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युद्धग्रस्त यूक्रेन से पटना लौटे छात्रों ने बताया कि वे कैसे हालात से निकलकर आए हैं. लेकिन अब भी सैकड़ों छात्र फंसे हैं और किसी तरह निकलने का रास्ता खोज रहे हैं.
डॉयचे वैले पर मनीष कुमार की रिपोर्ट-
‘‘एक दिन मेरी फ्लाइट कैंसिल हो गई थी. कीव एयरपोर्ट पर घंटों भूखे रहना पड़ा. मेरी खुशकिस्मती है कि मैं घर सुरक्षित लौट आई. अब मैं अपने माता-पिता के साथ हूं. यहां आने पर अब यूक्रेन की स्थिति के बारे में जो जानकारी मिल रही है, वह काफी डराने वाली है,'' यह कहना है बिहार के दरभंगा जिले की निवासी अंजली कुमारी का जो यूक्रेन के बुकोविनियन स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी, चेर्निटिस में मेडिकल (फर्स्ट ईयर) की छात्रा हैं.
अंजलि वाकई खुशकिस्मत रहीं कि अपने माता-पिता के पास लौट आईं क्योंकि सैकड़ों विद्यार्थी ऐसे हैं जो यूक्रेन पर हो रहे रूसी हमले के दौरान वहां विभिन्न शहरों में फंसे हैं. बमबारी यूक्रेन में रही है, किन्तु अपनी संतान की सुरक्षा को लेकर माता-पिता का दिल भारत में दहल रहा है. किसी का खाना-पीना छूट गया है तो कोई बच्चों की सलामती की दुआ कर रहा है.
ऐसी ही कुछ दुआएं कुबूल हुईं और 27 फरवरी को यूक्रेन से अलग-अलग विमानों से 23 बच्चे पटना पहुंचे. वहां मेडिकल की पढ़ाई कर रहे बेटे अभिषेक से मिलने उसके माता-पिता करीब तीन घंटे पहले ही पटना एयरपोर्ट पहुंच गए. दोनों की आंखें बता रही थीं कि कई रातें उन्होंने जागकर काटी हैं. बाहर आते ही जैसे मां-पिता पर नजर पड़ी, दोनों के गले से लिपट कर खूब रोए, फिर पांव छूकर आर्शीवाद लिया. मिलन का यह दृश्य वहां सभी को रुला गया.
यही हाल बिहार विधानसभा के सदस्य राजीव सिंह और यूक्रेन से आई उनकी बिटिया रीमा सिंह का था. पिता को देख रीमा के सब्र का बांध टूट गया और वह बिलख पड़ीं.
खराब हैं हालात
दरभंगा के मोहम्मद अल्ताफ कहते हैं, ‘‘ यूक्रेन की हालत बहुत खराब है. वहां लोग भूखों मर रहे हैं. हम लोग भी दो दिनों तक भूखे रहकर मेट्रो स्टेशन के नीचे बने बंकरों में रहे.'' बुकोविनियन स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी की छात्रा व नालंदा जिले के एकंगरसराय प्रखंड के सैदपुर गांव निवासी दिव्या सिंह कहती हैं, ‘‘मैं यूक्रेन के पश्चिमी हिस्से चेरिनवित्सी में थी. वहां स्थिति कीव व पूर्वी भाग की तरह इतनी बुरी नहीं है. हम रोमानिया बॉर्डर के करीब थे, इसलिए हमें भारतीय दूतावास ने सबसे पहले निकाला. तिरंगा देख कर रूस व यूक्रेन के सैनिक कोई रोक-टोक नहीं करते. बॉर्डर पर जाते वक्त हमारी बस पर तिरंगा लगा था और हम हाथ में भी तिरंगा लिए थे.''
सारण जिले के मशरक निवासी अनमोल प्रकाश ने बताया कि वहां स्थिति बदतर होती जा रही है. वह कहते हैं, "आम नागरिकों ने हथियार उठा लिए हैं. नागरिक भवनों पर बम बरसाए जा रहे हैं. देश छोड़ने को बहुत से लोग बॉर्डर पर खड़े हैं. जो रोक दिए गए हैं, वे मदद मांग रहे है. हमारी गाड़ी पर तिरंगा लगा था, इसलिए हम लोग सुरक्षित रोमानिया पहुंच गए.”
चेरिनवित्सी में मेडिकल (फर्स्ट ईयर) के छात्र आशीष कहते हैं, ‘‘हमारा हॉस्टल रोमानिया बॉर्डर से महज 30 किलोमीटर की दूरी पर था. आवागमन का साधन नहीं होने के कारण लोगों मीलों पैदल चल कर देश से बाहर जाने के लिए बॉर्डर पहुंच रहे हैं. वे चाहते हैं कि रूसी फौज के आने से पहले वे वहां से निकल जाएं.''
जवाब दे रहा धैर्य
यूक्रेन के हारकीव इंटरनेशनल मेडिकल कॉलेज में सेकेंड ईयर के छात्र शुभम ने पटना के मनेर में अपनी मां सविता मिश्रा को फोन किया. बातचीत के दौरान सायरन की आवाज सुनाई दे रही थी. आवाज इतनी तेज थी कि शुभम की आवाज कभी-कभी काफी दब जा रही थी. उसने पोलैंड के रास्ते भारत लौटने की बात कही. बात हो ही रही थी कि उसने कहा, "मां, सिग्नल वीक हो रहा है. अब शायद ही बात हो पाए.” यह सुनते ही सविता मिश्रा अंदर तक कांप गईं.
दरअसल, वहां पढ़ाई के लिए बिहार से गए कई बच्चे अपने माता-पिता को वॉट्सऐप कॉल कर या फिर वीडियो भेजकर आपबीती सुना रहे हैं. हारकीव में फंसीं दरभंगा जिले के सिंहवाड़ा प्रखंड के बिदौली निवासी प्रकाश मलिक की बेटी व मेडिकल की छात्रा सत्याक्षी मलिक ने मदद के लिए परिजनों को एक वीडियो भेजा है जिसमें वह कह रही हैं कि यहां हालात पल-पल खराब होते जा रहे हैं.
सत्याक्षी कहती हैं, "हमें जहां बेसमेंट में रखा गया है, वहां धूल से काफी परेशानी है. हमारे बीच जो अस्थमा के मरीज हैं, वे काफी परेशान हैं. एक-एक करके हमें फ्रेश होने के लिए भेजा जा रहा है. माइनस दो डिग्री तापमान में बेसमेंट में कंबल भी काम नहीं कर रहा है. कई बच्चों की तबियत काफी खराब हो गई है. हम और हमारे साथी काफी बुरी स्थिति में हैं, हमारी मदद कीजिए.”
खाने-पीने की समस्या
वहां फंसे लोगों व छात्र-छात्राओं के सामने खाने-पीने की समस्या खड़ी हो रही है. कोई बॉर्डर पर वीजा क्लीयरेंस के इंतजार में है तो कोई बंकर में दुबका पड़ा है. सारण जिले के खैरा थाना क्षेत्र के रामपुर कला गांव निवासी राम शरण सिंह की बिटिया जया कुमारी बुकोविनियन स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी की थर्ड ईयर की स्टूडेंट हैं. वह आमीर्निया बॉर्डर पर 24 घंटे से खड़ी हैं और बताती हैं कि इतनी भीड़ है कि कोई कुछ सुनने को तैयार नहीं है. जंग के दो दिनों में ही हजारों लोगों ने यूक्रेन छोड़ा
भागलपुर जिले के नवगछिया अनुमंडल का तेलघी गांव निवासी करण चौधरी खुशकिस्मत नहीं रहे. 17 किलोमीटर पैदल चलने के बाद लवीव नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में उन्हें वापस भेज दिया गया. भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने फ्लाइट उपलब्ध होने पर उन्हें जल्द वापस भेजने का भरोसा दिलाया है.
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजप्रताप यादव से वीडियो के जरिए हुई बातचीत में पटना के राजेंद्र नगर निवासी एक मेडिकल छात्र रिजवान ने बताया कि हंगरी बॉर्डर पर आने के लिए 18 लोगों ने भारतीय मुद्रा के हिसाब से 57,000 रुपये में एक टैक्सी तय की और रात के एक बजे बॉर्डर पहुंचे. वहां वह घंटों से माइनस दो डिग्री तापमान में खड़े रहे लेकिन अभी तक यूक्रेन से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गई.
जुर्माने के डर से नहीं छोड़ रहे थे कॉलेज
नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर कई छात्रों ने कहा कि यूक्रेन में एडमिशन कराने वाले एजेंटों व एजेंसियों ने भी उन्हें धोखे में रखा. ये छात्र दावा करते हैं कि घर लौटने पर एडमिशन रद्द करने की चेतावनी दी गई थी.
रूस के साथ तनाव की खबरों के बीच ही कई छात्र कॉलेज छोड़ घर जाना चाह रहे थे लेकिन अपने घर सिवान जिले के मैरवा लौटीं मेडिकल थर्ड ईयर की छात्रा अनन्या अनंत का कहना था कि कॉलेज प्रबंधन घर लौटने पर जुर्माना लगाने की बात कह रहा था. भारत सरकार द्वारा यूक्रेन छोड़ने की एडवाइजरी जारी करने के बाद ही कॉलेज प्रबंधन ने छुट्टी दी.
कई छात्रों का कहना था कि उन्हें अपने देश की मीडिया से दूर रहने की सलाह दी गई है. युद्ध से जुड़ी सूचना या वीडियो को सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की भी मनाही है.
मेडिकल की सस्ती पढ़ाई
भारत से बड़ी संख्या में छात्र मेडिकल की पढ़ाई करने यूक्रेन जाते हैं. इसकी मुख्य वजह वहां की सस्ती पढ़ाई है. वहीं से मेडिकल की पढ़ाई कर चुके डॉ. सतीश कुमार के अनुसार छह साल की पढ़ाई के लिए वहां अमूमन भारतीय मुद्रा में 20 से 25 लाख रुपये फीस के तौर पर देने होते हैं जबकि भारत में प्राइवेट मेडिकल कालेजों में पढ़ाई के लिए 50 लाख से एक करोड़ रुपये का खर्च आता है.
विदेशी कॉलेज से पास होने वाले मेडिकल छात्रों को भारत में प्रैक्टिस की इजाजत दिए जाने के बाद यूक्रेन में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है. मधुबनी जिले के निवासी व इंडो-यूरोपियन एजुकेशन फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार बताते हैं कि साल 2019 में यूक्रेन में 19,667 भारतीय छात्र पढ़ाई कर रहे थे.
यूक्रेन में 50 प्रतिशत छात्र मेडिकल की पढ़ाई करते हैं. इसके बाद अन्य कोर्स के छात्र आते हैं. कोरोना महामारी के कारण बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं यूक्रेन से लौट कर ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे थे. (dw.com)
यूक्रेन संकट के बीच में ही जर्मनी ने अपने लिए 100 अरब यूरो का एक विशेष रक्षा कोष बनाने का एलान किया है. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पहली बार जर्मनी और यूरोपीय देश अपनी रक्षा नीति में बड़ा बदलाव कर रहे हैं.
जर्मनी ने एक विशेष सशस्त्र सेना कोष पर 100 अरब यूरो खर्च करने का एलान किया है. यूक्रेन संकट के दौर में इस खास घोषणा में जर्मनी ने अपने रक्षा खर्च को जीडीपी के दो फीसदी से ऊपर रखने की भी बात कही है. अमेरिका लंबे समय से इसकी मांग करता रहा है. यूरोपीय सुरक्षा नीति में बीते कई दशकों में हुआ यह सबसे बड़ा बदलाव है. माना जा रहा है कि इसकी वजह यूक्रेन पर रूस का हमला है.
यूक्रेन संकट से यूरोप में हलचल
जर्मन चांसलर ओलाफ शॉल्त्स की यह घोषणा यूक्रेन को हथियारों की सप्लाई देने के फैसले के कुछ ही घंटे बाद हुई है. इससे पता चलता है कि यूक्रेन पर रूसी हमले ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप की सुरक्षा नीति को किस तरह प्रभावित किया है.
घोषणा ऐसे वक्त में हुई है जब इस्राएल ने युद्ध रोकने पर बातचीत के लिए खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश किया है. उसका कहना है कि रूस और यूक्रेन दोनों के साथ उसके अच्छे संबंध हैं. उधर यूरोप की राजधानियों में युद्ध खत्म करने के लिए प्रदर्शनों का शोर बढ़ता जा रहा है. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोप की जमीन पर पहली बार इतनी बड़ी जंग छिड़ी है.
रविवार को बर्लिन के ब्रांडेनबुर्ग गेट पर जमा दसियों हजार लोग हाथों में नारे लिखी तख्तियों के जरिए कह रहे थे, " हैंड्स ऑफ यूक्रेन," "पुतिन अपना इलाज कराओ और यूक्रेन और दुनिया को शांति में छोड़ दो." वैटिकन में जब पोप फ्रांसिस अपना साप्ताहिक दर्शन दे रहे थे तब सेंट पीटर्स चौराहे पर यूक्रेन के झंडे लहरा रहे थे.
जर्मनी का नया रक्षा कोष
नए रक्षा कोष की शॉल्त्स की घोषणा जर्मनी के लिए अहम है. अमेरिका और दूसरे नाटो के सहयोगी रक्षा कोष में पर्याप्त खर्च नहीं करने के लिए जर्मनी की लगातार आलोचना करते रहे हैं. नाटो सदस्यों ने अपनी जीडीपी का 2 फीसदी रक्षा पर खर्च करने का वादा किया था लेकिन जर्मनी लगातार इससे बहुत कम खर्च करता रहा है. शॉल्त्स ने बर्लिन में संसद के एक विशेष सत्र में कहा, "यह साफ है कि हमें हमारे देश की आजादी और लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए देश की सुरक्षा में और बहुत ज्यादा निवेश करना होगा."
जर्मनी बीते दशकों में अपने कम रक्षा खर्च के लिए आलोचना झेलता रहा है. जर्मन सेना के आधुनिकीकरण का काम बाकी देशों के मुकाबले बीते सालों में बहुत धीमा रहा है. जर्मनी अपनी सुरक्षा के लिए बहुत हद तक अमेरिकी सेना पर भी निर्भर है. हालांकि विश्वयुद्धों के बाद यूरोप में शांति के लिए प्रतिबद्ध इन देशों ने युद्ध को जितना हो सके अपने एजेंडे से बाहर रखने की कोशिश की है और जर्मनी ने तो खासतौर से. यूक्रेन पर रूस के हमले ने इन देशों को अपनी रक्षा नीति बदलने पर विवश कर दिया है.
जर्मन चांसलर ने कहा है कि 100 अरब यूरो का कोष फिलहाल 2022 के लिए एक बार का होगा. अभी यह साफ नहीं है कि आने वाले सालों के लिए भी इसी तरह से धन दिए जाएंगे. शॉल्त्स ने यह जरूर साफ कर दिया है कि जर्मनी अपनी जीडीपी के 2 फीसदी से ज्यादा धन रक्षा पर खर्च करेगा. जाहिर है कि भविष्य में जर्मनी का रक्षा खर्च बढ़ जाएगा.
बदल रही है यूरोप की रक्षा नीति
जर्मनी की इस घोषणा से पहले इटली, ऑस्ट्रिया और बेल्जियम ने दूसरे यूरोपीय देशों की तरह रूसी विमानों के लिए अपनी वायुसीमा को बंद करने की घोषणा की. उधर इस्राएल ने कहा कि वह 100 टन मानवीय सहायता यूक्रेन भेज रहा है. इसमें मेडिकल उपकरण, दवाइयां, टेंट, स्लीपिंग बैग, और कंबल हैं. यह सामान आम लोगों की मदद के लिए भेजा जा रहा है. इस्राएल के प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से फोन पर बात भी की है.
इधर यूरोपीय संघ के गृह मंत्रियों और विदेश मंत्रियों की रविवार को आपातकालीन बैठक हो रही है जिसमें संकट पर चर्चा होगी. गृह मंत्री इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि शरणार्थियों की भारी संख्या से कैसे निपटा जाए साथ ही यूरोपीय संघ की सीमाओं की सुरक्षा पर बातचीत की जा रही है.
यूरोपीय संघ के विदेश नीति प्रमुख जोसेप बोरेल ने कहा है कि वह मंत्रियों से आग्रह करेंगे कि वो "यूक्रेनी सेना की मदद के लिए आपातकालीन पैकेज पर सहमति बनाएं जिससे कि इस युद्ध में उन्हें सहायता दी जा सके."
सेना की ट्रेनिंग और दुनिया भर में शांति अभियानों को समर्थन देने के लिए यूरोपीय संघ ने एक यूरोपीयन पीस फैसिलिटी बनाने की घोषणा की है. यह एक कोष होगा जिसमें करीब 5.7 अरब यूरो की रकम होगी. इसमें से कुछ पैसा सहयोगी देशों को प्रशिक्षण और उन्हें घातक हथियार देने के लिए भी होगी.
जर्मनी ने एक दिन पहले अपनी नीति में बड़ा बदलाव करते हुए यूक्रेन को हथियार और दूसरी चीजों की सीधी सप्लाई देने का फैसला किया है. इनमें 500 स्टिंगर मिसाइल भी हैं जिनका इस्तेमाल हेलीकॉप्टर, लड़ाकू विमान को मार गिराने के लिए हो सकता है इसके साथ ही यूक्रेन को 1000 टैंक रोधी हथियार भी दिए जाएंगे. यूरोपीय संघ के पैसे से यूक्रेन को हथियार देना एक ऐतिहासिक फैसला है.
एनआर/एडी(एपी, एएफपी, रॉयटर्स)
कोस्टा रिका के एक हाइड्रोपावर प्लांट को ग्रीन क्रिप्टो-माइनिंग ऑपरेशन में बदल दिया गया है, लेकिन सवाल यह है कि बहुत ज्यादा ऊर्जा की जरूरत वाली बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी कभी भी जलवायु लक्ष्यों के अनुकूल हो सकती है?
डॉयचे वैले पर सेबास्टियन रोड्रिग्वेज की रिपोर्ट-
2020 के अंत में, 30 वर्षों के संचालन के बाद एडुआर्डो कोपर को कोस्टा रिका के सेंट्रल वैली में अपने हाइड्रोपावर प्लांट पोअस आई के टरबाइनों को बंद करना पडा. देश की सरकारी बिजली कंपनी ‘कोस्टा रिका इंस्टीट्यूट ऑफ इलेक्ट्रिसिटी' ने कोपर के हाइड्रोपावर प्लांट से पैदा होने वाली बिजली को बेचने से मना कर दिया, क्योंकि देश में अक्षय ऊर्जा का उत्पादन पहले से काफी ज्यादा हो गया है.
कोपर ने कहा, "इस मामले में हम कुछ नहीं कर सके. यह एक चिंताजनक स्थिति थी. हम कम से कम अपने कर्मचारियों को काम पर बनाए रखने की कोशिश कर रहे थे.” तभी उन्हें बिटकॉइन के बारे में पता चला. बिटकॉइन एनर्जी कंजम्पशन इंडेक्स के अनुसार, क्रिप्टोकरेंसी ऊर्जा की बहुत बड़ी उपभोक्ता है.
बिटकॉइन माइनिंग के लिए अपने संयंत्र का इस्तेमाल करके, कोपर ने अपनी ग्रीन-एनर्जी को सीधे मुद्रा में बदलने की कोशिश की. तीन महीने तक संयंत्र बंद रहने के बाद, अप्रैल 2021 में पोअस आई का टरबाइन फिर से घूमने लगा. इसका इस्तेमाल क्रिप्टोकरेंसी की माइनिंग के लिए किया जाने लगा.
कोपर ऐसे अकेले उदाहरण नहीं हैं. पूरे अमेरिका में, क्रिप्टोकरेंसी की माइनिंग करने वाले ‘ग्रीन बिटकॉइन' का लाभ ले रहे हैं. बड़ी अमेरिकी क्रिप्टो माइनिंग कंपनियां, जैसे कि बिटफार्म्स और नेप्च्यून डिजिटल एसेट्स अब अपनी करेंसी को ‘ग्रीन' बताकर मार्केटिंग कर रही हैं. इस बीच, ब्राजील के सांसद अक्षय ऊर्जा से होने वाली क्रिप्टो माइनिंग पर टैक्स में छूट देने के लिए बहस कर रहे हैं.
कीमती ऊर्जा की बर्बादी?
बिटकॉइन ब्लॉकचेन तकनीक पर काम करती है, जिसमें काफी ज्यादा ऊर्जा की खपत होती है. बिटकॉइन माइनिंग का मतलब पजल को सॉल्व करके नई बिटकॉइन बनाना है. इसे ‘प्रूफ ऑफ वर्क' भी कहा जाता है. इसमें काफी ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होती है.
ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने और पर्यावरण पर इसके प्रभाव को लेकर, 200 से अधिक कंपनियों और लोगों ने पिछले साल क्रिप्टो क्लाइमेट अकॉर्ड लॉन्च किया था. इसका मुख्य लक्ष्य यह था कि बिटकॉइन की माइनिंग के लिए, 2030 तक पूरी तरह से अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाए.
हालांकि, क्रिप्टोकरेंसी की माइनिंग के लिए ग्रीन-एनर्जी के इस्तेमाल को हर कोई फायदेमंद समाधान के रूप में नहीं देखता है. अर्थशास्त्री और बिटकॉइन विशेषज्ञ एलेक्स डी व्रीस ने कहा कि ग्रीन एनर्जी का इस्तेमाल ‘रैंडम कंप्यूटेशन' की जगह उन क्षेत्रों में करना चाहिए जिनसे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था बेहतर हो सके. साथ ही, रोजगार और दूसरे आर्थिक लाभ मिल सके.
दरअसल, हाल के समय में क्रिप्टोकरेंसी की माइनिंग में अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ा है, क्योंकि यह ऊर्जा का सबसे सस्ता स्रोत है. क्रिप्टोकरेंसी विश्लेषण फर्म कॉइनशेयर के एक अध्ययन में यह अनुमान लगाया गया है कि 2019 में पूरी दुनिया में बिटकॉइन की माइनिंग के लिए जितनी ऊर्जा की खपत की गई है उनमें से कम से कम 74 फीसदी ऊर्जा अक्षय स्रोत से आई है. इनमें इस्तेमाल की गई ज्यादातर ऊर्जा चीन के हाइड्रोपावर प्लांट की थी.
हालांकि, 2021 में चीनी सरकार ने काफी ज्यादा ऊर्जा खर्च होने की वजह से क्रिप्टोकरेंसी से जुड़ी सभी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया. इस बीच, स्वीडन ने यूरोपीय संघ से क्रिप्टो की माइनिंग पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है. स्वीडन ने तर्क दिया है कि इसमें उस अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल होता है जिसकी मदद से कई क्षेत्रों को डीकार्बोनाइज किया जा सकता है. ऐसे में क्रिप्टो के लिए अक्षय ऊर्जा के ज्यादा इस्तेमाल से जलवायु लक्ष्य खतरे में पड़ सकते हैं.
अपवाद है कोस्टा रिका
अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में ऊर्जा के क्षेत्र में शोध करने वाले जोस डैनियल लारा कोस्टा रिका के रहने वाले हैं. वह मानते हैं कि देश में ऊर्जा का उत्पादन खपत से ज्यादा है. इस वजह से ग्रीन क्रिप्टोकरेंसी की माइनिंग के पक्ष में तर्क दिए जा सकते हैं. आदर्श स्थिति यह है कि कोस्टा रिका को अपनी बची हुई ऊर्जा निर्यात करनी चाहिए, लेकिन फिलहाल यह संभव नहीं है. उदाहरण के लिए, पड़ोसी देश निकारागुआ में ऊर्जा की किल्लत है. यहां कोस्टा रिका अपनी ऊर्जा का निर्यात कर सकता है, लेकिन निकारागुआ के पास इसे आयात करने के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा नहीं है.
बिटकॉइन माइनिंग की वजह से कोपर ने एक मेगावाट की क्षमता वाले अपने दो हाइड्रोपावर प्लांट को फिर से चालू कर दिया है. साथ ही, बिजली को किसी ऐसी चीज में बदलने की अनुमति दी है जिसे फिजिकल पावर ग्रिड की जरूरत के बिना निर्यात किया जा सकता है. उन्होंने कहा, "यहां हमें ऊर्जा को डिजिटल टोकन में बदलने का मौका मिला.”
उन्होंने सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट के लिए कंटेनर जैसा स्टोरेज रूम स्थापित किया है. इसे इस तरह बनाया गया कि यहां ना तो नमी का असर होता है और ना ही गर्मी का. अब विदेशों में माइनिंग करने वाली कंपनियों को सीपीयू रखने के लिए इसे किराए पर दिया जा रहा है. साथ ही, वह खुद भी बिटकॉइन की माइनिंग कर रहे हैं. इसका फायदा यह हुआ कि उन्हें अपने 25 कर्मचारियों को नौकरी से नहीं निकालना पड़ा. अब वे आने वाले महीनों में तीसरे प्लांट को भी फिर से चालू करने की योजना बना रहे हैं.
पोअस आई क्रिप्टो माइनिंग सेंटर कोस्टा रिका में अपनी तरह का पहला माइनिंग सेंटर है, लेकिन कोपर चाहते हैं कि देश में ऊर्जा के क्षेत्र से जुड़े दूसरे कारोबारी भी इस कारोबार में शामिल हों. कई अन्य कंपनियों का भी दावा है कि क्रिप्टो माइनिंग से अक्षय ऊर्जा के उत्पादन से जुड़ी चुनौतियों को दूर करने में मदद मिल सकती है.
ग्रिड का संतुलन बनाए रखने के लिए क्रिप्टो माइनिंग
टेक्सास में, टेक्नोलॉजी के क्षेत्र की कंपनी लैंसियम अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल से चलने वाली बिटकॉइन माइनिंग सेंटर का निर्माण कर रही है. हालांकि, इसे पारंपरिक रूप से तैयार होने वाली बिजली की बचत बताने की जगह दूसरे तौर पर प्रचारित किया जा रहा है. कहा जा रहा है कि यहां बिटकॉइन की माइनिंग के जरिए ग्रिड का संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी.
अक्षय ऊर्जा की वजह से कई तरह की समस्याएं भी होती हैं. उदाहरण के लिए, टेक्सस में मौसम में उतार-चढ़ाव की वजह से विंड फॉर्म से कभी ज्यादा ऊर्जा का उत्पादन होता है, तो कभी कम. ऐसे में ऊर्जा की ज्यादा आपूर्ति से ग्रिड पर असर पड़ता है, यहां तक कि कभी-कभी ब्लैकआउट भी हो सकता है. यही वजह है कि नवीकरणीय ऊर्जा के दबाव को संतुलित करने के लिए जीवाश्म ईंधन वाले बिजली स्टेशन का इस्तेमाल किया जाता है.
लैंसियम का कहना है कि हमारा मॉडल बिटकॉइन माइनिंग की जगह ग्रिड के संतुलन को बनाए रखने पर जोर देता है. वहीं, लारा कहते हैं कि लैंसियम जैसी परियोजनाएं वाकई में अक्षय ऊर्जा का विस्तार कर सकती हैं और जीवाश्म ईंधन की जरूरत को कम कर सकती हैं.
जीवाश्म ईंधन वाली अर्थव्यवस्थाओं की ओर पलायन
हालांकि, डी व्रीस का कहना है कि ग्रीन क्रिप्टोकरेंसी का ज्यादा असर कार्बन फुटप्रिंट पर नहीं पड़ रहा है. चीन में क्रिप्टो से जुड़ी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगने के बाद, माइनिंग करने वाले ज्यादातर लोग और कंपनियां जीवाश्म ईंधन से समृद्ध देश कजाखस्तान और अमेरिका जैसे देशों में चले गए.
अगस्त 2020 में, दुनिया भर में कुल बिटकॉइन के 5 फीसदी हिस्से की माइनिंग अमेरिका में हुई. कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के आंकड़ों के अनुसार, एक साल बाद यह आंकड़ा बढ़कर 35 फीसदी तक पहुंच गया. टेक्सास खुद को क्रिप्टो कैपिटल के तौर पर विकसित कर रहा है. हालांकि, लैंसियम जैसी परियोजनाओं के बावजूद, राज्य की अधिकांश बिजली की आपूर्ति अभी भी कोयले और गैस से होती है.
ऊर्जा की कम लागत वाला क्रिप्टो मॉडल
कोपर जोर देकर कहते हैं कि पूरी दुनिया नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है. इसी के साथ ग्रीन-माइनिंग से बिटकॉइन के कार्बन फुटप्रिंट को खत्म करने में मदद मिल सकती है. उन्होंने कहा, "हम डर्टी बिटकॉइन को क्लीन बिटकॉइन से अलग करने का प्रयास कर रहे हैं. उपभोक्ताओं को इसे पहचानने में कुछ समय लग सकता है, लेकिन यह समय की जरूरत है.”
वहीं, डी व्रीस का मानना है कि क्रिप्टोकरेंसी को अधिक ऊर्जा-कुशल बनाना एक बेहतर समाधान होगा. कार्डानो और बीनेंस जैसे ब्लॉकचेन प्लैटफॉर्म पहले से ही अलग मॉडल का इस्तेमाल कर रहे हैं जिसे ‘प्रूफ ऑफ स्टेक' कहा जाता है. इसकी मदद से, माइनिंग करने वाले नए पजल को हल करने की जगह लेनदेन के लिए अपने पुराने कॉइन का ही इस्तेमाल करते हैं. इससे नए बिटकॉइन के निर्माण में खपत होने वाली ऊर्जा की बचत होती है.
डी व्रीस कहते हैं, "अगर आप प्रूफ ऑफ स्टेक का इस्तेमाल करते हैं, तो आपको ज्यादा हार्डवेयर की जरूरत नहीं होती है. आपके पास सिर्फ इंटरनेट से कनेक्ट किया हुआ डिवाइस होना चाहिए.”
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी क्रिप्टोकरेंसी इथेरियम भी इस साल से प्रूफ ऑफ स्टेक पर स्विच करने की योजना बना रही है. डी व्रीस का कहना है कि यह एक नई तकनीक है, लेकिन अगर यह काम इथेरियम करती है, तो दूसरे क्रिप्टोकरेंसी भी इस रास्ते पर आगे बढ़ सकती है. (dw.com)
यूक्रेन पर रूसी सेना के हमले लगातार जारी हैं लेकिन अपुष्ट खबरों में हमलावर सेना को भी भारी नुकसान होने की बात कही जा रही है. रूसी राष्ट्रपति ने परमाणु हथियारों को हमले के लिए तैयार रहने का भी हुक्म दिया है.
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूसी परमाणु हथियारों को लॉन्च के लिए तैयार रहने को कहा है. पुतिन ने इसके लिए अमेरिका और पश्चिमी देशों को जिम्मेदार बताया है. उनका कहना है कि नाटो शक्तियों ने रूस के खिलाफ कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने के साथ ही रूसी बैंकों को स्विफ्ट भुगतान तंत्र से बाहर कर दिया और "आक्रामक बयान" दे रहे हैं. पुतिन ने रक्षा मंत्री और सेना प्रमुख को परमाणु प्रतिरक्षा हथियारों को "युद्धक अभियान की विशेष स्थिति" में रखने का हुक्म दिया. अमेरिका ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए रूस पर युद्ध को फैलाने का आरोप लगाया है.
रूस और यूक्रेन एक प्रतिनिधिमंडल के जरिए आपस में बातचीत के लिए तैयार हो गए हैं. यह बातचीत बेलारूस और यूक्रेन की सीमा पर होगी.
इस बीच रूसी सेना यूक्रेन के दूसरे सबसे बड़े शहर में भी घुस गई है. रूसी सेना ने यूक्रेन के तेल और गैस ठिकानों को निशाना बनाया है. रविवार सुबह भी कई जगहों पर भारी धमाकों की आवाज के साथ आग की लपटें और धुएं का बादल उठता नजर आया. यूक्रेन की सेना ने रूसी सैनिकों को राजधानी कीव में आगे बढ़ने से रोक रखा है. इस बीच रूसी सेना यूक्रेन के दूसरे सबसे बड़े शहर खारकीव में घुस गई है.
पूरी रात चलता रहा हमला
रूसी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने रविवार को कहा कि बीती रात बहुत भयानक थी. रूसी गोलाबारी का निशाना नागरिक ठिकानों को बनाया गया. इनमें एक एंबुलेंस भी शामिल है. अब तक इस लड़ाई में कितने लोगों की जान गई है, इसका ठीक ठीक आंकड़ा नहीं मिल सका है. संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी ने 64 लोगों की जान जाने की बात कही, जबकि यूक्रेन का दावा है कि 3,500 रूसी सैनिक हताहत हुए हैं.
यूक्रेन के राष्ट्रपति के सलाहकार ने कहा है कि करीब 3500 रूसी सैनिक या तो घायल हुए हैं या मारे गए हैं. पश्चिमी देशों के अधिकारी खुफिया जानकारी के आधार पर बता रहे हैं कि रूसी सेना को उम्मीद से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है.
रूस ने आधिकारिक रूप से इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी है. स्वतंत्र रूप से भी मौत के आंकड़ों की पुष्टि नहीं हो सकी है.
रूस के मिसाइलों का हमला पूरी रात चलता रहा है. इसमें एक हमला वासिलकिव में एक तेल ठिकाने पर हुआ जो कीव के दक्षिणपश्चिम में है. यहां धमाके के बाद आग की भारी लपटें निकलने लगीं पूरा आसमान काले धुएं से भर गया. वासिलकीव की मेयर नतालिया बालासिनोविच का कहना है, "दुश्मन हर चीज को खत्म कर देना चाहता है."
यूुक्रेन के अधिकारियों ने लोगों को उनके घरों में और सुरक्षित ठिकानों पर रहने के लिए कहा है. कीव में सोमवार तक के लिए कर्फ्यू लगा दिया गया है.
उत्तर पूर्वी इलाके में मौजूद खारकीव में भारी लड़ाई चल रही है. यहां रूसी सैनिकों ने प्राकृतिक गैस की एक पाइपलाइन को उड़ा दिया है. धमाके ने आकाश को गहरे धुएं से ढंक दिया. हालांकि यूक्रेन के गैस पाइपलाइन ऑपरेटर का कहना है कि यूक्रेन से हो कर यूरोप जाने वाली रूसी गैस की सप्लाई सामान्य रूप से चालू है.
यूक्रेन के गृह मंत्रालय ने टेलिग्राम पर तस्वीरें डाली है जिनमें बहुत से सैन्य गाड़ियों को खारकीव की सड़कों पर देखा जा सकता है. एक जलते हुए टैंक की तस्वीर भी अलग से डाली गई है.
कीव में रह रह कर गोलियों और धमाकों की आवाज पूरी रात गूंजती रही. सुबह 9 बजे के करीब हवाई हमले का सायरन बजने के बाद तीन बड़े धमाकों की आवाज भी सुनाई दी है.
दृढ़ता से डटे हैं जेलेंस्की
यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की काफी दृढ़ता के साथ डटे हुए हैं. उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश डाला है जो कीव की सड़कों पर रिकॉर्ड किया गया है. संदेश में जेलेंस्की ने कहा है "हम दुश्मन के हमले के सामने डटे हुए हैं और उन्हें रोकने में सफल हुए हैं." एक अमेरिकी सैन्य अधिकारी का कहना है कि यूक्रेन के सैनिक रूस को हवा, जमीन और सागर में कड़ी टक्कर दे रहे हैं.
रूस ने बातचीत करने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल बेलारूस भेजा है जिसमें सेना के अफसर और राजनयिक हैं. इससे पहले यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने बेलारूस में बात करने से मना कर दिया था. इसके पहले रूस ने कहा कि एक रूसी प्रतिनिधिमंडल बेलारूस चला गया है और बातचीत की प्रतीक्षा कर रहा है. बातचीत के समय और जगह की जानकारी फिलहाल नहीं दी गई है. जेलेंस्की ने वारसॉ, ब्रातिस्लावा, बाकू, बुडापेस्ट या फिर इस्तांबुल में बातचीत करने का प्रस्ताव दिया था. इस बीच इस्राएल के प्रधानमंत्री ने रूसी राष्ट्रपति से फोन पर बातचीत में दोनों देशों के बीच मध्यस्थ बनने की पेशकश की है.
यूक्रेन को मदद
यूक्रेन को रूस के हमले का जवाब देने में दुनिया के कई देशों की मदद मिल रही है. हंगरी, पुर्तगाल, फ्रांस, ब्रिटेन समेत कई देश उसकी मदद के लिए आगे आए हैं. अब तक हथियार देने से इनकार करता रहा जर्मनी भी अब इसमें शामिल हो गया है. जर्मनी ने यूक्रेन शनिवार की शाम यूक्रेन को हथियार देने पर लगी रोक हटाने का फैसला किया है. हालांकि यूक्रेन का कहना है कि यह फैसला देर से लिया गया है. इस वक्त समस्या यह है कि ये हथियार वहां पहुंचे कैसे? जर्मनी ने कहा है कि वह जल्दी ही टैंकरोधी हथियार और मिसाइलें यूक्रेन भेजेगा.
अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने कहा है कि उसने यूक्रेन को और अधिक हथियार देने की मंजूरी दे रहे हैं ताकि वह रूस के हमले से अपना बचाव कर सके. अमेरिका ने यूक्रेन को 35 करोड़ डॉलर की सैन्य सहायता देने का फैसला किया है. इनमें टैंक रोधी हथियार, कवच और छोटे हथियार शामिल हैं. इटली ने यूक्रेन को 11 करोड़ यूरो की तत्काल मदद देने का एलान किया है.
रूस पर प्रतिबंधों का आना जारी
शनिवार को इन देशों ने कुछ रूसी बैंकों के स्विफ्ट भुगतान तंत्र का इस्तेमाल करने पर रोक लगाने का फैसला किया. ऐसे में रूस और उसकी कंपनियों के लिए व्यापार मुश्किल हो जाएगा. इन देशों का कहना है कि वे रूसी सेंट्रल बैंक पर भी इस तरह की पाबंदियां लगाएंगे कि रूसी मुद्रा रूबल की मदद करना मुश्किल हो जाएगा.
इन देशों ने उन बैंकों का नाम नहीं लिया जिन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा लेकिन यूरोपीय संघ के एक अधिकारी का कहना है कि 70 फीसदी रूसी बैंकिंग बाजार पर इसका असर होगा. पश्चिमी देश पहले स्विफ्ट का इस्तेमाल करने से बच रहे थे क्योंकि इसका असर उनकी अपनी अर्थव्यवस्था पर भी होगा. रूस के सेंट्रल बैंक पर पाबंदी से पुतिन के लिए विदेशी मुद्रा के भंडार का इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाएगा. रूस के पास करीब 640 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है और प्रतिबंधों का सामना करने में पुतिन के लिए इसे बड़ी मदद समझा जा रहा है.
इस बीच गूगल ने रूस के सरकारी टीवी चैनल आरटी और दूसरे चैनलों को उनके वेबसाइट से होने वाली कमाई रोक दी है. इसमें वेबसाइट, ऐप और यूट्यूब के वीडियो शामिल हैं. इसी तरह के कदम फेसबुक ने भी उठाए हैं.
रूसी विमानों के लिए रास्ता बंद
जर्मनी ने अपनी वायुसीमा से रूसी विमानों के गुजरने पर रोक लगा दी है. जर्मनी के अलावा अमेरिका, बेल्जियम, नीदरलैंड, इटली ने भी रूसी विमानों के लिए अपना एयरस्पेस बंद करने का फैसला किया है. इनके अलावा नॉर्डिक देशों में फिनलैंड, स्वीडन और डेनमार्क ने भी कहा है को अपनी वायुसीमा को रूसी विमानों के लिए बंद करने की तैयारी कर रहे हैं. पुर्तगाल, स्पेन, इटली, फ्रांस कनाडा और उत्तरी मैसेडोनिया ने भी रूसी विमानों के लिए वायुसीमा बंद करने का एलान कर दिया है.
इन देशों की कतार में ब्रिटेन, बुल्गारिया, पोलैंड, चेक, रोमानिया भी शामिल हो रहे हैं. बाल्टिक देशों में लिथुआनिया, लातविया और एस्तोनिया भी रूसी विमानों के लिए अपनी वायुसीमा बंद कर रहे हैं. आइसलैंड भी इन देशों में शामिल हो गया है. रूस ने भी इनमें से ज्यादातर देशों के लिए अपनी वायुसीमा बंद कर दी है.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आज एक और बैठक हो रही है जिसमें यूक्रेन के खिलाफ युद्ध रोकने के लिए प्रस्ताव को आम सभा में भेजने के बारे में चर्चा की जाएगी. इससे पहले इस प्रस्ताव को सुरक्षा परिषद में रूस ने वीटो कर दिया था.
यूरोपीय संघ, फ्रांस, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका के नेताओं ने शनिवार को एक संयुक्त बयान जारी कर कहा है, "हम रूस को इसके लिए जिम्मेदार ठहराएंगे और सामूहिक रूप से यह सुनिश्चित करेंगे कि यह जंग पुतिन के लिए एक रणनीतिक हार बने."
विकसित देशों के संगठन जी7 के नेता रविवार शाम एक ऑनलाइन बैठक करेंगे जिसमें रूस के खिलाफ आगे की रणनीति पर चर्चा की जाएगी.
शरणार्थी संकट
संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी ने रविवार को बताया कि रूस के हमले के बाद अब तक 368,000 लोग यूक्रेन से बाहर गए हैं. यह संख्या लगातार बढ़ रही है. इनमें से सबसे ज्यादा यानी करीब 156,000 लोग पोलैंड गए हैं. पोलैंड के बॉर्डर गार्ड का कहना है कि केवल शनिवार को ही करीब 77,300 लोगों ने सीमा पार की है.
इसके अलावा रोमेनिया, हंगरी, मोल्दोवा, स्लोवाकिया में भी लोग बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं. लाखों की संख्या में लोग यूक्रेन के भीतर भी विस्थापित हुए हैं. कोई पैदल, कोई कार में तो कोई किसी और जरिए जैसे भी संभव है यूक्रेन से निकलने की कोशिश कर रहा है. देश के बाहर जाने वालों में ज्यादातर महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और विदेशी हैं. इन्हें नहीं पता कि सीमा पार करने के बाद भी कहां जाएं. स्थानीय लोग और कुछ स्वयंसेवक इनके लिए खाना और दूसरी मदद का इंतजाम कर रहे हैं.
एनआर/एडी (एपी, रॉयटर्स, एएफपी,डीपीए)
विक्टोरिया गिल
यूक्रेन पर हमले के बाद रूसी सैनिकों ने चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र पर क़ब्ज़ा जमा लिया है. इसके बाद से यहां से होने वाले रेडिएशन में बढ़त दर्ज की गई है.
यूक्रेन सरकार ने बीते गुरुवार को बताया था कि रूसी सैनिकों ने चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र पर क़ब्ज़ा कर लिया है. ये वो जगह है जहां साल 1986 में भयानक परमाणु त्रासदी हुई थी.
इस क्षेत्र से होने वाले रेडिएशन पर नज़र रखने वाली संस्थाओं ने बीते गुरुवार को बताया है कि यहां पर रेडिएशन बीस गुना तक बढ़ गया है. लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो इस क्षेत्र में एक अन्य परमाणु हादसा होने की आशंकाएं काफ़ी कम हैं.
अचानक कैसे बढ़ा रेडिएशन
यूक्रेन के परमाणु नियामक के मुताबिक़, रेडिएशन (विकिरण) में दर्ज की गई बढ़त की वजह 4000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस परमाणु संयंत्र क्षेत्र में अचानक गाड़ियों की आवाजाही का बढ़ना है.
रेडिएशन में सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी क्षतिग्रस्त परमाणु रिएक्टर के क़रीब दर्ज की गई है.
यहां पर रेडिएशन के स्तर पर लगातार नज़र रखी जाती है. यहां हर घंटे रेडिएशन की मात्रा मापी जाती है.
रिएक्टर के क़रीब सामान्य स्थितियों में प्रति घंटे तीन माइक्रोसिएवर्ट्स रेडिएशन का सामना करना होता है.
लेकिन गुरुवार को यह मात्रा बढ़कर प्रतिघंटे 65 माइक्रोसिएवर्ट्स तक पहुंच गई जो कि उस मात्रा की पाँच गुना है जो एक ट्रांस-अटलांटिक फ़्लाइट में होती है.
शेफ़ील्ड यूनिवर्सिटी से जुड़ी न्यूक्लियर मटीरियल विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर क्लेयर कॉरखिल ने बीबीसी को बताया है कि यह बढ़ोतरी एक जगह पर केंद्रित थी और रिएक्टर क्षेत्र की तरफ़ आने वाली मुख्य सड़कों पर भी बढ़ोतरी देखी गई है.
यूक्रेन पर हमले के बाद रूसी सैनिकों ने चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र पर क़ब्ज़ा जमा लिया है. इसके बाद से यहां से होने वाले रेडिएशन में बढ़त दर्ज की गई है.
यूक्रेन सरकार ने बीते गुरुवार को बताया था कि रूसी सैनिकों ने चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र पर क़ब्ज़ा कर लिया है. ये वो जगह है जहां साल 1986 में भयानक परमाणु त्रासदी हुई थी.
इस क्षेत्र से होने वाले रेडिएशन पर नज़र रखने वाली संस्थाओं ने बीते गुरुवार को बताया है कि यहां पर रेडिएशन बीस गुना तक बढ़ गया है. लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो इस क्षेत्र में एक अन्य परमाणु हादसा होने की आशंकाएं काफ़ी कम हैं.
अचानक कैसे बढ़ा रेडिएशन
यूक्रेन के परमाणु नियामक के मुताबिक़, रेडिएशन (विकिरण) में दर्ज की गई बढ़त की वजह 4000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस परमाणु संयंत्र क्षेत्र में अचानक गाड़ियों की आवाजाही का बढ़ना है.
रेडिएशन में सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी क्षतिग्रस्त परमाणु रिएक्टर के क़रीब दर्ज की गई है.
रिएक्टर के क़रीब सामान्य स्थितियों में प्रति घंटे तीन माइक्रोसिएवर्ट्स रेडिएशन का सामना करना होता है.
लेकिन गुरुवार को यह मात्रा बढ़कर प्रतिघंटे 65 माइक्रोसिएवर्ट्स तक पहुंच गई जो कि उस मात्रा की पाँच गुना है जो एक ट्रांस-अटलांटिक फ़्लाइट में होती है.
शेफ़ील्ड यूनिवर्सिटी से जुड़ी न्यूक्लियर मटीरियल विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर क्लेयर कॉरखिल ने बीबीसी को बताया है कि यह बढ़ोतरी एक जगह पर केंद्रित थी और रिएक्टर क्षेत्र की तरफ़ आने वाली मुख्य सड़कों पर भी बढ़ोतरी देखी गई है.
प्रोफ़ेसर कॉरखिल कहती हैं कि "चेर्नोबिल ज़ोन में और इसके नज़दीकी क्षेत्रों में वाहन और लोगों की आवाजाही बढ़ने से रेडियोऐक्टिव धूल उड़ी होगी."
उन्होंने ये भी कहा है कि अगर आने वाले दिनों में आवाजाही नहीं होती है तो रेडिएशन लेवल गिरना चाहिए. लेकिन इस क्षेत्र में किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि चिंताजनक है.
यूक्रेन सरकार ने बताया है कि रूसी सैन्य टुकड़ियों ने यूक्रेन की सैन्य टुकड़ियों के साथ भीषण संघर्ष के बाद राजधानी कीएव से लगभग 130 किलोमीटर उत्तर की दिशा में स्थित चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र पर क़ब्ज़ा कर लिया है.
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोल्दोमिर ज़ेलेंस्की ने कहा है कि यूक्रेन के सैनिकों ने इसे बचाने के लिए संघर्ष किया ताकि "साल 1986 की त्रासदी की पुनरावृत्ति न हो."
उन्होंने चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र पर हमले को "पूरे यूरोप के ख़िलाफ़ युद्ध के एलान की संज्ञा दी."
इस परमाणु संयंत्र पर कई न्यूक्लियर वेस्ट कंटेनमेंट फ़ैसिलिटीज़ हैं जिनमें वह विशाल गुंबद शामिल है जिसे 'न्यू सेफ़ कन्फ़ाइनमेंट' नाम दिया गया है.
इस गुंबद के अंदर ही चार नंबर रिएक्टर है जिसके फटने की वजह से 1986 में भयानक परमाणु हादसा हुआ था.
प्रोफ़ेसर कॉरखिल ने कहा, "ये इमारतें रेडियोऐक्टिव पदार्थों को अपने अंदर बनाए रखने के लिए बनाई गी थीं. लेकिन इनमें किसी तरह का कवच नहीं लगा है और यह युद्ध क्षेत्र के लिए नहीं बनाई गई थीं."
साल 1986 से लेकर अब तक इस परमाणु संयंत्र की रेडियोऐक्टविटी में कमी आई है.
प्रोफ़ेसर कॉरखिल कहती हैं, "उस घटना में रेडियोऐक्टिव पदार्थों का रिसाव एक अग्निकांड की वजह से हुआ था."
लेकिन वह इस बात पर ज़ोर देती हं कि उस परमाणु दुर्घटना की पुनरावृत्ति होने की आशंकाएं काफ़ी कम हैं.
लेकिन इससे भी ज़्यादा चिंताजनक बात यूक्रेन के अन्य सक्रिय संयत्रों के पास संघर्ष शुरू होना होगी.
परमाणु नीति विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर जेम्स एक्टन ने लिखा है, "चेर्नोबिल एक ऐसे बड़े क्षेत्र में स्थित है जो कि एक रिहाइशी इलाका नहीं है. यूक्रेन के अन्य रिऐक्टर इस तरह के अलग-थलग इलाकों में नहीं हैं."
इसके साथ ही वह कहते हैं कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र युद्ध क्षेत्रों को ध्यान में रखकर नहीं बनाए जाते हैं.
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने कहा है कि यूक्रेन ने सूचना दी है कि सभी परमाणु ऊर्जा रिऐक्टर सुरक्षित ढंग से चल रहे हैं.
प्रोफ़ेसर कॉरखिल कहती हैं कि "चेर्नोबिल ज़ोन में और इसके नज़दीकी क्षेत्रों में वाहन और लोगों की आवाजाही बढ़ने से रेडियोऐक्टिव धूल उड़ी होगी."
उन्होंने ये भी कहा है कि अगर आने वाले दिनों में आवाजाही नहीं होती है तो रेडिएशन लेवल गिरना चाहिए. लेकिन इस क्षेत्र में किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि चिंताजनक है.
यूक्रेन सरकार ने बताया है कि रूसी सैन्य टुकड़ियों ने यूक्रेन की सैन्य टुकड़ियों के साथ भीषण संघर्ष के बाद राजधानी कीएव से लगभग 130 किलोमीटर उत्तर की दिशा में स्थित चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र पर क़ब्ज़ा कर लिया है.
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोल्दोमिर ज़ेलेंस्की ने कहा है कि यूक्रेन के सैनिकों ने इसे बचाने के लिए संघर्ष किया ताकि "साल 1986 की त्रासदी की पुनरावृत्ति न हो."
उन्होंने चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र पर हमले को "पूरे यूरोप के ख़िलाफ़ युद्ध के एलान की संज्ञा दी."
इस परमाणु संयंत्र पर कई न्यूक्लियर वेस्ट कंटेनमेंट फ़ैसिलिटीज़ हैं जिनमें वह विशाल गुंबद शामिल है जिसे 'न्यू सेफ़ कन्फ़ाइनमेंट' नाम दिया गया है.
इस गुंबद के अंदर ही चार नंबर रिएक्टर है जिसके फटने की वजह से 1986 में भयानक परमाणु हादसा हुआ था.
प्रोफ़ेसर कॉरखिल ने कहा, "ये इमारतें रेडियोऐक्टिव पदार्थों को अपने अंदर बनाए रखने के लिए बनाई गी थीं. लेकिन इनमें किसी तरह का कवच नहीं लगा है और यह युद्ध क्षेत्र के लिए नहीं बनाई गई थीं."
साल 1986 से लेकर अब तक इस परमाणु संयंत्र की रेडियोऐक्टविटी में कमी आई है.
प्रोफ़ेसर कॉरखिल कहती हैं, "उस घटना में रेडियोऐक्टिव पदार्थों का रिसाव एक अग्निकांड की वजह से हुआ था."
लेकिन वह इस बात पर ज़ोर देती हं कि उस परमाणु दुर्घटना की पुनरावृत्ति होने की आशंकाएं काफ़ी कम हैं.
लेकिन इससे भी ज़्यादा चिंताजनक बात यूक्रेन के अन्य सक्रिय संयत्रों के पास संघर्ष शुरू होना होगी.
परमाणु नीति विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर जेम्स एक्टन ने लिखा है, "चेर्नोबिल एक ऐसे बड़े क्षेत्र में स्थित है जो कि एक रिहाइशी इलाका नहीं है. यूक्रेन के अन्य रिऐक्टर इस तरह के अलग-थलग इलाकों में नहीं हैं."
इसके साथ ही वह कहते हैं कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र युद्ध क्षेत्रों को ध्यान में रखकर नहीं बनाए जाते हैं.
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने कहा है कि यूक्रेन ने सूचना दी है कि सभी परमाणु ऊर्जा रिऐक्टर सुरक्षित ढंग से चल रहे हैं. (bbc.com)
रूस के हमले के बाद से लाखों लोग यूक्रेन छोड़कर चले गए हैं. सैकड़ों की संख्या में लोग सीमाओं पर डटे हैं, जिससे दूसरे देश में जा सकें.
बीते तीन दिनों में यानी जब से रूस ने यूक्रेन ने रूस पर हमला किया है तब से अभी तक क़रीब एक लाख 15 हज़ार से अधिक लोग बॉर्डर पार करके पोलैंड जा चुके हैं.
भागने वालों में महिलाएं और बच्चे
कुछ लोग दो दिनों से लगातार चले जा रहे हैं. पड़ोसी देशों से लगी सीमाओं से 10-10 किलोमीटर दूर तक लोगों की कतार हैं. तमाम लोग यूक्रेन के मौजूदा हालात से बचकर निकल जाना चाहते हैं.
वहीं रूस मिसाइल बरसा रहा है. अमेरिका में यूक्रेन की राजदूत ने रूस पर आरोप लगाते हुए कहा है, 'रूस आम नागरिकों को निशाना बना रहा है.' अब परमाणु हमले का ख़तरा भी है.
इसकी एक बड़ी वजह यह है कि यूक्रेन में 18 साल से 60 साल के पुरुषों को कहा गया है कि वे 'देश छोड़कर ना जाएं और देश के लिए लड़ें.'
यूक्रेन : रूस को क्या उम्मीद के मुताबिक मिल रही है कामयाबी?
बीबीसी के अलग-अलग संवाददाताओं ने यूक्रेन की अलग-अलग सीमाओं पर सुरक्षित बच निकलने की लिए ख़्वाहिश लिए खड़े बहुत से लोगों से बात की.
लूसी विलियम्सन, पालांका, मोल्दोवा
मोल्दोवा की सीमा से खड़े होकर यूक्रेन को देखने पर लगता है कि यह सिर्फ़ औरतों का ही देश है. मांओं का देश. दादी-नानी का देश. जहां अलग-अलग रंग के सूटकेस लिए सैकड़ों औरतें खड़ी हैं और अपने बच्चों को लेकर उस दिशा में बढ़ी जा रही हैं, जिनके बारे में ख़ुद उन्हें भी नहीं पता.
एना को पलांका क्रॉसिंग प्वाइंट तक पहुंचने में 24 घंटे लग गए. उनकी छोटी सी पीले रंग की कार उस समय कार कम और एक छोटे से घर का स्टोर-रूम लग रही थी. जिसमें ठूंस-ठूंस कर बैग भरे हुए थे, उनकी छह साल की नातिन(बेटी की बेटी) भी इसी कार की पिछली सीट पर थी. हालांकि साथ में कोई बड़ा है, ये भरोसा उसे हिम्मत दिए हुए था, तभी तो वो पिछली सीट पर बैठकर गाने गुनगुना रही थी.
एना और उनकी बेटी दक्षिणी शहर ओडेसा से सीधे यहां पहुंचे थे. लगभग 50 किलोमीटर का सफ़र तय करके.
यह शहर अब रूस के निशाने पर है.
जब हमने एना से बात करना शुरू किय था तो उनके चेहरे पर एक धीरज वाली मुस्कान थी लेकिन बात करते-करते वो ना जाने कहां खो गयी. कुछ शब्दों के बाद ही उनकी आंखें भर गयीं.
उनके लिए यह बताना मुश्किल हो रहा था कि वो सिर्फ़ अपनी बेटी और उसकी बेटी के साथ यहां आयी हैं क्योंकि उनके पति देश को रूस के हमले से बचाने के लिए वहीं रुके हैं.
वह कहती हैं, "मैं उम्मीद करती हूं कि पश्चिमी देश इस भयावह परिस्थिति में हमारी मदद करेंगे क्योंकि जो माहौल है उसमें तो फिलहाल सिर्फ़ हमारा देश ही रूस के गुस्से और आक्रमण से जूझ रहा है."
लेकिन दर्द भरी जगहों पर भी उम्मीद दिख जाती है.
वैसा ही कुछ यहां भी था. एना के चारों ओर बहुत से ऐसे वॉलेंटियर थे जो यूक्रेन से बचकर आ रहे लोगों को मदद कर रहे थे.
यूक्रेन पर रूस के हमले का तीसरा दिन: कैसे क्या हुआ, अब तक जो पता है
यूक्रेन संकट: रूस से लड़ने के लिए अमेरिका अपने सैनिक क्यों नहीं भेज रहा?
लेकिन क्या एक बसी-बसाई ज़िंदगी,परिवार, सपनों को छोड़कर ज़िंदा रहना आसान है?
एना जैसे बहुत से लोग हैं जो अपने सालों-साल के सपने छोड़कर मोल्दोवा आ चुके है. लेकिन इनमें से शायद किसी एक को भी नहीं पता कि जान तो बच गयी लेकिन ज़िंदगी कैसी होगी.
पर ये फ़िक्र सिर्फ़ अपने लिए नहीं है, उस देश के लिए भी है जहां रहते हुए वे खुद को महफ़ूज़ समझते थे लेकिन आज वही देश अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहा है.
कीएव से पूरी रात का सफ़र.
पोलैंड के इस 19वीं शताब्दी के रेलवे स्टेशन की पहचान बीते कुछ दिनों में बदल चुकी है.
अब यह सिर्फ़ एक रेलवे स्टेशन भर नहीं रह गया है. ये स्टेशन उन लोगों के लिए स्वागत द्वार की तरह है, जिन्हें यहां पहुंचकर ज़िंदा बच जाने की उम्मीद है.
कैटराइना लियोन्तिएवा बताती है कि उन्हें यहां तक पहुंचने में कुल 52 घंटे का समय लगा.
उनके साथ उनकी बेटी भी 52 घंटे का सफ़र तय करके खारकीएव से यहां तक पहुंची हैं.
अपने पासपोर्ट को पूरी मज़बूती से पकड़े उन्होंने पोलैंड में प्रवेश किया है. पोलैंड फिलहाल देश नहीं ज़िंदा बच जाने की उम्मीद बन गया है.
जब मैंने उनसे पूछा कि उन्हें यहां पहुंचकर कैसा लग रहा है तो उनके शब्द बाद में सुनायी दिए, आंखों की नमी पहले दिखाई दे गयी.
वह कहती हैं, "मैं अभी कुछ भी समझ नहीं पा रही हूं. कुछ समझ नहीं आ रहा है. लेकिन मैं बस प्रार्थना कर रही हूं कि ये एक छोटा सा ट्रिप हो जो जल्दी से जल्दी ख़त्म हो जाए."
यहीं वेटिंग रूम में हमें इरेन मिलीं, जो अपने दो छोटे बच्चों के साथ यहां तक आ पहुंची हैं. लेकिन पति... पति देश की सुरक्षा के लिए यूक्रेन में ही हैं.
वह कहती हैं, "केवल औरतों और बच्चों को जाने की अनुमति है. मर्द वहीं रहना चाहते हैं. लड़ना चाहते हैं और देश के लिए अपना खून देना चाहते हैं. वे सभी नायक हैं."
लेकिन पति को पीछे, हमले के बीच छोड़कर आना कितना मुश्किल है?
वह कहती हैं, "मैं अंदर से डरी हुई हूं. हम बस भरोसा और उम्मीद कर रहे हैं कि सब ठीक हो जाएगा और हम साथ होंगे. हम बस प्रार्थना कर सकते हैं और वही कर रहे हैं."
वह बतती हैं, "मैं अपनी दो बेटियों के साथ यहां हंगरी आयी हूं. मैं उन्हें यहां हमारे रिश्तेदारों के पास छोड़कर, वापस अपने पति के पास चली जाऊंगी."
क्या आपको लौटने पर डर नहीं?
वह कहती हैं, "सच कहूं, डर तो है. लेकिन मुझे ख़ुद से ज़्यादा मेरी बेटियों के लिए डर है. मैं ये साफ़ देख पा रही हूं कि स्थिति ठीक नहीं है लेकिन मैं अपने देश को भी तो नहीं छोड़ सकती. हमें देशभक्त होना ही होगा." (bbc.com)
130 सालों बाद मौसम का मिजाज गर्म
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
रायपुर, 28 फरवरी। गर्मी के पहले ही महीने मार्च में सूरज तपाने जा रहा है। इस बार मार्च माह में तापमान चरम होने की संभावना है। लगभग 43.3 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक हो सकती है 130साल पहले मार्च माह पहले रिकार्ड स्तर पर दर्ज किया गया था, जिसके इस बार भी बढऩे की संभावना है। वही न्यूनतम तापमान 04 मार्च 1898 में 8.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था।
मौसम विज्ञानी एसपी चंद्रा के अनुसार मार्च का महीना शीत से ग्रीष्म ऋतु का संक्रमण काल का समय होता है। इस माह में तापमान दिन प्रतिदिन बढ़ता हुआ महीने के अंत तक 40.0 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक पहुंच जाता है । इस माह में औसत आर्द्रता लगभग 27 प्रतिशत से 43 प्रतिशत होती है । कभी कभी वातावरण धूमिल सा होता है । इस माह में अधिकतम और न्यूनतम तापमान का अंतर बहुत ज्यादा होता है । न्यूनतम तापमान जो अक्सर 20 डिग्री सेल्सियस के आसपास होता है , वह कभी कभी 10.0 डिग्री सेल्सियस से भी कम हो जाता है । उत्तरी भारत से होकर जानेवाले शीतकालीन विक्षोभों के प्रभाव से कभी - कभी आकाश बादलों से आच्छादित हो जाता है तथा गर्जन एवं वर्षा होने की भी संभावना रहती है कभी - कभी ओलावृष्टि के साथ मेघगर्जना भी होती है । इस माह में गर्जन होने वाले दिनों की औसत संख्या 1.7 है । इस माह में वायु की औसत 7 किमी प्रति घंटा है।
नई दिल्ली, 28 फरवरी | नोएडा प्राधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि सुपरटेक 40 मंजिला ट्विन टावर 22 मई को गिराए जाएंगे। पिछले साल 31 अगस्त के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा में ट्विन टावरों को गिराने का आदेश दिया था। जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ और सूर्यकांत ने कहा कि सभी प्राधिकरण नोएडा प्राधिकरण के हलफनामे में दी गई समयसीमा का सख्ती से पालन करें। नोएडा प्राधिकरण का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता रवींद्र कुमार ने पीठ के समक्ष प्रस्तुत किया कि विध्वंस प्रक्रिया शुरू हो गई है और 22 मई को जुड़वां टावरों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया जाएगा। शीर्ष अदालत को सूचित किया गया था कि 22 अगस्त तक पूरा मलबा हटा दिया जाएगा।
कुमार ने पीठ के समक्ष प्रस्तुत किया कि सभी हितधारकों की एक बैठक 9 फरवरी को हुई थी और सुपरटेक ट्विन टावरों के विध्वंस की समय सीमा तय की गई थी। नोएडा प्राधिकरण ने प्रस्तुत किया कि अन्य प्राधिकरणों से एनओसी के साथ गेल से एनओसी भी प्राप्त हुई है।
7 फरवरी को, शीर्ष अदालत को सूचित किया गया था कि गेल की एनओसी की आवश्यकता थी क्योंकि एक उच्च दबाव वाली भूमिगत प्राकृतिक गैस पाइपलाइन है, जो 15 मीटर की दूरी और 3 मीटर की गहराई से गुजर रही है।
17 जनवरी को, कुमार ने शीर्ष अदालत को सूचित किया था कि टावरों को गिराने के लिए एक विध्वंस एजेंसी, एडिफाइस इंजीनियरिंग को अंतिम रूप दिया गया है।
शीर्ष अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 17 मई को निर्धारित की है। (आईएएनएस)
नई दिल्ली : यूक्रेन-रूस युद्ध में यूक्रेन में फंसे भारतीयों में से 249 लोगों का एक दल आज ऑपरेशन गंगा के तहत पांचवीं फ्लाइट से नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर पहुंचा. इन सभी को रोमानिया के बुखारेस्ट एयरपोर्ट से लाया गया है. वतन लौटे यात्रियों ने यूक्रेन से सुरक्षित निकासी के लिए भारतीय दूतावास के अधिकारियों की प्रशंसा की है.
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बताया है कि ऑपरेशन गंगा के तहत हंगरी के शहर बुडापेस्ट से 240 भारतीयों को लेकर एयर इंडिया की छठी फ्लाइट ने उड़ान भर दी है.
यूक्रेन से दिल्ली पहुंचे एक छात्र ने न्यूज एजेंसी ANI से कहा, "सरकार ने हमारी बहुत मदद की है. भारतीय दूतावास द्वारा हर संभव सहायता प्रदान की गई. सबसे बड़ी समस्या सीमा पार करना है. मुझे उम्मीद है कि सभी भारतीयों को वापस लाया जाएगा. कई और भारतीय अभी भी यूक्रेन में फंसे हुए हैं."
यूक्रेन-रूस संकट के बीच, यूक्रेन में भारतीय दूतावास ने भारतीय नागरिकों को सरकारी अधिकारियों के साथ पूर्व समन्वय के बिना किसी भी सीमा चौकियों पर नहीं जाने की सलाह दी है.
रूस और यूक्रेन के बीच छिड़ी जंग के बीच 15 हजार से ज्यादा भारतीय छात्र यूक्रेन में फंसे हुए हैं. इन्हें स्वदेश लाने के लिए ऑपेरशन गंगा जारी है. इसके तहत अब तक एयर इंडिया की 5 फ्लाइट से 1100 से ज्यादा छात्र-छात्राओं समेत भारतीय नागरिकों को भारत लाया जा चुका है. हालांकि, अभी भी हज़ारों भारतीयों को घर वापसी का इंतज़ार है.
इससे पहले भी रोमानिया से 219 छात्र-छात्राओं को लेकर शनिवार रात जब एयर इंडिया का विमान मुंबई पहुंचा तो छात्रों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. एयरपोर्ट पर केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने छात्रों का स्वागत किया.
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, “हम यूक्रेन से भारतीय नागरिकों की निकासी के मामले में प्रगति कर रहे हैं. हमारी टीमें 24 घंटे काम कर रही हैं. मैं व्यक्तिगत रूप से निगरानी कर रहा हूं.” उन्होंने कहा कि यूक्रेन में फंसे भारतीयों को निकालने के लिए एयर इंडिया रोमानिया के बुखारेस्ट और हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट से उड़ानें संचालित करती रहेंगी.
मालूम हो कि यूक्रेन के हवाई क्षेत्र को 24 फरवरी की सुबह नागरिक विमानों के संचालन के लिए बंद कर दिया गया था. ऐसे में भारतीय नागिरकों को यूक्रेन से वापस लाने के लिए उड़ानें बुखारेस्ट और बुडापेस्ट के रास्ते संचालित की जा रही हैं.
नई दिल्ली, 28 फरवरी | भारतपे के सह-संस्थापक और प्रबंध निदेशक अशनीर ग्रोवर को बड़ा झटका देते हुए सिंगापुर में उनके खिलाफ जांच शुरू करने के लिए फिनटेक प्लेटफॉर्म के खिलाफ दायर की गई मध्यस्थता में उन्हें हार का सामना करना पड़ा है। सूत्रों ने आईएएनएस को बताया कि उनकी मध्यस्थता आपातकालीन मध्यस्थ (ईए) को उनके खिलाफ भारतपे में चल रही शासन समीक्षा को रोकने के लिए मनाने में विफल रही।
आपातकालीन मध्यस्थ ने उनकी अपील के सभी पांच आधारों को खारिज कर दिया है।
ग्रोवर ने सिंगापुर इंटरनेशनल आर्ब्रिटेशन सेंटर (एसआईएसी) में मध्यस्थता याचिका दायर की थी।
अपनी अपील में, ग्रोवर ने दलील दी कि जांच अवैध थी क्योंकि इसने शेयरधारक समझौते और एसोसिएशन के लेखों का उल्लंघन किया था।
भारतपे ने फैसले पर तुरंत कोई टिप्पणी नहीं की।
ग्रोवर के लिए आगे की राह कांटों से भरी है क्योंकि फिनटेक प्लेटफॉर्म में शीर्ष निवेशक अपनी 8.5 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने और कंपनी छोड़ने के लिए उसके द्वारा मांगे गए 4,000 करोड़ रुपये देने के लिए एक इंच भी पीछे नहीं हट रहे हैं।
उनके अनुसार, ग्रोवर का मूल्यांकन जमीन पर नहीं है क्योंकि कंपनी का अनुमान के मुताबिक 6 अरब डॉलर नहीं है।
2.85 अरब डॉलर के मूल्यांकन और मौजूदा डॉलर-रुपये की विनिमय दर पर उनकी हिस्सेदारी करीब 1,824 करोड़ रुपये होगी।
कंपनी में ग्रोवर के भाग्य पर फैसला होना बाकी है, फिनटेक प्लेटफॉर्म भारतपे ने उनकी पत्नी माधुरी जैन ग्रोवर को उनके कार्यकाल के दौरान कथित वित्तीय अनियमितताओं पर बर्खास्त कर दिया, जो कि करोड़ों में चलती हैं।
एक प्रमुख प्रबंधन सलाहकार और जोखिम सलाहकार फर्म, अल्वारेज और मार्सल, अगले सप्ताह किसी समय ग्रोवर के समय के दौरान फर्म में वित्तीय अनियमितताओं में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए तैयार हैं।
ग्लोबल ऑडिट फर्म पीडब्ल्यूसी को भी ग्रोवर के कार्यकाल के दौरान फिनटेक प्लेटफॉर्म के कामकाज की ऑडिटिंग में शामिल किया गया था।
भारतपे के प्लेटफॉर्म पर फिलहाल 8 मिलियन मर्चेंट हैं। (आईएएनएस)
कोरबा, 28 फरवरी। वरिष्ठ भाजपा नेता, रामपुर के विधायक व पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर में अपनी ही पार्टी के अकलतरा से विधायक सौरभ सिंह की सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शिकायत की है।
दरअसल विधायक सौरभ सिंह ने कुवर की अनुशंसा से जिला खनिज न्यास संस्थान में स्वीकृत कार्यों में भ्रष्टाचार और दुरुपयोग का आरोप लगाया था।
कंवर ने कहा कि जांजगीर जिले के विधायक की कोरबा जिले के मामले में की गई शिकायत से वे आहत हैं। इससे मेरे जैसे आदिवासी नेता पर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं व आम जनता में छवि खराब हुई है। कोरबा जिले में खनिज न्यास संस्थान की शासी परिषद की बैठक हुई थी जिसमें अपने रामपुर विधानसभा क्षेत्र के लिए उन्होंने नियमानुसार 10 करोड़ रुपये के सड़क, पानी, स्वास्थ्य आदि के लिए प्रस्ताव दिए थे जो स्वीकृत किए जा रहे हैं।
कंवर ने पत्र में कहा कि सौरभ सिंह कोरबा जिले की शासी परिषद के सदस्य नहीं है और उन्हें यहां डीएमएफ के अंतर्गत स्वीकृत कार्यों की जानकारी भी नहीं है। वे जांजगीर जिले से आते हैं और कोरबा जिले में भ्रष्टाचार की बात कहना दुर्भावना से की गई शिकायत प्रतीत होती है। इस शिकायत से मैं आहत हूं। सौरभ सिंह ने व्यक्तिगत लाभ के लिए शिकायत की है ऐसा प्रतीत होता है।
रायपुर। एक पश्चिमी विक्षोभ का कल प्रदेश में प्रवेश हो रहा है।इसके कारण प्रदेश में 3 मार्च को हल्की बारिश संभव है। वहीं प्रदेश में उत्तरी और दक्षिणी हवा का संगम स्थल होने के कारण प्रदेश में रविवार को सरगुजा और बिलासपुर संभाग में वर्षा होने की संभावना बनी हुई है।
यह स्थिति कल खत्म होने की संभावना है इसलिए प्रदेश में कल 28 फरवरी को प्रदेश में मौसम शुष्क रहने की संभावना है। प्रदेश में न्यूनतम तापमान में उत्तर और मध्य छत्तीसगढ़ में 1 से 2 डिग्री गिरावट होने की संभावना है। दक्षिण छत्तीसगढ़ में न्यूनतम तापमान में विशेष परिवर्तन होने की संभावना नहीं है।
हैदराबाद, 28 फरवरी | राजनीतिक दलों के सलाहकार और रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने पश्चिम बंगाल के बाद अब तेलंगाना में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सत्तारूढ़ पार्टी टीआरएस के लिए रणनीति तैयार करने के लिए जमीनी काम शुरू कर दिया है। उन्होंने अभिनेता-राजनेता प्रकाश राज के साथ रविवार को सिद्दीपेट जिले के मल्लाना सागर जलाशय का दौरा किया।
यह दौरा उन अटकलों के बीच हो रहा है कि तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) ने अगले चुनाव के लिए रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी किशोर को सौंपी है।
'पीके' नाम से जाने जाने वाले प्रशांत किशोर ने कथित तौर पर मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव से सिद्दीपेट जिले में उनके फार्म हाउस में मुलाकात की।
समझा जाता है कि उन्होंने 2023 के विधानसभा चुनावों की योजनाओं और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ राव के प्रस्तावित मोर्चे पर भी चर्चा की।
माना जाता है कि पीके ने टीआरएस प्रमुख के राष्ट्रीय विकल्प के विचार को कथित तौर पर अन्य राज्यों में उनकी टीम द्वारा किए गए प्रारंभिक सर्वेक्षण के परिणाम प्रदान किए हैं।
एक साथ मोर्चा बनाने के अपने प्रयासों के तहत केसीआर ने एक सप्ताह पहले मुंबई का दौरा किया और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार से मुलाकात की थी।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित कई नेताओं के साथ काम कर चुके पीके ने कथित तौर पर प्रस्तावित मोर्चे पर टीआरएस प्रमुख को अपनी राय दी।
इससे पहले, पीके ने मल्लाना सागर का दौरा किया, जिसे पोलावरम परियोजना के हिस्से के रूप में केसीआर द्वारा खोला गया देश का सबसे बड़ा मानव निर्मित जलाशय कहा जाता है।
उनके पोलावरम के अन्य प्रमुख घटकों का दौरा करने की संभावना है, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी लिफ्ट सिंचाई परियोजना और पिछले आठ वर्षों के दौरान टीआरएस द्वारा शुरू की गई अन्य परियोजनाओं के रूप में जाना जाता है। (आईएएनएस)
फरीदाबाद, 28 फरवरी | दिल्ली पब्लिक स्कूल (डीपीएस), ग्रेटर फरीदाबाद के दसवीं कक्षा के छात्र की आत्महत्या के मामले में एक ताजा घटनाक्रम में पुलिस ने रविवार को कहा कि उन्होंने स्कूल की शैक्षणिक प्रमुख ममता को गिरफ्तार कर लिया है। बाद में अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। 10वीं कक्षा के छात्र ने गुरुवार को अपने आवासीय स्कूल की इमारत से कूदकर कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी।
मृतक ने घटना के पीछे एक सुसाइड नोट छोड़ा था, जिसमें उसने आरोप लगाया था कि उसके सहपाठियों द्वारा उसकी यौनिकता को लेकर उसे धमकाया जा रहा था और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था।
उसने अपने सुसाइड नोट में स्कूल प्रशासन पर आरोप लगाया था। उसके सुसाइड नोट में लिखा था कि स्कूल अथॉरिटी ने ही उसे आत्महत्या के लिए मजबूर किया है।
सुसाइड नोट में लिखा है, "आप शक्तिशाली हैं (मां), परवाह मत करो कि लोग मेरी कामुकता के बारे में क्या सोचते हैं, कृपया रिश्तेदार, दादाजी को संभालो .. स्कूल ने मुझे मार डाला है। उच्च अधिकारी भी जिम्मेदार हैं।"
परिवार ने आरोप लगाया था कि उन्होंने कई बार स्कूल प्रशासन से संपर्क किया था, लेकिन उनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।
स्कूल में पढ़ाने वाली उसकी मां ने इस संबंध में प्राथमिकी दर्ज कराई है।
पुलिस ने कहा कि सुसाइड नोट बरामद किया गया है, जिसमें छात्र ने स्कूल अधिकारियों और कक्षा के साथियों पर आरोप लगाया है।
पिछले साल उनके दो स्कूली साथियों ने उसकी सेक्सुअलिटी पर कमेंट किया था, जिसके कारण वह डिप्रेशन में आ गया था।
इसके बाद लड़के ने अपनी मां से बात की, जिन्होंने स्कूल के प्रिंसिपल से संपर्क किया, हालांकि, स्कूल अधिकारियों द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई।
गुरुवार की रात जब मां घर पर नहीं थी तो लड़के ने अपने घर से छलांग लगा दी। उसे पास के अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
बाद में, फरीदाबाद की अपराध शाखा की एक टीम ने अपराध स्थल का दौरा किया और कुछ सबूत एकत्र किए। (आईएएनएस)
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 27 फरवरी। राज्य में आज रात 09.00 बजे तक 117 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। इनमें सबसे अधिक 29 रायपुर जिले से हैं। राज्य के स्वास्थ्य विभाग के इन आंकड़ों के मुताबिक आज रात तक किसी भी जिले में 30 से अधिक कोरोना पॉजिटिव नहीं मिले हैं। आज कुल 8 जिलों को एक भी पॉजिटिव नहीं मिले हैं।

आज सिर्फ एक मौत हुई है।
राज्य शासन के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक दुर्ग 16, राजनांदगांव 0, बालोद 1, बेमेतरा 3, कबीरधाम 0, रायपुर 29, धमतरी 7, बलौदाबाजार 0, महासमुंद 0, गरियाबंद 0, बिलासपुर 11, रायगढ़ 9, कोरबा 0, जांजगीर-चांपा 4, मुंगेली 1, जीपीएम 0, सरगुजा 3, कोरिया 5, सूरजपुर 1, बलरामपुर 7, जशपुर 5, बस्तर 2, कोंडागांव 8, दंतेवाड़ा 1, सुकमा 0, कांकेर 2, नारायणपुर 1, बीजापुर 1, अन्य राज्य 0 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं।
पुलिस प्रशासन की घंटों समझाइश के बाद केशकाल में दफन
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
केशकाल, 27 फरवरी। धर्मांतरण किए बुजुर्ग की मौत के बाद आज गांव में दफन करने ग्रामीण और परिवार के बीच विवाद की स्थिति बन गई। पुलिस प्रशासन की घंटों समझाइश के बाद परिवार केशकाल ले जाकर ईसाई समाज के श्मशान में दफनाने के लिए सहमत हुए और पुलिस व प्रशासन की मौजूदगी में केशकाल में अंतिम संस्कार किया गया।
केशकाल अनुविभाग के विश्रामपुरी थाना क्षेत्र अंतर्गत बड़बत्तर में धर्मांतरण कर ईसाई समुदाय में शामिल हुए एक बुजुर्ग की मौत होने के बाद उन्हें दफनाने को लेकर मृतक के परिवार और ग्रामीणों के बीच विवाद की स्थिति बनी हुई थी। इसकी सूचना मिलते ही एएसपी (ऑप्स) शोभराज अग्रवाल, तहसीलदार सुशील कुमार भोई, केशकाल एसडीओपी भूपत सिंह धनेश्री, फरसगांव एसडीओपी मणिशंकर चंद्रा समेत विश्रामपुरी पुलिस व प्रशासन की टीम मौके पर पहुंच कर दोनों पक्षों को समझाने का प्रयास में लगी हुई थी। प्रशासन, पुलिस व ग्रामीणों के बीच सुबह 11 से शाम 5 बजे तक चली इस गहन चर्चा के बाद ईसाई समाज के लोग शव को केशकाल ले जाकर ईसाई समाज के श्मशान में दफनाने के लिए सहमत हो गए हैं। इसके बाद पुलिस व प्रशासन की टीम शव को लेकर केशकाल रवाना हो गयी है।

गांव के पटेल ने बताया कि हमारा गांव पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र में आता है तथा यह आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र भी है। हमारे गांव के कुछ लोग आदिवासी धर्म को छोडक़र ईसाई धर्म मे शामिल हो गए हैं और ये लोग हिन्दू संस्कृति के देवी देवताओं को न मानते हुए हमारे रीति रिवाजों का भी पालन नहीं करते हैं। इसलिए हम लोग नहीं चाहते कि ऐसे लोगों को हमारे गांव में स्थान दिया जाए। चूंकि इस गांव में धर्म परिवर्तन कर चुके 18 परिवारों को हमने गांव से बहिष्कृत कर दिया है, इसलिए इन्हें समाजिक बैठक, कार्यक्रम एवं त्योहारों में भी शामिल नहीं किया जाता। इसी कारण से हम सभी गांव वाले चाहते हैं कि इनका शव हमारी जमीन में दफन न हो। जहां भी उनके समाज का श्मशान घाट है, वहां ले जाकर वह शव दफना सकते हैं।
ज्ञात हो कि ग्राम पंचायत बड़बत्तर में वर्तमान में ईसाई समुदाय के कुल 18 परिवार हंै, वहीं कुल सदस्यों की संख्या लगभग 100 से अधिक है। रविवार को ईसाई समुदाय के बुजुर्ग सुखलाल शोरी (70 वर्ष) की मौत हो गयी थी। मामला गंभीर तब हुआ, जब परिवार के लोग कहने लगे कि हम अपने गांव में ही अपनी पट्टे की जमीन पर शव को दफन करेंगे। वहीं गांव वालों ने इस पर आपत्ति जाहिर करते हुए अपने गांव की जमीन पर शव को दफनाने का विरोध जताया।
इस बारे में जानकारी देते हुए केशकाल एसडीओपी भूपत सिंह धनेश्री ने बताया कि ग्रामीणों के द्वारा गांव की जमीन में शव दफनाने को लेकर विरोध किया जा रहा था, जिसके कारण थोड़ी तनाव की स्थिति निर्मित हुई थी। जिसके चलते दोनों पक्षों को काफी समझाने के बाद मामले का निष्कर्ष निकाला गया है, ईसाई समुदाय के लोग शव को गांव से बाहर भेजने के लिए सहमत हो गए हैं, फलस्वरूप शव को दफनाने के लिए केशकाल के शमशान घाट भेजा जा रहा है।
भूपेश ने कुशीनगर में भाजपा पर जमकर साधा निशाना
‘छत्तीसगढ़’ न्यूज डेस्क
कुशीनगर 27 फ़रवरी। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा है कि अब वक्त बदलाव का है। जनता समझ चुकी है ये जुमले की सरकार, आपस में लड़वाकर मुद्दों से भटका रही है। जनता इन्हें सबक़ देगी। खुद से जुड़े मुद्दों पर मतदान करेगी।
भूपेश बघेल ने भाजपा पर तीखा हमला बोलाl उन्होंने कहा कि यूपी सरकार मानसिक रूप से दिवालिया हो चुकी है। इनके पास ना तो कुछ करने को है और न ही कुछ बताने को। उन्होंने कहा कि भाजपा अंग्रेजी मानसिकता की है। मंदिर मस्जिद और जात, धर्म के नाम पर लड़ा कर फूट डालो-राज करो के फार्मूले पर चलती हैl आज उत्तरप्रदेश के सामने यक्ष प्रश्न है कि कब तक यहां की जनता जाति-धर्म के आधार पर वोट करेगी? वे कब अपने मुद्दों पर वोट करेंगे? यदि जनता चाहती है कि उनकी समस्याएं हल हों तो वोट उन्हें देना होगा जो उनके मुद्दों की बात कर रही है। कांग्रेस एकमात्र पार्टी है जो जनता की बात कर रही है।
मुख्यमंत्री ने कहा, 'उत्तर प्रदेश के लोग हर चुनाव में कुछ नया करते हैं। उत्तर प्रदेश आपको वर्तमान के सवालों के जवाब देता है।'
बघेल ने कहा कि, विपक्षी नेताओं का हेलीकॉप्टर रोका जा रहा है। कुशीनगर में चीनी मिले बंद हो गई। धान की कीमत आधा हो गई है। किसानों को दाम नहीं, नौजवानों को काम नहीं मिल रहा है। इस दौरान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ की योजनाओं और कर्ज माफी, धान के सबसे अधिक दाम आदि का जिक्र किया।
दिलनवाज़ पाशा
'तीन दिन पहले धमाकों का जो सिलसिला शुरू हुआ है वो अभी थमा नहीं है. बाक़ी सभी लोगों के साथ हम सब भारतीय छात्र भी बंकर में हैं. जब कोई ज़ोर का धमाका होता है तो हमारी धड़कनें तेज़ हो जाती हैं. लगता है कि कहीं ये लड़ाई हम तक ना पहुंच जाएं. हम नहीं जानते की आगे क्या होगा.'
उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद के रहने वाले आसिफ़ चौधरी मेडिकल की पढ़ाई करने यूक्रेन गए थे. वो ख़ारकीएव की नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी के छात्र हैं.
अनुमान है कि भारत के क़रीब दो हज़ार छात्र इस यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं. इनमें से कुछ को एयर इंडिया की विशेष फ्लाइट के ज़रिए निकाल लिया गया था. लेकिन एयरस्पेस बंद होने के बाद ये सभी वहीं फंसे हैं.
ख़ारकीएव पूर्वी यूक्रेन में रूस सीमा के बिलकुल पास है. यूक्रेन का ये दूसरा सबसे बड़ा शहर भीषण हमला झेल रहा है. शहर के चारों तरफ़ युद्ध छिड़ा है. स्थानीय लोग बड़ी तादाद में शहर छोड़ कर जा चुके हैं. लेकिन यहां फंसे भारतीय छात्रों के पास यहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं है.
शनिवार को जब कुछ देर के लिए बमबारी बंद हुई तो अनस खाने-पीने का सामान लेने के लिए बाहर निकले. प्रशासन ने कुछ देर के लिए ज़रूरी सामानों की दुकानों को खुलवाया था.
वीडियो कॉल पर बीबीसी से बात करते हुए अनस ने वहां के हालात दिखाए. वहां इक्का-दुक्का को छोड़कर सभी दुकानें बंद थी. सड़कों पर सन्नाटा पसरा था और कुछ ही भारतीय छात्र नज़र आ रहे थे जो सामान लेने निकले थे.
शहर के मेट्रो स्टेशन बम शेल्टर बन चुके हैं. अनस ने मेट्रो स्टेशन भी दिखाया जिसमें सैकड़ों स्थानीय लोग शरण लिए हुए थे. इनमें बच्चे-बूढ़े जवान सभी हैं.
ख़ारकीएव में पढ़ने वाले कई भारतीय छात्र युद्ध शुरू होने से पहले बीबीसी के संपर्क में थे. एक सप्ताह पहले वहां से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि वो यहां से निकलने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन निकल नहीं पा रहे हैं.
हैदराबाद के रहने वाले तारिक़ भी इनमें से एक हैं. तारिक़ ने तब बताया था, "फ्लाइट का टिकट चार गुना से अधिक महंगा हो चुका है. जो आासानी से 25-30 हज़ार में मिल जाता था वो लाख- डेढ़ लाख में भी नहीं मिल रहा है."
तारिक़ भारत लौटने की मशक्कत में लगे थे. लेकिन निकल नहीं पाए. वो नौ छात्रों के एक समूह के साथ किसी तरह राजधानी कीएव पहुंचे. लेकिन यहां से आगे नहीं बढ़ पाए.
शनिवार को कीएव से बात करते हुए तारिक़ ने बताया, "हमें एक फ्लैट में शरण मिल गई है. हम शहर के जिस इलाक़े में हैं वहां युद्ध नहीं चल रहा है. हम सब अभी सुरक्षित हैं लेकिन आगे क्या होगा पता नहीं."
तारिक़ और उनके दोस्त अपने आप को फ़्लैट में बंद किए हुए हैं. उन्होंने बत्तियां बुझा दी हैं और खिड़कियां बंद कर दी हैं. राजधानी कीएव में सोमवार तक के लिए क़र्फ्यू लगा दिया गया है. बीते सप्ताह उन्होंने बताया था कि यूनिवर्सिटी प्रशासन और उन्हें भारत से लाने वाले एजेंट ने उनपर मीडिया से बात न करने का दबाव बनाया है.
यूनिवर्सिटी की तरफ़ से कहा गया था कि पढ़ाई जारी रहेगी और जो छात्र जाना चाहते हैं वो अपनी अटेंडेंस के रिस्क पर भारत जाएं. फिर अचानक से यूक्रेन के हालात बदल गए और अब सभी छात्र अपने आप को फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं.
इन दिनों ख़ारकीएव के एक बंकर में रह रहे अनस बताते हैं, "हमारे पास खाने-पीने का सामान ख़त्म हो रहा है. हमने पानी इकट्ठा किया है कि जब कुछ ना रहे तो हम पानी पीकर ही गुज़ारा कर सकें. अभी के हालात में ख़ारकीएव से बाहर निकल पाना संभव नहीं लग रहा है."
अनस कहते हैं, "हम चाहते हैं कि भारत सरकार यूक्रेन और रूस की सरकार से वार्ता करके ख़ारकीएव में फंसे भारतीय छात्रों को निकालने का प्रयास करे. हम दूतावास फ़ोन करते हैं तो कोई ठोस जवाब नहीं मिल पा रहा है."
भारत सरकार का कहना है कि वो भारतीय छात्रों को निकालने के लिए हरसंभव कोशिशें कर रहे हैं और इसके लिए यूक्रेन के कई पड़ोसी देशों के संपर्क में हैं.
पिछले दो दिनों में रोमानिया के रास्ते कुछ भारतीय छात्रों को निकाला गया है. भारत सरकार हंगरी, रोमानिया, पोलैंड और स्लोवाकिया के रास्ते छात्रों को भारत लाने के प्रयास कर रही हैं.
लेकिन इन देशों की सीमा तक पहुंचना भारत के छात्रों के लिए बहुत आसान नहीं हैं. सैकड़ों छात्रों ने पोलैंड पहुंचने की कोशिश की है लेकिन सीमा बंद होने की वजह से वो बॉर्डर पर ही फंस गए हैं.
उत्तर प्रदेश के छात्रों का एक समूह भी इसमें शामिल हैं. मेरठ के रहने वाले रजत जोहाल अपने साथियों के साथ पोलैंड सीमा के पास फंसे हैं.
लवीव यूनिवर्सिटी में मेडिकल के छात्र रजत ने बीबीसी को बताया, "भारत सरकार के संदेश के बाद हमने पोलैंड बॉर्डर पहुंचने का फ़ैसला लिया. लेकिन पोलैंड बॉर्डर पर हालात बहुत ख़राब हैं. हम दोगुना किराया चुकाकर किसी तरह बॉर्डर की तरफ़ बढ़े लेकिन ड्राइवर ने हमें चालीस किलोमीटर पहले ही उतार दिया. क्योंकि यहां बहुत लंबा जाम लगा था."
रजत बताते हैं, "यहां तापमान शून्य से नीचे है. हम रात भर पैदल चलते रहे. किसी तरह तीस किलोमीटर का सफर तय किया. पूरा रास्ता जाम हैं."
रजत कहते हैं, "सर्दी की वजह से हमारा शरीर जकड़ रहा था. हमें लग रहा था कि कहीं हम ठंड से ही ना मर जाएं. लेकिन हम पोलैंड पहुंचने की उम्मीद में आगे बढ़ते रहे. बॉर्डर के पास पहुंचकर हमें बहुत निराशा हाथ लगी. क्योंकि भारतीय छात्रों के लिए बॉर्डर बंद था. पोलैंड हमें एंट्री नहीं दे रहा है."
रजत और उनके साथियों ने इस समय बॉर्डर के पास एक शेल्टर में शरण ली है. रजत कहते हैं, "हम भारत सरकार से अपील करते हैं कि वो अपने अधिकारियों का एक दल पोलैंड बॉर्डर भेजे जो यहां फंसे सैकड़ों छात्रों की मदद कर सके."
पोलैंड बॉर्डर पर मौजूद हरिद्वार के रहने वाले एक और छात्र ने बीबीसी से कहा, "यहां सबसे मुश्किल हालात भारतीय छात्रों के लिए ही हैं. अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और नाईजीरिया जैसे देशों के अधिकारी यहां मौजूद हैं जो अपने छात्रों की मदद कर रहे हैं. लेकिन भारतीय छात्रों की मदद के लिए कोई अधिकारी नहीं हैं."
इस छात्र का दावा है, "हमारे प्रति यहां के अधिकारियों का रवैया भी अच्छा नहीं है. वो लाठियां चला रहे हैं. कई बार उन्होंने हमारे मुंह पर सिगरेट का धुआं छोड़ा है."
युद्ध शुरू होने से पहले भारत के क़रीब बीस हज़ार छात्र यूक्रेन में थे. युद्ध शुरू होने के बाद अब तक तीन उड़ानें वहां से भारतीय छात्रों को वापिस लेकर पहुंची हैं.
भारत सरकार लगातार दावा कर रही है कि प्रत्येक छात्र को निकालने के प्रयास किए जा रहे हैं. लेकिन जो छात्र वहां फंसे हैं उनकी सांसें अटकी हैं. हालांकि सरकार ने अब तक आधिकारिक तौर पर यह नहीं बताया है कि अब तक कितने छात्रों को निकाला जा चुका है और कितने छात्र फंसे हैं.
यूक्रेन में युद्ध का रविवार को युद्ध के तीसरे दिन भीषण लड़ाई चल रही है. ख़ारकीएव में बड़े हमले हो रहे हैं. राजधानी कीएव को भी घेर लिया गया है और लड़ाई यहां गलियों तक पहुंच गई हैं. (bbc.com)
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
अम्बिकापुर, 27 फरवरी। पश्चिमी विक्षोभ के लगातार सक्रिय होने व पूर्वी बांग्लादेश में चक्रवाती घेरा बनने से बंगाल की खाड़ी से नमी आने के कारण उत्तर छत्तीसगढ़ में शनिवार की रात से ही मौसम खराब हो गया है। मेघ गर्जना के साथ अंबिकापुर में रविवार की शाम 5 बजे तक लगभग 10 मिलीमीटर वर्षा हुई, इसके बाद भी वर्षा का क्रम जारी है, तो वहीं छत्तीसगढ़ के शिमला मैनपाट में ओलावृष्टि हुई है।
बारिश के कारण सीतापुर सहित पूरे सरगुजा में अधिकतम व न्यूनतम तापमान में गिरावट दर्ज की गई है। अगर किसी क्षेत्र में व्यापक रूप से ओलावृष्टि होती है तो न्यूनतम तापमान में और भी गिरावट दर्ज होगी।
विक्षोभ के प्रभाव से अंबिकापुर सहित पूरे सरगुजा में शनिवार की देर रात से रविवार की शाम तक रुक-रुक कर झमाझम वर्षा हो रही है। सुबह 11 से 4 बजे तक बारिश थमने से लोगों को थोड़ी राहत मिली थी, इसके बाद पुन: वर्षा का क्रम जारी है। मैनपाट में बारिश के साथ ओलावृष्टि हुई है। मैनपाट के ग्राम पंचायत सरभंजा के लुरैना बस्ती में हुई ओलावृष्टि से बारी में लगाए प्याज सहित फसलों को नुकसान पहुंचा है।
मौसम जानकार एमएम भट्ट ने बताया कि इस समय पूर्वी बांग्लादेश तथा उसके नजदीकी क्षेत्रों में वायुमंडल के निचले हिस्से में एक चक्रवाती घेरा सक्रिय है, जो लगातार नमी की आपूर्ति कर रहा है, जिसका व्यापक प्रभाव उत्तर छत्तीसगढ़ के सभी जिलों सहित झारखंड, बिहार पर भी पड़ा है। पिछले चार घंटों से अम्बिकापुर में रुक रुक कर मेघ गर्जन और वर्षा हो रही है।
सुबह 08.30 बजे तक अम्बिकापुर में 5.2 मिमी वर्षा एवं शाम तक 5.2 मिलीमीटर कुल 9.5 मिलीमीटर वर्षा हुई है। इसके बाद भी वर्षा का क्रम सतत जारी है।बारिश के कारण अधिकतम तापमान में 3 डिग्री तक गिरावट दर्ज की गई है तो वहीं न्यूनतम तापमान 2 डिग्री तक गिरा है।
3 मार्च तक रहेगी बादलों की आवाजाही
एमएम भट्ट ने बताया कि वर्तमान में सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ 28 फरवरी को कमजोर पड़ जाएगा, लेकिन इस बीच 28 फरवरी को ही को उत्तर भारत में जम्मू-कश्मीर की ओर से एक और पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने की संभावना बनी हुई है। इसके अलावा 2 मार्च को एक और पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होने के कगार पर है। आगामी 3 दिनों तक उत्तर छत्तीसगढ़ के आसमानों में बादलों की आवाजाही के साथ वर्षा व ओलावृष्टि की संभावना बनी हुई है।
नई दिल्ली, 27 फरवरी : कोरोना वायरस के ओमिक्रॉन वेरिएंट से भारत में आई तीसरी लहर अब लगभग थम चुकी है. कोरोना के मामलों में तेजी से गिरावट भी आ रही है. संक्रमण की रफ्तार थमी है लेकिन अब कोविड की चौथी लहर को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है. इस बीच आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों ने कोविड की चौथी लहर को लेकर बड़ी जानकारी दी है. कहा जा रहा है कि कोरोना की अगली लहर देश में 22 जून के आस-पास आ सकती है जो कि 24 अक्टूबर तक चलेगी.
बता दें कि इससे पहले आईआईटी के वैज्ञानिकों ने कोविड से संबंधित जो भी संभावनाएं व्यक्त की थीं वह करीब करीब सही थीं. इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि कोविड की चौथी लहर तीसरी लहर के मुकाबले कुछ ज्यादा दिन तक रह सकती है. हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि चौथी लहर का संक्रमण कोरोना के वेरिएंट पर निर्भर करेगा.
गौरतलब है कि कोरोना की तीसरी लहर फीकी पड़ती जा रही है. संक्रमण के मामलों में हर दिन गिरावट आ रही है. पिछले 24 घंटे में देश में कोरोना के करीब 10 हजार मामले सामने आए हैं जबकि अब पॉजिटिव दर सिर्फ 1 प्रतिशत रह गई है. शोधकर्ता अब इस बात पर रिसर्च कर रहे हैं कि कोविड की अगल लहर कब तक भारत में आ सकती है. MedRxiv में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक कोविड की चौथी लहर 22 जून तक भारत में आ सकती है जबकि यह 24 अक्टूबर तक चलेगी.
भारत सहित दक्षिण एशियाई देशों के प्रवासी, गैरकानूनी तरीकों से यूरोपीय संघ में दाखिल होने की कोशिश कर रहे हैं. सर्बिया में अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में ये आमद बढ़ गई है.
डॉयचे वैले अराफातुल इस्लाम कि रिपोर्ट-
हंगरी और रोमानिया के नजदीक स्थित सर्बिया के सीमाई शहर किकिन्डा में करीब 100 भारतीय आप्रवासी एक रिसेप्शन सेंटर में रह रहे हैं. उन्हें यूरोपीय संघ में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली है.
यूरोपीय संघ के दो सदस्य देशों की सीमा से लगे होने की वजह से किकिन्डा शहर प्रवासियों का एक लोकप्रिय ठिकाना बन गया है. कैंप के प्रवेश प्रभारी आंद्रेया मारचेंको ने डॉयचे वेले को बताया कि "केंद्र में हमारे पास 540 बिस्तर है लेकिन अभी फिलहाल 550 आप्रवासी यहां रह रहे हैं. इसका मतलब है कि हम अपनी क्षमता से ऊपर हैं. 360 लोग बांग्लादेश से आए थे, और करीब 100 भारत से. यह एक नया ट्रेंड है. पिछले कुछ महीने से यहां भारतीय आ रहे हैं.”
इस कैंप में सिर्फ पुरुष रखे गए हैं. इसका संचालन सर्बिया की शरणार्थी एजेंसी करती है. प्रवास अंतरराष्ट्रीय संगठन (आईओएम) और संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) से उसे सहायता मिलती है. शिविर में खेल का मैदान भी है जहां आप्रवासी क्रिकेट खेल सकते हैं.
पुलिस पर दुर्व्यवहार का आरोप
भारत के पंजाब राज्य से आए 39 साल के हरजिंदर कुमार ने डीडब्ल्यू को बताया कि वो कई महीने पहले सर्बिया आए थे. उनका कहना है कि अपनी मां के इलाज के लिए उन्होंने लोगों से पैसे उधार लिए थे और उन पर भारी कर्ज हो गया है. वो कहते हैं, "मैं एक ना एक दिन यूरोपीय संघ पहुंचने की उम्मीद के साथ सर्बिया आया हूं. वहां पहुंच जाऊं तो मैं अपना सारा कर्ज चुका दूंगा.”
हालांकि यूरोपीय संघ में दाखिल होने की कुमार की कई कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं. वो कहते हैं कि वो सर्बिया में खुद को फंसा हुआ महसूस करने लगे हैं. इस गैरकानूनी यात्रा के लिए मानव तस्करों को भुगतान के रूप में 2000 यूरो गंवा चुके हैं. कुमार शिविर में चिकन बिरयानी पका कर बेचते हैं. वो कहते हैं कि "यहां मेरे और मेरे कुछ दोस्तों के लिए यह जेबखर्च जैसा है.”
वैसे तो कई प्रवासी सेंटर की मुख्य इमारत के भीतर ही रहते हैं. लेकिन अधिकांश भारतीय परिसर के एक कोने में एक विशाल सफेद तंबू में रह रहे हैं. अधिकारियों ने ये नहीं बताया कि भारतीय प्रवासियों के लिए अलग जगह क्यों रखी गई है.
27 साल के जसबीर सिंह ने बताया कि भारत में नौकरी नहीं मिली तो वो कुछ महीने पहले सर्बिया चले आए थे. वो कहते हैं कि ईयू में घुसने की कोशिश के एवज में उन्हें 12 हजार यूरो देने पड़े थे. कुमार की तरह सिंह भी भारत के उत्तरी राज्य पंजाब से हैं. सिंह कहते हैं कि उन्होंने हंगरी, रोमानिया और क्रोएशिया के रास्ते यूरोपीय संघ में गैरकानूनी ढंग से घुसने की कोशिश की थी. ईयू की सीमाओं की चौकसी करने वाली एजेंसी, फ्रंटेक्स और सीमा पुलिस के सख्त पहरे ने उनकी सारी कोशिशें बेकार कर दीं.
जसबीर सिंह ने यह भी कहा कि सीमाओं पर पुलिस ने उनके साथ बुरा बर्ताव भी किया था. सिंह ने डीडब्ल्यू से कहा, "यूरोपीय पुलिस हमारा सम्मान नहीं करती. चेकिंग के दौरान वे हमारी पगड़ी तक निकाल देते हैं और जर्बदस्ती हमारी दाढ़ी पकड़कर खींचते हैं. वे हमारे कपड़े भी उतरवा देते हैं और कड़ी ठंड के बीच जबरन वापस सर्बिया भेज देते हैं.” सालों से प्रवासी क्रोएशिया, हंगरी और रोमानिया में सीमा सुरक्षा बलों पर हिंसक ढंग से वापस खदेड़ने का आरोप लगाते रहे हैं.
बाल्कन का रास्ता क्यों ले रहे हैं भारतीय
2015 और 2016 में मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) में संघर्ष और हिंसा से जान बचाकर भागने की कोशिश में हजारों की तादाद में शरणार्थी और प्रवासी, यूरोपीय संघ के सदस्य देश ग्रीस के रास्ते बोस्निया और सर्बिया होते हुए जर्मनी जैसे देशों तक पहुंच गए थे. जल्द ही ये रास्ता "बाल्कन रूट” के तौर पर मशहूर हो गया.
2017 से बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से कई प्रवासी गैरकानूनी ढंग से बाल्कन के रास्ते यूरोपीय संघ में दाखिल होने की कोशिश कर चुके हैं. भारतीय नागरिकों के लिए सर्बिया, यूरोप का इकलौता देश है जिसमें वीजा मुक्त प्रवेश दिया जाता है, इसीलिए वो लोकप्रिय ठिकाना भी बन गया है.
मारचेंको कहते हैं, "2017 से यह व्यवस्था है कि सर्बिया में अल्प अवधि की रिहाइश के लिए वीजा नहीं लगता. भारतीय बेलग्रेड की सीधी उड़ान लेकर आते हैं. यहां से वो यूरोपीय संघ के देशों में जाने की कोशिश करते हैं.”
कुछ भारतीय प्रवासियों ने ग्रीस में रुके रहने की कोशिश भी की थी. इस महीने की शुरुआत में 16 प्रवासियों के एक समूह को ग्रीस की सीमा से यूरोपीय संघ में दाखिल होने की कोशिश के दौरान उत्तरी मैसीडोनिया में पुलिस ने हिरासत में ले लिया था.
दूसरे भारतीय प्रवासी भी बोस्निया-हर्जेगोविना से क्रोएशिया में दाखिल होने की कोशिश करते हैं. उनका कहना है कि सर्बिया और बोस्निया के बीच गैरकानूनी ढंग से सीमा पार करना अपेक्षाकृत रूप से आसान है.
दर्जनों भारतीय बोस्निया के सीमाई शहर बिहाक में लीपा प्रवासी शिविर में रहते हैं. भारतीय प्रवासियों ने डीडब्ल्यू को बताया कि वे आर्थिक वजहों से यूरोपीय संघ जाना चाहते हैं. वे वहां पहुंचने की उम्मीद में बोस्निया आए थे.
लीपा कैंप में एक भारतीय प्रवासी वुपिन्दर ने डीडब्ल्यू से कहा, "मैं यूरोपीय संघ की सीमा पार कर पिछले महीने दो बार क्रोएशिया में दाखिल हो गया था. यूरोपीय संघ पहुंचने की मेरी कोशिश सफल नहीं हुई थी. क्रोएशिया की पुलिस ने मुझे वापस बोस्निया को निर्वासित कर दिया. मैंने ईयू आने के लिए मानव तस्करों को कोई पैसा नहीं दिया है. गूगल मैप्स के जरिए मैं अपने दम पर पहुंचने की कोशिश कर रहा हूं.”
वुपिन्दर कहते हैं कि बाल्कन देशों के रास्ते गैरकानूनी ढंग से यूरोपीय संघ में दाखिल होने की कोशिश सुरक्षित नहीं है और ऐसा कोई ना ही करे तो बेहतर. वो कहते हैं, "अगर भारत में मेरे पास नौकरी होती तो मैं इस तरह बोस्निया ना आया होता.” (dw.com)
मध्य जुरासिक काल में उड़ने वाले सबसे बड़े जानवर का कंकाल स्कॉटलैंड के स्काई आइल में मिला है. रिसर्चरों का कहना है कि ब्रिटिश इतिहास में ये सबसे अच्छे ढंग से संरक्षित जीवाश्मों में से एक है.
डॉयचे वैले पर एस्तेबान पार्दो की रिपोर्ट-
स्कॉटलैंड बादलों के मौसम और अनवरत बारिश के लिए मशहूर है. 17 करोड़ साल पहले वो ज्यादा गरम और उष्ण था. और उसके आकाश में उड़ान भरते थे ढाई मीटर विस्तार वाले विशाल डैनों से लैस महाकाय सरीसृप.
उत्तरपश्चिम स्कॉटलैंड में आइल ऑफ स्काई में रिसर्चरों ने एक जीवाश्म की खोज से ये पता लगाया है. पिछले दिनों करंट बायोलजी जर्नल में प्रकाशित उस खोज के निष्कर्षों में बताया गया है कि मध्य जुरासिक काल का ये सबसे बड़ा प्टेरोसॉर था.
नयी प्रजाति को नाम दिया गया है- जार्क स्काईअनआक. यह स्कॉटी गाइलिक मूल का एक शब्द है जिसके दो मतलब होते हैं- "पंखों वाला सरीसृप” या "आसमान का सरीसृप.”
जीवाश्म विज्ञानी स्टीफन ब्रुसेट ने डीडब्ल्यू को बताया, जो कंकाल मिला है वह एक आला दर्जे का स्कॉटी जीवाश्म है. एडिनबरा यूनिवर्सिटी में जीवाश्म विज्ञानी स्टीफन, 2017 में नेशनल ज्योग्राफिक सोसाइटी के अनुदान वाले उस अभियान के अगुआ थे जिसने "जार्क” को खोजा था.
जीवाश्म की संरक्षित अवस्था की खूबियों का उल्लेख करते हुए उनका कहना है कि "स्कॉटलैंड में मिले किसी पेत्रोसॉर से कहीं अधिक जानदार यह कंकाल था और संभवतः शुरुआती 19वीं सदी में मैरी एनिंग के दिनों के बाद से अब तक का सर्वश्रेष्ठ इलाकाई कंकाल है.”
मैरी एनिंग शुरुआती 19वीं सदी की एक मशहूर अंग्रेज जीवाश्मविज्ञानी थीं. उन्होंने कई जीवाश्मों की खोज की थी. जिसमें जर्मनी के बाहर मिला पहला पेत्रोसॉर कंकाल भी था.
ये उड़ते सरीसृप हैं, डायनासोर नहीं
उड़ने वाले सरीसृप, प्टेरोसॉर या प्टेरोडक्टाइल 22 करोड़ 80 लाख साल पहले ट्रियासिक काल के आखिरी चरण से लेकर 6 करोड़ 60 लाख पहले क्रेटेसियस काल के अंत तक अस्तित्व में थे. उसी दौरान एक एस्टेरॉयड ने धरती पर कमोबेश तमाम जीवन को नष्ट कर दिया था. प्टेरोसॉर उड़ने वाले पहले कशेरुकी यानी रीढ़ वाले जानवर थे. "द लैंड बिफोर टाइम” फिल्म ऋंखला को देखते हुए बड़े हुए लोग इस बात से पहले से वाकिफ होंगे क्योंकि उस फिल्म का एक प्रमुख किरदार पेट्री एक प्टेरोसॉर था.
सुनने में भले ही लगे लेकिन प्टेरोसॉर, डायनासोर नहीं हैं. बेशक वे उनके नजदीकी बंधु हैं और एक ही सरीसृप वंशवृक्ष की अलग शाखा से निकले हैं. इस जीवाश्म की खोज से पहले, वैज्ञानिक सोचते थे कि ट्राइएसिक और जुरेसिक कालों के दरमियान प्टेरोसॉर बामुश्किल ही 1.6 मीटर से अधिक बड़े होते थे. हालांकि ब्रुसेट अब कहते हैं, "अब हमें पता है कि वे और भी ज्यादा बड़े होने की क्षमता रखते थे.”
एक बेहद दुर्लभ जीवाश्म
2017 में इस जीवाश्म को तत्कालीन पीएचडी छात्रा एमिलिया पेनी ने स्काइ आइल पर ब्रदर्स प्वायंट नाम की जगह पर देखा था. उन्होंने एक चूना पत्थर पर जबड़े का एक हिस्सा और दांत उभरे हुए देखे थे.
ब्रुसेट कहते हैं कि टीम के सदस्य तब और रोमांचित और उत्साहित हो गए जब उन्होंने पाया कि वह सिर्फ खोपड़ी नहीं बल्कि एक पूरा कंकाल था. उन्होंने बताया कि चट्टान से जीवाश्म को छुड़ाना एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि लहरें भी तेजी से उठ आती थीं इसलिए उन्हें आधी रात तक का इंतजार करना पड़ा जब पानी घट गया और उसके बाद चट्टान काटकर जीवाश्म निकालने का काम पूरा किया जा सका.
जीवाश्म को रात में वहीं छोड़कर आना पड़ा. अगली सुबह पूरी खुदाई शुरू हुई. ब्रुसेत के मुताबिक वे लोग यही दुआ कर रहे थे कि इस चक्कर में बेशकीमती जीवाश्म कहीं कुचला ना जाए.
रिसर्च रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका नतालिया जागीलस्का ने डीडब्ल्यू को बताया कि एक और चीज जो इस जीवाश्म को इतना दुर्लभ बनाती है वो यह है कि मध्य जुरासिक काल के जीवाश्मों का मिलना ही कठिन है और प्टेरोसॉर को खोजना तो और भी मुश्किल है.
नतालिया कहती हैं, "फॉसिल रिकॉर्ड में वे बहुत ही कम संरक्षित रखे गए हैं. वे बहुत बहुत ज़्यादा नाजुक हैं, उनकी हड्डियां बहुत पतली होती हैं और चूर हो जाती हैं.”
कैसा दिखता होगा जार्क
आखिर जार्क स्काईअनआक कैसा दिखता होगा? उसके जीवाश्म के संरक्षण का काम तो आला दर्जे का था फिर भी उसके कई हिस्से नहीं मिल पाए थे. इसीलिए, जागीलस्का के मुताबिक, उसकी शक्लोसूरत का एक अनुमान लगाने के लिए कुछ जासूसी तो कुछ फोरेन्सिक किस्म की जुगत लगाना पड़ी. टीम ने बहुत सारे अलग अलग संग्रहालयों में रखे दूसरे बहुत सारे प्टेरोसॉर जीवाश्मों की मदद से रिक्त स्थान को भरने की और पहेली बुझाने की कोशिश की.
जागीलस्का चित्रकार भी हैं. उन्होंने प्टेरोसॉर को कुछ ऐसे जीव की तरह चित्रित किया है जिसकी चार टांगें और ढाई मीटर फैलाव वाले डैने हैं. वह करीब करीब अल्बट्रोस जैसा दिखता है. उसके आगे के हाथ पंखों में तब्दील हो गए थे और पिछले पांवों से काफी बड़े थे. और उसमें चार अंगुलियां थीं, चौथी वाली काफी चौड़ी थी जिसकी मदद से वो अपने झिल्लीदार पंखों को फैलाता होगा, जैसे कि आज के चमगादड़. संतुलन के लिए उसके पास एक लंबी पूंछ भी थी और बहुत नुकीले दांत भी थे जो शायद मछली पकड़ने के लिए थे.
उसकी खोपड़ी का गहराई से अध्ययन करने से पता चला कि उसकी नजर शायद बहुत तेज रही होगी और संतुलन का उसमें एक अच्छा बोध होगा. जागीलस्का के मुताबिक उड़ने वाले जीव के लिए ये दोनों खूबियां काफी मददगार होती हैं.
जीवाश्म के अध्ययन से ये भी मालूम हुआ कि वो कंकाल किसी वयस्क का नहीं था. हड्डियों की माइक्रोस्कोप से छानबीन में स्कॉटलैंड के शोधकर्ताओं ने पाया कि जार्क स्काईअनआक बड़ा हो ही रहा था.
जागीलस्का कहती हैं कि स्कॉटलैंड के राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शन के लिए रखे गए जीवाश्म को देखने आ रहे लोगों से वो यही चाहती हैं कि एक पल के लिए वे ये जरूर सोचें कि उनके सामने 17 करोड़ साल पहले स्कॉटलैंड के आसमान पर उड़ने वाले एक जानवर के "अपनी तमाम खूबियों के साथ संरक्षित” अवशेष रखे हैं. (dw.com)
यूक्रेन के सैन्य और नागरिक ठिकानों पर भारी हवाई हमले के बाद रूसी सैनिक यूक्रेन की राजधानी के करीब पहुंच गए हैं. शहर प्रशासन ने सड़कों पर लड़ाई की चेतावनी देते हुए नगरवासियों को घरों के भीतर रहने को कहा है.
यूक्रेन के राष्ट्रपति ने रूसी सैनिकों के हाथ अपदस्थ किए जाने की आशंकाओं के बीच यूक्रेन के लोगों से दृढ़ रहने को कहा है. उनका कहना है, "यूक्रेन का भविष्य तय हो रहा है." राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने यूक्रेन छोड़ कर जाने में अमेरिका की मदद लेने से इनकार कर दिया है. उनका कहना है कि युद्ध उनके देश में हो रहा है और वे वहीं रहेंगे.
शनिवार को जारी एक वीडियो में जेलेंस्की ने कहा है कि कीव में रूस के हमलों का जवाब दिया जा रहा है और आनन फानन में राजधानी पर कब्जा करके कठपुतली सरकार बिठाने की रूसी कोशिश नाकाम हो गई है. यूक्रेनी अधिकारियों ने हमले को नाकाम करने में कुछ सफलता की बात कही है. हालांकि उनका यह भी कहना है कि राजधानी के नजदीक लड़ाई अब भी जारी है. शहर के बाहरी हिस्से में झड़पें हो रही हैं. कहा जा रहा है कि रूसी सेना की कुछ छोटी टुकड़ियां मुख्य दस्ते के लिए रास्ता साफ करने की कोशिश में हैं.
अमेरिकी सेना के अधिकारियों का भी कहना है कि रूसी हमले का सामना काफी दृढ़ता से किया गया है और रूस ने जितनी आसानी से आगे बढ़ने के बारे में सोचा था उसकी तुलना में उनकी रफ्तार धीमी है.
रूसी सैनिकों का मार्च
यूक्रेनी राजधानी कीव के अधिकारियों ने नगरवासियों को चेतावनी दी है कि रूसी सैनिकों के खिलाफ सड़कों पर लड़ाई चल रही है. उन्होंने लोगों से उनके घरों के भीतर छिपे रहने को कहा है. उन्हें खिड़कियों के पास या बालकनी में नहीं जाने की सलाह दी गई है.
यूक्रेन की सेना का कहना है कि सिटी सेंटर के पश्चिम में एक सैन्य ठिकाने के पास लड़ाई चल रही है. कीव के मेयर का कहना है कि एक बड़े बिजली घर के पास धमाकों के कारण पूरा इलाका दहल उठा है. यहां पांच धमाके हुए हैं लेकिन धमाकों की वजह का पता नहीं चल सका है. रूसी सेना शहर में घुसने के लिए कई दिशाओं से हमले कर रही है.
रूसी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता मेज जनरल इगोर कोनाशेंकोव ने शनिवार को दावा किया कि हमला शुरू होने के बाद से अब तक यूक्रेन की 821 सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया है. रूसे सेना के निशाने पर 87 टैंक और दूसरी चीजें आई हैं. कोनाशेंकोव ने यह जानकारी नहीं दी कि इन हमलों में कितने लोगों की मौत हुई है. उनका दावा है कि रूसी सेना ने दक्षिणी शहर मेलिटोपॉल पर पूरी तरह से नियंत्रण कर लिया है. यह शहर अजोव सागर तट से करीब 35 किलोमीटर दूर है. उनका यह भी कहना है कि रूस समर्थित अलगवावदी डोनबास के इलाके में काफी आगे बढ़ गए हैं. रूस और यूक्रेन दोनों की ओर से किए जा रहे दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है.
आम लोगों को नुकसान
रूस का दावा है कि उसके हमले का लक्ष्य केवल यूक्रेन के सैन्य ठिकाने हैं लेकिन इस युद्ध में बहुत से आम लोगों की जान गई है और लोग घायल भी हुए हैं. यूक्रेन के स्वास्थ्य मंत्री विक्टर ल्याशको ने शनिवार को बताया कि 198 लोगों की जान गई है और 1 हजार लोग रूस के हमले में घायल हुए हैं. उनके बयान से यह पता नहीं चल सका है कि इसमें कितने सैनिक और कितने आम नागरिक हैं.
कीव के दक्षिणपूर्वी बाहरी हिस्से की एक बहुमंजिली इमारत में एक मिसाइल आ कर गिरी है. इसकी वजह से इमारत में का एक हिस्सा तबाह हो गया है. राहतकर्मियों ने वहां पहुंच कर लोगों को मदद दी है. राहतकर्मियों का कहना है कि इस हमले में छह आम लोग घायल हुए हैं.
यूक्रेन पर हमले के बाद जान बचाने के लिए बड़ी संख्या में लोग घर छोड़ कर दूसरे ठिकानों की ओर जा रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों के मुताबक 1,20,000 से ज्यादा यूक्रेनी लोगों ने पोलैंड, मोल्डोवा और दूसरे पड़ोसी देशों का रुख किया है. यह संख्या बहुत तेजी से लगातार बढ़ती जा रही है.
संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी की प्रवक्ता शाबिया मंटू ने बताया, "लगभग 1,16,000 लोगों ने अब तक अंतरराष्ट्रीय सीमा पार की है. यह संख्या ऊपर जा सकती है और हर मिनट यह बदल रही है. हालत काफी अस्थिर हैं और हर घंटे बदल जा रहे हैं."
लड़ाई रोकने पर बातचीत के संकेत
शुक्रवार को लड़ाई रोकने के लिए बातचीत की उम्मीद बनी और फिर टूट गई. रूसी राष्ट्रपति के कार्यालय क्रेमलिन ने कहा कि वह बातचीत के लिए बेलारूस में एक प्रतिनिधिमंडल भेजने के लिए तैयार है. लेकिन बाद में वह अपने बयान से पीछे हट गया. इसके पीछे वजह ये बताई गई कि यूक्रेन बेलारूस की बजाय वारसॉ में बात करना चाहता है. इसके बाद क्रेमलिन की तरफ से चर्चा बंद हो गई. रूसी विदेश मंत्री सर्गेइ लावरोव ने यूक्रेनी राष्ट्रपति के प्रस्ताव की गंभीरता को लेकर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि जेलेंस्की को बातचीत के लिए पहले ही रजामंद हो जाना चाहिए था.
हालांकि शुक्रवार की रात जेलेंस्की के प्रवक्ता सर्गी निकिपोरोव ने फेसबुक पर लिखा कि दोनों पक्ष बातचीत के लिए जगह और समय तय करने पर चर्चा कर रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस के खिलाफ एक प्रस्ताव को पास कराने की कोशिश नाकाम हो गई. इस प्रस्ताव में रूस से यूक्रेन पर हमला रोकने और अपनी सेना वापस बुलाने की मांग की गई थी. रूस ने इस प्रस्ताव को वीटो कर दिया. 11 देश इस प्रस्ताव के पक्ष में थे लेकिन भारत, चीन और संयुक्त अरब अमीरात ने इस दौरान चर्चा से बाहर रहने का फैसला किया. सुरक्षा परिषद में इसके खिलाफ काफी एकजुटता दिखी लेकिन यह सर्वसम्मति में नहीं बदल सकी. अमेरिका और उसके समर्थक देशों का कहना है कि भले ही यह प्रस्ताव पास नहीं हो सका, लेकिन इसने दिखा दिया कि रूस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कितना अलग थलग पड़ गया है.
सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पास नहीं होने के कारण इसके समर्थकों को इसे संयुक्त राष्ट्र की आम सभा से तुरंत पास कराने की मांग करने का मौका मिल गया. 193 सदस्यों वाले आमसभा के प्रस्ताव को वीटो नहीं किया जा सकता. हालांकि आमसभा का सत्र बुलाने के लिए अभी कोई समय तय नहीं की गई है.
रूस पर सख्ती
पश्चिमी देशों ने यूक्रेन में सैन्य दखल के विकल्प को तो चर्चा से बाहर रखा है, लेकिन रूसी अर्थव्यवस्था और पुतिन पर लगाम कसने के लिए तमाम कोशिश कर रहे हैं. अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, और यूरोपीय संघ ने शुक्रवार को कहा है कि वे राष्ट्रपति पुतिन और विदेश मंत्री लावरोव पर प्रतिबंध लगाएंगे. यूरोपीय संघ ने सर्वसम्मति से उनकी संपत्तियों को जब्त करने का फैसला किया है. अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यालय व्हाइट हाउस के प्रेस सचिव जेन प्साकी ने संकेत दिया है कि अमेरिकी प्रतिबंधों में यात्रा प्रतिबंध भी शामिल होगा.
रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जाखारोवा का कहना है कि इन प्रतिबंधों ने पश्चिम की "पूरी तरह से लाचारगी" को दिखा दिया है. जाखारोव ने टेलिविजन पर कहा है, "आप किससे बात करेंगे? ...एक परमाणु ताकत, एक महान देश, आपने किसके साथ उलझने का फैसला किया है?"
यूरोपीय नेताओं का कहना है कि इसके बाद भी अभी कुछ और प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. इनमें रूस को भुगतान तंत्र स्विफ्ट से बाहर करना भी एक उपाय है. इस बीच एशिया प्रशांत के देशों ने भी रूस के खिलाफ कदम उठाने शुरू कर दिए हैं. इनमें निर्यात को नियंत्रित कर रूस के उद्योग और सैन्य जगत के लिए मुश्किलें खड़ी करना शामिल है. सेमीकंडक्टर और दूसरे हाईटेक सामानों पर भी नियंत्रण किया जा रहा है. कई खेल और संगीत जगत के मुकाबलों से भी रूस को बाहर किया जा रहा है. इनमें फुटबॉल और टेनिस के मुकाबले भी शामिल हैं.
एनआर/आरएस(रॉयटर्स, एपी)
यूक्रेन में युद्ध रोकने की मांग वाले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव पर वोटिंग से भारत के बाहर रहने का मतलब रूस का समर्थन नहीं है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह रूस पर भारत की निर्भरता दिखाता है.
शुक्रवार को भारत ने यूक्रेन विवाद में कूटनीति का रास्ता बंद होने पर दुख जताया लेकिन साथ ही उसने अमेरिका के साथ जाकर उस प्रस्ताव पर वोट करने से इनकार कर दिया जो रूस के खिलाफ था. भारत का वोट मुमकिन है कि बीते सात दशकों से उसके दोस्त रहे रूस से संबंधों का ताना बाना बिगाड़ देता. रूस ने इस प्रस्ताव को वीटो किया जबकि चीन और संयुक्त अरब अमीरात भी भारत की तरह ही वोटिंग से बाहर रहे.
रूस ने उम्मीद जताई थी कि सुरक्षा परिषद में भारत उसके साथ सहयोग करेगा. भारत के पूर्व राजनयिक जी पार्थसारथी कहते हैं, "हमने रूस का समर्थन नहीं किया है. हम इससे बाहर रहे हैं. इस तरह की स्थितियों में यह करना सही है."
प्रधानमंत्रीनरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ गुरुवार को टेलिफोन पर बातचीतमें "हिंसा को तुरंत रोकने" की अपील की. मोदी ने कूटनीति पर लौटने की कोशिश की मांग करते हुए कहा, "रूस और नाटो के साथ विवाद को सिर्फ ईमानदार और गंभीर बातचीत से सुलझाया जा सकता है."
रूस पर निर्भर भारत
भारत कश्मीर मामले में पाकिस्तान के साथ विवाद में रूस के सहयोग और सुरक्षा परिषद में वीटो के लिए निर्भर रहा है. यूक्रेन से विवाद के दौरान जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान मास्को पहुंचे तो भारत वहां हो रही गतिविधियों पर बड़ी चौकसी से नजर रख रहा था. युद्ध की स्थिति में भी इमरान खान से पुतिन की मुलाकात करीब 3 घंटे चली.
यूक्रेन की जंग ने भारत के लिए ना सिर्फ कश्मीर बल्कि चीन के साथ भी चल रहे विवाद में नई चुनौतियां पैदा की हैं. पाकिस्तान और चीन दोनों रूस की तरफ हैं. भारत मानता है कि रूस चीन को भारत के साथ सीमा विवाद में नरमी दिखाने के लिए माहौल बना सकता है. जून 2020 में भारत और चीन का सीमा विवाद अचानक हिंसक हो गया था और तब से बातचीत होने के बावजूद तनाव कायम है.
"वोटिंग से बाहर रहना बेहतर"
यूक्रेन में लड़ाई शुरू होने के बाद भारत की राजधानी में शनिवार को भी कई संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया. ये संगठन रूसी हमले को बंद करने और भारत सरकार से वहां फंसे लोगों को बाहर निकालने की मांग कर रहे हैं. यूक्रेन में फंसे भारतीय लोगों में ज्यादातर छात्र ही हैं. 20 साल के प्रताप सेन छात्र हैं और सुरक्षा परिषद की वोटिंग से भारत के बाहर रहने के बारे में कहते हैं कि यह भले ही आदर्श नहीं है लेकिन इन परिस्थितियों में बेहतर विकल्प था. प्रताप सेन का कहना है, "भारत को अमेरिका और पश्चिमी दुनिया के साथ ही कई दशकों से करीबी सहयोगी रहे रूस के बीच संतुलन बनाना है."
एशिया सोसायटी पॉलिसी के सीनियर फेलो सी राजामोहन की राय में भारत की समस्या यह है कि वह अब भी रूसी हथियारों पर बहुत निर्भर है. राजा मोहन ने कहा, "यह महज एक काल्पनिक सवाल नहीं है, बल्कि सच्चाई यह है कि भारत एक तरह से चीन के साथ युद्ध के बीच में है. विवादित सीमा को लेकर भारत और चीन आमने सामने है."
हथियार और कारोबार
भारत और रूस ने 2025 तक आपसी कारोबार को 30 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है. भारत रूस के तेल और गैस पर भी बहुत निर्भर है. भारत ने 2021 में रूस से 18 लाख टन कोयला आयात किया था. रूस से प्राकृतिक गैस के कुल निर्यात का 0.2 फीसदी भारत को जाता है. भारत की सरकारी कंपनी गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने रूस के गासप्रोम के साथ 20 साल तक हर साल 25 लाख टन प्राकृतिक गैस खरीदने का करार किया है. यह करार 2018 में शुरू हुआ.
मोदी और पुतिन ने पिछले साल रक्षा और कारोबारी रिश्तों पर चर्चा करने के लिए मुलाकात की थी और सैन्य तकनीक में सहयोग को अगले दशक तक बढ़ाने के लिए करार पर दस्तखत किए थे.
भारत रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम चाहता है और चीन का सामना करने के लिए इसे जरूरी मानता है. इस मिसाइल सिस्टम की वजह से भारत और अमेरिका के रिश्ते में भी समस्या आ सकती है.
भारत ने अमेरिका और उसके सहयोगियों से चीन का सामना करने में मदद मांगी है. यह भारत प्रशांत सुरक्षा गठबंधन की साझी जमीन है जिसे "क्वॉड" कहा जाता है और जिसमें ऑस्ट्रेलिया और जापान भी शामिल हैं.
संतुलन की जरूरत
भारत अपने हथियारों की खरीदारी में अमेरिकी उपकरणों को भी शामिल कर रहा है. डॉनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति रहते अमेरिका और भारत ने करीब 3 अरब अमेरिकी डॉलर के हथियार सौदे को मंजूरी दी थी. भारत और अमेरिका के बीच सैन्य क्षेत्र में आपसी कारोबार जो 2008 में लगभग शून्य था वह 2019 में 15 अरब डॉलर तक पहुंच गया.
यूक्रेन का संकट बढ़ने के साथ भारत की असली समस्या यह होगी कि वह रूस के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में क्या करे. रूस के साथ मिसाइल सिस्टम के सौदे ने भारत को अमेरिकी प्रतिबंधों के खतरे में डाल दिया है. अमेरिका ने अपने सहयोगियों से कहा है कि वो रूस के साथ सैन्य उपकरणों की खरीदारी से दूर रहें. राजा मोहन कहते हैं, "भारत की समस्या तो अभी शुरू ही हुई है. सबसे जरूरी यह है कि रूस पर हथियारों की निर्भरता से बाहर निकला जाए."
हालांकि ऐसा भी नहीं है कि पश्चिमी देश भारत को बिल्कुल दुश्मन ही मान लेंगे, आखिर भारत की जरूरत उन्हें भी है. राजनीति विज्ञानी नूर अहमद बाबा कहते हैं कि पश्चिमी देश भारत से नाखुश हो सकते हैं लेकिन शायद उसे पूरी तरह अलग थलग करना उनके लिए संभव नहीं होगा. बाबा का कहना है, "आखिरकार देशों को असल राजनीति और कूटनीति के बीच संतुलन रखना होता है. ऐसा नहीं है कि पश्चिमी देशों के साथ केवल भारत का ही फायदा है, बल्कि उन्हें भी भारत की जरूरत है."
एनआर/एमजे (एपी)
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 27 फरवरी। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के रुमगा ग्राम पंचायत में गाज गिरने से एक व्यक्ति की मौत हो गई और उसका बेटा बुरी तरह झुलस गया।
बीते 2 दिनों से जीपीएम जिले में मौसम बदला हुआ है। रुमगा निवासी गणेश प्रसाद कल अपने बेटे सतीश के साथ तालाब की तरफ गया था। इसी दौरान बारिश के बीच गाज गिरी। गणेश प्रसाद की घटनास्थल पर ही मौत हो गई जबकि उसका बेटा सतीश बुरी तरह झुलस गया, जिसे सिम्स बिलासपुर में इलाज के लिए लाया गया है।


