राष्ट्रीय
जन सुराज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय सिंह ने पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के राजनीति छोड़ने के सवाल का जवाब दिया है.
शनिवार को पटना में हुई पार्टी की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उदय सिंह से पूछा गया कि 'प्रशांत किशोर ने कहा था कि अगर जेडीयू की 25 से ज़्यादा सीटें आईं तो वह राजनीति छोड़ देंगे'.
इस पर उदय सिंह ने कहा, "जब प्रशांत जी ने यह बात कही थी, उस तारीख़ को याद कीजिए और उसके बाद जिन पैसों की बरसात की मैं बात कर रहा हूं, जिसके बाद पूरा चुनाव प्रभावित हुआ. तो ये 25 सीटें बढ़ेंगी, ये बात लोग बहुत आसानी से समझ सकते हैं."
उदय सिंह का दावा है कि राज्य सरकार ने 21 जून के बाद से चुनाव होने तक क़रीब 40 हज़ार करोड़ रुपये खर्च किए. इसकी वजह से वोटर शिफ़्ट हुए.
एक पत्रकार ने उनसे सवाल किया कि 'जन सुराज पार्टी 243 में एक भी सीट नहीं ला सकी'.
इस पर उन्होंने कहा, "हमने पहले कहा था कि या तो हम 243 में से 200 सीटें लाएंगे या हम शून्य पर रहेंगे. मैंने भी कहा था और प्रशांत जी ने भी ये कहा था. हम जानते थे कि इसकी संभावना है."
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जम्मू-कश्मीर के नौगाम पुलिस स्टेशन में हुए धमाके पर प्रतिक्रिया दी है.
राज्य के डीजीपी नलिन प्रभात के मुताबिक़, इस धमाके में नौ लोगों की मौत हुई है और कुल 32 लोग घायल हुए हैं.
राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, "जम्मू-कश्मीर के नौगाम पुलिस स्टेशन में हुए विस्फोट में कई सुरक्षाकर्मियों की मौत और कई लोगों का घायल होना बहुत ही पीड़ादायक और चिंताजनक है."
उन्होंने कहा, "सूचना है कि ये भीषण हादसा लाल किला के पास हुए हमले से जुड़े विस्फोटकों की जांच के दौरान हुआ. मैं शहीदों को विनम्र श्रद्धांजलि देता हूं और घायलों के जल्द स्वस्थ होने की आशा करता हूं."
एक ताजा शोध में कहा गया है कि मुंबई में जलवायु परिवर्तन से मॉनसूनी बारिश और घातक हो रही है. हर साल हजारों जानें जाती हैं, जिनमें ज्यादातर गरीब बस्तियों के लोग शामिल हैं. बढ़ते समुद्री स्तर से यह खतरा और बढ़ेगा.
डॉयचे वैले पर आमिर अंसारी की रिपोर्ट –
एक ताजा शोध में कहा गया है कि मुंबई में जलवायु परिवर्तन से मॉनसूनी बारिश और घातक हो रही है. हर साल हजारों जानें जाती हैं, जिनमें ज्यादातर गरीब बस्तियों के लोग शामिल हैं. बढ़ते समुद्री स्तर से यह खतरा और बढ़ेगा.
शिकागो यूनिवर्सिटी के ताजा शोध में कहा गया कि मुंबई में जलवायु परिवर्तन से मॉनसूनी बारिश और घातक हो रही है. इस कारण हर साल हजारों गरीबों की जान जा रही है.
भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में जलवायु परिवर्तन के कारण मॉनसूनी बारिश और बाढ़ अब पहले से कहीं अधिक घातक साबित हो रही है, खासकर गरीब आबादी के लिए. यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, समुद्र-स्तर में वृद्धि और भारी बारिश के चलते मुंबई में बाढ़ का खतरा लगातार बढ़ रहा है.
रिपोर्ट में 2.2 करोड़ की आबादी वाले इस महानगर के विस्तृत आंकड़ों का विश्लेषण कर यह अनुमान लगाया गया कि बारिश और बाढ़ का मृत्यु दर पर कितना असर पड़ता है. शोध में पाया गया कि बस्तियों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, क्योंकि उनके पास सुरक्षित आवास और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है.
विशेषज्ञों का कहना है कि मुंबई का यह संकट दुनिया के अन्य तटीय महानगरों के लिए भी चेतावनी है. जैसे-जैसे धरती गर्म हो रही है, भारी बारिश और समुद्र-स्तर में बढ़ोतरी से जकार्ता, मनीला और लागोस जैसे शहरों में भी सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर खतरे मंडरा रहे हैं.
क्यों बढ़ रहा खतरा?
दक्षिण एशिया की वार्षिक मॉनसूनी बारिश एक अरब से अधिक लोगों की जीवनरेखा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन इसे लगातार अनियमित और घातक बना रहा है. खराब बुनियादी ढांचे के कारण इसका असर और भी गंभीर हो जाता है, जिससे बाढ़ और जलभराव जैसी आपदाएं आम हो गई हैं.
विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई में बारिश से होने वाली मौतों की संख्या बढ़ रही है. समुद्र-स्तर में वृद्धि और भारी वर्षा के चलते भारत की वित्तीय राजधानी में बाढ़ का खतरा लगातार बढ़ रहा है, जो गरीब और असुरक्षित आबादी के लिए बड़ा संकट बन गया है.
स्थ्य और बुनियादी ढांचे की चुनौतियां
रिपोर्ट में बताया गया कि मुंबई में बारिश से होने वाली बाढ़ गरीबों, छोटे बच्चों और महिलाओं जैसे कमजोर वर्गों पर सबसे ज्यादा असर डाल रही है. शोधकर्ताओं ने पाया कि मॉनसून के दौरान होने वाली कुल मौतों में लगभग आठ प्रतिशत मौतें बाढ़ के कारण होती हैं. 2006 से 2015 के बीच हर साल 2,300 से 2,700 लोगों की जान गई, जो कैंसर से होने वाली मौतों के बराबर है.
मुंबई तीन तरफ से समुद्र से घिरी है और हर साल भारी बारिश और ज्वार भाटे के मेल से गंभीर बाढ़ का सामना करती है. जब तेज बारिश के साथ ज्वार भाटा आता है, तब हालात सबसे घातक हो जाते हैं. शहर का खराब ड्रेनेज सिस्टम इस संकट को और बढ़ा देता है.
नई दिल्ली, 14 नवंबर । केंद्र ने इंश्योरेंस कंपनियों और अस्पतालों से नेशनल हेल्थ क्लेम एक्सचेंज में शामिल होने में तेजी लाने, स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल तैयार करने और निर्बाध कैशलेस क्लेम प्रोसेसिंग जैसे उपायों को तेजी से लागू करने को कहा है, जिससे कि स्वास्थ्य सेवा को किफायती और सभी की पहुंच में लाया जा सके। यह जानकारी शुक्रवार को आधिकारिक बयान में दी गई। वित्तीय सेवा विभाग के सचिव एम. नागराजू ने इंश्योरेंस कंपनियों और अस्पतालों के साथ एक बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें स्वास्थ्य क्षेत्र में महंगाई और बढ़ते हुई प्रीमियम लागत जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई।
इस बैठक को जनरल इंश्योरेंस काउंसिल, एसोसिशएन ऑफ हेल्थेकेयर प्रोवाइडर्स इन इंडिया (एएचपीआई), मैक्स हेल्थकेयर,फोर्टिस हेल्थकेयर, अपोलो हॉस्पिटल्स के प्रतिनिधि और इंश्योरेंस कंपनियां जैसे न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, स्टार हेल्थ इंश्योरेंस और बजाज एलियांज जनरल इंश्योरेंस कंपनी के प्रतिनिधि शामिल हुए। उन्होंने कहा कि सभी इंश्योरेंस कंपनियों के पास स्टैंडर्ड हॉस्पिटल पैनल नियम होने चाहिए, जिससे सभी पॉलिसीहोल्डर्स के पास लगातार कैशलेस इलाज तक पहुंच की सुविधा उपलब्ध हो। इससे हॉस्पिटल के प्रशासन पर दबाव भी कम होगा और संचालन आसान हो जाएगा। वित्तीय सेवा विभाग के सचिव ने कहा कि इंश्योरेंस कंपनियों को पॉलिसीहोल्डर्स को बेहतर सेवा उपलब्ध करानी चाहिए और क्लेम में तेजी लानी चाहिए।
बैठक के दौरान उन्होंने आगे कहा कि हालांकि, मेडिकल महंगाई विभिन्न लागत कारकों से जुड़ी हुई है, फिर भी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी होल्डर्स के लिए बेहतर मूल्य सुनिश्चित करने हेतु पारदर्शिता और दक्षता लाने हेतु लागत नियंत्रण और मानकीकरण के माध्यम से हॉस्पिटल और इंश्योरेंस कंपनियों के बीच अधिक सहयोग आवश्यक है। इस बैठक में जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के महासचिव इंद्रजीत सिंह, अपोलो हॉस्पिटल्स की एमडी डॉ. सुनीता रेड्डी, इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स के एमडी शिवकुमार पट्टाभिरामन, मैक्स हेल्थकेयर के सीएमडी अभय सोई, एएचपीआई के महानिदेशक डॉ. गिरधर जे. ज्ञानी, निवा बूपा हेल्थ इंश्योरेंस के सीईओ कृष्णन रामचंद्रन, स्टार हेल्थ इंश्योरेंस ईडी और सीओओ अमिताभ जैन, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी की महाप्रबंधक मीरा पार्थसारथी और अन्य पक्षकार शामिल थे। - (आईएएनएस)
नई दिल्ली, 14 नवंबर । एनडीए के मुख्य घटक दल जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने बिहार विधानसभा चुनाव में मतगणना के दौरान आए रुझानों पर उत्साह व्यक्त किया है। साथ ही पार्टी का मानना है कि यह बिहार की महिलाओं के विश्वास की जीत है। बता दें कि शुक्रवार सुबह 8 बजे से विधानसभा चुनाव को लेकर शुरुआती रुझान आने लगे थे। 243 विधानसभा सीटों पर आए रुझानों में एनडीए को 200 प्लस सीटों का बहुमत मिल रहा है। हालांकि, अभी पूरी तस्वीर साफ नहीं हुई है। लेकिन, राजनीतिक पंडित मानते हैं कि 20 साल नीतीश कुमार ने बिहार का नेतृत्व किया, उसके बावजूद इस तरह का जनादेश मिलना अपने आप में ऐतिहासिक है। चुनाव में मिले ऐतिहासिक रुझान को लेकर जदयू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किया।
पोस्ट में लिखा, “जीता है बिहार की महिलाओं का विश्वास, जीता है एनडीए, जीता है बिहार।“ जदयू ने लिखा, “नीतीश कुमार ने जंगलराज, भ्रष्टाचार, परिवारवाद और विपक्ष के अहंकार, इन सबको बिहार की राजनीति की सीमा के बाहर धकेल दिया है। यही है सुशासन का असली प्रभाव और यही है बिहार का आत्मविश्वास।“ जदयू ने एक अन्य पोस्ट में लिखा, “आज विपक्ष की बकवास हार रही है, बिहार का विकास जीत रहा है। आज कोई एक नहीं, पूरा बिहार जीत रहा है।“ बता दें कि बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को मिले प्रचंड बहुमत से भाजपा-जदयू, लोजपा(रामविलास) के पार्टी ऑफिस में जीत की लहर देखने को मिल रही है। यहां पर सुबह से ही कार्यकर्ता जश्न मना रहे हैं। एक दूसरे को मिठाई खिलाने का दौर जारी है। पटाखे छोड़े गए, होली खेली गई। जदयू नेताओं ने कहा कि आज पूरा बिहार दीपावली मना रहा है। बिहार विधानसभा चुनाव में 243 सीटों पर दो चरण में मतदान हुए, 6 नवंबर को पहले चरण के लिए मतदान किया गया। दूसरे चरण के लिए 11 नवंबर को मतदान संपन्न हुआ। 14 नवंबर को जारी रुझानों में एनडीए को भारी बहुमत मिल रहा है। --(आईएएनएस)
नई दिल्ली, 14 नवंबर । केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने 31.60 करोड़ रुपए के बैंक धोखाधड़ी मामले में आरोपी राजेश बोथरा को गिरफ्तार किया है। राजेश बोथरा ने कंपनी फ्रॉस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर एंड एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड (एफआईईएल) और उसके निदेशकों के साथ मिलकर साजिश में सक्रिय भूमिका निभाई थी। सीबीआई ने शुक्रवार को प्रेस जानकारी दी कि आरोपी राजेश बोथरा को गुरुवार को गिरफ्तार किया गया। आरोपी के भारत आने और दिल्ली स्थित एयरो सिटी के होटल अंदाज एंड हयात रेजिडेंस में होने की सूचना मिली थी। इस पर तुरंत कार्रवाई करते हुए जांच एजेंसी ने आरोपी को गिरफ्तार किया।
केंद्रीय जांच एजेंसी ने बताया कि पीएनबी ने फ्रॉस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर एंड एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड (एफआईईएल) कंपनी और उसके डायरेक्टर समेत कई लोगों के खिलाफ शिकायत दी थी और आरोप लगाए कि बैंक से एफएलसी सीमा का लाभ उठाकर 31.60 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी की गई। इस शिकायत के आधार पर सीबीआई ने मुकदमा दर्ज किया था। सीबीआई के अनुसार, जांच से पता चला कि आरोपी राजेश बोथरा ने एफआईईएल की अन्य कंपनियों के साथ बिक्री-खरीद में लेनदेन को गलत तरीके से दर्शाकर फर्जी बिल ऑफ लैडिंग उपलब्ध कराए। एफआईईएल की ओर से ये फर्जी बिल ऑफ लैडिंग बैंक में दिए गए, जिससे एफआईईएल को एलसी की आय का गबन करने में मदद मिली, जिससे पीएनबी (ई-ओबीसी) को लगभग 32 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।
जांच से पता चला है कि अन्य कंपनियों को वास्तव में राजेश बोथरा की ओर से नियंत्रित और संचालित किया जा रहा था और कोई वास्तविक व्यवसाय या माल की आवाजाही नहीं हुई थी। राजेश बोथरा लखनऊ में सीबीआई और एसीबी के अन्य मामलों में भी आरोपी है, जिनमें अन्य आरोपियों के साथ उसके खिलाफ भी आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है। सीबीआई के अनुसार, आरोपी राजेश बोथरा अन्य मामलों की जांच में कभी शामिल नहीं हुआ और न ही मुकदमे के दौरान पेश हुआ। सीबीआई ने एक बयान में कहा कि वह कानूनी प्रक्रिया से बच नहीं पाएगा। आरोपी राजेश बोथरा की गिरफ्तारी से उसकी पूछताछ सुनिश्चित होगी और निचली अदालतों में पेश किया जाएगा। --(आईएएनएस)
नई दिल्ली, 14 नवंबर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 नवंबर को गुजरात के दौरे पर रहेंगे। सुबह लगभग 10 बजे, प्रधानमंत्री सूरत में निर्माणाधीन बुलेट ट्रेन स्टेशन का दौरा करेंगे और मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर (एमएएचएसआर) की प्रगति की समीक्षा करेंगे। यह भारत की सबसे महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में से एक है और देश के हाई-स्पीड कनेक्टिविटी के युग में प्रवेश का प्रतीक है। मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल कोरिडोर लगभग 508 किलोमीटर लंबा है। इसमें 352 किलोमीटर हिस्सा गुजरात और दादरा एवं नगर हवेली में, जबकि 156 किलोमीटर हिस्सा महाराष्ट्र में आता है।
यह कोरिडोर साबरमती, अहमदाबाद, आणंद, वडोदरा, भरूच, सूरत, बिलिमोरा, वापी, बोइसर, विरार, ठाणे और मुंबई जैसे प्रमुख शहरो को जोड़ेगा, जो भारत के परिवहन बुनियादी ढाँचे में एक परिवर्तनकारी कदम होगा। अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उन्नत इंजीनियरिंग तकनीकों से निर्मित इस परियोजना में 465 किमी मार्ग (मार्ग का लगभग 85 प्रतिशत) पुलों पर निर्मित है, जिससे न्यूनतम भूमि व्यवधान और बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित होती है। अभी तक 326 किलोमीटर का काम पूरा हो चुका है और 25 में से 17 नदी पुलों का निर्माण पूरा किया जा चुका है। परियोजना पूरी होने पर बुलेट ट्रेन से मुंबई से अहमदाबाद की यात्रा का समय घटकर करीब दो घंटे का रह जाएगा। इससे यात्रा और अधिक तेज, सहज और आरामदायक होगी जो एक क्रांतिकारी बदलाव होगा।
इस परियोजना से पूरे कॉरिडोर पर व्यापार, पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। सूरत-बिलिमोरा खंड, जो लगभग 47 किलोमीटर लंबा है, निर्माण के अंतिम चरण में है, जहां सिविल कार्य और ट्रैक बिछाने का काम पूरा हो चुका है। सूरत स्टेशन का डिजाइन शहर के विश्व प्रसिद्ध हीरा उद्योग से प्रेरित है, जो इसकी भव्यता और दक्षता दोनों को दर्शाता है। स्टेशन को यात्री सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है, जिसमें विशाल प्रतीक्षालय, शौचालय और खुदरा दुकानें शामिल हैं। यह सूरत मेट्रो, सिटी बसों और भारतीय रेलवे नेटवर्क के साथ निर्बाध मल्टी-मॉडल कनेक्टिविटी भी प्रदान करेगा। --(आईएएनएस)
नई दिल्ली, 14 नवंबर । केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने शुक्रवार को जानकारी देते हुए बताया कि उन्होंने कोरिया की प्रमुख शिपिंग कंपनियों के सीईओ के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की। इस बैठक में केंद्रीय मंत्री पुरी और कोरिया की प्रमुख कंपनियों के प्रमुखों के बीच इस विषय को लेकर चर्चा हुई कि एनर्जी और शिपिंग किस प्रकार एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में अभिन्न अंग के रूप में महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, "आज कोरिया की प्रमुख शिपिंग कंपनियों के प्रमुखों के साथ एक बेहद उपयोगी बैठक हुई। मेरी कोरिया ओशन बिजनेस कॉर्पोरेशन (केओबीसी) के सीईओ एन ब्युंग गिल, एसके शिपिंग के सीईओ किम सुंग इक, एच-लाइन शिपिंग के सीईओ सियो म्युंग द्यूक और पैन ओशियन के वाइस प्रेसिडेंट सुंग जे योंग से मुलाकात हुई।" केंद्रीय मंत्री पुरी ने इस बैठक को लेकर जानकारी देते हुए बताया कि हमने चर्चा की कि कोरिया की एडवांस शिपबिल्डिंग टेक्नोलॉजी और भारत का मैन्युफैक्चरिंग बेस और कम प्रोडक्शन लागत किस प्रकार साथ मिलकर एक पारस्परिक रूप से लाभकारी पार्टनरशिप को लीड कर सकते हैं, जो कि शिप को लेकर हमारी बढ़ती घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ ग्लोबल जरूरतों को भी पूरा करने में अहम होगी।
उन्होंने एक्स पर भारत को लेकर कहा कि हमारा 150 अरब डॉलर से अधिक मूल्य का क्रूड और गैस आयात समुद्री मार्ग से होता है, जो कि हमारी एनर्जी और शिपबिल्डिंग वेसल की मांग के एक बड़े पैमाने को दर्शाते हैं। इसके अलावा, केंद्रीय मंत्री पुरी ने कहा कि ऑयल और गैस सेक्टर अकेले भारत के कुल व्यापार में वॉल्यूम को लेकर लगभग 28 प्रतिशत का योगदान देते हैं, जो कि इसे हमारे पोर्ट पर एक सिंगल लार्जेस्ट कमोडिटी बनाता है। बावजूद इसके इस कार्गो के केवल 20 प्रतिशत को भारतीय ध्वज वाले या भारतीय स्वामित्व वाले जहाजों पर ले जाया जाता है।
केंद्रीय मंत्री पुरी ने लिखा, "भारत की क्रूड ऑयल, एलपीजी, एलएनजी और ईथेन को लेकर मांग तेजी से बढ़ रही है। अकेले ओएनजीसी को लेकर अनुमान है कि इसे 2034 तक 100 ऑफोशोर सर्विस और प्लेटफॉर्म सप्लाई वेसल की जरूरत होगी। कुल मिलाकर यह दिखाता है कि ग्लोबल लीडर्स के साथ पार्टनरशिप कर भारत में ही शिप बनाना हमारी अहम जरूरत क्यों बनी हुई है।" --- (आईएएनएस)
संभल, 14 नवंबर । संभल के एमपी–एमएलए कोर्ट में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के विवादित बयान को लेकर दायर की गई याचिका खारिज होने के बाद अब यह मामला हाईकोर्ट में पहुंच गया है। हिंदू रक्षा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष सिमरन गुप्ता ने शुक्रवार को हाईकोर्ट में नई याचिका दाखिल की, जिसमें उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग दोहराई।
इस याचिका में कहा गया है कि राहुल गांधी का 'इंडियन स्टेट' वाला बयान संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अविश्वास पैदा करता है, इसलिए इस पर उचित एवं कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। सिमरन गुप्ता ने कहा कि वह न्याय की उम्मीद छोड़ने वाले नहीं हैं और उनकी कानूनी लड़ाई अब हाईकोर्ट में जारी रहेगी। यह पूरा विवाद उस बयान से जुड़ा है जो राहुल गांधी ने 15 जनवरी 2025 को एक कार्यक्रम के दौरान दिया था। इसमें उन्होंने कहा था कि हमारी लड़ाई भाजपा या आरएसएस से नहीं, बल्कि इंडियन स्टेट से है।
राहुल गांधी के इस बयान के बाद विवाद छिड़ गया। कई नेताओं ने इसकी निंदा की। हिंदू रक्षा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष सिमरन गुप्ता ने इसे राष्ट्र-विरोधी और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला बयान बताया। इसके बाद उन्होंने 23 जनवरी 2025 को संभल स्थित एमपी-एमएलए कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। करीब दस महीनों तक चली सुनवाई के दौरान पक्ष और विपक्ष दोनों ओर से विस्तृत बहस हुई। अदालत ने साक्ष्यों, आरोपों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद 7 नवंबर को यह याचिका खारिज कर दी थी, जिससे राहुल गांधी को बड़ी राहत मिली थी। सिमरन गुप्ता ने संभल के एमपी–एमएलए कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि यहां से न्याय मिलेगा। हाईकोर्ट में इस केस की अगली सुनवाई को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। --(आईएएनएस)
प्रदूषित हवा में सांस लेने से गर्भ में बच्चे का स्वास्थ्य बिगड़ता है. इससे समय से पहले जन्म और गर्भपात का खतरा बढ़ रहा है.
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना की रिपोर्ट -
भारत में वायु प्रदूषण का गर्भावस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है. इस हवा में सांस लेने का असर गर्भवती महिलाओं और उनके बच्चे की सेहत पर सीधे पड़ता है. लैंसेट की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत और दक्षिण एशिया में वायु प्रदूषण, खासकर पीएम 2.5, के उच्च स्तर से गर्भपात और समय से पहले जन्म का खतरा बढ़ जाता है. हर साल लगभग तीन लाख से अधिक गर्भपात प्रदूषण के कारण हो रहे हैं.
बढ़ते प्रदूषण के चलते जन्म के समय बच्चे का वजन कम रह जाता हैं. आईआईटी दिल्ली और अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान (मुंबई) ने ब्रिटेन और आयरलैंड के संस्थानों के साथ मिलकर हाल ही में इस विषय पर अध्ययन किया है. स्टडी में पाया गया कि गर्भावस्था में पीएम 2.5 के अधिक संपर्क में आने से समय से पहले डिलीवरी का जोखिम लगभग 70 प्रतिशत तक बढ़ जाता है. वहीं जन्म के समय बच्चे का वजन कम होने का जोखिम करीब 40 प्रतिशत तक ज्यादा होता है. ऐसे बच्चे, जो प्रदूषित हवा में पलते हैं, उनके विकास में रुकावट आती है. बच्चों को आगे चलकर सांस की परेशानी, एनीमिया और दिल की बीमारी हो सकती है.
क्या प्रदूषण कम कर रहा है भारत में धूप के घंटे?
उत्तर भारत के बिहार, दिल्ली, पंजाब और हरियाणा जैसे इलाकों में पीएम 2.5 प्रदूषकों का स्तर बहुत ज्यादा है. जबकि देश के दक्षिण और पूर्वोत्तर हिस्सों में यह कम है. यही वजह है कि उत्तर भारत के राज्यों में समय से पहले जन्म के मामलों की संख्या भी अधिक पाई गई. हिमाचल प्रदेश में 39 प्रतिशत, उत्तराखंड में 27 प्रतिशत, राजस्थान में 18 प्रतिशत और दिल्ली में 17 प्रतिशत बच्चों का जन्म समय से पहले हुआ. वहीं पंजाब ऐसा राज्य रहा, जिसमें जन्म के समय सबसे ज्यादा बच्चों का वजन औसत से कम था.
पीएम 2.5 क्या होता है?
हवा में धूल हमें दिखती है लेकिन पीएम 2.5 बहुत छोटे होते हैं. पीएम का अर्थ है पार्टिकुलेट मैटर और 2.5 मतलब 2.5 माइक्रोन, उसका आकार बताता है. ये इतने बारीक होते हैं कि आंखों से नहीं दिखते. ये इंसानी बाल की मोटाई से लगभग तीस गुना छोटे होते हैं.
फैक्ट्रियों और गाड़ियों के धुंए, लकड़ी, कचरा या पराली जलाने से ये कण हवा में फैल जाते हैं. सांस लेने के साथ ये हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं. ये फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं और खून में भी मिल सकते हैं. इससे सांस की परेशानी, दिल की बीमारी, स्ट्रोक और बच्चों के विकास में दिक्कत जैसी समस्याएं हो सकती हैं.
आईआईटी दिल्ली के अध्ययन से पता चलता है कि गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में प्रदूषण के संपर्क में आने से बच्चे का वजन कम हो सकता है. साथ ही पीएम 2.5, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और ओजोन के अधिक स्तर से बच्चे का जन्म 37 हफ्ते तक पहले हो सकता है.
मां और बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ता है गंभीर असर
प्रदूषण का असर मां से कहीं ज्यादा बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ता है. प्रदूषित हवा में पीएम 2.5 जैसे बहुत बारीक कण और कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड जैसी गैसें होती हैं. सांस लेते समय ये गंदी हवा गर्भवती महिला के शरीर में प्रवेश करती है. जिससे ये कण फेफड़ों से होकर खून में पहुंच जाते हैं. गर्भ में पल रहे बच्चे को बढ़ने के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन चाहिए होती है. ये प्रदूषक खून में ऑक्सीजन की मात्रा घटा देते हैं. ऑक्सीजन की कमी से बच्चे का विकास रुक सकता है.
नई दिल्ली के बीएलके मैक्स अस्पताल में स्त्रीरोग विभाग की निदेशक डॉ तृप्ति शरण ने डीडब्ल्यू को बताया कि डॉक्टर, गर्भवती महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान ड्रग्स या सिगरेट ना लेने की सलाह देते हैं. लेकिन प्रदूषण इससे भी ज्यादा हानिकारक हो सकता है. प्रदूषक, हवा के रास्ते सीधे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं. ये मां और बच्चे दोनों को नुकसान पहुंचाता है.
डॉ. तृप्ति कहती हैं, "प्लेसेंटा मां और बच्चे के बीच एक कनेक्शन होता है. इसके जरिए ऑक्सीजन और पोषण बच्चे तक पहुंचता है. जिससे बच्चा सही ढंग से बढ़ सके. पीएम 2.5 जैसे प्रदूषित कण प्लेसेंटा के जरिए बच्चे तक पहुंच जाते हैं. प्लेसेंटा को भी नुकसान होता है. प्लेसेंटा के ठीक से काम ना करने पर बच्चे को जरूरी ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं मिलते. मां का गर्भाशय जल्दी सिकुड़ने लगता है. जिससे बच्चे का जन्म समय से पहले हो जाता है."
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ करुणाकर मरीकिनति भारत और ब्रिटेन में प्रैक्टिस करते हैं. वह डीडब्ल्यू से बातचीत में बताते हैं कि गर्भावस्था के दौरान पीएम 2.5 और अन्य प्रदूषकों के संपर्क में आने से मां के शरीर का मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है. महिलाओं में हाइपरटेंशन, प्री‑एक्लेम्सिया, तनाव, एंग्जायटी और अस्थमा जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं. इनसे भी बच्चे तक पहुंचने वाली ऑक्सीजन की आपूर्ति पर दुष्प्रभाव पड़ता है. ये प्रभाव विशेष रूप से दूसरी और तीसरी तिमाही में अधिक दिखाई देता है. उस समय भ्रूण का तेज विकास और अंगों का निर्माण हो रहा होता है.
जन्म के बाद बच्चे का स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है
भारत की तरह अन्य देशों में भी प्रदूषण बड़ी समस्या है. प्रदूषण बच्चे के लिए दीर्घकालिक समस्याएं पैदा कर सकता है. इसलिए गर्भावस्था के दौरान मां का विशेष ध्यान रखने की जरुरत है.
डॉ करुणाकर मरीकिनति कहते हैं, "ऐसे वातावरण में पैदा होने वाले बच्चों को जन्म के बाद भी सांस की बीमारियां, फेफड़ों और दिल की समस्याएं, विकास में रुकावट और एनीमिया जैसी परेशानियां हो सकती हैं. इसलिए गर्भवती महिलाओं को अपना विशेष ध्यान रखने की सलाह दी जाती है. उन्हें सबसे अच्छा फेस मास्क पहनना चाहिए. प्रदूषित हवा में कम समय बिताना चाहिए. साथ ही, ऐसे क्षेत्रों में जाने से बचना चाहिए जहां हवा ज्यादा गंदी है. अगर संभव हो तो सुरक्षित और साफ वातावरण के लिए गांव जैसी किसी जगह पर जाकर रहना सही रहेगा.”
हालांकि सभी प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए गांव या साफ जगह पर जाकर रहना विकल्प नहीं हो सकता. खासकर तब जब भारत के सुदूर इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं उतनी कारगर नहीं हैं.
पुरानी कारों को लेकर दूसरे देशों में क्या हैं नियम
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में एंड ऑफ लाइफ व्हीकल पर रोक लगाकर कार मालिकों को राहत दी. कोर्ट ने दिल्ली में पुरानी गाड़ियों के मालिकों के खिलाफ सख्ती पर फिलहाल रोक लगा दी. जानिए, दूसरे देशों में क्या हैं नियम.
दिल्ली-एनसीआर के लिए क्या थे नियम
जुलाई 2025 में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने नो फ्यूल फॉर ओल्ड व्हीकल पॉलिसी का एलान किया था. सरकार ने 1 जुलाई, 2025 से 15 साल से अधिक पुराने पेट्रोल और 10 साल से अधिक पुराने डीजल वाहनों को ईंधन नहीं देने का फैसला किया. इसका उद्देश्य वायु प्रदूषण को कम करना था. लोगों के विरोध के बाद इस नीति पर रोक लगा दी गई.
अलग-अलग देशों में अलग-अलग नियम
कारों की उम्र को लेकर अलग-अलग देशों के अपने नियम हैं. कार कितनी पुरानी है और वह सड़क पर चलने लायक है या नहीं उसकी फिटनेस तय होने के बाद वह सड़क पर फर्राटा भर सकती है. रखरखाव के आधार पर यह अवधि बढ़ भी सकती है.
जापान
जापान टोयोटा, निसान, सुजुकी और होंडा जैसी कारों को बनाता है और उसकी कारें दुनिया भर में बिकती है. जापान में कारों की औसत उम्र आठ से नौ साल है. अच्छे रखरखाव के साथ वहां के लोग अपनी कार को 13 से 15 साल तक चला सकते हैं. यहां कारों को कचरे में डालने से पहले उसकी स्थिति की जांच की जाती है.
अमेरिका
अमेरिका में पुरानी गाड़ियों के लिए अलग से कोई संघीय कानून नहीं है. इस मामले में पर्यावरण से जुड़े नियमों और राज्यों के नियमों के आधार पर कार्रवाई होती है. कुछ राज्यों में यहां साल में दो बार और कुछ में एक बार जांच करानी होती है. हालांकि कुछ राज्यों में यह नहीं होता बल्कि सिर्फ प्रदूषण जांच की जाती है. 25 साल से ज्यादा पुरानी गाड़ियों को क्लासिक का दर्जा मिलता है.
चीन
चीन में पुरानी गाड़ियों की औसत उम्र लगभग 12 साल है. चीन में गाड़ियों का नियमित रूप से फिटनेस टेस्ट किया जाता है. चीन में 10 साल से ज्यादा पुरानी कार को पुरानी कार मान लिया जाता है.
ब्रिटेन
ब्रिटेन में कारों की औसत उम्र लगभग नौ साल है. 2019 में यह आठ साल थी. यहां एक तिहाई से ज्यादा कारें 12 साल से अधिक पुरानी है. यहां नई गाड़ी खरीदना काफी महंगा है इसलिए लोग अपनी गाड़ियों को अच्छे तरीके से मेनटेन करते हैं.
यूरोपीय संघ
यूरोपीय संघ के देशों में अमूमन सभी गाड़ियों को पहली बार 4 साल और उसके बाद हर दो साल पर उनकी जांच करानी पड़ती है. इन नियमों का पालन करते हुए लंबे समय तक कार चलाई जा सकती है. कुछ देशों में यह नियम 3 साल के बाद हर दूसरे साल या फिर हर साल जांच कराने का भी है.
फ्रांस
फ्रांस में कारों के लिए कोई आयु प्रतिबंध नहीं है, लेकिन यूरो 6 मानकों को पूरा करना होगा. हालांकि फ्रांस के कुछ शहरों में उत्सर्जन की वजह से पुराने वाहनों पर प्रतिबंध है.
आयरलैंड
आयरलैंड में पुरानी कारों पर कोई आयु प्रतिबंध नहीं है, लेकिन पुरानी कारों पर अधिक टैक्स लग सकता है.
जर्मनी
जर्मनी में कारों के शौकीनों की कमी नहीं है. इसलिए यहां लोग कई सालों तक कारों को अच्छी तरह से रखते हैं. यहां पर 30 साल से अधिक पुराने वाहनों को "ओल्डटाइमर" (विंटेज या क्लासिक कारें) माना जाता है और उन्हें एच-प्लेट ("ऐतिहासिक" के लिए) के साथ रजिस्ट्रेशन किया जा सकता है, जो टैक्स का भी लाभ देता है. साथ ही ऐसे इलाकों में प्रवेश की अनुमति देता है जो पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील है.
नई दिल्ली, 14 नवंबर । बिहार विधानसभा चुनाव में 243 सीटों पर आए रुझानों में एनडीए बड़ी जीत की ओर बढ़ रही है, जबकि महागठबंधन को करारा झटका लगने जा रहा है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, भाजपा 90 और जेडीयू 80 सीटों पर आगे चल रही है। वहीं राजद 28 और कांग्रेस 5 सीटों पर आगे है। वहीं रुझानों को लेकर अब विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। रुझान में एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिलने पर समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा और चुनाव आयोग पर निशाना साधा और कहा कि बिहार चुनाव के परिणामों ने एसआईआर के खेल को उजागर कर दिया है। इनकी चुनावी साजिश का अब भंडाफोड़ हो चुका है। उन्होंने कहा कि भाजपा दल नहीं छल है।
अखिलेश यादव ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ''बिहार में जो खेल एसआईआर ने किया है वो पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, यूपी और बाकी जगह पर अब नहीं हो पाएगा, क्योंकि इस चुनावी साजिश का अब भंडाफोड़ हो चुका है। अब आगे हम ये खेल इनको नहीं खेलने देंगे। सीसीटीवी की तरह हमारा ‘पीपीटीवी’ मतलब ‘पीडीए प्रहरी’ चौकन्ना रहकर भाजपाई मंसूबों को नाकाम करेगा। भाजपा दल नहीं छल है।'' बिहार विधानसभा चुनाव पर कांग्रेस नेता उदित राज ने आईएएनएस से बातचीत करते हुए कहा, "यह एनडीए की नहीं, बल्कि एसआईआर और चुनाव आयोग की जीत है। इसमें वोट चोरी हुई है। हरियाणा और महाराष्ट्र में इन्होंने वोट चोरी करके सरकार बनाई।
बिहार में हमने आखिर तक आपत्ति जताई, लेकिन चुनाव आयोग ने लिखित में नहीं दिया। ऐसे में नतीजे तो ऐसे ही आने ही थे।" छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेश बघेल ने एक्स पोस्ट में लिखा, ''मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को बिहार चुनाव में जीत की बधाई। आपने बहुत मेहनत की। 64 लाख मतदाताओं के नाम काटे। 16 लाख नए मतदाताओं ने आवेदन किया आपने 21 लाख नए नाम जोड़ लिए। धांधली पर धांधली। बेहिसाब धांधली। भाजपा को आपसे अच्छा सहयोगी नहीं मिल सकता।'' वहीं शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने रुझानों में एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिलने पर भाजपा और चुनाव आयोग पर हमला बोला। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ''बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम से चौंकने की जरूरत नहीं है। चुनाव आयोग और भाजपा मिलकर जो राष्ट्रीय कार्य कर रहे थे, उसे देखते हुए इससे अलग नतीजे आना संभव नहीं था। बिल्कुल महाराष्ट्र जैसा पैटर्न। जिस गठबंधन का सत्ता में आना तय था, वह 50 के अंदर ही खत्म हो गया।'' -(आईएएनएस)
जयपुर, 14 नवंबर । राजस्थान में सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा को झटका लगा है। बारां जिले के अंतर्गत आने वाली अंता विधानसभा सीट पर उपचुनाव में कांग्रेस ने बढ़त हासिल की है। अंता विधानसभा उपचुनाव के लिए सुबह 8 बजे मतगणना शुरू हुई। 20 में से अब तक 17 राउंड की मतगणना के बाद कांग्रेस उम्मीदवार प्रमोद जैन 'भाया' ने महत्वपूर्ण बढ़त बनाई है। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा के मोरपाल सुमन को 14,057 वोटों से पीछे छोड़ा। कांग्रेस उम्मीदवार प्रमोद जैन 'भाया' को 17वें राउंड तक 63,381 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार मोरपाल सुमन 49,324 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर हैं। निर्दलीय उम्मीदवार नरेश मीणा 45,138 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर हैं। अंता विधानसभा क्षेत्र में कुल 15 उम्मीदवार मैदान में हैं।
इस बीच, कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जश्न का माहौल है और पटाखे फोड़े गए हैं। मतगणना शुरू होने से पहले, कांग्रेस प्रत्याशी अपनी पत्नी के साथ एक गौशाला गए और अपनी जीत का विश्वास जताते हुए सेवा की। कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने रुझानों में कांग्रेस की जीत पर खुशी जताई। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा, "अंता उपचुनाव में कांग्रेस को विजय दिलाने के लिए मैं सभी मतदाताओं का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं और नवनिर्वाचित विधायक प्रमोद जैन भाया को हार्दिक बधाई देता हूं।" उन्होंने लिखा, "अंता की जीत ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में आमजन का विश्वास एक बार फिर मजबूत किया है।
भाजपा सरकार पिछले दो साल की अपनी एक भी ठोस उपलब्धि बताने में नाकाम रही है। हमारी लोकप्रिय जनहितकारी योजनाओं को कमजोर करने के कारण आम आदमी बेहद परेशान है और यह परिणाम कांग्रेस सरकार की ओर से पूर्व में चलाई गई योजनाओं पर जनता की मुहर है।" अशोक गहलोत ने कहा कि इस परिणाम से लगता है कि मात्र दो साल में ही सरकार पर एंटी-इंकंबेंसी हावी हो गई है और यह सरकार अपने लिटमस टेस्ट में फेल साबित हुई है। बता दें कि यह सीट विधायक (भाजपा) कंवर लाल मीणा को एक आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद अयोग्य घोषित किए जाने के बाद खाली हुई थी। --(आईएएनएस)
नई दिल्ली, 14 नवंबर । भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी ने शुक्रवार को बिहार में वोट काउंटिंग के रुझानों में एनडीए की बढ़त का स्वागत करते हुए कहा कि ट्रेलर बता रहा है कि फिल्म क्या होने वाली है? उन्होंने कहा कि हमने विकास से संबंधित किसी भी काम के साथ कोई समझौता नहीं किया। प्रदेश के लोगों ने विकास की राजनीति को प्राथमिकता दी है। एनडीए जीत की ओर अग्रसर है। समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत के दौरान अपराजिता सारंगी ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्होंने बिहार में कई जगहों पर राजनीतिक स्थिति को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया, लेकिन बिहार की जनता ने उन्हें आखिरकार बता दिया कि आने वाले दिनों में स्थिति कैसी होने वाली है।
बिहार की जनता ने राहुल गांधी के एसआईआर के संबंध में किए गए दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि बिहार में आज शाम तक दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। वहीं, भाजपा प्रवक्ता जफर इस्लाम ने कहा कि प्रदेश में राजनीतिक स्थिति पूरी तरह से एनडीए के पक्ष में है। इस बात को बिल्कुल भी खारिज नहीं किया जा सकता है। एनडीए के लिए आने वाले दिनों में स्थिति सकारात्मक होती जाएगी, क्योंकि प्रदेश की जनता का आशीर्वाद प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ है। उन्होंने कहा कि निश्चित तौर पर इस बात पर खारिज नहीं किया जा सकता है कि प्रदेश का हर वर्ग प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पक्ष में खड़ा है। जनता आज की तारीख में एनडीए को जीतते देखना चाहती है, क्योंकि एनडीए ने अपने शासनकाल में विकास के लिए काम किया है। एनडीए ने अपने कार्यकाल में यह सुनिश्चित किया है कि किसी भी व्यक्ति के हित पर कुठाराघात न हो।
भाजपा प्रवक्ता जफर इस्लाम ने कहा कि दूसरी तरफ से जब हम जंगलराज को देखते हैं तो हमें समझ में आता है कि किस तरह से लोगों के हितों पर कुठाराघात किया जाता था। विकास से संबंधित कार्य ठप रहा करते थे, लेकिन आज स्थिति ऐसी नहीं है। पिछले दो दशकों में प्रदेश में विकास से संबंधित अनेक काम हुए हैं। ऐसी स्थिति में हर समझदार जनता एक ऐसी ही सरकार को चुनेगी, जो विकास को तवज्जो देगी। उन्होंने कहा कि विपक्ष के लोगों ने एसआईआर को लेकर लोगों के बीच में भ्रम फैलाने की कोशिश की, लेकिन ध्यान देने वाली बात है कि जमीन पर कोई भी व्यक्ति एसआईआर का विरोध करता हुआ नहीं दिखा। इससे यह साफ जाहिर होती है कि ये लोग सिर्फ अपनी हार की नैतिक जिम्मेदारी लेने से बचने के लिए एसआईआर का सहारा ले रहे थे। इसके अलावा और कुछ भी नहीं था। उन्होंने सवाल किया कि एसआईआर के तहत फर्जी मतदाताओं को चिन्हित किया जा रहा है।
जो मतदाता मर चुके हैं और जो वोट नहीं देने वाले हैं, अगर उनका नाम मतदाता सूची से हटाया जा रहा है तो इससे इन लोगों को दिक्कत क्यों हो रही है? इसके अलावा भाजपा प्रवक्ता रोहन गुप्ता ने वोट काउंटिंग में एनडीए की बढ़त को पिछले दो दशकों में सरकार की कार्यशैली की जीत बताया। उन्होंने कहा देश के सभी राजनीतिक दलों को यह सीख लेनी चाहिए कि आप बिना काम किए सत्ता में नहीं रह सकते हैं। अगर आप सत्ता में रहना चाहते हैं तो आपको लोगों के बीच में जाकर काम करना होगा। अगर आपको ऐसा लग रहा है कि आप बिना काम किए सत्ता में रह पाएंगे तो मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि यह आपकी गलतफहमी है, लिहाजा आप अपनी गलतफहमी दूर कर लें। उन्होंने कहा कि बिहार में नीतीश कुमार के शासनकाल में हर वर्ग के लिए काम किया गया। एनडीए ने एक टीम की तरह प्रदेश के विकास के लिए काम किया है और इसी का नतीजा है कि आज एनडीए जीत की ओर अग्रसर है। --(आईएएनएस)
जम्मू, 14 नवंबर । जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने नगरोटा विधानसभा सीट को बरकरार रखा है। शुक्रवार को मतगणना के बाद भाजपा की उम्मीदवार देवयानी राणा को नगरोटा उपचुनाव में विजेता घोषित किया गया। इस सीट पर कुल 10 प्रत्याशियों के बीच मुकाबला रहा। देवयानी राणा ने नगरोटा उपचुनाव में अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी, नेशनल पैंथर्स पार्टी के हर्ष देव सिंह को 24,647 वोटों के अंतर से हराकर जीत हासिल की। सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) पार्टी की उम्मीदवार शमीम बेगम लगभग 31,478 मतों के अंतर से तीसरे स्थान पर रहीं। भाजपा प्रत्याशी देवयानी राणा को उपचुनाव में 42,350 वोट मिले, जबकि पैंथर्स पार्टी के हर्ष देव सिंह के पक्ष में 17,703 और नेशनल कॉन्फ्रेंस की शमीम बेगम के पक्ष में 10,872 वोट पड़े।
नगरोटा में पार्टी उम्मीदवार की जीत की घोषणा के तुरंत बाद जम्मू में भाजपा खेमे में जश्न शुरू हो गया। देवयानी राणा पूर्व विधायक देवेंद्र सिंह राणा की बेटी हैं, जिन्होंने 2024 के विधानसभा चुनाव में नगरोटा सीट जीती थी। पिछले साल 31 अक्टूबर को देवेंद्र सिंह राणा के निधन के कारण नगरोटा में उपचुनाव कराए गए हैं। वहीं, जम्मू-कश्मीर के बडगाम विधानसभा क्षेत्र में अभी मतगणना जारी है। नौवें दौर की मतगणना के बाद पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के उम्मीदवार आगा सैयद मुंतजिर मेहदी अपने नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रतिद्वंद्वी आगा सैयद महमूद से 3,084 मतों से आगे चल रहे हैं। बडगाम सीट पर उपचुनाव नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के इस्तीफा देने के बाद कराए गए हैं।
उमर ने 2024 के विधानसभा चुनावों में दो सीटें (गांदरबल और बडगाम) जीती थीं। बाद में उन्होंने बडगाम सीट से इस्तीफा देकर गंदेरबल विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का फैसला किया। बता दें कि 90 सदस्यीय जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भाजपा के पास 29 सीटें हैं, जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास 41 सीटें हैं। बडगाम सीट जीतने की स्थिति में पीडीपी की संख्या बढ़कर 4 पहुंच जाएगी। --(आईएएनएस)
नई दिल्ली, 14 नवंबर । प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने रिलायंस एडीएजी ग्रुप के चेयरमैन अनिल डी.अंबानी को किसी भी तरह की वर्चुअल पेशी की अनुमति नहीं दी है। यह जानकारी शुक्रवार को सूत्रों की ओर से दी गई। अनिल डी.अंबानी को बैंक फ्रॉड मामले में दूसरे दौर की पूछताछ के लिए शुक्रवार (14 नवंबर) को ईडी के दिल्ली मुख्यालय में पेश होना था, लेकिन वह नहीं पहुंचे। हालांकि, उन्होंने वर्चुअल पेशी का प्रस्ताव रखा है। ईडी के सूत्रों के मुताबिक, जांच एजेंसी को ईमेल के माध्यम से वर्चुअल रूप से पेश होने की उनकी इच्छा की जानकारी मिली थी, लेकिन ईडी ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी है। अनिल डी. अंबानी की ओर से जारी एक बयान में कहा गया था कि वह सभी मामलों में ईडी के साथ सहयोग करने के लिए तैयार है और वे वर्चुअल माध्यम से पेश हो सकते हैं।
बयान में आगे कहा गया, "अनिल डी. अंबानी को ईडी की ओर से भेजा गया समन फेमा जांच से संबंधित है, न कि पीएमएलए के किसी मामले से इसका जुड़ाव है।" बयान में आगे कहा गया,"अनिल डी. अंबानी रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर के बोर्ड के सदस्य नहीं हैं। उन्होंने अप्रैल 2007 से मार्च 2022 तक लगभग पंद्रह वर्षों तक कंपनी में केवल एक गैर-कार्यकारी निदेशक के रूप में काम किया और कंपनी के डे-टू-डे मैनेजमेंट में कभी शामिल नहीं रहे।" ईडी ने समूह के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पूछताछ के लिए अनिल अंबानी को 14 नवंबर को फिर से तलब किया था।
अगस्त में ईडी मुख्यालय में कथित 17,000 करोड़ रुपए के ऋण धोखाधड़ी मामले में उनसे लगभग नौ घंटे तक कड़ी पूछताछ हुई थी। यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हुआ है जब ईडी ने सोमवार को नवी मुंबई स्थित धीरूभाई अंबानी नॉलेज सिटी में 4,462.81 करोड़ रुपए मूल्य की 132 एकड़ से अधिक जमीन को धन शोधन निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत अस्थायी रूप से कुर्क किया था। ईडी ने इससे पहले रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड (आरकॉम), रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड और रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड के बैंक धोखाधड़ी मामलों में 3,083 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की 42 संपत्तियां जब्त की थीं। --(आईएएनएस)
नई दिल्ली, 14 नवंबर । बिहार की 243 विधानसभा सीटों के लिए मतगणना जारी है। चुनाव आयोग के ताजा रुझानों के अनुसार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) बहुमत के आंकड़ों को पार करते हुए स्पष्ट दिख रहा है, जबकि विपक्ष का महागठबंधन पिछड़ता नजर आ रहा है। इस बीच भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष एवं कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर लगातार चुनाव हारने को लेकर तंज कसा। अमित मालवीय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट कर लिखा, "राहुल गांधी! एक और चुनाव, एक और हार!
अगर चुनावी निरंतरता के लिए कोई पुरस्कार होता, तो वह सभी पर भारी पड़ते। इस दर पर, असफलताएं भी सोच रही होंगी कि वह उन्हें इतनी विश्वसनीयता से कैसे पा लेते हैं।" मालवीय ने राहुल गांधी के नेतृत्व में 95 हार का जिक्र किया। उन्होंने बताया, "राहुल गांधी की 95 हार, हालांकि कई लोग उन्हें 9 से 5 बजे तक दोषारोपण करने वाला राजनेता कहेंगे, लेकिन राहुल गांधी दो दशकों में 95 चुनावी हार झेल चुके हैं, जो एक सदी से पांच कम है। क्या भारत की संस्थाओं पर यह हमला इस चांदी के चम्मच वाले उत्तराधिकारी की ध्यान भटकाने की चाल है?"
मालवीय ने राज्य चुनावों के ग्राफिक्स भी पोस्ट किए, जिसमें दिखाया गया है कि राहुल गांधी के चुनावी राजनीति में प्रवेश करने के बाद कांग्रेस पार्टी कब और कहां चुनाव हारी। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए मतगणना जारी है। चुनाव आयोग के ताजा रुझानों के मुताबिक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) बहुमत के लिए आवश्यक आंकड़े 122 को आसानी से पार करते हुए दिख रही है। रुझानों में भाजपा ने बाकी सभी पार्टियों की तुलना में बढ़त बनाई हुई है। चुनाव आयोग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक भाजपा सर्वाधिक 88 सीटों पर आगे है। दूसरे नंबर की पार्टी नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) है, जो 79 सीटों पर आगे चल रही है। इसके अलावा प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) 32 सीटों पर आगे चल रही है।
चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) 21 सीटों पर आगे चल रही है। देश की मुख्य विपक्षी पार्टी एवं बिहार में विपक्षी महागठबंधन का प्रमुख दल कांग्रेस मात्र 4 सीटों पर आगे है। --(आईएएनएस)
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से क़रीब 35 किलोमीटर दूर धौज गाँव की सीमा शुरू होते ही पुलिस के बैरिकेड दिखाई देते हैं.
दर्जनों जवान यहाँ से आने-जाने वाली हर गाड़ियों की जाँच कर रहे हैं.
संदेह होने पर ड्राइवर के फ़ोन नंबर सहित अधिक जानकारियाँ नोट भी कर रहे हैं.
यहाँ से क़रीब दो-ढाई किलोमीटर दूर मुख्य मार्ग से एक किलोमीटर हटकर अल फ़लाह यूनिवर्सिटी का 70 एकड़ से अधिक में फ़ैला और चारदीवारी से घिरा विशाल कैम्पस है.
यूनिवर्सिटी के गेट के बाहर मुस्तैद सुरक्षाकर्मी पत्रकारों को भीतर जाने से रोक रहे हैं.
यहाँ बड़ी संख्या में पत्रकार मौजूद हैं, जो यूनिवर्सिटी कैम्पस से बाहर निकल रहे लोगों से बात करने की कोशिश में माइक आगे बढ़ाते हैं लेकिन अधिकतर लोग बिना कोई प्रतिक्रिया दिए निकल जाते हैं.
कुछ पत्रकार बाहर निकल रहे लोगों का पीछा तक करते हैं. इस शोर-शराबे के बीच लोग ख़ामोश हैं और उनके चेहरों पर झिझक और डर साफ़ नज़र आता है.
वर्ष 2014 में स्थापित ये यूनिवर्सिटी इस साल अक्तूबर के अंत में तब चर्चा में आई, जब यहाँ पढ़ाने वाले एक डॉक्टर प्रोफ़ेसर को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने हरियाणा पुलिस के साथ एक साझा ऑपरेशन में गिरफ़्तार किया.
लेकिन 10 नवंबर को दिल्ली में हुए धमाके के बाद यह यूनिवर्सिटी जाँच का केंद्र बन गई है.
बुधवार को राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए), हरियाणा पुलिस, जम्मू-कश्मीर पुलिस और यूपी पुलिस के दलों ने कैम्पस में जाँच की.
मैकेनिकल इंजीनियर ने स्थापित की यूनिवर्सिटी
हरियाणा विधानसभा में साल 2014 में पारित एक क़ानून के तहत स्थापित इस यूनिवर्सिटी का संचालन दिल्ली के ओखला (जामिया नगर) में पंजीकृत अल-फ़लाह चैरिटेबल ट्रस्ट करता है.
पेशे से इंजीनियर और प्रोफ़ेसर जावेद अहमद सिद्दीक़ी 1995 में पंजीकृत इस ट्रस्ट के संस्थापक और चेयरपर्सन हैं.
अल फ़लाह चैरिटेबल ट्रस्ट ने 1997 में शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने शुरू किए थे.
सबसे पहले फ़रीदाबाद के धौज गाँव में ट्रस्ट ने एक इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित किया था.
इसके बाद ट्रस्ट ने कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन और ब्राउन हिल कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग की स्थापना साल 2006 और 2008 में की.
आगे चलकर यही यूनिवर्सिटी बनीं और साल 2015 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने भी इस यूनिवर्सिटी को मान्यता दी.
यहाँ मेडिकल विषयों की पढ़ाई साल 2016 में शुरू हुई और साल 2019 में अल-फ़लाह स्कूल ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ को मान्यता मिली.
अब इस मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के अलावा 2023 से मेडिकल साइंसेज़ में पीजी कोर्स भी संचालित होते हैं. यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर इसे राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यापन परिषद (एनएएसी) से प्रमाणित बताया है हालांकि एनएएसी ने एक बयान जारी कर इस प्रमाण पत्र को फ़र्ज़ी बताया है.
यहाँ प्रति वर्ष 200 एमबीबीएस छात्रों के दाख़िले होते हैं और इस समय एक हज़ार से अधिक छात्र मेडिकल कोर्सेज़ में पंजीकृत हैं. इसके अलावा यहाँ पैरा-मेडिकल कोर्स भी चलते हैं.
अल फ़लाह चैरिटेबल ट्रस्ट के चेयरपर्सन और अल-फ़लाह यूनिवर्सिटी के चांसलर जावेद अहमद सिद्दीक़ी ख़ुद इंजीनियर हैं.
इंदौर के देवी अहिल्या बाई विश्वविद्यालय से इंडस्ट्रियल एंड प्रोडक्ट डिज़ाइन में बीटेक की डिग्री लेने वाले डॉ.जावेद सिद्दीक़ी अल-फ़लाह चैरिटेबल ट्रस्ट के अलावा कई अन्य कंपनियों के संस्थापक हैं.
उन्होंने साल 1996 में अल-फ़लाह इन्वेस्टमेंट लिमिटेड की स्थापना भी की थी. सिद्दीक़ी पर इस कंपनी के ज़रिए निवेश में धोखाधड़ी का आरोप लगा था और उन पर मुक़दमा भी दर्ज हुआ था.
सिद्दीक़ी साल 2000 में दर्ज धोखाधड़ी के इसी मामले में तीन साल से अधिक समय तक जेल में भी रहे. हालाँकि उन्हें साल 2005 में बरी कर दिया गया था.
वो जामिया मिल्लिया इस्लामिया के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग में भी पढ़ा चुके हैं.
दिल्ली ब्लास्ट के बाद सुर्ख़ियों में यूनिवर्सिटी
भारत सरकार ने दिल्ली में लाल क़िले के सामने 10 नवंबर की शाम हुए धमाके को अब 'टेरर अटैक' माना है.
अब तक की जाँच में जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया है, उनमें से कुछ लोगों का संबंध अल-फ़लाह यूनिवर्सिटी से है.
जम्मू-कश्मीर पुलिस और हरियाणा पुलिस ने एक साझा अभियान में अक्तूबर माह के अंत में डॉ. मुज़म्मिल शकील को गिरफ़्तार किया था.
2017 में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने वाले डॉ. मुज़म्मिल शक़ील अल-फ़लाह यूनिवर्सिटी के मेडिकल कॉलेज में फिज़ियोलॉजी विभाग में शिक्षक हैं.
फ़रीदाबाद पुलिस के एक बयान के मुताबिक़ मुज़म्मिल शक़ील की निशानदेही पर भारी मात्रा में विस्फ़ोटक पदार्थ और रसायन बरामद किए गए थे.
फ़रीदाबाद के पुलिस कमिश्नर सतेंद्र कुमार ने 10 नवंबर को पत्रकारों से बातचीत में कहा था,"फ़रीदाबाद में जम्मू-कश्मीर पुलिस की जाँच के दौरान बड़ी मात्रा में आईईडी बनाने का सामान और गोला-बारूद बरामद हुआ है."
उन्होंने डॉक्टर मुज़म्मिल शक़ील की गिरफ़्तारी की पुष्टि भी की थी.
जाँच एजेंसियों ने डॉ. मुज़म्मिल शकील की निशानदेही पर असॉल्ट राइफ़ल और पिस्टल समेत हथियार भी बरामद करने का दावा किया है.
फ़रीदाबाद के पुलिस कमिश्नर के पीआरओ यशपाल ने बीबीसी से इस बात की पुष्टि की है कि इस यूनिवर्सिटी से ही जुड़ी एक और डॉ. शाहीन सईद को भी जाँच एजेंसियों ने हिरासत में लिया है.
2002 में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने वाली डॉ. शाहीन यूनिवर्सिटी के फॉर्माकोलॉजी विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं. फ़रीदाबाद पुलिस ने बीबीसी से डॉ. शाहीन सईद की गिरफ़्तारी की पुष्टि की है
समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में शाहीन के भाई मोहम्मद शोएब ने बताया कि पुलिस और एटीएस की टीम उनके घर पर आई थी और पूछताछ हुई थी.
जबकि उनके पिता का कहना था कि शाहीन पर लगे आरोपों पर उन्हें भरोसा नहीं है.
डॉक्टर शाहीन ने कुछ समय कानपुर में भी पढ़ाया था. इस मामले को लेकर कानपुर पुलिस ने भी कई लोगों से पूछताछ की है.
कानपुर के ज्वाइंट सीपी (लॉ एंड ऑर्डर) आशुतोष कुमार के मुताबिक़ शाहीन जेएसम कॉलेज में पढातीं थी.
समाचार एजेंसी पीटीआई ने दिल्ली पुलिस के सूत्रों के हवाले से जानकारी दी है कि डीएनए टेस्ट से इसकी पुष्टि हुई है कि लाल क़िले के पास जिस कार में धमाका हुआ, उसे डॉक्टर उमर नबी ही चला रहे थे.
2017 में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने वाले डॉ. उमर नबी जनरल मेडिसिन विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत थे.
डॉ. उमर नबी के परिजनों से भी पूछताछ की गई है.
डॉक्टर उमर नबी की भाभी मुज़म्मिल अख़्तर ने बीबीसी को बताया कि सोमवार देर रात पुलिस की टीम पुलवामा के कोइल गाँव में उनके घर पर आई थी. उमर के कुछ अन्य रिश्तेदार से भी पूछताछ की गई है.
हालाँकि इस बारे में जाँच एजेंसियों की तरफ़ से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है.
दूसरी ओर अल फ़लाह यूनिवर्सिटी ने ख़ुद को इन तीनों डॉक्टरों से अलग करते हुए कहा है कि यूनिवर्सिटी के साथ उनका संबंध सिर्फ़ पेशेवर था.
क्या कहा है यूनिवर्सिटी ने?
अल-फ़लाह स्कूल ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ की प्रिंसिपल डॉ. भूपिंदर कौर की तरफ़ से जारी बयान में कहा गया है, "हमें पता चला है कि हमारे दो डॉक्टरों को जाँच एजेंसियों ने हिरासत में लिया है. हम ये स्पष्ट करना चाहते हैं कि इन दोनों व्यक्तियों का यूनिवर्सिटी से कोई संबंध नहीं है. ये पेशेवर हैसियत में हमारे साथ काम कर रहे थे."
यूनिवर्सिटी ने कहा है कि किसी तरह के रसायनों या विस्फोटक पदार्थों से संस्थान का कोई संबंध नहीं है और संस्थान जाँच एजेंसियों का पूरा सहयोग कर रहा है.
अपने बयान में यूनिवर्सिटी ने कहा है कि संस्थान को दिल्ली के लाल क़िले के पास हुई घटना के साथ जोड़ने से छात्रों के लिए दिक़्क़तें हो रही हैं.
बीबीसी ने ट्रस्ट के चेयरपर्सन डॉ. जावेद अहमद सिद्दीक़ी और मेडिकल कॉलेज का पक्ष जानने का प्रयास किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिल सका.
स्टू़डेंट्स में डर
इस यूनिवर्सिटी में देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र पढ़ने आते हैं.
मेडिकल कोर्सेज के अधिकतर छात्र परिसर में बने हॉस्टल में रहते हैं, जबकि अन्य कोर्सेज के छात्र आसपास के इलाक़ों में लॉज या किराए के कमरों में रहते हैं.
दिल्ली में हुए हमले की जाँच के दायरे में यूनिवर्सिटी के आने के बाद से ही कई छात्र आशंकित और डरे हुए हैं.
इसी यूनिवर्सिटी से पैरा-मेडिकल कोर्स करने और अब यहाँ पढ़ रहे एक छात्र ने अपना नाम न ज़ाहिर करते हुए बताया, "जिन डॉक्टरों की गिरफ़्तारी की गई है वह हमारे कॉलेज से ही जुड़े हैं. जब से ये घटनाक्रम हुआ है छात्र डरे हुए और आशंकित हैं."
मेडिकल कॉलेज से जुड़ा 650 बेड का एक अस्पताल भी है, जिसमें आसपास के इलाक़े के अलावा दूर-दूर से भी मरीज़ इलाज कराने आते हैं.
जाँच के बीच यहाँ मरीज़ों का आना जारी है, हालाँकि उनकी संख्या में गिरावट ज़रूर हुई है.
अस्पताल में काम करने वाले एक अन्य स्टाफ़ ने बताया, "इस घटनाक्रम के बाद से इलाज कराने आ रहे मरीज़ों की संख्या में भारी गिरावट आई है. अब पहले से आधे मरीज़ ही आ रहे हैं."
उत्तर प्रदेश के रहने वाले विश्वास जॉनसन ने बताया, "इसी यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद मुझे आसानी से संस्थान में ही नौकरी मिल गई. यहाँ देश के हर हिस्से से छात्र पढ़ने आते हैं, लेकिन सबसे ज़्यादा संख्या यूपी और बिहार से आने वाले छात्रों की है."
विश्वास कहते हैं, "यहाँ मेडिकल कोर्सेज में पढ़ाई का माहौल बेहतर है. हालाँकि पैरा-मेडिकल कोर्स में पढ़ने वाले छात्रों पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है."
विश्वास भी डरे हुए हैं. वो कहते हैं, "कैंपस में भारी पुलिस है. छात्रों में डर का मौहल है. डॉ. शाहीना सईद ने हमें पढ़ाया है. डॉ. मुज़म्मिल को भी मैंने परिसर में कई बार देखा है."
मेडिकल के एक छात्र ने अपना नाम ज़ाहिर न करते हुए कहा, "छात्र आशंकित हैं, अगर यूनिवर्सिटी पर असर हुआ तो इससे छात्रों का भी भविष्य प्रभावित हो सकता है. नए छात्रों में डर और आशंकाएँ और भी ज़्यादा हैं."
एक अन्य छात्र ने बताया, "यूनिवर्सिटी प्रशासन ने छात्रों से संयम बनाए रखने की अपील की है."
11 साल से यहाँ सुरक्षा गार्ड का काम कर रहे एक व्यक्ति के मुताबिक़ डॉक्टरों की गिरफ़्तारी के बाद से कर्मचारी भी आशंकित हैं.
वो कहते हैं, "इतने साल यहाँ काम करते हुए हो गए, कभी ऐसा नहीं सुना. अब यहाँ जाँच चल रही है, बार-बार पुलिस आ रही है. इससे यहाँ काम करने वालों के मन में भी सवाल हैं."
कहाँ मिले विस्फोटक?
हरियाणा पुलिस के मुताबिक़, अल फ़लाह यूनिवर्सिटी के नज़दीक ही धौज गाँव और फ़तेहपुर तगा गाँव से डॉ. मुज़म्मिल की निशानदेही पर विस्फोटक बरामद हुए हैं.
डॉ. मुज़म्मिल ने धौज गाँव में एक कमरा किराए पर लिया था. जाँच एजेंसियों ने यहाँ से भारी मात्रा में विस्फोटक बरामद करने का दावा किया है.
जम्मू-कश्मीर पुलिस ने हरियाणा पुलिस के साथ मिलकर फ़रीदाबाद में कार्रवाई की थी.
जम्मू-कश्मीर की पुलिस ने भी इस बारे में विस्तार से जानकारी दी थी.
पुलिस के बयान के मुताबिक़ अब तक 2900 किलो से अधिक आईईडी बनाने की सामग्री और अन्य रासायनिक पदार्थ बरामद हुए हैं.
डॉ. मुज़म्मिल ने इसी साल सितंबर में धौज में एक कमरा किराए पर लिया था. यहाँ भी जाँच एजेंसियाँ पड़ताल कर रही हैं.
इस मकान के मालिक से भी पुलिस ने पूछताछ की है, जिसके बाद से वो भी डरे हुए हैं.
वहीं अल-फ़लाह यूनिवर्सिटी से क़रीब तीन किलोमीटर दूर भी डॉ. मुज़म्मिल ने एक कमरा किराए पर लिया था. पुलिस ने यहाँ भी विस्फोटक और रसायन बरामद करने का दावा किया है.
फ़तेहपुर तगा गाँव की नई बन रही डेहरा बस्ती के आख़िरी छोर पर वो घर अब खुला पड़ा है, जहाँ कथित रूप से विस्फोटक बरामद किए गए. यहाँ भी लोग बात करने से डरते हैं.
इस घर के ठीक सामने रहने वाली एक महिला ने बीबीसी से कहा, "दो दिन पहले यहाँ पुलिस आई थी. कहा जा रहा है कि कोई डॉक्टर हैं, जिन्होंने ये कमरा किराए पर लिया था. मैंने उन्हें कभी यहाँ नहीं देखा ना ही मीडिया में आने से पहले उनका नाम सुना था."
इस मकान में अन्य किराएदार भी रहते हैं, जो फ़िलहाल यहाँ मौजूद नहीं थे.
इस मकान के मालिक नूर मोहम्मद इश्तियाक़ अल-फ़लाह यूनिवर्सिटी में बनीं मस्जिद के इमाम भी हैं. उन्हें भी हिरासत में लिया गया है.
समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए उनके भाई ने बताया कि मकान का एक कमरा कुछ डॉ. मुज़म्मिल को किराए पर दिया गया था.
अपने भाई को बेग़ुनाह बताते हुए उन्होंने कहा, "मेरे भाई 20 साल से उस मस्जिद में इमाम हैं, इमाम की हैसियत से वो नमाज़ पढ़ने आने वाले डॉक्टरों और छात्रों से बात भी करते थे. इसके अलावा उनका किसी से कोई संबंध नहीं है."
बढ़ा जाँच का दायरा
अल-फ़लाह यूनिवर्सिटी परिसर में जाँच जारी है. बुधवार को यहाँ कई राज्यों की पुलिस और केंद्रीय एजेंसियाँ मौजूद रहीं.
एक सुरक्षा गार्ड के मुताबिक़, मंगलवार के बाद से यहाँ लगातार जाँच एजेंसियों से जुड़े लोग आ रहे हैं.
हालाँकि इसे लेकर आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है.
बुधवार रात होने तक भी कई जाँच टीमें अल-फ़लाह यूनिवर्सिटी परिसर में मौजूद थीं.
गेट पर मौजूद एक सुरक्षा गार्ड कहते हैं, "अब पहले से ज़्यादा पुलिस आ रही है. आगे क्या होगा किसी को नहीं पता."
वहीं, यूनिवर्सिटी के मेडिकल कॉलेज में क़रीब 70 किलोमीटर दूर से इलाज कराने आए एक व्यक्ति ने कहा, "यहाँ इलाज कुछ सस्ता हो जाता है इसलिए आते हैं."
लगातार आगे बढ़ रही लाल क़िले के पास हुए हमले की जाँच ने यूनिवर्सिटी के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
इन सवालों से सबसे ज़्यादा परेशान यहाँ पढ़ने वाले छात्र हैं.
पैरा-मेडिकल की पढ़ाई कर रहे एक छात्र ने कहा, "किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि यूनिवर्सिटी का नाम इतने बड़े हमले से जुड़ेगा. अब इसका असर हम सबके भविष्य पर पड़ेगा. यूनिवर्सिटी की बहुत बदनामी हो रही है, हम जैसे छात्रों को इसे भुगतना पड़ सकता है."
किसान अब पहले से ज्यादा यूरिया की मांग कर रहे हैं. लेकिन घरेलू उत्पादन उस गति से नहीं हो रहा. तो क्या भारत यूरिया संकट की तरफ बढ़ रहा है?
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना की रिपोर्ट -
भारत में किसानों की यूरिया पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है. यह स्थिति सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है. किसानों की बढ़ती जरूरत के मुकाबले देश में यूरिया का उत्पादन कम हो रहा है. पिछले वित्त वर्ष यानी अप्रैल 2024 से मार्च, 2025 के बीच यूरिया की खपत लगभग 38.8 मिलियन टन रही. यह रिकॉर्ड आंकड़ा है.
जल्द ये रिकॉर्ड भी टूट सकता है. चालू वित्त वर्ष में यूरिया की खपत 40 मिलियन टन से ज्यादा होने की उम्मीद है. इस वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में ही यूरिया की बिक्री में 2.1 प्रतिशत का उछाल आया है. रबी के मौसम में यह और बढ़ेगी. गेहूं, चना, आलू, सरसों और मटर जैसी फसलें इसी मौसम में बोई जाती हैं. इन फसलों को अधिक नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है, जो यूरिया से मिलता है.
बिहार के कई जिलों में हैंडपंप से लेकर तालाब तक सब सूखे
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि यूरिया की खपत पिछले दशकों में लगातार बढ़ी है. वित्त वर्ष 1990‑91 में यह लगभग 14 मिलियन टन थी. वर्ष 2010-11 तक खपत दोगुनी होकर 28.1 मिलियन टन पर पहुंच गई. लेकिन बढ़ती मांग के साथ घरेलू उत्पादन नहीं बढ़ रहा बल्कि कम हो रहा है. घरेलू उत्पादन वर्ष 2023‑24 में 31.4 मिलियन टन था. लेकिन अगले वित्त वर्ष में यह घटकर 30.6 मिलियन टन हो गया. साल 2025 में अप्रैल से सितंबर के बीच यह उत्पादन, पिछले वर्ष इसी अवधि की तुलना में 5.6 प्रतिशत कम हुआ है.
यूरिया की मांग क्यों बढ़ रही है?
वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और मिट्टी की स्थिति के कारण यूरिया की बिक्री बढ़ रही है. साथ ही यूरिया का गैर-कृषि कार्यों में भी इस्तेमाल बढ़ा है. गोंद, पेंट, प्लास्टिक और फर्नीचर जैसे उद्योगों में यूरिया की जरुरत पड़ती है.
तापमान और बारिश का पैटर्न बदला है. सूखा या अत्यधिक बारिश होने से मिट्टी की पोषक तत्व क्षमता प्रभावित होती है. इस वर्ष जून से अगस्त के बीच देश भर में बारिश औसत से ऊपर रही. जून में 8.9 प्रतिशत, जुलाई में 4.8 प्रतिशत, और अगस्त में 5.2 प्रतिशत अधिक बारिश हुई है. अच्छी बारिश से खरीफ फसलों जैसे मक्का और धान की बुवाई पर असर पड़ा. किसान फसल धनत्व बढ़ाने के लिए उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं. इसके चलते यूरिया की मांग अचानक बहुत बढ़ गई है.
अन्य उर्वरकों पर सब्सिडी की जरुरत
बाजार में मौजूद अन्य उर्वरकों की तुलना में यूरिया सस्ता है. सरकार यूरिया पर सबसे ज्यादा सब्सिडी देती है. यूरिया का एमआरपी नवंबर 2012 से 5,360 रूपए प्रति टन है. यह तब से नहीं बदला है. वहीं जनवरी 2015 से नीम की परत लगी यूरिया का मूल्य लगभग 5,628 रूपए प्रति टन है.
जबकि एक टन सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) की कीमत 11,500 से 12,000 रूपए, ट्रिपल सुपर फॉस्फेट (टीएसपी) 26,000 रूपए, डाय-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) 27,000 रूपए और म्युरिएट ऑफ पोटाश (एमओपी) की कीमत 36,000 रूपए है. किसान उर्वरक बैग के हिसाब से खरीदते हैं. यूरिया के एक 45 किलोग्राम वाले बैग की कीमत लगभग 250 से 270 रूपए है. जो बाकियों से बहुत सस्ता पड़ता है.
सस्ता होने के साथ ही यूरिया में नाइट्रोजन की मात्रा भी ज्यादा होती है. इसमें 46 प्रतिशत नाइट्रोजन है. डीएपी में लगभग 18 प्रतिशत नाइट्रोजन होता है. वहीं एसएसपी और टीएसपी में नाइट्रोजन लगभग ना के बराबर मिलता है.
आयात नहीं, घरेलू उत्पादन को बढ़ाना होगा
भारत में यूरिया की कुल मांग का लगभग 87 प्रतिशत घरेलू उत्पादन से पूरा होता है. जितना कम पड़ता है उसे आयात किया जाता है. भारत में चीन, ओमान, कतर और रूस से यूरिया खरीदा जाता है. इस वित्त वर्ष आयात बढ़ने का अनुमान है.
भारत में यूरिया बनाने के लिए प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की भी जरुरत पड़ती है. देश में लगभग 15 प्रतिशत यूरिया संयंत्र ही देश की खुद की गैस का इस्तेमाल करते हैं. बाकी की क्षमता आयातित गैस पर आधारित है. इसका मतलब एलएलजी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव की वजह से यूरिया के आयात और दाम पर असर पड़ सकता है.
यूरिया उत्पादन वर्ष 2019‑20 में 24.5 मिलियन टन से बढ़कर 2023‑24 में 31.4 मिलियन टन तक पहुंच गया. लेकिन अगले ही वित्त वर्ष से इसमें गिरावट आने लगी. वर्ष 2024-25 के बीच इफको, नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड, कृषक भारती सहकारी लिमिटेड, मैटिक्स फर्टिलाइजर और चंबल फर्टिलाइजर ने घरेलू यूरिया उत्पादन की आपूर्ति करने में मदद की. वरना स्थिति और खराब हो सकती थी.
हालांकि इसके कुछ नुकसान भी हैं. यूरिया बनाने वाले इन संयंत्रों से प्रदूषण भी फैलता है. विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सीएसई) की एक रिपोर्ट के अनुसार कुल उत्पादन लागत का लगभग 70-80 प्रतिशत हिस्सा ऊर्जा की खपत पर खर्च होता है. अध्ययन में यह भी पाया गया कि यूरिया उत्पादन करने वाले संयंत्रों में प्रति वर्ष लगभग 191 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी का उपयोग होता है. लगभग 26 प्रतिशत संयंत्रों में भूजल का इस्तेमाल होता है. इन संयंत्रों से निकलने वाला पानी भी प्रदूषित होता है.
यूरिया पर निर्भरता घटाने की जरुरत भी
केवल यूरिया पर निर्भर रहने के बजाय किसान गोबर, कंपोस्ट, हरी खाद और जैविक उर्वरक का उपयोग कर सकते हैं. डॉ.दया श्रीवास्तव सुझाव देते हैं कि सरकार उन किसानों को प्रोत्साहित करे जो यूरिया का इस्तेमाल कम कर रहे हैं. अभी ऐसा नहीं हो रहा है.
वह कहते हैं, "अगर यूरिया पर सब्सिडी दी जा रही है, तो वर्मी कंपोस्ट जैसे जैविक उर्वरक पर भी सब्सिडी दी जानी चाहिए. जैविक उर्वरक महंगे होने के कारण कम इस्तेमाल होते हैं. प्राकृतिक या जैविक खेती में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक का उपयोग नहीं होता. जैविक खेती के लिए किसान को रजिस्ट्रेशन का खर्च अपनी जेब से देना पड़ता है. यह 4,000 से 4,500 रुपये है. जबकि सरकार को जैविक खेती अपनाने वाले किसानों को अधिक सब्सिडी और प्रोत्साहन देना चाहिए.”
डॉ. दया श्रीवास्तव आगे बताते हैं, "जैविक खेती करने वाले किसानों के लिए अभी तक कोई विशेष बाजार विकसित नहीं किया गया है, जिससे उन्हें अपना उत्पादन बेचने में दिक्कत होती है. यूरिया पर सब्सिडी को कम किया जा सकता है क्योंकि नाइट्रोजन के अन्य कई स्रोत उपलब्ध हैं." डॉ. दया श्रीवास्तव के मुताबिक पोल्ट्री मेंयोर एक बेहतरीन विकल्प है. साथ ही, जैविक उर्वरक जैसे बायो-एनपीके के उपयोग और महत्व के बारे में किसानों में जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए.
हालांकि भारत में यूरिया की बढ़ी मांग और कमजोर उत्पादन के बीच भारत सरकार के उर्वरक विभाग ने हाल ही में कहा है कि देश में यूरिया की मांग को पूरा करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं. इस वर्ष अप्रैल से अक्टूबर के बीच, भारत ने 5.8 मिलियन टन यूरिया का आयात किया. पिछले वर्ष इसी अवधि में यह मात्रा 2.4 मिलियन टन थी.
देश में भी घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास जारी हैं. असम के नामरूप और ओडिशा के तलचर में दो यूरिया संयंत्र निर्माणाधीन हैं. दोनों की क्षमता 1.27 मिलियन टन प्रति वर्ष है. साथ ही सरकार ने आश्वासन दिया है कि रबी सीजन के लिए यूरिया का पर्याप्त स्टॉक है.
क्यों इतने खास हैं 'माउंट ऑफ ऑलिव्स' के जैतून
येरुशलम के पूरब की ओर एक लंबे टीले पर तीन पहाड़ियां हैं. इन्हीं में से एक है, माउंट ऑफ ऑलिव्स. यहां जैतून तोड़कर तेल निकालना एक प्राचीन परंपरा का हिस्सा है. मान्यता है कि ईसा मसीह ने इस पहाड़ी पर प्रार्थना की थी.
माना जाता है, ईसा ने यहां प्रार्थना की थी
कभी ये जमीन जैतून के पेड़ों से ढकी थी. जैतून के पेड़ों से इसे ही 'माउंट ऑफ ऑलिव्स' को अपना नाम मिला. इसका जिक्र बाइबिल में भी मिलता है. गॉस्पेल के मुताबिक, सूली चढ़ाने के लिए प्राचीन येरुशलम ले जाए जाने से पहले ईसा मसीह ने आखिरी रात यहीं गुजारी थी. ईसा ने यहां प्रार्थना की थी. ईसाई और यहूदी, दोनों धर्मों में इस जगह की काफी मान्यता है.
जैतून के प्राचीन पेड़
'माउंट ऑफ ऑलिव्स' पर जैतून के बहुत प्राचीन पेड़ भी हैं. इन्हें अहम सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है. इस साल जैतून की फसल तोड़ने के मौसम में ही इस्राएल और हमास के बीच युद्धविराम हुआ. युद्ध के दौरान आशंका थी कि पेड़ों को मिसाइल से नुकसान पहुंच सकता है.
प्राचीन परंपरा का हिस्सा
अब शांत हुए माहौल में मंक और ननें 'माउंट ऑफ ऑलिव्स' और 'गेथसमनी गार्डन' में जैतून की तैयार हो चुकी फसल जमा करने में व्यस्त हैं. यह बहुत प्राचीन परंपरा रही है. जैतून तोड़ने के लिए कई देशों से वॉलंटियर भी यहां आते हैं. सिर्फ वयस्क ही नहीं, बच्चे और किशोर भी हाथ बंटाते हैं. इस तस्वीर में दो कैथलिक नन, सिस्टर मैरी बेनेडिक्ट और सिस्टर कोलोंबा नजर आ रही हैं.
जैतून तोड़कर जमा करने में लोगों की आस्था है
डिएगो दला गासा एक 'फ्रेंसिस्कन' हैं. यह कैथलिक चर्च से जुड़ा एक धार्मिक समूह है. डिएगो, 'माउंट ऑफ ऑलिव्स' पर 'गेथसमनी गार्डन' के पास एक आश्रम (हरमिटेज) में जैतून पैदावार की देखरेख करते हैं. पहाड़ी पर बने बाकी कैथलिक आश्रमों-चर्चों और उनमें रहने वाले समुदायों के लिए जैतून तोड़कर उनसे तेल जैसे उत्पाद बनाना ना तो कारोबार है, ना ही भरण-पोषण का मुख्य जरिया.
"ये जमीन एक तोहफा है"
इन लोगों के लिए यह काम प्रार्थना का एक रूप और श्रद्धा की एक अभिव्यक्ति है. जैसा कि डिएगो ने एपी से बातचीत में कहा, "यह जमीन एक तोहफा है, दैवीय उपस्थिति का एक प्रतीक है." डिएगो बताते हैं, "पवित्र जगहों का संरक्षक होने का मतलब बस उनकी रक्षा करना नहीं है, बल्कि उन्हें जीना है. शरीर से भी और आध्यात्मिक रूप से भी. दरअसल ये पवित्र जगहें हमारी रक्षा करती हैं."
इन लोगों के लिए कारोबार नहीं है जैतून की खेती
पहाड़ी पर बने आश्रमों और चर्चों के लोग बाजार में बेचने के लिए सामान नहीं बनाते हैं. इस काम में उनकी गहरी आस्था है. जैसा कि सिस्टर मैरी बेनेडिक्ट बताती हैं, "जैतून तोड़ते समय प्रार्थना करना आसान है, और प्रकृति में भी इतनी सुंदरता है. ऐसा लगता है छुट्टी बिता रहे हों."
धार्मिक कार्यों में भी इस्तेमाल होता है ऑलिव ऑइल
ये लोग जितना जैतून का तेल निकालते हैं, उसका बड़ा हिस्सा खुद ही इस्तेमाल करते हैं. धार्मिक अनुष्ठानों में भी ऑलिव ऑइल इस्तेमाल किया जाता है. यहां 'बेनेडिक्टेन मोनेस्ट्री' में रहने वालीं सिस्टर कोलोंबा ने बताया कि ईसा मसीह की मूर्ति के पास जलने वाले चर्च लैंप के जैतून का तेल पर्याप्त मात्रा में मौजूद हो, यह सुनिश्चित करना उनकी जिम्मेदारी है.
आर्थिक और धार्मिक, दोनों रूपों से बड़ा प्रतीक है जैतून
इस शुष्क, रेगिस्तानी इलाके में जैतून के पेड़ बहुत अहम पैदावार हैं. सदियों से यहां जैतून उगता और उगाया जाता रहा है. वेस्ट बैंक में यहूदी सेटलर्स और फलस्तीनियों के बीच संघर्ष में जैतून के पेड़ों पर भी विवाद रहा है. यहां जैतून आर्थिक और धार्मिक, दोनों रूपों से एक मजबूत प्रतीक है.
इस बरस कम पैदावार हुई
इस साल जैतून की पैदावार काफी कम हुई. सूखा पड़ने और तेज हवाओं के कारण फूलों को बड़ा नुकसान पहुंचा. बसंत के मौसम में एक बड़ी आग में बहुत सारे पेड़ तहस-नहस भी हो गए.
भारत में शराब के बढ़ते बाजार के बीच, जेन-जी नॉन-अल्कोहलिक विकल्पों को अपनाकर पीने की आदतों में बदलाव ला रहे हैं. लेकिन अभी ये विकल्प पूरी तरह शराब की जगह नहीं लेने जा रहे
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना की रिपोर्ट -
भारत में शराब पीने के तरीके में बदलाव आ रहा है. जिम्मेदारी से पीने के शौकीन अब एक ऐसे विकल्पों की ओर देख रहे हैं जो उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक ना हों. इस ट्रेंड को 'सोबर ड्रिंकिंग' या 'सोबर क्यूरोसिटी' कहते हैं. बहुत से जेन-जी सोशल गैदरिंग में शराब के अलावा काफी मात्रा में नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक्स भी पी रहे हैं. स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता से ऐसा हुआ है. ज्यादा शराब पीने से वजन बढ़ने और नींद खराब होने जैसे बुरे प्रभावों को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ी है. वे शराब पी रहे हैं लेकिन नियंत्रित मात्रा में. नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक्स भी उन्हें आकर्षित कर रही हैं.
यूरोमीटर इंटरनेशनल की 'वैश्विक शराब बाजार 2025' रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक शराब उद्योग वर्ष 2024 में 253 अरब लीटर तक पहुंच गया था. फिर इसकी रफ्तार ठहर गई. दुनियाभर में शराब पीने वाले लोगों की संख्या घट रही है. जो लोग कभी-कभी शराब पीते हैं, उनमें से 53 प्रतिशत लोग अब इसे कम करने की कोशिश कर रहे हैं. जबकि पांच साल पहले यह आंकड़ा 44 प्रतिशत था.
टैल्कम पाउडर, एस्बेस्टस और कैंसर: क्या है इनका रिश्ता?
सबसे ज्यादा जेन-जी इस बदलाव को तेजी से अपना रहे हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि 36 प्रतिशत युवाओं ने कभी शराब नहीं पी. इसके पीछे स्वास्थ्य एक बड़ी वजह है. लगभग 87 प्रतिशत लोगों को लगता है कि स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और लंबी उम्र के लिए शराब से परहेज जरुरी है. जबकि 30 प्रतिशत लोग सोचते हैं कि कम शराब पीने से बचत होती है. वहीं 25 प्रतिशत लोग बेहतर नींद पाने के लिए शराब कम कर रहे हैं.
भारत में क्या हैं ड्रिंकिंग पैटर्न?
पारंपरिक रूप से शराब की बड़ी खपत वाले पश्चिमी देशों के बजाए अब ब्राजील, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका और खासतौर पर भारत जैसे उभरते हुए बाजार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं. वर्ष 2024 से 2029 तक भारत में शराब की खपत करीब 36 करोड़ लीटर बढ़ने की उम्मीद है. यह दर्शाता है कि भारत के बाजारों में भी शराब की खरीद तेजी से बढ़ रही है. इसका मुख्य कारण है इन सभी देशों में मध्यम वर्ग की आय का बढ़ना और लोगों की खरीदारी की आदतों में आया बदलाव. वहीं तेज महंगाई और खराब होती अर्थव्यवस्था के बीच अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देशों में लोग खर्च करने से पहले बहुत ज्यादा सोच-विचार करने लगे हैं. इसलिए अब शराब उद्योग को सबसे बड़ी संभावनाएं उभरते हुए बाजारों में दिख रही हैं.
हालांकि भारत में भी लोगों का शराब की ओर रुझान अपने चरम पर नहीं है क्योंकि भारत में भी लोग कम अल्कोहल वाले विकल्पों की ओर जा रहे हैं. ऐसे में नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक्स का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. भारत में नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक का बाजार वर्ष 2024 में लगभग 32.06 बिलियन डॉलर था. वर्ष 2033 तक यह बढ़कर 68.73 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. अगर इस सेगमेंट की बात करे तो वर्ष 2024 में नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक्स की बिक्री में 17 प्रतिशत और नॉन-अल्कोहलिक रेडी-टू-ड्रिंक ड्रिंक्स की बिक्री में 14 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. जबकि नॉन/लो अल्कोहल बीयर में 11 प्रतिशत और नॉन-अल्कोहलिक वाइन में 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. अधिकतर बार और रेस्टोरेंट्स में जीरो‑प्रूफ स्पिरिट्स या नॉन-अल्कोहलिक कॉकटेल आसानी से मिल रहे हैं.
क्यों नॉन-अल्कोहलिक बन रहे हैं युवा
स्टैटिस्टा के आंकड़ों के अनुसार जेन-जी पिछली पीढ़ियों की तुलना में शराब पर बहुत कम खर्च कर रही है. वर्ष 2022 में बूमर, जेन-एक्स और मिलेनियल ने शराब पर 23 से 25 बिलियन डॉलर तक खर्च किया. वहीं जेन-जी का खर्च केवल 3 बिलियन डॉलर था.
दक्षिण-पूर्व एशिया के लोग भारी संख्या में छोड़ रहे धूम्रपान
नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक की लोकप्रियता के कई कारण है. जेन-जी और मिलेनियल सबसे स्वास्थ्य‑सचेत पीढ़ियां समझी जाती हैं. ये लोग किसी भी प्रोडक्ट को खरीदने से पहले उसमें इस्तेमाल सामग्री को ध्यान से पढ़ते हैं. ताकि उन्हें पता हो कि उनके शरीर में क्या जा रहा है. खासकर कोविड महामारी के बाद से वे ज्यादा सतर्क हो गए हैं. ये वो पीढ़ी भी है जिसने अपने परिवार या आसपास किसी ना किसी पर शराब के बुरे असर होते देखे हैं. ये लोग इस बात के प्रति भी सजग हैं कि 40 साल की उम्र तक उनका स्वास्थ्य और शरीर कैसा दिखना चाहिए. इसलिए वे अपने खान-पान पर और अधिक ध्यान दे रहे हैं. साथ ही नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक उन लोगों को भी समूह का हिस्सा बनने का मौका देती हैं जो शराब नहीं पीते, लेकिन फिर भी पार्टी में शामिल होना चाहते हैं.
अल्कोहलिक ड्रिंक जैसे बीयर, वाइन, व्हिस्की और रम में एथेनॉल होता है. जबकि मॉकटेल, नॉन-अल्कोहलिक बीयर, और जीरो प्रूफ स्पिरिट्स को फलों का रस, हर्ब्स, मसाले और फ्लेवरिंग एजेंट्स मिलाकर बनाया जाता है.
वंश पाहुजा घरेलू नॉन-अल्कोहलिक स्पिरिट्स ब्रांड ‘सोबर' के फाउंडर है. वह डीडब्ल्यू को बताते हैं कि नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक उनके लिए है जो शराब जैसा स्वाद, अनुभव, खुशबू और लुक चाहते हैं लेकिन शराब के नकारात्मक असर जैसे सिरदर्द या नशे का अनुभव नहीं करना चाहते. नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक में शुगर और कैलोरी की मात्रा भी बहुत कम या ना के बराबर होती है. हां, इनकी कीमत थोड़ी ज्यादा है क्योंकि अभी इनका बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं हो रहा. अभी इनकी डिमांड बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में अधिक है.
क्या है युवाओं में लोकप्रिय जीब्रा स्ट्राइपिंग
नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक अभी इस स्थिति में नहीं हैं कि वो शराब की जगह ले लें. हालांकि वो एक विकल्प जरूर बन चुके हैं. युवा 'जीब्रा स्ट्राइपिंग' अपना रहे हैं. इसका मतलब है कोई व्यक्ति पार्टी या सोशल मौके पर शराब और नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक को बारी-बारी से पीता है. ताकि शराब कम और संतुलित तरीके से पी जाए.
रुचि नागरेचा नॉन-अल्कोहलिक कॉकटेल ब्रांड ‘सोब्रेटी सिप्स' की फाउंडर हैं. उनका मानना है कि नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक्स जश्न मनाने का एक तरीका हैं. शराब उद्योग सैकड़ों सालों से मौजूद है. यह रातों-रात खत्म नहीं होगा. उनके ब्रांड की ड्रिंक्स में बोटैनिकल्स, हाइड्रोसोल्स, टिंचर और कोल्ड एक्सट्रैक्शन का इस्तेमाल होता है. जो अल्कोहलिक कॉकटेल जैसी जटिलता और संतुष्टि देते हैं.
रूचि डीडब्ल्यू से कहती हैं, "मैं अक्सर देखती हूं कि कोई शाम की शुरुआत वाइन के एक ग्लास से करता है और फिर जीरो-प्रूफ या नॉन-अल्कोहलिक कॉकटेल की ओर शिफ्ट हो जाता है. यह एक बेहतरीन संतुलन है. जीब्रा स्ट्राइपिंग एक मानसिकता है. लोग अभी भी पार्टी और माहौल का हिस्सा बनना चाहते हैं. लेकिन साथ ही वो हाइड्रेटेड रहना और हैंगओवर से भी बचना चाहते हैं."
क्या शराब की जगह ले सकेंगे नॉन- अल्कोहलिक ड्रिंक?
भारत में लोग स्वास्थ्य के प्रति अधिक सचेत हो रहे हैं. इसका मतलब यह नहीं कि वे सीधे नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक्स की ओर बढ़ रहे हैं. भारत में शराब के क्षेत्र में अब कम अल्कोहल वाले और रेडी-टू-ड्रिंक (आरटीडी) उत्पाद लोकप्रिय हो रहे हैं. लेकिन ये बदलाव अभी अल्कोहलिक ड्रिंक की कैटेगरी पर ज्यादा असर नहीं डाल रहा.
आरडेंट अलकोबेव के निदेशक देबाशीष श्याम ने इसे लेकर डीडब्ल्यू को बताया कि लोग शराब कम पीने लगे हैं. वे बेहतर क्वालिटी के उत्पाद चुन रहे हैं. घर पर पार्टी, ट्रैवल और आउटडोर इवेंट्स बढ़ने से प्रीमियम शराब की मांग भी बढ़ रही है.
शराब विशेषज्ञ और सलाहकार रोजिता तिवारी भी कुछ ऐसा ही कहती हैं. उनके मुताबिक अब भारत में पीने की एक नई सोच शुरू हो रही है. लोग ज्यादा समझदारी और संतुलन के साथ, स्वाद और आनंद पर ध्यान देते हुए पीना पसंद कर रहे हैं. लोग कम पीना चाहते हैं लेकिन गुणवत्ता वाली चीजें पीना चाहते हैं. नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक्स उनके लिए हैं जो शराब नहीं पीते. ताकि वे बिना शराब के भी दोस्तों के साथ उसी स्वाद और माहौल का आनंद ले सकें. ये नशे का इलाज नहीं हैं सिर्फ किसी समूह में 'एडजस्ट' होने का एक तरीका हैं.
वीरेंदर दिल्ली के वसंत विहार में स्थित 'रेड' बार में बतौर बार टेंडर काम करते हैं. ये बार अपने अल्कोहलिक कॉकटेल के लिए जाना जाता है. वीरेंद्र डीडब्ल्यू को बताते हैं कि लोग स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं लेकिन वो ज्यादातर मामलों में खुद से नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक्स नहीं मांग रहे, सिर्फ आर्डर देते समय वे शुगर की मात्रा कम रखने को कहते हैं. उनके बार में सोबर ब्रांड के ड्रिंक मौजूद हैं. इनको ड्रिंक्स मेन्यू में 'मॉकटेल' की कैटेगरी में रखा जाता है. यानी बार और रेस्टोरेंट्स में नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक को जूस, और कोक जैसे सॉफ्ट ड्रिंक की कैटेगरी में जगह मिल गई है.
शराब पीने को लेकर किस देश में क्या चेतावनी दी जाती है
अमेरिका में शराब की बोतलों पर कैंसर की चेतावनी देने की जरूरत पर बहस चल रही है. अलग अलग देशों में शराब पीने को लेकर अलग अलग नियम हैं.
ब्रिटेन
ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा कहती है कि एक हफ्ते में 14 यूनिट से ज्यादा शराब नहीं पीनी चाहिए. उसका यह भी कहना है कि "पीने का पूरी तरह से सुरक्षित कोई भी स्तर नहीं है, लेकिन इन दिशा निर्देशों के पालन से आपके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचने का जोखिम कम हो जाता है." इन दिशा निर्देशों के मुताबिक, कम शराब पीने के लंबी अवधि के फायदों में कैंसर के जोखिम का कम होना शामिल है.
फ्रांस
फ्रांस की स्वास्थ्य एजेंसी का कहना है कि वयस्कों को एक दिन में अधिकतम दो सामान्य ड्रिंक जितनी शराब पीनी चाहिए और हर रोज नहीं पीना चाहिए. एक हफ्ते में 10 से ज्यादा सामान्य ड्रिंक नहीं लेने चाहिए और हर हफ्ते शराब ना पीने वाले वाले दिन भी होने चाहिए. एजेंसी के मुताबिक शराब कैंसर का जाना माना कारण है और कुछ तरह के कैंसर होने का खतरा रोज एक ड्रिंक लेने से भी बढ़ जाता है.
जर्मनी
जर्मन सेंटर फॉर एडिक्शन इशूज कहता है कि एक दिन में महिलाओं को 12 ग्राम से ज्यादा और पुरुषों को 24 ग्राम से ज्यादा शराब नहीं पीनी चाहिए. हर हफ्ते कम से कम दो दिन शराब से परहेज भी करना चाहिए. 2022 में सरकार के पैसे से हुए एक अध्ययन में दावा किया गया था कि शराब पीने से कई तरह के कैंसर हो सकते हैं.
आयरलैंड
अगले साल लागू होने वाले नए नियमों के तहत आयरलैंड में बिकने वाले सभी शराब उत्पादों पर स्वास्थ्य से जुड़ी लेबल लगाना अनिवार्य कर दिया गया है. इनमें कैंसर, लिवर की बीमारी आदि से संबंध और गर्भावस्था में पीने के जोखिम को लेकर चेतावनियां शामिल हैं. इस कदम का स्वागत करते हुए उस समय विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा था कि आयरलैंड शराब उत्पादों पर स्वास्थ्य से जुड़े लेबल देने वाला पहला देश बन जाएगा.
लिथुआनिया
लिथुआनिया के कड़े नियम शराब पीने को लेकर किसी भी तरह के सार्वजनिक प्रोत्साहन को प्रतिबंधित करते हैं. यहां तक कि शराब के विज्ञापन भी नहीं निकाले जा सकते हैं. सरकार के नारकोटिक्स, टोबैको एंड अल्कोहल कंट्रोल बोर्ड की वेबसाइट पर एक बयान में शराब और कैंसर के बीच संबंध के बारे में बताया गया है. हालांकि इसमें कैंसर को लेकर स्पष्ट चेतावनी नहीं दी गई है.
नॉर्वे
नॉर्वे के स्वास्थ्य निदेशालय का कहना है कि शराब पीने का कोई सुरक्षित स्तर नहीं है और इसे "जितना हो सके उतना कम" पीना चाहिए. 2024 में जारी किए गए दिशानिर्देशों में निदेशालय ने कहा, "शराब पीना कैंसर के विकसित होने से जुड़ा हुआ है, विशेष रूप से स्तनों का कैंसर और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट का कैंसर."
स्पेन
स्पेन के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि शराब पीने से हमेशा ही जोखिम रहता है और "शराब को जितना कम पिया जाए उतना अच्छा." महिलाएं एक दिन में वाइन का आधा गिलास या बियर का छोटा गिलास पीएं तो जोखिम कम रहता है. पुरुषों के लिए यह सीमा एक दिन में वाइन का एक गिलास या बियर के दो छोटे गिलास है. मंत्रालय के मुताबिक जोखिम भरे सेवन से भविष्य में कैंसर या मानसिक रोग जैसी समस्याओं के होने की संभावना बढ़ती है.
अमेरिका
अमेरिका में शराब आधारित ड्रिंक्स पर 1988 से एक स्वास्थ्य चेतावनी रहती है, लेकिन इसमें गर्भवती महिलाओं को सलाह दी गई होती है कि वो इन्हें ना पिएं. यह भी लिखा होता है कि शराब पीने से इंसान की गाड़ी चलाने और मशीनें चलाने की क्षमता पर असर पड़ता है. सीके/एनआर (रॉयटर्स)
दिल्ली वालों को रोजाना एक घंटा भी आराम का नहीं मिलता
एक नई रिपोर्ट ने दिल्ली समेत कई भारतीय शहरों पर प्रदूषण के असर को एक नए नजरिए से पेश किया है. रिपोर्ट दिखाती है कि प्रदूषण का इन शहरों में रहने वालों के जीवन की गुणवत्ता पर कितना बुरा असर पड़ रहा है.
क्या हैं आरामदायक घंटे
आरामदायक घंटे यानी वो समय जब किसी भी शहर का तापमान 18 से 31 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है. इसके बारे में अहमदाबाद के सीईपीटी विश्वविद्यालय और भारतीय जलवायु टेक स्टार्टअप 'रेस्पीरेर लिविंग साइंसेज' ने मिल कर एक नया अध्ययन किया है.
दिल्ली में नहीं आराम
रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली को साल के 8,760 घंटों में से सिर्फ 2,210 ऐसे घंटे मिलते हैं जो तापमान के लिहाज से आरामदायक होते हैं. लेकिन इनमें से 1,951 घंटे (88 प्रतिशत) ऐसे होते हैं जिनमें वायु की गुणवत्ता खराब होती है. दिल्ली वालों को साल में सिर्फ 259 (तीन प्रतिशत) घंटे ऐसे मिलते हैं जिनमें तापमान आरामदायक होता है और वायु की गुणवत्ता भी अच्छी होती है. यानी एक दिन में औसतन सिर्फ 42 मिनट.
चेन्नई का भी यही हाल
रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली अकेला ऐसा भारतीय शहर नहीं है जो इस समस्या से जूझ रहा है. राष्ट्रीय राजधानी की ही तरह चेन्नई के आरामदायक घंटों में से भी करीब 88 प्रतिशत घंटों पर वायु प्रदूषण का असर रहता है.
बेंगलुरु का हाल बेहतर
बेंगलुरु का हाल दिल्ली से काफी बेहतर बताया गया है. कर्नाटक की राजधानी में साल में 8,100 से भी ज्यादा घंटे ऐसे मिलते हैं जिनमें वायु की गुणवत्ता ठीक होती है और तापमान के लिहाज से आरामदायक घंटों पर खराब एक्यूआई की न्यूनतम छाया पड़ती है. इसी तरह अहमदाबाद को भी दिल्ली से ज्यादा इस्तेमाल करने लायक घर से बाहर के हालात मिलते हैं.
मेट्रो शहरों पर दोहरा असर
रिपोर्ट दिखाती है कि विशेष रूप से भारत के मेट्रो शहरों में जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण का दोहरा असर बढ़ता जा रहा है. इससे पहले भी कई अध्ययन यह दिखा चुके हैं कि इन दोनों कारणों की वजह से इन शहरों में जीवन की गुणवत्ता और लोगों के स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है.
पारंपरिक तरीकों से नहीं बन रही बात
इन हालात को देखते हुए इस रिपोर्ट में घर के अंदर के हालात को भी और बेहतर बनाने के उपाय सुझाए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक पूरी तरह से बंद और वातानुकूलित स्थान हों या बेरोक प्राकृतिक वेंटिलेशन वाले स्थान, दोनों ही तरीके अब भारतीय शहरों की मांग को पूरा नहीं कर पा रहे हैं. प्रस्तावित किया गया है कि पर्स्नलाइज्ड एनवायरनमेंटल कंट्रोल सिस्टम्स (पीईसीएस) का इस्तेमाल करना चाहिए.
क्या है पीईसीएस
पीईसीएस यानी तापमान का नियंत्रण करने के स्थानीय साधन, जैसे निजी पंखे, रेडिएंट पैनल और स्थानीय वेंटिलेशन सिस्टम आदि. इनसे ऊर्जा की भी बचत होती है. रिपोर्ट में दिखाया गया है कि अगर इमारतें बनाने में पीईसीएस का इस्तेमाल किया जाए तो दिल्ली में 68 प्रतिशत, अहमदाबाद में 70 प्रतिशत और चेन्नई में 72 प्रतिशत ऊर्जा बचत की जा सकती है.
बिहार के गांवों से पलायन कोई नई बात नहीं है। लेकिन ये कहानी सिर्फ रोजगार से ही नहीं, बल्कि उन महिलाओं से भी जुड़ी है जो पार्टनर के बिना रहने को मजबूर हैं।
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना-याकूत अली की रिपोर्ट -
जहानाबाद के नसरत गांव में हर जगह केवल महिलाएं दिखाई देंगी। शादी के तुरंत बाद पुरुष काम के लिए घर छोड़ देते हैं। जूली देवी की शादी वर्ष 2017 में अनिल कुमार से हुई। अगले ही महीने अनिल बेंगलुरु चले गए। जहां वह इलेक्ट्रीशियन का काम करते हैं।
बिहार में रोजगार की तलाश में आप्रवासनआम बात है। दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब और दक्षिण भारत इलाकों में काम करने वाले मजदूरों में बिहार के पुरुषों की संख्या काफी ज्यादा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 74।54 लाख लोग बिहार से बाहर काम करने जाते हैं।
जहां प्रवास पुरुषों के लिए आर्थिक अवसर लाता है। वहीं महिलाओं पर भी इसका काफी ज्यादा असर पड़ता है। नसरत जैसे बिहार के ऐसे सैकड़ों गांव हैं जहां पति अपनी पत्नियों को गांव में ही छोड़ गए हैं। वे केवल छठ जैसे पर्व या किसी विशेष अवसर पर ही घर लौटते हैं।
मजदूरों के तौर पर होता है शोषण
नसरत पटना से केवल 50 किलोमीटर दूर है। गांव में महिलाएं अपने पतियों के भेजे पैसों से घर चलाती हैं। यहां एक किराना दुकान है। इस दुकान में लगभग हर महिला का उधार खाता चलता है। क्योंकि घर के खर्च भेजे गए पैसों से पूरे नहीं होते।
पति के बिना अकेली महिलाओं पर काम का बोझ भी बढ़ जाता है। जूली के पति महीने का पंद्रह हजार रूपए कमाते हैं। हर महीने वह दस हजार रूपए घर भेजते हैं। जूली बताती हैं कि बच्चों की पढ़ाई, सास-ससुर की देखभाल और पूरा घर संभालने की जिम्मेदारी उन्हीं की है।
जूली ने डीडब्लू से बातचीत में कहा, ‘दस हजार रुपये में पांच लोगों का खर्च नहीं चलता। बच्चे की पढ़ाई और सास की दवाई का खर्च बहुत होता है। घर चलाने के लिए हर महीने कम से कम बीस हजार रूपए चाहिए। देवर और ननद पढ़े-लिखे हैं, पर नौकरी नहीं मिल रही। इसलिए मुझे ही घर से बाहर जाकर कुछ पैसे कमाने पड़ते हैं।’
जूली कहती हैं कि जब कोई महिला अकेली होती है, तो खेत के जमींदार उसका फायदा उठाते हैं। महिलाएं अपने हक या सही मजदूरी की मांग नहीं कर पातीं। उन्हें डर रहता है कि अगर कुछ बोलेंगी तो काम छिन जाएगा। गांव में खेती के काम के अलावा महिलाओं के पास कमाई करने का और कोई विकल्प भी नहीं है।
जूली कहती हैं, ‘मैं और मेरी सास दोनों खेत में दिनभर काम करते हैं। सुबह 9 बजे निकलते हैं। शाम 6 बजे तक खेत में ही रहते हैं। इतने लंबे काम के बदले हमें सिर्फ सौ रुपये मिलते हैं। जबकि मर्दों को तीन सौ रुपये दिए जाते हैं। सब मालिक ऐसा ही करते हैं। अगर हम कुछ कहें, तो फिर हमें काम ही नहीं मिलेगा।’
पति से दूर रहने वाली जितनी भी महिलाओं से हमने बाद की, उन्होंने इस मसले पर दुख जाहिर किया। जूली के पति साल में सिर्फ एक बार, जनवरी में घर आते हैं और होली के बाद फिर बेंगलुरु लौट जाते हैं।
उदास चेहरे के साथ जूली कहती हैं, ‘जब पति साथ होते हैं, काम बांटने में आसानी होती है। अपने सुख-दुख साझा कर सकते हैं। बच्चों की परवरिश बेहतर होती है। उनके बिना मेरा ख्याल रखने वाला कोई नहीं है। अगर मैं बीमार हो जाऊं तो डॉक्टर के पास खुद ही जाती हूं, दवा लेती हूं और ठीक होते ही फिर काम पर लग जाती हूं। अब तो बस फोन पर ही उनसे बात होती है। छठ जैसे त्योहारों पर उनके बिना बहुत खालीपन महसूस होता है।’
गांव में महिलाओं को यह डर भी रहता है कि अगर उनके पति वापस ना लौटे तो? कई राज्यों में बिहार के आप्रवासियों पर होने वाले हमले और मारपीट की खबरें इन्हें परेशान करती हैं। जूली कहती हैं कि नीतीश सरकार ने कुछ नहीं किया। वो कहती हैं, ‘अगर गांव में कंपनियां होतीं, तो यह सवाल ही नहीं उठता कि पति के बिना हम कैसे रहें।’
कर्ज और उधार के बोझ तले महिलाएं
गांव में कई महिलाओं ने अपनी बेटी की शादी या पशु खरीदने के लिए उधार लिया है। अब उसे चुकाने की जिम्मेदारी उनकी अकेले की है। सुनैना देवी के पति चेन्नई में मजदूरी करते हैं। महीने का पांच से दस हजार घर भेजते हैं। सुनैना कहती हैं, ‘पिछले दो महीने से वो भी नहीं आ रहा।’
नीतीश सरकार ने चुनाव से कुछ ही दिन पहले बिहार ग्रामीण आजीविका परियोजना से जुड़ी जीविका दीदी योजना शुरू की है, जिसके तहत बिहार में महिलाओं के बैंक अकाउंट में दस हजार रूपए ट्रांसफर किए जाते हैं। सुनैना को भी इसका लाभ मिला है। पर इन गांव में कई महिलाएं ऐसी हैं जो शादी, बीमारी, इलाज या खेती-बाड़ी के लिए माइक्रोफाइनेंस कंपनियों से कर्ज लेती हैं। सुनैना ने भी कर्ज लिया हुआ है। गांव में औसतन हर महिला पर बीस हजार रूपए तक का कर्ज बकाया है। ये कंपनियां आम तौर पर सालाना 20 से 30 प्रतिशत की दर से ब्याज वसूलती हैं।
सुनैना बताती हैं, ‘पिछले साल बेटी की शादी में छह लाख रूपए लोन लिया था। वो अभी चुकाना बाकी है। जीविका के पैसों से गाय खरीदी है। इसकी कीमत 12 हजार रूपए पड़ी। इसके लिए दो हजार रूपए उधार लिए। महिलाएं जब उधार लेती हैं, तो ब्याज ज्यादा लिया जाता है। हमारे परिवार पर कर्ज बढ़ गया है और अभी तीन बच्चों की शादी करनी है। मैं खेतों में मजदूरी कर कुछ पैसा कमा लेती हूं। लेकिन इतना काफी नहीं है। मेरे पति अब विदेश जाकर काम ढूंढने की तैयारी कर रहे ’
नई दिल्ली, 12 नवंबर । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय भूटान दौरे पर हैं। अपनी यात्रा के दूसरे दिन, बुधवार को उन्होंने कालचक्र अभिषेक का उद्घाटन किया। इस दौरान पीएम मोदी ने खुद को सौभाग्यशाली बताया। पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उद्घाटन कार्यक्रम की तस्वीर पोस्ट की। तस्वीर में पीएम मोदी भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक, चतुर्थ नरेश के साथ नजर आए। उन्होंने लिखा, "भूटान के राजा महामहिम जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक और महामहिम चतुर्थ नरेश के साथ कालचक्र 'समय का चक्र' अभिषेक का उद्घाटन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसकी अध्यक्षता परम पावन जे खेंपो ने की, जिसने इसे और भी विशेष बना दिया।"
उन्होंने लिखा, "यह दुनिया भर के बौद्धों के लिए एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है जिसका सांस्कृतिक महत्व बहुत अधिक है। कालचक्र अभिषेक चल रहे वैश्विक शांति प्रार्थना महोत्सव का एक हिस्सा है, जिसने बौद्ध धर्म के भक्तों और विद्वानों को भूटान में एक साथ लाया है।" भूटान के प्रधानमंत्री छेरिंग तोबगे ने 'एक्स' पर लिखा, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पवित्र कालचक्र अभिषेक का उद्घाटन और आशीर्वाद दिया, जो आज चल रहे वैश्विक शांति प्रार्थना महोत्सव के एक भाग के रूप में शुरू हुआ।" इससे पहले पीएम मोदी ने थिम्पू में भूटान के चौथे नरेश जिग्मे सिंग्ये वांगचुक से मुलाकात की थी। उन्होंने मुलाकात की तस्वीर 'एक्स' पर पोस्ट करते हुए बताया, "महामहिम चतुर्थ नरेश के साथ एक अच्छी बैठक हुई।
भारत-भूटान संबंधों को और मजबूत करने के लिए पिछले कुछ वर्षों में उनके व्यापक प्रयासों की सराहना की। ऊर्जा, व्यापार, प्रौद्योगिकी और कनेक्टिविटी में सहयोग पर चर्चा हुई। गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी परियोजना की प्रगति की सराहना की, जो हमारी एक्ट ईस्ट नीति के अनुरूप है।" 11 नवंबर, 1955 को जन्मे जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने भूटान के चौथे नरेश के रूप में कार्य किया। उनका शासनकाल 1972 से 2006 तक चला और उन्हें भूटान के सबसे दूरदर्शी और प्रिय राजाओं में से एक माना जाता है। उनके नेतृत्व में, भूटान का आधुनिकीकरण हुआ, राष्ट्रीय एकता मजबूत हुई और एक अद्वितीय सुख-आधारित दर्शन अपनाया गया जिसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली। --(आईएएनएस)
नई दिल्ली, 12 नवंबर । संयुक्तता और मिशन तत्परता का अद्भुत प्रदर्शन करते हुए थलसेना और भारतीय वायुसेना ने एक समन्वित एयरबोर्न अभ्यास को अंजाम दिया। दोनों सेनाओं ने यह प्रदर्शन अभ्यास ‘मरु ज्वाला’ के तहत किया है।
इस प्रभावशाली अभ्यास में थलसेना व वायुसेना ने सटीकता, तालमेल और परिचालन दक्षता का अद्वितीय प्रदर्शन किया। वहीं भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान सीमा के पास राजस्थान के थार रेगिस्तान में सैन्य अभ्यास 'महागुजराज' को अंजाम दिया है। सेना के मुताबिक, इस अभ्यास ने यह सिद्ध किया कि भारतीय सशस्त्र बल जटिल एयरबोर्न अभियानों की योजनाओं, समन्वय और निष्पादन में एकीकृत रूप से कार्य करने में सक्षम हैं। सेना ने बुधवार को इस संबंध में जानकारी देते हुए कहा कि यह अभ्यास भारतीय सशस्त्र बलों की संयुक्त युद्धक क्षमता का शानदार प्रतीक रहा। यहां सशस्त्र बलों के बीच रणनीतिक तालमेल और तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिली। यह रणनीतिक तालमेल भविष्य के बहु-आयामी युद्धक्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाने में सक्षम है। यह अभ्यास दक्षिणी कमान की सुदर्शन चक्र कोर के तहत एकीकृत त्रि-सेवा अभ्यास ‘त्रिशूल’ का हिस्सा था।
लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ, जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, दक्षिणी कमान ने प्रत्यक्ष रूप से इस अभ्यास को देखा। उन्होंने एयरबोर्न बलों, सुदर्शन चक्र कोर और भारतीय वायुसेना के अधिकारियों व जवानों की उच्च स्तर की संचालनिक तत्परता और पेशेवर क्षमता की सराहना की। भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान सीमा के पास राजस्थान के थार रेगिस्तान में सैन्य अभ्यास ‘महागुजराज’ पूरा किया है। इसी दौरान थल सेना, वायुसेना और नौसेना ने संयुक्त अभ्यास भी किया। इसका उद्देश्य तीनों सेनाओं की संयुक्त युद्धक क्षमताओं और समन्वय का प्रदर्शन करना था। यह संयुक्त त्रि-सेवा युद्धाभ्यास ‘त्रिशूल’ का हिस्सा था। वहीं वायुसेना के अभियान ‘महागुजराज’ नाम से संचालित किए गए।
भारतीय वायुसेना ने पश्चिमी क्षेत्र में अभ्यास महागुजराज-25 का आयोजन किया। यह अभ्यास 28 अक्टूबर से 11 नवंबर तक चला। संचालनिक उत्कृष्टता और संयुक्त तत्परता की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए भारतीय वायुसेना का यह व्यापक अभ्यास वायुसेना की क्षमता को प्रमाणित करता है। वायुसेना अपनी इस क्षमता के माध्यम से विभिन्न वायु अभियानों के संपूर्ण दायरे को कवर करती है। इसके अंतर्गत वायुसेना एयर कैंपेन से लेकर समुद्री और एयर-लैंड मिशनों तक प्रभावी ढंग से संचालन करने में सक्षम है। -(आईएएनएस)
कोच्चि, 8 नवंबर। केरल के कोच्चि के एडापल्ली में शनिवार को एक कार मेट्रो के मेट्रो के खंभे से टकराने के कारण उसमें सवार दो युवकों की मौत हो गई। पुलिस ने यह जानकारी दी।
मृतकों की पहचान अलप्पुझा जिले के रहने वाले मुनीर (21) और हारून शाजी (22) के रूप में हुई है।
कार चालक और एक अन्य यात्री को गंभीर रूप से घायल अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
पुलिस के अनुसार, यह दुर्घटना तड़के साढ़े तीन बजे हुई जब ये युवक नेदुम्बस्सेरी हवाई अड्डे से अपने घर लौट रहे थे।
पुलिस के एक अधिकारी ने कहा, "एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि कार की गति बहुत तेज थी। दुर्घटना के सही कारण का पता लगाना बाकी है।"
पुलिस ने बताया कि मेट्रो के खंभे से टकराने के बाद वाहन पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। (भाषा)
सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने शुक्रवार यानी 7 नवंबर को आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों में नया आदेश जारी किया.
शीर्ष अदालत ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के अधिकारियों से कहा है कि सरकारी और निजी अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और रेलवे स्टेशन जैसी सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाया जाए.
इसके बाद उनकी नसबंदी और टीकाकरण कराकर उन्हें शेल्टर होम में रखा जाए. इसके साथ ही कोर्ट ने हाईवे और एक्सप्रेसवे से आवारा जानवरों और मवेशियों को हटाने का भी आदेश दिया.
कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि इन निर्देशों का सख़्ती से पालन होना चाहिए. पिछले तीन महीनों में सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों में कई बार हस्तक्षेप किया है.
इन आदेशों का विरोध भी हुआ, जिसके बाद कोर्ट को कुछ निर्देशों में संशोधन करना पड़ा. आइए समझते हैं कि इन सभी आदेशों के बाद अब सरकारों को क्या-क्या करना होगा.
मामले की शुरुआत कैसे हुई?
आवारा कुत्तों से जुड़े कई मामले सुप्रीम कोर्ट और अलग-अलग हाई कोर्टों में लंबित थे. इस बीच, 28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लिया.
इस रिपोर्ट में दिल्ली की एक छह साल की बच्ची की मौत का ज़िक्र था, जिसे आवारा कुत्ते ने काट लिया था.
कोर्ट ने इसे "चिंताजनक और परेशान करने वाला" मामला बताया और कहा कि दिल्ली में कुत्तों के काटने की हज़ारों घटनाएं रोज़ दर्ज होती हैं.
इसके बाद, 11 अगस्त की सुनवाई में कोर्ट ने दिल्ली और एनसीआर (नोएडा और गाज़ियाबाद सहित) से सभी आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर में रखने का आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि वहाँ उनकी नसबंदी और टीकाकरण किए जाएंगे और उन्हें दोबारा सड़कों पर नहीं छोड़ा जाएगा.
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी व्यक्ति या संगठन ने अगर इस आदेश में बाधा डाली, तो उसके ख़िलाफ़ अवमानना की कार्रवाई की जाएगी.
साथ ही अदालत ने यह निर्देश भी दिया कि शेल्टर में रखे गए कुत्तों की उचित देखभाल और निगरानी सुनिश्चित की जाए.
इस फ़ैसले का बहुत विरोध किया गया. इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन भी हुए. कोर्ट के फैसले की एक बड़ी आलोचना यह थी कि शहर में कुत्तों के लिए पर्याप्त शेल्टर नहीं हैं.
इस विरोध के बाद मामला एक बड़ी तीन जजों की पीठ को सौंपा गया. इस पीठ ने देशभर में चल रहे आवारा कुत्तों से जुड़े सभी मामलों को अपने पास ट्रांसफर कर लिया.
22 अगस्त को इस पीठ ने पहले आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि नसबंदी और टीकाकरण के बाद कुत्तों को उसी इलाके में वापस छोड़ा जाएगा, जहाँ से उन्हें पकड़ा गया था. केवल रेबीज़ से संक्रमित कुत्तों को ही शेल्टर में रखा जाएगा.
साथ ही, हर इलाके में कुत्तों को खाना देने के लिए निर्धारित स्थल तय करने को कहा गया. कोई व्यक्ति या संगठन कुत्ते को गोद लेना चाहे तो वह म्युनिसिपल अधिकारियों को आवेदन दे सकता है.
इसके साथ मामला सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रहा. कोर्ट ने यह आदेश सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू कर दिया. और उनसे जवाब भी मांगा कि वे अपने यहाँ जानवरों से जुड़े ऐसे मुद्दों के लिए क्या कदम उठा रहे हैं.
7 नवंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्कूल, अस्पताल, खेल परिसर, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन जैसी जगहों पर कुत्तों के काटने की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं. और कहा कि यह प्रशासन की उदासीनता और सिस्टम की नाकामी को दर्शाती हैं. इससे लोगों की सुरक्षा, पर्यटन और भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी बुरा असर पड़ रहा है.
कोर्ट ने कहा कि साल दर साल आवारा कुत्तों की लोगों को काटने की घटनाएँ बढ़ रही हैं. सरकारी डेटा के मुताबिक 2023 में देश भर में 30 लाख के करीब ऐसी घटनाएँ हुई, और 2024 में क़रीब 37 लाख ऐसी घटनाएँ.
इससे निपटने के लिए कोर्ट ने ये दिशानिर्देश जारी किए:
सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दो हफ़्ते के अंदर ऐसे निजी और सरकारी अस्पताल, शैक्षणिक संस्था इत्यादि की सूची बनानी होगी. इन जगहों पर पर्याप्त बाउंड्री वॉल, फेंसिंग और गेट लगाने होंगे ताकि आवारा कुत्ते घुस ना सके. ऐसा जल्द से जल्द करना होगा, और हो सके तो आठ हफ्तों के अंदर.
इन सभी अस्पतालों, खेल परिसरों, शैक्षणिक संस्थाओं को एक अधिकारी नामित करना होगा जो जगह की देख-रेख करे.
स्थानीय नगरपालिका या पंचायत तीन महीने में एक बार इन जगहों का निरीक्षण करें.
नगरपालिका अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि इन परिसरों में मौजूद आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर होम में रखा जाए, उनकी नसबंदी और टीकाकरण हो, और उन्हें दोबारा उन्हीं इलाकों में न छोड़ा जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों से आठ हफ़्तों के भीतर यह रिपोर्ट मांगी है कि वे इन आदेशों को कैसे लागू कर रहे हैं.
मवेशी और आवारा पशुओं के लिए भी आदेश
कोर्ट ने मवेशियों और आवारा पशुओं के मुद्दे पर भी आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि मवेशियों और आवारा पशुओं के कारण रोड और हाईवे पर दुर्घटना होते रहती है.
इसलिए, म्युनिसिपल, राज्य और नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के अधिकारियों को हाईवे और एक्सप्रेसवे से मवेशियों और आवारा पशुओं को हटाना होगा.
इन्हें पकड़कर गोशालाओं या शेल्टर होम में रखा जाए, जहाँ उनकी उचित देखभाल हो सके.
अदालत ने अधिकारियों को आदेश दिया कि सड़कों पर 24 घंटे निगरानी रखी जाए ताकि कोई पशु दोबारा सड़कों पर न आए.
कोर्ट ने यह भी कहा कि हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के मुख्य सचिव अपने स्तर पर ज़िम्मेदारी तय करें और आदेशों के पालन में किसी तरह की लापरवाही पाए जाने पर संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भी सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आठ हफ़्तों के भीतर रिपोर्ट मांगी है कि वे इन दिशा-निर्देशों का पालन कैसे कर रहे हैं.
आगे क्या?
कोर्ट के इन फैसलों के बाद अब सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सार्वजनिक स्थलों, जैसे अस्पताल, खेल परिसर, रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन और शैक्षणिक संस्थानों से आवारा कुत्तों को उठा कर शेल्टर घरों में रखना होगा. साथ ही, हाईवे और एक्सप्रेसवे पर मवेशियों और आवारा पशुओं को भी हटाना होगा.
ये फ़ैसला कितना लागू होने पाता है, ये देखने वाली बात होगी. अब भी सबसे बड़ा सवाल है कि इन आवारा जानवरों और कुत्तों को रखा कहा जाएगा.
हालांकि, कोर्ट ने जानवरों को हटाने के लिए कोई समय सीमा नहीं दी है, बस ये कहा है कि आठ हफ्तों में रिपोर्ट दायर करनी होगी कि राज्यों ने क्या कदम उठाए हैं.
पशु कल्याण से जुड़े कई संस्थानों ने कोर्ट के शुक्रवार को दिए गए फैसले की आलोचना की.
पशु अधिकार संगठन पेटा इंडिया ने अपने एक प्रेस रिलीज़ में कहा कि कोर्ट का फैसला "ज़मीनी वास्तविकता से जुड़ा नहीं है".
पेटा ने कहा कि देश भर में पाँच करोड़ से ज़्यादा आवारा कुत्ते हैं और 50 लाख से ज़्यादा मवेशी हैं. उसका कहना था कि इन्हें रखने के लिए पर्याप्त शेल्टर होम अभी नहीं हैं.
बीजेपी की पूर्व सांसद मेनका गांधी ने समाचार एजेंसी एनआई को कहा कि कोर्ट का नया फैसला पिछले फैसले वाली दिक्कतों का सामना करेगा, जिसे कोर्ट को बाद में बदलना पड़ा था. उन्होंने कहा कि वे इस फैसले को आगे कोर्ट में चुनौती देंगी.
उन्होंने कहा कि अगर कुत्तों को रेलवे स्टेशन, स्कूलों और कॉलेजों से हटाया जा सकता था, तो ये हो जाता.
वे बोलीं, "अगर इन्हें हटाया गया, तो ये जानवर जाएँगे कहाँ?" उनके मुताबिक अगर कुत्तों को उनकी जगह से हटा कर रोड पर लाया गया तो उससे आम नागरिकों को खतरा और बढ़ जाएगा.
कुछ बातें स्पष्ट नहीं
सुप्रीम कोर्ट के सामने 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने एक एफिडेविट दायर की है, जिसमें उन्होंने बताया है कि उनके यहाँ कितने शेल्टर होम हैं और उन्होंने कितने आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण की है.
दिल्ली में 20 जानवरों के लिए 'एनिमल बर्थ कंट्रोल सेंटर' हैं. ये 'एनिमल बर्थ कंट्रोल' नियम के तहत बनाए जाते हैं. पिछले छह महीनों में हर सेंटर पर रोज़ाना 15 आवारा कुत्तों की नसबंदी और उनका टीकाकरण हुआ है.
महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा ऐसे एनिमल बर्थ कंट्रोल सेंटर है. पूरे राज्य में 236 ऐसे सेंटर हैं. वहीं, उत्तर प्रदेश के 17 शहरों में ऐसे सेंटर हैं और बिहार में एक भी ऐसा सेंटर नहीं है, लेकिन कुत्तों के लिए 16 जगहों पर व्यवस्था है.
पशु अधिकार कार्यकर्ता गौरी मौलेखी, जो इस मामले में भी शामिल थी, उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा, "(इस फ़ैसले से) जानवरों से प्यार करने वालों और अधिकारियों जिन्हें जानवरों को हटाने पर मजबूर किया गया है, उनके बीच झगड़ा बढ़ेगा."
कई स्कूलों और कॉलेजों में भी आवारा कुत्तों को पाला जाता है. इसी साल जून में विश्वविदालय अनुदान आयोग ने कहा था कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जानवरों का देखभाल करने के लिए सोसाइटी बनाई जाए. इनमें संस्थानों में जानवरों को खाना देने लिए जगह बनाई जाए. तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ऐसे संस्थानों में कुत्तों को हटाया जाएगा या उन्हें रहने दिए जाएगा ये अभी स्पष्ट नहीं है.
ये भी गौर करने वाली बात है, कि कोर्ट ने जानवररों को केवल हटाने को नहीं कहा, लेकिन यह भी कहा कि रेलवे स्टेशन, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज इत्यादि में दीवार या फेंसिंग होनी चाहिए. जानवरों को हटाने के साथ ये भी एक बड़ा काम होगा, जिसे राज्यों को आठ हफ्तों के अंदर करना होगा.
इस मामले की अगली सुनवाई 13 जनवरी को है, तब ये बात और साफ़ होगी कि इन आदेशों का कितना पालन हो पाया है.
नई दिल्ली, 7 नवंबर । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जानकारी दी है कि इजरायल के साथ मुस्लिम देश कजाकिस्तान भी अब्राह्म समझौते में शामिल होने जा रहा है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अब्राहम समझौते में शामिल होने वाला कजाकिस्तान पहला देश है। आइए जानते हैं कि अब्राहम समझौता क्या है और इसकी कब शुरुआत हुई। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर इसका ऐलान करते हुए लिखा, "मैंने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कसीम-जोमार्ट तोकायेव के बीच एक शानदार बातचीत की। कजाकिस्तान मेरे दूसरे कार्यकाल का पहला देश है जो अब्राहम समझौते में शामिल हुआ है।" अमेरिकी राष्ट्रपति ने आगे कहा कि यह दुनियाभर में सेतु बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
आज, मेरे अब्राहम समझौते के माध्यम से और भी कई देश शांति और समृद्धि को अपनाने के लिए कतार में खड़े हैं। हम जल्द ही इसे आधिकारिक बनाने के लिए एक हस्ताक्षर समारोह की घोषणा करेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति ने जानकारी दी है कि वह कई अन्य देशों से इस शक्ति समूह में शामिल होने के लिए बातचीत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि स्थिरता और विकास के लिए देशों को एकजुट करने में अभी बहुत कुछ बाकी है, वास्तविक प्रगति, वास्तविक परिणाम। अब्राहम समझौते की शुरुआत ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में की थी।
2020 में अब्राहम समझौते की शुरुआत हुई थी, जिसके तहत इजरायल और अरब देशों के बीच आधिकारिक तौर पर संबंध की शुरुआत हुई थी। यहूदी, ईसाई और इस्लाम के पैगंबर के नाम पर ही इस समझौते का नाम अब्राहम रखा गया। अमेरिकी राष्ट्रपति की पहल पर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने इजरायल के साथ संबंध स्थापित किए।
फिलिस्तीन को लेकर इजरायल और अन्य मुस्लिम देशों के बीच काफी तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई थी। हालांकि, इस समझौते के तहत अरब और मुस्लिम देशों ने इजरायल के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए। यूएई के बाद मोरक्को, बहरीन और सूडान भी इसमें शामिल हुए। इस समझौते से जुड़े देशों ने इजरायल में अपनी एंबेसी खोलने पर सहमति जताई। इसके साथ ही व्यापार और पर्यटन की भी शुरुआत हुई, हालांकि गाजा में इजरायल के युद्ध का इस समझौते पर गहरा असर पड़ा। बीते कुछ सालों से इस समझौते में कोई प्रगति देखने को नहीं मिली, हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में जानकारी दी है कि इस समझौते में अब अन्य कई मुस्लिम देश भी शामिल होंगे। इसका ऐलान आधिकारिक तौर पर किया जाएगा। अगर कजाकिस्तान की बात करें तो इजरायल के साथ हमेशा से ही इसके अच्छे संबंध रहे हैं। कजाकिस्तान में 70 फीसदी आबादी मुस्लिमों की रही है, बावजूद इसके इजरायल के साथ इसके संबंध अच्छे रहे। वहीं अब्राहम में इसके शामिल होने से दोनों देशों के बीच की दोस्ती और मजबूत होगी। --(आईएएनएस)


