विचार/लेख
विष्णु नागर
हमारे समय में ये चूहा- दौड़ नहीं थी कि 90 प्रतिशत नंबर भी आए हैं तो मुंह लटका हुआ है। फेल होने जैसा अहसास है। हमारे समय तो साठ प्रतिशत अंक भी आ जाएं तो बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। 90 और 100 प्रतिशत अंक लाने की बात तो सपने तक में सोच नहीं सकते थे,जबकि इस बार तो दसवीं के 11 हजार छात्र-छात्राओं को गणित में सौ में से सौ नंबर मिले हैं! यह भेडिय़ा धसान है और कुछ नहीं।
मेरे बच्चे जब पढ़ रहे थे, तब चूहा -दौड़ तो थी मगर ऐसी नहीं थी। हमें किसी कोचिंग सेंटर में उनको भेजने की न जरूरत हुई, न उन्होंने इसकी आवश्यकता महसूस की। साल में कुछ महीने ट्यूशन जरूर की मगर दिन- रात उसी में भिड़े हैं, ऐसी स्थिति नहीं थी। उन्हें खेलने का, कोर्स के इतर तरह- तरह की किताबें- पत्रिकाएं पढऩे का, अलग- अलग तरह की रुचियों को विकसित करने का भरपूर मौका मिला।
उन्होंने जीवन का तब भी आनंद लिया और अब भी ले रहे हैं। वे एक जगह पहुंच गए हैं मगर उसके बाद उन्हें और ऊंची किसी जगह पहुंचने की कोई जल्दी नहीं है, वे किसी प्रतियोगिता में नहीं हैं। स्वाभाविक रूप से, उनकी योग्यता के अनुरूप मिले तो ठीक वरना कोई हाय -हाय नहीं। कोई कुंठा नहीं।
यह सब किसी और का नहीं, उस समय का कमाल है, जो उन्हें बचपन और छात्र जीवन में अपनी तरह का बनने के लिए मिल सका। जीवन ने उन्हें सफलता की मशीन बनाकर नहीं छोड़ा। अपनी तरह विकसित होने का अवकाश दिया।
और हम भी जो साधारण सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में पढ़े, न पढऩे में कभी बहुत अच्छे थे, न खेलने में, न किसी और काम में, सबमें सामान्य थे, हम भी कुल मिलाकर ठीक ही रहे।
और ये सब ख्याल आया आज ' इंडियन एक्सप्रेस ' में जेएनयू के भूतपूर्व प्रोफेसर अभिजीत पाठक का लेख पढक़र, जो उन्होंने नंबर की दौड़ में छात्रों की रचनात्मकता को नष्ट करने, उसे मशीन का पुर्जा बना देने के विरुद्ध लिखा है।
अब भी बच्चे रचनात्मक बनते हैं मगर उसके लिए ऐसी जिद होनी चाहिए, जो सफलता के तमाम आकर्षणों को ठुकरा सके। उनके आगे मजबूती से खड़ी रह सके, जबकि उनके आसपास सफलता का समुद्र लहरा रहा है और अनेक मामलों में उनके मां-बाप इतने समर्थ हैं कि उन्हें इस समुद्र का अच्छा तैराक बनाने की स्थिति में हैं!
मेरे मन में भी एक बार यह कुंठा जागी थी कि पढऩे में आगे रहनेवाला मेरा बेटा आइएएस बने। उसने इससे साफ इन्कार कर दिया और आज इन अफसरों की हालत देखता हूं तो उसने बहुत अच्छा निर्णय लिया।
और जो कहानी मैं अपने बच्चों के माध्यम से कह रहा हूं, वह केवल मेरे बच्चों की नहीं, कमोबेश उनके समय की कहानी है। यह अलग बात है कि उनमें से किसने आगे चलकर क्या रास्ता चुना मगर उनके समय ने उन्हें चुनाव की आजादी दी थी,जो अब सिकुड़ती जा रही है। समाज रचनात्मक सोच का दुश्मन बनता जा रहा है।सफलता एक ऐसा शून्य पैदा कर रही है, जो जीवन को सुविधाओं से संपन्न करने के साथ जीना मुश्किल बनाती जा रही है। एक निरुद्देश्य जीवन सबकी महत्वाकांक्षा बनता जा रहा है।
इस समय जो सफल हैं, वे सबसे अधिक असफल हैं।
पुष्य मित्र
2013-14 की बात होगी, जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को अपना पीएम कैंडीडेट घोषित कर दिया था। मोदी बिहार में रैली करने आने वाले थे। तब नीतीश कुमार ने कहा था, हमारे पास, बिहार भाजपा के पास अपना मोदी है ही। हमें किसी और मोदी की जरूरत नहीं। कभी इतने पावरफुल से नीतीश और सुशील मोदी।
तब सुशील मोदी उनके डिप्टी हुआ करते थे। दोनों की जोड़ी शासन के लिहाज से अच्छी मानी जाती थी। सुशील मोदी नीतीश को प्रिय थे। मगर भाजपा के लोगों ने इसका मतलब यह लगाया कि सुशील मोदी ने नीतीश के आगे भाजपा को समर्पण करा दिया है, अब जब तक सुशील मोदी रहेंगे बिहार में भाजपा आत्मनिर्भर नहीं हो पाएगी। ऐसे में 2020 में सुशील मोदी को साइड लाइन कर दिया गया। उनके मित्र नीतीश की एक न चली।
साइड लाइन होने पर सुशील मोदी नीतीश और उनकी सरकार पर तब हमलावर होने लगे जब नीतीश राजद के साथ चले गए। तब नीतीश उनकी बातों को यह कह कर हंसी में उड़ाते रहते कि क्या कीजिएगा, उनकी पार्टी में इसी वजह से पूछ बढ़ जाए तो अच्छा ही न है। मगर सुशील मोदी की भाजपा में पूछ नहीं बढ़ी। वे खुद ही स्वयं सेवक भाव से तथ्य और तर्कों से पार्टी की सेवा करते रहे। पार्टी उन्हें निर्ममता से साइड लाइन करती रही। शायद इसकी एक ही वजह थी कि कभी सुशील मोदी ने कह दिया था नीतीश में पीएम बनने के सभी गुण हैं।
फिर नीतीश भाजपा के साथ आ गए और खुद भी उसी गति को प्राप्त हो रहे हैं, जिस गति में उनके मित्र सुशील मोदी थे। दोनों ने संघर्ष के बदले समझौते को तरजीह दी थी। समर्पण किया था।
देख रहा हूं, आज जब सुशील मोदी की अंतिम यात्रा निकल रही है, आज भी उनके फेसबुक पेज से नरेंद्र मोदी के वाराणसी सीट से नामांकन के वीडियो को लाइव किया जा रहा है। उनके निधन का जिक्र तक नहीं।
निश्चित तौर पर सुशील मोदी तथ्य और तर्क के सहारे लोकतांत्रिक राजनीति करने वाले एक दक्षिणपंथी नेता थे, सौभाग्य से उनकी राजनीति का उभार समाजवादियों के संगत में हुआ था। जेपी आंदोलन की छाप उन पर थी। मगर वे और उनके जैसे नेता 2014 के बाद अपनी ही पार्टी में मिसफिट होते चले गए। वे उग्र हिंदुत्व की राजनीति चाह कर भी ठीक से नहीं कर पाते थे। लोकतांत्रिक मान्यताओं के बीज उनमें थे।
एक दफा बिहार के वित्त विभाग से जुड़ी एक स्टोरी के सिलसिले में मैं उनसे बाइट लेने गया था। तब बिहार में महागठबंधन की सरकार थी। उन्होंने मना कर दिया यह कहते हुए कि जिस विभाग में मैं रहता हूं, उसके बारे में मैं दो तीन साल कोई भी कमेंट करने से बचता हूं। यह मैंने नीतीश जी से सीखा है। वे भी रेल मंत्रालय से हटने के बाद उससे जुड़े विषय पर टिप्पणी करने से बचते थे। पता नहीं उन्होंने यह दिल से कहा या मुझे किसी बहाने से टालना चाहते थे। मगर यह बात उस वक्त मुझे अच्छी लगी। अब वे चले गए हैं। कैंसर ने उन्हें हमसे छीन लिया है। एक पत्रकार के तौर पर मुझे उनकी कमी खलेगी, क्योंकि भाजपा में अब शायद ही कोई ऐसा है जिससे वैसी बातें की जा सकेगी, जैसी उनसे की जा सकती थी। और अब शायद ही कोई ऐसा नेता भी होगा जो हर कॉल का कॉल बैक करेगा। अलविदा। नमन
ध्रुव गुप्त
बहुत सारे टीवी विज्ञापनों में लड़कियों का जैसा कामुक और अपमानजनक इस्तेमाल हो रहा है वह शर्मनाक है। यहां कई उत्पादों को प्रोमोट करने वाली लड़कियों को एक स्वतंत्र, विचारवान अस्तित्व की तरह नहीं, सेक्स टॉयज की तरह पेश किया जा रहा है। कंडोम के कुछ विज्ञापनों में खास ब्रांड के कंडोम देखकर वे ऐसी कामोत्तेजक मुद्राएं दिखाती है कि देखने वालों को शर्म आ जाए। समझ नहीं आता कि ये विज्ञापन कंडोम के प्रति जनचेतना फैला रहे हैं या कामुकता। यही नहीं, विज्ञापनों में किसी ख़ास ब्रांड का सूट, जीन्स, बनियान और यहां तक कि अंडरवियर पहनने वाले लडक़ों के इर्दगिर्द ये लडकियां मक्खियों की तरह मंडराती दिखाई जाती हैं। किसी खास ब्रांड के परफ्यूम या डियो लगाने वाले मर्दों के पीछे तो वे अपना सर्वस्व न्योच्छावर करने को तैयार हो जाती हैं। किसी खास कंपनी की बाइक अगर आपके पास है तो लिफ्ट मांगकर सरेराह आपसे लिपटने-चिपटने वाली लड़कियों की भी यहां कमी नहीं है। यह भी कि अगर आपके घर का बाथरूम किसी खास कंपनी के उपकरणों से सुसज्जित है तो कोई अनजान लडक़ी भी आपके बाथरूम में प्रवेश कर आपको सेक्सी नृत्य करके दिखा सकती हैं। यहां पुरुष के अंतर्वस्त्र देख नाचने-गाने वाली लड़कियां भी हैं और उन्हें छूकर चरम सुख का अहसास करने वाली लड़कियां भी।
टेलीविजऩ पर आने वाले ऐसे विज्ञापनों को देखकर हैरत होती है कि क्या सचमुच हमारे देश की लडकियां इतनी ही खाली दिमाग, मूर्ख और कामातुर हैं ? अगर ऐसा नहीं तो स्त्रियों की अस्मिता और स्वाभिमान को ललकारने वाले ऐसे अश्लील, विकृत, अपमानजनक विज्ञापनों के खिलाफ कहीं से भी कोई आवाज़ क्यों नहीं उठती ?
चंदन कुमार जजवाड़े
पटना में रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथ में बीजेपी का सिंबल (कमल) देखा गया।
आमतौर पर चुनाव प्रचार में किसी दल के सबसे बड़े नेता के हाथ में किसी अन्य दल का चुनाव चिह्न देखने को नहीं मिलता है।
रविवार को बिहार की राजधानी पटना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार रोड शो किया। यह इलाक़ा पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के लोकसभा क्षेत्र में आता है।
प्रधानमंत्री के रोड शो को देखने के लिए बीजेपी के अलावा जेडीयू के समर्थक भी बड़ी संख्या में पटना की सडक़ों पर मौजूद थे।
इस दौरान पटना की सडक़ों पर सुरक्षा व्यवस्था काफ़ी कड़ी कर दी गई थी और कई सडक़ों को वाहनों के लिए बंद कर दिया गया था।
इससे पटना में कई रेलवे स्टेशन और अन्य जगहों पर लोगों को काफ़ी परेशानी भी हुई।
पटना में नरेंद्र मोदी के साथ नीतीश कुमार की इस तस्वीर को सोशल मीडिया पर कई लोगों ने साझा किया है। रोड शो के दौरान नीतीश कुमार की बॉडी लैंग्वेज को लेकर भी लोग कई तरह की चर्चा कर रहे हैं।
वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, ‘नीतीश कुमार एक हारे हुए, थके हुए नेता की मन:स्थिति में दिखते हैं। उन्हें बार-बार यह कहने की ज़रूरत पड़ती है कि अब बीजेपी का साथ छोडक़र कहीं नहीं जाएंगे। यह पूरी तरह आत्मसमर्पण का भाव है। वो चाहते हैं कि अब बीजेपी के सहारे आगे की जि़ंदगी सुविधा में कट जाए।’
क्या थक चुके हैं नीतीश कुमार?
नीतीश कुमार पहली बार साल 1985 में बिहार विधानसभा का चुनाव जीतकर विधायक बने थे। नीतीश ने पहली बार साल 1989 में लोकसभा चुनाव जीता था और साल 1990 में वो पहली बार केंद्र सरकार में मंत्री भी बनाए गए थे।
नीतीश ने साल 2000 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, हालाँकि बहुमत ना होने से वह सरकार एक हफ़्ते भी नहीं चल पाई थी।
इस तरह से नीतीश का राजनीतिक सफऱ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से काफ़ी पुराना नजऱ आता है। नीतीश ही मूलरूप से पिछले बीस साल से बिहार की सत्ता पर बैठे हैं और बिहार की सियासत में उनकी सेहत को लेकर भी कई बार चिंता जताई गई है।
पिछले महीने 7 अप्रैल को बिहार के नवादा में चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश कुमार ने पीएम मोदी की मौजूदगी में अपने भाषण में कई बार ग़लतियाँ की थीं। नीतीश ने यहाँ तक कह दिया था कि लोग वोट देकर प्रधानमंत्री मोदी को ‘चार हज़ार लोकसभा’ सीटें देंगे।
अपने भाषण के बाद नीतीश कुमार प्रधानमंत्री मोदी के आगे झुककर उनके पाँव छूते भी नजऱ आए थे। बिहार के सियासी गलियारों में यह तस्वीर चर्चा का एक विषय बन गई थी, जिसे बिहार में विपक्ष ने नीतीश के सम्मान के साथ भी जोड़ा था।
नवादा के बाद बिहार में नरेंद्र मोदी की कुछ सभाओं में नीतीश कुमार मौजूद नहीं थे। उसके बाद से नीतीश के बीजेपी के साथ समीकरण पर कई तरह के सवाल सवाल किए जा रहे थे। हालाँकि बाद में नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी मुंगेर लोकसभा सीट पर प्रचार के दौरान एक साथ मौजूद थे।
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद मानते हैं, ‘नीतीश कुमार ने अपने हाथ में बीजेपी का चुनाव चिह्न उस वक़्त थामा है जब पिछले 20 साल की राजनीति में मोदी अपनी सबसे कमज़ोर स्थिति में हैं। जब मोदी ताक़तवर थे तब नीतीश उनसे झगड़ रहे थे। इसका मतलब है कि नीतीश कुमार अब बहुत कमज़ोर हो चुके हैं।’
सुरूर अहमद के मुताबिक़ नीतीश कुमार की मानसिक स्थिति ऐसी दिखती है कि उनसे जो चाहे करा लो। उन पर सेहत और उम्र का असर जेडीयू के ही नेता जॉर्ज फर्ऩांडिस की याद दिलाता है, जो किसी समय एनडीए का बड़ा चेहरा थे, लेकिन साल 2009 के लोकसभा चुनावों में ख़ुद पाँचवें नंबर पर रहे थे।
बीजेपी को नीतीश की ज़रूरत क्यों
माना जाता है कि नीतीश की लोकप्रियता में गिरावट के दावों के पीछे एक वजह उनका बार-बार पाला बदलना है।
जानकारों के मुताबिक़- नीतीश के साथ आने से एनडीए को भले ही बड़ा फ़ायदा न हो, लेकिन उनके विपक्ष में होने से एनडीए को बड़ा नुक़सान हो सकता था।
माना जाता है कि इसी साल जनवरी में विपक्ष का साथ छोडक़र एनडीए में शामिल होने के बाद ही नीतीश के राजनीतिक क़द को बड़ा नुक़सान हुआ है। अगर वो विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में होते तो उनका क़द और उनकी राजनीतिक हैसियत ज़्यादा बड़ी होती।
लेकिन ऐसी स्थिति में भी बीजेपी को नीतीश कुमार की ज़रूरत क्यों पड़ती है?
पटना में एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक और राजनीतिक मामलों के जानकार डीएम दिवाकर इसके पीछे दो प्रमुख वजह मानते हैं।
उनके मुताबिक़, ‘इस बार मुस्लिम वोटर नीतीश के साथ नहीं दिखते हैं फिर भी बीजेपी को लगता है कि नीतीश जितने भी सेक्युलर वोटों का विभाजन करेंगे उतना ही बीजेपी को फ़ायदा होगा, क्योंकि यह वोट कभी भी बीजेपी का नहीं रहा है।’
‘इसकी दूसरी वजह यह है कि बीजेपी के पास बिहार में कोई सर्वमान्य नेता नहीं है और पार्टी में कई नेता ख़ुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानते हैं। इसलिए नीतीश को आगे कर के बीजेपी अपनी पार्टी के भीतर की कलह को दबा देती है।’
माना जाता है कि नीतीश कुमार के हाथ में बीजेपी के चुनाव चिह्न को देखकर नीतीश के साथ के सेक्युलर वोटों पर असर पड़ सकता है और वो नीतीश से दूर जा सकते हैं।
हालाँकि तस्वीरों में नजऱ आ रहा है कि नीतीश कभी कमल निशान को एक हाथ से दूसरे हाथ में लेते हैं तो कभी अपना हाथ नीचे की तरफ़ ले जाते हैं।
क्या यह बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है?
बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने पत्रकारों से बातचीत में कहा है कि ‘नीतीश जी की स्थिति को देखकर बहुत से लोग दु:खी थे। उनकी बॉडी लैंग्वेज को देखकर ऐसा लग रहा था कि जबरन उनके हाथ में ‘कमल’ थमा दिया गया था।’
तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया है, ‘मोदी जी बिहार आए लेकिन बिहार के बारे में नहीं बोल पाए। क्या बोला उन्होंने नौकरी के बारे में, कारख़ाने के बारे में, निवेश के बारे में, विशेष राज्य के दर्जे के बारे में? मोदी जी काम की बात नहीं करते, वो बेकार की बात करते हैं। नीतीश जी ने कहा था जो साल 2014 में आए थे, वो साल 2024 में चले जाएंगे। वो अंदर से यही चाहते हैं।’
हालाँकि नीतीश कुमार कई बार यह दावा कर चुके हैं कि अव वो एनडीए को छोडक़र कहीं नहीं जाएंगे। माना जाता है कि नीतीश अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम दौर से गुजऱ रहे हैं। इसे उनकी पार्टी जेडीयू के भविष्य के साथ भी जोड़ा जाता है।
बिहार में महागठबंधन की सरकार के दौरान नीतीश कुमार ने ख़ुद अपनी पार्टी के किसी नेता को नहीं बल्कि आरजेडी के तेजस्वी यादव को अपने गठबंधन के भविष्य का नेता बताया था।
नीतीश के महागठबंधन को छोडऩे के बाद तेजस्वी यादव ने दावा किया था कि नीतीश की पार्टी जेडीयू साल 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान टूट जाएगी।
इससे पहले जेडीयू से बग़ावत करते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने भी कऱीब एक साल पहले जेडीयू को लेकर कुछ ऐसा ही दावा किया था।
हालाँकि डीएम दिवाकर कहते हैं, ‘नीतीश या उनकी पार्टी का बीजेपी में विलय नहीं होगा, जेडीयू का अस्तित्व विधानसभा में उनकी ताक़त पर टिका है। लेकिन ऐसा भी लगता है कि लालू प्रसाद यादव अब नीतीश को नहीं अपनाएंगे।’
नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के संबंध
दिसंबर 2003 में बतौर रेल मंत्री नीतीश कुमार गुजरात के कच्छ में एक रेल परियोजना का उद्घाटन करने पहुंचे थे। उस दौरान नीतीश ने नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते हुए उन्हें भावी राष्ट्रीय नेता बताया था। लेकिन मोदी के साथ उनका यह रिश्ता कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है।
साल 2022 में एनडीए का साथ छोडऩे के बाद नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी और बीजेपी पर कई बार तीखे हमले किए थे। नीतीश संविधान, लोकतंत्र और सांप्रदायिकता को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर हमलावर नजऱ आते थे।
इससे पहले भी नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के बीच संबंधों में कई बार उतार-चढ़ाव देखा गया है।
नीतीश और मोदी के बीच पहली तल्ख़ी साल 2010 में तब देखी गई थी, जब पटना में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भोज का आयोजन किया था। लेकिन अख़बार में एक विज्ञापन में मोदी के साथ अपनी तस्वीर से नीतीश इतने नाराज़ हुए थे कि उन्होंने भोज रद्द कर दिया था।
कहा जाता है कि इसी वजह से नीतीश ने साल 2008 में कोसी बाढ़ राहत के तौर पर गुजरात सरकार से मिले 5 करोड़ रुपए भी लौटा दिए थे। जबकि उस वक़्त गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी एक ताक़तवर नेता थे।
साल 2014 लोकसभा चुनावों के पहले बीजेपी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया था। उसके बाद नीतीश कुमार एनडीए से बाहर हो गए थे। उस समय भी बीजेपी और एनडीए के दलों के बीच मोदी की ताक़त बहुत बड़ी थी।
साल 2022 में एनडीए छोडऩे के बाद नीतीश कुमार तो यहाँ तक दावा कर रहे थे कि अब वो मरना पसंद करेंगे लेकिन बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे। वहीं बीजेपी के नेता भी नीतीश के लिए एनडीए का दरवाज़ा बंद बताते थे।
हालाँकि नीतीश बीजेपी के फिर से साथी बने हैं लेकिन इस गठजोड़ ने अब तक बिहार के अगले विधानसभा चुनावों के बारे में खुलकर कुछ नहीं कहा है कि चुनावों में उनका नेता कौन होगा और चुनाव किसके चेहरे पर लड़ा जाएगा। (bbc.com/hindi)
ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने ऐलान किया है कि सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स के नकारात्मक प्रभाव की जांच की जाएगी। सरकार का कहना है कि सोशल मीडिया की पहुंच बहुत ज्यादा है और वे फैसला कर रहे हैं कि लोग क्या देखें।
डॉयचेवैले पर विवेक कुमार का लिखा-
पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया कंपनियों के साथ ऑस्ट्रेलिया की तनातनी बढ़ी है। हाल ही में एक हिंसक वीडियो को सोशल मीडिया साइट एक्स से हटाने को लेकर सरकार और कंपनी के बीच खासी नोकझोंक हुई थी।
सरकार को लग रहा है कि लोग ऑनलाइन क्या देखेंगे, यह फैसला कंपनियां कर रही हैं और सामग्री पर किसी तरह की लगाम नहीं है। इस बारे में जांच के लिए अब एक संसदीय समिति बनाने का फैसला किया गया है।
शुक्रवार को देश के प्रधानमंत्री एंथनी अलबानीजी ने कहा, ‘बहुत सारे मुद्दे हैं। चाहे वह घरेलू हिंसा का मुद्दा हो या युवाओं के कट्टरपंथीकरण का, हमेशा कुछ ना कुछ सामने आता रहता है और बार-बार उसमें सोशल मीडिया की भूमिका दिखाई देती है। वे बहुत सकारात्मक भी हो सकते हैं लेकिन उनका नकारात्मक असर भी है।’
ट्विटर से झगड़ा
अल्बानीजी सरकार एक्स के मालिक ईलॉन मस्क के साथ एक कानूनी लड़ाई भी लड़ रही है। पिछले महीने 16 वर्षीय एक किशोर ने एक चर्च में दो पादरियों पर चाकू से हमला कर दिया था। इस हमले को पुलिस ने एक आतंकवादी घटना बताया। इस किशोर ने पादरी मार मारी इमानुएल के सिर और सीने पर चाकू से हमला किया था। उस घटना के बाद इमानुएल के अनुयायियों ने विरोधस्वरूप हिंसक प्रदर्शन किया और पुलिसकर्मियों पर भी हमले किए।
इस घटना के कई वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए गए। ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों का कहना है कि ये वीडियो और तस्वीरें समुदाय में तनाव बढ़ा रही थीं। लेकिन मस्क ने ये वीडियो एक्स से हटाने से इनकार कर दिया। बाद में अदालती आदेश पर वीडियो सिर्फ ऑस्ट्रेलिया के सर्वर से हटाए गए।
मस्क ने इस आदेश के खिलाफ अदालत में अपील की है। अरबपति उद्योगपति मस्क ने एक्स पर लिखा, ‘हमारी चिंता ये है कि किसी एक देश को पूरी दुनिया के लिए सामग्री पर पाबंदी लगाने दी गई तो किसी देश को पूरे इंटरनेट पर नियंत्रण करने से कैसे रोका जा सकेगा। ई-सेफ्टी कमीशन यही कर रहा है।’
इससे पहले ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीजी ने मस्क को एक ‘अहंकारी अरबपति' बताते हुए कहा था कि इन तस्वीरों और वीडियो के कारण लोगों को पहुंच रहे दुख के प्रति मस्क अंधे हो गये हैं।
इंफ्लूएसरों के दम पर चुनाव प्रचार में जुटी बीजेपी, कांग्रेस
स्थानीय समाचार चैनल एबीसी को दिए एक इंटरव्यू में अल्बानीजी ने कहा, ‘यह अहंकारी अरबपति सोचता है कि वह ना सिर्फ कानून से ऊपर है बल्कि शालीनता की हदों का भी सम्मान नहीं कर रहा है। हम उसका सामना करने के लिए हर जरूरी उपाय करेंगे।’
उन्होंने कहा कि एक हिंसक वीडियो को अपने प्लेटफॉर्म पर रखने के लिए कोर्ट जाने का विचार ही दिखाता है कि मस्क असलियत से कितनी दूर हैं।
बाकी साइट भी निशाने पर
संसद की संयुक्त समिति की जांच के दायरे में मेटा भी है, जिसने हाल ही में देश में समाचारों के प्रसार के नए नियम लागू कर दिए हैं। मेटा ने कहा है कि वह अब खबरों के लिए स्थानीय मीडिया संस्थानों को भुगतान नहीं करेगी।
देश की संचार मंत्री मिशेल रोलैंड ने कहा कि संसद को यह समझने की जरूरत है कि सोशल मीडिया कंपनियां कैसे ‘स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी सामग्री के प्रसार को बढ़ाने या घटाने और असामाजिक और जन-सुरक्षा के लिए खतरनाक सामग्री के बारे में फैसले करती हैं।’
रोलैंड ने कहा, ‘यह जांच सांसदों को इन कंपनियों की बारीकी से जांच करने के लिए अवसर और संसाधान उपलब्ध कराएगी। उसके बाद समिति ऐसे कदमों की सिफारिश करेगी, जिनसे इन कंपनियों को अपने फैसलों के लिए जवाबदेह बनाया जा सके।’
दुनियाभर में चिंता
सोशल मीडिया कंपनियों के बर्ताव और जवाबदेही को लेकर पूरी दुनिया में चिंता जताई जा रही है। अमेरिका से लेकर यूरोप और एशिया तक तमाम देशों की सरकारों ने इन कंपनियों की जवाबदेही तय करने के लिए कदम उठाए हैं।
अमेरिका में हाल ही में कई कंपनियों के प्रमुखों को संसद में पेश होना पड़ा और सांसदों के तीखे सवालों के जवाब देने पड़े। अमेरिकी सरकार टिकटॉक को तो चेतावनी भी जारी कर चुकी है। यूरोप में कई बार फेसबुक और गूगल पर जुर्माने लगाए जा चुके हैं। हालांकि अब तक इन जुर्मानों का दायरा आर्थिक और वित्तीय नियमों का उल्लंघन ही रहा है लेकिन अब कंपनियों की सामाजिक जवाबदेही का मुद्दा भी जोर पकड़ रहा है।
हाल ही में सिडनी की न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी के लेक्चरर डॉ। कॉनर क्लून ने कंपनियों की जवाबदेही पर एक अध्ययन किया था। अपने शोध में उन्होंने कंपनियों की सामग्री की निगरानी की नीतियों का अध्ययन किया।
इस बारे में डॉ। क्लून ने लिखा, ‘सोशल मीडिया कंपनियां इस बात को लेकर अहम मोड़ पर हैं कि वे अपने मंच पर साझा की जाने वाली सामग्री को किस तरह नियंत्रित करती हैं। सामग्री पर नजर रखने वाले उनके एल्गोरिदम बेहतर हो रहे हैं और कुछ ही सालों में वे इतने योग्य हो जाएंगे कि उल्लंघन करने वाली किसी भी सामग्री को पकड़ सकें। उनकी सटीकता ज्यादा नहीं तो 95 फीसदी तक होगी।
यह एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इससे कंपनियों को अपने मंच पर साझा की गई सामग्री पर नियंत्रण करने में ही मदद मिलेगी। इससे नियमों का उल्लंघन करने वालों के व्यवहार को बदल पाने में कोई खास मदद नहीं मिलेगी।’(dw.com/hi)
आज बच्चे पहले के मुकाबले कम उम्र में इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और दुनिया में हर आधे सेकेंड में एक बच्चा ऑनलाइन होता है।
ऐसे में जानकार चेतावनी दे रहे हैं कि ऑनलाइन दुनिया तक बच्चों की बढ़ती पहुंच से उनके लिए गंभीर खतरे भी पैदा हो रहे हैं।
वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी के यंग एंड रेजिलिएंट सेंटर ने इस बारे में हाल ही में एक स्टडी की है।
इससे पता चला है कि कम आमदनी वाले परिवारों के बच्चे तो खासतौर से अनजान लोगों से अनुचित या गैर-जरूरी रिक्वेस्ट ब्लॉक नहीं करते हैं। इस अध्ययन में पाया गया था कि ऐसे लोगों की शिकायत न करने या ब्लॉक नहीं करने की वजह से बच्चे भविष्य में खुद को अनचाहे संपर्क के कहीं ज़्यादा बड़े जोखिम में डाल देते हैं।
ब्रिटेन में ऑनलाइन सेफ्टी एक्ट नाम के नए क़ानून के तहत तकनीकी कंपनियों की ये जि़म्मेदारी होती है कि वो इंटरनेट पर बच्चों की अधिक सुरक्षा सुनिश्चित करें। लेकिन, इस कानून से जुड़े नए नियम 2025 तक लागू नहीं होंगे।
आलोचक कहते हैं कि ये नियम भी बहुत अधिक कारगर नहीं हैं।
दुनिया भर में सरकारों ने ऐसे ही नियम कायदे लागू किए हैं।
तो आप ऑनलाइन दुनिया में अपने बच्चों को कैसे महफूज रख सकते हैं और बच्चों के लिए इंटरनेट की दुनिया ज्यादा सुरक्षित बनाने के लिए दुनिया भर की सरकारें और तकनीकी कंपनियां क्या कर रही हैं?
दुनिया भर में बच्चे ऑनलाइन कितना वकत बिताते हैं?
आज दुनिया भर में बच्चे, पहले से कहीं ज़्यादा वक़्त ऑनलाइन होते हैं। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, दुनिया में हर आधे सेकेंड में कोई न कोई बच्चा पहली बार ऑनलाइन दुनिया में दाखिल होता है।
आंकड़े दिखाते हैं कि दुनिया में कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने में कम उम्र वालों का सबसे ज्यादा योगदान है। 2023 में दुनिया भर में 15 से 24 साल के 79 प्रतिशत लोग ऑनलाइन हो रहे थे, जो बाकी आबादी से 65 प्रतिशत ज्यादा है।
सिडनी के यंग एंड रेजि़लिएंट सेंटर की सह-निदेशक अमांडा थर्ड कहती हैं, ‘आज के बच्चे ऑनलाइन दुनिया में ही बड़े हो रहे हैं और लगातार बदल रहे डिजिटल मंजर में उन्हें इंटरनेट के सुरक्षित रखने के लिए मदद की जरूरत होती है।’
बच्चों के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ के एक अध्ययन के मुताबिक 30 देशों में एक तिहाई से ज़्यादा बच्चों को साइबर दुनिया में दादागीरी और धमकियों का सामना करना पड़ता है। इसकी वजह से लगभग 20 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाना बंद कर देते हैं।
हेट स्पीच, हिंसक कंटेंट और उग्रवादी संगठनों में भर्ती भी चिंता के विषय हैं। इसके साथ साथ ग़लत जानकारी या फिर साजिश की मनगढ़ंत कहानियां भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बहुत चलती हैं। हालांकि, यूनिसेफ का कहना है, ‘ऑनलाइन दुनिया में बच्चों को सबसे ज्यादा खतरा यौन शोषण और बुरे बर्ताव से है।’
यूनिसेफ के मुताबिक, ‘बच्चों का यौन शोषण करने वालों के लिए अपने शिकार से ऑनलाइन संपर्क करना आज ज़्यादा आसान हो गया है। वो बड़ी आसानी से ऐसी तस्वीरें साझा कर सकते हैं और दूसरों को भी ऐसे अपराध करने के लिए उकसा सकते हैं। 25 देशों में लगभग 80 प्रतिशत बच्चों ने ऑनलाइन दुनिया में यौन शोषण या बुरे बर्ताव के खतरों की शिकायत की है।’
मां-बाप के लिए ऑनलाइन निगरानी के कौन से विकल्प मौजूद हैं?
अपने बच्चों पर नजर रखने के लिए मां-बाप के पास ऐसे कई उपाय उपलब्ध हैं, जो बच्चों को परेशान करने वाले या अनुचित कंटेंट को ब्लॉक कर देते हैं। लेकिन, अध्ययन ये बताते हैं कि अक्सर अभिभावक इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर नहीं करते हैं।
2019 में हुए ग्लोबल किड्स ऑनलाइन सर्वे में पता चला था कि नौ से 17 साल उम्र के ज्यादातर बच्चों के मां-बाप, बच्चों की निगरानी के लिए तकनीकी औजार इस्तेमाल करने के बजाय बीच बचाव और नियमों पर आधारित पाबंदियों जैसे तरीके अपनाते हैं।
इस स्टडी के मुताबिक, अभिभावकों के बीच बहुत से सांस्कृतिक फासले भी देखने को मिले हैं। यूरोप और दक्षिणी अमेरिका के अमीर देशों के माता-पिता मध्यस्थता करने को तरजीह देते हैं। वहीं घाना, फिलीपींस और दक्षिण अफ्रीका में मां-बाप इस मामले में सीमित स्तर पर दखल देने की नीति अपनाते हैं।
हालांकि, बच्चों के फोन या दूसरे उपकरणों पर पैरेंटल कंट्रोल का इस्तेमाल बहुत कम बना हुआ है। इस सर्वे में शामिल देशों में तीन प्रतिशत से कम माता-पिता ऐसे थे, जो अपने ऑनलाइन बच्चों पर नजर रखने के लिए इन तकनीकी औजारों का इस्तेमाल कर रहे थे।
ब्रिटेन स्थित कुछ बड़ी इंटरनेट कंपनियों ने मिलकर इंटरनेट मैटर्स नाम से सुरक्षा का एक संगठन बनाया है। इंटरनल मैटर्स ने ऐसे उपलब्ध तकनीकी औजारों की एक लिस्ट तैयार की है। और, इसके साथ साथ इसने इन तकनीकी टूल्स के कदम दर कदम इस्तेमाल के लिए एक गाइड भी बनाई है।
मिसाल के तौर पर जो मां-बाप अपने बच्चों को सबसे लोकप्रिय प्लेटफॉम्र्स में से एक यानी, यू-ट्यूब और टिकटॉक पर अनुचित कंटेंट देखने से रोकना चाहते हैं, तो वो खास बच्चों के लिए बनाए गए ‘किड्स वर्जन’ की सेटिंग कर सकते हैं, जो एडल्ट कंटेंट को फिल्टर कर देता है।
यू-ट्यूब और टिकटॉक की मुख्य साइट इस्तेमाल करने वाले किशोर उम्र बच्चों के लिए अभिभावक निगरानी रखने वाले खाते बना सकते हैं, जिससे उन्हें पता चल सकेगा कि उनके बच्चे इन ऐप्स पर क्या देख रहे हैं।
फैमिली सेंटर के जरिए फेसबुक मैसेंजर पर भी नजर रखी जा सकती है।
टिकटॉक का कहना है कि उसका परिवार से जोडऩे वाला टूल, मां-बाप को ये अख्तियार देता है कि वो अपने किशोर उम्र बच्चों के खातों को प्राइवेट बना सकें।
इंस्टाग्राम पर भी अभिभावकों के लिए काफी टूल्स मौजूद हैं, जिससे वो रोजाना इन्हें देखने की समय सीमा तय कर सकते हैं। ब्रेक का वक्त भी तय कर सकते हैं और उन खातों की लिस्ट भी बना सकते हैं, जिनकी शिकायत उनके बच्चों ने की हो।
मोबाइल फोन और कन्सोल में कंट्रोल के कौन से विकल्प हैं?
एंड्रॉयड, एप्पल के फोन और टैबलेट में ऐसे ऐप और सिस्टम होते हैं, जिनका इस्तेमाल मां-बाप कर सकते हैं। इन टूल्स के ज़रिए कुछ ऐप को ब्लॉक किया जा सकता है या उन तक पहुंच को सीमित किया जा सकता है।
एडल्ट कंटेंट को प्रतिबंधित किया जा सकता है। बच्चों के खरीदारी करने पर रोक लगाई जा सकती है और उनकी ब्राउजिंग पर नजर रखी जा सकती है।
एप्पल ने इसके लिए स्क्रीन टाइम का टूल दिया है। गूगल फैमिली लिंक के नाम से इसके लिए ऐप देता है। वहीं दूसरे डेवेलपर्स ने भी ऐसे कई ऐप उपलब्ध कराए हैं।
नेटफ्लिक्स जैसे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म कंटेंट को फिल्टर करने के लिए पैरेंटल कंट्रोल मुहैया कराते हैं।
वहीं, गेमिंग के कंसोल की सेटिंग के जरिए बच्चों के मां-बाप उनकी उम्र के मुताबिक गेम खेलने की सीमा तय कर सकते हैं और गेम खेलने के दौरान खरीदारी पर रोक लगा सकते हैं।
कई देशों में अभिभावकों के लिए नियंत्रण के ये विकल्प ब्रॉडबैंड और टीवी के सब्सक्रिप्शन की सेवाओं की तरफ से भी दिए जाते हैं।
आपको अपने बच्चों से ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में कैसे बात करनी चाहिए?
ब्रिटेन की बच्चों की कल्याणकारी संस्था एनएसपीसीसी के मुताबिक, बच्चों से ऑनलाइन सेफ्टी के बारे में बात करना और उनकी ऑनलाइन गतिविधियों में दिलचस्पी रखना भी काफी अहम है।
ये संस्था मां-बाप को सुझाव देती है कि वो इन मुद्दों पर बातचीत को अपने बच्चों के साथ रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बनाएं। ठीक उसी तरह जैसे वो बच्चों से स्कूल में बिताए गए वक्त के बारे में बातें करते हैं। इससे बच्चों के लिए अपनी चिंताएं, मां-बाप से बता पाना और आसान हो जाएगा।
सरे यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर सुरक्षा के विशेषज्ञ प्रोफेसर एलन वुडवार्ड कहते हैं, ‘सबसे खराब बात बच्चों से ये कहना होती है कि ‘तुम इसे नहीं देख सकते हो।’ ’
प्रोफेसर वुडवार्ड कहते हैं, ‘फिर बच्चे इस रोकथाम से बचने का कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेंगे। फिर चाहे इसके लिए उन्हें वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (वीपीएन) का इस्तेमाल करना पड़े, जहां उन्हें ऐसी पाबंदियों से बचने का मौका मिल जाता है। या फिर वो किसी दूसरे के लॉगिन के जरिए वो सब देखने लगते हैं।’
दुनिया भर में सरकारें इसके लिए क्या कर रही हैं?
हाल के वर्षों में विनियमन की संस्थाओं ने निजता के ऐसे कानून लागू करने पर जोर देना तेज कर दिया है, जिनसे बच्चों की ऑनलाइन दुनिया में हिफाजत हो सके। इस मामले में कानून बनाने वाले भी काफी सक्रियता दिखा रहे हैं।
हालांकि, इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ प्राइवेसी प्रोफेशनल्स (आईएपीपी) का कहना है कि इनमें से बहुत से लोग इस बात पर सहमत हैं कि ‘ऑनलाइन दुनिया में प्राइवेसी और सुरक्षा बनाए रखने के लिए और कानूनों की जरूरत है। लेकिन न्यायिक अधिकार क्षेत्र इस साझा मकसद के लिहाज से अलग अलग तरीके अपना रहे हैं।’
मिसाल के तौर पर ब्रिटेन या फिर कैलिफोर्निया में ये कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वो अपनी सेवाओं को इस तरह तैयार करें, जिससे बच्चों की निजता और सुरक्षा को सक्रियता से महफूज बनाया जा सके।
ब्रिटेन की तकनीकी सचिव मिशेल डोनेलान ने बड़ी तकनीकी कंपनियों से गुजारिश की थी, ‘आप हमारे साथ मिलकर तैयारी करें। भारी जुर्माना लगने और सख्त कानून लागू होने का इंतजार न करें, अपनी जिम्मेदारी निभाने में सक्रियता दिखाएं और अभी कार्रवाई करें।’
अमेरिका के कुछ कानून, इंटरनेट तक बच्चों की पहुंच की निगरानी के लिए मां-बाप की जिम्मेदारियों पर जोर डालते हैं।
1998 का अमरीकी चिल्ड्रेन्स ऑनलाइन प्राइवेसी प्रोटेक्शन एक्ट मां-बाप की इजाजत के बगैर, ऑनलाइन कंपनियों को बच्चों से जुड़ी कुछ जानकारियां प्रॉसेस करने पर रोक लगाता है।
अमेरिका के अरकंसास, लूसियाना, टेक्सस और यूटा राज्यों में हाल में पारित किए गए कुछ कानून मोटे तौर पर सोशल मीडिया सेवाओं को बच्चों को उनके मां-बाप की इजाजत के बगैर इस्तेमाल करने की इजाजत देने पर रोक लगाते हैं।
2020 में ब्राजील ने निजी डेटा जमा करने को लेकर एक कानून पारित किया था, लेकिन, ब्राजील के सांसद अभी भी डिजिटल माहौल में बच्चों और किशोरों की हिफाजत करने की व्यवस्थाओं जैसे कि इंटरनेट सेवाएं और ऑनलाइन प्रोडक्ट देने वालों के लिए यौन शोषण की चेतावनी देने वाली व्यवस्था बनाने को लेकर अभी परिचर्चाएं ही कर रहे हैं।
2022 में फ्रांस ने इंटरनेट से जुड़ी डिवाइस के लिए मां-बाप की इजाज़त को अनिवार्य बना दिया है।
अगस्त 2023 में भारत ने एक विवादित डेटा प्राइवेसी बिल को मंजूरी दी थी, जिसमें बच्चों के निजी डेटा को जमा करने के लिए उनके मां-बाप से तस्दीक़ के साथ इजाज़त लेना जरूरी बना दिया गया था। इस कानून में खास बच्चों को निशाना बनाकर ऑनलाइन विज्ञापन करने पर भी रोक लगा दी गई थी।
तकनीकी कंपनियां इस समस्या से कैसे निपट रही हैं?
आज तकनीकी कंपनियों के ख़िलाफ़ न केवल निजता से जुड़ी चिंताओं बल्कि यूजर की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर भी विरोध-प्रदर्शन बढ़ता जा रहा है।
दुनिया भर में एक्टिविस्ट और अभिभावक तकनीकी कंपनियों को ये जिम्मेदारी लेने या फिर ऐसे मंच तैयार करने का दबाव बना रही हैं, जो बच्चों और कम उम्र के यूजऱ के लिए ‘बनावट में ही सुरक्षित’ हों।
इसी साल जनवरी के आखिर में अमेरिकी संसद में सुनवाई के दौरान मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने उन बच्चों के मां-बाप से माफी मांगी थी, जिन्हें ऑनलाइन दुनिया में शोषण का शिकार बनाया गया था।
दि बिग टेक ऐंड दि ऑनलाइन चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉयटेशन क्राइसिस की ये सुनवाई इसलिए की गई थी, ताकि ‘ऑनलाइन दुनिया में बच्चों के यौन शोषण के बढ़ते मामलों की पड़ताल की जा सके।’
मेटा, स्नैप, डिस्कॉर्ड, एक्स और टिकटॉक जैसी सभी कंपनियों के अधिकारियों को गवाही देने के लिए बुलाया गया था। हालांकि सबसे ज्यादा चर्चा मार्क जुकरबर्ग और टिकटॉक के चीफ एग्जीक्यूटिव शोउ च्यू की पेशी की सबसे ज़्यादा चर्चा हुई थी।
सुनवाई के दौरान मार्क जकरबर्ग ने कहा था, ‘आप सबको जिन हालात से गुजरना पड़ा उसके लिए मैं माफी मांगता हूं। आपके परिवारों को जिन चीजों का सामना करना पड़ा, उसकी तकलीफ किसी को भी नहीं झेलनी चाहिए।’
अमेरिकी संसद में ये सुनवाई तब हुई थी, जब मेटा के एक पूर्व वरिष्ठ कर्मचारी ने कांग्रेस को बताया था कि वो ये मानते हैं कि इंस्टाग्राम किशोरों को यौन शोषण से महफूज रखने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा है।
मेटा और स्नैपचैट ने कहा कि उन्होंने 18 साल से कम उम्र वाले अपने यूजर्स के लिए पहले से ही सुरक्षा के अधिक उपाय कर रखे हैं। उन्होंने मां-बाप की निगरानी आसान बनाने वाले टूल्स के बारे में भी बताया।
स्नैपचैट के एक अधिकारी ने कहा, ‘नौजवान पीढ़ी के बीच लोकप्रिय एक प्लेटफॉर्म के तौर पर हमें अपनी अतिरिक्त जिम्मेदारियों का एहसास है कि हमें एक सुरक्षित और सकारात्मक अनुभव देना चाहिए।’
मेटा के एक प्रतिनिधि ने कहा कि उनकी कंपनी चाहती है कि युवा पीढ़ी के लोग ‘अन्य लोगों से ऐसे माहौल में जुड़ सकें, जहां वो ख़ुद को सुरक्षित महसूस करते हों।’
उन्होंने कहा, ‘हिंसा और ख़ुदकुशी को उकसावा देने वाला कंटेंट, ख़ुद को चोट पहुंचाने या फिर खान-पान की बीमारी बढ़ाने वाले कंटेंट हमारे नियमों के खिलाफ हैं- और हमें जब भी अपने प्लेटफॉर्म पर ऐसा कंटेंट मिलता है, हम उसे हटा देते हैं।’
हालांकि, बीबीसी समेत कई मीडिया और निगरानी रखने वाले संगठनों ने बताया है कि अनुचित या दुव्र्यवहार करने वाले कंटेंट की शिकायत करने के बावजूद ये कंपनियां या तो तुरंत इन्हें हटाती नहीं हैं।
अक्सर ऐसा होता है कि कई बार संपर्क करने के बावजूद भी ऐसे कंटेंट को यूं ही पड़ा रहने दिया जाता है। (bbc.com/hindi)
डॉ आर के पालीवाल
दिल्ली के कथित शराब घोटाले में आम आदमी पार्टी और भारत राष्ट्र समिति के कई नेताओं सहित दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के साथ राष्ट्रीय मीडिया और अंतरराष्ट्रीय जगत में कई प्रश्न खड़े हुए थे जिनमें दो सवाल सबसे बड़े थे। एक सवाल है , तेजी से उभरते राष्ट्रीय दल आप के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल को लोकसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर गिरफ्तार करना जिससे वे अपने दल और अपने दल के गठबंधन इंडिया के लिए चुनाव प्रचार करने में सक्षम नही रहे और दूसरा यह कि एक तरफ सौ करोड़ के इस घोटाले में दर्जन से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हुई है और दूसरी तरफ कथित सत्तर हजार करोड़ के घोटाले में एक भी गिरफ्तारी नहीं होने से केंद्रीय जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर लगे प्रश्न चिन्ह। ऐसा नहीं कि केंद्रीय और राज्यों की विभिन्न जांच एजेंसियों और पुलिस प्रशासन पर पहले इस तरह के आरोप नहीं लगे। आपात काल से लेकर लगभग हर सरकार पर कमोबेश इस तरह के आरोप लगते रहे हैं कि वे जांच एजेंसियों को अपने पक्ष के लोगों को बचाने और विरोधी पक्ष के लोगों पर त्वरित कार्रवाई करने का दबाव बनाकर उनकी निष्पक्षता समाप्त करती हैं। दुर्भाग्य से वर्तमान दौर में इस तरह के आरोप सामान्य से बहुत ज्यादा बढ गए थे इसीलिए अरविन्द केजरीवाल के मामले में जर्मनी, अमेरीका और संयुक्त राष्ट्र संघ तक भी यह मुद्दा उछला था।
सर्वोच्च न्यायालय के लिए भी यह मामला अत्यंत पेचीदा था। यह ऐसा मामला था जिसमें पद पर रहते हुए मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी की गई थी। एक प्रमुख राष्ट्रीय दल के मुखिया को पुराने मामले में लोकसभा चुनाव से पूर्व गिरफ्तारी के कारण गिरफ्तारी के समय को लेकर भी आरोप लग रहे थे कि चुनाव प्रचार में बाधा पहुंचाने के लिए यह गिरफ्तारी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय को इन सब महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर दोनों पक्षों को सुनकर निर्णय देना था। न्यायालय ने दोनों पक्षों को सुनवाई का पूरा मौका देने के बाद तर्कपूर्ण आदेश दिया है जिसमें न उन्होंने अरविंद केजरीवाल को पूरी तरह मुक्त किया है और न प्रवर्तन निदेशालय को आगे की कार्यवाही से रोका है।न्यायालय ने अरविंद केजरीवाल को एक जून तक अंतरिम जमानत देकर केवल चुनाव के बाकी समय के लिए प्रचार करने के लिए मुक्त किया है। साथ ही उन पर कुछ कड़ी शर्त भी लगाई हैं, जैसे केजरीवाल शराब मामले पर कुछ नहीं बोल सकते और मुख्यमंत्री कार्यालय भी नहीं जा सकते लेकिन उनके चुनाव प्रचार करने पर न्यायालय की कोई रोक नहीं है।
लोकतंत्र के लिए सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला एक ऐतिहासिक नजीर बनेगा। इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए।आम आदमी पार्टी के लिए यह बडी राहत का फैसला है। इंडिया गठबंधन के लिए भी यह अच्छी खबर है।उम्मीद है कि हेमंत सोरेन के लिए भी इस फैसले से उम्मीद जगेगी। जेल से बाहर आने के बाद केजरीवाल की आगे की रणनीति क्या होगी यह केजरीवाल के चुनावी भाषणों से साफ होगी कि वे केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी के प्रति कैसा रूख अख्तियार करते हैं। केजरीवाल को केंद्र सरकार दुश्मन नंबर एक समझती है क्योंकि वह दस साल से राजधानी दिल्ली में उनकी आंख की किरकिरी बना है। विपक्ष इस दौरान केजरीवाल को अग्रिम कतार का नेता मानने लगा है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय ने केजरीवाल को अंतरिम जमानत देकर लोकसभा चुनाव प्रचार का अवसर देकर कम से कम लोकतंत्र को समृद्ध किया है। अब केजरीवाल के बारे में जनता की क्या प्रतिक्रिया है यह केजरीवाल की चुनावी सभाओं में जनता की उपस्थिति और अंतत: दिल्ली और पंजाब में लोकसभा में आम आदमी पार्टी को मिलने वाली सीटों से पता चलेगा। केजरीवाल के आगामी कार्यकलापों पर हमारी और मीडिया की भी नजर रहेगी।
जगदीश्वर चतुर्वेदी
हिन्दी में अधूरी तस्वीर देखने का रिवाज है। अधूरी इमेजों में भ्रमित रहने वालों को यह भ्रम होता है कि वे ही हिन्दी के पब्लिक इंटलेक्चुअल या जन-बुद्धिजीवी हैं।
हिन्दी में किसे पब्लिक इंटलेक्चुअल कहें और किसे न कहें। इस सवाल पर सबसे ज्यादा दुविधा है। जो टीवी पत्रकार हैं वे अपने को प्रतिदिन व्यक्त करते रहते हैं और यह मानकर चलते हैं कि वे पब्लिक इंटलेक्चुअल हैं। जो पत्रकार-प्रोफेसर आए दिन टीवी और अन्य मीडिया में दिखते हैं वे भी अपने को पब्लिक इंटलेक्चुअल मानते हैं।
इसके अलावा हिन्दी में बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका है जो अहर्निश देश के बारे में सोचता है लेकिन कभी मीडिया में नजर नहीं आता या मीडिया उन्हें अवसर नहीं देता। इसके अलावा एक वर्ग ऐसे बुद्धिजीवियों का भी है जो जानबूझकर मीडिया की उपेक्षा करता है। मासमीडिया से अपने पार्टीजान नजरिए के कारण दूरी रखता है। इस वर्ग में बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी आते हैं। एक वर्ग ऐसे लोगों का है जो देश के बारे में सोचता है, उसके सामाजिक सरोकार भी हैं लेकिन हम उसे बुद्धिजीवी की कोटि में नहीं रखते इन्हें मजदूर,किसान,औरत आदि के नाम से जानते हैं।
आम लोगों को यही आभास है कि हिन्दी में गिनती के साहित्यकार-बुद्धिजीवी हैं जो मीडिया में दिखाई देते हैं। मीडिया में आम जनता की समस्याओं पर बोलने और लिखने वाले हिन्दी के कम लोग इसलिए दिखते हैं क्योंकि मीडिया की दिलचस्पी हिन्दी के ज्यादा से ज्यादा बुद्धिजीवियों को शामिल करने में नहीं है। मीडिया वाले खासकर टीवी वाले घुमा-फिराकर नामवर सिंह, सुधीश पचौरी, राजेन्द्र यादव, अशोक बाजपेयी, पुरूषोत्तम अग्रवाल आदि। यानी हिन्दी की मीडिया की नजर में यही बौद्धिक संपदा है।
इस प्रसंग में हम यही कहना चाहेंगे कि मीडिया प्रस्तुतियों के आधार पर यदि बुद्धिजीवी की सामाजिक उपस्थिति का फैसला किया जाएगा तो मामला गड़बड़ा सकता है। मीडिया की प्रस्तुतियां हमें सीमित ज्ञान देती हैं। मीडिया से हमें हिन्दी बुद्धिजीवी की असल इमेज का अंदाजा नहीं लग सकता। इस प्रसंग में दो उदाहरण बताना चाहूँगा।
पहला वाकया प्रसिद्ध मीडिया विशेषज्ञ और प्रोफेसर हर्बर्ट शिलर का है। शिलर ने लिखा है कुछ साल पहले लॉस एंजिल्स टाइम्स ने अमेरिका के लोकगायक पीट शीजर का साक्षात्कार छापा था। वे 60 साल से भी ज्यादा समय से गीत गाते रहे हैं। शिलर ने 39 छात्रों की कक्षा से पूछा वे क्या शीजर का नाम जानते हैं इनमें से अधिकांश छात्र 1997 में स्नातक कर चुके थे। सभी विद्यार्थियों ने कहा वे पीट शीजर के बारे में कुछ भी नहीं जानते। छात्रों ने कहा कि उन्होंने कभी इस लोक कवि का नाम भी नहीं सुना। यह छात्रों का वह ग्रुप था जिसे रिसर्च करने, उच्च शिक्षा में आने का मौका मिला था, ये अभिजात्यवर्ग के छात्र थे।
शिलर ने सवाल किया है कि इस स्थिति को कैसे व्याख्यायित करेंगे? यहां कम्युनिकेशन ही मुख्य है। ये छात्र नब्बे के दशक के टीवी को देखकर बड़े हुए हैं और इस बीच में इस लोकगायक को कभी टीवी पर गीत गाते नहीं देखा, टीवी के युग में जो टीवी पर नहीं दिखता उसका राष्ट्रीय ऑडिएंस के लिए कोई अस्तित्व नहीं है। यही दशा पीट शीजर की भी हुई। इसका अर्थ यह है कि टीवी पर अगर आप दिख रहे हैं तो आपका अस्तित्व है।
शिलर ने लिखा है ज्यादातर व्यक्ति, घटनाएं, सामाजिक आंदोलन और रचनात्मक प्रयासों का वजूद इसलिए नहीं माना जाता,क्योंकि वे टीवी पर दिखाई नहीं देते।
दूसरा वाकया नॉम चोम्स्की से जुड़ा है। तीसरी दुनिया में चोम्स्की महान बुद्धिजीवी के रूप में स्वीकार किए जाते हैं। हम सब जानते हैं कि वे दुनिया एक नम्बर के बुद्धिजीवी हैं। इसके बावजूद अमेरिकी मीडिया में चोम्स्की कभी बुलाए नहीं जाते. अमेरिका के तमाम उनके सहकर्मी लिखते हैं कि उन्हें मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट में ज्यादातर लोग जानते तक नहीं हैं। उन्हें कभी अमेरिकी कारपोरेट मीडिया में बुलाया नहीं गया। उनकी अधिकांश किताबों के रिव्यू तक अमेरिकी कारपोरेट मीडिया ने नहीं छापे। ज्यादातर अमेरिकियों ने चोम्स्की का नाम तक नहीं सुना। इसका क्या अर्थ लगाएं ?
हिन्दी के बुद्धिजीवी के साथ भी तकरीबन ऐसा ही घट रहा है। हमारे बहुत से दोस्त अच्छी तरह जानते हैं कि मीडिया में चंद लोग ही बार-बार क्यों दोहराए जाते हैं ? हिन्दी में व्यापक संख्या में ऐसा बुद्धिजीवी-साहित्यकार है जो आम जनता से जुड़े सवालों पर राय रखता है,वैज्ञानिक राय रखता है लेकिन मीडिया कभी उन तक जाने की कोशिश ही नहीं करता। चंद नमूने के हिन्दी बुद्धिजीवियों तक मीडिया का सिमट जाना मीडिया की समस्या है। मीडिया चंद लोगों तक इसलिए बंधा है क्योंकि उसके पास समय,संसाधन और विवेक का अभाव है।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि इन दिनों मीडिया में अ-राजनीतिकरण की हवा चल रही है। हमारे जो लोग बुद्धिजीवी-साहित्यकार की पब्लिक इंटलेक्चुअल के रूप में उपस्थिति देखना चाहते हैं उनसे सवाल है कि वे बुद्धिजीवी किसे मानते हैं? इस प्रसंग में मैं फिर नॉम चोम्स्की को उद्धृत करना चाहूँगा।
चोम्स्की ने सवाल उठाया है कि बुद्धिजीवी का असल में इस दुनिया में किस चीज से सरोकार होता है ? यदि हम मजदूर यूनियन में काम कर रहे होते तो पाएंगे कि मजदूरों के इस दुनिया से सरोकार हैं , अल सल्वाडोर के किसानों के भी सरोकार हैं। किंतु उन्हें हम ‘बुद्धिजीवी’ नहीं मानते। असल में यह हास्यास्पद शब्द है। मेरा आशय इस बात से है कि आखिरकार इसका कैसे इस्तेमाल किया जाता है। ‘बुद्धिजीवी’ का हमारे दिमाग से कोई लेना-देना नहीं है। ये दोनों भिन्न चीजें हैं। मेरा संदेह इस बात पर है कि अनेक लोगों के पास कौशल होता है।स्वचालित मशीनों पर काम करने का गुण भी होता है। वे विश्वविद्यालय में काम करने वाले लोगों से ज्यादा काम करते हैं,शिक्षा में जिसे हम ‘स्कालरली’ कार्य कहते हैं। वह मूलत: क्लेरिकल वर्क ही है।
चोम्स्की ने लिखा मैं नहीं समझता कि दिमाग के लिए ऑटोमोबाइल का इंजन लगाने से क्लेरिकल वर्क ज्यादा चुनौतीपूर्ण है । सच इसके विपरीत है। मैं क्लर्क का काम कर सकता हूँ। किंतु यह पता नहीं लगा सकता कि इंजन कैसे लगेगा। इसलिए ‘बुद्धिजीवी’ से तुम्हारा तात्पर्य ऐसे लोगों से है जो विशिष्ट वर्ग में आते हैं ,जो विचारों को थोपते हैं, जो लोग सत्ता में हैं उनके लिए विचार बनाते हैं, सबसे कहते हैं कि उन विचारों पर विश्वास करो, आदि-आदि। तब तो भिन्न बात है।
जो लोग अपने को ‘बुद्धिजीवी’ कहते हैं उन्हें मैं धर्मनिरपेक्ष पुजारी कहना चाहूँगा। उनका काम है समाज के बारे में सत्य सिद्धान्तों को बचाए रखना। साथ ही जनता को ये लोग ‘बुद्धिजीवी विरोधी'' के रूप में रेखांकित करते हैं। सच यह है कि अमेरिका के साथ फ्रांस या अधिकांश यूरोप की तुलना करोगे तो पाओगे कि अमेरिका में सबसे स्वस्थ चीज यही है। यहां बुद्धिजीवियों को बहुत कम सम्मान दिया जाता है। सम्मान होना भी नहीं चाहिए। उनका किस चीज के लिए सम्मान किया जाए ?
फ्रांस में बुद्धिजीवी अभिजन का हिस्सा है। उनकी प्रथम पेज पर खबर आती है। अनेक कारणों में से एक कारण यह भी है कि बुद्धिजीवी की छवि हॉलीवुड की तरह पाखण्डपूर्ण है। तुम सब समय टीवी कैमरे के सामने होते हो, तुम सब समय नया बनाते रहते हो और मीडिया केन्द्र में रखकर प्रचार करता रहता है। किंतु तुम्हारी टेबिल के पास जो आदमी बैठा है उस पर फोकस कभी नहीं करेगा। लोगों को इस बात का भी पता नहीं होता कि क्या अच्छा है। इसलिए वे हमेशा ऊलजुलूल सामग्री के साथ आते हैं। इस सबके बीच बुद्धिजीवी प्रशंसा पाते हैं, आत्म महत्ता पाते हैं।
चोम्स्की ने कहा कि वियतनाम युद्ध के समय मुझे कईबार संयुक्त हस्ताक्षरों से युक्त पत्र जारी करने के लिए कहा गया। मसलन् ज्यां पाल सार्त्र के साथ पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया। फ्रांस के अखबारों में यह प्रथम पेज पर प्रकाशित हुआ।किंतु अमेरिका में इसका किसी ने उल्लेख करना तक जरूरी नहीं समझा।
फ्रांसीसी समझते थे कि यह सनसनीखेज है,मैं सोचता था भयानक है। क्यों कोई हमारी चि_ी का जिक्र करे। हम दोनों के ऊपर इससे क्या प्रभाव पडऩे वाला था। मैं सोचता हूँ कि अमेरिकी लोगों का सोच ज्यादा स्वस्थ था। चोम्स्की ने लिखा यदि आप किसी व्यक्ति को किसी विषय के बारे में कुछ ज्यादा बता देते हैं, अथवा ज्यादा जानते हैं, तो यह बुद्धिजीवी जीवन की अभिव्यक्ति नहीं है। बल्कि यह प्रविलेज अवस्था की अभिव्यक्ति है।
मसलन् यदि आप विश्वविद्यालय में हैं तो किसी एक चीज में प्रविलेज अवस्था में हैं। जबकि लोग कहते हैं कि आपको ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। आप अपने काम पर नियंत्रण रखने की स्थिति में होते हैं। चोम्स्की का मानना है अभिव्यक्ति की आजादी हमें सिर्फ लिखने-पढऩे वालों के संघर्षों के कारण नहीं मिली, अपितु मजदूर आन्दोलन, मानवाधिकारों के लिए संघर्ष, महिला आंदोलन आदि के कारण अभिव्यक्ति की आजादी प्राप्त हुई है।
मनीष आजाद
‘मैं उस सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा जो पहले से ही नंगी है। उसे कपड़े पहनाना मेरा काम नहीं है। यह काम दर्जी का है।’ - मंटो
मंटो कुछ उन कलाकारों में से थे जिन्हें अपनी कला या अपने सच पर इस कदर आस्था थी कि वे उसके पोषण के लिए खुद अपना ही शिकार करने को बाध्य हो जाते थे। इसे ही ‘आत्महंता आस्था’ कहते है। उन्हीं के समकालीन बंगाल के ‘ऋत्विक घटक’ भी ऐसे ही कलाकार थे। दोनो को ही अपने जीते जी वो सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने अपने कारणों से दोनों को ही उस समय की प्रगतिशील धारा (मुख्यत: ‘इप्टा’ और ‘प्रगतिशील लेखक संघ’) से तिरस्कार मिला। जिससे उन्हें गहरी पीड़ा हुई।
दरअसल कोई भी कलाकार उस समय अपने को बहुत अकेला महसूस करने लगता है जब उसके अपने सहोदर लोग ही उसे ना समझ पायें या गलत समझ लें। यही वह समय होता है जब वह अपने भीतर ही विस्फोट करने को बाध्य हो जाता है। यह विस्फोट भले ही उस कलाकार के चीथड़े उड़ा दे, लेकिन इसकी अनुगूंज भविष्य में प्रगतिशील धारा के मुहाने को और चौड़ा बनाने में सफल होती है। मंटो भी इसमें सफल रहे। आज मंटो की रचनाओं के विषय ‘जदीदियत’ और ‘तरक्की पसन्द’ अदब का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं।
यूरोप में एक समय ‘काफ्का’ को ‘लूकाच’ समर्थक परम्परागत माक्र्सवादी आलोचक, पूंजीवादी-पतित लेखक ही मानते थे। बाद में ‘ब्रेख्त’ और अन्य माक्र्सवादी रचनाकारों ने उन्हें साहित्य में स्थापित किया और प्रगतिशील-माक्र्सवादी धारा का मुहाना और चौड़ा किया। मंटो की तुलना अक्सर फ्रांसीसी रचनाकार ‘मोपांसा’ से की जाती है। यह आश्चर्यजनक है कि मोपांसा पर ‘तोलस्तोय’ ने अश्लीलता और आम लोगों में भविष्य ना देख पाने का लगभग वही आरोप लगाया था जो मंटो पर उनके समकालीन प्रगतिशीलों ने लगाया था।
मंटो ने अपनी रचनाओं में उस दौर के विभाजन के दर्द और उसकी त्रासदी को जिस मानवीय स्तर पर पेश किया है, वह अकल्पनीय है। यह याद करना जरूरी है कि इस विभाजन में करीब 15 लाख लोग मारे गये थे और करीब दो करोड़ लोगों को इधर से उधर पलायन करना पड़ा था। मंटो का बाम्बे से लाहौर प्रवास इसी दर्दनाक विभाजन के बीच हुआ। इसी मानवीय विपदा के बीच दोनों मुल्कों की ‘आजादी’ आयी। मंटो ने इसे उस पंक्षी की आजादी की संज्ञा दी, जिसके दोनों पर काट दिये गये हों। क्या बेहतरीन कमेन्ट है, दोनों मुल्कों की तथाकथित आजादी पर।
दरअसल इस तरह के विभाजनों, युद्धों, बड़े दंगों, फासीवाद के दौरान होने वाली क्रूरताओं में जनता का एक हिस्सा एक तरह से ‘बैनलटी ऑफ इविल’ (banality of evil) का शिकार हो जाता है। इसे ‘हाना अरेन्ट’ (Hannah Arendt) ने इस रूप में व्याख्यायित किया है कि ऐसे समय जनता के इर्द गिर्द जो माहौल होता है उसमें जनता को यह नहीं लगता कि वह कोई बुरा काम कर रही है। यानी बुराई को यहां एक जस्टीफिकेशन मिल जाता है और यह ‘न्यू नार्मल’ हो जाता है।
मंटो ने अपनी प्रसिद्ध कहानी ‘ठण्डा गोश्त’ में इसी ‘बैनलटी ऑफ इविल’ की बात की है, जब कहानी का पात्र ‘ईश्वर सिंह’ एक मुस्लिम घर में सभी पुरूष सदस्यों की हत्या करके, उस घर की एकमात्र महिला सदस्य को अपने कंघे पर उठाकर झाडिय़ों में बलात्कार के लिए ले जाता है। लेकिन यह कहानी बड़ी कहानी इसलिए बन जाती है कि मंटो ने दिखाया है कि ‘बैनलटी ऑफ इविल’ का शिकार होने के बावजूद उस समय उसका जमीर वापस आ जाता है जब उसे पता चलता है कि जिसके साथ उसने बलात्कार किया है वह तो ‘ठण्डा गोश्त’ था, यानी वह महिला मरी हुई थी। और इसके असर से अपनी पत्नी के साथ बिस्तर में ईश्वर सिंह खुद एक ठंडे गोश्त में बदल जाता है। आश्चर्य है कि फैज़ अहमद फैज़ भी इस रचना के महत्व को नहीं समझ पाए थे.
किसी ने कहा है कि अच्छी रचना वही होती है जो आपको शॉक दे। मंटो की कहानियां अपने पाठकों को अनेक स्तर पर शॉक देती है। मंटो पर बनी नंदिता दास की फिल्म में मंटो के अजीज मित्र ‘श्याम’ जब शराब की बोतल दिखाते हुए मंटो से कहते हैं कि तुम कहां के मुसलमान हुए तो मंटो का जवाब है- ‘इतना तो हूं ही कि दंगे में मारा जा सकूं।’ मंटो का यह कथन आपको हिलाकर रख देता है। अंत में, मंटो के ही एक कथन से इसे समाप्त करना ठीक होगा।
‘हिन्दोस्तान आजाद हो गया, पाकिस्तान भी स्वाधीन हो गया। लेकिन दोनों ही मुल्कों में मनुष्य अभी भी गुलाम है- अपने पूर्वाग्रहों का गुलाम, धार्मिक कट्टरता का गुलाम, बर्बरता और अमानवीयता का गुलाम।’
के.जी.कदम
हम सबने पढ़ा.. मौर्य काल ,गुप्त काल, मुगल आये तो मुगल काल ब्रिटिश आये तो ब्रिटिश काल।
इसी तरह अब मोबाइल आये तो ‘स्क्रोल काल’ शुरू हो गया है।
ये काल व्यवस्था संभवत ईश्वरीय व्यवस्था ही है। मनुष्य की अंगुली करने की आदत को देखकर ही ईश्वर ने ‘स्क्रोल काल’ की रचना की कल तक मनुष्य दूसरों के अंगुली करके मजा लेता था.. अब अपनी ही अंगुली अपने मोबाइल पर रगड़ कर खुद के मजे ले रहा है।
ईश्वर भी अब निश्चिंत है। अब मनुष्य जितनी अंगुली करेगा। खुद ही फंसेगा, उलझेगा, डूबेगा।
और डूब भी रहा है आप कहीं भी देख लो। घर में देख लो, गार्डन में देख लो, बाजार में देख लो, दफ्तर में देख लो, बस में, ट्रेन मेंज् शौचालय तक में भी स्क्रोल हो रहे है।
नया जन्मा बच्चा अब स्क्रोल के साथ दूध पीता है। मोबाइल छिन लो तो सर पटकने लगेगा। मम्मियां ऐसी दिक्कत आने से पहले ही मोबाइल थमा देती है.. ले बेटा ले . पर दूध पी, खाना खा।
ये मोबाइल, बच्चों को बहलाने का बह्मास्त्र है और इसके प्रयोग से कई मम्मियां अपनी किटी पार्टी पूरा लुत्फ ले लेती है।
यहां कोई हमारी तुम्हारी जैसी पुरानी सोच का आदमी बोल भी दे कि ‘आप ये क्या कर रही है’ तो एक ही जवाब.. क्या करें भाई साहब.. बहुत जिद्दी है ये।
खैर ये घर घर की कहानी है। वाकई ये मोबाइल एक महामारी में बदल रहा है.. फर्क इतना भर है कि इस महामारी में शरीर सलामत रहता है। सिर्फ आत्मा मरती है।
और मनुष्य को भी अब चिन्ता शरीर की ही है, आत्मा भले ही चिड़चिड़ी, गुस्सैल, संवेदनाहीन.. रहे या मरे अब कोई फर्क नहीं पड़ता। नतीजन ज्यादातर लोग.. जिन्हें हम जिन्दा समझते है। वे सिर्फ शरीर भर है।
कल शाम आसपास कहीं बारिश से मौसम सुहाना था और रात हम दोनो (श्रीमतीजी) हर रोज की तरह पीस पार्क में टहल रहे थे। यही बात कर रहे थे कि अच्छे मौसम में भी लोग बाहर क्यों नहीं निकलते। हवाओं से बात करने का अलग ही आनंद है.. कभी कभी हाथों को फैलाकर मौसम का आनन्द लेना चाहिए।
हम दोनो के अलावा पार्क में लडक़ा और भी था जो मौसम से नहीं मोबाइल से जुड़ा था। वो कई बार दिन में भी आता है उसके लिए ये उलझने, डूबने की सुरक्षित जगह है।
उसके अलावा पार्क कोई नहीं आता, कभी कभार एक्के दुक्के लोग आ जाते है पर वे भी लग जाते है रील फिल में।
सुहानी शाम भी लोग घर में मोबाइल लेकर लेटे रहते है । अच्छा मौसम और ठण्डी हवाएं लौट जाती है। गोया कि अब हर मौसम मोबाइल में उपलब्ध है। अब ‘लाईव’ से ज्यादा ‘वर्चुअल’ का महत्व है। संवेदनाओं से ज्यादा शरीर काज् ये स्क्रोल काल है।
संजय श्रमण
जिद्दु कृष्णमूर्ति का असली चमत्कार भारतीयों को भारतीयों की भाषा में समझाया नहीं गया है।
उनके गहरे मित्र और समर्थकों ने भी अभी तक बहुत ही ईमानदारी से कृष्णमूर्ति का प्रचार करने की कोशिश की है। उन्होंने भारतीय मन की कमजोरियों का लाभ उठाकर कृष्णमूर्ति का प्रचार नहीं किया है। इसीलिये कृष्णमूर्ति को लोग न तो जानते हैं न समझते हैं।
लेकिन ओशो रजनीश और जग्गी वासुदेव या रविशंकर जैसे लोगों ने भारतीय मन की कमजोरियों का फायदा उठाते हुए खुद को बहुत ही व्यवस्थित ढंग से प्रचारित किया है।
इसीलिये न सिर्फ लोग उन्हें जानते हैं बल्कि उनकी पूजा भी करते हैं। इन लोगों ने भारतीयों का कितना हित या अहित किया है ये बात अलग है, इसका हिसाब लगाना हालांकि बहुत आसान है।
इनके शिष्यों की जिन्दगी में थोड़ा सा गहराई से झांकिए सब पता चल जाता है। इनके अंधविश्वास, भाग्यवाद और गुरु पर हद दर्जे की निर्भरता (जिसे ये गुरुभक्ति कहते हैं) से साफ़ पता चलता है कि इन गुरुओं ने नुक्सान ही अधिक पहुँचाया है और अभी भी पहुंचा रहे हैं।
आइये कृष्णमूर्ति को भारतीय मन के ढंग से समझते हैं। हालाँकि यह ढंग बिलकुल ही गलत है लेकिन इसके प्रति चेतावनी जाहिर करते हुए मैं ये पोस्ट लिख रहा हूँ। इसका उद्देश्य सिर्फ इतना ही है कि कृष्णमूर्ति को न जानने वाले लोगों को ये पता चल सके कि कृष्णमूर्ति सामान्य बाबाओं से किस तरह भिन्न हैं। कितने ईमानदार, बोल्ड और कितने खालिस जमीनी इंसान हैं।
यह बताना इसलिए भी जरूरी है कि भारतीय मन चमत्कार में ही भरोसा करता है।
ईमानदारी यहाँ चमत्कार नहीं है इंसानियत यहाँ चमत्कार नहीं है। जब तक ये न बताया जाए कि किसी ने करोड़ों रुपयों को लात मार दी तब तक लोग त्याग को भी नहीं समझते।
अगर ये कहें कि फलाने चंद गरीब पैदा हुए और गरीब ही मर गए लेकिन बड़े अच्छे कवि थे तो लोग उन्हें नहीं पूछते। लेकिन ये कहें कि ढिकाने चंद राजमहल में पैदा हुए थे फिर अरबों खरबों की संपत्ति को लात मारकर बाबाजी बन गए तो इस आदमी को भारतीय लोग एकदम से पूजने लगते हैं। उसकी शिक्षा क्या है या वो क्या कह के गए हैं इससे उन्हें कोई भी मतलब नहीं, वे बस उसकी मूर्ति और मन्दिर बनाकर ढोल पीटने लग जायेंगे।
इसीलिये राम कृष्ण सहित भारतीयों के सभी चमत्कारी अवतार या तो राजा हैं, या किसी अन्य अतिभौतिक या अतिप्राकृतिक अर्थ में चमत्कारी हैं। यहाँ तक कि स्वयं बुद्ध भी इसी अर्थ में लोगों को अधिक महिमावान नजर आते हैं। इसीलिये बुद्ध को भी बहुत पारम्परिक अर्थ में ही समझा जाता है।
यह बात बुद्ध के लिए समस्या बन गयी है। और इसीलिये कबीर,रविदास और नानक सहित गोरख को भी भारतीय भीड़ सम्मान नहीं दे पाती।
इस दृष्टि से कृष्णमूर्ति के चमत्कार को उजागर करना होगा ताकि लोग समझ सकें कि वे चमत्कारी बाबाओं और त्यागियों से गुणात्मक रूप से भिन्न हैं, न सिर्फ भिन्न हैं बल्कि उनसे बहुत ज्यादा सुलझे हुए और बहुत ज्यादा स्पष्टवादी और उपयोगी हैं। तो सवाल उठता है कि कृष्णमूर्ति के पास क्या था जिसे उन्होंने लात मार दी? क्या त्याग उन्होंने किया? इसे समझें की कोशिश कीजिये।
थीयोसोफिकल सोसाइटी ने बचपन में ही कृष्णमूर्ति को गोद ले लिया था और उन्हें पाल पोसकर बड़ा किया। गुलाम भारत के दौर में उनकी शिक्षा इंग्लैण्ड में करवाई गई और उन्हें विश्वगुरु की भूमिका के लिए चुना गया। एनी बेसेंट और बिशप लीडबीटर, जो थियोसोफिकल सोसाइटी के प्रमुख थे, उन्होंने इस बालक को चुना था।
उनकी मान्यता ये थी कि इस बालक में गौतम बुद्ध की आत्मा का प्रवेश कराया जा सकता है और बुद्ध को भगवान मैत्रेय के रूप में कृष्णमूर्ति के शरीर के जरिये फिर से दुनिया के सामने लाया जा सकता है।
इस सोच के साथ कृष्णमूर्ति की शिक्षा शुरू की गयी। उनके नाम से कुछ किताबें भी लिखी गयी (एट द फीट ऑफ़ मास्टर) उनके नाम से एनी बेसेंट कई लेख लिखती रहीं। और उन्हें महान साबित करती रहीं।
कृष्णमूर्ति के जवान होते होते उनके नाम पर करोड़ों की संपत्ति महल किले और जायदाद इक_ी हो गयी। उनके शरीर में बुद्ध के प्रवेश की घोषणा के बहुत पहले से ही उन्हें बुद्ध मानकर पूजा जाने लगा।
गुलाम भारत में जहां अंग्रेजों से मित्रता होना अपने आप में सौभाग्य माना जाता था वहां नौजवान कृष्णमूर्ति को अंग्रेज और सारे यूरोपियन पूजने लगे थे, वे लोग उनके प्रति इतने समर्पित हो गये थे जिसका कोई हिसाब नहीं। दुनिया के बड़े राजनेता, दार्शनिक,धन्नासेठ, वैज्ञानिक, साहित्यकार इत्यादि उनकी एक झलक पाने को मरे जाते थे।
लेकिन कृष्णमूर्ति को इस सबसे नफरत थी। जिस दिन यह तय था कि कृष्णमूर्ति बुद्ध बनकर बोलना शुरू करेंगे उस दिन कृष्णमूर्ति से सारी बिसात उलट डाली और कहा कि मैं कोई बुद्ध या अवतार या गुरु इत्यादि नहीं हूँ। मैंने अपना समाधान अपनी मेहनत से पाया है और आप भी अपनी समझ और मेहनत से अपना समाधान हासिल कीजिये।
आप कल्पना कीजिये, जिस नौजवान को लाखों यूरोपीय, अमेरिकी और भारतीय लोग भगवान समझने लगे थे वह अगर किसी पोंगा पंडित की तरह अवतार या गुरु होने का नाटक करने लगता तो उसके लिए कितना आसान न होता? कितनी आसानी से वह दुनिया पर राज कर सकता था? कितनी आसानी से वह सब कुछ हासिल कर सकता था।
लेकिन कृष्णमूर्ति ने इस सबको इक_ा नकार दिया। इस नौजवान ने अपने नाम की गयी अरबों की संपत्ति को ठुकरा दिया। अपने नाम पर बनाई गयी संस्था (ऑर्डर ऑफ स्टार इन द ईस्ट) को भंग कर दिया और सबको सीधे-सीधे ये कहा कि सत्य एक पथहीन भूमि है उस पर कोई किसी को साथ नहीं ले जा सकता उस पर सबको अकेले ही चलना है और सारे धर्म, भगवान और मसीहा सब इंसानियत के दुश्मन हैं।
भारतीय धर्मप्रेमी तो ठीक हैं, वैज्ञानिक बुद्धि के यूरोपीय भी अभी तक इस सच्चाई को अपने गले नहीं उतार सके हैं। अभी भी गिने चुने लोग ही कृष्णमूर्ति को पढ़ते या समझते है। बाकी सब लोग किसी न किसी दाढ़ी वाले या बाबा की गुलामी कर रहे हैं।
कृष्णमूर्ति इतने ईमानदार और गैर समझौतावादी हैं कि वे एक अर्थ में भारतीय लगते ही नहीं हैं। और आध्यात्मिक तो बिलकुल ही नहीं लगते।
यही उनका चमत्कार है – अगर कोई समझ सके तो।
उमंग पोद्दार
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल शुक्रवार 10 मई को जेल से बाहर आ गए।
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने उन्हें 1 जून तक अंतरिम जमानत दी है, साथ ही उन्हें चुनाव प्रचार करने की भी इजाजत है। केजरीवाल को 2 जून को दोबारा सरेंडर करना होगा।
मतलब ये है कि लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण की वोटिंग तक केजरीवाल जेल से बाहर रहेंगे।
विपक्ष ने केजरीवाल की गिरफ्तारी को चुनाव के दौरान समान अवसर पर हमला बताया था। हालांकि, कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस गिरफ्तारी से विपक्ष के पक्ष में लोगों की सहानुभूति बढ़ी है।
अब कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि केजरीवाल की रिहाई से विपक्ष को फ़ायदा मिलेगा।
खासकर, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों में जहां आम आदमी पार्टी का मजबूत आधार है। इससे इंडिया गठबंधन भी मजबूत होगा।
अरविंद केजरीवाल के खान-पान पर भिड़े ईडी और ‘आप’, आतिशी ने कहा- ‘जेल में जान से मारने की साजिश रची जा रही है।’
कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि लोकसभा चुनाव पांच साल में होने वाली एक अहम लोकतांत्रिक घटना है।
कोर्ट को अंतरिम जमानत देने से पहले इस पहलू पर विचार करना था।
कोर्ट ने कहा कि अरविंद केजरीवाल का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वो ‘समाज के लिए ख़तरा’ नहीं हैं।
इन सब बातों को ध्यान में रखकर कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ केजरीवाल को ज़मानत देने का आदेश सुनाया।
आदेश में कहा गया कि केजरीवाल, मुख्यमंत्री कार्यालय नहीं जाएंगे। वो किसी भी फ़ाइल पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे, जब तक कि किसी आदेश पर दिल्ली के उप राज्यपाल की मंजूरी हासिल करने के लिए उनके हस्ताक्षर की जरूरत न हो।
केजरीवाल अपने खिलाफ चल रहे मौजूदा केस के बारे में कोई बयान नहीं देंगे और केस से जुड़े गवाहों से बातचीत नहीं करेंगे। हालांकि, केजरीवाल अपनी सियासी गतिविधियां जारी रख सकते हैं।
दिल्ली-पंजाब में आम आदमी पार्टी
का बढ़ेगा मनोबल?
फि़लहाल, लोकसभा चुनाव चल रहे हैं। तीन चरणों के लिए वोटिंग हो चुकी है, अभी चार चरण बाक़ी हैं।
आम आदमी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले दो राज्य दिल्ली और पंजाब में अभी मतदान होना है।
दिल्ली की 7 सीटों पर 25 मई को चुनाव है। यहां से आम आदमी पार्टी 4 सीटों पर और कांग्रेस 3 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। दोनों ही पार्टियां इंडिया गठबंधन के तहत एक साथ मिलकर चुनाव लड़ रही हैं।
पंजाब की सभी 13 सीटों पर आम आदमी पार्टी चुनाव लड़ रही है। यहां 1 जून को मतदान है। इन दोनों राज्यों के अलावा आम आदमी पार्टी हरियाणा में भी एक सीट पर चुनाव लड़ रही है। यहां दिल्ली के साथ ही 25 मई को चुनाव है।
पूरे देश की बात करें तो 543 में से 285 सीटों पर वोटिंग हो चुकी है। इनमें से कई जगहों पर आम आदमी पार्टी का भी आधार था।
उदाहरण के लिए, गुजरात में पार्टी ने 2 उम्मीदवारों को उतारा था। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को पांच सीटों पर जीत मिली थी और 13त्न वोट मिले थे।
क्या केजरीवाल की रिहाई से विपक्ष को मदद मिलेगी?
जानकारों का मानना है कि केजरीवाल की रिहाई से न सिर्फ उनकी पार्टी बल्कि पूरे इंडिया गठबंधन को फायदा मिलेगा।
इससे पहले जब आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह को कुछ शर्तों के साथ जमानत दी गई थी तो कई जानकारों का कहना था कि पार्टी कार्यकर्ताओं में नए उत्साह का संचार हुआ था।
राजनीतिक विश्लेषक और आम आदमी पार्टी के पूर्व सदस्य आशुतोष कहते हैं, ‘अरविंद केजरीवाल की मौजूदगी का दिल्ली और पंजाब में बड़ा प्रभाव पड़ेगा। केजरीवाल का कम्युनिकेशन स्किल बेहतरीन है और जनता से उनका जुड़ाव है।’
आशुतोष कहते हैं, ‘वो पूरे भारत में जाने जाते हैं, इससे भी चीज़ें बदलेंगी। ये मोदी सरकार के लिए बड़ा झटका है। वो सिर्फ कुछ राज्यों में कैंपेन ही नहीं करेंगे बल्कि इंडिया गठबंधन की तरफ से वो दूसरे राज्यों में भेजे जाएंगे। मौजूदा वक्त में मोदी और राहुल गांधी के बाद वो बड़े नेताओं में से एक माने जाते हैं।’
राजनीतिक विश्लेषक अदिति फडनीस मानती हैं कि ये बीजेपी के लिए ‘बड़ा झटका’ है, साथ ही इससे आम आदमी पार्टी का मनोबल काफी हद तक बढ़ेगा। वो कहती हैं, ‘अब वो बाहर आकर लोगों को समझा सकते हैं।’
फडनीस मानती हैं कि दिल्ली में इसका निश्चित तौर पर सकारात्मक असर होगा। हालांकि, दूसरे राज्यों के बारे में वो इतनी स्पष्ट नहीं हैं।
फडनीस बताती हैं, ‘पंजाब में उनकी मौजूदगी से बहुत ज़्यादा असर नहीं होगा। वहां कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच के गठबंधन में दिक्कतें हैं। दोनों ही पार्टियां एक दूसरे के खिलाफ गंभीरता से चुनाव लड़ रही हैं।’
वो कहती हैं कि केजरीवाल के बाहर आने से इंडिया गठबंधन को मजबूती मिलेगी, भले ही ये कुछ समय के लिए ही क्यों न हो।
फडनीस कहती हैं, ‘चुनाव के पिछले चरण के बाद से ऐसा लग रहा है कि विपक्ष उतना बुरा प्रदर्शन नहीं कर रहा है, जितने की आशंका थी।’
बता दें कि झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और फिर अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी की विपक्ष के नेताओं ने पुरज़ोर निंदा की थी। अब केजरीवाल की रिहाई के बाद कुछ विपक्षी नेताओं ने कहा कि इससे इंडिया गठबंधन मजबूत होगा।
क्या केजरीवाल दोबारा जेल जाएंगे?
कोर्ट ने 10 मई को कहा कि वो उनके मुख्य मामले की सुनवाई करेगा। इस मामले में उनकी गिरफ्तारी को चुनौती दी गई है। ऐसे में अगर कोर्ट ने केजरीवाल की गिरफ़्तारी को अवैध पाया तो वो फिर जेल नहीं जाएंगे। हालांकि, अगर ऐसा नहीं होता है तो उन्हें 2 जून को तिहाड़ जेल वापस जाना पड़ेगा।
कथित शराब घोटाले से जुड़े कुछ मामलों में सीबीआई और ईडी दोनों ने आरोपियों को गिरफ़्तार किया है। केजरीवाल के मामले में गिरफ्तारी ईडी ने की है।
दिल्ली के उपराज्यपाल ने एनआईए को चि_ी लिखकर केजरीवाल के खिलाफ जांच के लिए कहा है।
उन्होंने आरोप लगाया है कि आम आदमी पार्टी को प्रतिबंधित संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस’ से फंडिंग मिली है, इस संगठन पर खालिस्तान के समर्थन का आरोप लगता है।
हालांकि, कानून के जानकार मानते हैं कि 1 जून तक केजरीवाल को किसी दूसरी सरकारी एजेंसी द्वारा गिरफ्तार किए जाने की संभावना नहीं है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज गोविंद माथुर का कहना है, ‘मुझे ऐसा नहीं लगता कि उन्हें किसी नए आधार पर गिरफ्तार किया जाना चाहिए। अगर किसी नए मामले में उनकी गिरफ़्तारी होती है तो ये सही नहीं होगा।’
‘अगर वो किसी दूसरे मामले में केजरीवाल को गिरफ्तार करना चाहते थे, जबकि ये मामला कोर्ट में चल रहा था तो उन्हें कोर्ट को जानकारी देनी चाहिए था कि उन्हें केजरीवाल के हिरासत की जरूरत है। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया है, इसका मतलब है कि इसकी अभी जरूरत नहीं है।’
सीनियर एडवोकेट नित्या रामकृष्णन कहती हैं, ‘ऐसी उम्मीद नहीं है कि कोई भी एजेंसी, कोर्ट के आदेश को टालने के लिए कुछ ऐसा करेगी। अगर वो ऐसा करते हैं तो उपाय भी होंगे।’ (bbc.com/hindi)
दिलीप कुमार पाठक
ईरानी कवि साबिर हका पढऩे-लिखने के शौकीन इमारतों में मजदूरी करते थे। साबिर के पास रहने के लिए घर भी नहीं है, कभी सडक़ों पर सोते हैं कभी सोते ही नहीं। इसी कारण पिछले बारह साल से इतना वक्त नहीं मिल पाया कि वे अपनी पुस्तक को पूरा कर सकें। फिर भी लिखते रहते हैं। वैसे भी ईरान में सेंसरशिप लागू है। कवियों-लेखकों के शब्द, सरकार सेंसर कर देती है। तब वे आधे वाक्य बनकर रह जाते हैं।
फिर भी साबिर को जब मौका मिलता तो अपनी वेदना को शब्दों का रूप देकर कविताएं लिख डालते थे। अव्वल पहले तो उनकी रचनाएं कोई प्रकाशित करने के लिए राजी ही नहीं हो रहा था, सही तो है मजदूर भला कवि कैसे हो सकते हैं! हम सब भी तो यही सोचते हैं। लेकिन जब उनकी कविताएं दुनिया की नजऱ में आईं तो पढऩे-लिखने वाले लोग हैरत में पड़ गए। दरअसल वो कविताएं नहीं थीं वो एक वेदना थी।
वाकई साबिर ने यथार्थ को क्या खूब शब्द दिए हैं। उनके दो कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ईरान श्रमिक कविता स्पर्धा में प्रथम पुरस्कार पा चुके हैं। बहुत कम लिखने वाले साबिर कहते हैं-‘कविता से पेट नहीं भरता, पैसे कमाने के लिए ईंट-रोड़ा ढोना पड़ता है। एक बार साबिर ने कहा था, -‘मैं थका हुआ हूं, बेहद थका हुआ, मैं पैदा होने से पहले से ही थका हुआ हूं, मेरी मां मुझे अपने गर्भ में पालते हुए मज़दूरी करती थी, मैं तब से ही एक मजदूर हूं। मैं अपनी मां की थकान महसूस कर सकता हूं। उसकी थकान अब भी मेरे जिस्म में है।’
माँ की थकान खुद में महसूस करने वाले साबिर ने लिखा है
क्या आपने कभी शहतूत देखा है, जहां गिरता है,
उतनी ज़मीन पर उसके लाल रस का धब्बा पड़ जाता है।
गिरने से ज़्यादा पीड़ादायी कुछ नहीं।
मैंने कितने मज़दूरों को देखा है इमारतों से गिरते हुए,
गिरकर शहतूत बन जाते हुए...
मौत के मुहाने पर खड़ा एक मजदूर जिंदगी भर मौत से डरते हुए जिये जाता है। मौत के उसी डर पर साबिर ने लिखा -
‘ताउम्र मैंने इस बात पर भरोसा किया कि झूठ बोलना ग़लत होता है गलत होता है किसी को परेशान करना ताउम्र मैं इस बात को स्वीकार किया कि मौत भी जिंदगी का एक हिस्सा है। इसके बाद भी मुझे मृत्यु से डर लगता है, डर लगता है दूसरी दुनिया में भी मजदूर बने रहने से।
मैंने अपने पिता को हमेशा मजबूर देखा है, मैं उनके लिए कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा। जिस व्यक्ति ने अपना जीवन खपा दिया मेरी एक खुशी के लिए जिसने जिंदगी कुर्बान कर दी। मैं कविताएं लिखूँ भी तो किसके लिए मुझे कविताएं लिखते हुए अफसोस होता है कि मेरे पिता पढ़ नहीं सकते। मेरे पिता मजदूर थे आस्था से भरे हुए इंसान जब भी वह नमाज़ पढ़ते थे (अल्लाह) उनके हाथों को देख शर्मिंदा हो जाता था।
राजनीति हमेशा मजदूर-किसानों को उम्मीद दिखाते हुए कसमें खाती है। दरअसल वो कसमें नहीं खाती मजदूरों की चेतना हर रही होती है। बड़े-बड़े बदलाव भी कितनी आसानी से कर दिए जाते हैं। हाथ-काम करने वाले मज़दूरों को राजनीतिक कार्यकर्ताओं में बदल देना भी कितना आसान रहा, है न! क्रेनें इस बदलाव को उठाती हैं और सूली तक पहुंचाती हैं।
जब मैं मरूंगा अपने साथ अपनी सारी प्रिय किताबों को ले जाऊंगा अपनी क़ब्र को भर दूंगा उन लोगों की तस्वीरों से जिनसे मैंने प्यार किया। मेरे नये घर में कोई जगह नहीं होगी भविष्य के प्रति डर के लिए। मैं लेटा रहूंगा। मैं सिगरेट सुलगाऊंगा और रोऊंगा उन तमाम औरतों को याद कर जिन्हें मैं गले लगाना चाहता था। इन सारी प्रसन्नताओं के बीच भी एक डर बचा रहता है, कि एक रोज, भोरे-भोर, कोई कंधा झिंझोडक़र जगाएगा मुझे और बोलेगा- ‘अबे उठ जा साबिर काम पे चलना है।
ये तो एक साबिर की बात है कभी-कभार सोचता हूं मजदूरों को हिसाब करना आ गया गऱ उन्होंने अपना हिस्सा मांग लिया तो क्या सरकारें क्या सभ्यताएं ईश्वर को भी मुँह छिपाने की जगह नहीं मिलेगी। खैर वर्दी को सलाम करती हुई सभ्यताएं फटी हुई कमीज को कभी भी आदर की दृष्टि से नहीं देख सकतीं। कम से कम, तब तक, जब तक हर मजदूर के घर साबिर हका पैदा नहीं होते जो अपना हक ले सकें।
अप्रैल में इतनी गर्मी पड़ी कि एशिया के कई देशों में स्कूल बंद करने पड़े। यह सिर्फ एक झांकी है कि कैसे जलवायु परिवर्तन बच्चों की पढ़ाई को प्रभावित कर सकता है।
अप्रैल लगातार 11वां महीना रहा जब सबसे ज्यादा गर्मी के ऐतिहासिक रिकॉर्ड टूटे। एशिया में कुछ देशों में बारिश का मौसम शुरू हो गया है, जिससे गर्मी में राहत मिली है। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि अभी समस्याएं खत्म नहीं हुई हैं और बहुत से देश जलवायु परिवर्तन के कारण शिक्षा और बच्चों पर होने वाले प्रभाव से लडऩे के लिए तैयार नहीं हैं।
एशिया में तापमान पूरी दुनिया के औसत से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण अन्य हिस्सों के मुकाबले इस महाद्वीप में ताप लहरें कहीं ज्यादा लंबी, तेज और तीव्र हो रही हैं। लेकिन गर्मी ही एकमात्र चुनौती नहीं है।
ज्यादा गर्म वातावरण में नमी भी ज्यादा होती है इसलिए बारिश और बाढ़ का खतरा भी ज्यादा होता है। इससे स्कूलों की इमारतों को नुकसान होता है। वे बच्चों की पढ़ाई के लिए सुरक्षित नहीं रह जाती। इसके अलावा बाढ़ या अन्य मौसमी आपदाएं आने पर स्कूलों की इमारतों को शिविरों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, लिहाजा पढ़ाई प्रभावित होती है।
गर्मी के कारण जंगलों की आग और वायु प्रदूषण भी बढ़ता है। हाल में भारत से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक तमाम देशों में प्रदूषण के कारण स्कूल बंद करने पड़े हैं। संयुक्त राष्ट्र की बच्चों के लिए काम करने वाली एजेंसी यूनिसेफ ने पिछले साल चेतावनी दी थी, ‘जलवायु परिवर्तन का संकट पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र के बच्चों के लिए एक सच्चाई बन चुका है।’
13 साल की महुआ अख्तर नूर इस संकट का जीता-जागता उदाहरण हैं। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में उसका स्कूल बंद हो गया है। अब वह एक कमरे के अपने घर में तपती दोपहरी बिताती हैं। बिजली आती-जाती रहती है, इसलिए गर्मी से बचने के लिए उन्हें पंखे तक की राहत नहीं है।
नूर बताती हैं, ‘गर्मी असहनीय हो गई है। हमारा स्कूल बंद हो गया है। मैं घर पर भी नहीं पढ़ सकती।’
बांग्लादेश में समाजसेवी संस्था सेव द चिल्ड्रन के निदेशक शुमोन सेनगुप्ता कहते हैं, ‘ना सिर्फ तापमान अधिक है बल्कि उसके अधिक बने रहने की अवधि भी ज्यादा है। पहले कुछ ही इलाकों में ऐसी ताप लहर चलती थी। अब ऐसे इलाके कहीं ज्यादा हो गए हैं।’
एशिया के अधिकतर स्कूल इस बदलाव के लिए तैयार नहीं हैं। सेनगुप्ता कहते हैं कि बांग्लादेश के स्कूल मजबूत तो हैं लेकिन अक्सर वहां भीड़ क्षमता से ज्यादा होती है और हवा के आने-जाने की सुविधा कम है।
ग्रामीण इलाकों में स्कूलों की टीन की छतें तो कमरों को भ_ी में तब्दील कर देती हैं, जिनमें पंखे भी काम नहीं करते। एशिया के बहुत से देशों में ग्रामीण इलाकों में बच्चे पैदल स्कूल जाते हैं। इससे हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए सरकारें स्कूल बंद करने जैसे कदम उठाती हैं।
चारों तरफ से मार
स्कूल बंद करने के भी बड़े नुकसान हैं, खासकर गरीब और कमजोर तबकों से आने वाले बच्चों के लिए। पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र में यूनिसेफ की स्वास्थ्य विशेषज्ञ साल्वा एलेरयानी कहती हैं, ‘इन बच्चों को कंप्यूटर, इंटरनेट और किताबों जैसे संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। इनके घरों में भी ताप लहर से सुरक्षा के इंतजाम अच्छे नहीं होते।’
गर्मी से बेहाल हुए भारत-बांग्लादेश
जलवायु परिवर्तन ने स्कूली शिक्षा को कई तरह से प्रभावित किया है। म्यांमार में यूनिसेफ के एक शोध में पाया गया कि मौसमी आपदाओं के कारण जब खेती और रोजगार प्रभावित होते हैं तो माता-पिता बच्चों को स्कूल से निकाल लेते हैं क्योंकि वे खर्च वहन नहीं कर पाते।
क्षेत्र के कुछ धनी देशों ने जलवायु परिवर्तन से शिक्षा को बचाने के लिए कदम भी उठाए हैं। जैसे जापान में 2018 तक आधे से कम स्कूलों में एयर कंडिशनर थे लेकिन 2022 तक यह संख्या बढक़र 95 फीसदी हो गई।
लेकिन गरीब देशों में ये सुविधाएं नहीं हैं और उनके बच्चों की शिक्षा प्रभावित होने के खतरे और उसके नुकसान कहीं ज्यादा हैं। सेनगुप्ता कहते हैं, ‘यह बेहद जरूरी है कि सरकारें और नीति निर्माता इस बारे में तुरंत कदम उठाएं।’ (dw.com/hi)
अनुघा पाठक
‘तो इसका मतलब मेरी शादी मान्य नहीं है?’ मेरी सहेली गायत्री ने मुझसे सवाल किया?
उसने ये सवाल हिंदू विवाह पर सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी के बारे में पढऩे के बाद किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हिंदू विवाह एक 'संस्कार' है और ये एक समारोह के जरिये सही तरीके से पूरा होना चाहिए।
हिंदू विवाह को हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत ही मान्यता मिलती है।
गायत्री 35 साल की आधुनिक महिला हैं, जिन्होंने अपनी शादी में कन्यादान की रस्म नहीं होने दी थी। क्योंकि उनका मानना था कि वो कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे दान में दिया जाए।
हमारी बातचीत से मुझे ये याद आया कि मेरी दोनों बहनों की शादी में हमने वो समारोह नहीं किया था, जिसमें वर पक्ष के मेहमानों के पांव धोए जाते हैं।
तो क्या इसका मतलब ये निकाला जाना चाहिए ये शादियां अमान्य हैं?
इसका फौरी ज़वाब है- नहीं। लेकिन इसका विस्तार से जवाब आपको इस लेख को पढऩे के दौरान मिलेगा।
आइए पहले उस केस के बारे में जानते हैं, जिससे ये बहस शुरू हुई।
अदालत की बहस और हिंदू विवाह
अदालत उस महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने कहा था कि उसकी तलाक की याचिका को बिहार के मुजफ्फरपुर कोर्ट से झारखंड के रांची कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया जाए।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत महिला और उनके पूर्व पार्टनर ने संयुक्त रूप से एक याचिका दायर कर कहा था कि वो अपनी असहमतियों का निपटारा कर लेना चाहते हैं।
उन्होंने कहा था कि चूंकि उनकी शादी में परंपरागत रस्मों-रिवाजों का पालन नहीं हुआ था इसलिए उनकी शादी को अमान्य करार दिया जाए।
अदालत ने उनकी याचिका मंजूर कर ली और उनकी शादी को अमान्य घोषित कर दिया।
अदालत ने फैसला देते वक्त कुछ टिप्पणियां की। इनमें से एक थी कि जहां हिंदू शादी उपयुक्त रस्मों और समारोहों से नहीं हुई वहां कानून की नजर में ये हिंदू शादी के तौर पर मान्य नहीं होगी। शादी की रस्मों के एक उदाहरण के तौर पर सप्तपदी का नाम लिया गया था।
इसे समझने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम के सेक्शन 114 का जि़क्र करना होगा जिसमें शादी की ‘धारणा’ की बात की गई है।
वीणा गौड़ा महिलावादी वकील हैं और मुंबई में रहती हैं। वो कहती हैं, ‘अदालत हमेशा शादी की धारणा के पक्ष में झुका होता है। मसलन, अगर आप किसी के साथ लंबे समय तक रह रहे हैं और आपने समाज में इसे इस तरह पेश किया है कि आप दोनों पति-पत्नी हैं तो कानून भी ये मानेगा कि आप विवाहित है, जब तक कि कोई पक्ष इसे चुनौती न दे।’
वो कहती हैं कि अगर कोई शादी हिंदू विवाह अधिनियम के तहत होती है तो कुछ रस्मों-रिवाजों को करना ही होगा। साथ ही शादी के सर्टिफिकेट के लिए ऐसे समारोहों का प्रमाण भी देना होगा।’
वीणा कहती हैं, ‘विशेष विवाह अधिनियम यानी स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी का रजिस्ट्रेशन ही अपने आप में शादी है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में निकाहनामा ही आपकी शादी हैं। वहीं क्रिश्चियन कानून के तहत शादी होने पर चर्च सर्टिफिकेट देता है। इन सभी शादियों में मैरिज सर्टिफिकेट या इसका रजिस्ट्रेशन अपने आप में शादी का हिस्सा है। हालांकि हिंदू कानून में शादी के रजिस्ट्रेशन की कोई अवधारणा नहीं है। यह कानून में बाद में शामिल किया गया।’
वो कहती हैं, ‘हिंदू कानून में शादी समारोह की अवधारणा है और इसे दोनों पक्ष में किसी के भी रीति-रिवाज और परंपराओं के तहत करना पड़ता है। सिर्फ रजिस्ट्रेशन शादी का प्रमाण नहीं हो सकता। इसलिए कानून के जरिये से देखें तो कोर्ट ने जो कहा वो एक हद तक सही है।’
सप्तपदी, कन्यादान या मंगलसूत्र पहनाने को अक्सर पिछड़ी और ब्राह्वणवादी पितृसत्ता मान्यताओं का समर्थन करना माना जाता है क्योंकि ये मानती हैं कि महिलाएं दूसरी को सौंपी जाने वाली संपत्ति है।
कानून क्या कहता है?
कानून इस मामले में स्पष्ट है। ये किसी कर्मकांड या समारोह का जिक्र नहीं करता। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 7 कहती है कि हिंदू विवाह वर-वधू में से किसी भी पक्ष के पारंपरिक अनुष्ठानों और समारोहों के जरिये हो सकता है।
वीणा एक उदाहरण देती हैं। वो कहती हैं, ‘कर्नाटक के कुछ समुदायों में लोग कावेरी नदी को साक्षी मान कर शादी करते हैं। कुछ शादियों में सूर्य को साक्षी माना जाता है। कई तरह के समारोह और अनुष्ठान होते हैं। कानून किसी खास अनुष्ठान या समारोह के बारे में नहीं कहता है कि इन्हें ही किया जाना चाहिए। ये सिर्फ ये कहता है कि शादी वर या वधू में से किसी भी पक्ष की परंपरा के मुताबिक समारोह करके शादी पूरी हो सकती है।’
हिंदू विवाह अधिनियम का धारा 3 में रीति-रिवाजों का परिभाषा दी गई है। यहां रीति-रिवाज और इनका पालन करने से मतलब ऐसे नियमों को पालन करना है जो लंबे समय से लगातार उसी रूप में माने जाते रहे हैं। और ये परंपराएं किसी समुदाय, जाति, समूह या परिवार में कानून का बल (यानी कानूनी मान्यताएं) हासिल कर चुकी हैं।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट समेत भारतीय अदालतें सप्तपदी जैसी रस्मों पर इतना जोर क्यों दे रही है?
डॉ. सरसु थॉमस नेशनल लॉ स्कूल बेंगलुरु में प्रोफेसर हैं और जिनकी फैमिली लॉ और जेंडर कानून में विशेषज्ञता हासिल है। वो मानती हैं कि ‘सभी शादियां ब्राह्मण परंपराओं और रीति-रिवाजों के मुताबिक़ नहीं होती हैं। लेकिन ये सही है कि अदालतें ब्राह्मण परंपराओं और रीति-रिवाजों को ही देख रही हैं।’
वो कहती हैं, ‘मैं समझती हूं कि जहां-जहां कोर्ट ने सप्तपदी या होम करने पर जोर दिया है वो कुछ मामलों में ठीक नहीं है। कुछ लोग ये मान सकते हैं कि मंगलसूत्र बांधना सप्तपदी के बराबर का अनुष्ठान या परंपरा नहीं है।’
हालांकि वो कहती हैं, ‘अगर वर या वधू में से किसी पक्ष के अनुष्ठान,परंपरा या रीति-रिवाज के साथ शादी की जाती है तो शादी हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शादी मानी जाएगी।’
अदालतों का ये रुख भी
कुछ मामलों में अदालतों ने दूसरा रुख अपनाया है।
उदाहरण के लिए हाल के एक केस में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तहत कन्यादान कोई अनिवार्य अनुष्ठान नहीं है।
पुणे में रहने वाली रमा सरोद महिला अधिकारों की विशेषज्ञ वकील हैं। उनका कहना है कि भारतीय अदालतों को प्रगतिशील रुख अपनाना चाहिए।
वो कहती हैं, ‘सुप्रीम कोर्ट को आवश्यक कर्मकांडों और समारोहों के परिभाषा को विस्तार देने की जरूरत है। उसे ये बताना होगा कि इसके दायरे में क्या आते हैं। हिंदू विवाह कानून 1955 में आया था। ये सही है कि ये कर्मकांड, रीति-रिवाज, परपराएं उस समय अहम थीं लेकिन अब हमें इन नियमों की व्याख्या आधुनिक समय के हिसाब से करनी होगी।’
रमा कहती हैं, ‘बदलती विचारधाराओं और समारोहों,अनुष्ठानों की जगह होनी चाहिए। लोगों को वही समारोह करने चाहिए जो वो समझते हैं कि ये ठीक है। उन्हें उसी के हिसाब से अपनी शादियों के रजिस्ट्रेशन का अधिकार देना चाहिए। एक वकील के तौर पर मैं ये मानती हूं कि शादी का रजिस्ट्रेशन बेहद अहम है।’ लेकिन सवाल बरकरार है। अगर कोई प्रगतिशील हिंदू उन पुराने रीति-रिवाजों का पालन न करना चाहे तो क्या होगा, भले ही शादी संपन्न होने के लिए ये जरूरी हो।
क्या नए कानून की जरूरत है?
डॉ. सरसु कहती हैं, ‘नए कनून की कोई जरूरत नहीं है।’ वो कहती हैं, ‘अंत में महिलाओं का ही परेशान होना है, क्योंकि ज्यादातर लोग अपनी परंपरा के हिसाब से शादी करेंगे। अब अगर इन परंपराओं को मान्यता न दिया जाए तो इसका मतलब ये हुआ कि महिलाओं की शादियां मान्य नहीं हैं।’
वो कहती हैं, ‘मेरे हिसाब से कानून ठीक है। प्रगतिशील जोड़ों के पास हमेशा से स्पेशल मैरिज एक्ट का विकल्प खुला है। लेकिन नए अनुष्ठानों, समारोहों के लिए कोई नया कानून बनाना ठीक नहीं है। हालांकि कानून ये कह सकता है शादी मान्य होने के लिए रजिस्ट्रेशन पर्याप्त सुबूत है।’
वीणा का कहना है कि अदालत को प्रगतिशील रुख अपनाना चाहिए। उन्हें ऐसी परंपराओं को नामंजूर करना चाहिए जो लैंगिक आधार पर बने हैं। साथ ही उन्हें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि शादी नाम की संस्था कितनी प्रासंगिक है और इसके तहत महिलाओं के अधिकारों की क्या स्थिति है।
वो कहती हैं, ‘भारतीय कानून के तहत मैरिटल रेप पर विचार नहीं किया जाता। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने फैसला दिया था कि शादी के तहत पति की ओर से किया गया अप्राकृतिक यौनाचार अपराध नहीं है। शादी में सहमति की कोई अवधारणा नहीं है। इसका मतलब है कि अगर आप यौन संबंध को लेकर असहमत हैं तो भी शादी करने पर इस पर आपकी सहमति मानी जाती है। ये वो चीजें हैं जिन पर मैं मानती हूं कि ज्यादा प्रगतिशील नजरिये से विचार करने की जरूरत है।’
वीणा मुझे कुछ सवालों पर सोचने को मजबूर कर देती हैं। वो कहती हैं, ‘ये कहना आसान है शादी बराबरी के आधार पर होती है। लेकिन क्या कानून महिला को बराबरी का पार्टनर बनने देता है।’
जहां तक मुझे याद है हम महिलाओं को ये कहा जाता है कि कब शादी करो किससे शादी करो और जहां तक इस बहस का सवाल है तो कैसे शादी करो।
इन सब चीजों के बीच हमारी बराबरी की लड़ाई कहां है। (bbc.com/hindi)
डॉयचेवैले पर चारु कार्तिकेय का लिखा-
लोकसभा चुनावों में मतदान के तीन चरण समाप्त हो चुके हैं, लेकिन जैसे-जैसे चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है पार्टियों के चुनावी अभियान और भडक़ाऊ होते जा रहे हैं। ऐसे में बेरोजगारी जैसी बड़ी समस्या पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है।
रोजगार रहित आर्थिक विकास यानी 'जॉबलेस ग्रोथ' से पिछली सरकारें भी जूझती रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के खिलाफ विशेष आरोप यह है कि उसके कार्यकाल में बेरोजगारी इतनी बढ़ गई जितनी बीते चार दशकों में नहीं बढ़ी थी।
यह बात सरकारी आंकड़े 2019 में ही दिखा रहे थे। फरवरी, 2019 में 'बिजनेस स्टैंडर्ड' अखबार की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि एक सरकारी सर्वेक्षण में पाया गया कि बेरोजगारी 45 सालों में सबसे ऊंचे स्तर पर थी, लेकिन सरकार ने इस रिपोर्ट को जारी नहीं किया।
आखिरकार मई, 2019 में सरकार को इन आंकड़ों को सार्वजनिक करना ही पड़ा। आंकड़ों के मुताबिक 2017-18 में बेरोजगारी दर 6।1 प्रतिशत थी, जो 45 सालों में सबसे ऊंचा स्तर था। इस रिपोर्ट को आए पांच साल बीत चुके हैं, लेकिन आज भी स्थिति नाजुक ही बनी हुई है।
ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अक्तूबर से दिसंबर, 2023 के बीच देश के शहरी इलाकों में बेरोजगारी दर 6।5 प्रतिशत थी। निजी संस्थानों का आकलन इससे ज्यादा गंभीर है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के मुताबिक फरवरी, 2024 में कुल बेरोजगारी दर आठ प्रतिशत हो गई थी।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर इकनोमिक स्टडीज एंड प्लानिंग के प्रोफेसर प्रवीण झा कहते हैं, ‘बेरोजगारी वाकई में एक बड़ी समस्या है। सर्वसम्मत राय यह है कि कुल मिलाकर रोजगार की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है।’
युवा बेरोजगारी है असली समस्या
कई जानकारों का कहना है कि उन्हें विशेष रूप से युवा बेरोजगारी के बढऩे की विशेष रूप से चिंता है। सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि 2022-23 में 15-29 साल के युवाओं में से लगभग 16 प्रतिशत युवा कौशल की कमी और अच्छी नौकरियों की भी कमी की वजह से बेरोजगार रह गए।
निजी संस्थाओं का मानना है कि स्थिति इससे कहीं ज्यादा खराब है। सीएमआईई के मुताबिक युवा बेरोजगारी दर 45।4 प्रतिशत है। हाल ही में जारी की गई एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर तीसरा युवा ना तो पढ़ाई कर रहा है, ना ही नौकरी और ना ही कोई प्रशिक्षण हासिल कर रहा है।
यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने नई दिल्ली स्थित थिंक-टैंक इंस्टिट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट (आईएचडी) के साथ मिलकर जारी की थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अशिक्षित युवाओं के मुकाबले ज्यादा पढ़े लिखे युवाओं को नौकरी मिलने की संभावना और कम है।
जहां अशिक्षित युवाओं में 3।4 प्रतिशत बेरोजगारी दर पाई गई, वहीं ग्रेजुएट युवाओं में यह दर 29।1 प्रतिशत पाई गई। माध्यमिक या उच्च शिक्षा पा चुके युवाओं में बेरोजगारी दर 18।4 पाई है।
आईएचडी के सेंटर फॉर एम्प्लॉयमेंट स्टडीज के निदेशक प्रोफेसर रवि श्रीवास्तव ने इस रिपोर्ट को बनाने वाली की टीम का नेतृत्व किया था। उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि युवा बेरोजगारी देश की बेरोजगारी समस्या के केंद्र में है।
उन्होंने कहा, ‘बाकी सब अंडरएम्प्लॉयमेंट है, या जिसे हम छिपी हुई बेरोजगारी कहते हैं, जिसमें लोग काम तो कर रहे हैं लेकिन या तो उन्हें बहुत कम वेतन मिल रहा है या वो बहुत कम दिनों के लिए काम कर पा रहे हैं। लेकिन जहां तक 'ओपन अनएम्प्लॉयमेंट' का सवाल है, उसका सबसे बड़ा हिस्सा युवा बेरोजगारी से ही बनता है।’
कहीं बर्बाद ना हो जाए युवा शक्ति
हर साल करोड़ों युवा रोजगार के बाजार में कदम रखते हैं। ऐसे में अच्छी नौकरियों की कमी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। देश की आबादी में युवाओं की बड़ी हिस्सेदारी को जनसांख्यिकीय लाभांश या 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' माना जाता है, लेकिन जानकार चेताते हैं कि बेरोजगारी इस युवा शक्ति को एक बोझ में बदल सकती है।
अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं कि उनके और उनके साथियों का अनुमान है कि देश में पहले से करीब 28 करोड़ नौकरियों की कमी है और उसमें हर साल रोजगार के बाजार में कदम रखने वाले करीब 2।4 करोड़ युवा जुड़ते हैं।
कुमार ने डीडब्ल्यू को यह भी बताया, ‘इसके विपरीत हर साल संगठित क्षेत्र में सिर्फ करीब पांच लाख नौकरियों का ही सृजन हो पाता है, जबकि बाकी सारी नौकरियां असंगठित क्षेत्र में हैं, जैसे किसी ने पकोड़े तल लिए, किसी ने सब्जी बेच ली, मूंगफली बेच ली, रिक्शा चला लिया, माल ढो लिया आदि।’
ऐसे हालात में क्या इतनी भीषण गर्मी में अपना वोट डालने के लिए मतदान केंद्रों तक जाने वाले लोगों के मन में बेरोजगारी एक मुद्दा नहीं है? अप्रैल में नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले 62 प्रतिशत लोगों ने कहा कि नौकरी ढूंढना पहले के मुकाबले आज ज्यादा मुश्किल है।
27 प्रतिशत लोगों ने यह भी कहा कि चुनावों में किसे वोट देना है यह तय करने के लिए उनके सामने बेरोजगारी एक महत्वपूर्ण विषय है। हालांकि बीजेपी चुनावों के दौरान इस विषय से कतरा रही है। डीडब्ल्यू ने आर्थिक मामलों पर बीजेपी प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल से बेरोजगारी पर टिप्पणी के लिए अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने हमारे सवाल का जवाब नहीं दिया।
विपक्षी पार्टियों का ‘इंडिया’ गठबंधन बेरोजगारी और अन्य आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर मतदाताओं को अपनी तरफ करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन मतदाता किसकी सुनते हैं यह जानने के लिए दोनों ही पक्षों को चार जून का इंतजार रहेगा। (dw.com/hi)
दो सप्ताह के अंदर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सैम पित्रोदा के दो बयानों से ऐसा विवाद उठा कि पार्टी असहज स्थिति में आई और सफाई देनी पड़ी।
सैम पित्रोदा ने पहले एक इंटरव्यू में इनहेरिटेंस टैक्स का जि़क्र छेड़ते हुए ये कहा कि इस पर भारत में भी चर्चा होनी चाहिए, जिसे बीजेपी ने एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया।
इसके बाद बुधवार को उनके इंटरव्यू का एक हिस्सा सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जो उन्होंने हाल ही में अंग्रेज़ी अख़बार स्टेट्समैन को दिया था।
इस इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ‘हम भारत जैसे विविधता से भरे देश को एकजुट रख सकते हैं, जहाँ पूर्व में रहने वाले लोग चाइनीज़ जैसे दिखते हैं, पश्चिम में रहने वाले अरब जैसे दिखते हैं, उत्तर में रहने वाले मेरे ख़्याल से गोरे लोगों की तरह दिखते हैं, वहीं दक्षिण में रहने वाले अफ्ऱीकी जैसे लगते हैं। इससे फक़ऱ् नहीं पड़ता। हम सब भाई-बहन हैं।’
बीजेपी ने इसे नस्लीय टिप्पणी बताया और ख़ुद पीएम मोदी ने अपने चुनावी भाषण में सैम पित्रोदा के बयान के ज़रिए राहुल गांधी को घेरा।
पीएम मोदी ने कहा, ‘मैं आज बहुत ग़ुस्से में हूँ। मुझे कोई गाली दे, मुझे ग़ुस्सा नहीं आता। मैं सहन कर लेता हूँ। लेकिन आज शहजादे के फिलॉस्फर (सैम पित्रोदा) ने इतनी बड़ी गाली दी है, जिसने मुझमें ग़ुस्सा भर दिया है। कोई मुझे ये बताए कि क्या मेरे देश में चमड़ी के आधार पर योग्यता तय होगी। संविधान सिर पर लेकर नाचने वाले लोग चमड़ी के रंग के आधार पर मेरे देशवासियों का अपमान कर रहे हैं।’
बढ़ती मुसीबत के बीच कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने सैम पित्रोदा के बयान से किनारा किया और शाम होते-होते उन्होंने पित्रोदा के इंडियन ओवरसीज़ के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने और उसके स्वीकार होने की सूचना भी दे दी।
हालांकि ये पहली बार नहीं है जब सैम पित्रोदा ने अपने बयानों से कांग्रेस को मुश्किल में डाला हो। इससे पहले साल 2019 में उन्होंने 1984 सिख दंगों पर एक बयान दिया था, जिस पर काफी हँगामा हुआ था।
सैम पित्रोदा ने एक सवाल के जवाब में कहा था, ‘1984 में हुआ तो हुआ पिछले पाँच साल में क्या हुआ इस पर बात करिए।’
हालांकि जब इस बयान पर हंगामा हुआ तो सैम ने माफ़ी मांगी और अपने बयान की वजह अपनी खऱाब हिंदी को बताया था।
उसी साल सैम के एक और बयान ने सुर्खियां बटोरी थीं। पुलवामा हमले और फिर भारत की जवाबी कार्रवाई के बाद सैम ने कहा था, ‘हमले होते रहते हैं। मुंबई में भी हमला हुआ था। हम भी प्रतिक्रिया देते हुए प्लेन भेज सकते थे लेकिन ये सही नहीं होता। मेरे हिसाब से आप दुनिया से ऐसे नहीं निपटते हैं।’
सैम पित्रोदा का शुरूआती जीवन
साल 2015 में बीबीसी संवाददाता रेहान फज़़ल ने सैम पित्रोदा के साथ ख़ास बातचीत की, जिसमें उन्होंने अपने जिंदगी से जुड़े कई अनकहे पहलुओं पर बात की।
सैम पित्रोदा के सफऱ की शुरुआत ओडिशा के बोलांगीर जि़ले के एक छोटे से गाँव तीतलागढ़ में हुई थी। सैम के दादा बढ़ई और लोहार का काम किया करते थे।
उस ज़माने में सैम का सबसे प्रिय शगल होता था अपने घर के सामने से गुजऱने वाली रेलवे लाइन पर दस पैसे का सिक्का रखना और ट्रेन के गुजऱने के बाद कुचले हुए सिक्के को ढूंढ कर जमा करना।
सैम के पिता चाहते थे कि वो गुजराती और अंग्रेज़ी सीखें। इसलिए उन्होंने उन्हें और उनके बड़े भाई मानेक को पढऩे के लिए पहले गुजरात में विद्यानगर के शारदा मंदिर बोर्डिंग स्कूल और फिर बड़ौदा विश्वविद्यालय भेजा।
वहाँ से उन्होंने भौतिकी शास्त्र में पहली श्रेणी में एमएससी की परीक्षा पास की।
अनु को दिल दे बैठे
बड़ौदा विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए ही सैम पित्रोदा की मुलाकात उनकी भावी पत्नी अनु छाया से हुई। जब उन्होंने अनु को पहली बार देखा तो वो धूप में अपने बाल सुखा रही थीं।
सैम याद करते हैं, ‘मैंने उसे देखते ही पहली निगाह में अपना दिल दे दिया। उस समय मैं सिफऱ् बीस साल का था। आज की तरह उस समय भी मेरे पास डायरी हुआ करती थी। उसमें मैंने लिखा कि मैं इस लडक़ी से शादी करूँगा।’
लेकिन अनु तक अपनी भावना पहुंचाने में सैम को डेढ़ साल लग गए। अमेरिका जाने से पहले वो उनका हाथ मांगने उनके पिता से मिलने गोधरा गए। अभी उन्होंने दरवाज़े पर दस्तक दी ही थी कि उनका कुत्ता दौड़ता हुआ आया और उसने सैम के हाथ में काट खाया।
सैम उससे इतने परेशान हुए कि उनके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला और अनु का हाथ मांगने की बात उनके दिल में ही रह गई।
जब अमेरिका गए पहुंचे सैम
भारत में भौतिकी में स्नातकोत्तर करने के बाद इलेक्ट्रॉनिक्स में मास्टर की डिग्री हासिल करने के लिए पित्रोदा शिकागो के इलिनॉय इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी गए।
जब सैम शिकागो पहुंचे तो उन्हें अमेरिकी संस्कृति से सामंजस्य बैठाने में ख़ासी मशक्कत करनी पड़ी।
सैम याद करते हैं, ‘वहाँ सब कुछ नया था। हर चीज़ अजीब सी लगती थी। लोग अजीब थे। खाना अजीब था। बातें अजीब थीं। भाषा अजीब थी। पहली बार मैंने वहाँ डोर नॉब देखा। हमारे यहाँ तो सांकल होती थी। रिवॉल्विंग दरवाज़ा पहली बार मैंने वहाँ देखा। हमारी समझ में आ गया कि जि़ंदगी अब आगे देखने के लिए है, पीछे देखने के लिए नहीं।’
वो बताते हैं, ‘मेरे लिए सबसे बड़ा साँस्कृतिक झटका ये था कि एक साथ कई लोग बाथरूम में सामूहिक तौर पर नहाया करते थे और वो भी बिल्कुल नंगे होकर और उस पर तुर्रा यह कि नहाते समय वो आपस में बातें भी किया करते थे।’
सैम याद करते हैं, ‘मुझे ऐसा करते हुए बहुत शर्म आई। इसलिए मैंने उससे बचने के लिए रात के बारह बजे नहाना शुरू कर दिया ताकि हॉस्टल के बाथरूम में कोई शख्स मौजूद न हो।’
सत्यनारायण से सैम बनने का सफऱ
पढ़ाई ख़त्म करने के बाद सैम ने टेलीविजऩ ट्यूनर बनाने वाली कंपनी ओक इलेक्ट्रिक में काम करना शुरू कर दिया। तब तक सैम का नाम सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा हुआ करता था।
जब उनको अपनी तनख़्वाह का चेक मिला तो उसमें उनका नाम सैम लिखा हुआ था।
जब वो वेतन का काम देखने वाली महिला के पास इसकी शिकायत लेकर गए तो उसने कहा कि तुम्हारा नाम बहुत लंबा है, इसलिए मैंने इसे बदल दिया।
सैम ने सोचा कि कोई कैसे उनकी मजऱ्ी के बगैर उनका नाम बदल सकता है लेकिन फिर उनको ख़्याल आया कि अगर वो चेक में नाम बदलने पर ज़ोर देंगे तो उन्हें इसे भुनाने में दो हफ़्ते और लग जाएंगे।
ये नाम उनसे चिपक गया और वो सत्यनारायण से सैम हो गए।
भारत में आईटी क्रांति
1974 में सैम पित्रोदा दुनिया की सबसे पहली डिजिटल कंपनियों में से एक विस्कॉम स्विचिंग में काम करने लगे।
1980 में रॉकवेल इंटरनेशनल ने इसे खऱीद लिया। सैम इस कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट बन गए और इसमें उनकी हिस्सेदारी भी हो गई।
उन्होंने इसे बेचने का फ़ैसला किया और मुआवज़े में उन्हें चालीस लाख डॉलर मिले। 1980 में वो दिल्ली आए।
इससे पहले वो पंद्रह साल की उम्र में एक कॉलेज टूर पर सिफऱ् दो दिन के लिए दिल्ली आए थे।
वो उस समय दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ ताज होटल में रुके हुए थे। वहाँ पहुंचते ही उन्होंने अपनी पत्नी अनु को टेलीफ़ोन करने की कोशिश की, लेकिन टेलीफ़ोन लगा ही नहीं।
अगले दिन सुबह जब उन्होंने अपने होटल की खिडक़ी से झाँका तो देखा कि नीचे सडक़ पर डेड फ़ोन की एक सांकेतिक शव यात्रा निकल रही है।
शव की जगह टूटे हुए, काम न करने वाले फ़ोन रखे हुए थे और लोग ज़ोर-ज़ोर से नारे लगा रहे थे। सैम ने उसी समय तय किया कि वो भारत की टेलीफ़ोन व्यवस्था को ठीक करेंगे।
26 अप्रैल, 1984 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सी-डॉट की शुरुआत की मंज़ूरी दी। सैम को एक रुपए वार्षिक वेतन पर सी-डॉट का प्रमुख बनाया गया।
सैम बताते हैं, ‘रूज़वेल्ट के समय में अमेरिका में लोगों ने देश को अपनी मुफ़्त सेवाएं दी थीं। हमारे जो दोस्त यहाँ थे रजनी कोठारी, आशीष नंदी, धीरू भाई सेठ उन सबने कहा कि अगर तुम्हें देश की सेवा करनी हो तो दिल लगा कर काम करो।’
वो कहते हैं, ‘मैंने सोचा कि ये समय भारत को देने का है, उससे लेने का नहीं। भारत ने मुझे बहुत कुछ दिया था। मैंने दस डॉलर में यहाँ से मास्टर्स किया फि़जि़क्स में। उस ज़माने में तनख़्वाह तो बहुत थी नहीं। दस हज़ार रुपए महीने तनख़्वाह ले कर मैं क्या करता?’
इससे पहले सैम ने इंदिरा गाँधी और उनके मंत्रिमंडल के सामने एक घंटे का प्रेज़ेंटेशन दिया।
सैम कहते हैं, ‘हमने बंगलौर में हार्डवेयर डिज़ाइन करना शुरू किया। सॉफ़्टवेयर के लिए हमें दिल्ली में जगह नहीं मिल रही थी। राजीव गांधी ने सलाह दी कि आप एशियाड विलेज जाइए। जगह तो अच्छी थी लेकिन वहाँ एयरकंडीशनिंग नहीं थी। दिल्ली की गर्मी में एयरकंडीशनिंग न हो तो सॉफ़्टवेयर का काम नहीं हो सकता था। अकबर होटल में जगह ख़ाली थी। हमने वहाँ दो फ़्लोर ले लिए।’
वो बताते हैं, ‘शुरू में फर्ऩीचर नहीं था। हमने छह महीने तक खटिया पर बैठ कर काम किया। हमने 400 युवा इंजीनियरों को भर्ती किया। उन्हें ट्रेन किया। पता चला कि इनमें कोई लडक़ी नहीं है। फिर लड़कियों को लाया गया उसमें।’
कुछ ही महीनों में भारत के हर गली कूचे में पीले रंग के एसटीडी या पीसीओ बूथ दिखाई देने लगे। इस पूरे अभियान में बीस लाख लोगों को रोजग़ार मिला, ख़ास तौर पर पिछड़े और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को।
फ़ोन भारतीय लोगों की सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बन गए। बूथ चलाने वाले लोगों ने वहाँ पर सिगरेट, टॉफिय़ाँ और यहाँ तक कि दूध भी बेचना शुरू कर दिया। टेलीफ़ोन अब विलासिता की चीज़ न रह कर रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़ बन गया।
सैम बताते हैं, ‘हमने पहले ग्रामीण एक्सचेंज बनाया। फिर बड़ा डिजिटल एक्सचेंज बनाया। फिर तो दूर संचार क्रांति शुरू हो गई क्योंकि लोग कुशल हो गए। वो बीज था जो हमने बोया। हर शख्स जिसने कभी सी-डॉट में काम किया, वो आज या तो कोई बड़ा मैनेजर है, प्रोफ़ेसर है या उद्यमी है। हमने एक दक्षता पैदा की और फिर मल्टीप्लायर प्रभाव शुरू हो गया।’
सॉफ़्टवेयर कंसल्टिंग को भारत में शुरू किया
इस बीच सैम को 'टेलीकॉम आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। उस दौरान मशहूर कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक के अध्यक्ष जैक वेल्च भारत आए। वो राजीव गांधी से मिलने वाले थे लेकिन वो किसी ज़रूरी काम में व्यस्त थे।
उन्होंने सैम को उनसे मिलने भेजा। सैम ने उन्हें नाश्ते पर आमंत्रित किया। वेल्च ने पहला सवाल किया, ‘हमारे लिए आपके पास क्या प्रस्ताव है?’
सैम ने कहा, ‘हम आपको सॉफ़्टवेयर बेचना चाहते हैं।’ वेल्च बोले, ‘लेकिन हम तो यहाँ सॉफ़्टवेयर खऱीदने नहीं आए हैं। हमारी मंशा तो आपको इंजन बेचने की है।’
सैम ने कहा कि हमारा आपसे इंजन खऱीदने का कोई इरादा नहीं है। वेल्च ने कहा कि हम इतनी दूर से जिस काम के लिए आए हैं, आप उस पर बात तक करने के लिए तैयार नहीं हैं। अब क्या किया जाए?
सैम ने कहा आइए नाश्ता करते हैं। लंबी चुप्पी के बाद वेल्च ने कहा, ‘बताइए आप सॉफ़्टवेयर के बारे में कुछ कह रहे थे।’ सैम ने 35 एमएम की स्लाइड पर अपना प्रेजेंटेशन शुरू किया।
वेल्च ने उसके एक-एक शब्द को ग़ौर से सुना और कहा, ‘आप हमसे क्या चाहते हैं?’
सैम का जवाब था, ‘एक करोड़ डॉलर का सॉफ़्टवेयर का ऑर्डर।’ वेल्च ने कहा, ‘मैं अपनी कंपनी के चोटी के ग्यारह लोगों को आपके पास भेजूँगा। आप उन्हें कनविंस करिए कि आपके प्रस्ताव में दम है।’
एक महीने बाद जीई के चोटी के अधिकारी दिल्ली पहुंचे। सैम ने उस समय नई-नई बनी कंपनी इंफ़ोसिस के साथ उनकी बैठक तय की। इंफ़ोसिस ने कहा कि उनका तो कोई दफ़्तर भी नहीं है।
सैम ने कहा आप जीई वालों को ये बात मत बताइए और उनसे किसी पांच सितारा होटल में मिलिए। वो बैठक हुई और जीई ने एक करोड़ डॉलर का सॉफ़्टवेयर का पहला ऑर्डर दिया और यहीं से भारत के सॉफ़्टवेयर कंसल्टिंग उद्योग की नींव रखी गई।
राजीव की मौत और अमेरिका वापसी
21, मई, 1991 को अचानक राजीव गाँधी की हत्या हो गई। इसके बाद सैम का भारत में मन नहीं लगा।
सैम याद करते हैं, ‘हमने सिफऱ् एक प्रधानमंत्री ही नहीं खोया, मैंने अपना सबसे प्यारा दोस्त खो दिया। ये एक इच्छा और एक सपने का अंत था। मैंने अपनी नागरिकता तक बदल दी थी। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए।’
‘मेरे सामने अंधेरा ही अंधेरा था और तभी मैंने पाया कि तब तक मेरे सारे पैसे ख़त्म हो गए थे। मैंने पिछले दस साल से कोई वेतन नहीं लिया था। मैंने सोचा कि अब समय आ गया है वापस अमेरिका जाने का।’
ये बात सुनने में थोड़ी अजीब सा लग सकती है कि सैम पित्रोदा ने काम करने की धुन में 1965 के बाद से कोई फिल्म नहीं देखी थी।
उनके नज़दीकी दोस्त और पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी बताते हैं, ‘सैम पित्रोदा न तो शॉपिंग करने जाते हैं, न ही किसी जन्मदिन पार्टी में जाते हैं और न ही कभी फि़ल्म देखने जाते हैं। एक बार वो मेरे घर पर रुके हुए थे। उनकी पत्नी अनु भी उनके साथ थीं। मैंने उनसे कहा, चलिए फि़ल्म देखी जाए। सैम ने कहा फि़ल्म और मेरा दूर-दूर का वास्ता नहीं है। लेकिन मैं उन्हें ज़बरदस्ती थ्री ईडियट्स फि़ल्म दिखाने ले गया।’
‘जब हम फि़ल्म देख कर बाहर निकले तो अनु ने कहा आप का बहुत-बहुत धन्यवाद। मैंने कहा धन्यवाद देने की क्या ज़रूरत है। अनु ने कहा कि चालीस साल की वैवाहिक जि़ंदगी में हमने पहली बार साथ में कोई फि़ल्म देखी है।’
सैम पित्रोदा बचपन से तबला बजाते हैं, चित्रकारी करते हैं और बेहतरीन संगीत सुनते हैं। गज़लें सुनना उन्हें बेहद पसंद है।
इकोनॉमिस्ट और वॉल स्ट्रीट जर्नल पढऩा उन्हें पसंद है। कुछ साल पहले वियना में उनके चित्रों की प्रदर्शनी लगी थी। संगीत सुनने का उन्हें बहुत शौक है ख़ासतौर से ड्राइव करते हुए।
बचपन में उन्होंने जो फि़ल्में देखीं थीं पचास के दशक में ‘बरसात’, ‘नागिन’, ‘कागज़़ के फूल’... ‘प्यासा’ और जब भी इन फि़ल्मों के गीत वो सुनते हैं, अपने आप को गुनगुनाने से नहीं रोक पाते। (bbc.com/hindi)
ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में एक हाई स्कूल के लड़कों ने जो किया, उससे पूरा देश शर्मसार महसूस कर रहा है. विक्टोरिया राज्य की मुख्यमंत्री ने इस घटना को घिनौना और अपमानजनक बताया है.
डॉयचे वैले पर विवेक कुमार का लिखा-
ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में एक निजी हाई स्कूल के कुछ लडक़ों को इसलिए स्कूल से निलंबित कर दिया गया क्योंकि वे अपने साथ पढ़ रही लड़कियों की ‘स्प्रैडशीट पर रैंकिंग’ कर रहे थे। विक्टोरिया राज्य की मुख्यमंत्री ने इस कृत्य को ‘अपमानजनक और घृणित’ बताते हुए कहा है कि इससे उन्हें बहुत आघात लगा है।
मेलबर्न के रिंगवुड कस्बे में यारा वैली ग्रामर स्कूल के तीन छात्रों को स्कूल से निलंबित कर दिया गया है। उन्होंने एक स्प्रैडशीट बना रखी थी जिसमें साथ पढऩे वाली लड़कियों की तस्वीरें लगाकर सामने टिप्पणियां की गई थीं।
मीडिया में आई खबरों के मुताबिक उन्होंने लड़कियों पर बेहद अभद्र टिप्पणियां लिखी थीं। ये टिप्णियां उनकी रैंकिंग के हिसाब से की गई थीं, जैसे ‘पत्नी बनाने लायक’, ‘प्यारी’, ‘ठीकठाक’, ‘चीज’, ‘दफा करो’, ‘रेप लायक भी नहीं।’
‘घिनौना कृत्य’
स्कूल के प्रिंसिपल मार्क मेरी ने कहा कि इस डॉक्युमेंट के स्क्रीनशॉट इंटरनेट पर शेयर किए गए थे और स्कूल के स्टाफ ने उन्हें देखा, जिसके बाद कार्रवाई की गई। उन्होंने कहा कि जिस तरह की टिप्पणियां की गई हैं उनसे वह ‘बेहद गुस्से और सदमे में हैं।‘
एबीसी न्यूज से बातचीत में मार्क मेरी ने कहा, ‘जब मुझे इसके बारे में बताया गया, तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि कोई भी, एक तो लड़कियों को इस तरह ऑब्जेक्टिफाई कर सकता है, वो भी अपने साथ पढऩे वाली लड़कियों को। और दूसरा कि कोई इतना क्रूर हो सकता है।’ उन्होंने कहा कि वह घटना की कडिय़ों को जोडऩे की कोशिश कर रहे हैं।
विक्टोरिया की मुख्यमंत्री जसिंटा ऐलन ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जब देश में महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा के बारे में इतनी बहस हो रही है, तब ऐसा होना बेहद शर्मनाक है। ऐलन ने कहा, ‘रिंगवुड के स्कूल में व्यवहार के बारे में जो खबरें आई हैं, वे शर्मनाक, घिनौनी और किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हैं।’
उन्होंने कहा कि जिन लड़कियों को उस डॉक्युमेंट में निशाना बनाया गया है, उससे उन्हें ‘बहुत बड़ा आघात‘ पहुंचा है। उन्होंने कहा, ‘यह सोचना कि आप जिस क्लास में बैठी हैं, वहां आपके सहपाठी आपके बारे में ना सिर्फ ऐसा सोचते हैं बल्कि उसे लिखकर दूसरों के साथ बांटते हैं। यह कोई मजाक नहीं है। महिलाओं का सम्मान हर क्लास, हर घर और हमारे समाज के हर हिस्से की प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि बहुत बड़ी संख्या में महिलाएं हिंसा का शिकार हो रही हैं, बहुत बड़ी संख्या में महिलाएं अपनी जान गंवा रही हैं।’
महिलाओं के खिलाफ हिंसा का संकट
इसी महीने ऑस्ट्रेलिया के बड़े शहरों में हजारों लोगों ने महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा के खिलाफ प्रदर्शन किया था। इसके बाद देश के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीजी ने कहा था यह ‘राष्ट्रीय संकट’ बन चुका है।
2.7 करोड़ की आबादी वाले ऑस्ट्रेलिया में इस साल यानी चार महीनों में 28 महिलाओं की हत्याएं हो चुकी हैं और यह सिलसिला साल दर साल बढ़ता चला जा रहा है।
ऑस्ट्रेलिया में महिलाओं के खिलाफ उनके जीवनसाथी द्वारा हिंसा के मामले पिछले कई साल से चिंता का विषय बने हुए हैं। सालाना औसत बताती है कि हर 11 दिन में एक महिला की हत्या हो जाती है। लेकिन हत्या के अलावा भी हिंसा का संकट बहुत बड़ा हो चुका है।
देश के सांख्यिकी ब्यूरो (ऑस्ट्रेलियन ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स) के आंकड़ों के मुताबिक 2013 से 2023 के बीच पुरुषों द्वारा हत्या के मामलों में तो 16 फीसदी की कमी देखी गई लेकिन घायल करने की दर 20 फीसदी बढ़ गई। इसी तरह यौन हिंसा के मामलों में 50 फीसदी की वृद्धि हुई। शोषण और अपहरण के मामले 18 फीसदी बढ़े।
इस माहौल में मेलबर्न के स्कूल की घटना को बहुत से विशेषज्ञ एक सामाजिक समस्या के रूप में देख रहे हैं। देश के शिक्षा मंत्री जेसन क्लेयर ने कहा, ‘यह घटना दिखाती है कि अभी बहुत सा काम करना बाकी है। यह काम सिर्फ स्कूलों का नहीं है बल्कि माता-पिता और मेरे जैसे राजनेताओं का भी है।’ (dw.com/hi)
-शैलेन्द्र शुक्ल
जिस संसदीय क्षेत्र में जितने अधिक मतदाता थे उसमें प्रतिशत उतना ही कम दिखाई पड़ रहा है।अपने आस पास के लोगों से पूछें बात करें तो मालूम होगा की 90 प्रतिशत से अधिक लोगों ने जो कल यहाँ उपस्थित थे, मतदान किया है। इसका सीधा मतलब है कि मतदाता सूची में लाखों ऐसे नाम जुड़े हैं जो उस क्षेत्र में निवास ही नहीं करते, कारण:-
वर्षों पूर्व अपना घर कहीं और बदल लिया है
किसी दूसरे गाँव या शहर में चले गए हैं
लड़कियाँ विवाह कर किसी दूसरे स्थान पर जा चुकी हैं
लडक़े पढ़ाई के लिए या नौकरी करने के लिए किसी अन्य स्थानों में जा चुके हैं।
-पिछली बार जब भी मतदाता सूची को अपडेट करने का सर्वे हुआ होगा उसके बाद से हर संसदीय क्षेत्र में न जाने कितने हज़ार या लाख लोग ब्रह्मलीन हो चुके हैं।
मैंने जिस मतदान केंद्र में मतदान किया वहाँ की सूची में शाम को 5 बजे जांच करने पर पाया कि उस मतदान केंद्र को कवर करने वाले क्षेत्र में बमुश्किल 5 प्रतिशत ऐसे लोग जो निवास रत हैं, किन्हीं कारणों से वोट डालने से वंचित रह गए अर्थात लगभग 95 प्रतिशत लोगों ने वोट डाल दिया तो मतदान प्रतिशत 95 प्रतिशत दर्ज होना था, किन्तु दर्ज हुआ 67 प्रतिशत इसका मतलब है सूची में दर्ज लगभग 20-25 प्रतिशत लोग अब इस क्षेत्र में निवासरत ही नहीं है। सबसे अच्छा उदाहरण तो मेरे निवास परिसर का है जिसमें मतदान के लिए कुल 11 पर्ची आई थीं जिसमें से केवल चार लोगों ने मतदान दिया क्योंकि शेष सात लोग वर्षों पूर्व अन्यंत्र चले गए हैं। विधानसभा के समय मैंने फ़ोन पर उनसे संपर्क किया था तो उन्होने बताया था कि उनके नाम अब उनके वर्तमान में निवासरत क्षेत्र की मतदाता सूची में जुड़ गए हैं किन्तु यह सही है कि रायपुर ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र की सूची से अभी हटे नहीं है। इसका सीधा अर्थ है कि मतदान का जो प्रतिशत दर्शाया जा रहा है वह भ्रामक है।
अब अगले चुनाव के लिए 4-5 साल का समय है। उसके पूर्व सही सर्वे कर वास्तविक मतदाता सूची बन जाना चाहिए। कुछ दिनों पूर्व ही एक ख़बर छपी थी कि हैदराबाद में फर्जी मतदाता सूची की शिकायत होने पर जब जाँच की गई तो पाया गया कि लगभग छह लाख वोटर ऐसे दर्ज है जो उस संसदीय क्षेत्र में निवास ही नहीं करते। वोटिंग प्रतिशत के आंकड़े देखकर मीडिया अनुमान लगाता है कि मतदाताओं की चुनाव में रुचि नहीं है जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है। प्रमाण चाहिए तो आप जितने लोगों से जुड़े हैं उनसे फोन पर संपर्क कर पूछ ले, निश्चित थी 90-95 प्रतिशत लोगों का जवाब होगा कि उन्होंने वोट दिया है। वोट न देने वालों में अधिकांश किन्हीं कारणों से मजबूर होंगे, जैसे बीमार होना, जरूरी कार्य से किसी दूसरे शहर चले जाना, या पूर्व नियोजित कार्यक्रम अनुसार किसी अन्य कार्य में अन्यत्र स्थान में रहना आदि।
जिनकी चुनाव में ड्यूटी लगती है उनके वोट डालने की व्यवस्था समुचित नहीं है। कितना ही आसान हो जाता यदि वे जहाँ जिस बूथ में ड्यूटी कर रहे हैं वहीं उन्हें उनके परिचय पत्र व मतदाता सूची क्रमांक देखकर वोट देने की सुविधा हो जाती? अभी तो यदि उनके प्रतिशत पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि वो बामुश्किल 25-30 प्रतिशत है। निर्वाचन आयोग चाहे तो इन आंकड़ों में अप्रत्याशित सुधार ला सकता है।
(पूर्व अध्यक्ष, सीएसईबी)
-दीपक मंडल
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने मंगलवार देर रात अपने भतीजे और पार्टी के नेशनल को-ऑर्डिनेटर आकाश आनंद को उनके पद से हटाने का ऐलान किया।
मायावती ने ‘पूर्ण परिपक्वता’ हासिल करने तक उन्हें अपने उत्तराधिकारी की जिम्मेदारियों से भी मुक्त कर दिया है। देश में लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण की वोटिंग ख़त्म होने के चंद घंटे बाद ही मायावती के इस ऐलान ने पार्टी कार्यकर्ताओं, राजनीतिक दलों और विश्लेषकों को हैरत में डाल दिया है।
मायावती ने मंगलवार को देर रात अपने ट्वीट में लिखा, ‘विदित है कि बीएसपी एक पार्टी के साथ ही बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर के आत्म-सम्मान व स्वाभिमान तथा सामाजिक परिवर्तन का भी मूवमेन्ट है जिसके लिए मान्य। श्री कांशीराम जी व मैंने ख़ुद भी अपनी पूरी जि़न्दगी समर्पित की है और इसे गति देने के लिए नई पीढ़ी को भी तैयार किया जा रहा है।’’
उन्होंने लिखा, ‘इसी क्रम में पार्टी में, अन्य लोगों को आगे बढ़ाने के साथ ही, श्री आकाश आनंद को नेशनल कोऑर्डिनेटर व अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, किन्तु पार्टी व मूवमेन्ट के व्यापक हित में पूर्ण परिपक्वता (maturity) आने तक अभी उन्हें इन दोनों अहम जिम्मेदारियों से अलग किया जा रहा है। जबकि इनके पिता श्री आनन्द कुमार पार्टी व मूवमेन्ट में अपनी जि़म्मेदारी पहले की तरह ही निभाते रहेंगे।’
सवाल ये है कि मायावती ने ऐसे वक्त पर ये कदम क्यों उठाया, जब लोकसभा चुनाव के चार चरण बाकी हैं। वो भी पार्टी के स्टार प्रचार आकाश आनंद के ख़िलाफ़ जिन्होंने पिछले कुछ समय से अपनी रैलियों से बीएसपी को मतदाताओं के बीच काफ़ी चर्चा में ला दिया था।
क्या आकाश आनंद राजनीतिक रूप से मैच्योर नहीं हैं?
मायावती ने लिखा है कि पूर्ण परिपक्वता होने तक आकाश आनंद को दोनों अहम जिम्मेदारियों (नेशनल को-ऑर्डिनेटर और उत्तराधिकारी) से अलग किया जा रहा है। तो सवाल ये है कि क्या वो आकाश आनंद को राजनीतिक तौर पर पूरी तरह परिपक्व नहीं मानती हैं।
अगर वो पूर्ण परिपक्व नहीं हैं तो मायावती ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी और पार्टी का नेशनल को-ऑर्डिनेटर बनाकर गलती की थी और क्या अब उन्होंने उन्हें हटाकर अपनी गलती सुधारी है?
आकाश आनंद अपनी पिछली कुछ चुनावी रैलियों में बेहद आक्रामक अंदाज में दिखे हैं।
इन रैलियों में आक्रामक भाषणों की वजह से उनके खिलाफ चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में दो केस दर्ज किए गए थे।
28 अप्रैल को उत्तर प्रदेश में सीतापुर की रैली में उन्होंने योगी आदित्यनाथ की सरकार की ‘तालिबान से तुलना’ करते हुए उसे ‘आतंकवादियों’ की सरकार कहा था। इसके अलावा उन्होंने लोगों से कहा था कि वो ऐसी सरकार को जूतों से जवाब दे।
इस आक्रामक भाषण पर हुए मुकदमे के बाद ही आकाश आनंद ने 1 मई को ओरैया और हमीरपुर की अपनी रैलियां रद्द कर दी थीं।
पार्टी की ओर से ये कहा गया है कि परिवार के एक सदस्य के बीमार पडऩे की वजह से ये रैलियां रद्द की गई हैं।
क्या बीजेपी को नाराज नहीं करना चाहती हैं मायावती?
लेकिन राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि मायावती आकाश आनंद की ओर से इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों से खुश नहीं हैं। इस आक्रामक शैली से उन्हें चुनाव में अपनी पार्टी का फायदा होने से ज़्यादा नुकसान की आशंका सताने लगी थी।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सुनीता एरोन ने मायावती के इस फैसले पर बीबीसी से बात करते हुए कहा, ‘मायावती आकाश आनंद को लेकर ओवर प्रॉटेक्टिव हैं। वो नहीं चाहतीं कि इस समय वो कोई मुश्किल में फंसें। और इससे भी बड़ी बात ये है कि वो इस समय बीजेपी से अपना संबंध नहीं बिगाडऩा चाहतीं।’
सुनीता एरोन कहती हैं, ‘मायावती का ये कहना ठीक है कि आकाश आनंद अभी परिपक्व नहीं हैं। दरअसल आकाश आनंद ने चुनावों के बीच ये कहना शुरू कर दिया था कि उनकी पार्टी चुनाव के बाद किसी से भी गठबंधन कर सकती है। मेरे ख्याल से उन्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए था।’
वो कहती हैं, ‘ये ठीक है कि बीएसपी के संस्थापक कांशीराम भी कहते थे कि अपने लोगों के हित में वो किसी के साथ भी जा सकते हैं। लेकिन वो एक सैद्धांतिक बात थी। लेकिन आकाश आनंद ने इसे इस तरह कहा जैसे पार्टी की कोई विचारधारा ही नहीं है।’
आकाश आनंद के आक्रामक भाषणों से किसे हो रहा था घाटा?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मायावती और उनकी पार्टी के लिए ये लोकसभा चुनाव ‘करो या मरो’ का चुनाव है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी यूपी में समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर लड़ी थी।
पार्टी ने दस सीटें जीती थीं लेकिन इसे सिर्फ 3.67 फीसदी वोट मिले थे। वहीं 2009 के चुनाव में इसने 21 सीटें जीती थीं। जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में यूपी में वो सिर्फ एक सीट जीत पाई।
चुनाव में इस निराशाजनक प्रदर्शन के बाद बीएसपी ने बीजेपी के खिलाफ अपने सुर नरम कर लिए थे।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता कहते हैं कि मायावती के बीजेपी से गठबंधन के कयास लगाए जाते रहे हैं। पिछले कुछ अर्से से बीएसपी बीजेपी के प्रति कम आक्रामक दिखी है।
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘‘इस चुनाव प्रचार के दौरान आकाश आनंद जिस तरह से आक्रामक शैली में भाषण दे रहे थे उससे उन्हें समाजवादी पार्टी को फायदा होता दिख रहा था। शायद यही वजह है कि मायावती ने आकाश आनंद को नेशनल को-ऑर्डिनेटर के पद से हटाकर हालात संभालने की कोशिश की है।’’
पिछले दिनों बीबीसी से बातचीत में आकाश आनंद ने इन आरोपों से इंकार किया था कि बीएसपी बीजेपी की ‘बी’ टीम है।
लेकिन चुनाव के बाद बीजेपी के साथ जाने की संभावना से जुड़े सवाल पर उन्होंने ये भी कहा था कि बीएसपी का मकसद राजनीतिक सत्ता में आना है, इसके लिए पार्टी जो सही होगा करेगी।
क्या पार्टी के चुनावी नतीजों पर पड़ेगा असर?
आकाश आनंद की चुनावी रैलियों ने पिछले दिनों खासी हलचल पैदा की है।
बीएसपी पर नजर रखने वालों का कहना है कि उनकी रैलियों ने कम से कम यूपी में बीएसपी समर्थकों में एक नया जोश पैदा किया था। ऐसे में उन्हें नेशनल को-ऑर्डिनेटर के पद से हटाए जाने पर पार्टी के युवा मतदाता निराश महसूस करेंगे।
शरद गुप्ता कहते हैं कि चुनाव के वक्त ऐसे फैसलों से मतदाताओं में ये संदेश जा सकता है कि बीएसपी में अपनी रणनीति को लेकर असमंजस की स्थिति है और वो पार्टी से दूर जा सकते हैं।
दूसरी ओर कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मायावती बेहद सधी हुई राजनेता हैं।
ऐसे समय में जब बीएसपी का जनाधार कम होता दिख रहा है तो वो बीजेपी के खिलाफ आक्रामक रुख अपना कर अपनी पार्टी को संकट में नहीं डालनी चाहतीं।
सुनीता एरोन कहती हैं कि हो सकता है कि मायावती का ये फैसला फौरी हो, मामला ठंडा होने पर वो आकाश आनंद को दोबारा उनके पद पर ला सकती हैं।
क्यों बनाया था आकाश आनंद को उत्तराधिकारी?
आकाश आनंद मायावती के सबसे छोटे भाई आनंद कुमार के बेटे हैं।
वो 2017 में लंदन से पढ़ाई करने के आने के बाद ही बीएसपी के कामकाज से जुड़े थे। मई 2017 में सहारनपुर में ठाकुरों और दलितों के बीच संघर्ष के समय वो मायावती के साथ वहां गए थे।
आकाश 2019 से पार्टी के नेशनल को-ऑर्डिनेटर के तौर पर काम कर रहे थे। लेकिन मायावती ने उन्हें 2023 में पार्टी का नेशनल को-ऑर्डिनेटर और अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मायावती ने उन्हें ये सोच कर जिम्मेदारी दी कि युवा आकाश पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं और नई पीढ़ी के दलित नेतृत्व को उत्साहित कर सकेंगे।
मायावती ने उन्हें ये जिम्मेदारी ऐसे समय में सौंपी जब पार्टी का राजनीतिक ग्राफ नीचे जाता दिख रहा था।
दूसरी ओर वो दलित युवा में तेज़ी से लोकप्रिय हो रहे चंद्रशेखर आजाद के प्रभाव से भी चिंतित लग रही थीं। आकाश आनंद ने हाल के अपने कुछ इंटरव्यू में आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद पर जम कर वार किए।
इस लोकसभा चुनाव में उन्होंंने अपनी रैलियों की शुरुआत भी यूपी की नगीना सीट से की थी, जहां आजाद के खिलाफ बहुजन समाज पार्टी ने अपना उम्मीदवार उतारा है। (bbc.com/hindi)
सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार के उस नियम पर नाराजगी जाहिर की है जिसमें सैनिटरी कचरे के निपटान के लिए अतिरिक्त शुल्क लिया जाता है.
डॉयचेवैले पर आमिर अंसारी का लिखा-
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केरल सरकार के उस नियम पर नाराजगी जाहिर की है जिसमें सैनिटरी कचरे के निपटान के लिए अतिरिक्त शुल्क वसूला जाता है। कोर्ट ने अफसोस जताया है कि राज्य का रुख मासिक धर्म स्वच्छता और सैनिटरी उत्पादों तक पहुंच के लिए अदालत की लगातार वकालत के विपरीत है।
केरल सरकार द्वारा सैनिटरी पैड्स और डायपर के निपटान के लिए लगाए गए अतिरिक्त शुल्क के नियम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है।
इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा, ‘एक तरफ, हम स्कूलों और अन्य संस्थानों में सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराकर मासिक धर्म स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए निर्देश जारी कर रहे हैं और दूसरी तरफ राज्य सैनिटरी कचरे के निपटान के लिए शुल्क ले रहे हैं। यह कैसे हो सकता है? आप इस पर जवाब दें।’
अदालत ने यह टिप्पणी इंदु वर्मा द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर की। याचिकाकर्ता ने केरल सरकार के उस नियम पर रोक लगाने की मांग की है, जो इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड्स और डायपर के निपटान के लिए लोगों से अतिरिक्त शुल्क वसूलने की अनुमति देता है।
सैनिटरी पैड्स उठाने के लिए शुल्क
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत और केवी विश्वनाथन की बेंच के सामने याचिकाकर्ता ने कहा, ‘जब सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट नियमों में ऐसा कोई प्रावधान मौजूद नहीं है, तो राज्य सैनिटरी कचरे को उठाने पर शहरवासियों से अतिरिक्त शुल्क कैसे ले सकता है? संबंधित विभाग द्वारा सौंपी गई एजेंसियों द्वारा लोगों को सैनिटरी नैपकिन, शिशु और वयस्क के डायपर के संग्रह के लिए अतिरिक्त भुगतान करने के लिए कहा गया है।’
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुनवाई के दौरान मासिक धर्म स्वच्छता प्रथाओं और आवश्यक स्वच्छता सुविधाओं तक पहुंच पर सैनिटरी कचरे के निपटान के लिए अतिरिक्त शुल्क के संभावित प्रभाव के बारे में चिंता जताई।
कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा, ‘आपको सैनिटरी कचरे के लिए अतिरिक्त शुल्क क्यों लेना चाहिए? यह मासिक धर्म स्वच्छता के संबंध में हमारे निर्देशों के उद्देश्य के विपरीत होगा। आपको इसे उचित ठहराना होगा।’
फ्री सैनिटरी पैड देने पर जोर
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को छठी कक्षा से लेकर 12वीं तक हर छात्रा को मुफ्त सैनिटरी पैड और सभी रेसिडेंशियल और नॉन रेसिडेंशियल शिक्षण संस्थानों में लड़कियों के लिए अलग शौचालयों का प्रावधान सुनश्चित करने का निर्देश जारी किया था। इसके अलावा कोर्ट ने मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन पर राष्ट्रीय दिशानिर्देशों पर जोर दिया था। पिछले साल नवंबर में कोर्ट ने केंद्र सरकार को शैक्षणिक संस्थानों में कम लागत वाले सैनिटरी पैड्स, वेंडिंग मशीनों की उपलब्धता और उनके सुरक्षित निपटान पर नीति को अंतिम रूप देने का भी निर्देश दिया था।
माहवारी की जानकारी कम
बाल सुरक्षा के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूनिसेफ के 2022 के एक अध्ययन के मुताबिक भारत में 71 फीसदी किशोरियों को माहवारी के बारे में जानकारी नहीं है। उन्हें पहली बार माहवारी होने पर इसका पता चलता है। और ऐसा होते ही उन्हें स्कूल भेजना बंद कर दिया जाता है।
एक सामाजिक संस्था दसरा ने 2019 में एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें बताया गया था कि 2।3 करोड़ लड़कियां हर साल स्कूल छोड़ देती हैं क्योंकि माहवारी के दौरान स्वच्छता के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इनमें सैनिटरी पैड्स की उपलब्धता और पीरियड्स के बारे में समुचित जानकारी शामिल है।
केरल के अतिरिक्त शुल्क वाले नियम पर सुप्रीम कोर्ट में इसी महीने आगे की सुनवाई होने की संभावना है। (dw.com/hi)
-नासिरुद्दीन
चूंकि स्त्री पत्नी है इसलिए उसके साथ किसी भी तरह से बनाया गया यौन रिश्ता ग़लत नहीं हो सकता है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का हालिया एक फ़ैसला तो कुछ ऐसा ही मानता है।
दरअसल, एक महिला ने अपने पति पर जबरिया ‘अप्राकृतिक’ यौन संबंध बनाने का आरोप लगाया था।
महिला ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत कार्रवाई की मांग की। कोर्ट के मुताबिक, पत्नी के साथ ‘अप्राकृतिक’ यौन संबंध अपराध नहीं माना जा सकता और मुकदमा ख़ारिज कर दिया।
यही नहीं मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोर्ट ने यह भी कहा कि यह बलात्कार की श्रेणी में भी नहीं आता है क्योंकि क़ानून 15 साल से ज्य़ादा उम्र की पत्नी के साथ कैसे भी बनाये गये और किसी भी तरह बनाये गये यौन रिश्ते को बलात्कार नहीं मानता।
अदालत ने ऐसा फ़ैसला कैसे दिया?
कोर्ट जब ऐसे फ़ैसले देती है तो लगता है क्या वाक़ई क़ानून की आंख पर पट्टी ही बंधी होती है या वह लकीर का फक़ीर होती है?
कोर्ट ऐसा कैसे कह सकती है कि पत्नी के साथ किसी भी तरह से किसी भी तरह का बनाया गया यौन संबंध ठीक है या वह अपराध की श्रेणी में नहीं लाया जा सकता है? या ज़बरदस्ती के लिए पति पर मुक़दमा नहीं किया जा सकता है? मगर कोर्ट ने ऐसा ही कहा।
कोर्ट जब सुनवाई करती है या फ़ैसले देती है तो यह यांत्रिक प्रक्रिया नहीं होती। कोर्ट क़ानून को विस्तार भी देती है और कई बार वह नई व्याख्या भी देती है। उसे समय के साथ अपनी व्याख्या में बदलाव की भी ज़रूरत होती है। तब ही वह राह दिखाने वाली मानी जाती है। इसीलिए सोचने वाली बात है, आज के वक़्त में ऐसे फ़ैसले कैसे दिये जा सकते हैं?
यही तो पितृसत्ता है न!
हमारा समाज पितृसत्तात्मक है। यानी उसकी धुरी पितृसत्ता है। मर्दों की भलाई सोचने वाली सत्ता। यह विचार है। इसकी जड़ें भी काफ़ी गहरी हैं। इसकी शाखें कहां तक फैली हैं, इसका अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल है।
पितृसत्ता को बनाए रखने में समाज में स्थापित संस्थाओं का भी बड़ा योगदान होता है। अदालतें भी ऐसी ही संस्था हैं। इसलिए पितृसत्ता का असर गाहे-बगाहे वहां भी दिख जाता है। यहां से विचार बनते हैं। फ़ैसले के रूप में आने वाले विचारों पर पितृसत्ता का असर दिखता है।
वह कई बार मर्द के पक्ष में खड़ी दिखती हैं। इस फैसले पर भी इसका असर साफ़ देखा जा सकता है। कोर्ट यही मान रही है न कि पति, पत्नी का स्वामी है। स्वामी यानी मालिक। यानी स्त्री जो पत्नी है, उस पर मर्द पति का कब्ज़ा है। पत्नी स्त्री के तन-मन सब पर पति पुरुष का अधिकार है।
इसलिए वह उसके साथ जैसे और जब चाहे यौन सम्बंध बना सकता है। तो फिर सबसे बड़ा सवाल है, स्त्री का आज़ाद वजूद है या नहीं? आज़ाद वजूद यानी स्वतंत्र अस्तित्व। स्त्री के साथ उसके पति ने जो किया, यह फ़ैसला उसके जवाब नहीं देता बल्कि कई सवाल खड़े करता है।
स्त्री का स्वतंत्र अस्तित्व है या नहीं?
ऐसे फ़ैसले स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व और व्यक्तित्व को नकारते हैं। स्त्री सबसे पहले इंसान है। बतौर इंसान वह आज़ाद है। उसका आज़ाद वजूद है। महज़ शादीशुदा होने से उसका वजूद ख़त्म नहीं हो जाता। न ही उसके वजूद का मालिक कोई और हो जाता है।
हालांकि, हमारा समाज इसके उलट ही मानता है। यह विचार उस पर हावी है कि विवाहित स्त्री का वजूद उसके पति से है। पति से अलग उसका अस्तित्व नहीं है। यानी पति कहे- उठ तो उसे उठना है और वह कहे- बैठ तो उसे बैठना है। यानी वह स्त्री न हो कोई मुंह बंद गुडिय़ा हो।
ऐसी गुडिय़ा जिसकी चाबी किसी और के हाथ में है। उसके शरीर से उसका पति जैसे चाहे, वैसे खेल सकता है। उसके लिए सब जायज़ है। बल्कि वह तो उसका हक़दार है। ऐसे ही विचार की मान्यता किसी मर्द को इस बात की शह दे देती हैं कि वह जैसा चाहे, वैसा अपनी पत्नी के साथ कर सकता है। यह विचार उसे बेख़ौफ़ और बेअंदाज़ बनाते हैं।
हिंसा से घिरी जि़ंदगी
ऐसा नहीं है कि ये बातें हवा में हो रही हैं।
पति नाम का मर्द क्या करता है, इसकी झलक, एक आंकड़े में भी देखी जा सकती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस-5) बताता है कि शादीशुदा महिलाओं का लगभग एक तिहाई (29।3 फ़ीसदी) किसी न किसी रूप में पति की हिंसा झेलती है।
यह हिंसा शारीरिक और यौनिक दोनों तरह की होती है। हम जिस सामाजिक माहौल में रहते हैं, उसमें किसी स्त्री का अपने पति की हिंसा को स्वीकार करना आसान नहीं है। यौन हिंसा को स्वीकार करना और बताना तो और भी मुश्किल है।
इसलिए एक तिहाई का यह आंकड़ा और ज़्यादा ही होगा। यही नहीं, पति की यौन हिंसा किस तरह की होगी, उसका सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
अगर महिला पत्नी न हो तब
दिलचस्प है कि पत्नी के साथ जो हिंसा, अपराध नहीं है, वही कर्म किसी अन्य महिला के साथ कोई मर्द करे तो वह गंभीर जुर्म होगा। क़ानून भी उसे जुर्म मानेगा। उसके लिए कड़ी से कड़ी सज़ा तय करेगा।
मगर देखिए यह कैसी निराली बात है। यौन हिंसा करने के बाद भी पति-पत्नी के रिश्ते में यह छूट पति के हिस्से में आ गई। पति को पत्नी के शरीर का हाकिम मान लिया गया। जबरन बनाया गया यौन संबंध बलात्कार माना जाता है। फिर स्त्री पत्नी हो या कोई और महिला, वह बलात्कार ही माना जाना चाहिए। मगर क़ानून की नजऱ में ऐसा नहीं है।
अदालत भी यही मान रही है। वह कोई नई व्याख्या देने को तैयार नहीं है। सवाल है, पतियों को ज़बरदस्ती के अपराध से क्यों मुक्त रखना चाहिए? हत्या के अपराध के मामले में तो ऐसी छूट नहीं है? यह छूट पति को सिफऱ् इसलिए मिली हुई है कि यह समाज मर्दाना है। वह स्त्री को अपने मातहत मानता है। स्त्री के अस्तित्व को नकारता है। यह गाँठ बाँधने की ज़रूरत है कि पत्नी, पति की जायदाद नहीं है।
रज़ामंदी का कोई मतलब है या नहीं?
रज़ामंदी भी कोई चीज़ है। अगर रिश्ते को लोकतांत्रिक होना है, तो उसे रज़ामंदी के सिद्धांत पर चलना होगा। यानी ‘न’ को ‘न’ समझना होगा। ‘न’ को ‘न’ मानना होगा। ‘न’ की इज्ज़़त करनी होगी। यह सब तब ही मुमकिन है, जब रज़ामंदी, रिश्ते की बुनियादी शर्तों में एक हो।
किसी भी तरह का, किसी भी तरह से, कभी भी बनाया गया यौन संबंध रज़ामंदी की बुनियाद को हिला देता है। यह स्त्री के लोकतांत्रिक अधिकार का हनन है। यह लोकतांत्रिक रिश्ते के ख़िलाफ़ है। 21वीं सदी में बेहतर सहजीवन के लिए रिश्ते का लोकतांत्रिक होना निहायत ज़रूरी है।
इस पैमाने पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का फ़ैसला खरा नहीं उतरता है। यह फ़ैसला स्त्री की गरिमा के ख़िलाफ़ है। मानवाधिकार के पैमाने पर भी खरा नहीं है। शादीशुदा जि़ंदगी में बलात्कार होता है, इस बात को न मानने का कोई आधार नहीं है।
यह केस ही इस बात की तस्दीक करता है। शादी की पवित्रता के नाम पर हम कब तक इस ‘बलात्कार’से मुँह चुराते रहेंगे? यह ‘बलात्कार’ होता रहेगा तो शादी पवित्र कहाँ रहेगी?
एस.के.
तहमीना दुर्रानी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रख्यात, लेकिन पाकिस्तान में विवादित लेखिका के रूप में जाना जाता है, क्योंकि धर्म की आड़ में पीर फकीरों द्वारा जिन औरतों का शारीरिक और मानसिक शोषण होता रहा है, उसी पर उन्होंने लिखने की हिम्मत की थी। उनकी एक पुस्तक ‘माय फ्यूडल लॉर्ड’ ने पाकिस्तान की पितृसत्तात्मक समाज की जड़ें हिलाकर रख दी थी।
अब बात करते है अपने मुल्क की...हमारे यहां भी हर मंदिर, मस्जिद और आश्रम निष्पाप रहे यह ज़रूरी नहीं। यहां भी बड़े बड़े नाम है... राम रहीम, आसाराम... वगैरा-वगैरा, जिनके बारे में जान कर ये पता चलता है कि धर्म की आड़ में औरतों और बच्चों को किस तरह इस्तेमाल किया जाता हैं! अभी-अभी एक खबर आई कि उज्जैन के एक आश्रम में 19 बच्चों के साथ आचार्य और सेवादार मिलकर यौन शौषण करते रहे। पुलिस ने आचार्य को पकड़ लिया परंतु सेवादार फिलहाल फरार है।
इससे पहले कि लोग कहने लगे कि लोगों को सिर्फ हमें बदनाम करने में मजा आता है, तो मैं कह दूं कि बिहार के सहरसा में एक मस्जिद के मौलाना को तेरह साल की एक लडक़ी का यौन शौषण करने के आरोप में पुलिस ने पकड़ा था। तो कहने का ये मतलब है कि पीर-फकीर हो साधु हो, या फिर कोई राजनेता हो..., सिर्फ ये सोच कर खामोश रहना कि ये हमारा अपना है... पूरे समाज को ही जर्जर कर देगा। और किसी घटना को सिफऱ् ये सोच कर उछालना कि वह हमारे धर्म से नहीं , उनके धर्म से है या फिर हमारी पार्टी से नहीं, विपक्षी पार्टी से है....ये बात भी समाज को जर्जर ही करेगा।
धर्म और राजनीति के आड़ में शायद सब से अधिक यौन शौषण होता है। अखबारों में छपी खबरों से ये भी पता लगता है कि ईसाई धर्म में कैथोलिक चर्चों में भी यौन शौषण की लगातार खबरें आती रहती हैं। लेकिन कैथोलिक समूह का कहना है कि प्रोटेस्टेंट समूह जान बूझकर उनके बारे में बदनामी फैलाते हैं। डेरा सच्चा सौदा के नाम से जो कुछ भी हुआ है, उससे भी धर्म ही बदनाम हुआ है। अब धर्म को कुछ देर के लिए भूल कर हम आते हैं राजनीति पर। मणिपुर की गंदी राजनीति की बलि चढ़ी दो कुकी महिलाओं को तो अब हम भूल ही चुके हैं, जिनका 1000 सामाजिक दरिंदों द्वारा बुरी तरह यौन शौषण किया गया था, और वह सब हुआ था पुलिस की मदद से। कितनों ने प्रतिवाद किया और कितनों ने आवाज उठाई? अखबार, मीडिया, राजनैतिक पार्टियां...क्या किसी को सच में अफसोस था ? या सभी अपनी अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने में लगे हुए थे?
इस समय पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा का कुनबा भी यौन शौषण के मामले में घिरा हुआ है। बेटा एचडी रेवन्ना के साथ साथ पोता प्रज्वल रेवन्ना दोनों सेक्स स्केंडल में फंसे हैं। घटिया से घटिया वीडियो सामने आ रहे हैं। अखबारों से खबर मिली कि प्रज्वल रेवन्ना विदेश जा चुके है । लेकिन इतनी आसानी से कोई आरोपी कैसे विदेश चले जाते है, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। इससे पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर की महिला पहलवानों ने जब बृजभूषण शरण सिंह पर यौन शौषण के कई आरोप लगाए थे तब भी कुछ नहीं किया गया। क्योंकि आरोपी प्रमुख राजनैतिक पार्टी से जुड़े होने के साथ-साथ भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष पद पर भी थे। तो धर्म और राजनीति की नब्ज़ पकडऩे वाले रसूखदार लोग कीचड़ से सने हुए हो तो भी खुशबूदार ही माने जायेंगे। और थोड़े बहुत जो पकड़े जाते हैं वो वही लोग होते हैं जिनकी कोई पहुंच नहीं होती है। इसे सामाजिक दोहरापन भी कहा जा सकता है। हम जब बलात्कारियों को हार पहना कर स्वागत कर सकते है तो फिर इस तरह हार पहन कर गौरव अनुभव करने का मौका पाने बहुत से लोग लालायित भी होंगे।
निर्भया के समय अखबार, मीडिया और आम जनता जिस तरह सक्रिय हुए थे, आज क्यों नहीं होते हैं? ये ज्वलंत सवाल है और शायद आगे पूरे देश में ही इस एक सवाल से आग लग जाए.... या शायद नहीं! हम तो मूकदर्शक है। खामोशी अपना कर अपना रास्ता नापते रहेंगे, जब तक ये आग खुद के दरवाज़े तक न पहुंचे। बाकी हम ये सोचते हुए समय तो काट ही सकते कि हमारा धर्म उसके धर्म से बेहतर क्यों है और हमारी पार्टी उनकी पार्टी से सफेद क्यों है !
जाते जाते याद आ रही है कि महाश्वेता देवी जी की एक लघु कथा है ...नाम ‘द्रौपदी’। एक आदिवासी औरत को पुलिस ने किस तरह यौन शौषण किया था, उसी को लेकर ये कहानी है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में इस लघु कथा को पढ़ाया जाता था। अचानक इसे वहां के पाठ्यक्रम से हटा दिया गया। बहुतों ने प्रतिवाद करके कहा कि ये प्रक्रिया अलोकतांत्रिक है। बच्चों को द्रौपदी पढक़र, आदिवासी समाज की औरतों पर जो जुल्म ढाया जाता है, उसके बारे में पता चलता है। लेकिन यूनिवर्सिटी की तरफ से कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। अब ये भी बड़ा सवाल है कि आदिवासी चरित्र ‘द्रौपदी’ से किसको नुकसान होने की संभावना है! पता नहीं अगर महाश्वेता देवी जी आज जिंदा होती तो उनके सामने क्या सफाई पेश की जाती!
प्रिय दर्शन
1. बहस हारने या जीतने के लिए नहीं होती। वह किसी नतीजे तक पहुंचने के लिए होती है। हालांकि नतीजे तक पहुंचना आसान नहीं होता, लेकिन किसी भी बहस का लक्ष्य उस तरफ बढऩा जरूर होना चाहिए। अगर बहस कहीं नहीं बढ़ती तो दोनों पक्ष हारते हैं।
2. दलीलों को तीर-तलवार-भाले-खंजर की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। उनका काम किसी को घायल करना या चोट पहुंचाना नहीं होता। वे किसी बहस में कोई नया सिरा जोडऩे के होती हैं।
3. लेकिन दलीलें मिलती कहां से हैं - तर्क से, अध्ययन से, अनुभव से और आस्था से भी। आप कहां खड़े हैं, किस रास्ते चलते हुए आए हैं, जीवन के साथ आपने या जीवन ने आपके साथ क्या किया है- इसके आधार पर आपका विचार तय होता है, आपके तर्क तय होते हैं, आपकी दलीलें तय होती हैं।
4. मगर यही जीवन, यही अभ्यास तय करता है कि आखिर हम बहस क्यों कर रहे हैं? किसी नतीजे तक पहुंचने के लिए या किसी को नीचा दिखाने के लिए या बहस को भटकाने के लिए या कोई पुराना हिसाब चुकाने के लिए? बहस करते हुए हम जितना दूसरों को घेरते हैं उतना ख़ुद भी घिरते जाते हैं।
5. केदारनाथ सिंह की चर्चित कविता है- धूप में घोड़े पर बहस’। कविता में एक निरर्थक और एक दूसरे से असंपृक्त बहस जारी है। बहस में तीन लोग शामिल हैं। लेकिन उनके बीच कोई तारतम्य न होते भी बहस में कई बहुत मासूम दुख चले आते हैं, निजी अनुभवों और पछतावों की छाया चली आती है। बहस करते हुए दरअसल हम खुद को खोल रहे होते हैं।
6. बहस करते समय यह ध्यान रखें कि किससे बहस कर रहे हैं। उसका इरादा क्या है? बहस में कई बार बहुत अच्छी और आकर्षक लगने वाली दलीलें भी गलत नतीजों तक ले जा सकती हैं। बहुत अच्छे वक्ता बहस जीतने के लिए गलत दलीलों की मदद लेते हैं या अनजाने में बहस के कुछ महत्वपूर्ण पहलू छोड़ देते हैं।
7. दरअसल बहस का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण तर्क है। लेकिन तर्क की भी सीमा होती है। आधुनिकता के तर्कवाद ने हमें एक अंधी सुरंग में भी धकेला है। गांधी बहुत तार्किक नहीं थे। जहां तर्क उन्हें अपर्याप्त लगता था, वहां वे अपनी अंत:प्रेरणा की शरण ले लेते थे।
8. लेकिन तर्कवाद की सीमा समझने का मतलब तर्क-विरोधी होना नहीं होता। तर्क का अतिशय सहारा अक्सर कुतर्क की ओर ले जाता है।
और कुतर्क सबसे पहले तर्क को बेमानी बनाता है और फिर पूरी बहस को।
9. वैसे सोशल मीडिया पर बहसें अक्सर अनियंत्रित होती हैं। कोई भी कुछ भी बोल कर निकल सकता है। इसमें बहुत ऊर्जा जाती है। वैचारिक बहसें व्यक्तिगत छींटाकशी में बदल जाती हैं। लोग एक ही बात को जबरन खींचते रहते हैं।
10. शायद कुछ लोगों को इसी से ऊर्जा मिलती है। बहस से नहीं, बहस को पटरी से उतार कर। ऐसे लोग खुद को पीडि़त दिखाने में भी फौरन देर नहीं करते। ऐसे लोगों को बहसें मुबारक।
-रजनी ठाकुर
तू न थकेगा कभी, तू न रुकेगा कभी, तू न मुड़ेगा कभी, कर शपथ, अग्निपथ।
हरिवंशराय बच्चन ने इस कविता को लिखते वक्त शायद ही सोचा होगा कि अग्निपथ एक दिन भारतीय सेना के कर्तव्य पथ का एक हिस्सा होगा। साल 2022 में भारत सरकार ने अग्निपथ की घोषणा की जिसके तहत सेना में चार साल के लिए जवानों की भर्ती की जाएगी जो अग्निवीर कहलाएंगे।
दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सेना में अचानक हुए इस बदलाव की क्या वजह है, चार साल की छोटी अवधि के लिए भर्तियां क्यों की जा रही हैं, जैसे कई सवाल इस घोषणा के बाद से उठाए जा रहे हैं।
यह बदलाव अचानक नहीं आया है, बल्कि पिछले कई सालों से भारतीय सेना में ‘जोश (युवा) और होश (अनुभवी)’ के बीच संतुलन बनाने की कवायद चल रही है। इस वक्त सेना की औसत उम्र 32 साल है, अग्नि वीरों की भर्ती से अगले 6-7 सालों में इसे घटाकर 26 साल लाने का लक्ष्य रखा गया है। शॉर्ट टर्म सर्विस का कांसेप्ट नया नहीं है, उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया, स्विटजरलैंड, ब्राजील, स्वीडन जैसे कई देशों में कम समय के लिए सेना में सेवा का प्रावधान है, हालांकि इन देशों में सैन्य सेवा सबके लिए अनिवार्य है।
सेना के साथ सवाल अग्निवीरों के भविष्य का भी है, चार साल में सेना से रिटायर होने के बाद उनके पास क्या विकल्प होगा। भारत जैसे देश में जहां क्लर्क के पोस्ट पर निकलने वाली सरकारी भर्तियों में भी ग्रेजुएट और इंजीनियर आवेदन करते हैं, वहां 21.5 साल से 25 साल की उम्र में रिटायर होने वाले अग्निवीरों का भविष्य क्या होगा।
इस सवाल के जवाब के लिए सिक्के का दूसरा पहलू भी समझने की जरुरत है, हमारे देश में इस वक्त युवाओं की संख्या ज्यादा है यानी रोजगार के भी अवसर ज्यादा होने चाहिए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की ‘द इंडिया एंप्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024’ बताती है कि भारत के कुल बेरोजगारों में 80 फीसदी युवा हैं, हाईस्कूल या उससे ज्यादा पढ़े युवाओं में बेरोजगारी का अनुपात कहीं ज्यादा है। रक्षा विभाग फिलहाल हर साल 50 से 60 हजार अग्नि वीरों की भर्ती करेगी, जिसे अगले 5 सालों में बढ़ाकर 90 हजार से लेकर 1.25 लाख तक किया जाएगा। भर्तियां बढऩे के साथ ही युवाओं के लिए मौके भी बढ़ेगे।
भर्ती के लिए उम्र सीमा 17.5 साल- 21 साल की रखी गई है, अग्निवीर बनने के लिए अभ्यर्थियों को पहले कॉमन एंट्रेंस एग्जाम (CEE) होगा, इसके बाद फिजिकल और मेडिकल टेस्ट देना है, यानी काफी कम उम्र में वह अपनी शारीरिक और बौद्धिक क्षमता को बेहतर करने के लिए काम करेंगे।
यह तैयारी युवाओं को एक जिम्मेदार नागरिक बनाने के साथ टीम स्पिरिट की भावना को बढ़ाने में भी मदद करेगी। ऐसा नहीं है कि 10वीं और 12वीं पास करने वाले युवा अगर अग्निवीर बनते हैं तो उनके आगे की पढ़ाई रुक जाएगी, शिक्षा मंत्रालय अग्निवीरों के लिए तीन साल का कौशल आधारित विशेष डिग्री पाठ्यक्रम शुरू करेगा। इसमें सेना में चार साल के कार्यकाल के दौरान मिले प्रशिक्षण के लिए 50 प्रतिशत अंक दिए जाएंगे। यह स्नातक डिग्री पाठ्यक्रम इंदिरा गांधी राष्ट्रीयमुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) द्वारा शुरू किया जाएगा। यह डिग्री देश और विदेश दोनों जगह नौकरी और उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए मान्य होगी।
22-23 साल की उम्र तक देश के ज्यादातर युवा या तो पढ़ाई कर रहे होते हैं या नौकरी की तलाश में रहते हैं, अग्निवीरों के पास डिग्री के साथ ही सेना का अनुभव भी होगा। 25% अग्निवीरों के पास सेना में स्थायी नियुक्ति पाने का भी मौका है, चार साल की सेवा के दौरान अगर वह पूरे समर्पण से काम करते हैं तो उन्हें सेना में बने रहने और आगे बढऩे के भरपूर मौके मिलेंगे। सेना में युद्ध के अलावा भी कई ऐसे काम हैं, जहां युवाओं की जरूरत है।
जिनकी सेवा आगे नहीं बढ़ती है, उनके लिए भी सेना से बाहर कई मौके तैयार किए जा रहे हैं, पैरामिलिट्री फोर्स से लेकर प्राइवेट सेक्टर तक में वह अपना भविष्य तराश सकते हैं, रक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि हर साल लगभग 17,600 लोग तीनों सेवाओं से समय से पहले सेवानिवृत्ति ले रहे हैं और इनमें से ज्यादातर पूर्व सैनिक सुरक्षा से जुड़े काम में ही हैं।
चार साल की सेवा के बाद अग्निवीर 21.5 साल से 25 साल की उम्र में सेना से बाहर आ जाएंगे। तब उनके पास 12वीं की डिग्री होगी जिसमें सीखी गई सभी स्किल का ब्यौरा होगा। सेवा निधि पैकेज के रूप में 11.71 लाख रुपए मिलेंगे। उन्हें बैंकों से आसानी से कर्ज देने की व्यवस्था की जाएगी, ताकि वे अपना कोई कारोबार खड़ा कर सकें। वे शारीरिक कौशल के साथ कई तरह के अनुभव और प्रशिक्षण से भी लैस होंगे।
अभी तक रक्षा मंत्रालय के 16 पीएसयू ने अपनी नौकरियों में 10 फीसदी अग्निवीरों को रिजर्वेशन देने का एलान कर दिया है। CRPF, ITBP, नेशनल सिक्योरिटी गार्ड और सशस्त्र सीमा बल की नौकरियों में भी 10 फीसदी आरक्षण का ऐलान किया है। कोस्टगार्ड ने भी भर्तियों में अग्नि वीरों को वरीयता देने का फैसला किया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अपील के बाद आनंद महिंद्रा, हर्ष गोयनका, किरण मजूमदार शॉ समेत कई जाने माने उद्योगपतियों और ग्लोबल कंपनियों ने भी अग्नि वीरों को नौकरी देने की बात कही है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने भी पुलिस की भर्तियों में पूर्व अग्निवीरों को प्राथमिकता देने की बात कही है, बहुत संभव है कि आने वाले दिनों में दूसरे राज्य भी इस तरह की घोषणा करें।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कम उम्र में सेना का अनुभव युवाओं को एक जिम्मेदार नागरिक बनाने में मदद तो करेगा ही उनके लिए एक बेहतर भविष्य की बुनियाद भी रखेगा।


