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ऑनलाइन दुनिया के जाल से अपने बच्चों को बचाने का तरीका जानिए
13-May-2024 2:19 PM
ऑनलाइन दुनिया के जाल से अपने बच्चों को बचाने का तरीका जानिए

आज बच्चे पहले के मुकाबले कम उम्र में इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और दुनिया में हर आधे सेकेंड में एक बच्चा ऑनलाइन होता है।

ऐसे में जानकार चेतावनी दे रहे हैं कि ऑनलाइन दुनिया तक बच्चों की बढ़ती पहुंच से उनके लिए गंभीर खतरे भी पैदा हो रहे हैं।

वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी के यंग एंड रेजिलिएंट सेंटर ने इस बारे में हाल ही में एक स्टडी की है।

इससे पता चला है कि कम आमदनी वाले परिवारों के बच्चे तो खासतौर से अनजान लोगों से अनुचित या गैर-जरूरी रिक्वेस्ट ब्लॉक नहीं करते हैं। इस अध्ययन में पाया गया था कि ऐसे लोगों की शिकायत न करने या ब्लॉक नहीं करने की वजह से बच्चे भविष्य में खुद को अनचाहे संपर्क के कहीं ज़्यादा बड़े जोखिम में डाल देते हैं।

ब्रिटेन में ऑनलाइन सेफ्टी एक्ट नाम के नए क़ानून के तहत तकनीकी कंपनियों की ये जि़म्मेदारी होती है कि वो इंटरनेट पर बच्चों की अधिक सुरक्षा सुनिश्चित करें। लेकिन, इस कानून से जुड़े नए नियम 2025 तक लागू नहीं होंगे।

आलोचक कहते हैं कि ये नियम भी बहुत अधिक कारगर नहीं हैं।

दुनिया भर में सरकारों ने ऐसे ही नियम कायदे लागू किए हैं।

तो आप ऑनलाइन दुनिया में अपने बच्चों को कैसे महफूज रख सकते हैं और बच्चों के लिए इंटरनेट की दुनिया ज्यादा सुरक्षित बनाने के लिए दुनिया भर की सरकारें और तकनीकी कंपनियां क्या कर रही हैं?

दुनिया भर में बच्चे ऑनलाइन कितना वकत बिताते हैं?

आज दुनिया भर में बच्चे, पहले से कहीं ज़्यादा वक़्त ऑनलाइन होते हैं। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, दुनिया में हर आधे सेकेंड में कोई न कोई बच्चा पहली बार ऑनलाइन दुनिया में दाखिल होता है।

आंकड़े दिखाते हैं कि दुनिया में कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने में कम उम्र वालों का सबसे ज्यादा योगदान है। 2023 में दुनिया भर में 15 से 24 साल के 79 प्रतिशत लोग ऑनलाइन हो रहे थे, जो बाकी आबादी से 65 प्रतिशत ज्यादा है।

सिडनी के यंग एंड रेजि़लिएंट सेंटर की सह-निदेशक अमांडा थर्ड कहती हैं, ‘आज के बच्चे ऑनलाइन दुनिया में ही बड़े हो रहे हैं और लगातार बदल रहे डिजिटल मंजर में उन्हें इंटरनेट के सुरक्षित रखने के लिए मदद की जरूरत होती है।’

बच्चों के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ के एक अध्ययन के मुताबिक 30 देशों में एक तिहाई से ज़्यादा बच्चों को साइबर दुनिया में दादागीरी और धमकियों का सामना करना पड़ता है। इसकी वजह से लगभग 20 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाना बंद कर देते हैं।

हेट स्पीच, हिंसक कंटेंट और उग्रवादी संगठनों में भर्ती भी चिंता के विषय हैं। इसके साथ साथ ग़लत जानकारी या फिर साजिश की मनगढ़ंत कहानियां भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बहुत चलती हैं। हालांकि, यूनिसेफ का कहना है, ‘ऑनलाइन दुनिया में बच्चों को सबसे ज्यादा खतरा यौन शोषण और बुरे बर्ताव से है।’

यूनिसेफ के मुताबिक, ‘बच्चों का यौन शोषण करने वालों के लिए अपने शिकार से ऑनलाइन संपर्क करना आज ज़्यादा आसान हो गया है। वो बड़ी आसानी से ऐसी तस्वीरें साझा कर सकते हैं और दूसरों को भी ऐसे अपराध करने के लिए उकसा सकते हैं। 25 देशों में लगभग 80 प्रतिशत बच्चों ने ऑनलाइन दुनिया में यौन शोषण या बुरे बर्ताव के खतरों की शिकायत की है।’

मां-बाप के लिए ऑनलाइन निगरानी के कौन से विकल्प मौजूद हैं?

अपने बच्चों पर नजर रखने के लिए मां-बाप के पास ऐसे कई उपाय उपलब्ध हैं, जो बच्चों को परेशान करने वाले या अनुचित कंटेंट को ब्लॉक कर देते हैं। लेकिन, अध्ययन ये बताते हैं कि अक्सर अभिभावक इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर नहीं करते हैं।

2019 में हुए ग्लोबल किड्स ऑनलाइन सर्वे में पता चला था कि नौ से 17 साल उम्र के ज्यादातर बच्चों के मां-बाप, बच्चों की निगरानी के लिए तकनीकी औजार इस्तेमाल करने के बजाय बीच बचाव और नियमों पर आधारित पाबंदियों जैसे तरीके अपनाते हैं।

इस स्टडी के मुताबिक, अभिभावकों के बीच बहुत से सांस्कृतिक फासले भी देखने को मिले हैं। यूरोप और दक्षिणी अमेरिका के अमीर देशों के माता-पिता मध्यस्थता करने को तरजीह देते हैं। वहीं घाना, फिलीपींस और दक्षिण अफ्रीका में मां-बाप इस मामले में सीमित स्तर पर दखल देने की नीति अपनाते हैं।

हालांकि, बच्चों के फोन या दूसरे उपकरणों पर पैरेंटल कंट्रोल का इस्तेमाल बहुत कम बना हुआ है। इस सर्वे में शामिल देशों में तीन प्रतिशत से कम माता-पिता ऐसे थे, जो अपने ऑनलाइन बच्चों पर नजर रखने के लिए इन तकनीकी औजारों का इस्तेमाल कर रहे थे।

ब्रिटेन स्थित कुछ बड़ी इंटरनेट कंपनियों ने मिलकर इंटरनेट मैटर्स नाम से सुरक्षा का एक संगठन बनाया है। इंटरनल मैटर्स ने ऐसे उपलब्ध तकनीकी औजारों की एक लिस्ट तैयार की है। और, इसके साथ साथ इसने इन तकनीकी टूल्स के कदम दर कदम इस्तेमाल के लिए एक गाइड भी बनाई है।

मिसाल के तौर पर जो मां-बाप अपने बच्चों को सबसे लोकप्रिय प्लेटफॉम्र्स में से एक यानी, यू-ट्यूब और टिकटॉक पर अनुचित कंटेंट देखने से रोकना चाहते हैं, तो वो खास बच्चों के लिए बनाए गए ‘किड्स वर्जन’ की सेटिंग कर सकते हैं, जो एडल्ट कंटेंट को फिल्टर कर देता है।

यू-ट्यूब और टिकटॉक की मुख्य साइट इस्तेमाल करने वाले किशोर उम्र बच्चों के लिए अभिभावक निगरानी रखने वाले खाते बना सकते हैं, जिससे उन्हें पता चल सकेगा कि उनके बच्चे इन ऐप्स पर क्या देख रहे हैं।

फैमिली सेंटर के जरिए फेसबुक मैसेंजर पर भी नजर रखी जा सकती है।

टिकटॉक का कहना है कि उसका परिवार से जोडऩे वाला टूल, मां-बाप को ये अख्तियार देता है कि वो अपने किशोर उम्र बच्चों के खातों को प्राइवेट बना सकें।

इंस्टाग्राम पर भी अभिभावकों के लिए काफी टूल्स मौजूद हैं, जिससे वो रोजाना इन्हें देखने की समय सीमा तय कर सकते हैं। ब्रेक का वक्त भी तय कर सकते हैं और उन खातों की लिस्ट भी बना सकते हैं, जिनकी शिकायत उनके बच्चों ने की हो।

मोबाइल फोन और कन्सोल में कंट्रोल के कौन से विकल्प हैं?

एंड्रॉयड, एप्पल के फोन और टैबलेट में ऐसे ऐप और सिस्टम होते हैं, जिनका इस्तेमाल मां-बाप कर सकते हैं। इन टूल्स के ज़रिए कुछ ऐप को ब्लॉक किया जा सकता है या उन तक पहुंच को सीमित किया जा सकता है।

एडल्ट कंटेंट को प्रतिबंधित किया जा सकता है। बच्चों के खरीदारी करने पर रोक लगाई जा सकती है और उनकी ब्राउजिंग पर नजर रखी जा सकती है।

एप्पल ने इसके लिए स्क्रीन टाइम का टूल दिया है। गूगल फैमिली लिंक के नाम से इसके लिए ऐप देता है। वहीं दूसरे डेवेलपर्स ने भी ऐसे कई ऐप उपलब्ध कराए हैं।

नेटफ्लिक्स जैसे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म कंटेंट को फिल्टर करने के लिए पैरेंटल कंट्रोल मुहैया कराते हैं।

वहीं, गेमिंग के कंसोल की सेटिंग के जरिए बच्चों के मां-बाप उनकी उम्र के मुताबिक गेम खेलने की सीमा तय कर सकते हैं और गेम खेलने के दौरान खरीदारी पर रोक लगा सकते हैं।

कई देशों में अभिभावकों के लिए नियंत्रण के ये विकल्प ब्रॉडबैंड और टीवी के सब्सक्रिप्शन की सेवाओं की तरफ से भी दिए जाते हैं।

आपको अपने बच्चों से ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में कैसे बात करनी चाहिए?

ब्रिटेन की बच्चों की कल्याणकारी संस्था एनएसपीसीसी के मुताबिक, बच्चों से ऑनलाइन सेफ्टी के बारे में बात करना और उनकी ऑनलाइन गतिविधियों में दिलचस्पी रखना भी काफी अहम है।

ये संस्था मां-बाप को सुझाव देती है कि वो इन मुद्दों पर बातचीत को अपने बच्चों के साथ रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बनाएं। ठीक उसी तरह जैसे वो बच्चों से स्कूल में बिताए गए वक्त के बारे में बातें करते हैं। इससे बच्चों के लिए अपनी चिंताएं, मां-बाप से बता पाना और आसान हो जाएगा।

सरे यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर सुरक्षा के विशेषज्ञ प्रोफेसर एलन वुडवार्ड कहते हैं, ‘सबसे खराब बात बच्चों से ये कहना होती है कि ‘तुम इसे नहीं देख सकते हो।’ ’

प्रोफेसर वुडवार्ड कहते हैं, ‘फिर बच्चे इस रोकथाम से बचने का कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेंगे। फिर चाहे इसके लिए उन्हें वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (वीपीएन) का इस्तेमाल करना पड़े, जहां उन्हें ऐसी पाबंदियों से बचने का मौका मिल जाता है। या फिर वो किसी दूसरे के लॉगिन के जरिए वो सब देखने लगते हैं।’

दुनिया भर में सरकारें इसके लिए क्या कर रही हैं?

हाल के वर्षों में विनियमन की संस्थाओं ने निजता के ऐसे कानून लागू करने पर जोर देना तेज कर दिया है, जिनसे बच्चों की ऑनलाइन दुनिया में हिफाजत हो सके। इस मामले में कानून बनाने वाले भी काफी सक्रियता दिखा रहे हैं।

हालांकि, इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ प्राइवेसी प्रोफेशनल्स (आईएपीपी) का कहना है कि इनमें से बहुत से लोग इस बात पर सहमत हैं कि ‘ऑनलाइन दुनिया में प्राइवेसी और सुरक्षा बनाए रखने के लिए और कानूनों की जरूरत है। लेकिन न्यायिक अधिकार क्षेत्र इस साझा मकसद के लिहाज से अलग अलग तरीके अपना रहे हैं।’

मिसाल के तौर पर ब्रिटेन या फिर कैलिफोर्निया में ये कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वो अपनी सेवाओं को इस तरह तैयार करें, जिससे बच्चों की निजता और सुरक्षा को सक्रियता से महफूज बनाया जा सके।

ब्रिटेन की तकनीकी सचिव मिशेल डोनेलान ने बड़ी तकनीकी कंपनियों से गुजारिश की थी, ‘आप हमारे साथ मिलकर तैयारी करें। भारी जुर्माना लगने और सख्त कानून लागू होने का इंतजार न करें, अपनी जिम्मेदारी निभाने में सक्रियता दिखाएं और अभी कार्रवाई करें।’

अमेरिका के कुछ कानून, इंटरनेट तक बच्चों की पहुंच की निगरानी के लिए मां-बाप की जिम्मेदारियों पर जोर डालते हैं।

1998 का अमरीकी चिल्ड्रेन्स ऑनलाइन प्राइवेसी प्रोटेक्शन एक्ट मां-बाप की इजाजत के बगैर, ऑनलाइन कंपनियों को बच्चों से जुड़ी कुछ जानकारियां प्रॉसेस करने पर रोक लगाता है।

अमेरिका के अरकंसास, लूसियाना, टेक्सस और यूटा राज्यों में हाल में पारित किए गए कुछ कानून मोटे तौर पर सोशल मीडिया सेवाओं को बच्चों को उनके मां-बाप की इजाजत के बगैर इस्तेमाल करने की इजाजत देने पर रोक लगाते हैं।

2020 में ब्राजील ने निजी डेटा जमा करने को लेकर एक कानून पारित किया था, लेकिन, ब्राजील के सांसद अभी भी डिजिटल माहौल में बच्चों और किशोरों की हिफाजत करने की व्यवस्थाओं जैसे कि इंटरनेट सेवाएं और ऑनलाइन प्रोडक्ट देने वालों के लिए यौन शोषण की चेतावनी देने वाली व्यवस्था बनाने को लेकर अभी परिचर्चाएं ही कर रहे हैं।

2022 में फ्रांस ने इंटरनेट से जुड़ी डिवाइस के लिए मां-बाप की इजाज़त को अनिवार्य बना दिया है।

अगस्त 2023 में भारत ने एक विवादित डेटा प्राइवेसी बिल को मंजूरी दी थी, जिसमें बच्चों के निजी डेटा को जमा करने के लिए उनके मां-बाप से तस्दीक़ के साथ इजाज़त लेना जरूरी बना दिया गया था। इस कानून में खास बच्चों को निशाना बनाकर ऑनलाइन विज्ञापन करने पर भी रोक लगा दी गई थी।

तकनीकी कंपनियां इस समस्या  से कैसे निपट रही हैं?

आज तकनीकी कंपनियों के ख़िलाफ़ न केवल निजता से जुड़ी चिंताओं बल्कि यूजर की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर भी विरोध-प्रदर्शन बढ़ता जा रहा है।

दुनिया भर में एक्टिविस्ट और अभिभावक तकनीकी कंपनियों को ये जिम्मेदारी लेने या फिर ऐसे मंच तैयार करने का दबाव बना रही हैं, जो बच्चों और कम उम्र के यूजऱ के लिए ‘बनावट में ही सुरक्षित’ हों।

इसी साल जनवरी के आखिर में अमेरिकी संसद में सुनवाई के दौरान मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने उन बच्चों के मां-बाप से माफी मांगी थी, जिन्हें ऑनलाइन दुनिया में शोषण का शिकार बनाया गया था।

दि बिग टेक ऐंड दि ऑनलाइन चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉयटेशन क्राइसिस की ये सुनवाई इसलिए की गई थी, ताकि ‘ऑनलाइन दुनिया में बच्चों के यौन शोषण के बढ़ते मामलों की पड़ताल की जा सके।’

मेटा,  स्नैप, डिस्कॉर्ड, एक्स और टिकटॉक जैसी सभी कंपनियों के अधिकारियों को गवाही देने के लिए बुलाया गया था। हालांकि सबसे ज्यादा चर्चा मार्क जुकरबर्ग और टिकटॉक के चीफ एग्जीक्यूटिव शोउ च्यू की पेशी की सबसे ज़्यादा चर्चा हुई थी।

सुनवाई के दौरान मार्क जकरबर्ग ने कहा था, ‘आप सबको जिन हालात से गुजरना पड़ा उसके लिए मैं माफी मांगता हूं। आपके परिवारों को जिन चीजों का सामना करना पड़ा, उसकी तकलीफ किसी को भी नहीं झेलनी चाहिए।’

अमेरिकी संसद में ये सुनवाई तब हुई थी, जब मेटा के एक पूर्व वरिष्ठ कर्मचारी ने कांग्रेस को बताया था कि वो ये मानते हैं कि इंस्टाग्राम किशोरों को यौन शोषण से महफूज रखने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा है।

मेटा और स्नैपचैट ने कहा कि उन्होंने 18 साल से कम उम्र वाले अपने यूजर्स के लिए पहले से ही सुरक्षा के अधिक उपाय कर रखे हैं। उन्होंने मां-बाप की निगरानी आसान बनाने वाले टूल्स के बारे में भी बताया।

स्नैपचैट के एक अधिकारी ने कहा, ‘नौजवान पीढ़ी के बीच लोकप्रिय एक प्लेटफॉर्म के तौर पर हमें अपनी अतिरिक्त जिम्मेदारियों का एहसास है कि हमें एक सुरक्षित और सकारात्मक अनुभव देना चाहिए।’

मेटा के एक प्रतिनिधि ने कहा कि उनकी कंपनी चाहती है कि युवा पीढ़ी के लोग ‘अन्य लोगों से ऐसे माहौल में जुड़ सकें, जहां वो ख़ुद को सुरक्षित महसूस करते हों।’

उन्होंने कहा, ‘हिंसा और ख़ुदकुशी को उकसावा देने वाला कंटेंट, ख़ुद को चोट पहुंचाने या फिर खान-पान की बीमारी बढ़ाने वाले कंटेंट हमारे नियमों के खिलाफ हैं- और हमें जब भी अपने प्लेटफॉर्म पर ऐसा कंटेंट मिलता है, हम उसे हटा देते हैं।’

हालांकि, बीबीसी समेत कई मीडिया और निगरानी रखने वाले संगठनों ने बताया है कि अनुचित या दुव्र्यवहार करने वाले कंटेंट की शिकायत करने के बावजूद ये कंपनियां या तो तुरंत इन्हें हटाती नहीं हैं।

अक्सर ऐसा होता है कि कई बार संपर्क करने के बावजूद भी ऐसे कंटेंट को यूं ही पड़ा रहने दिया जाता है। (bbc.com/hindi)


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