्देश्य से ही भारत, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया से बीच पहला शिखर सम्मेलन हो रहा है. वैसे तो चीन पर शायद सार्वजनिक स्तर पर बयानबाजी के आसार कम हैं लेकिन यह सब को मालूम है कि इन चारों देशों के साझा प्रयास- क्वाड के पीछे चीन सबसे बड़ी और मुखर वजह चीन ही है.
सारा दारोमदार इस बात पर है कि क्वाड के देश चीन की तेजी से आधुनिक बन रही पीपल्स लिबरेशन आर्मी से निपटने पर भी कोई साझा कदम उठाने की योजना बनाते हैं या हर बार की तरह अमेरिका पर ही यह जिम्मेदारी टाल दी जाती है. (dw.com)
चीन पूरी दुनिया पर छा जाने के लिए बेकरार है. इसके लिए चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी में नई जान फूंकी जा रही है. जानकार कहते हैं कि चीन की बढ़ती ताकत विश्व स्तर पर टकरावों को जन्म दे सकती है.
पिछले दिनों चीन की सर्वोच्च विधायी संस्था, नेशनल पीपुल्स कांग्रेस (एनपीसी) की सालाना बैठक में हुए प्रमख भाषणों का सबसे ज्यादा जोर कायाकल्प पर रहा. तीन हजार सदस्यों वाली कांग्रेस की यह बैठक साल का सबसे बड़ा राजनीतिक आयोजन है. इसमें सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी का अति उत्साही दूरगामी उद्देश्य निहित थाः सही मायनों में वैश्विक शक्ति के रूप में चीन का राष्ट्र निर्माण! ऐसी शक्ति जिसे बाकी दुनिया झुक कर सलाम करे!
इस लक्ष्य के साथ कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में बने रहने का लक्ष्य भी गुंथा हुआ है. डिजिटल स्पेस की सेंसरिंग, समाचार मीडिया पर नियंत्रण और सरकार या पार्टी की सार्वजनिक आलोचना करने वालों को जेल. इस तरह पार्टी अपनी पकड़ को मजबूत बनाए रखती है. लेकिन वह जनता को खुश रखने की कोशिश भी करती है. दुनिया में अपने बढ़ते दबदबे की झलक दिखाकर राष्ट्रीय गौरव को उभारती है. इसके जरिए वह 70 साल से भी ज्यादा वक्त से जारी अपनी हुकूमत की वैधता को भी साबित करने की कोशिश करती है.
मौकों की तलाश
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में नंबर तीन की हैसियत रखने वाले पदाधिकारी ली चांगशू ने एनपीसी के सदस्यों से कहा, "चीनी राष्ट्र को कायाकल्प की तरफ एक और विशाल कदम बढ़ाने के लिए अग्रसर करते हुए सेंट्रल कमेटी ने आकर्षक नतीजे हासिल किए हैं. इससे हमारे लोग खुश हैं और यह बात इतिहास में दर्ज होगी.”
कायाकल्प की बात मंत्र की तरह दोहराई जाती है. चीनी कलेंडर में बैल का वर्ष मनाते हुए राष्ट्रीय कला संग्रहालय में चहुं दिशा यही मंत्र अभिव्यक्त किया गया था. प्रदर्शनी के परिचय में एक परिश्रमी बैल को दिखाते हुए पार्टी नेता और राष्ट्राध्यक्ष शी जिनपिंग को "चीनी राष्ट्र के महान प्रयास की समझ” को गहरा बनाने का श्रेय दिया गया था. ये नजरिया हलचल भरा है. अमेरिका और अन्य देशों की सरकारें चीन के उदय और उसकी वजह से होने वाले वैश्विक बदलावों के बीच क्या रास्ता निकाला जाए, इस पर मंथन करने लगी हैं.
चीनी नेता अमेरिकी सीमा-शुल्कों और प्रतिबंधों को चुनौती देते हुए एक ज्यादा व्यवस्थित अर्थव्यवस्था और एक ज्यादा शक्तिशाली सेना बनाने के अलावा घरेलू बाजार की वृद्धि और हाईटेक क्षमताओं को और तेज करने में जुटे हैं. वे विश्व नेतृत्व का प्रदर्शन करते हुए अवसरों की तलाश कर रहे हैं, कोविड-19 की वैश्विक महामारी से लेकर जलवायु परिवर्तन तक. लेकिन मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर दूसरों की मांगें मानने के झंझट से खुद को मुक्त रखते हैं.
चुनौतियां
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के लिए इसमें बहुत सी चुनौतियां बनती हैं. जलवायु परिवर्तन पर सहयोग के लिए तो जगह है. व्यापार और प्रौद्योगिकी पर कुछ मतभेद सुलझाए जाने हैं. पश्चिमी प्रशांत महासागर पर कब्जे के लिए दोनों देशों की नौ सेनाओं में होड़ लगी है. ताइवान, हांगकांग और चीन के मुस्लिम बहुल शिनचियांग क्षेत्र पर गहरे विभाजन बने हुए हैं जहां दोनों पक्ष अपने अपने दावों पर अड़े हैं.
कम्युनिस्ट पार्टी ने इस वर्ष के लिए लक्ष्य रखा गया है "सामान्यतः समृद्ध समाज" का निर्माण. देश की प्रति व्यक्ति जीडीपी दस हजार डॉलर से ऊपर हो गई है. जिसके चलते चीन उच्च मध्यवर्गीय आय वाले देशों की रैंक में अपनी जगह पुख्ता कर चुका है. हालांकि शहरी अमीरों और ग्रामीण गरीबों की संपत्ति में अंतर की चौड़ी खाई है.
अंतरिम लक्ष्य के रूप में शी जिनपिंग ने कहा है कि 2035 में अर्थव्यवस्था का आकार दोगुना हो जाएगा. और प्रति व्यक्ति जीडीपी करीब 20 हजार डॉलर हो जाएगी. लेकिन इस रास्ते में कुछ बाधाएं हैं. अर्थव्यवस्था के पूरी तरह विकसित होने से पहले ही चीनी आबादी बूढ़ी हो रही है. ये चीन में दशकों तक लागू रही एक-संतान कड़ी नीति का नतीजा है. ये साफ नहीं है कि पार्टी का कठोर सिस्टम तेजी से जटिल होते समाज और वृद्धि की केंद्रीय योजना के बजाय रचनात्मकता पर तेजी से निर्भर होती जा रही अर्थव्यवस्था को मैनेज भी कर पाएगा या नहीं.
राख से उठा चीन
कायाकल्प की शब्दावली चीन के साम्राजी दौर के चर्मोत्कर्ष की याद दिलाती है जब वो एशिया में प्रौद्योगिकी और संस्कृति का सरताज था. चिंग वंश उत्तरोतर 19वीं सदी में कमजोर पड़ गया और उस दौरान सैन्य लिहाज से ज्यादा ताकतवर हो चुके पश्चिमी देशों ने उसे बहुत सी क्षेत्रीय और व्यापार रियायतें देने पर विवश कर दिया.
कायाकल्प का विचार सिर्फ कम्युनिस्टों की अपीलों को ही नहीं बल्कि शुरुआती 20वीं सदी के अन्य क्रांतिकारियों और सुधारकों की अपीलों को भी एक आधार देता है. लेकिन जब विभिन्न शक्तियां सत्ता के लिए आपस में झपट रही थीं और चीन अराजकता में घिरा हुआ था, जापान ने दूसरा विश्व युद्ध खत्म होते होते चीन के अधिकांश हिस्से पर हमला कर कब्जा कर लिया.
चीन को फिर से मजबूत बनाने के अपने आह्वान में कम्युनिस्ट पार्टी अक्सर "सदी के अपमान” का मुद्दा उठा देती है. तेज आर्थिक वृद्धि के दशकों के बाद, पार्टी अपना अंतिम लक्ष्य पाने में पहले की अपेक्षा और नजदीक आ चुकी है.
2017 की पार्टी कांग्रेस में शी जिनपिंग ने कहा था, "आधुनिक समयों के आरंभ से ही इतना सब कुछ इतने लंबे समय तक सहने वाले चीनी राष्ट्र का एक जबर्दस्त रूपांतरण हुआ हैः वह उठ खड़ा हुआ, समृद्ध बना, और ताकतवर बन रहा है, वह कायाकल्प की अद्भुत संभावनाओं को अपने भीतर संजोए हुए है.”
दुनिया पर असर
सवाल ये है कि शेष दुनिया के लिए चीन के कायाकल्प का क्या अर्थ होगा. क्या वो वैश्विक आर्थिक वृद्धि को संचालित करेगा, दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार और दूसरे देशों के लिए निवेश का स्रोत बनेगा? या उसे एक सैन्य और औद्योगिक भय की तरह देखा जाएगा जो छोटे पड़ोसियों को तंग करेगा और टेक्नोलोजी चुराएगा? क्या उसकी कामयाबी कुछ अन्य देशों को अपने यहां सर्वसत्तावादी अधिनायकवादी सत्ताओं के निर्माण के लिए उकसाएंगी और वे देश अमेरिका के अपनाए लोकतंत्र से मुंह मोड़ लेंगे?
सेंटर फॉर स्ट्रेटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज में चाइना पावर प्रोजेक्ट के निदेशक बोनी ग्लेसर कहते हैं, "चीन हवा में सवार होकर ज्यादा ताकत वाली निर्णायक पोजीशन का रुख कर रहा है जो उसके मुताबिक सत्ता के वैश्विक संतुलन का उत्कर्ष है. और बाइडेन सरकार के लिए यह एक बहुत बड़ी चुनौती है.”
बाइडेन और उनके सहयोगियों ने चीन पर कड़ा रुख अपनाने का संकेत दिया है. विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने हाल के एक भाषण में चीन को "आर्थिक, राजनयिक, सैन्य और प्रौद्योगिकीय शक्ति वाला एक ऐसा इकलौता देश” करार दिया था "जो स्थिर और खुली अंतरराष्ट्रीय प्रणाली को, दुनिया को बेहतर ढंग से चलाने वाले तमाम नियमों, मूल्यों और सबंधों को गंभीर चुनौती देता है.”
ये सार्वजनिक रुख कूटनीति के लिए रास्ता बना सकता है लेकिन चीन के अंतिम लक्ष्य अटल हैं, चाहे वो टेक्नोलोजी का लीडर बनने का लक्ष्य हो या दक्षिणी चीन सागर में अपनी नेवी की पहुंच बढ़ाने का लक्ष्य. एक ओर अमेरिका आर्थिक मंदी और महामारी से जूझ रहा है, वहीं चीन और उसके नेता अपने कायाकल्प को लेकर और बेधड़क, और आश्वस्त हो चले हैं.
एसएस/एके (एपी)
दुनिया में जुड़वां बच्चों की संख्या बीते सालों में काफी ज्यादा बढ़ गई है. एक तरफ यह चलन बेहतर होती कुछ चीजों की तरफ इशारा कर रहा है तो दूसरी तरफ इसे लेकर चिंताएं भी बहुत हैं.
संसार में लगभग हर 40 में एक बच्चा जुड़वां बच्चे के रूप में पैदा हो रहा है. पहले के मुकाबले यह संख्या बहुत ज्यादा है. डॉक्टरों की मदद से होने वाली बच्चों की पैदाइश को इसके लिए सबसे बड़ी वजह बताया जा रहा है. साइंस जर्नल ह्यूमन रिप्रोडक्शन में छपी एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में हर साल 16 लाख जुड़वां बच्चे पैदा हो रहे हैं.
रिसर्च में शामिल ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर क्रिश्टियान मोंडेन का कहना है, "जुड़वां बच्चों की तुलनात्मक और विशुद्ध संख्या दुनिया में बीसवीं सदी के मध्य के बाद अब सबसे ज्यादा है और यह सर्वकालिक रूप से सबसे ज्यादा रहने की उम्मीद है."
विकसित देशों में 1970 के दशक से प्रजनन में मदद करने वाली तकनीक यानी एआरटी का उदय हुआ. इसके बाद से इसने जुड़वां बच्चों के जन्म के मामलों में बड़ा योगदान दिया है. अब बहुत सी महिलाएं ज्यादा उम्र में मां बन रही हैं और फिर उनके जुड़वां बच्चे होने के आसार बढ़ जाते हैं. गर्भनिरोधक का इस्तेमाल बढ़ गया है, महिलाएं अपना परिवार ज्यादा उम्र में अकेले रहने के बाद शुरू कर रही हैं और इसके साथ ही कुल मिला फर्टिलिटी रेट में आई गिरावट को भी इसके लिए जिम्मेदार बताया गया है.
अफ्रीका अव्वल
रिसर्चरों ने इसके लिए 135 देशों से साल 2010-2015 के बीच के आंकड़े जुटाए. जुड़वां बच्चों के पैदा होने की दर सबसे ज्यादा अफ्रीका में है. हालांकि रिसर्चरों ने इसके लिए अफ्रीका महाद्वीप और बाकी दुनिया के बीच जेनेटिक फर्क को इसके लिए जिम्मेदार माना है. एक रिसर्चर ने बताया कि संसार के गरीब देशों में जुड़वां बच्चों की संख्या बढ़ने से चिंता भी है.
मोंडेन का कहना है, "जुड़वां बच्चों की पैदाइश के साथ शिशुओं और बच्चों की मौत की उच्च दर भी जुड़ी है साथ ही महिलाओं और बच्चों में गर्भावस्था के दौरान और प्रसव के बाद ज्यादा जटिलता भी होती है." रिसर्च रिपोर्ट के सहलेखक जरोएन स्मिट्स का कहना है, "कम और मध्यम आय वाले देशों में जुड़वां बच्चों पर और ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है. सब सहारा अफ्रीका में तो खासतौर से बहुत सारे बच्चे अपने जुड़वां को जीवन के पहले साल में ही खो देते हैं, हमारी रिसर्च के मुताबिक यह संख्या हर साल 2-3 लाख तक है."
रिसर्चरों का कहना है कि जुड़वां बच्चों की संख्या में इजाफा मुख्य रूप से "फ्रैटर्नल ट्विंस" यानी उन बच्चों में हो रही है जो दो अलग निषेचित अंडाणुओं से पैदा होते हैं. आडेंटिकल ट्विंस जिन्हें मोनोजाइगट भी कहा जाता है उनकी संख्या लगभग वही है यानी एक हजार बच्चों में एक.
एनआर/एके(एएफपी)
जर्मनी की सत्ताधारी सीडीयू पार्टी के युवा सांसद मार्क हाउप्टमन ने भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद इस्तीफा दे दिया है. एक हफ्ते में वो सत्ताधारी गठबंधन के तीसरे सांसद हैं जिन्हें इस तरह के आरोपों में इस्तीफा देना पड़ा.
जर्मनी के दो प्रमुख राज्यों में प्रांतीय चुनावों से ठीक पहले चांसलर अंगेला मैर्कल की पार्टी सीडीयू के एक और सांसद को इस्तीफा देना पड़ा है. युवा सांसद मार्क हाउप्टमन ने लॉबिइंग के आरोपों में दबाव बढ़ने के बाद गुरुवार को इस्तीफा दे दिया. इससे पहले उन्हीं की पार्टी के निकोलास लोएबल और बावेरियाई सहयोगी पार्टी सीएसयू के गेयॉर्ग नुइसलाइन को महामारी के दौर में मास्क से जुड़े कारोबारी सौदों के चलते इस्तीफा देना पड़ा.
हाउप्टमान की विदाई एक स्थानीय अखबार में अजरबाइजानी, ताइवानी और वियतनामी पर्यटन के बारे में छपे विज्ञापन की वजह से हुई है. जुडथुरिंगर कूरियर नाम का यह अखबार खुद सांसद हाउप्टमान चलवाते हैं. जर्मन समाचार पत्रिका श्पीगेल ने एक रिपोर्ट छापी है कि उन पर इन विज्ञापनों के बदले विदेशी एजेंसियों से रिश्वत लेने के आरोप हैं. हाउप्टमान ने डी वेल्ट अखबार से बातचीत में कहा है कि वह संदेह को कड़ाई से खारिज करते हैं और रिपोर्ट में बातों को "गलत तरीके से दिखाया" गया है. हाउप्टमान का कहना है, "मैंने किसी भी वक्त इन विज्ञापनों के प्रभाव में आ कर राजनीतिक फैसले नहीं लिए. मैं इन्हें काफी महत्व देता हूं. मैंने कोई पैसा नहीं लिया और मेरे राजनीतिक फैसलों पर किसी का असर नहीं है." उन्होंने इस पूरे मामले पर हैरानी जताते हुए कहा, "मेरे प्रति निजी शत्रुता अपने चरम पर पहुंच गई है."
लोकप्रिय युवा चेहरा
अपनी वेबसाइट पर हाउप्टमान ने बताया है कि उन्होंने थुरिंगिया की येना यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान और इंटरकल्चरल कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है. इसके बाद उन्होंने सीडीयू के स्टाइपेंड पर जापान की ओसाका और अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी में भी कुछ पढ़ाई की है. उन्होंने यूरोपीय संसद, बीजिंग में सीडीयू के कोनराड आडेनावर फाउंडेशन के अलावा थुरिंगिया के परिवहन मंत्रालय में काम किया है और साथ ही वह जर्मन संसद में सीडीयू-सीएसयू के सांसदों के एक समूह के चेयरमैन भी रहे हैं.
37 साल के हाउप्टमान ने राजनीति की सीढ़ी तेजी से चढ़ी है और वो ऑस्ट्रिया के युवा चांसलर सेबास्टियन कुर्त्स के भी बड़े समर्थक माने जाते हैं. मार्क हाउप्टमन के अखबार ने जानकारी दी है कि अपने संसदीय कामों की वजह से विदेश यात्राओं के जरिए उन्होंने अच्छे संपर्क बनाए हैं जिसका फायदा थुरिंगिया की मध्यम आकार वाले उद्योगों को खूब मिला है. हाउप्टमान भारत के साथ ही इसी तरह के संबंध विकसित करने के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने भारत के उद्योग जगत के साथ मिल कर कई कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाई है. इसमें इंडोजर्मन बिजनेस डायलॉग सबसे प्रमुख है.
सत्ताधारी पार्टी की मुश्किल
इसी हफ्ते सत्ताधारी गठबंधन के दो और सांसदों को महामारी के दौरान मास्क की खरीदारी से जुड़े विवाद के सामने आने के बाद इस्तीफा देना पड़ा. इनमें एक हैं निकोलास लोएबल. आरोप है कि उनकी कंपनी ने मास्क की खरीदारी का सौदा कराने के बदले ढाई लाख यूरोप का कमीशन हासिल किया. इसी तरह सीएसयू के सांसद गेयॉर्ग नुइसलाइन पर भी मास्क सप्लायर के लिए लॉबिइंग करने के बदले 660,000 यूरोप की रकम कमाने का आरोप है.
एक हफ्ते में तीन लोगों के इस्तीफे से जर्मनी की सत्ता के गलियारे में हलचल तेज हो गई है. शुक्रवार की शाम तक सीडीयू-सीएसयू ने संसद के 245 सदस्यों को यह लिख कर देने के लिए कहा था कि महामारी के दौर में किसी तरह के कारोबार से उन लोगों ने कोई फायदा नहीं उठाया. हालांकि हाउप्टमान मास्क की खरीदारी को लेकर चल रहे स्कैंडल में तो शामिल नहीं हैं लेकिन मैर्कल की पार्टी पर लॉबिइंग के संपर्कों को लेकर दबाव बढ़ गया है. सत्ताधारी गठबंधन में शामिल एसपीडी के उपाध्यक्ष राल्फ स्टेगनर ने राजनेताओं के लिए स्पष्ट आचार संहिता की अपनी मांग दोहराई है. उनका कहना है कि जर्मनी को केंद्रीय और प्रांतीय स्तर पर पैसे देकर की जाने वाली लॉबिइंग पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए.
मंगलवार को डीडब्ल्यू के साथ एक इंटरव्यू में सीएसयू के सांसद मिषाएल फ्रीजर ने कहा कि वो नुइसलाइन और लोएबेल के आगे इस मामले के बढ़ने की उम्मीद नहीं कर रहे हैं. फ्रीजर ने कहा, "मैं जर्मनी को तो कोई नुकसान नहीं देख रहा हूं लेकिन राजनीति का नुकसान बहुत बड़ा है." इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि संसद को इस तरह के मामलों के लिए अपने नियमों को बेहतर बनाने की जरूरत है.
एनआर/एमजे (डीपीए, एएफपी)
कॉन्ट्रैक्ट ट्रेसिंग पर जोर
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 13 मार्च। छत्तीसगढ़ में महाराष्ट्र के लोगों की वजह से कोरोना की रफ्तार में एकाएक बढ़ोत्तरी हुई है। कोरोना रोकथाम के लिए यहां कॉन्ट्रैक्ट ट्रेसिंग पर विशेष जोर दिया गया है। स्वास्थ्य विभाग ने सभी सीएमओ को निर्देश दिए हैं, कि जहां भी कोरोना से मौतें हुई हैं, वहां घर के आसपास रहने वाले लोगों की कोरोना जांच अनिवार्य रूप से कराई जाए।
छत्तीसगढ़ में पिछले तीन दिनों से कोरोना के मामलों में अचानक तेजी आई है। कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 4 सौ के पार जा रहा है। अगले कुछ दिनों में भी कोरोना की रफ्तार कम होने के संकेत नहीं दिख रहे हैं। कोरोना की रफ्तार में तेजी के पीछे सीमावर्ती राज्य महाराष्ट्र से लोगों की आवाजाही को प्रमुख वजह माना जा रहा है।
महाराष्ट्र में कोरोना बुुरी तरह फैला हुआ है। कई शहरों में लॉकडाउन है, और नागपुर जैसे शहर में तो रोजाना 2 हजार से अधिक कोरोना संक्रमित मिल रहे हैं। हाल यह है कि महाराष्ट्र से कोरोना के इलाज के लिए लोग छत्तीसगढ़ आ रहे हैं। स्वास्थ्य अफसरों के मुताबिक रायपुर और दुर्ग में कोरोना प्रकरणों की संख्या में एकदम बढ़ोत्तरी के पीछे प्रमुख वजह यही है। शुक्रवार को एम्स में 64 वर्षीय महिला की कोरोना से मौत हो गई। यह महिला नागपुर की रहने वाली थी, और यहां एम्स में इलाज चल रहा था। स्वास्थ्य विभाग के लोग महिला की कॉन्ट्रैक्ट टे्रसिंग के लिए जानकारी जुटाने की कोशिश की, तो महिला को लेकर ज्यादा कुछ जानकारी नहीं मिल पाई।
एम्स से महिला का कोई ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। कोरोना प्रकरणों की बढ़ती रफ्तार पर नोडल अधिकारी डॉ. सुभाष पाण्डेय ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में कहा कि पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र कोरोना से बुरी तरह प्रभावित है, और वहां से लोग बड़ी संख्या में यहां आ रहे हैं। कोरोना के प्रकरण बढऩे की प्रमुख वजह यह भी है। इसके अलावा कोरोना से बचाव के लिए मास्क आदि का उपयोग नहीं करने की वजह से भी संक्रमण फैल रहा है।
डॉ. पाण्डेय ने सभी सीएमओ से वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के जरिए बात की थी। इसमें स्पष्ट तौर पर निर्देशित किया गया है, कि जहां भी कोरोना के मृत्यु हो, वहां आसपास के लोगों का अनिवार्य रूप से कोरोना टेस्ट जरूर कराएं। इसके अलावा पीडि़तों की निगरानी की भी हिदायत दी गई है। विशेषकर महाराष्ट्र से आने वाले लोगों की कोरोना जांच के लिए भी दिशा निर्देश दिए गए हैं। ऐसे सभी लोगों की आरटीपीसीआर, अथवा एंटीजन टेस्ट कराया जाए। बहरहाल, कोरोना रोकथाम के लिए प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, तो दोगुना रफ्तार से कोरोना के मामले आ सकते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पहले 100 दिनों के कार्यकाल के लिए एक महत्वाकांक्षी एजेंडा तैयार किया था. इसमें जलवायु परिवर्तन से लेकर इमिग्रेशन में सुधार और कोरोनो वायरस महामारी तक हर चीज पर तुरंत कार्रवाई का वादा था.
अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर 10 मार्च को जो बाइडेन का 50 दिनों का कार्यकाल पूरा हो गया. बाइडेन प्रशासन ने अपने कार्यकाल के 50वें दिन एक मील का पत्थर तय किया और वह था उनके 1900 अरब डॉलर कोरोना वायरस सहायता पैकेज का अमेरिकी संसद कांग्रेस में पास होना. इस बिल का नाम 'अमेरिकन रेस्क्यू प्लान एक्ट 2021' है. इसके तहत, जरूरतमंद अमेरिकियों के खाते में 1400 डॉलर की सीधी आर्थिक मदद दी जाएगी.
बिल के बजट में से 350 अरब डॉलर का बड़ा हिस्सा प्रांतीय और लोकल गवर्नमेंट के लिए रखा गया है. महामारी से निपटने के लिए भी अलग से फंड रखा गया है. इस बिल से बाइडेन को कई चुनावी वादे पूरी करने में मदद मिलेगी. इनमें स्कूलों को खोलना और ज्यादा से ज्यादा अमेरिकी नागरिकों को टीका लगाना जैसे बड़े वादे भी शामिल हैं. सत्ता संभालते ही बाइडेन ने कई चुनावी वादे पूरे किए, लेकिन कई वादे अब भी अधूरे हैं. जानते हैं कि वे अपने प्रमुख वादों को कहां तक पूरा कर पाए हैं.
वे वादे जो पूरे हुए
जो बाइडेन ने अपने कार्यकाल के पहले हफ्तों के दौरान कोरोना महामारी को प्राथमिकता दी थी जिसका असर दिख रहा है. उनका लक्ष्य 100 दिनों में 10 करोड़ लोगों को टीका लगाने का था. वह अगले सप्ताह के अंत तक 10 करोड़ लोगों को टीका लगाने के अपने लक्ष्य तक पहुंचने वाले हैं. हर दिन 20 लाख लोगों को कोराना वैक्सीन का टीका लगाया जा रहा है. अब तक 7.5 करोड़ से अधिक लोगों को टीका लग चुका है.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने जलवायु नीति पर अपने वादों को पूरा करने के लिए कई कदम उठाए. उन्होंने शपथ के दिन ही एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर करके किस्टोन एक्सएल तेल पाइपलाइन के लिए परमिट को रद्द कर दिया और आर्कटिक नेशनल वाइल्ड लाइफ रिफ्यूज में चल रहे विकास से जुड़े काम को रोकने का आदेश दिए. साथ ही, पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और विज्ञान पर ट्रंप के कार्यकाल में लागू किए गए नियमों की समीक्षा करने का आदेश दिया. 27 जनवरी को जारी एक कार्यकारी आदेश से संघीय भूमि और खुले समुद्र में नए तेल और गैस पट्टी पर रोक लगा दी गई.
बाइडेन ने चुनाव अभियान के दौरान किए गए कई वादों को भी आसानी से पूरा किया. इसमें ट्रंप प्रशासन के जलवायु परिवर्तन से लेकर आव्रजन नीतियों तक को रद्द करना शामिल है. शुरूआत में, बाइडेन प्रशासन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन और पेरिस जलवायु समझौते को फिर से बहाल कर दिया, सीमा पर बन रही दीवार के काम को रोक दिया, और विभिन्न मुस्लिम-बहुल देशों के लोगों पर यात्रा प्रतिबंधों को समाप्त कर दिया. साथ ही, अमेरिका-मेक्सिको की सीमाओं पर अलग हुए परिवारों को फिर से मिलाने के लिए एक टास्क फोर्स बनाया है.
बाइडेन ने अपने पहले 100 दिनों के भीतर अमेरिकी संसद में इमिग्रेशन पर एक व्यापक सुधार बिल लाने का वादा किया था. जिसे पिछले महीने पूरा कर दिया गया. बाइडेन ने एक कार्यकारी आदेश भी जारी किया. इसके तहत उन प्रवासी बच्चों को "संरक्षण देने और सशक्त बनाने” का निर्देश दिया गया जो अपने माता-पिता के साथ यहां आए हैं. बाइडेन ने प्रशासन में नैतिक सुधार के किए गए वादों को पूरा करने की कोशिश भी की है. 20 जनवरी को एक कार्यकारी आदेश जारी किया गया. इस आदेश में गुटबाजी करने और उपहार लेने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाना और न्यायिक विभाग में राजनीतिक हस्तक्षेप को प्रतिबंधित करना शामिल है.
वे वादे जो पूरे होने हैं
अभी भी बाइडेन के कई वादे पूरे नहीं हुए है और उन पर काम करना बाकी है. बाइडेन की राष्ट्रीय कोविड-19 रणनीति के तहत फरवरी के अंत तक देश भर में 100 नए सरकारी टीकाकरण केंद्र स्थापित करने लक्ष्य था. अब तक, प्रशासन लगभग 20 जगहों पर बड़े पैमाने पर टीकाकरण का काम कर रहा है जहां रक्षा मंत्रालय पेंटागन की तरफ से सैनिकों को ड्यूटी पर तैनात किया गया है. कुल मिलाकर, प्रशासन का कहना है कि सरकार कम से कम 441 टीकाकरण केंद्र चला रही है. हालांकि, उनमें से ज्यादातर नई नहीं हैं, लेकिन सरकारी संसाधनों की मदद से सभी की क्षमता बढ़ायी गई है.
अपने कार्यकाल के पहले 100 दिनों में बाइडेन ने अमेरिकी शरणार्थी सिस्टम में सुधार करने के लिए ‘सार्वजनिक शुल्क' नियम को हटाने का वादा किया था. यह नियम ट्रंप प्रशासन ने सार्वजनिक लाभ लेने से प्रवासियों को वंचित करने के लिए लगाया था. फरवरी की शुरुआत में बाइडेन ने इस नियम को हटाने के लिए संबंधित एजेंसियों को उन नीतियों की समीक्षा करने और 60 दिनों के भीतर बदलाव की सिफारिश करने का निर्देश दिया है.
प्रशासन ने शरणार्थी सिस्टम में सुधार करने के लिए कुछ कदम उठाए हैं. इसमें बाइडेन के अपने कार्यकाल के पहले दिन उठाया गया एक कदम शामिल है. ट्रंप कार्यकाल के एक नियम को होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने स्थगित कर दिया है. इस नियम के तहत, शरण मांगने वालों को मेक्सिको में तब तक इंतजार करना होता था, जब तक उनके दावों की समीक्षा होती थी.
राष्ट्रपति ने महामारी से संबंधित अधिकारों को अपने पास रखा है जो उनके प्रशासन को लोगों को शरण लेने का अवसर दिए बिना सीमा से तुरंत हटाने की अनुमति देता है. बाइडेन के सहयोगियों ने कहा है कि उनके इस अधिकार को तत्काल समाप्त करने की कोई योजना नहीं है. इस नियम को पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने 1944 के एक अस्पष्ट स्वास्थ्य कानून का इस्तेमाल करके एक साल पहले पेश किया था.
बाइडेन ने प्रवासी परिवारों के लंबे समय तक हिरासत में रखने के नियम को समाप्त करने का भी वादा किया था. आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन ने पिछले हफ्ते एक ऐसे ही हिरासत केंद्र का इस्तेमाल बंद करने का संकेत दिया. हालांकि, आईसीई, टेक्सास में दो अन्य हिरासत केंद्रों में आप्रवासी परिवारों को तीन दिन या उससे कम समय के लिए हिरासत में रखना जारी रखेगा. बाइडेन प्रशासन कई लंबे समय तक हिरासत में रखने वाले जगहों की क्षमता का विस्तार कर रहा है जिसमें आप्रवासी बच्चों को रखा जा सके, ताकि सीमा पर बिना कारण के नाबालिगों की लगातार बढ़ती संख्या को रोका जा सके.
जलवायु परिवर्तन पर, बाइडेन ने अपने पहले 100 दिनों के कार्यकाल के अंदर वैश्विक शिपिंग और विमानन के क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन को कम करने और जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए विश्व शिखर सम्मेलन आयोजित करने का वादा किया था. अमेरिका 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस पर ऐसा ही सम्मेलन आयोजित करेगा.
अमेरिका में स्कूलों को फिर से खोलना बाइडेन के प्रमुख अभियान वादों में से एक है, जिसे लागू करवाना कठिन रहा है. वजह ये है कि स्कूल में बच्चों को पढ़ने के लिए बुलाने का निर्णय स्थानीय अधिकारियों और शिक्षक संगठनों पर छोड़ दिया गया है. इस महीने उन्होंने राज्यों को शिक्षकों के टीकाकरण को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया और घोषणा की कि वह मार्च में शिक्षकों के टीकाकरण के लिए देश के संसाधनों के इस्तेमाल का निर्देश रहे हैं. बाइडेन प्रशासन को उम्मीद है कि कोरोनो राहत बिल के पारित होने और सुरक्षा उपाय बेहतर होने पर, शिक्षक पढ़ाने के लिए वापस लौटने में अधिक सहज महसूस करेंगे.
कार्रवाई का इंतजार करते वादे
बाइडेन प्रशासन ने निजी जेल अनुबंधों को समाप्त करने वाले एक कार्यकारी आदेश के अलावा अभी तक आपराधिक न्याय सुधार पर कोई महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लिया है. बाइडेन ने अपने पहले 100 दिनों के भीतर पुलिस ओवरसाइट बोर्ड स्थापित करने का वादा किया था, लेकिन अब तक उस दिशा में कोई स्पष्ट पहल नहीं हुई है. 100 दिनों के अंदर पूरे किए जाने वाले कई अन्य वादों पर किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई है. इनमें केंद्रीय भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए कैबिनेट स्तरीय एक कमिटी का गठन करना और बंदूक की खरीद के लिए पृष्ठभूमि की जांच के मुद्दों की एफबीआई समीक्षा का आदेश देना शामिल है.
कुछ वादों को पूरा करने के लिए, बाइडेन को सीनेट की मंजूरी लेनी होगी, जैसे कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा अधिनियम को दोबारा बहाल करना और निगमों पर करों में वृद्धि करने का उनका वादा. बाइडेन ने अपने कार्यकाल के पहले 100 दिनों में समानता अधिनियम के पारित होने का भी वादा किया था. यह लिंग, किसी खास जेंडर के प्रति यौन आकर्षण और जेंडर के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है. ये विधेयक संसद के निचले सदन ने पास कर दिया है लेकिन सीनेट में पास होना बाकी है.
उनके कुछ वादे सीनेट से मंजूरी मिलने के बाद, बाइडेन के कैबिनेट मंत्रियों की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं. बंदूक नियंत्रण पर, बाइडेन ने कहा है कि वह अपने अटॉर्नी जनरल को निर्देश देंगे कि वे देश के बंदूक कानूनों को और अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए प्रमुख न्याय विभाग एजेंसियों के पुनर्गठन की सिफारिशें दें. उन्होंने सभी अमेरिकियों को घर का अधिकार देने के लिए भी वादा किया था. इसके लिए उन्होंने अपने आवास और शहरी विकास मंत्री को एक टास्क फोर्स के गठन के लिए सिफारिशें तैयार करने को कहा था.
आरआर/एमजे (एपी)
दक्षिण कोरियाई टीवी सीरीज को भारत में स्ट्रीमिंग सेवाओं पर जबरदस्त हिट हो रही हैं. सीरीज से प्रेरित होकर भारत में बहुत से लोग कोरियाई भाषा सीख रहे हैं.
डॉयचे वैले पर सीरत चब्बा की रिपोर्ट-
कोरोना वायरस की वजह से भारत में लगे लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में शेरेज़ादे श्रॉफ ने अपने पसंदीदा फिल्म और शो ऑनलाइन देखना शुरू किया. इसी दौरान उन्हें नेटफ्लिक्स पर दक्षिण कोरिया की एक बेहद लोकप्रिय टेलीविजन सीरीज़ ‘क्रैश लैंडिंग ऑन यू' दिखी. जब उन्होंने इस सीरीज को देखा, तो उन्हें लगा कि वे एक ऐसी दुनिया में चली गई हैं जिसकी कल्पना तक नहीं की थी.
श्रॉफ भारत की एक लोकप्रिय ब्यूटी और लाइफस्टाइल यूट्यूबर हैं. उन्होंने डॉयचे वेले से बात करते हुए कहा, "देखने के लिए लगभग कुछ नहीं बचा था. तभी मेरे बेस्ट फ्रेंड ने मुझे यह सीरीज देखने की सलाह दी थी. जब मैंने इसे देखा, तो लगा कि मैं दूसरी दुनिया में चली गई हूं. यह पहली कोरियाई सीरीज थी जिसे मैंने देखा था. इसके बाद कोरियाई ड्रामा की दुनिया में मेरी एंट्री हुई.”
लॉक डाउन में लोकप्रिय हुई सीरीज
‘क्रैश लैंडिंग ऑन यू' दिसंबर, 2019 में रिलीज हुई थी. मार्च 2020 तक भारत में यह सीरीज लोकप्रिय नहीं हुई थी. लेकिन कोरोना वायरस की वजह से देशव्यापी लॉकडाउन लगने के बाद यह इतनी लोकप्रिय हुई, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी.
इस सीरीज की कहानी पैराग्लाइडिंग हादसे के बारे में है. इस हादसे में दक्षिण कोरियाई राजघराने की एक महिला उत्तराधिकारी उत्तर कोरिया पहुंच जाती है. वहां उसकी मुलाकात एक आर्मी ऑफिसर होती है. यह आर्मी ऑफिसर महिला की मदद करने का फैसला लेता है.
कोरियाई ड्रामा और संगीत को के-पॉप के तौर पर जाना जाता है. पिछले एक दशक में कई बार इसने दुनिया भर में धूम मचाई है. इसे ‘कोरियन वेव' कहा गया. भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों के युवा और छात्र-छात्राएं इससे काफी प्रेरित हुए हैं. वे कोरियाई ड्रामे की कहानियों, खान-पान और टीवी स्टार के फैशन को फॉलो करने लगे हैं.
नेटफ्लिक्स और अमेजन प्राइम जैसी स्ट्रीमिंग सेवाओं का चलन पढ़ने से पहले कोरियाई ड्रामा देखने के विकल्प सीमित थे. इसके लिए पहले किसी असुरक्षित या संदिग्ध वेबसाइट पर नए एपिसोड रिलीज होने का इंतजार करना पड़ता था. इन एपिसोड के साथ दिखाए जाने वाले सब-टाइटल्स भी ज्यादा अच्छे नहीं होते थे. इन सब-टाइटल्स को देखकर कहानी समझ पाना मुश्किल था. हालांकि अब पूरी कहानी बदल गई है. नेटफ्लिक्स कोरियाई ड्रामा और शो को दुनिया के सामने ला रहा है. आज इन शो को देखने वाले दर्शकों की एक बड़ी तादाद है.
भारतीयों को क्यों पसंद आ रहा कोरियाई शो
कोरोना वायरस लॉकडाउन के समय, ‘क्रैश लैंडिंग ऑन यू' कई भारतीय फिल्मों और शो को पीछे छोड़ नेटफ्लिक्स के टॉप 10 में शामिल हो गई. श्रॉफ कहती हैं, "मैंने कई सारे घरेलू शो देखे हैं, लेकिन फर्क ये है कि एक कोरियन शो देखने के बाद आप ठहर नहीं सकते. यह आपको उस संस्कृति, जीवनशैली, मूल्यों को दिखाता है, जो हर किसी का सपना होता है.”
श्रॉफ ने देखा कि इंस्टाग्राम फॉलोअर्स उनकी पोस्ट पर कोरियाई ड्रामा को लेकर बात कर रहे हैं. इसलिए, उन्होंने अपने प्रशंसकों के लिए एक फेसबुक ग्रुप बनाने का फैसला लिया. यह फेसबुक ग्रुप उन लोगों के लिए है जो कोरियन फिल्म और सीरीज के सुझाव देना चाहते हैं, उसकी समीक्षा करना चाहते हैं या ली मिन-हो या पार्क सी-जून जैसी हस्तियों पर चर्चा करना चाहते हैं.
यह एक निजी ग्रुप है जिसमें करीब छह हजार सदस्य हैं. इस ग्रुप में उन लोगों को शामिल किया गया है जो 10 वर्षों से ज्यादा समय से कोरियन ड्रामा देख रहे हैं. साथ ही, उन नए लोगों को भी शामिल किया गया है जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान कोरियन ड्रामा और शो देखने की शुरुआत की. कुछ लोग अब तक 300 से ज्यादा शो देख चुके हैं. वहीं, कई ने अभी अपनी पहली सीरीज ही पूरी की है.
श्रॉफ कहती हैं, "यहां कोरियाई ड्रामा के बारे में कोई कुछ भी बात कर सकता है. वह परिवार से जुड़ा भी हो सकता है और सेक्सिज्म से जुड़ा मुद्दा भी. वह हमारी पसंद का भी हो सकता है और पसंद का नहीं भी.”
वह आगे कहती हैं, "कोरियाई ड्रामा सिर्फ मनोरंजन नहीं है जो आप देखते हैं और सुनते हैं. जब लोग कोरियाई ड्रामा देखते हैं, तो वह उस चीज को खाना चाहते हैं जो उस शो का किरदार खा रहा होता है. वह उसके हीरो की तरह पीना चाहते हैं. इन शो को देखने का मतलब उनकी संस्कृति में गोता लगाने जैसा है. उनकी संस्कृति के बारे में जानने जैसा है. ड्रामा में जब कोई चीज दिखती है, तो उसके बारे में लंबे समय तक याद रहता है. जैसे, रम्यून (कोरियाई मसालेदार नूडल्स), टोटोकबोकी (चावल का मसालेदार केक), मांडू (पकौड़ी), और सोजू (शराब).”

टीवी शो देखकर भारत के लोगों की दिलचस्पी दक्षिण कोरिया की संस्कृति और खाने में भी बढ़ रही है
पिछले कुछ समय से भारत में कोरियाई भोजन की मांग बढ़ी है. हरियाणा के गुरुग्राम में सुभाष कुकरेजा की दुकान है. उनके यहां पूर्वी एशियाई देशों के भोजन और लोकप्रिय व्यंजन मिलते हैं. उन्होंने डॉयचे वेले से कहा, "हमने पिछले एक साल में भारतीय ग्राहकों की संख्या में तेजी से वृद्धि देखी है.” दुकान में एक दर्जन से ज्यादा ब्रैंड और फ्लेवर में रम्यून रखा हुआ है. वे कहते हैं, "हमारे स्थानीय ग्राहकों को कोरियाई मसालेदार नूडल्स काफी पसंद आ रहे हैं.”
कोरियन भाषा सीखने वालों की संख्या बढ़ी
श्रॉफ करीब एक साल से कोरियन शो देख रही हैं. वह कहती हैं कि आज के समय में कोरियाई शब्द उनकी बोलचाल का हिस्सा बन गए हैं. कोरियाई पॉप-कल्चर की लोकप्रियता की वजह से भारत में कोरियाई भाषा सीखने वालों की संख्या बढ़ी है. इसके लिए, कुछ लोग प्रोफेशनल प्रोग्राम में एडमिशन ले रहे हैं. वहीं कुछ, ऐप्लिकेशन की मदद ले रहे हैं.
नई दिल्ली में दक्षिण कोरियाई दूतावास के तहत चलने वाले कोरियन कल्चर सेंटर इंडिया (केसीसीआई) में कोरियाई भाषा सीखने वाले लोगों के लिए कई तरह के कोर्स चलाए जाते हैं. भाषा सीखने वालों की बढ़ती संख्या को देखते हुए केसीसीआई ने ऑनलाइन ‘कोरियन लैंग्वेज हॉबी क्लास' शुरू करने का फैसला लिया. इसके लिए काफी संख्या में लोगों ने अपने नाम दर्ज करवाए. दो मिनट के अंदर 600 लोगों ने रजिस्ट्रेशन करवाया. इतनी तेजी से संख्या बढ़ती देख केसीसीआई को रजिस्ट्रेशन रोकने पर मजबूर होना पड़ा.
केसीसीआई के निदेशक हवांग इल-यांग ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा, "2020 में लागू की गई भारत की नई शिक्षा नीति की वजह से कोरियन भाषा को बढ़ावा मिला है. नई शिक्षा नीति में कोरियन भाषा की अनुशंसा विदेशी भाषा के तौर पर की गई है. केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के साथ हमारी बातचीत चल रही है, ताकि 2021 में भारतीय स्कूलों में कोरियन भाषा पढ़ाई जा सके.” यह संस्था भारत के बड़े शहरों में ऑनलाइन और ऑफलाइन कोर्स शुरू करने का प्रयास कर रही है. इसके लिए, कोरियाई भाषा पढ़ाने वाली संस्था सेजोंग इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर काम कर रहा है.
भारत में कोरियाई फिल्में, शो, और ड्रामों को देखने वालों की संख्या बढ़ी है. इसके साथ ही, कोरियन खाने का बाजार भी बढ़ा है और कोरियाई भाषा सीखने वालों की संख्या भी. इन सब से एक बात तो साफ है कि सवा सौ करोड़ की आबादी वाला यह देश कोरियाई फिल्म इंडस्ट्री का बड़ा बाजार बन सकता है. (dw.com)
नई दिल्ली. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को शुक्रवार की शाम सरकारी एसएसकेएम अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. चिकित्सकों ने उनकी हालत ‘संतोषजनक’ पाई, जिसके बाद उन्हें छुट्टी दी गई. टीएमसी सुप्रीमो (66 वर्षीय) ने अस्पताल से छुट्टी देने की बार-बार अपील की, जिसके बाद चिकित्सकों ने यह निर्णय किया. वहीं बनर्जी के चोटिल होने पर पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा चुनाव आयोग को भेजी गयी रिपोर्ट में ‘चार-पांच लोगों’ के हमले का जिक्र नहीं किया गया है. राज्य निर्वाचन आयोग के एक अधिकारी ने इस बारे में बताया.
दूसरी ओर तमिलनाडु के उप मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम समेत 56 उम्मीदवारों ने शुक्रवार को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए छह अप्रैल को होने वाले मतदान के वास्ते अपने नामांकन पत्र दाखिल किये. चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार उम्मीदवारों में एक महिला प्रत्याशी हैं. अन्नाद्रमुक समन्वयक पनीरसेल्वम ने मंदिर में दर्शन करने के बाद बोदिनायक्कनूर से नामांकन पत्र भरा, जहां से वह तीसरी बार चुनाव जीतने के लिए प्रयासरत हैं.
वाशिंगटन, 13 मार्च| दुनियाभर में कोरोनावायरस के कुल मामलों की 11.9 करोड़ के पार पहुंच चुकी है जबकि जबकि 26.3 लाख से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी ने यह जानकारी दी।
शनिवार सुबह अपने नवीनतम अपडेट में, यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सिस्टम्स साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसएसई) ने खुलासा किया कि वर्तमान कोरोना मामलों और मौतों की संख्या क्रमश: 119,023,857 और 2,638,887 है।
सीएसएसई के अनुसार, दुनिया में सबसे ज्यादा 29,343,530 मामलों और 532,400 मौतों के साथ अमेरिका सबसे ज्यादा प्रभावित देश बना हुआ है।
वहीं, 11,363,380 मामलों के साथ भारत दूसरे स्थान पर है।
सीएसएसई के आंकड़ों के अनुसार, कोरोनावायरस के 10 लाख से अधिक मामलों वाले अन्य देश ब्राजील (11,308,846), रूस (4,321,588), ब्रिटेन (4,261,398), फ्रांस (4,075,735), स्पेन (3,183,704), इटली (3,175,807), तुर्की (2,850,930), जर्मनी (2,559,296), कोलंबिया (2,294,617), अर्जेंटीना (2,185,747), मेक्सिको (2,157,771), पोलैंड (1,868,297), ईरान (1,731,558), दक्षिण अफ्रीका (1,526,873), यूक्रेन (1,487,497), इंडोनेशिया (1,487,497), इंडोनेशिया (1,410,134), पेरू (1,394,571), चेक रिपब्लिक (1,376,998) और नीदरलैंड्स (1,160,380) हैं।
वर्तमान में कोरोना से मौतों के मामले में ब्राजील 275,105 मौतों के साथ दूसरे स्थान पर है, उसके बाद तीसरे स्थान पर मेक्सिको (193,851) और चौथे पर भारत (158,306) है।
इस बीच, 50,000 से ज्यादा मौतों वाले देश ब्रिटेन (125,579), इटली (101,564), फ्रांस (90,207), रूस (89,701), जर्मनी (73,204), स्पेन (72,258), ईरान (61,069), कोलंबिया (60,950), अर्जेंटीना (53,578) और दक्षिण अफ्रीका (51,179) हैं। (आईएएनएस)
-दयानिधि
हेल्थ रिस्क असेसमेंट (एचआरए) स्कोर के अनुसार 50.42 फीसदी या हर 2 में से 1 भारतीय 'हाई रिस्क' या 'बॉर्डरलाइन' श्रेणी में है
इंडिया फिट रिपोर्ट 2021 में कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन के दौरान रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल और मधुमेह के स्तर में वृद्धि के बारे में विस्तार से बताया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पूरे भारत से जीओक्यूआईआई में 50 लाख से अधिक लोग हैं जो स्वस्थ रहने के लिए इस मंच से जुड़े हैं। इन्हीं उपयोगकर्ताओं से स्वास्थ्य के अलग-अलग समस्या को लेकर आंकड़े एकत्रित किए गए हैं।
हेल्थ रिस्क असेसमेंट (एचआरए) स्कोर के अनुसार 50.42 फीसदी या हर 2 में से 1 भारतीय 'हाई रिस्क' या 'बॉर्डरलाइन' श्रेणी में है। इसमें पिछले साल के आंकड़ों की तुलना में 12 फीसदी का सुधार है इससे पहले 62 फीसदी भारतीय 'अस्वस्थ' श्रेणी में थे।
सूरत, जयपुर और पटना भारत के शीर्ष 3 शहरों में रहने वाले लोग स्वस्थ हैं जबकि लखनऊ, कोलकाता और चेन्नई वाले अस्वस्थ हैं। यहां यह ध्यान देना दिलचस्प है कि महानगरीय शहरों में से कोई भी शीर्ष 3 स्वस्थ शहरों में नहीं है, भले ही उनके पास फिटनेस सुविधाएं और स्वास्थ्य केंद्रों तक अधिक पहुंच है।
जीओक्यूआईआई की नवीनतम इंडिया फिट रिपोर्ट 2021 के अनुसार, अधिकांश लोग अपनी जीवन शैली में कुछ सुधार करके स्वस्थ बन सकते हैं। लॉकडाउन ने भारतीयों को अपने स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देने और अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने का समय दिया। रिपोर्ट में कहा गया के उम्र के लिहाज से, पुरानी पीढ़ी की तुलना में युवा पीढ़ी अधिक अस्वस्थ पाई गई है।
रक्त चाप
2020 में लगभग 15 फीसदी लोगों ने उच्च रक्त चाप होने के बारे में बताया, जबकि 2019 में यह 13.4 फीसदी था। रिपोर्ट के अनुसार, यह आंकड़ा पिछले 4 वर्षों में लगातार बढ़ा है। लगभग 35 प्रतिशत उपयोगकर्ताओं ने यह भी बताया कि यह बीमारी उनके परिवार में चली आ रही है अर्थात आनुवंशिक है। अधेड़ उम्र के लोगों में रक्तचाप के मामले वयस्कों की तुलना में सिर्फ तीन गुणा हैं। तब यह कहना सुरक्षित नहीं है, कि 45 से ऊपर के लोगों को उच्च रक्तचाप होने का अधिक खतरा है।
मधुमेह
मधुमेह देखभाल और प्रबंधन के लिए एक पूर्ण-स्टैक डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चला है कि कोविड-19 महामारी से पहले जनवरी से फरवरी के मध्य तक औसत उपवास (फास्टिंग) शुगर का स्तर 138 मिलीग्राम / डीएल था, जो कि मार्च के मध्य में अप्रैल तक बढ़कर 165 मिलीग्राम / डीएल हो गया। एक तिहाई का दावा था कि यह बीमारी उनके परिवार में चली आ रही है। मधुमेह से पीड़ित लोगों का प्रतिशत वयस्कों से लेकर अधेड़ उम्र के लोगों तक तिगुना हो गई।
कोलेस्ट्रॉल
लगभग 13 प्रतिशत उपयोगकर्ताओं ने उच्च कोलेस्ट्रॉल होने के बारे में बताया, यह एक ऐसा आंकड़ा है जो पिछले दो वर्षों से स्थिर बना हुआ है। दूसरी ओर केवल 4 प्रतिशत ने उल्लेख किया कि उन्हें हृदय से संबंधित समस्याएं हैं जो 2019 में 8.6 प्रतिशत थी।
तनाव का बढ़ना
रिपोर्ट में यह भी पता चला कि पूरे वर्ष भर तनाव का स्तर बहुत अधिक रहा। सर्वेक्षण के परिणाम ने बताया कि वर्ष के मध्य में तनाव सूचकांक 4.98 से बढ़कर वर्ष के अंत में 5.11 तक की वृद्धि हुई। वर्तमान में 45 फीसदी लोग अवसाद से ग्रस्त बताए गए हैं।
तनाव बढ़ने के कारण
कोरोना का डर, वित्तीय स्थिरता और वर्तमान कार्य भारतीयों के तनाव के स्तर को प्रभावित करने वाले शीर्ष 3 प्रमुख कारक हैं। जबकि दोनों महिला एवं पुरुषों को कोविड-19 का डर, स्वास्थ्य की समस्याओं के बारे में चिंता को जाता है। महिलाएं तनाव के दूसरे प्रमुख कारण के रूप में घर के काम का हवाला देती हैं। 4.83 फीसदी किशोरों में स्कूल और अध्ययन को लेकर तनाव पाया गया। (downtoearth.org.in)
-बारबरा जैकलीन साहाकियान, क्रिस्टेल लैंगने
क्या ये दिमाग अपने जैविक स्वभाव के विरुद्ध जा रहे हैं?
विज्ञापन से लेकर कार्यस्थल तक अक्सर यह माना जाता है कि पुरुष और महिलाएं मूल रूप से भिन्न हैं। हम सभी ऐसे लोगों को जानते हैं, जिनमें पुरुष और महिला व्यक्तित्व का सम्मिश्रण (उभयलिंगी) होता है। इन्हें स्टीरियोटाइप रूप से पुरुष या महिला माना जाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस तरह के “मनोवैज्ञानिक उभयलिंगी” लंबे समय से बेहतर संज्ञानात्मक लचीलेपन (विभिन्न कार्यों या विचारों के बीच बदलाव की मानसिक क्षमता), सामाजिक क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य जैसे लक्षण प्रदर्शित करते हैं।
लेकिन मस्तिष्क से इसका क्या संबंध है? क्या वे लोग जो अपने व्यवहार में अधिक उभयलिंगी गुण प्रदर्शित करते हैं, अपने जैविक स्वभाव के विरुद्ध जा रहे हैं? क्या ये ऐसे काम कर रहे हैं जो उनके दिमाग के लिए अनुकूलित नहीं हैं? इस सवाल का जवाब लंबे समय से अज्ञात है कि क्या मस्तिष्क और उभयलिंगी होने के गुण के बीच कोई संबंध है। सेरेब्रल कोर्टेक्स जर्नल में प्रकाशित हमारा नया अध्ययन यह सुझाव देता है कि ऐसा होना आम है।
मनोवैज्ञानिक उभयलिंगी होना मनोवैज्ञानिक रूप से सुरक्षात्मक माना जाता है। उदाहरण के लिए, हम जानते हैं कि यह अवसाद और चिंता जैसी कम मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा है। इसे उच्च रचनात्मकता से भी जोड़ा गया है।
हम उन सभी लक्षणों से परिचित हैं, जो स्टीरियोटाइप रूप से पुरुष या महिला के रूप में वर्गीकृत हैं। उदाहरण के लिए, पुरुषों को भावनाओं को व्यक्त करने या परेशान होने पर रोने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता है।
इसके बजाय उनसे कठिन, मुखर, तर्कसंगत और मानचित्र देखने जैसे दृश्यात्मक काम करने की उम्मीद की जाती है। दूसरी ओर, महिलाओं के बारे में माना जाता है कि ऐसी स्थिति में अक्सर वे अधिक भावनात्मक, दूसरों की देखभाल करने वाली और बेहतर भाषा का इस्तेमाल करती हैं।
लेकिन ये अंतर सामाजिक मानदंडों और अपेक्षाओं पर आंशिक रूप से खरे उतरते हैं। चूंकि हम सभी दूसरे के द्वारा पसंद किया जाना चाहते हैं, इसलिए हम पारंपरिक बने रहते हैं। यदि किसी लड़की को बताया जाए कि मुखर होना असभ्य है, तो वह इसे ठीक करने के लिए अपना व्यवहार बदल सकती है, जिससे उसके भविष्य के करियर विकल्प प्रभावित न हो। या फिर एक किशोर युवती को सैन्य या पुलिसिंग जैसे खतरनाक करियर के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता है।
दिमाग में सेक्स
वैज्ञानिकों ने लंबे समय से इस बात पर तर्क-वितर्क किया है कि असल में विभिन्न नर और मादा दिमाग कैसे होते हैं। साहित्य में पुरुष और महिला दिमाग के बीच अंतर को लेकर काफी लिखा गया है। हालांकि, अन्य शोधकर्ताओं का तर्क है कि ये अंतर मामूली हैं। एक अध्ययन ने बताया है कि मनोवैज्ञानिक रूप से हममें से अधिकांश वास्तव में कहीं न कहीं एक ऐसी बीच की जगह पर होते हैं, जिसे रूढ़िवादी तरीके से हम “पुरुष” और “महिला” के रूप में जानते-समझते आए हैं।
लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि जो लोग इस बीच की अवस्था में होते हैं, वे दिमाग के साथ-साथ व्यवहार में भी अधिक उभयलिंगी होते हैं? इसकी जांच करने के लिए, हमने मशीन-लर्निंग एल्गोरिदम और न्यूरोइमेजिंग डेटा का उपयोग करके एक ब्रेन रेंज बनाई। चूंकि नर और मादा दिमाग समान होते हैं, इसलिए अलग-अलग मस्तिष्क क्षेत्रों के बीच कनेक्टिविटी को अलग-अलग दिखाया गया है। हमने 9,620 प्रतिभागियों (4,495 पुरुष और 5,125 महिला) के दिमाग को चिह्नित करने के लिए इन कनेक्टिविटी मार्कर का उपयोग किया।
हमें पता चला कि दिमाग वास्तव में दो छोरों के बजाय पूरे रेंज में बंटा हुआ था। एक सबसैंपल में, लगभग 25 प्रतिशत दिमाग पुरुष के रूप में पहचाने गए, 25 प्रतिशत महिला के रूप में और 50 प्रतिशत रेंज के उभयलिंगी (एंड्रोजिनस) क्षेत्र में बंटे हुए थे। हमने पाया कि जिन प्रतिभागियों की मैपिंग इस रेंज के मध्य (एंड्रोजीनस) में थी, उनमें अवसाद और चिंता आदि जैसे मानसिक लक्षण दो छोरों की तुलना में कम थे।
ये निष्कर्ष हमारी इस परिकल्पना का समर्थन करते हैं कि ब्रेन एंड्रोजिनी (मस्तिष्क और तंत्रिका विज्ञान) की न्यूरोइमेजिंग अवधारणा मौजूद है, जो मनोवैज्ञानिक एंड्रोजिनी की तरह ही बेहतर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी हो सकती है।
एंड्रोजिनी क्यों फायदेमंद है
बदलते वैश्विक परिवेश के अनुकूल नई चीजें सीखने के लिए हमें अपने आस-पास की दुनिया के प्रति चौकस रहने में सक्षम होना चाहिए। हमारे पास बेहतर मानसिक क्षमता और लचीलापन भी होना चाहिए और जीवन रणनीतियों की एक विस्तृत श्रृंखला को नियोजित करने में सक्षम होना चाहिए।
ये कौशल हमें बाहरी संदर्भ को तेजी से समझने और बेहतर निर्णय लेने में सक्षम बनाते हैं। ये हमें समय रहते अवसरों का लाभ उठाने और लचीला बनाने में मदद करते हैं। इसलिए, इन कौशलों के साथ एंड्रोजीनस दिमाग वाले लोगों के लिए फायदा अधिक है।
लेकिन ऐसा क्यों है? लगभग 20,000 प्रतिभागियों पर किए गए 78 अध्ययनों के मेटा-एनालिसिस से पता चला कि जो पुरुष विशिष्ट मर्दाना मानदंडों के अनुरूप होते हैं, उदाहरण के लिए दूसरों पर कभी भरोसा नहीं करते और महिलाओं पर बल प्रयोग करते हैं, उन्हें अन्य की तुलना में अवसाद, अकेलेपन, मादक द्रव्यों के सेवन समेत अधिक मनोरोग लक्षणों का सामना करना पड़ता है। वे कमजोर सामाजिक संबंध की वजह से खुद को अलग-थलग महसूस करते थे।
जो महिलाएं पारंपरिक सोच को मानते रहने की कोशिश करती है, उन्हें कीमत चुकानी होती है। हो सकता है कि उन्हें अपने सपनों की नौकरी से बाहर होना पड़े, क्योंकि इंडस्ट्री पर पुरुषों का वर्चस्व है। लेकिन, एंड्रोजीनस (उभयलिंगी) इंसान कुछ हद तक लिंग मानदंडों से प्रभावित नहीं होता।
इसका मतलब यह नहीं है कि स्पेक्ट्रम के बिल्कुल ही दूसरे छोर पर आने वाले लोगों के लिए कोई उम्मीद नहीं है। मस्तिष्क एक हद तक परिवर्तनशील है। यह संभावना है कि एंड्रोजीनस मस्तिष्क आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारकों से प्रभावित होता है। साथ ही दोनों के बीच बातचीत भी होती है। हमारे अध्ययन से पता चलता है कि लोगों की ब्रेन एंड्रोजिनी में जीवन के अलग-अलग चरणों में बदलाव हो सकते हैं।
आगे जीवन के विभिन्न चरणों में ब्रेन एंड्रोजिनी पर हो सकने वाले असर शिक्षा जैसे कारकों का इस पर होने वाले प्रभाव को लेकर और अधिक अध्ययन की आवश्यकता होगी। इसे देखते हुए हमने पाया कि एक एंड्रोजीनस ब्रेन बेहतर मानसिक स्वास्थ्य प्रदान करता है। यह जीवन भर स्कूल और कार्यस्थल में बेहतर प्रदर्शन प्रदान कर सकता है। हमें रूढ़ियों से बचने और बढ़ते बच्चों को संतुलित अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है।
(बारबरा जैकलीन साहाकियान क्लिनिकल न्यूरोसाइकोलॉजी, यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज में प्रोफेसर हैं; क्रिस्टेल लैंगने कोगनिटिव न्यूरोसाइंस, यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज में पोस्टडॉक्टोरल रिसर्च असोसिएट हैं; चियांग लुओ फूडान यूनिवर्सिटी में असोसिएट प्रिंसिपल इंवेस्टीगेटर ऑफ न्यूरोसाइंस हैं और यी झांग यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज में विजिटिंग पीएचडी कैंडिडेट हैं। लेख द कन्वरसेशन से विशेष अनुबंध के तहत प्रकाशित) (downtoearth.org.in)
-राकेश कुमार मालवीय
ग्रामीणों का कहना है कि इस आदेश के बाद उनका निस्तार, उनके आसपास का पर्यावरण और वन्य प्राणियों पर संकट खड़ा हो जाएगा
मध्यप्रदेश के मंडला जिले के भंवरताल गांव के लोग इन दिनों एक संकट की दस्तक सुन रहे हैं। सरकार का एक आदेश लागू होने के बाद उनका संकट और बढ़ जाएगा। ग्रामीणों का कहना है कि इस आदेश के बाद उनका निस्तार, उनके आसपास का पर्यावरण और वन्य प्राणियों पर संकट खड़ा हो जाएगा, क्योंकि गांव के आसपास रिजर्व फारेस्ट और आरक्षित भूमि होने से उनकी आजीविका भी वनों पर निर्भर है, यह जिला आदिवासी बाहुल्य जिला है और यह पेसा यानी पांचवी अनुसूची के अंतर्गत आता है, गांव के लोगों ने ग्रामसभा में इस आदेश के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित करके विरोध जताया है और न्यायालय जाने की बात भी कह रहे हैं।
दरअसल मध्यप्रदेश में 22 जनवरी को मध्य प्रदेश गौण खनिज नियम, 1996 में एक संशोधन को अधिसूचित कर दिया। इस संशोधन के जरिए राज्य में गौण खनिज उत्खनन के लिए परमिट जारी करने के प्रक्रिया में संशोधन कर दिया गया है। इस संशोधित आदेश के बाद प्रदेश में रिजर्व फारेस्ट के अंदर खनन कार्य को लीज पर दिया जा सकेगा। इस आदेश का स्थानीय समुदायों द्वारा महापंचायत आयोजित कर विरोध किया जा रहा है।
भंवरताल गांव के निवासी निवासी सामाजिक कार्यकर्ता व वकील विभूति झा कहते हैं कि इस संशोधित आदेश के बाद वनों के अंदर गतिविधियां बढ़ेंगी, खनिज पदार्थों का वैध—अवैध उत्खनन बढ़ेगा। इससे वनों के भीतर बसाहटों और जैव विविधता, और वन्यप्राणियों पर संकट खड़ा हो जाएगा, इसका दूरगामी असर दिखाई देगा। बात अकेले भांवरताल गांव की नहीं है, उससे सटे आसपास के गांव काताजर, करवाही, भांगा, मलारा आदि में इसका असर दिखाई देगा क्योंकि यह गांववासी उसके आसपास चरवाही से लेकर निस्तार के लिए जलाउ लकड़ी आदि के लिए भी इन्हीं वनों पर निर्भर हैं।
इस इलाके में पहले से ही डोलोमाइट उत्खनन होता रहा है, इंडियन ब्यूरेा आफ माइंस के मुताबिक देश का तकरीबन 27 फीसदी डोलोमाइट मध्यप्रदेश में पाया जाता है। इसका बड़ा हिस्सा मंडला मे भी है। आदेश के बाद मंडला जिले में डोलोमाइट उत्खनन का दायरा बढ़कर कान्हा टाइगर रिजर्व वाले इलाके में भी पहुंचने का खतरा हो जाएगा। ग्रामसभा में पारित प्रस्ताव में लिखा गया है कि जिन इलाकों में डोलोमाइट खनन के लिए अनुमति दी जानी है उन इलाकों में वन्यप्राणियों की चहलकदमी रहती है। इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 2015 से लेकर अब तक 130 मामलों में वनविभाग ने पशु हानि के लिए मुआवजा भी दिया है। यह मामले तेंदुआ या बाघ द्वारा पालतु पशुओं को मारने के मामले से संबंधित हैं। विभूति झा कहते हैं कि यदि इस क्षेत्र में खनन की अनुमति दी जाती है तो न केवल जंगल काटे जाएंगे, वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण भी होगा, जिसका असर कान्हा टाइगर रिजर्व पर पड़ने की आशंका है।
हालांकि सरकार का कहना है कि इस पूरे मामले पर स्थानीय समुदाय से दावे और आपत्तियां मंगवाने के बाद ही आगे की प्रक्रिया में जाया जाएगा। जिला कलेक्टर हर्शिका सिंह कहती हैं कि इस मामले में स्थानीय समुदाय से नोटिस देकर दावे और आपत्तियां आमंत्रित की जा रही हैं। इसके बाद ही आगे बढ़ा जाएगा। सामाजिक कार्यकर्ता विभूति झा का कहना है कि इन दावे और आपत्तियों के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया जा रहा है, जबकि इससे प्रभावित होने वाला एक बड़ा वर्ग है। (downtoearth.org.in)
-विभा वार्ष्णेय
अगर चने का नर्म साग सर्वसुलभ हो जाए तो इस पौष्टिक आहार को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी
सर्दियों के दौरान दिल्ली में हरी पत्तेदार सब्जियों से भरी गाड़ियों के नजारे आम हैं। फेरी वाले सरसों, पालक और मेथी जैसे तरह-तरह के साग बेचते दिखते हैं। हमेशा तो नहीं लेकिन कभी-कभार उनके पास चने का साग भी मिल जाता है। चना (साइसर एरीटिनम) दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फली है, जिसकी खेती इसके प्रोटीन से भरपूर बीजों के लिए की जाती है न कि हरी पत्तियों के लिए। यही वजह है कि इसका साग हमें बाजार में बहुत मुश्किल से मिलता है।
चने की पैदावार को बढ़ाने के लिए इसकी कोमल पत्तियों को बढ़ रहे पौधों से तोड़ लिया जाता है। इससे पौधा घनी झाड़ीनुमा और पौधा अधिक बीज पैदा करने में सक्षम हो जाता है। ऑक्सैलिक और मैलिक एसिड की उपस्थिति की वजह से इसकी पत्तियों में थोड़ी खटास होती है। हालांकि, पत्तियों को धो देने से उनकी खटास चली जाती है। गांवों में बच्चों को स्नैक्स की तरह इन पत्तियों का लुत्फ उठाते देखना आम है। बच्चे केवल शीर्ष पर मौजूद नई पत्तियों को ही तोड़ते हैं, इसलिए किसान भी इससे नाराज नहीं होते।
यह साग बाजार में बमुश्किल ही मिल पाता है। लेकिन, अगर दुकानदार के पास आपको यह पत्तियां न मिलें, तो उसके लिए दुखी होने की जरूरत नहीं है। आप उन्हें घर पर ही उगा सकते हैं। इसके लिए आपको बस माइक्रोग्रीन्स को उगाने के तौर-तरीकों को सीखने की जरूरत है। बस पहली दो पत्तियों के आने के तुरंत बाद ही पौधों की छंटाई कर देने की जगह उसे कुछ समय तक बढ़ने देना चाहिए, जब तक टहनियों में और भी पत्तियां न निकल आएं। करीब 10 दिनों में पर्याप्त संख्या में पत्तियां निकल आती हैं।
माइक्रोग्रीन्स उगाने के लिए छोटे, भूरे बीजों वाली देसी किस्म बढ़िया होती है। बीज को एक दिन के लिए पानी में भिगोएं, फिर उन्हें रोप दें और मिट्टी की एक पतली परत से ढंक दें। उन्हें सूरज की रोशनी में बढ़ने दें और पौधों को नियमित तौर पर पानी देते रहें। ये काफी तेजी से बढ़ते हैं, इसी वजह से स्कूलों में बच्चों को चने के बीजों से ही अंकुरण के बारे में पढ़ाया जाता है।
पौष्टिक तत्वों से भरपूर
अध्ययनों से पता चला है कि चने की पत्तियां बहुत पौष्टिक होती हैं। ये मैक्रोन्यूट्रिएन्ट मिनरल्स (कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, फास्फोरस) और माइक्रोन्यूट्रिएन्ट मिनरल्स (आयरन, जिंक, मैंग्नीज, कॉपर और बोरोन) दोनों का बहुत अच्छा स्रोत हैं। यही नहीं, साल 2003 में द जर्नल ऑफ द साइंस ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर में प्रकाशित एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बताया कि इनमें से अधिकतर मिनरल्स का स्तर इस साग में पत्तागोभी और पालक से कहीं अधिक है।
पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना के शोधार्थियों के मुताबिक, 100 ग्राम सूखी पत्तियों में 93 मिलीग्राम आयरन होता है। उन्होंने सुझाव दिया कि पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इन पत्तियों के पाउडर का इस्तेमाल चपाती और पूरी जैसे पारंपरिक खाने में किया जाना चाहिए।
परंपरागत रूप से साग केवल उन राज्यों में ही भोजन का हिस्सा है, जहां चने की खेती की जाती है। इनमें उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, तमिलनाडु, झारखंड और बिहार शामिल हैं। हालांकि, पत्तियों को सुखाकर उनका भंडारण किया जा सकता है, लेकिन सहजन की पत्तियों के विपरीत अभी तक इसके लिए कोई औपचारिक बाजार मौजूद नहीं है। चना उत्पादन में अग्रणी भारत जैसे देश के लिए यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि पूरी दुनिया का 65 फीसदी चना यहीं पैदा होता है। उत्तर प्रदेश में दाल में साग डालकर पकाया जाता है और इसे बनाना बहुत आसान है। इसमें बहुत कम मसालों का उपयोग किया जाता है, ताकि साग की खटास का लुत्फ उठाया जा सके (देखें रेसिपी)।
बीते कुछ वर्षों के दौरान पाया गया है कि यह फलीदार प्रजाति खतरे में है। पश्चिमी ईरान से दक्षिण पूर्व तुर्की तक फैले अर्द्धचंद्राकार उपजाऊ क्षेत्र में चने की फसल के तौर पर खेती (गृहीकरण) शुरू की गई थी। अध्ययनों से पता चलता है कि 10 हजार से अधिक वर्षों में चने के गृहीकरण की इस प्रक्रिया के दौरान इसकी 80 फीसदी आनुवांशिक विविधता खो गई।
इसने बीमारियों, सूखे और वैश्विक तापमान के प्रति पौधे को अतिसंवेदनशील बना दिया है। अप्रैल 2019 में नेचर जेनेटिक्स में प्रकाशित एक पेपर में इंटरनैशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टिट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (इक्रिसैट), हैदराबाद ने अनुमान जताया है कि वैश्विक तापमान बढ़ने की वजह से उपज को 70 फीसदी तक नुकसान पहुंच सकता है। यह एक विरोधाभास ही है कि ग्रीनहाउस गैसों में प्रमुख नाइट्रोजन के प्रबंधन में चने की फसल अहम भूमिका निभाती है, उसके उत्सर्जन को नियंत्रित करती है।
इक्रिसैट गर्मी और सूखे को सहन कर सकने वाली चने की प्रजातियों को विकसित करने का प्रयास कर रहा है, जिससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि यह प्रोटीन युक्त फलियां जलवायु परिवर्तन से बच पाने में सक्षम हैं। संस्थान ने इस पौधे में ऐसे जींस की पहचान की है, जो 38 सेल्सियस तक तापमान को सहने में फसल की मदद कर सकता है।
चने में 23 फीसदी प्रोटीन पाया जाता है। ऐसे में दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीका के विकासशील देशों में पोषण सुरक्षा के लिहाज से यह फसल बहुत महत्वपूर्ण है। इस गुणकारी, बहुउपयोगी और पौष्टिक फसल की रक्षा के लिए इक्रिसैट के प्रयास महत्वपूर्ण हैं।
दाल के साथ चने का साग
सामग्री:
चने का साग : 250 ग्राम
चने की दाल : 50 ग्राम
मिर्च पाउडर : 1 चम्मच
पिसी हल्दी : 1 चम्मच
धनिया पाउडर : 1 चम्मच
गरम मसाला : 1 चम्मच
जीरा : 1 चम्मच
हींग : 1 चुटकी
अदरक मिर्च का पेस्ट : 1 चम्मच
मक्के का आटा : 1 चम्मच
घी : 2 चम्मच
नमक : स्वादानुसार
विधि: चने के साग से कठोर तने और पुरानी पत्तियों को हटा दें। साग को धोकर बारीक काट लें। अब कटे हुए साग और दाल को हल्दी पाउडर, नमक, 1 चम्मच घी और 2 कप पानी के साथ प्रेशर कुकर में डाल दें। अब इसे करीब 10 मिनट यानी 5 सीटि यां आने तक पकाएं। अब कुकर खोलें, उसमें मिर्च, धनिया पाउडर और गरम मसाला डाल दें। फिर इसमें अदरक मिर्च का पेस्ट मिलाकर कुकर को दोबारा आंच पर चढ़ा दें, लेकि न ढक्कन को बंद न करें, खुला ही रहने दें। अब एक कप पानी में मक्के का आटा अच्छी तरह से मिलाएं। दाल जब तक गाढ़ी न हो जाए, इसे धीरे-धीरे मिलाते रहें। आखिर में तड़का पैन को आंच पर रखें और उसमें घी के साथ जीरा, हींग डाल दें और मसालों को चटकने दें। अब इसे दाल में डालकर तुरंत ढक्कन बंद कर दें। इसे अच्छी तरह से मिलाकर मक्के और बाजरा की रोटि यों के साथ परोसें। " (downtoearth.org.in)
-कमलेश
“सात तारीख़ से एक हफ़्ता पहले मेरे पास एक लड़की का फ़ोन आया. उसने कहा मैं बहुत परेशान हूं और मुझे यहां से निकलना है तो मैंने पूछा कि क्या बात है, क्या घरेलू हिंसा हुई है? उसने कहा नहीं और बस रोना शुरू कर दिया. उसने कहा कि मदद के लिए मैं घर से किसी को नहीं बुला सकती.”
सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी की ये बातें उस लड़की से हुई थीं जिसकी अलग सेक्शुअल ओरिएंटेशन (यौन व्यवहार) होने के बावजूद भी जबरन एक लड़के से शादी करा दी गई. लड़की का कहना है कि वो लेस्बियन है और लड़के से शादी नहीं करना चाहती थी.
लड़की का आरोप है कि उन्होंने अपने लेस्बियन होने के बारे में घर में बार-बार बताया था लेकिन फिर भी उनकी शादी एक लड़के से कर दी गई. ऐसे में उन्हें मजबूरन अपने ससुराल से भागकर ग़ैर-सरकारी संस्था ‘अनहद’ की मदद लेनी पड़ी.
आज ये मामला दिल्ली हाईकोर्ट में है और वो लड़की अपने अधिकारों और सुरक्षा की माँग कर रही है.
कोर्ट ने लड़की की याचिका पर सुरक्षा मुहैया कराते हुए कहा है कि एक बालिग़ लड़की को ससुराल या मायके में रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है. वो जहां चाहे रह सकती है.
इस मामले में उन्हें 'अनहद' से मदद मिली और वो अब दिल्ली के ही एक और एनजीओ के शेल्टर होम में रह रही हैं.
सब जानते हुए भी हुई शादी
अनहद से ही जुड़ीं शबनम हाशमी बताती हैं, “मेरे पास दोबारा सात तारीख़ को सुबह सात बजे किसी और लड़की का फ़ोन आया और उसने कहा कि वो बहुत परेशान है. उस दिन पीड़ित लड़की का भी फिर से फ़ोन आया.”
“उन्होंने बताया कि लड़की की ज़बरदस्ती शादी कर दी गई है और वो बहुत परेशान है. बात करके मुझे लगा कि कुछ गंभीर मामला है. मैंने उन्हें ऑफ़िस बुलाया. तब आकर उन्होंने मुझे पूरी कहानी बताई.”
पीड़िता ने अपनी याचिका में बताया है कि किस तरह उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ शादी कर दी गई और वो डेढ़ साल इस घुटन में जीती रहीं.
याचिका के मुताबिक़ पीड़िता की अक्टूबर 2019 में शादी हुई थी. उन्होंने शादी से पहले अपने माता-पिता को खुलकर बता दिया था कि वो लेस्बियन हैं और उनकी लड़कों में कोई रूचि नहीं है. उन्हें शादी नहीं करनी है.
लेकिन घरवालों ने जबरन शादी करा दी. शादी के बाद वो दिल्ली के बुराड़ी इलाक़े में अपने ससुराल आ गईं. यहां आकर उन्होंने अपने पति को बता दिया कि वो लड़कों में रूचि नहीं रखतीं और इस शादी में नहीं रह सकतीं. उनके बीच शारीरिक संबंध भी स्थापित नहीं हुए.
याचिका में कहा गया है कि वो इस जबरन शादी से बिल्कुल नाख़ुश थीं और धीरे-धीरे अवसाद में जाने लगी थीं. उन्हें कई बार आत्महत्या का भी ख्याल आया. इससे परेशान होकर उन्होंने अपने पति से तलाक़ लेने की बात की. लेकिन, तलाक़ किसी ना किसी वजह से टलता रहा.
शबनम हाशमी बताती हैं कि पति ने तलाक़ से मना नहीं किया लेकिन कहा कि छोटी बहन की शादी तक रुक जाओ वरना बदनामी होगी. पीड़िता रुक गईं क्योंकि कुछ ही महीनों में शादी होने वाली थी. लेकिन, इसके बाद मार्च 2020 में लॉकडाउन हो गया. बहन की शादी भी हो गई लेकिन तलाक़ नहीं हो पाया.
इलाज कराने की धमकी
पीड़िता के पति भारतीय वायु सेना में हैं तो उनकी पोस्टिंग कहीं बाहर थी. पीड़िता की अपने दोस्तों से भी बात होती रहती थी.
याचिका के मुताबिक़ ससुराल में उन पर विवाहेत्तर संबंध होने का आरोप लगाया गया. ये बात उनके मायके वालों को भी बताई गई. पीड़िता ने अपने माता-पिता को बताया कि वो इस शादी में कितनी परेशान हैं. उन्होंने अपने पिता को ‘सत्यमेव जयते’ सीरीज़ का वो एपिसोड भी भेजा जो एलजीबीटी समुदाय की समस्याओं पर आधारित था.
लेकिन, उनके माता-पिता नहीं माने और कहा कि उन्हें वापस ले जाने से समाज में बदनामी होगी. साथ ही कहा कि उनका सेक्शुअल ओरिएंटेशन एक बीमारी है जिसका वो इलाज कराएंगे. इसके बाद पीड़िता बुरी तरह घबरा गईं.
शबनम हाशमी बताती हैं, "जब पीड़िता मेरे पास आई तो बहुत डरी हुई थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. अपने माता-पिता की बात से उसे लगा कि अब वो आकर ले जाएंगे और फ़ोन भी ले लेंगे. उसके पास वहां से निकलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. तब उन्होंने मुझे फ़ोन किया."
पीड़िता को समझाने और पुलिस के पास शिकायत दर्ज करने पर उनकी मानसिक स्थित बेहतर हुई और वो अब शेल्टर होम में रह रही हैं.
शबनम हाशमी ने बताया कि नौ तारीख़ को उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका डालकर पीड़िता के अधिकारों की सुरक्षा की माँग की.
लेकिन, इस बीच शबनम हाशमी को धमकियां भी मिलीं. वो बताती हैं कि, "मेरे पास रात से फ़ोन आने शुरू हो गए. परिवार के लोग उस शेल्टर होम में भी पहुँच गए जहां लड़की को रखा गया था. वो लड़की को वापस देने के लिए कहने लगे."
क्या कहता है परिवार
इस मामले में हमने पीड़िता के पिता भरत सिंह से भी बात की. उनका कहना है कि उन्हें अपनी बेटी के लेस्बियन होने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.
उन्होंने बताया, “बेटी ने कभी इस बारे में नहीं बताया वरना हम उसकी शादी ही नहीं कराते. उसके ससुराल में क्या चल रहा था हमें ये भी नहीं पता. जब उन्होंने बताया कि बेटी ससुराल से चली गई है तो हम वहां पहुँचे. हमने बस कहा कि बेटी से मिला दें. अगर मिलना नहीं चाहती तो बस उसे दिखा ही दें.”
भरत सिंह कहते हैं कि उनका परिवार कोर्ट में नहीं जाएगा. बेटी जहां रहना चाहे रह सकती है. घर आना चाहे तो घर भी आ सकती है.
हालांकि, पीड़िता की वकील वृंदा ग्रोवर ने बताया कि उन्होंने और कोर्ट में न्यायाधीश ने पीड़िता से ख़ुद बात की है और पूछा है कि वो कहां रहना चाहती हैं. पीड़िता का कहना है कि फ़िलहाल वो अपने परिवार से नहीं मिलना चाहतीं क्योंकि उसे ख़तरा है. बाद में क्या करना है आगे देखेंगी.
वृंदा ग्रोवर बताती हैं, “हाईकोर्ट में हमने इसलिए ये मामला डाला क्योंकि उसके माता-पिता को जैसे ही पता चला कि वो घर से निकली है, उसकी लिए तलाश शुरू हो गई. उसे यही डर था कि उसके माता-पिता या तो उसको ज़बरदस्ती ससुराल भेजेंगे या पंडित और डॉक्टर को दिखाएंगे. कोर्ट ने एकदम से राहत दी.”
“कोर्ट ने कहा कि एक व्यस्क औरत को बिल्कुल भी जबरन किसी रिश्ते में नहीं रख सकता. अगर उसकी सेक्शुअल ओरिएंटेशन अलग है तो उसके साथ इस तरह की ज़बरदस्ती नहीं की जा सकती. पति को जल्द से जल्द शादी रद्द करने के लिए भी कहा. पति ने भी सहमति जताई है.”
वह बताती हैं कि एक बार केस ख़त्म हो जाएगा तो पीड़िता अपने अनुसार रह सकती हैं. वो पढ़ाई या नौकरी जो भी कर सकती हैं.
सिर्फ़ एक मामला नहीं
इस मामले में पीड़िता के साथ जो हुआ वो कोई पहला मामला नहीं है. कई और लेस्बियन लड़कियों को ऐसी ही परेशानियों से गुज़रना पड़ता है.
शबनम हाशमी बताती हैं कि उनके ही पास एक डेढ़ महीना पहले एक लेस्बियन कपल का मामला आया था. उनके ऊपर परिवार का बहुत दबाव था. लड़की घर से भागी थी. फिर उसे सुरक्षा दिलाई गई.
समानाधिकार कार्यकर्ता हरीश अय्यर कहते हैं, “समलैंगिकों के साथ जबरन शादी या दबाव डालने के मामले कम नहीं हैं लेकिन समस्या ये है कि इसका कोई डाटा ही नहीं है. ये दिखाता है कि उन्हें लेकर सरकारें गंभीर ही नहीं हैं. वरना स्थितियां ऐसी हैं कि कई बार हफ़्ते में दो बार मेरे पास मदद के लिए फ़ोन आते हैं.”
“दरअसल, हमारे समाज में औरत की मर्ज़ी और इच्छा मायने ही नहीं रखती है. समलैंगिक लड़कों के मुक़ाबले समलैंगिक लड़कियों की ज़िंदगी और भी मुश्किल होती है. लड़की के लिए लोग मानते ही नहीं कि उसकी भी कोई शारीरिक इच्छाएं हो सकती हैं. अब जिसकी शारीरिक इच्छाएं ही नहीं, वो हां या ना कैसे कर सकती है. वो शादी में हिंसा भी झेलती हैं.”
माता-पिता सामाजिक डर से या बाद में ठीक हो जाएगी ये सोचकर उसकी शादी कर देते हैं. लेकिन इस तरह उसे ख़ुशियां मिलती नहीं बल्कि छिन जाती हैं.
ऐसे में जानकार बहुत बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान की ज़रूरत पर ज़ोर डालते हैं ताकि जितना लोग सामलैंगिकता के बारे में सुनेंगे और समझेंगे, उतना ही इसे स्वीकार कर पाएंगे.
समलैंगिक विवाह को मौलिक अधिकार क्यों नहीं मानती केंद्र सरकार
धर्म और जाति से परे यहां लोग लिखते हैं अपने प्यार की कहानियां
वृंदा ग्रोवर कहती हैं कि क़ानून और समाज दोनों स्तर पर स्वीकार्यता की ज़रूरत है. अगर समलैंगिक विवाह को मंज़ूरी मिलती है तो इससे समाज में एक व्यापक समझ बनेगी. सरकार की ज़िम्मेदारी है कि इस बात को समझाने के लिए सामाजिक जागरूकता अभियान चलाए ताकि लोग समझ सकें कि ये प्राकृतिक है और हमें ये स्वीकार करना चाहिए.
उनका कहना है कि वक़्त के साथ ये बदलेगा लेकिन उस बीच कई नौजवानों को बहुत पीड़ा उठानी पड़ेगी.
फ़िलहाल मौजूदा मामले में पीड़िता शेल्टर होम में रह रही हैं. मामला ख़त्म होने तक उन्हें और मदद करने वाली संस्था को सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी. इस मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को है. (bbc.com)
नई दिल्ली, 12 मार्च | लगभग 237 सेंधमारी की घटनाओं ने 2020 में वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को प्रभावित किया है, जबकि इस साल फरवरी 2021 तक ही 56 और ऐसे मामलों का खुलासा हो चुका है। साइबरसिक्योरिटी कंपनी टेनेबल की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। यानी पिछले 14 महीने की अवधि के दौरान कुल 293 सेंधमारी की घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं और 57.34 प्रतिशत मामलों का सार्वजनिक रूप से खुलासा हुआ।
डाटा में इस बात का भी पता चला है कि 2020 में 10 करोड़ से अधिक स्वास्थ्य सेवा (हेल्थकेयर) रिकॉर्ड सामने आए, जबकि 2021 के पहले दो महीनों में ही 28.6 लाख रिकॉर्ड का खुलासा किया गया है।
रैंसमवेयर को स्वास्थ्य संबंधी उल्लंघनों के सबसे प्रमुख मूल कारण के रूप में रिपोर्ट किया गया है, जो कि 54.95 प्रतिशत रहा है।
रयूक सबसे अधिक इस्तेमाल किए गए रैंसमवेयर में शामिल रहा, और कुल रैंसमवेयर में से इसकी सेंधमारी का प्रतिशत 8.64 दर्ज किया गया।
इसके बाद मेज (6.17 प्रतिशत), कोंटी (3.7 प्रतिशत) और रेविल/सोंडिनोकीबी (3.09 प्रतिशत) का स्थान रहा।
अन्य प्रमुख कारणों में ईमेल कोम्प्रोमाइज/फिशिंग (21.16 प्रतिशत), अंदरूनी खतरे (7.17 प्रतिशत) और असुरक्षित डेटाबेस (3.75 प्रतिशत) शामिल रहे हैं।
टेनेबल के सिक्योरिटी रिस्पांस मैनेजर रिओ क्विनलान ने एक बयान में माना कि जिस तरह से कोविड-19 महामारी वैश्विक स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे पर अभूतपूर्व दबाव डाल रही है, इस समय सेंधमारी करने वाले हमलावर भी इस मौके को भुना रहे हैं।
टेनेबल ने स्वास्थ्य क्षेत्र को सचेत करते हुए कहा है कि स्वास्थ्य संगठनों को अपने संगठन को लक्षित करने और प्रभावित करने की संभावना और कमजोरियों की पहचान करके इसका निवारण करना चाहिए। (आईएएनएस)
बेंगलुरू, 12 मार्च | अमेजन इंडिया ने शुक्रवार को अपनी आईफोन 12 सीरीज, आईपैड मिनी, मैकबुक प्रो और अन्य डिवाइस पर सौदों और छूट की पेशकश के लिए अपने प्लेटफॉर्म पर 'एप्पल डेज' की घोषणा की। कंपनी ने एक बयान में कहा कि एप्पल डेज 17 मार्च तक लाइव होगा, जिसमें भाग लेने वाले विक्रेताओं की ओर से शानदार ऑफर पेश किए जाएंगे।
उपयोगकर्ता 2,800 रुपये की छूट के साथ 67,100 रुपये की कीमत पर आईफोन 12 मिनी प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा ग्राहक एचडीएफसी बैंक क्रेडिट कार्ड पर 6,000 रुपये की अतिरिक्त छूट का लाभ उठा सकते हैं।
कंपनी ने कहा कि इस दौरान आईफोन 11 प्रो 79,900 रुपये की आकर्षक कीमत पर उपलब्ध होगा।
एप्पल डेज के दौरान, उपयोगकर्ता एचडीएफसी बैंक के डेबिट और क्रेडिट कार्ड पर 3,000 रुपये की तत्काल छूट के साथ आईपैड पर 9,000 रुपये तक की बचत करके नवीनतम ऐप्पल उत्पादों पर आकर्षक सौदों का आनंद ले सकते हैं।
आईफोन 12 मिनी दुनिया का सबसे छोटा, सबसे पतला और सबसे हल्का 5जी स्मार्टफोन है और इसे सभी तकनीक को एक ही स्मार्टफोन में पेश करते हुए तैयार किया गया है।
5.4-इंच की स्क्रीन के साथ आने वाले इस फोन में स्टैंडर्ड मॉडल के 6.1-इंच डिस्प्ले की तुलना में 12 मॉडल की तरह ही पीछे की तरफ एक ही दोहरा कैमरा सेटअप देखने को मिल रहा है और यह ग्राहकों के हाथ में काफी आकर्षक फोन के तौर पर दिखने वाला है। (आईएएनएस)


