विचार/लेख
-अशोक पांडे
रूस के उत्तरी कॉकेशिया में दागि़स्तान नाम का एक छोटा सा मुल्क है। करीब तीस लाख की आबादी वाले इस मुल्क में रूसी के अलावा कोई पंद्रह भाषाएँ बोली जाती हैं। इन भाषाओं के नाम बड़े दिलचस्प हैं- रुतुल, अगुल, दारगिन, नोगाई, कुम्यिक, अवार वगैरह।
किस्सा 1968 के आसपास का है जब दागि़स्तान भी सोवियत संघ का हिस्सा था। अवार भाषा के उस समय के सबसे नामी लेखक रसूल हम्जातोव के पास मॉस्को से निकलने वाली एक बड़ी पत्रिका के सम्पादक की चिठ्ठी आई। लिखा था कि पत्रिका के आगामी अंकों में दागिस्तान पर विशेष सामग्री छपने जा रही है। चिठ्ठी में इसी उद्देश्य से रसूल से उनकी कोई रचना माँगी गई थी। पत्रिका का बड़ा नाम था और उसकी दस लाख प्रतियाँ छपा करती थीं। रचना कैसी हो इस बारे में सम्पादक ने रसूल को स्पष्ट हिदायतें देने के बाद लिखा था कि उसे नौ से दस पन्नों में टाइप कर के बीसेक दिनों में मॉस्को पहुँच जाना चाहिए।
और कोई लेखक होता तो इतनी बड़ी पत्रिका में छपने का मौका मिलने के विचार से ही खुश हो गया होता पर रसूल को झल्लाहट हुई। चिठ्ठी किनारे रख दी गई। कुछ दिनों बाद सम्पादक ने फोन पर तकाज़े करने शुरू कर दिए। रसूल के कुछ दिन टालमटोल की तो सम्पादक ने प्रस्ताव दिया कि वह अपने दफ्तर से किसी को उनके पास भेज देंगे। सम्पादक ने आगे कहा, ‘तुम अपने कुछ विचार और तफसीलें उसे बता देना, बाकी वह सब कुछ खुद ही कर लेगा। तुम उसे पढक़र, ठीक-ठाक करके उस पर अपने हस्ताक्षर कर देना। हमारे लिए तो मुख्य चीज तुम्हारा नाम है।’
रसूल की समझ में नहीं आ रहा था कि नौ पन्नों में बाईस दिन के भीतर कोई अपने देश के बारे में कैसे लिख सकता है।
रसूल और सम्पादक के बीच हुई वह आखिरी बातचीत थी। रसूल उन दिनों मॉस्को में ही नौकरी करते थे। सम्पादक कहीं घर न चला आये इस आशंका से उन्होंने एक महीने की छुट्टी ली और अपने दागिस्तान के अपने छोटे से गाँव त्सादा चले आये।
गाँव पहुँचने पर रसूल को अपने पिता का एक पुराना खत याद हो आया, जो पहली बार मास्को देखने पर उन्होंने उसे लिखा था। मास्?को देखकर उन्हें बड़ी हैरानी हुई थी।
‘ऐसा लगता है कि यहाँ मास्को में खाना पकाने के लिए आग नहीं जलाई जाती, क्योंकि मुझे यहाँ अपने घरों की दीवारों पर उपले पाथनेवाली औरतें नजर नहीं आतीं, घरों की छतों के ऊपर अबूतालिब की बड़ी टोपी जैसा धुआँ नहीं दिखाई देता। छत को समतल करने के लिए रोलर भी नजर नहीं आते। मास्कोवासी अपनी छतों पर घास सुखाते हों, ऐसा भी नहीं लगता। पर यदि घास नहीं सुखाते, तो अपनी गायों को क्या खिलाते हैं? सूखी टहनियों या घास का ग_ा उठाए एक भी औरत कहीं नजर नहीं आई। न तो कभी जुरने की झनक और न खंजड़ी की धमक ही सुनाई दी है। ऐसा लग सकता है मानो जवान लोग यहाँ शादियाँ ही नहीं करते और ब्याह का धूम-धड़ाका ही नहीं होता। इस अजीब शहर की गलियों-सडक़ों पर मैंने कितने भी चक्कर क्यों न लगाए, कभी एक बार भी कोई भेड़ नजर नहीं आई। तो सवाल पैदा होता है कि जब कोई मेहमान आता है, तो मास्कोवाले क्या जिबह करते हैं! अगर भेड़ को जिबह करके नहीं, तो यार-दोस्त के आने पर वे कैसे उसकी खातिरदारी करते हैं! नहीं, ऐसी जिंदगी मुझे नहीं चाहिए। मैं तो अपने त्सादा गाँव में ही रहना चाहता हूँ, जहाँ बीवी से यह कहकर कि वह कुछ ज्यादा लहसुन डालकर खीनकाल बनाए, उन्हें जी भरकर खाया जा सकता है।’
तो सत्तर घरों, सत्तर चूल्हों और नीला धुआं छोडऩे वाली सत्तर चिमनियों वाले अपने इस सुन्दर पहाड़ी गाँव के खेतों, धारों, पत्थरों, पगडंडियों, झरनों और रिश्तेदारों-पड़ोसियों की संगत में रसूल की समझ में आता है कि उनका गाँव पूरे संसार की सबसे खूबसूरत जगह है। उनके पिता जो खुद एक बहुत नामी लोकगायक थे, अपनी हर बातचीत में अक्सर अपने इलाके के बड़े विद्वान और कवि अबूतालिब की पंक्तियों को उद्धरणों की तरह इस्तेमाल करते थे। पिता की बातों से रसूल ने जाना कि दुनिया भर के ज्ञान से अधिक समझदारी की बातें उनके गाँव के बड़े-बूढ़ों की बनाई लोरियों, कहावतों और लकड़ी के नक्काशीदार दरवाजों पर उकेरी गई इबारतों के भीतर मिलती हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का परिणाम यह हुआ कि रसूल हम्जातोव ने अपने गाँव, अपने देश पर एक ऐसी किताब लिख डाली जिसके टक्कर की किताब संसार भर के साहित्य में नहीं मिलती।
यह किताब किसी भी स्थापित विधा के खांचे में फिट नहीं बैठती। कोई उसे गीतनुमा कथा बताता है, कोई गद्य कविता। कोई आत्मकथा कहता है, कोई दागिस्तान के इतिहास की पाठ्यपुस्तक। कोई उसे दागिस्तान के लोकगीतों और मुहावरों के संग्रह के तौर पर देखता है तो कोई किस्सागोई की एक मिसाल के तौर पर।
अपने घर, गाँव और देश के बारे में जितनी मोहब्बत ‘मेरा दागि़स्तान’ में रसूल ने भरी है उसने इस किताब को बीते पचास बरसों से लिखने-पढऩे वालों के बीच किसी महबूबा के तौर पर स्थापित किया है। चालीस जबानों में अनूदित हो चुकी इस किताब के सैकड़ों एडीशन छप चुके हैं और उसकी मांग में कमी नहीं आई है।
इस किताब को हर समझदार इंसान के घर में होना चाहिए। परिवार के लोगों के साथ इस का वाचन किया जाना चाहिए।
-मोहम्मद हनीफ
शहरों में जन्मे भाई-बहनों ने पंजाब की ग्रामीण संस्कृति को ज़्यादातर फिल्मों में ही देखा है। वो भी तब जब एक हीरोइन सरसों के खेत में अंदर जाकर डांस करने लगती है और एक शहरी बाबू पेड़ के पीछे छिपकर उसे देखता रहता है।
अमर सिंह चमकीला पर एक फिल्म आई। लोगों ने इसे देखा और पसंद भी किया।
डायरेक्टर इम्तियाज अली साहब की ख़ूब तारीफ़ भी हुई। दिलजीत सिंह दोसांझ और परिणीति चोपड़ा की भी बल्ले-बल्ले, लेकिन उसी समय एक छोटी सी बहस छिड़ गई कि कौन से गाने खऱाब हैं और कौन से अच्छे हैं?
और ये भी कहा गया कि चमकीला बेहद गंदे गाने गाता था। उसको न तो बाप की, न माँ की, न भाभी की, न साली की और न बूढ़े आदमी की, किसी की इज़्जत नहीं थी।
चमकीला को मारने की बात कहने वाले भी ये कहते थे कि तुम गंदे गाने गाते हो, सुधर जाओ। लेकिन वह बाज नहीं आया और 27 साल की उम्र में अपनी पत्नी अमरजोत कौर के साथ क़त्ल कर दिया गया।
पंजाब का कल्चर एक तरह से ‘गंद से मुक्त’ हो गया।
कल्चर शब्द भी हमने पहली बार शहर आकर सुना था। वहां भी हमारे शहरी मित्र कहते थे कि शहरों के पास यानी हमारे पास कल्चर (संस्कृति) होता है और आपके गांव वालों के पास सिर्फ एग्रीकल्चर।
अब शहरी कल्चर इतना हावी था कि हम उन्हें कभी बता ही नहीं पाए कि अगर हमारे पास एग्रीकल्चर नहीं होता तो आपके बच्चे दूध कहां से पीते?
आपको तो यह भी नहीं मालूम कि जो गेहूं की रोटी आप रोज खाते हो, वह शहर की फैक्ट्रियों में नहीं उगती, बल्कि गांव में ही पसीना बहा कर किसान उगाता है।

शिव कुमार बटालवी
पंजाबी के सबसे अजीम कवि शिव कुमार बटालवी थे। उनकी मृत्यु भी युवावस्था में ही हो गई थी। एक इंटरव्यू लेने वाले ने उनसे पूछा कि आप कवि क्यों बने? उन्होंने कहा, ‘हिंदुस्तान का समाज तबकों में बँटा हुआ है, कोई लोअर मिडिल क्लास, कोई अपर मिडिल क्लास। इन सबकी अपनी-अपनी त्रासदियाँ हैं। माता-पिता सभी बच्चों को पढ़ाते हैं, जुएं की तरह। उसके बाद उसका रिटर्न मांगते हैं। मेरे वालिद साहब भी तहसीलदार थे। उन्होंने भी मुझे पढ़ाया, पता नहीं मैं शायर क्यों बन गया।’अमर सिंह चमकीला के पिता तहसीलदार नहीं थे।
हमारे शिव कुमार बटालवी पंजाबी के महान क्लासिक शायर बन गए। चमकीला गाँव के अखाड़ों में गाने वाला गंदा-मंदा गायक। जब वह मशहूर हो गए तो चौधरियों ने उन्हें शादियों में भी बुलाना शुरू कर दिया। लेकिन चमकीला चौधरियों की शादियों में गाने के बाद भी मजदूर और मरासी (विदूषक) ही रहे।
फिल्म में उनका किरदार दिलजीत सिंह दोसांझ ने निभाया है और बहुत अच्छा अभिनय किया है।
वही दिलजीत सिंह जब अंबानी के शादी से जुड़े समारोह में गए तो एक अंतरराष्ट्रीय रॉकस्टार की तरह गए।
हम भी एक नवाब की हवेली के सेट पर उमराव जान वाले गाने ‘इन आंखों की मस्ती के दीवाने हजारों हैं...’ सुन लें तो वो हाई कल्चर है।
अगर कोई गऱीब आदमी 1200 का टिकट खरीद कर लाहौर के किसी हॉल में डांसर नरगिस का डांस देख ले तो हमारी तहजीब पर बन आती है, ऐसा वाला सियापा शुरू हो जाता है।
एक समय ऐसा था जब पंजाब के छह जि़लों की पुलिस नरगिस के पीछे पड़ी थी।

भारत और पाकिस्तान की शादियां
भारत और पाकिस्तान में शादियों में आपने आमतौर पर देखा होगा कि पिता, बेटियां और भाभियां एक साथ डांस कर रहे होंगे और बैकग्राउंड में गाना बज रहा होगा, ‘चोली के पीछे क्या है।’
सभी खुश होते हैं और खुश होना भी चाहिए। लेकिन अगर किसी शादी में चमकीला गाए कि ‘साडा पियो गुआच गया तेरी माँ दी तलाशी लेनी।’ तो पहले हमारे कान लाल होते हैं और फिर चमकीला, अमरजोत के ख़ून से धरती लाल हो जाती है।
पाकिस्तान में चमकीले जैसे ग्रामीण कलाकार भी हुए हैं, जिन्हें फिल्म स्टूडियो या रेडियो स्टेशन में प्रवेश की अनुमति नहीं थी।
यह तो शुक्र करो टेप रिकॉर्डर की तकनीक का, जब टेप रिकॉर्डर आए तो उन्होंने अपने दोस्तों के साथ बैठकर गाने लिखे, उन्हें छोटे शहरों में रिकॉर्ड किया और इसी तरह मंसूर मलंगी, अल्हरिता लुहनेवाला आदि कलाकारों के गाने हमारी बसों और ट्रकों पर टेप रिकॉर्डर के साथ पूरे देश में छा गए।
ग्रामीण कल्चर सडक़ के रास्ते शहर पहुंच गया और शहरी लोगों ने भी इसे लोक संस्कृति के रूप में स्वीकार किया। लेकिन कभी-कभी इसकी सफ़ाई की जि़म्मेदारी नहीं छोड़ी।
कई ‘चमकीलियां’ मारी गईं!
इधर पाकिस्तान में भी ''गंदी संस्कृति'' को साफ़ करने के लिए कई 'चमकीलियां' मारी गई हैं। करिश्मा शहज़ादी , रज़ाला, अफसाना और उनके जैसी कई और, जिनके नाम पर न कोई फिल्म बनी और न ही किसी ने टीवी पर ख़बर चलाई। वे तो गंदे गाने भी नहीं गाती थीं, उन पर आरोप यह था कि वे एक औरत हैं और गाना भी गाती हैं। मंगोरा के मुख्य चौराहे पर तालिबान ने गायिका शबाना की गोली मारकर हत्या कर दी थी, साथ ही उनके गानों के टेप और सीडी भी उन पर फेंक दी गई थीं। मंगोरा के उस चौराहे का नाम उसके बाद से ही ख़ूनी चौक पड़ गया था।
पाकिस्तान में गंदे गानों को गाने का सबसे ज़्यादा आरोप पंजाबी सिंगर नसीबो लाल पर लगता है। उन्होंने हज़ारों अच्छे और बुरे गाने गाए।
इस मामले में उनको चमकीले की उस्ताद ही समझिए। उन्होंने कुछ गाने ऐसे भी गाए हैं- ‘नसीब साढ़े लिखे रब्ब ने कच्ची पेंसिल नाला...’ लेकिन लोगों को याद वही रहते हैं , जिन्हें सुना अकेले में जाता है और सबके सामने सिकोड़े जाते हैं नाक-मुंह।
नसीबो लाल अकसर कहती हैं कि गीत लिखने वाले मरद, वाद्य यंत्र बजाने वाले मरद , सुनने वाले भी मरद और गंदी अकेली नसीबो लाल।

हमारे दिलों को ठंडक तब मिली जब पाकिस्तान की बड़ी और सूफी गायिका आबिदा परवीन और नसीबो लाल एक गाने के लिए एक साथ आईं।
आबिदा परवीन का रुतबा इतना ऊंचा है कि पाकिस्तान में लोग उन्हें सूफी पीर मानते हैं। उन्होंने नसीबो लाल के हाथों को चूमा और गले लगा लिया। सबसे अच्छी और सबसे बुरी बहन ने मिलकर ‘तू झूम’ गाना गाया और मेला लूट लिया।
अब बाक़ी जिन्हें एग्रीकल्चर पसंद नहीं है, वे सूखे राशन पर गुज़ारा करें और अगर वे कभी किसी को कुछ गंदा कहते हुए सुनें, तो वे वहाँ से चले जाएँ और घर जाकर ‘इन आंखों की मस्ती के दीवाने हजारों हैं...’ सुन लिया करें।
रब्ब राखा!
(bbc.com/hindi)
ईरानी मजदूर साबिर हका की कविताएं तडि़त-प्रहार की तरह हैं। साबिर का जन्म 1986 में ईरान के करमानशाह में हुआ। अब वह तेहरान में रहते हैं और इमारतों में निर्माण-कार्य के दौरान मज़दूरी करते हैं।
साबिर हका के दो कविता-संग्रह प्रकाशित हैं और ईरान श्रमिक कविता स्पर्धा में प्रथम पुरस्कार पा चुके हैं। लेकिन कविता से पेट नहीं भरता। पैसे कमाने के लिए ईंट-रोड़ा ढोना पड़ता है।
एक इंटरव्यू में साबिर ने कहा था, ‘मैं थका हुआ हूं। बेहद थका हुआ। मैं पैदा होने से पहले से ही थका हुआ हूं। मेरी मां मुझे अपने गर्भ में पालते हुए मज़दूरी करती थी,मैं तब से ही एक मज़दूर हूं। मैं अपनी मां की थकान महसूस कर सकता हूं। उसकी थकान अब भी मेरे जिस्?म में है।’
साबिर बताते हैं कि तेहरान में उनके पास सोने की जगह नहीं और कई-कई रातें वह सडक़ पर भटकते हुए गुज़ार देते हैं। इसी कारण पिछले बारह साल से उन्हें इतनी तसल्ली नहीं मिल पाई है कि वह अपने उपन्यास को पूरा कर सकें।
1. *शहतूत*
क्या आपने कभी शहतूत देखा है,
जहां गिरता है, उतनी जमीन पर
उसके लाल रस का धब्बा पड़ जाता है।
गिरने से ज़्यादा पीड़ादायी कुछ नहीं।
मैंने कितने मज़दूरों को देखा है
इमारतों से गिरते हुए,
गिरकर शहतूत बन जाते हुए।
2. *(ईश्वर)*
(ईश्वर) भी एक मज़दूर है
जरूर वह वेल्डरों का भी वेल्डर होगा।
शाम की रोशनी में
उसकी आंखें अंगारों जैसी लाल होती हैं,
रात उसकी क़मीज़ पर
छेद ही छेद होते हैं।
3. *बंदूक़*
अगर उन्होंने बंदूक़ का आविष्कार न किया होता
तो कितने लोग, दूर से ही,
मारे जाने से बच जाते।
कई सारी चीज़ें आसान हो जातीं।
उन्हें मज़दूरों की ताक़त का अहसास दिलाना भी
कहीं ज़्यादा आसान होता।
4. *मृत्यु का ख़ौफ़*
ताउम्र मैंने इस बात पर भरोसा किया
कि झूठ बोलना ग़लत होता है
ग़लत होता है किसी को परेशान करना
ताउम्र मैं इस बात को स्वीकार किया
कि मौत भी जि़ंदगी का एक हिस्सा है
इसके बाद भी मुझे मृत्यु से डर लगता है
डर लगता है दूसरी दुनिया में भी मजदूर बने रहने से।
5. *कॅरियर का चुनाव*
मैं कभी साधारण बैंक कर्मचारी नहीं बन सकता था
खाने-पीने के सामानों का सेल्समैन भी नहीं
किसी पार्टी का मुखिया भी नहीं
न तो टैक्सी ड्राइवर
प्रचार में लगा मार्केटिंग वाला भी नहीं
मैं बस इतना चाहता था
कि शहर की सबसे ऊंची जगह पर खड़ा होकर
नीचे ठसाठस इमारतों के बीच उस औरत का घर देखूं
जिससे मैं प्यार करता हूं
इसलिए मैं बांधकाम मजदूर बन गया।
6. *मेरे पिता*
अगर अपने पिता के बारे में कुछ कहने की हिम्मत करूं
तो मेरी बात का भरोसा करना,
उनके जीवन ने उन्हें बहुत कम आनंद दिया
वह शख्स अपने परिवार के लिए समर्पित था
परिवार की कमियों को छिपाने के लिए
उसने अपना जीवन कठोर और ख़ुरदुरा बना लिया
और अब
अपनी कविताएं छपवाते हुए
मुझे सिर्फ एक बात का संकोच होता है
कि मेरे पिता पढ़ नहीं सकते।
7. *आस्था*
मेरे पिता मज़दूर थे
आस्था से भरे हुए इंसान
जब भी वह नमाज़ पढ़ते थे
(अल्लाह) उनके हाथों को देख शर्मिंदा हो जाता था।
8. *मृत्यु*
मेरी मां ने कहा
उसने मृत्यु को देख रखा है
उसके बड़ी-बड़ी घनी मूंछें हैं
और उसकी क़द-काठी,जैसे कोई बौराया हुआ इंसान।
उस रात से
मां की मासूमियत को
मैं शक से देखने लगा हूं।
9. *राजनीति*
बड़े-बड़े बदलाव भी
कितनी आसानी से कर दिए जाते हैं।
हाथ-काम करने वाले मज़दूरों को
राजनीतिक कार्यकर्ताओं में बदल देना भी
कितना आसान रहा, है न!
क्रेनें इस बदलाव को उठाती हैं
और सूली तक पहुंचाती हैं।
10. *दोस्ती*
मैं (ईश्वर) का दोस्त नहीं हूं
इसका सिर्फ एक ही कारण है
जिसकी जड़ें बहुत पुराने अतीत में हैं-
जब छह लोगों का हमारा परिवार
एक तंग कमरे में रहता था
और (ईश्वर) के पास बहुत बड़ा मकान था
जिसमें वह अकेले ही रहता था
11. *सरहदें*
जैसे कफऩ ढंक देता है लाश को
बफऱ् भी बहुत सारी चीज़ों को ढंक लेती है।
ढंक लेती है इमारतों के कंकाल को
पेड़ों को, क़ब्रों को सफ़ेद बना देती है
और सिर्फ बर्फ ही है जो
सरहदों को भी सफ़ेद कर सकती है।
12 *घर*
मैं पूरी दुनिया के लिए कह सकता हूं यह शब्द
दुनिया के हर देश के लिए कह सकता हूं
मैं आसमान को भी कह सकता हूं
इस ब्रह्मांड की हरेक चीज़ को भी।
लेकिन तेहरान के इस बिना खिडक़ी वाले किराए के कमरे को
नहीं कह सकता,
मैं इसे घर नहीं कह सकता।
13 *सरकार*
कुछ अरसा हुआ
पुलिस मुझे तलाश रही है
मैंने किसी की हत्या नहीं की
मैंने सरकार के खिलाफ कोई लेख भी नहीं लिखा
सिर्फ तुम जानती हो, मेरी प्रियतमा
कि जनता के लिए कितना त्रासद होगा
अगर सरकार महज़ इस कारण मुझसे डरने लगे
कि मैं एक मज़दूर हूं
अगर मैं क्रांतिकारी या बाग़ी होता
तब क्या करते वे?
फिर भी उस लडक़े के लिए यह दुनिया
कोई बहुत ज़्यादा बदली नहीं है
जो स्कूल की सारी किताबों के पहले पन्ने पर
अपनी तस्वीर छपी देखना चाहता था।
14. *इकलौता डर*
जब मैं मरूंगा
अपने साथ अपनी सारी प्रिय किताबों को ले जाऊंगा
अपनी क़ब्र को भर दूंगा
उन लोगों की तस्वीरों से जिनसे मैंने प्यार किया।
मेर नये घर में कोई जगह नहीं होगी
भविष्य के प्रति डर के लिए।
मैं लेटा रहूंगा। मैं सिगरेट सुलगाऊंगा
और रोऊंगा उन तमाम औरतों को याद कर
जिन्हें मैं गले लगाना चाहता था।
इन सारी प्रसन्नताओं के बीच भी
एक डर बचा रहता है-
कि एक रोज़, भोरे-भोर,
कोई कंधा झिंझोडक़र जगाएगा मुझे और बोलेगा-
‘अबे उठ जा साबिर, काम पे चलना है।’
(फ़ेसबुक से)
गोकुल सोनी
आपने अक्सर सडक़ों पर भिखारियों को भीख मांगते देखा होगा। उनकी फटेहाल गरीबी देखकर कई लोग उन्हें दया की भावना से भीख में पैसे दे देते हैं, लेकिन आप शायद ही जानते होंगे कि इनमें से कई भिखारी ऐसे होते हैं, जो किसी मेहनत करने वाले मजदूर और प्रायवेट नौकरी करने वालों से ज्यादा पैसे कमा लेते हैं। आप ये भी जानते होंगे की दुनिया का सबसे बड़ा भिखारी हमारे भारत में ही रहता है। बताते हैँ उसका नाम भरत है और वह मुंबई में रहता है। खैर, आज मैं आपको हमारे रायपुर में तीस हजार रुपये महीना कमाने वाला एक भिखारी की बात बताने जा रहा हूं।
रायपुर में मेरे एक मित्र की दुकान है जहां मैं हर रोज जाता हूं। एक युवा व्यक्ति जो शरीर से बिल्कुल स्वस्थ है, रोज शाम को उसकी दुकान पर आता है। बिना कुछ बोले वह दुकान की टेबल पर दस-दस रुपये के नोटों को डाल देता है। मित्र उसकी गिनती करता है और उसके बदले एक बड़ी नोट दे दिया करता है। ना ही पैसा देने वाला कुछ बोलता है और ना ही मेरा मित्र कुछ बोलता है। यह सिलसिला काफी दिनों से चल रहा है जिसे मैं देख भी रहा हूं। एक दिन मैंने मित्र से पूछा- ये कौन है और रुपया कहां से लाता है? मित्र ने जब उसके बारे में बताया तो मैं आश्चर्यचकित रह गया। मित्र ने बताया कि यह एक भिखारी है।
दिनभर भीग मांगता है और शाम को सारा चिल्हर नोट यहां लाकर दे देता है। मैं उसके बदले में उसे एक बड़ा नोट दे देता हूं। मित्र ने आगे बताया कि वह रोज पांच से छै सौ रूपये लाता है जो उसके आधे दिन की कमाई होता है। दोपहर से पहले तक की कमाई वह किसी और को देकर उससे भी पाँच सौ रूपये लेता है। यानी एक दिन में वह एक हजार से ग्यारह सौ रुपये तक कमा लेता है। कुल मिलाकर भीख मांग कर वह महीने में तीस हजार रुपये से भी ज्यादा कमा लेता है।
आपको बता दूं बहुत पहले एक ऐसा ही भिखारी हुआ करता था जो बजरंग होटल के पास बैठ कर भीख मांगता था। एक अखबार का बड़ा नामी पत्रकार उस भिखारी से हर महिने पैसे उधार लिया करता था। वेतन मिलने पर पत्रकार महोदय उस भिखारी का उधारी चुका दिया करता था। अब ना तो वह भिखारी दिखाई देता है और ना ही पत्रकार। पत्रकार स्वर्ग सिधार चुके हैं।
जय स्तंभ चौक के पास एक भीख मांगने वाले को मैं देखा हूं। रात में वह रवि भवन के पीछे रोज सिगरेट पीता है। यहां पेन और खिलौने बेचने वाले परिवार के कुछ लोग इसी चौक पर भीख मांगते हैँ।
अपूर्व गर्ग
ये वो आंकड़े हैं जो बताते हैं पूर्व प्रधान मंत्री और बीजेपी के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी बाजपेयी ने कहाँ -कहाँ से चुनाव लड़े ,सांसद बने। इसमें ये भी जोड़ें कि 1957 में अटल जी मथुरा से लड़े और राजा महेंद्र प्रताप सिंह से बुरी तरह पराजित हुए थे।
1957-1962 MP, Balrampur (Lok Sabha constituency) wnd Lok Sabha
1967 MP, Balrampur (Lok Sabha constituency) yth Lok Sabha
1971 MP, Gwalior (Lok Sabha constituency) zth Lok Sabha
1977 MP, New Delhi (Lok Sabha constituency) {th Lok Sabha (yth term)
1980 MP, New Delhi (Lok Sabha constituency) |th Lok Sabha
1991 MP, Lucknow (Lok Sabha constituency) v®th Lok Sabha
1996 MP, Lucknow (Lok Sabha constituency) vvth Lok Sabha
1999 MP, Lucknow (Lok Sabha constituency) vxth Lok Sabha
2004 MP, Lucknow (Lok Sabha constituency) vyth Lok
इसी तरह 1984 में ग्वालियर से लड़े और माधव राव सिंधिया से हारे।
....तो वाजपेयी जी मथुरा, बलरामपुर, ग्वालियर, दिल्ली, लखनऊ से चुनाव लड़े।
हार जीत दोनों हुई।
बीजेपी के ही नहीं प्रतिपक्ष के नेता भी उतना ही सम्मान और मित्रता उनसे रखते।
अटलजी और नरसिम्हा राव की गुरु -शिष्य जोड़ी कौन नहीं जानता?
राजीव गाँधी ने अटल जी को इलाज के लिए जिस तरह मदद करी, अमरीका भेजा और इसे अटलजी ने खुद इंटरव्यू में बताया, राजीव जी को याद किया। ये सब दजऱ् है।
कभी ये सवाल कर ट्रॉल नहीं किया कि मथुरा, बलरामपुर, ग्वालियर, दिल्ली, लखनऊ से जगह बदल-बदल कर क्यों लड़ रहे?
वे स्वस्थ लोकतंत्र की महान परम्पराओं के दिन थे, जहाँ मुद्दे केंद्र में होते।
आज बीजेपी छोडिय़े पत्रकारों का एक हिस्सा चटखारे ले रहा कि राहुल क्यों रायबरेली से? ये लोग राहुल के उठाये मुद्दों पर बात नहीं करते पर पूरा फोकस ...अमेठी ...रायबरेली है।
सुनिए, कभी इतिहास के पन्ने पलटिये और देखिये पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहाँ-कहाँ से चुनाव लड़ा और ये भी देखिएगा उस दौर के उनके प्रतिपक्ष ने, उस दौर के पत्रकारों ने मथुरा, बलरामपुर, ग्वालियर ,दिल्ली ,लखनऊ को नहीं उनकी नीतियों और वक्तव्यों को मुद्दा बनाया। अब तो बालिग़ हो जाइये!
अंकित
लेबर वार्ड के बिस्तर पर पड़ी नीलम को डॉक्टर ने कहा है कि सब कुछ बढिय़ा चल रहा है और आज रात 10 बजे तक तेरा बच्चा इस दुनिया में कदम रखेगा। बीते नौ महीनों से गर्भ में अपने बच्चे को सँभाले हुई नीलम को अब इसी घड़ी का इंतजार है। पर थोड़े समय बाद डॉक्टर नीलम के पास आती है और कहती है- ‘तुम्हारे बच्चे की जान खतरे में है और समय बहुत कम है। ऑपरेशन करना पड़ेगा, नहीं तो बच्चा मर भी सकता है।’ नीलम ऐसा कुछ सुनने के लिए तैयार नहीं थी। थोड़ी देर पहले नीलम का खिलखिलाता चेहरा अब भय की मूरत बन गया है। बीते महीनों में उसने डॉक्टर के कहे अनुसार अपनी देख-रेख में कोई कमी नहीं रखी थी, वह हक्की-बक्की हुई डॉक्टर की इस बात का कारण नहीं समझ पा रही थी।
यह डरावनी घटना अकेली नीलम की कहानी नहीं, बल्कि आज भारत में हर रोज 23000 के करीब औरतों के साथ यही हो रहा है। सिजेरियन ऑपरेशन द्वारा बच्चों को जन्म देने की पीड़ा को महसूस करना इसे ठीक ढंग से जाने बिना संभव नहीं है। पहली बार सुनने में लग सकता है कि यह एक आम सर्जरी की तरह ही है, जो हर रोज होती ही रहती है। पर बात तब विशेष चर्चा का विषय बन जाती है, जब हमें यह पता लगता है कि यह बहुत गैर-जरूरी है और आज अंधा पैसा कमाने का एक जरिया बन चुका है।
सिजेरियन या सी-सेक्शन डिलीवरी क्या है?
जब से मनुष्यता ने आधुनिक युग में कदम रखा है, तब से लेकर आज तक के तकनीकी विकास से इंसान के लिए दुनिया की किसी भी बड़ी बीमारी या शारीरिक परेशानियों से लडऩा कोई बड़ी बात नहीं है। विज्ञान के इसी विकास की देन है यह तकनीक-सी-सेक्शन डिलीवरी। आमतौर पर एक सेहतमंद माँ अपने बच्चे को बिना किसी विशेष डॉक्टरी मदद के जन्म देती है जिसे योनि-प्रसव, क़ुदरती या नॉर्मल डिलीवरी भी कहा जाता है, पर कुछ हालतों में ऐसा भी होता है जब शारीरिक कमजोरी, ख़ून की कमी, इंफे़क्शन के बढऩे या हादसों में जख्मी होने के कारण बच्चे को क़ुदरती तौर से जन्म देने के लिए माँ सक्षम नहीं होती। ऐसी हालत में सी-सेक्शन डिलीवरी की जाती है, जिसमें बच्चेदानी के ऊपरी चमड़ी समेत सात अलग-अलग परतों को चीरकर बच्चे को बाहर निकाला जाता है। यह बात सुनने में जितनी पीड़ादायी है, असल में इससे कई गुणा दर्दनाक है। लेकिन जहाँ ऊपर बताए गए कारणों से तकनीक की कमी के कारण सच में कितनी ही औरतों और बच्चों की मौत हो जाती थी, वहाँ यह तकनीक विज्ञान का एक तोहफा साबित होती है। पर सवाल यह है कि आज इस तकनीक का इस्तेमाल इंसानी भलाई के लिए किस हद तक किया जा रहा है?
आज भारत में हर रोज करीब 23000 बच्चे सिजेरियन के द्वारा पैदा होते हैं। अगर हम इस गिनती को सरकारी अस्पतालों और निजी अस्पताल में हुई डिलीवरियों में बाँट दें तो सरकारी अस्पतालों में होने वाली कुल डिलीवरियों में सिजेरियन डिलीवरी 14त्न है, वहीं निजी अस्पतालों में यह गिनती 54 से 60त्न तक है, यानी निजी अस्पताल में होने वाले हर 100 डिलीवरियों में से लगभग 60 डिलीवरियाँ सिजेरियन द्वारा की जा रही हैं।
राज्य विशेष आँकड़ों के मुताबिक पंजाब के सरकारी और निजी अस्पतालों में यह अनुपात क्रमवार 34त्न और 51त्न है। तेलंगाना के निजी अस्पतालों में हर 100 में से 89 बच्चे सिजेरियन द्वारा पैदा हो रहे हैं और बिहार के सरकारी और निजी अस्पतालों में क्रमवार यह गिनती 6त्न सरकारी अस्पतालों में और 48.8त्न निजी अस्पतालों में होते हैं।
ऊपर दिए गए आँकड़ों से यह बात साफ है कि निजी अस्पतालों में सिजेरियन द्वारा होने वाली डिलीवरियाँ सरकारी अस्पतालों के मुकाबले करीब चार गुना ज़्यादा है। कई राज्यों में तो यह अनुपात 5 से 6 गुना तक हैं, पर इसका मतलब यह भी नहीं है कि सरकारी अस्पतालों की स्थिति बहुत अच्छी है। यहाँ अन्य कारणों से होने वाले ऑपरेशनों को भी टाला जाता है, जिसे लेकर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था आज निंदनीय स्थिति में है, जिस पर विस्तार से चर्चा की ज़रूरत है।
निजी अस्पतालों में बढ़ते सिजेरियन के मामलों का कारण है, इससे होने वाली अपार कमाई। खर्चे के नजरिए से क़ुदरती ढंग से जन्म देने के मुकाबले माँ के परिवार को सिजेरियन से जन्म देने में लगभग 8 से 10 गुना तक ज्यादा खर्च करना पड़ता है। भारत में सिजेरियन आपरेशनों के लिए अस्पताल में दाखिल होने से लेकर छुट्टी मिलने तक आमतौर पर 30 से 50 हज़ार का खर्चा आ जाता है। ज़्यादा महँगे अस्पतालों में तो यह खर्चा और भी बढ़ जाता है और यहाँ तक कि लाखों तक भी पहुँच जाता है। एक तो गैर-जरूरी तौर पर ऑपरेशन किए जाते हैं, साथ ही गैर-जरूरी तौर पर दाखिल रखकर भी लोगों की जेबों पर डाका मारने की कोशिश की जाती है। इस प्रकार ‘डॉक्टरी सेवा’ के नाम पर डकैती की जा रही है।
यही क़ीमत एक सरकारी अस्पताल में भले ही कम है, मगर इन अस्पतालों की स्थिति किसी रिफ्य़ूजी कैंप से भी कहीं बदतर है, जहाँ बेड की कमी के कारण एक बेड पर दो-दो मरीजों को रहना पड़ता है। इसके अलावा अन्य सुविधाओं और स्टॉफ की कमी के कारण स्थिति और गंभीर होती है। इससे एक और बात साफ जाहिर होती है कि लगभग आधे से ज़्यादा ऑपरेशन गैर-जरूरी होते हैं, जहाँ इन मामलों में माँ बच्चे को एक कुदरती और सुरक्षित तरीके से जन्म दे सकती हैं, मगर फिर भी सेहतमंद महिलाओं को इस प्रक्रिया के लिए राजी करने के लिए अस्पताल में काफी नाटक खेला जाता है। यहाँ अस्पताल में दाखिल किसी गर्भवती महिला की डिलीवरी के कुछ घंटे पहले एक सिलसिलेवार ढंग से ऐसा माहौल बनाया जाता है, जिससे वह और उसका परिवार इसके लिए मान जाए। आइए नीलम की कहानी से लेबर रूम में चलते इस ड्रामे को समझने की कोशिश करते हैं-
नीलम के बच्चे के जन्म होने में अभी लगभग 5 से 6 दिन का समय बाकी है, मगर डॉक्टर उसे कहती है, ‘आज रात 10 बजे के करीब तुम्हारा बच्चा इस दुनिया में कदम रखेगा, सब कुछ बढिय़ा चल रहा है।’ रात का समय बीत जाता है, लेकिन नीलम की डिलीवरी नहीं होती। कुछ समय बाद डॉक्टर फिर से आती है और कहती है कि ‘तुम्हारे बच्चे की जान खतरे में है और समय बहुत कम है, ऑपरेशन करना पड़ेगा नहीं तो बच्चा मर भी सकता है।’ इसके लिए वह यह बहाना देती है कि तुम्हारे बच्चे की धडक़न ठीक ढंग से नहीं चल रही (इसके अलावा दूसरे झूठे कारण भी दिए जाते हैं, जैसे गले में प्लेसेंटा फँस गया है, पोजीशन बिगड़ गया है, आदि)। इसी दौरान नीलम को ‘पिटोसिन’ नाम का एक इंजेक्शन लगाया जाता है। यह इंजेक्शन बहुत ही गंभीर स्थिति में लगाया जाता है, जो एक उत्प्रेरक का काम करती है, यह बच्चेदानी की मांसपेशियों को सिकुडऩे पर मजबूर करती है, जिससे एक नावाजिब प्रसव पीड़ा शुरू हो जाती है, जो एक कुदरती प्रसव पीड़ा से कई गुना ज्यादा दर्दनाक होती है। कानूनी तौर पर इस इंजेक्शन के लिए माँ-बाप के हस्ताक्षर की जरूरत होती है, जिसके लिए डॉक्टर एक नया नाटक करते हैं। वह फिर से जिंदगी और मौत का हवाला देकर माँ-बाप को राजी कर लेते हैं। ऐसी स्थिति में अक्सर ही माँ-बाप डॉक्टर पर भरोसा कर यह सोचते हैं कि डॉक्टर ने कहा है तो सही ही कहा होगा। मगर उनके इसी भरोसे का फ़ायदा उठाया जाता है। इसके बाद इस नाटक का अंत हो जाता है और ऑपरेशन थिएटर अपनी तैयारी में जुट जाते हैं। यहाँ से नीलम के परिवार के लिए अगले कुछ घंटो तक जारी रहने वाली बड़े ख़र्चों की लड़ी शुरू हो जाती है।
नीलम की कहानी में उन्नीस-बीस का फर्क जोड़ दें, तो यह आज लगभग हर रोज 23000 औरतों के साथ हो रहा है। सिजेरियन के बाद 90त्न माएँ अपने अगले बच्चों को भी नॉर्मल डिलीवरी से जन्म नहीं दे पाती। ऑपरेशन के बाद शरीर में भारी खून की कमी होती है, जिसे गरीबी के कारण ज्यादातर औरतें पूरा नहीं कर पाती। इसके अलावा गंभीर देखभाल की जरूरत होती है, जिसका खर्चा उठाना एक और विपदा है। गाँव-घरों में जहाँ सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की भारी कमी है, जहाँ औरतों को डिलीवरी के लिए दूर शहर के चक्कर काटने पड़ते हैं, वहाँ वह अक्सर निजी अस्पतालों के इस नाटक और गोरखधंधे फँसकर रह जाती हैं।
मगर यह कहानी सिर्फ लेबर रूम पर ही ख़त्म नहीं हो जाती। आज पूरी दुनिया में जगह -जगह निजी अस्पतालों का एक जाल है। कैंसर जैसी बड़ी बीमारियों के इलाज के लिए कोई आम आदमी सरकारी अस्पतालों से उम्मीद नहीं कर सकता। जहाँ देश की अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था का बखान करने वाले नेता ख़ुद अपने इलाज के लिए विदेशों में शरण लेते है, वहाँ आम लोगों के लिए क्या उम्मीद हो सकती है। मगर आज स्वास्थ्य व्यवस्था के बाजार बन जाने के लिए कौन जिम्मेदार है? आज हम एक ऐसे समाज में जी रहे है, जहाँ किसी भी चीज का उत्पादन मुनाफ़ा कमाने के लिए होता है। उसी तरह विज्ञान की हर बेहतरीन खोज भी मुनाफाखोरों के हत्थे चढक़र मुनाफ़ा कमाने का एक औजार-भर रह जाती है। इसलिए यह तब तक खत्म नहीं हो सकता, जब तक इस मुनाफे के लिए काम करती व्यवस्था की जगह हम ऐसा समाज नहीं बना लेते, जहाँ विज्ञान और उत्पादन लोगों की ज़रूरतों को पूरा करे और जहाँ तमाम सुविधाएँ सभी की पहुँच में हों।
डॉ. अभय शुक्ला
कोविड-19 महामारी के दौरान इलाज के लिए भटकते लाखों भारतीयों को दर्दनाक अनुभवों का सामना करना पड़ा था। इसने हमारे स्वास्थ्य सेवा तंत्र में दो परस्पर सम्बंधित परिवर्तनों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित किया है। एक तो सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करना और दूसरा निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं का नियमन। चूंकि भारत में स्वास्थ्य सेवा का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा निजी क्षेत्र के नियंत्रण में है, इसलिए स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार की कोई भी पहल निजी स्वास्थ्य सेवा को शामिल किए बिना पूरी नहीं हो सकती।
गौरतलब है कि फोर्ब्स द्वारा 2024 में जारी अरबपतियों की सूची में 200 भारतीय शामिल हैं। विनिर्माण (मैन्यूफेक्चरिंग) के बाद, भारत में अरबपतियों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या (36) स्वास्थ्य सेवा (फार्मास्यूटिकल्स सहित) उद्योग से है। और यह संख्या हर साल बढ़ रही है,खासकर कोविड-19 महामारी के दौरान और उसके बाद। भारत में निजी स्वास्थ्य सेवा उद्योग भरपूर मुनाफा कमाता है क्योंकि इसका समुचित नियमन नहीं होता है, और अक्सर मरीज़ों से अनाप-शनाप शुल्क वसूला जाता है।
यह परिदृश्य हाल ही में जन स्वास्थ्य अभियान द्वारा प्रकाशित 18 सूत्री जन स्वास्थ्य घोषणापत्र में शामिल नीतिगत सिफारिशों की प्रासंगिकता को रेखांकित करता है। इसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा, निजी स्वास्थ्य सेवा, औषधि नीति और सबके लिए स्वास्थ्य सेवा के अधिकार सहित विविध विषयों को शामिल किया गया है और परस्पर-सम्बंधित नीतिगत सिफारिशें प्रस्तुत की गई हैं। इस लेख में भारत में निजी स्वास्थ्य सेवा से सम्बंधित कुछ प्रमुख उपायों की संक्षिप्त रूपरेखा दी गई है।
पारदर्शिता और सेवा दरों का मानकीकरण
भारत में निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाता सभी व्यावसायिक सेवाओं में सबसे अनोखे हैं। अनोखापन यह है कि इनकी दरें आम तौर पर सार्वजनिक डोमेन में पारदर्शी रूप से उपलब्ध नहीं होती हैं। ये दरें एक ही प्रक्रिया या उपचार के लिए बहुत अलग-अलग होती हैं - न केवल एक ही क्षेत्र के विभिन्न अस्पतालों में बल्कि एक ही अस्पताल के अंदर विभिन्न रोगियों के लिए भी अलग-अलग हो सकती हैं। चिकित्सा प्रतिष्ठान (केंद्र सरकार) नियम, 2012 के अनुसार सभी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को अपनी दरें प्रदर्शित करना अनिवार्य है और समय-समय पर सरकार द्वारा निर्धारित मानक दरों पर शुल्क लेना भी अनिवार्य है। लेकिन यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन कानूनी प्रावधानों के अधिनियमित होने के 12 साल बाद भी इन्हें अभी तक लागू नहीं किया गया है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से स्वास्थ्य सेवा दरों को कानून के अनुसार मानकीकृत करने का आदेश दिया है। अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य सेवा दरों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए और दरों के मानकीकरण को उचित तरीके से लागू किया जाए। यह तकनीकी रूप से संभव भी है। चूंकि हज़ारों निजी अस्पताल केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना जैसे बड़े सरकारी कार्यक्रमों के तहत सभी सामान्य चिकित्सा प्रक्रियाओं के लिए मानक दरों पर भुगतान स्वीकार करते हैं, इसलिए इन उपायों को कानूनी रूप से लागू करना कोई मुश्किल काम नहीं है। यह चिकित्सा प्रतिष्ठान अधिनियम या राज्य सरकारों द्वारा अपनाए जाने वाले अधिक बेहतर अधिनियमों को लागू करते हुए सुनिश्चित किया जा सकता है।
बेतुके स्वास्थ्य हस्तक्षेपों को रोकने के लिए भी मानक प्रोटोकॉल लागू करना अनिवार्य है। वर्तमान में व्यापारिक उद्देश्यों से ऐसे बेतुके हस्तक्षेपों को व्यापक पैमाने पर प्रचारित किया जाता है। उदाहरण के लिए, भारत में सिज़ेरियन डिलीवरी का अनुपात निजी अस्पतालों (48त्न) में सरकारी अस्पतालों (14त्न) की तुलना में तीन गुना अधिक है। चिकित्सकीय रूप से सीज़ेरियन प्रक्रिया की दर कुल प्रसवों का 10-15त्न अनुशंसित है जबकि निजी अस्पतालों में ये कहीं अधिक होते हैं। उपचार पद्धतियों को तर्कसंगत बनाने और ज़रूरत से ज़्यादा चिकित्सीय प्रक्रियाओं पर अंकुश लगाने से न केवल निजी अस्पतालों द्वारा वसूले जाने वाले भारी-भरकम बिलों में कमी आएगी, बल्कि रोगियों के लिए स्वास्थ्य सेवा परिणामों में भी महत्वपूर्ण सुधार होगा।
रोगियों के अधिकार
रोगियों और अस्पतालों के बीच जानकारी और शक्ति की भारी असमानता होती है। इसे देखते हुए रोगियों की सुरक्षा के लिए कुछ अधिकारों को सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया है। इनमें शामिल हैं: प्रत्येक रोगी को अपने स्वास्थ्य की स्थिति और उपचार की बुनियादी जानकारी प्राप्त करने का अधिकार; चिकित्सा की अपेक्षित लागत तथा उसका मदवार बिल प्राप्त करने का अधिकार; दूसरी राय लेने का अधिकार; पूरी जानकारी के आधार पर सहमति देने का अधिकार; गोपनीयता और औषधियां व नैदानिक परीक्षण के लिए प्रदाता चुनने का अधिकार; और यह सुनिश्चित करना कि कोई भी अस्पताल किसी भी बहाने से रोगी के शव को रोके न रखे।
भारतीय संदर्भ में, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2018 में रोगियों के अधिकारों और जि़म्मेदारियों की एक सूची तैयार की थी।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2019 में इस चार्टर का संक्षिप्त रूप और फिर 2021 में एक समग्र चार्टर सभी राज्य सरकारों को भेजा था जिसमें रोगियों के 20 अधिकारों को शामिल किया गया था। अलबत्ता, अब तक इन अधिकारों पर आधिकारिक स्तर पर कम ही ध्यान दिया गया है। संपूर्ण रोगी अधिकार चार्टर (कुछ अस्पतालों में अपनाया गया कमज़ोर संस्करण नहीं) को देश की सभी स्वास्थ्य संस्थाओं में प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए। इससे रोगियों और उनकी देखभाल करने वालों को अनुकूल वातावरण में स्वास्थ्य सेवा का लाभ मिल सकेगा। ऐसा सुरक्षित माहौल बनाने से रोगियों और प्रदाताओं के बीच आवश्यक विश्वास को फिर से स्थापित करने में मदद मिलेगी।
इसके अलावा, रोगियों की निजी अस्पतालों से सम्बंधित गंभीर शिकायतों के लिए न्याय सुनिश्चित करने में मेडिकल काउंसिल जैसे मौजूदा तंत्र की विफलता को देखते हुए ज़रूरी है कि जिला स्तरीय उपयोगकर्ता-अनुकूल शिकायत निवारण प्रणाली शुरू हो, जिसकी निगरानी विविध हितधारकों द्वारा हो।
कॉलेजों का व्यावसायीकरण
जन स्वास्थ्य अभियान के घोषणापत्र में निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं पर लगाम कसने के साथ-साथ चिकित्सा शिक्षा से सम्बंधित कुछ उपायों का भी उल्लेख किया गया है। इसमें विशेष रूप से व्यावसायिक निजी मेडिकल कॉलेजों को नियंत्रित करने की तत्काल आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनकी फीस सरकारी मेडिकल कॉलेजों से अधिक न हो। इसके अलावा, चिकित्सा शिक्षा का विस्तार व्यावसायिक निजी संस्थानों की बजाय सरकारी कॉलेजों पर आधारित होना चाहिए। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को स्वतंत्र, बहु-हितधारक समीक्षा और सुधार की आवश्यकता है। इस निकाय की आलोचना होती रही है कि इसमें विविध हितधारकों के प्रतिनिधित्व का अभाव है, निर्णय प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत है और चिकित्सा शिक्षा को अधिक व्यावसायिक बनाने का रुझान है।
इसके अलावा, राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (एनईईटी) के पुनर्गठन की भी आवश्यकता है। वर्तमान स्वरूप में यह परीक्षा कमज़ोर वर्ग के उम्मीदवारों के लिए घाटे का सौदा प्रतीत हो रही है और राज्यों से स्वयं की मेडिकल प्रवेश प्रक्रियाओं को निर्धारित करने की स्वायत्तता छीन रही है।
जनहित में निजी स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के इन उपायों को एक लोक-केंद्रित सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा विकसित करने के व्यापक प्रयास के हिस्से के रूप में देखना चाहिए जो सार्वजनिक सेवाओं के सुदृढ़ीकरण और विस्तार पर आधारित हो और ज़रूरत पडऩे पर विनियमित निजी प्रदाताओं को भी शामिल किया जा सकता है। थाईलैंड के स्वास्थ्य सेवा तंत्र जैसे सफल मॉडलों का उदाहरण लेते हुए, भारत में भी मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा तक अधिकार-आधारित पहुंच प्रदान की जानी चाहिए।
आज, सभी राजनीतिक दलों को इन परिवर्तनों को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए, जबकि एक नागरिक होने की हैसियत से हमें दृढ़तापूर्वक इनकी मांग करनी चाहिए। भारत में 2024 का विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाने का यही सबसे उपयुक्त तरीका होगा। (स्रोतफीचर्स)
उत्तर प्रदेश की रायबरेली और अमेठी सीट पर कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों के नाम का एलान शुक्रवार सुबह कर दिया है।
रायबरेली सीट से राहुल गांधी चुनावी मैदान में होंगे। रायबरेली सीट पर नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख आज यानी तीन मई है।
ये पहली बार है, जब राहुल गांधी रायबरेली सीट से चुनावी मैदान में होंगे।
रायबरेली सीट पर बीजेपी ने दिनेश प्रताप सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है।
पिछले लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी ने उन्हें हराया था।
रायबरेली सीट पर साल 2004 से 2024 तक सोनिया गांधी सांसद रही हैं।
इस बार सोनिया गांधी ने रायबरेली से चुनाव नहीं लडऩे का फ़ैसला किया था। सोनिया गांधी अब राज्यसभा सांसद हैं।
अमेठी सीट से केएल शर्मा को उतारे जाने पर प्रियंका क्या बोलीं
वहीं अमेठी की सीट पर कांग्रेस ने किशोरी लाल शर्मा को चुनावी मैदान में उतारा है। अमेठी सीट पर बीजेपी की ओर से स्मृति इरानी मैदान में हैं।
पिछली बार स्मृति इरानी ने राहुल गांधी को अमेठी से हराया था।
कांग्रेस की लिस्ट आने के साथ ही ये स्पष्ट हो गया कि प्रियंका गांधी वाड्रा इस बार चुनावी मैदान में नहीं होंगी।
ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं कि वो इन चुनावों में अमेठी या रायबरेली से लड़ सकती हैं।
प्रियंका गांधी वाड्रा ने अमेठी सीट पर किशोरी लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाए जाने पर सोशल मीडिया पर लिखा, ‘किशोरी लाल शर्मा जी से हमारे परिवार का वर्षों का नाता है। अमेठी, रायबरेली के लोगों की सेवा में वे हमेशा मन-प्राण से लगे रहे। उनका जनसेवा का जज्बा अपने आप में एक मिसाल है।’
प्रियंका ने लिखा, ‘आज खुशी की बात है कि किशोरी लाल जी को कांग्रेस पार्टी ने अमेठी से उम्मीदवार बनाया है। किशोरी लाल जी की निष्ठा और कर्तव्य के प्रति उनका समर्पण अवश्य ही उन्हें इस चुनाव में सफलता दिलाएगा।’
राहुल गांधी और अमेठी सीट
राहुल गांधी अमेठी सीट पर साल 2004 में सांसद चुने गए थे। इसके बाद वो इस सीट से लगातार सांसद चुने जाते रहे थे।
लेकिन 2019 में बीजेपी की स्मृति इरानी ने राहुल गांधी को इस सीट पर हरा दिया था।
हालांकि 2019 लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी केरल की वायनाड सीट से भी चुनाव लड़े थे और वहीं से जीतकर संसद पहुंचे थे।
राहुल गांधी इस बार भी वायनाड सीट से चुनावी मैदान में हैं। इस सीट पर वोट डाले जा चुके हैं।
1999 के बाद यह पहला मौक़ा है, जब गांधी परिवार का कोई सदस्य अमेठी से चुनाव नहीं लड़ रहा है।
साल 1999 में सोनिया गांधी ने अमेठी सीट से ही राजनीति में कदम रखा था।
इसके बाद साल 2004 में सोनिया गांधी रायबरेली सीट से चुनाव लडक़र जीती थीं।
इसी साल राहुल गांधी अमेठी सीट पर सांसद चुने गए थे।
साल 2019 के अलावा अमेठी सीट पर कांग्रेस 1977, 1998 में भी हार चुकी है, तब इस सीट पर उम्मीदवार गांधी परिवार से नहीं थे।
अमेठी सीट का इतिहास
अमेठी और रायबरेली सीट को गांधी परिवार की सीट माना जाता है।
फिऱोज़ गांधी 1952 और 1957 में इस सीट से सांसद चुने गए थे। इंदिरा गांधी 1967 में रायबरेली से लडक़र लोकसभा पहुंची थीं।
रायबरेली सीट पर इंदिरा गांधी 1971 में जीती थीं। हालांकि इमरजेंसी के बाद 1977 में वो इस सीट से हार गई थीं।
1980 में इंदिरा गांधी रायबरेली से फिर चुनाव जीती थीं। लेकिन इन चुनावों में वो आंध्र प्रदेश की मेडक सीट से भी चुनाव जीती थीं।
अमेठी से गांधी परिवार की सियासी शुरुआत 1980 से हुई थी। तब संजय गांधी इस सीट से जीतकर संसद पहुँचे थे।
संजय गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी 1981 में इस सीट से संसद पहुंचे थे। वो अपनी मौत तक इस सीट से सांसद चुने जाते रहे।
हालांकि 1991 से 1999 तक इस सीट पर गांधी परिवार का कोई सदस्य चुनावी मैदान में नहीं रहा।
किशोरी लाल शर्मा कौन हैं?
अमेठी से चुनावी मैदान में उतरे किशोरी लाल शर्मा गांधी परिवार के कऱीबी माने जाते हैं।
कांग्रेस से टिकट मिलने के बाद किशोरी लाल शर्मा ने कहा, ‘मैं खडग़े जी का, राहुल जी का, सोनिया जी और प्रियंका का हृदय से धन्यवाद देता हूं। जिन्होंने मेरे जैसे छोटे कार्यकर्ता को अपनी पारिवारिक सीट की जि़म्मेदारी दी है।’
वो बोले, ‘मैं पूरी कोशिश करूंगा कि मैं मेहनत करूं। मैं 40 साल से यहां की सेवा कर रहा हूं। 1983 में कांग्रेस यूथ कार्यकर्ता के रूप में यहां आया था और लगातार तब से यहां काम कर रहा हूं। मुझे राजीव जी यहां लेकर आए थे और उसके बाद मैं यहीं रह गया।’
वो कहते हैं, ‘हमने सोनिया जी को सारे चुनाव लड़ाए। राजीव जी के 1981 के चुनाव को छोड़ दें तो उनके साथ काम किया।’
राहुल गांधी रण छोडक़र चले गए हैं?
इस सवाल पर उन्होंने कहा- ‘राहुल गांधी रण छोडऩे वाले नहीं है, वो पूरे देश की लड़ाई लड़ रहे हैं।’
वो इस सीट से आज अपना नामांकन दाखिल करेंगे। किशोरी लाल रायबरेली के संसदीय क्षेत्र से सोनिया गांधी के प्रतिनिधि रहे हैं।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि रायबरेली, अमेठी में गांधी परिवार से जुड़े मामलों में किशोरी लाल शर्मा संपर्क सूत्र हैं।
किशोरी लाल शर्मा मूल रूप से पंजाब के हैं। वो 1983 में कांग्रेस कार्यकर्ता के तौर पर अमेठी आए थे।
कहा जाता है कि किशोरी लाल शर्मा राजीव गांधी के करीबी थे।
राजीव गांधी की मौत के बाद वो अमेठी सीट पर कांग्रेस के लिए काम करते रहे। जब गांधी परिवार 1990 के दौर में अमेठी की चुनावी राजनीति से दूर रहा, तब इस सीट पर किशोरी लाल शर्मा सक्रिय रहे थे।
1999 में सोनिया गांधी की पहली चुनावी जीत में किशोरी लाल शर्मा की अहम भूमिका बताई जाती है।(bbc.com/hindi)
कहा जाता है कि स्वस्थ तन में स्वस्थ मन का वास होता है। इसलिए तन-मन को स्वच्छ, स्वस्थ रखना बहुत ही आवश्यक है। इसी तरह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए, शत-प्रतिशत मतदान हो इसके लिए मतदाताओं में मतदान के प्रति जागरूकता होना भी आवश्यक है।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र देश भारत में लोकसभा निर्वाचन 2024 को लेकर भारत निर्वाचन आयोग ने 16 मार्च 2024 को चुनावी तिथियों के घोषणा की और इस तरह देश में आदर्श आचार संहिता प्रभावशील है।
देश के 543 लोकसभा सीटों के लिए 7 चरणों में मतदान होना है। इन 543 सीटों में अनुसूचित जाति के लिए 84, अनुसूचित जनजाति के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं तो 412 सीट अनारक्षित है। इसके साथ ही चार राज्यों अरुणाचल प्रदेश के 60, सिक्किम के 32, आंध्रप्रदेश के 175 एवं ओडिशा के 147 सीटों के लिए विधानसभा चुनाव होंगे।
28 राज्यों के 524 व 8 केंद्र शासित प्रदेशों के 19 सीटों में होने वाले चुनाव को लेकर भारत निर्वाचन आयोग लगातार बैठक, दिशा-निर्देश, प्रशिक्षण, जनजागरूकता, सुरक्षा, साधन-संसाधन आदि पर राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी से सतत समन्वय बनाए हुए हैं। वैसे तो देश के 21 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों की 102 संसदीय सीटों में प्रथम व द्वितीय चरण के मतदान हो चुके हैं।
छत्तीसगढ़ राज्य के बारे में बात करें तो यहां 11 लोकसभा सीट हैं, जिसमें 4 सीट अनुसूचित जनजाति, 1 सीट अनुसूचित जाति व 6 सीट अनारक्षित है। इन 11 लोकसभा सीटों के लिए तीन चरणों में मतदान होना है। पहले चरण में 19 अप्रैल को बस्तर लोकसभा सीट तथा द्वितीय चरण में 26 अप्रैल को राजनांदगांव, महासमुंद एवं कांकेर सीटों के लिए मतदान हो चुके हैं। इन दोनों चरणों के मतदान प्रतिशत को देखें तो बस्तर में 68.31 प्रतिशत, वहीं राजनांदगांव में 77.42 प्रतिशत, कांकेर 76.23 प्रतिशत व महासमुंद लोकसभा सीट में 75.02 प्रतिशत मतदान हुए हैं। इस तरह राज्य में दूसरे चरण का मतदान प्रतिशत 76.24 रहा है। अब 7 मई को होने वाले तृतीय चरण में छत्तीसगढ़ के सरगुजा, रायगढ़, जांजगीर-चाम्पा, कोरबा, बिलासपुर, दुर्ग व रायपुर के अलावा देश के 12 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों के 94 सीटों पर मतदान होगा। चौथे चरण में 10 राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों के 96 सीटों के लिए 13 मई, पांचवां चरण में 8 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेश के 49 सीटों के लिए 20 मई, छठवां चरण में 7 राज्यों के 57 सीटों के लिए 25 मई और सातवां व आखिऱी चरण में 8 राज्यों व केन्द्र शासित राज्यों के 57 सीटों के लिए 1 जून को मतदान होंगे।
हालांकि देश में पहला आम चुनाव अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 के बीच 499 सीटों के लिए कठोर जलवायु और चुनौतीपूर्ण व्यवस्थाओं के कारण 68 चरणों में चुनाव हुआ था। इसके पहले वर्ष 1949 में चुनाव आयोग बनाया गया और वर्ष 1950 में सुकुमार सेन को पहले मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया। उस समय देश की जनसंख्या 36 करोड़ से अधिक थीं और उस आम चुनाव में 17 करोड़ से अधिक मतदाताओ ने भाग लिया यानी 44-45 प्रतिशत के आसपास मतदान हुआ था। उस दौर में शिक्षा, प्रचार-प्रसार और अन्य सुविधाओं का कम होना भी कम मतदान होने का मुख्य कारण था। लेकिन तब से भारत में मतदाताओं की संख्या, मतदान प्रतिशत और मतदान के प्रति जागरूकता लगातार बढ़ी है।
मताधिकार एक मौलिक अधिकार है तो कर्तव्य भी है ऐसे में अपने अधिकार व कर्तव्य को भली-भांति समझते हुए मतदान के लिए पहुंचना आवश्यक है। जब स्वयं मतदान के लिए तैयार होंगे, स्वयं मतदान करने पहुंचेंगे, जब अपने अधिकार को जानेंगे, जब अपने कर्तव्य को समझेंगे व निभाएंगे तो निश्चित ही देश व प्रदेश का विकास तेज गति से आगे बढ़ेगा।
(लेखक : विजय मानिकपुरी, सहायक जनसंपर्क अधिकारी)
-भारत डोगरा
धरती पर करोड़ों वर्षों से लाखों तरह के जीवन रूप फल-फूल रहे हैं। मनुष्य के धरती पर आगमन से पहले भी यहां बहुत जैव-विविधता मौजूद थी। सवाल यह है कि जब किसी भी अन्य ज्ञात ग्रह या उपग्रह पर अभी तक जीवन तक का पता नहीं चल सका है, तो विशेषकर धरती पर ही लाखों तरह के जीवन रूप किस तरह पनप सके?
गौरतलब है कि धरती पर कुछ विशेष तरह की जीवनदायिनी स्थितियां मौजूद हैं व इनकी उपस्थिति के कारण ही धरती पर इतने विविध तरह का जीवन इतने लंबे समय तक पनप सका है। ये जीवनदायिनी क्षमताएं मुख्य रूप से कई स्थितियों से जुड़ी है- वायुमंडल में विभिन्न गैसों की विशेष अनुपात में उपस्थिति, पर्याप्त मात्रा में जल की उपलब्धता, वन व मिट्टी की अनुकूल स्थिति वगैरह।
यह जीवनदायिनी स्थितियां सदा से धरती पर रही तो हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि इनमें कभी कोई बड़ी उथल-पुथल नहीं आ सकती है या इनमें कभी कोई कमी-बेशी नहीं हो सकती है। तकनीकी व औद्योगिक बदलाव के साथ-साथ मनुष्य द्वारा ऐसे अनेक व्यापक बदलाव लाए जा रहे हैं जो इन जीवनदायिनी स्थितियों में बदलाव ला सकते हैं। उदाहरण के लिए, विभिन्न तरह के प्रदूषण के साथ कार्बन डाईऑक्साइड व अन्य ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि से वायुमंडल में मौजूद गैसों का अनुपात बिगड़ सकता है, प्राकृतिक वन बहुत तेजी से लुप्त हो सकते हैं, मिट्टी के मूल चरित्र व प्राकृतिक उपजाऊपन में बड़े बदलाव आ सकते हैं, पानी के भंडार तेजी से कम हो सकते हैं व प्रदूषित हो सकते हैं। यहां तक कि मानव निर्मित विविध कारणों से ऐसा भी हो सकता है कि सूर्य का प्रकाश व ऊष्मा धरती पर सुरक्षित व सही ढंग से न पहुंच सकें।
दो परमाणु बमों का पहला उपयोग हिरोशिमा व नागासाकी (जापान) में वर्ष 1945 में हुआ था। उसके बाद अनेक प्रमुख देशों में परमाणु हथियार बनाने की होड़ लग गई। आज विश्व में लगभग 12,500 परमाणु बम हैं।
किसी परमाणु बम को गिराने पर मुख्य रूप से चार तरह से बहुत भयानक तबाही होती है - आग, अत्यधिक ताप, धमाका व विकिरण का फैलाव। खास तौर से, विकिरण का असर कई पीढिय़ों तक रह सकता है।
यह सब तो केवल एक परमाणु बम गिराने पर भी होता है, पर चूंकि अब विश्व में 12,500 से अधिक परमाणु बम हैं, तो वैज्ञानिक इस पर भी विचार करते रहे हैं कि यदि परमाणु बमों का अधिक व्यापक स्तर पर उपयोग चंद दिनों या घंटों के भीतर हो गया तो क्या परिणाम होगा?
यदि कुल मौजूद 12,500 परमाणु हथियारों में से कभी 10 प्रतिशत का भी उपयोग हुआ तो इसका अर्थ है कि 1250 परमाणु हथियारों का उपयोग होगा व 5 प्रतिशत का उपयोग हुआ तो 625 हथियारों का उपयोग होगा।
यदि 5 से 10 प्रतिशत हथियारों का उपयोग कभी हुआ तो कल्पना की जा सकती है कि आग, ताप, धमाकों व विकिरण का कैसा सैलाब आएगा। इसके अतिरिक्त इतना धूल-धुआं-मलबा वायुमंडल में फैल जाएगा कि सूर्य की किरणें धरती पर भलीभांति प्रवेश नहीं कर पाएंगी। इस कारण खाद्य उत्पादन व अन्य ज़रूरी काम नहीं हो पाएंगे। इस सबका मिला-जुला असर यह होगा कि सभी मनुष्य व अधिकांश अन्य जीव-जंतु, पेड़-पौधे यानी सभी तरह के जीवन-रूप संकटग्रस्त हो जाएंगे।
स्पष्ट है कि कई स्तरों पर मानव के क्रियाकलापों से ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो गई हैं जिनसे धरती की जीवनदायिनी क्षमता बुरी तरह खतरे में पड़ सकती है। यह हमारे समय की सबसे बड़ी समस्या है। इससे पहले कि यह बहुत विध्वंसक व घातक रूप में सामने आए, इस समस्या का समाधान आवश्यक है।
इस समस्या के कई पक्ष हैं और अभी इनके संदर्भ में अलग-अलग प्रयास हो रहे हैं। सबसे अधिक चर्चित वे प्रयास हैं जो जलवायु बदलाव व ग्रीनहाऊस गैसों को नियंत्रित करने के लिए किए जा रहे हैं। इनके बारे में भी वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने कई बार चेतावनी दी है कि ये निर्धारित लक्ष्यों से पीछे छूट रहे हैं। परमाणु हथियारों के खतरों को कम करने के लिए कुछ संधियां व समझौते हुए थे, पर इनमें से कुछ रद्द हो गए हैं व कुछ का नवीनीकरण समय पर नहीं हो सका है।
अब अनेक वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि कृत्रिम बुद्धि (एआई) तकनीकों के सैन्यकरण होने से व अति विनाशक हथियारों में इनका उपयोग होने से खतरे और बढ़ जाएंगे। सबसे अधिक चिंता की बात यह मानी जा रही है कि अंतरिक्ष के सैन्यकरण की ओर भी कदम उठाए जा रहे हैं।
समय रहते धरती की जीवनक्षमता को संकट में डालने वाले सभी कारणों को नियंत्रित करना होगा व इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाकर, विभिन्न देशों को मिलकर कार्य करना होगा।
(स्रोत फीचर्स)
-निखिल ईनामदार
इस साल जनवरी में भयंकर ठंड के बावजूद हजारों लोग दिल्ली के लाल कि़ले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक कार्यक्रम में सुनने के लिए इक_ा हुए थे।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस कार्यक्रम में ‘विकसित भारत 2047’ का संदेश देते हुए देश को 2047 तक विकसित बनाने का वादा किया था।
लुभावने जुमले गढऩे के उस्ताद कहे जाने वाले मोदी का ये सबसे ताजा सूत्रवाक्य है।
वैसे तो ‘विकसित भारत’ एक अनिश्चित संकल्प है। लेकिन, एक दशक पहले सत्ता में आने वाले नरेंद्र मोदी, पिछले दस वर्षों से तेज आर्थिक विकास की बुनियाद रखने की बातें कई बार कह चुके हैं।
प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को विरासत में एक ऐसी अर्थव्यवस्था मिली थी, जो डगमगा रही थी। विकास की रफ्तार सुस्त पड़ रही थी और निवेशकों का भरोसा कमजोर दिख रहा था। भारत के लगभग दर्जन भर अरबपति दिवालिया हो चुके थे और इस वजह से देश के बैंकों में अरबों के ऐसे कर्ज दर्ज थे, जो अदा नहीं किए गए थे। नहीं चुकाए गए इन कर्जों की वजह से बैंकों के पास कारोबारियों को और कर्ज दे पाने की क्षमता बेहद कम हो गई थी।
अब, दस साल बाद भारत की विकास दर दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से कहीं ज़्यादा तेज़ है।
भारत के बैंक मजबूत स्थिति में हैं और बेहद तकलीफदेह महामारी का सामना करने के बावजूद भारत सरकार का खजाना स्थिर है।
पिछले साल ब्रिटेन को पीछे छोड़ते हुए भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया था।
मॉर्गन स्टैनले के विश्लेषकों के मुताबिक- 2027 तक भारत, जापान और जर्मनी को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर बढ़ रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि देश में उम्मीद की एक लहर दिखती है।
भारत ने जी20 शिखर सम्मेलन की कामयाब मेजबानी की। वो चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला दुनिया का पहला देश बन गया और पिछले एक दशक में भारत में दर्जनों यूनिकॉर्न (1 अरब डॉलर से ज़्यादा मूल्य वाली कंपनी) उभरी हैं। हर दिन नई ऊंचाई छू रहे शेयर बाजार की वजह से भारत के मध्यम वर्ग को भी समृद्धि का कुछ हिस्सा हासिल हुआ है।
ऊपरी तौर पर देखें तो ‘मोदीनॉमिक्स’ यानी सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का आर्थिक नजरिया कारगर होता दिखाई दे रहा है। लेकिन, जब आप गहराई से पड़ताल करते हैं तो तस्वीर ज़्यादा पेचीदा नजर आती है।
1।4 अरब आबादी वाले विशाल भारत देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं, जिन्हें आज भी दो वक़्त की रोटी जुटाने के लिए ख़ासी मशक्कत करनी पड़ती है। ऐसे तबके के लिए तरक्की का सुनहरा दौर आना अभी बाकी है।
तो मोदी की आर्थिक नीति से किसको फायदा हुआ है और किसे नुकसान?
डिजिटल क्रांति
नरेंद्र मोदी के डिजिटल प्रशासन पर जोर देने की वजह से भारत के सबसे गरीब तबके के लोगों की जिंदगी में बदलाव आते दिख रहे हैं।
आज भारत के दूर-दराज के किसी कोने में रहने वाले लोग भी रोजमर्रा के बहुत से सामान बिना नकदी के खरीद सकते हैं।
आज देश में बहुत से लोग एक पैकेट ब्रेड या बिस्किट खरीदने के लिए क्यूआर कोड स्कैन करके 10-20 रुपये जैसी मामूली रकम का भुगतान कर सकते हैं।
इस डिजिटल क्रांति की बुनियाद में तीन स्तरों वाले प्रशासन की एक व्यवस्था है। इसमें देश के हर नागरिक के लिए पहचान पत्र, डिजिटल भुगतान और डेटा का एक ऐसा स्तंभ है, जो लोगों को टैक्स रिटर्न जैसी अहम निजी जानकारी चुटकियों में मुहैया करा देता है।
करोड़ों लोगों के बैंक खातों को इस ‘डिजिटल तंत्र’ से जोडऩे की वजह से लालफीता शाही और भ्रष्टाचार को काफ़ी कम किया जा सका है।
डिजिटल प्रशासन की इस व्यवस्था की वजह से आंकलनों के मुताबिक, मार्च 2021 तक भारत की जीडीपी के 1.1 प्रतिशत के बराबर रकम बचाई जा सकी थी। इसके ज़रिए सरकार लोगों को कई तरह की सामाजिक सब्सिडी और आर्थिक सहायता को सीधे उनके खाते में डाल पाती है। इसके अलावा, सरकार को बहुत ज़्यादा वित्तीय घाटा उठाए बगैर मूलभूत ढांचे के निर्माण के मद में ख़र्च करने में भी मदद मिलती है।
हर जगह नजर आती है क्रेन
भारत में आप कहीं पर भी चले जाएं, हर जगह आपको क्रेन और जेसीबी मशीनें चलती दिखाई दे जाएंगी।
ये सब मिलकर भारत के बेहद खराब मूलभूत ढांचे की नई और चमकदार छवि गढ़ रहे हैं।
मिसाल के तौर पर आप भारत के कोलकाता शहर में पानी के भीतर बनी पहली मेट्रो लाइन को ही देख सकते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि भारत की तस्वीर बदल रही है।
नई सडक़ों, हवाई अड्डों, बंदरगाहों और मेट्रो लाइनों का निर्माण नरेंद्र मोदी की आर्थिक नीति की धुरी रहा है। पिछले तीन साल से उनकी सरकार हर साल 100 अरब डॉलर की रक़म मूलभूत ढांचे के विकास में ख़र्च (पूंजीगत व्यय) कर रही है।
2014 से 2024 के बीच भारत में लगभग 54 हज़ार किलोमीटर (33,553 मील) लंबे नेशनल हाइवे बनाए गए हैं। जो इससे पहले के दस वर्षों के दौरान बने राष्ट्रीय राजमार्गों से दोगुना हैं।
मोदी सरकार ने अफसरशाही के कामकाज का भी रवैया बदला है। जबकि इससे पहले दशकों तक नौकरशाही को भारत की अर्थव्यवस्था का सबसे डरावना पहलू कहा जाता था। लेकिन, मोदी सबकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतर सके हैं।
महामारी के दौरान निर्मम लॉकडाउन लगाए गए। 2016 में की गई नोटबंदी का असर अब तक अर्थव्यवस्था पर भारी है।
लंबे समय से लटका हुआ अप्रत्यक्ष कर की व्यवस्था का सुधार यानी गुड्स ऐंड सर्विसेज़ टैक्स लागू तो हुआ, मगर इसे लागू करने में कई खामियां रह गईं। इन सबकी वजह से भारत की अर्थव्यवस्था की बनावट पर दूरगामी असर पड़ा है।
भारत का विशाल असंगठित क्षेत्र- छोटे छोटे कारोबारी, जो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे हैं, वो अब भी इन फ़ैसलों के असर से उबर नहीं सके हैं। वहीं, निजी क्षेत्र बहुत बड़े बड़े निवेश करने से गुरेज कर रहा है।
जीडीपी के अनुपात में देखें तो 2020-21 में निजी निवेश महज़ 19.6 प्रतिशत था। जबकि 2007-08 में जीडीपी के 27.5 फीसद के साथ निजी निवेश अपने शिखर पर रहा था।
रोजगार की चुनौती
इसी साल जनवरी में हजारों नौजवान, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के भर्ती केंद्रों पर जमा हुए थे। वो सब इसराइल के कंस्ट्रक्शन उद्योग में काम पाने की उम्मीद में जुटे थे। बीबीसी संवाददाता अर्चना शुक्ला ने वहां पर कई लोगों से बात की थी।
इन कामगारों की मायूसी से जाहिर होता है कि भारत में रोजग़ार का संकट असल में कितना गहरा है। ये संकट हर जगह उम्मीदों का गला घोंट रहा है।
23 बरस की रुकैया बेपारी कहती हैं, ‘अपने परिवार की मैं पहली सदस्य हूं जिसने पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है। मगर, जहां मैं रहती हूं, वहां कोई काम-धंधा नहीं है तो मैं अब ट्यूशन पढ़ाकर गुजर करती हूं। इसमें बहुत ज्यादा पैसे नहीं मिलते।’
पिछले दो साल से रुकैया और उनके भाई के पास कोई स्थायी रोजगार नहीं है। देश में वो अकेले नहीं हैं।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के ताजा आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2000 में जहां देश के बेरोजगारों में पढ़े लिखे नौजवानों की तादाद 54.2 प्रतिशत थी, वो 2022 में बढक़र 65.7 फ़ीसद पहुंच चुकी है।
जाने-माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज के जुटाए आंकड़ों के मुताबिक, 2014 के बाद से भारत में वास्तविक मजदूरी/तनख्वाह में भी कोई खास बढ़ोत्तरी नहीं देखी गई है।
हाल ही में फाइनेंशियल टाइम्स को दिए गए एक इंटरव्यू में विश्व बैंक के एक अर्थशास्त्री ने कहा था कि भारत के सामने ‘अपनी आबादी की बढ़त (डेमोग्राफिक डिविडेंड) को गंवा देने का ख़तरा’ मंडरा रहा है।
रोजग़ार सृजन एक पहेली रही है, जिसे सुलझा पाने में नरेंद्र मोदी नाकाम रहे हैं।
भारत बन पाया दुनिया का कारखाना?
2014 में अपनी जीत के ठीक बाद प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ के नाम से एक महत्वाकांक्षी अभियान की शुरुआत की थी।
इस अभियान का मकसद भारत को दुनिया के कारखाने में तब्दील करना था।
2020 में उनकी सरकार ने सेमीकंडक्टर बनाने वाली कंपनियों से लेकर मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक्स बनाने वाली कंपनियों तक को 25 अरब डॉलर से सहयोग दिया था ताकि देश की निर्माण क्षमता को बढ़ावा दिया जा सके।
फिर भी कामयाबी हाथ नहीं आई।
हां, एप्पल के लिए आईफोन बनाने वाली फॉक्सकॉन जैसी कुछ कंपनियां ‘चीन प्लन वन’ की अपनी वैश्विक नीति के तहत विविधता लाने के लिए भारत आ रही हैं।
माइक्रॉन और सैमसंग जैसी दूसरी बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भी भारत में निवेश करने को लेकर उत्साहित हैं। लेकिन, अभी निवेश के ये आंकड़े बहुत बड़े नहीं हैं। इन तमाम कोशिशों के बावजूद, पिछले एक दशक के दौरान जीडीपी के प्रतिशत के तौर पर मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी जस की तस बनी हुई है।
निर्यात में बढ़ोतरी
निर्यात में बढ़ोत्तरी भी मोदी से पहले के प्रधानमंत्रियों के राज में बेहतर रही थी।
ग्रेट लेक्स इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के प्रोफ़ेसर विद्या महामबरे कहते हैं, ‘अगर भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की विकास दर 2050 तक भी सालाना 8 प्रतिशत रहती है और चीन 2022 के स्तर पर ही अटका रहता है, तो भी 2050 में भारत का निर्माण क्षेत्र चीन के 2022 के स्तर के बराबर नहीं पहुंच सकेगा।’
बड़े स्तर के उद्योगों की कमी की वजह से भारत की आधी आबादी अभी भी अपनी रोज़ी-रोटी के लिए खेती-बाड़ी के भरोसे है, जो दिन-ब-दिन घाटे का काम बनती जा रही है। इसका सीधा नतीजा क्या हुआ है? भारत में लोगों के घरेलू बजट सिमट रहे हैं।
भारत में कुल निजी खपत के व्यय की विकास दर तीन प्रतिशत ही रही है, जो पिछले बीस सालों में सबसे कम है। ये वो रक़म है जो लोग सामान खऱीदने में ख़र्च करते हैं।
वहीं, परिवारों पर कज़ऱ् का बोझ अपने रिकॉर्ड स्तर पर जा पहुंचा है। इसके उलट, एक नई रिसर्च के मुताबिक़ भारत में परिवारों की वित्तीय बचत अपने सबसे निचले स्तर तक गिर गई है।
बहुत से अर्थशास्त्रियों का कहना है कि महामारी के बाद भारत के आर्थिक विकास का मिज़ाज असमान या ‘्य’ के आकार का रहा है। जिसमें अमीर लोग तो दिनों-दिन और अमीर होते जा रहे हैं। वहीं, गरीब लोग रोजमर्रा की जद्दोजहद के शिकार हैं। भले ही जीडीपी के मामले में भारत, दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। लेकिन, प्रति व्यक्ति के नज़रिए से देखें, तो भारत अब भी 140वीं पायदान पर है।
असमानता
वल्र्ड इनइक्वालिटी डेटाबेस के ताजा रिसर्च के मुताबिक, भारत में असमानता अपने 100 साल के शिखर पर पहुंच चुकी है।
ऐसे में इस बात पर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि हाल के दिनों में चुनाव अभियान की परिचर्चाओं में संपत्ति के वितरण और विरासत के टैक्स के इर्द गिर्द घूमती नजऱ आई है।
हाल ही में भारत के अरबपति कारोबारी मुकेश अंबानी के बेटे की शादी से पहले के तीन दिनों के समारोह के दौरान भारत के इस ‘सुनहरे दौर’ की झलक दिखाई दी थी। इस आयोजन में मार्क जुकरबर्ग, बिल गेट्स और इवांका ट्रंप शामिल हुए थे।
रिहाना ने बॉलीवुड के बड़े-बड़े सितारों के साथ ठुमके लगाए थे।
गोल्डमैन सैक्स में भारत के कंज्यूमर ब्रैंड पर रिसर्च करने वाले अर्नब मित्रा बताते हैं कि आज भारत में लग्जऱी ब्रैंड की कारें, घडिय़ां और महंगी शराब के निर्माताओं का कारोबार, भारत की आम जनता की ज़रूरत की चीज़ें बनाने वाली कंपनियों की तुलना में कहीं ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रहा है।
स्टर्न की न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर विरल आचार्य कहते हैं कि कुछ मु_ी भर विशाल कारोबारी घराने, ‘हजारों छोटी छोटी कंपनियों की कीमत पर’ आगे बढ़े हैं।
विरल आचार्य कहते हैं कि देश के बेहद अमीर लोगों को टैक्स में भारी कटौती और ‘राष्ट्रीय चैंपियन’ तैयार करने की सोची समझी नीति का फायदा मिला है। इस नीति के तहत बंदरगाहों और हवाई अड्डों जैसी बेशकीमती सार्वजनिक संपत्तियों को बनाने या चलाने के लिए कुछ पसंदीदा गिनी चुनी कंपनियों के हवाले कर दिया गया है।
इलेक्टोरल बॉन्ड के आंकड़ों के सार्वजनिकहोने के बाद ये पता चला है कि इनमें से कई कंपनियां सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को चंदा देने में सबसे आगे रही हैं।
क्या ये सच में भारत का दशक है?
कुल मिलाकर ये सब बातें भारत की अर्थव्यवस्था की बेमेल तस्वीर पेश करती हैं। लेकिन, जानकार कहते हैं कि अपनी कई समस्याओं के बावजूद भारत आज तरक्की की उड़ान भरने के लिए तैयार खड़ा है।
मॉर्गन स्टैनले के विश्लेषकों ने एक बहुचर्चित पेपर में लिखा था, ‘भारत का अगला दशक 2007 से 2012 के चीन जैसा (बेहद तेज आर्थिक विकास वाला) हो सकता है।’
इन विश्लेषकों का कहना है कि भारत को कई मामलों में बढ़त हासिल है। भारत के पास युवा आबादी है। उसे चीन से जोखिम कम करने की भू-राजनीति और वहां के रियल एस्टेट सेक्टर में चल रहे सफाई अभियान का फायदा मिल सकता है। इसके अलावा, जानकार कहते हैं कि डिजिटलीकरण, स्वच्छ ईंधन की तरफ तेजी से बढ़ते कदम और दुनिया भर में कारोबार की ऑफशोरिंग जैसे अन्य पहलू भी भारत के आर्थिक विकास को रफ्तार दे सकते हैं।
मूलभूत ढांचे के विकास पर जोर भी एक ऐसा पहलू है, जिसके दूरगामी फायदे होते हैं। क्राइसिल के भारत के अर्थशास्त्री डीके जोशी कहते हैं कि सडक़ों, बिजली की आपूर्ति और बंदरगाहों में जहाजों पर सामान लादने उतारने के वक्त में सुधार करके भारत आखिरकार ‘एक ऐसा माहौल तैयार कर रहा है, जहां मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर फल-फूल सकता है।’ लेकिन, भारत के रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन कहते हैं कि इस ‘भौतिक पूंजी’ पर जोर देने के साथ साथ नरेंद्र मोदी को ‘मानवीय पूंजी’ के निर्माण पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है।
आज भारत के बच्चे उतनी अच्छी पढ़ाई नहीं कर रहे हैं, जितनी उन्हें करनी चाहिए ताकि वो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया का सामना करने के लिए तैयार हो सकें।
प्रथम फाउंडेशन की प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 14 से 18 साल की उम्र वाले एक चौथाई बच्चे साधारण से लिखे हुए वाक्य भी बिना अटके पढ़ नहीं सकते हैं।
कोविड-19 की वजह से छात्रों की पढ़ाई को तगड़ा झटका लगा था, क्योंकि वो लगभग दो साल तक पढऩे के लिए स्कूल नहीं जा सके थे। लेकिन, सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश को नहीं बढ़ाया है।
ऐसा लगता है कि अपने पहले दशक में मोदी की अर्थनीति केवल गिने चुने लोगों के लिए ही फ़ायदेमंद साबित हुई है। वहीं, देश की ज़्यादातर आबादी के लिए ऐसा लगता है कि ख्वाब अभी भी अधूरे ही हैं।(bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के. पालीवाल
जैसे-जैसे हमारे देश में सरकार का धार्मिक स्वरूप सामने आ रहा है वैसे वैसे कुछ इस्लाम बहुल देशों में भारत सरकार के प्रति मित्रता के भाव कम होते जा रहे हैं। ताजा मामला छोटे से देश मालदीव का है जहां पिछले एक साल से भारत विरोधी माहौल मुखर होता जा रहा है जिसकी परिणति मालदीव द्वारा अपनी जमीन से भारतीय सैनिकों की वापसी की चेतावनी के रुप में भी सामने आ चुकी है। कुछ समय पहले तक मालदीव से भारत के संबंध सामान्य थे। पर्यटन के क्षेत्र मे अच्छी कमाई करने वाले मालदीव की अर्थ व्यवस्था में भारतीय पर्यटकों का भी अच्छा खासा योगदान रहता है। दोनों देशों के रिश्तों में तनातनी के मद्देनजर भारतीय पर्यटकों का मालदीव घूमना भी अब पहले जैसा सहज नहीं रहेगा क्योंकि भारत विरोधी माहौल मे अधिसंख्य भारतीय पर्यटक सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे।
मालदीव में जिस तरह से वहां की सरकार भारत विरोधी वातावरण निर्मित कर रही है उसके जवाब में हमारे लिए भी यह जरूरी हो जाता है कि हम भारतीय भी पर्यटन के सहारे चल रही मालदीव की अर्थ व्यवस्था को झटका देने के लिए स्थिति सामान्य होने तक मालदीव में भ्रमण बंद कर दें। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार अपनी तरफ से द्विपक्षीय रिश्तों की बेहतरी के लिए काम करती है लेकिन नागरिकों का भी यह राष्ट्रीय कर्तव्य है कि वे भी ऐसा हर संभव कदम उठाएं जो राष्ट्र हित में है। मालदीव इतना छोटा देश है कि वह अपने बूते अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में खड़ा नहीं हो सकता।इसी वजह से भारत से दूर होकर वह चीन से नजदीकियां बढ़ा रहा है। विगत में पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल में भी इसी तरह के भारत विरोधी और चीन समर्थक झुकाव सामने आए हैं। इस लिहाज से चीनी सामान की खरीदारी बंद करना उससे भी जरूरी है। महात्मा गांधी ने खादी से ही ब्रिटिश के कपड़ा उद्योग की लूट को बंद कर उनकी आर्थिक रीढ़ तोड़ी थी। हमे यह भी ध्यान रखना है कि ऐसा करते समय हमे सामने वाले के लिए दुर्भावना या दुश्मनी का भाव नहीं रखना है केवल अपने हित साधन हेतु इस तरह के निर्णय करने हैं ताकि परिस्थितियां अनुकूल होने पर फिर से पहले जैसा सहज वातावरण और आत्मीय संबंध स्थापित करने के लिए कोई दिक्कत न हो।
मालदीव आबादी के हिसाब से भले ही बहुत छोटा देश है लेकिन अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण उसका सामरिक महत्व काफी है। यही कारण है कि भारत को दबाव में लाने के लिए चीन की बाज नजऱ मालदीव पर उसी तरह है जैसे वह पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए विगत काफी समय से रखता रहा है। पिछले साल भारत का विरोध और चीन का समर्थन करने वाले पीपल्स नेशनल कांग्रेस के नेता मुहम्मद मुइज्जू ने राष्ट्रपति चुनाव जीतकर भारत के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां पैदा कर दी थी। गनीमत यह थी कि मालदीव की संसद में उनकी विरोधी पार्टी का बहुमत होने से राष्ट्रपति की स्थिति ज्यादा मजबूत नहीं थी। हाल ही में मालदीव में हुए संसदीय चुनावों में भी मुहम्मद मुइज्जु की पार्टी को अच्छा खासा बहुमत मिल गया है। निकट भविष्य में मालदीव की सरकार के चीन की तरफ झुकाव और भारत से और ज्यादा दूरी पर जाने की प्रबल संभावना है। हमारे देश के लिए इस संकट के समाधान के लिए वेट एंड वाच का ही विकल्प बचा है। ज्यादा दारोमदार मालदीव के अगले कदम से ही तय होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि मालदीव की सरकार कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगी जिससे भारत के साथ सर्द हुए मालदीव के रिश्ते और ठंडे होकर बर्फ की तरह न जम जाएं जिन्हें सामान्य करने में उच्च तापमान की जरूरत महसूस हो।
पायल भुयन-सेराज अली
युवा, गऱीब, महिला और किसान... प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन चारों को देश की सबसे बड़ी जाति और स्तम्भ बता चुके हैं। लोकसभा चुनाव में बीजेपी के घोषणापत्र पर भी इन चारों के सशक्तीकरण पर खासा जोर था।
पिछले कुछ सालों में युवा, गरीब, महिला और किसान को ध्यान में रखते हुए की तरह की योजनाओं लाई गईं और एक ऐसा ‘क्लास’ तैयार हुआ है जिसे ‘लाभार्थी क्लास’ कहा जा सकता है।
ये ‘लाभार्थी क्लास’ जाति, धर्म और लिंग के दायरे से अलग सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से तैयार हुआ है।
ऐसे में आखिर सरकारी योजनाओं के ये लाभार्थी कौन हैं? क्या सोचकर वोट करते हैं?
बीबीसी ने यही जानने के लिए दो राज्यों झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ लाभार्थियों से बात की है, साथ ही चुनाव विश्लेषकों से भी उनका नजरिया जाना है।
इस रिपोर्ट के लिए हमने तीन महिलाओं की जि़ंदगी को कऱीब से देखा है। झारखंड के गोड्डा जि़ले में रहने वाली फुदिया देवी, काजोरी और उत्तर प्रदेश के बांदा की रहने वाली सुकुरतिन प्रजापति।
तीन महिलाएं, कहानी अलग-अलग
सुकुरतिन प्रजापति पहले मजदूरी करती थीं फिर गांव के एक स्कूल में खाना बनाने लगीं। उनके पति की मौत हो चुकी है। उनके छह बच्चे हैं। वो कहती हैं कि उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिला है। इन योजनाओं से उन्हें आवास, गैस, शौचालय, आधार कार्ड, पहचान पत्र मिला है। राशन और विधवा पेंशन मिलता है। सुकुरतिन के पास स्मार्ट कार्ड और आयुष्मान कार्ड भी है।
सरकारी योजनाओं का लाभ झारखंड की फुदिया देवी को भी मिला है। वो सरकारी योजनाओं से खुश नजर आती हैं, फुदिया देवी कहती हैं कि गैस नहीं होता तो उन्हें चूल्हे पर खाना बनाना पड़ता।
लेकिन झारखंड की ही रहने वाली काजोरी देवी की कहानी ऐसी नहीं है। वो कहती हैं कि किसी योजना से उन्हें कुछ नहीं मिला। वो कहती हैं कि गैस, पेंशन या राशन उन्हें कुछ भी नहीं मिला। फुदिया देवी और सुकुरतिन योजनाओं का लाभ पा कर सरकार से खुश हैं जबकि काजोरी खुश नहीं दिखाई देतीं।
अलग-अलग राज्यों में अलग हालात?
सुकुरतिन प्रजापति उत्तर प्रदेश की रहने वाली हैं, जो बीजेपी शासित राज्य है जबकि फुदिया देवी और काजोरी झारखंड की रहने वाली है जो गैर बीजेपी शासित राज्य है।
लाभार्थी योजनाओं के आंकड़ों पर नजर डाले तो पाते हैं कि मोदी सरकार की कई योजनाएं ग़ैर-बीजेपी शासित राज्यों ने नहीं अपनाई। मसलन आयुष्मान योजना।
कई योजनाएं ग़ैर बीजेपी शासित राज्य अपने यहां दूसरे नाम से पहले से ही चला रहे हैं और मानते हैं कि उनकी योजनाएं केंद्र की मोदी सरकार की योजनाओं से बेहतर हैं।
कई ग़ैर बीजेपी शासित राज्यों पर आरोप भी लगाते हैं कि मोदी सरकार केंद्रीय योजनाओं के लिए उचित फ़ंड नहीं देती है।
जानकार क्या कहते हैं?
आईआईटी दिल्ली में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर रितिका खेड़ा ने लाभार्थी योजनाओं के फ़ंडिंग पर काफी शोध किया है। आंकड़ों के आधार पर वो कहती हैं कि बीजेपी ने यूपीए सरकार के मुक़ाबले लाभार्थी योजनाओं पर पूरी जीडीपी का कम हिस्सा ख़र्च किया है।
वो कहती हैं, ‘लाभार्थी योजनाओं पर सरकार के ख़र्चे की बात करें तो यूपीए-1 में इसमें काफी बढ़त देखने को मिलती है, उसके बाद से लेकर वो आज तक घटता ही जा रहा है, अगर हम जीडीपी के प्रतिशत में ख़र्च को मापें तो कोविड के पहले साल में मोदी सरकार ने जीडीपी का तीन प्रतिशत लाभार्थी योजनाओं पर ख़र्च किया था, वो एक अपवाद है।’
हालांकि, कुछ जानकार इस पर तर्क ये देते हैं कि अगर देश की जीडीपी बढ़ रही है तो लाभार्थी योजनाओं पर लोगों की निर्भरता कम होती है, इसलिए खर्च नहीं बढऩा कोई ग़लत बात नहीं है। लेकिन रितिका का कहना है, ‘लाभार्थी योजनाओं को देखने का सही तरीका नहीं है खासतौर पर तब जब, नोटबंदी, जीएसटी और कोविड जैसे तीन झटकों को झेल कर अर्थव्यवस्था बाहर निकली हो।’
हालांकि, लाभार्थी योजनाओं का लाभ पाने वालों से मिलकर इस कहानी की सभी परतें नहीं खुलतीं। मसलन मोदी सरकार के पहले भी ऐसी योजनाएं थी। लोगों तक लाभ भी पहुंचा था तो फिर इस ‘लाभार्थी क्लास’ के बारे में चर्चा अभी क्यों?
‘लाभार्थी क्लास’ पर अभी चर्चा क्यों?
इस पर सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के राहुल वर्मा कहते हैं, ‘कुछ बदलाव हुए हैं। पहला बदलाव तो ये है कि पिछले दस सालों में टेक्नोलॉजी की वजह से योजनाओं को लोगों तक पहुंचाना ज़्यादा आसान हो गया है। दूसरा कि अब आप सीधे पैसे भेज सकते हैं उससे भ्रष्टाचार कम हुआ है। तीसरा, टेक्नोलॉजी ने मार्केट करने का भी ज़्यादा स्कोप दिया है।’
राहुल जो कह रहे हैं उसका असर लाभार्थियों के जीवन में भी देखा जा सकता है। काजोरी देवी भी इससे सहमत हैं। वो कहती हैं, ‘अब अच्छा है कि खाता में पैसा आता है। जब मन करे तब निकालो, जब मन नहीं तो नहीं निकालो। पहले हाथ में देते थे तो ख़र्च हो जाता था।’
भारत के जाने माने राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर भारत के नए ‘लाभार्थी क्लास’ को योजनाओं के नामकरण की स्टाइल से भी जोड़ते हैं।
वो कहते हैं, ‘कई सारी स्कीमें जो सरकार के अलग-अलग विभाग अलग-अलग नामों से चलाते थे। उनकी रीपैकेजिंग करके या कुछ नई योजनाएं भी शुरू की गई है। इनका सीधा लाभ लाभार्थियों तक पहुंचाया जा रहा है। क्योंकि ये सीधे प्रधानमंत्री की ओर से चलाई जा रही हैं। यही वजह है कि हर स्कीम का नाम है, प्रधानमंत्री रोजगार योजना, प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना आदि।’
लेकिन प्रशांत किशोर की इस बात पर बीजेपी के बांदा के विधायक प्रकाश द्विवेदी अलग तर्क देते हैं। वो कहते हैं कि पुरानी सरकारों की तरह योजनाओं को किसी ख़ास नाम से नहीं चलाया जा रहा है।
प्रकाश द्विवेदी कहते हैं, ‘जैसे पीएम आवास योजना है तो उन्होंने मोदी आवास योजना या नरेंद्र आवास योजना नहीं रखा है ना। इससे पहले इंदिरा आवास योजना होती थी। जवाहर रोजग़ार योजना होती थी। प्रधानमंत्री व्यक्ति नहीं है, पद है।’
झारखंड के कांग्रेस के विधायक और कृषि मंत्री बादल पत्रलेख मानते है कि योजनाएं उनके पास भी थीं, लेकिन मोदी सरकार ने अलग नैरेटिव ही सेट किया।
बादल पत्रलेख कहते हैं, ‘पहले एक रुपया किलो मिलता था, अब आप उसे फ्री दे रहे हैं। 30 रुपये किलो में आप एक ही रुपया ना मुफ़्त किए। 29 रुपये वाले का कोई नाम नहीं हो रहा है। और एक रुपये वाला मैदान मार के चला जा रहा है।’
कांग्रेस के विधायक जिस योजना का जिक्र कर रहे थे, वो है मोदी सरकार की सबसे चर्चित मुफ़्त राशन लाभार्थी योजना।
इस योजना को मोदी सरकार ने कोविड महामारी के समय जून 2020 में शुरू किया गया था जो अब दिसंबर 2028 तक चलेगी।
मोदी सरकार का दावा है कि अकेले मुफ्त राशन योजना का लाभ आने वाले पांच सालों में तकरीबन 80 करोड़ लोगों को मिलेगा।
पीएम आवास योजना (ग्रामीण) का मक़सद है ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब लोगों को आवास दिलवाना।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, सरकार द्वारा कुल 2,94,77835 ( करीब तीन करोड़) घर स्वीकृत किए गए थे। उनमें से 2,59,58739 (करीब दो करोड़ साठ लाख ) पूरे हो चुके हैं।
साल 2016 में शुरू हुई उज्ज्वला योजना के तहत ग्रामीण इलाकों में एलपीजी सिलिंडर देने की शुरुआत हुई, भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक अक्टूबर, 2023 तक 9।67 करोड़ एलपीजी सिलिंडर लोगों को दिए गए।
पीएम किसान योजना के माध्यम से सरकार किसानों को प्रति वर्ष 6000 रुपये तक देती है।
साल 2018-2019 में जब यह योजना शुरू हुई तीन करोड़ से अधिक लोगों तक पहुँची और इसके बाद यह संख्या बढ़ती गई।
‘जाति और वर्ग की लड़ाई हो गई है धुंधली’
लाभार्थी योजनाओं की ज़मीनी हक़ीक़त को लेकर विपक्षी पार्टियां सवाल उठाती रही हैं।
विश्लेषकों की एक राय के मुताबिक, भारत की चुनावी राजनीति की एक सच्चाई ये भी है कि जाति और वर्ग की लड़ाई को इन योजनाओं ने धुंधला कर दिया है।
लेकिन इसके बाद भी पार्टी की उम्मीदवारों की सूची जाति और वर्ग के समीकरण से बाहर क्यों नहीं आ पा रही है।
सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) के संजय कुमार कहते हैं, ‘चुनाव में टिकट देने की जो सबसे अहम मापदंड है, वो है कि उम्मीदवार में चुनाव जीतने की क्षमता होनी चाहिए। जाति की इसमें अहम भूमिका होती है, इसमें पैसों और संसाधनों का भी अपना महत्व होता है।’
सवाल ये भी उठता है कि क्या योजनाओं के लाभार्थियों को मोदी सरकार वोट बैंक में तब्दील कर पा रही है। सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ ने लोकसभा चुनाव से पहले एक सर्वे किया। इस सर्वे में दिलचस्प आंकड़े निकल कर सामने आए हैं।
संजय कुमार कहते हैं, ‘हमारे सर्वे से पता चलता है कि बीजेपी को इस बार 40 फीसदी वोट मिलने का अनुमान है और गरीब और निम्न वर्ग के बीच उनका सपोर्ट 39-39 फ़ीसदी है। 2019 की बात करें तो पहले अमीरों और मध्यम वर्ग में उनका जनाधार कहीं ज़्यादा था और गरीबों से अंतर बहुत ज़्यादा होता था। लाभार्थी क्लास ने ये अंतर पाट दिया है।’
आखिर में जब हमने फुदिया देवी, काजोरी और सुकुरतिन प्रजापति से पूछा कि वो क्या सोचकर वोट देंगी।
फुदिया और सुकुरतिन कहती हैं कि जिस सरकार ने उन्हें योजनाओं का लाभ दिया है वो वोट उसी को देंगी। वहीं काजोरी कहती हैं, ‘जब हमें घर मिलेगा, पेंशन मिलेगा तभी वोट दूंगी, नहीं तो नहीं दूंगी।’(bbc.com/hindi)
(झारखंड से स्थानीय पत्रकार प्रवीण तिवारी और उत्तर प्रदेश से स्थानीय पत्रकार पंकज द्विवेदी के इनपुट समेत)
-डॉ. आर.के. पालीवाल
लोकतंत्र में सत्ताधारी दल हमेशा असली मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश करता है ताकि अपने खिलाफ एंटी इनकंबेंसी फैक्टर का प्रभाव कम कर सके। दूसरी तरफ सत्ता पाने के लिए विपक्षी दलों की कोशिश रहती है कि जनता को हर दिन होने वाली परेशानियों को जनता के बीच रखकर मतदाताओं को सत्ताधारी दल से दूर कर अपनी तरफ आकर्षित करे। एक शिक्षित,समृद्ध और जागरूक लोकतंत्र में यह आदर्श संभव है लेकिन हमारे देश में अधिकांश मतदाता अपने मताधिकार की सही अहमियत नहीं समझते।
ज्यादातर मतदाता धर्म और जातिगत भावनाओं के आवेग में बहक जाते हैं या फिर अपने थोड़े से आर्थिक लाभ के लिए किसी भी दल या प्रत्याशी को अपना मत दे देते हैं। आम भारतीय मतदाता के लिए लोकतांत्रिक मूल्य, विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी, नागरिक की गरिमा, धर्मनिरपेक्षता, जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता आदि मुद्दे मायने ही नहीं रखते। यही कारण है कि राजनीतिक दल भी इन असली मुद्दों के प्रति घोर उदासीनता बरतते हैं और आम मतदाताओं को चमकीले हवाई मुद्दों में उलझाने में ज्यादा ऊर्जा और समय देते हैं।
आम मतदाताओं के लिए लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों द्वारा शासित दो प्रदेशों दिल्ली और झारखंड के मुख्यमंत्रियों अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी और दूसरी तरफ जिन लोगों पर भ्रष्टाचार के बड़े आरोप लगे थे उनके सत्ताधारी भाजपा से गठबंधन के बाद उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर विभूषित करने का भी कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ा। किसी परिपक्व लोकतन्त्र में सत्ता का ऐसा दोहरा मापदंड मतदाताओं के लिए पचाना आसान नहीं होता लेकिन हमारे देश में आज़ादी के पचहत्तर साल बाद भी मतदाताओं की जागरूकता और नैतिकता का स्तर इतना ऊंचा नहीं उठ सका। यही कारण है कि राजनीतिक दल धन, गुंडई और धर्म और जाति के समीकरण से चुनाव जीतने की क्षमता रखने वाले माफियाओं और भ्रष्टाचारियों को टिकट देने में कोई संकोच नहीं करते।
ऐसा लगता है कि 2024 के वर्तमान लोकसभा चुनाव में हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती के बाद स्टेट बैंक आफ इंडिया द्वारा जारी की गई इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी भी कोई बड़ा मुद्दा नहीं बनी, जिसमें विभिन्न जांच एजेंसियों के छापों के बाद आपराधिक मामलों मे फंसी दागदार कंपनियों और केंद्र और राज्य सरकारों से बड़े टेंडर पाई कंपनियों से आया मोटा चंदा इस बात का संकेत है कि अपराधों के प्रति नरमी की उम्मीद और बड़े टेंडर की पृष्ठभूमि में दिया गया मोटा चंदा भ्रष्टाचार के दायरे में आता है। हालांकि आम मतदाताओं तक या तो इस तरह के आर्थिक हथकंडों की पूरी जानकारी नही पहुंच पाती या यह उनकी समझ के दायरे में नहीं आता ताकि चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सके। जो प्रबुद्ध नागरिक मनी लांड्रिंग को ठीक से समझते हैं उनकी संख्या कुल मतदाताओं की संख्या मे नगण्य है। प्रबुद्ध वर्ग की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह बाकी समाज को इन गंभीर मुद्दों पर उद्वेलित करे लेकिन वह अपने अपने ड्राइंग रूम तक सिमट कर रह गया।
चुनावी भाषणों में जिस तरह से विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा राम मंदिर निर्माण मुद्दा, जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने , हिंदू मुस्लिम तुष्टिकरण, फ्री राशन, बिजली और भत्ते आदि की रेवडिय़ां बांटने और अपनी सरकार और अपने घोषणापत्र को सर्वोत्तम और दूसरे दलों की सरकारों और घोषणा पत्रों को झूठ का पुलिंदा बताने पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है उस तरह से किसान आंदोलन,मणिपुर की हिंसा , जांच एजेंसियों की निष्पक्षता, सरकारी कर्मचारियों की कार्य कुशलता और नागरिकों से व्यवहार, जलवायु परिवर्तन के खतरों के परिपेक्ष्य में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, बेरोजगारों के लिए रोड मैप आदि ठोस मुद्दे चुनावी भाषणों में नहीं के बराबर हैं। इस दृष्टि से 2024 का लोकसभा चुनाव भी पुराने चुनावों से बहुत अलग नहीं दिखता।
-सुदीप्ति
प्रज्वल रेवन्ना के नाम पर मेन स्ट्रीम मीडिया में सन्नाटा है। अभी तक आपको पता चल ही गया होगा कि यह कोई सामान्य सी बात नहीं है। जेडीएस का एम पी, देश के पूर्व प्रधानमंत्री का पोता और वर्तमान सत्ताधारी पार्टी से जुड़ा नेता जो हज़ारों महिलाओं का न सिर्फ शोषण करता है बल्कि उस शोषण और हिंसा से भरे वीडियो का कारोबार चलाता है। चुनाव के दिनों में ऐसी बातों पर भूचाल आ जाना चाहिए पर सन्नाटा सा ही पसरा है।
इस मुद्दे पर किसी ने एक बात कहीं जो इस प्रकार थी-‘इस केस की एक पीडि़ता जेडीएस की महिला नेता के पास शिकायत लेकर जाती है, वह नेता रोने लगती है और कहती है कि मैं भी पीडि़त हूँ। वे दोनों साथ में पुलिस स्टेशन जाते हैं, महिला पुलिसकर्मी रोने लगती है और कहती है कि वह भी पीडि़त है। वे सब एक टीवी न्यूज़ चैनल पर जाते हैं। एंकर रोने लगती है और कहती है कि वह भी पीडि़त है।’
मुझे लगा कौन असंवेदनशील है जो ऐसे मुद्दे पर जोक बना रहा है। पर नहीं! यह हुआ है। घटिया मज़ाक जैसी यह बात वास्तविकता है। बेटी बचाओ के दौर में यह कमज़ोर के साथ एमपावर्ड स्त्रियों के साथ घटित घटनाएं हैं।
इस वक्त जो भी कहे कि सभी राजनीतिक दलों में ऐसे लोग होते हैं और राजनीति ही कीचड़ है। उसकी बातों में मत आइए। यह राजनीति नहीं अपराध है। अपराध और राजनीति की सांठगांठ खूब है पर ऐसा हो जाने पर सीनाजोरी के साथ उसे ढांकना अब होने लगा है।
उन स्त्रियों की सोचिए जिन सबकी पहचान पूरे राज्य में उजागर हो चुकी है। कई लोग लिख रहे हैं कि उन वीडिओज़ में भयानक हिंसा है। ऐसा कि जानकारी या खबर के लिए भी देखा नहीं जाता है। आई ए एस अफसर से लेकर कारपोरेट दुनिया की महिलाएं हैं। क्या देश की आम महिलाएं इतनी कमजोर हो चुकी हैं। लडऩे से पहले हिम्मत हार चुकी हैं
उन औरतों की सोचिए जिनको एक्सप्लोइट भी किया गया और पहचान सामने आने के बाद भी उन्हें प्रताडऩा झेलनी पड़ेगी।
इस मुद्दे पर सबसे अधिक त्रासद स्त्रियों का शोषण नहीं है, शोषण के बाद की चुप्पी है। हाल में कितनी प्रोपेगैंडा फिल्में बनी हैं जो धार्मिक आधार पर लड़कियों/स्त्रियों का शोषण दिखा रही हैं और लोग उनपर हत्थे से उखड़ रहे हैं। शोषण की फिल्मी कहानी पर भी उबलने वाला समाज असली शोषण पर इतना मूक कैसे है? इसमें धर्म का एंगल नहीं है इसीलिए? स्त्री कभी चुनावी ताकत या मुद्दा नहीं रही है। वे वोट का अधिकार रखते हुए भी बराबर की नागरिक बनती नहीं हैं इसीलिए चुनाव के समय भी उनके शोषण के मुद्दे को यूँ दबाया जा सकता है।
यूँ तो खीझ, आक्रोश, दुख और निराशा में जाने कितनी बातें दिमाग में घुमड़ रही है। पर फिलहाल इसी पर सोचिए कि बहू-बेटी-मां आदि की इज्ज़त की दुहाई देते समाज में ऐसी घटनाएं खून खौलाने वाली, सजा दिलवाने को कटिबद्ध समुदाय की न्यायप्रियता से भरी क्यों नहीं होती?
प्रिय दर्शन
1 पाठक लगातार कम हो रहे हैं। हम सब अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं - वे अंग्रेज़ी के पाठक बनते जा रहे हैं। हिंदी उनके लिए बोलचाल और मनोरंजन की भाषा है।
2 समाज में संवेदना कम हो रही है। यह मूलत: उपभोक्तावादी समाज है जो हर चीज़ फ़ायदे की तुला पर तौलता है। बरसों पहले एक इंटरव्यू में ग्राहम ग्रीन ने कहा था कि हमारे समय में रूबल और डॉलर महंगे हो रहे हैं, आदमी का मोल घट रहा है। तो हर कोई पूछता है, लिखने से पैसे नहीं मिलते तो लिखते क्यों हो।
3 पढऩे वालों की एकाग्रता घट रही है। दिल बहलाने या भटकाने के इतने साधन हैं- मसलन यह स्मार्टफोन ही- कि एक लय में पढऩा लगभग असंभव हो चुका है। तो किसी भी कृति का वास्तविक प्रभाव लगातार खंडित होता रहता है।
4 अनपढ़ लोगों की क़द्र बढ़ रही है। हालांकि यह पहले से थी, लेकिन पहले शिक्षक या लेखक या पत्रकार होना भी सम्मान की बात थी, अब सारा सम्मान इस एक बिंदु पर टिक गया है कि आपके पास पैसे कितने हैं।
5 इस देश के किसी भी धनपशु को यह अधिकार है कि वह हर विषय का विशेषज्ञ बन जाए, चाहे तो साहित्य भी लिखने लगे और लोकार्पण करा कर बड़ा लेखक बन जाए। उसकी स्तुति करने वाले मिल जाएंगे।
6 लेखन में सतहीपन बढ़ रहा है। क्योंकि बहुत सारे औसत लेखक बेशर्मी से अपना प्रचार करते हैं, अपने दोस्तों से लिखवाते हैं, साधन हो तो समारोह करते हैं और उल जलूल कुछ भी लिखकर मान्यता हासिल करने की कोशिश करते हैं।
7 हिंदी का समाज किसी बड़ी लड़ाई के लिए प्रस्तुत नहीं है। वह सामाजिक न्याय, समानता, लोकतंत्र आदि के मूल्यों को कुछ कौतुक से देखता है। लोकतंत्र का मतलब उसके लिए बस चुनाव में वोट डाल आना है। समानता की लड़ाई यूटोपिया हो चुकी है। ऐसे में हिंदी के लेखक के हिस्से भी न कोई सामाजिक संघर्ष दिखता है और न वह विचार जिसके लिए वह कोई लंबी लड़ाई लडऩे को तैयार हो?। जब बड़े युद्ध नहीं बचते तो वह छोटी-छोटी निजी? लड़ाइयों में लिप्त मिलता है।
8 हिंदी का लेखक अपनों की राजनीति का भी मारा है। संविधान ने हिंदी को राजकाज की भाषा तो बनाया, रोटी और रोजग़ार की भाषा नहीं बनाया। तो हिंदी की हैसियत इस देश में बची नहीं। वह अंग्रेजी के सामने दबी रहती है। बांग्ला और मराठी जैसी भाषाएं दावा करती हैं कि वे उससे पुरानी और समृद्ध हैं। फिर इन भाषाओं की अपनी 'कांस्टिटुएंसी' है जो हिंदी की नहीं है। कभी समाजवादी लोग हिंदी के लिए लड़ते थे, अब कोई लडऩे वाला नहीं है। ऐसे में हिंदी का लेखक वह आत्मविश्वास ही अर्जित नहीं कर पाता कि अपने लिए कुछ मांग सके, अपना शोषण भी रोक सके। पत्रिकाएं उसे पारिश्रमिक नहीं देतीं, प्रकाशक उसे रॉयल्टी नहीं देते और समाज उसका इतना साथ नहीं देता कि वह ठीक से खड़ा हो सके।
9 हिंदी इन दिनों वीभत्स सांप्रदायिकता की भाषा बनाई जा रही है। इस भाषा का सबसे लोकप्रिय वक्ता वह शख़्स है, जो झूठ बोलता है, नफऱत फैलाता है और आक्रामक बहुसंख्यकवाद का पोषण करता है। इस लोकप्रिय अविचार से लडऩे वाले जो विचार थे वे सांगठनिक तौर पर भी कमज़ोर हैं और सांस्कृतिक तौर पर भी हिंदी से दूर।
10 कुल मिलाकर हिंदी का लेखक अपने समाज का बेचेहरा प्राणी है जिसे कोई पहचानता नहीं। इस विज्ञापनबाज़ दुनिया में वह किसी तरह अपनी किताब छपवा कर कुछ संकोच के साथ घूमता रहता है कि किसे बताए कि उसने क्या लिखा है।
प्रिय दर्शन
1 पाठक लगातार कम हो रहे हैं। हम सब अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं - वे अंग्रेज़ी के पाठक बनते जा रहे हैं। हिंदी उनके लिए बोलचाल और मनोरंजन की भाषा है।
2 समाज में संवेदना कम हो रही है। यह मूलत: उपभोक्तावादी समाज है जो हर चीज़ फ़ायदे की तुला पर तौलता है। बरसों पहले एक इंटरव्यू में ग्राहम ग्रीन ने कहा था कि हमारे समय में रूबल और डॉलर महंगे हो रहे हैं, आदमी का मोल घट रहा है। तो हर कोई पूछता है, लिखने से पैसे नहीं मिलते तो लिखते क्यों हो।
3 पढऩे वालों की एकाग्रता घट रही है। दिल बहलाने या भटकाने के इतने साधन हैं- मसलन यह स्मार्टफोन ही- कि एक लय में पढऩा लगभग असंभव हो चुका है। तो किसी भी कृति का वास्तविक प्रभाव लगातार खंडित होता रहता है।
4 अनपढ़ लोगों की क़द्र बढ़ रही है। हालांकि यह पहले से थी, लेकिन पहले शिक्षक या लेखक या पत्रकार होना भी सम्मान की बात थी, अब सारा सम्मान इस एक बिंदु पर टिक गया है कि आपके पास पैसे कितने हैं।
5 इस देश के किसी भी धनपशु को यह अधिकार है कि वह हर विषय का विशेषज्ञ बन जाए, चाहे तो साहित्य भी लिखने लगे और लोकार्पण करा कर बड़ा लेखक बन जाए। उसकी स्तुति करने वाले मिल जाएंगे।
6 लेखन में सतहीपन बढ़ रहा है। क्योंकि बहुत सारे औसत लेखक बेशर्मी से अपना प्रचार करते हैं, अपने दोस्तों से लिखवाते हैं, साधन हो तो समारोह करते हैं और उल जलूल कुछ भी लिखकर मान्यता हासिल करने की कोशिश करते हैं।
7 हिंदी का समाज किसी बड़ी लड़ाई के लिए प्रस्तुत नहीं है। वह सामाजिक न्याय, समानता, लोकतंत्र आदि के मूल्यों को कुछ कौतुक से देखता है। लोकतंत्र का मतलब उसके लिए बस चुनाव में वोट डाल आना है। समानता की लड़ाई यूटोपिया हो चुकी है। ऐसे में हिंदी के लेखक के हिस्से भी न कोई सामाजिक संघर्ष दिखता है और न वह विचार जिसके लिए वह कोई लंबी लड़ाई लडऩे को तैयार हो?। जब बड़े युद्ध नहीं बचते तो वह छोटी-छोटी निजी? लड़ाइयों में लिप्त मिलता है।
8 हिंदी का लेखक अपनों की राजनीति का भी मारा है। संविधान ने हिंदी को राजकाज की भाषा तो बनाया, रोटी और रोजग़ार की भाषा नहीं बनाया। तो हिंदी की हैसियत इस देश में बची नहीं। वह अंग्रेजी के सामने दबी रहती है। बांग्ला और मराठी जैसी भाषाएं दावा करती हैं कि वे उससे पुरानी और समृद्ध हैं। फिर इन भाषाओं की अपनी 'कांस्टिटुएंसी' है जो हिंदी की नहीं है। कभी समाजवादी लोग हिंदी के लिए लड़ते थे, अब कोई लडऩे वाला नहीं है। ऐसे में हिंदी का लेखक वह आत्मविश्वास ही अर्जित नहीं कर पाता कि अपने लिए कुछ मांग सके, अपना शोषण भी रोक सके। पत्रिकाएं उसे पारिश्रमिक नहीं देतीं, प्रकाशक उसे रॉयल्टी नहीं देते और समाज उसका इतना साथ नहीं देता कि वह ठीक से खड़ा हो सके।
9 हिंदी इन दिनों वीभत्स सांप्रदायिकता की भाषा बनाई जा रही है। इस भाषा का सबसे लोकप्रिय वक्ता वह शख़्स है, जो झूठ बोलता है, नफऱत फैलाता है और आक्रामक बहुसंख्यकवाद का पोषण करता है। इस लोकप्रिय अविचार से लडऩे वाले जो विचार थे वे सांगठनिक तौर पर भी कमज़ोर हैं और सांस्कृतिक तौर पर भी हिंदी से दूर।
10 कुल मिलाकर हिंदी का लेखक अपने समाज का बेचेहरा प्राणी है जिसे कोई पहचानता नहीं। इस विज्ञापनबाज़ दुनिया में वह किसी तरह अपनी किताब छपवा कर कुछ संकोच के साथ घूमता रहता है कि किसे बताए कि उसने क्या लिखा है।
डॉ. संजय शुक्ला
सामाजिक आलोचक जॉर्ज कार्लिन ने एक बात बड़े पते की कही है कि ‘यदि आप मतदान नहीं करते तो आप सरकार से शिकायत करने का हक खो देते हैं।’ यह बात भारत जैसे विशाल मतदाताओं वाले देश के लिए सटीक बैठती है। इन दिनों देश में आम चुनाव की राजनीतिक सरगर्मियां तेज है और अमूमन सभी दलों ने अपनी पूरी ताकत इस रण पर फतह हासिल करने के लिए झोंक दी है। दूसरी ओर चुनाव आयोग से लेकर जिला प्रशासन सहित अनेक सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं अधिकाधिक मतदान के लिए जागरूकता अभियान चला रही है। बिलाशक चुनाव आयोग से लेकर देश की पूरी सरकारी मशीनरी के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना एक बहुत बड़ी चुनौती है लेकिन इस बीच मतदाताओं को मतदान के प्रति प्रेरित करना और उन्हें पोलिंग बूथ तक लाना यह जवाबदेही भी वह निभा रहा है।
चुनाव को लोकतंत्र का महापर्व कहा जाता है जिसमें मतदाता अपने वोट के जरिए उम्मीदवार के भाग्य का फैसला करने का साथ ही देश का नीति नियंता भी चुनता है। एक लिहाज से कहें तो भारतीय लोकतंत्र में आम जनता के लिए मतदान ही एकमात्र ऐसा अधिकार है जिसके द्वारा वह किसी के हाथों सत्ता सौंपने या सत्ता छीनने की ताकत रखता है। एकबारगी हम देखें तो चुनावों के बाद देश की सरकारें आम जनता को हाशिए पर ही धकेल देती और उसे अगले चुनाव में ही केंद्रीय भूमिका मिलती है। इन तथ्यों के मद्देनजर मतदाताओं की जवाबदेही है कि वे अपने वोट की ताकत पहचानें और निष्पक्ष मतदान के लिए प्रतिबद्ध हों। दूसरी ओर पचहत्तर साल पुराने लोकतंत्र में शांतिपूर्ण स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान अभी भी सबसे बड़ी चुनौती है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधायिका ही आधार स्तंभ है जिसकी बुनियाद चुनाव है। इस व्यवस्था में कोई भी बदलाव केवल और केवल मतदान के जरिए ही संभव है लिहाजा मतदाता ही लोकतंत्र की धुरी हैं। लोकतंत्र की मजबूती तब संभव है जब मतदाता अपने मताधिकार का अनिवार्य तौर पर उपयोग करें। चुनाव आयोग द्वारा अधिकाधिक मतदान के लिए विभिन्न स्तरों पर मतदाता जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।चुनाव आयोग के मुताबिक इस चुनाव के लिए 97 करोड़ मतदाताओं का पंजीकरण किया गया है अब देखना यह होगा कि इनमें कितने फीसदी मतदाता अपने सर्वोच्च संवैधानिक अधिकार का उपयोग करते हैं? चुनाव आयोग द्वारा शत्-प्रतिशत मतदान के लक्ष्य को हासिल करने के उद्देश्य से बुजुर्ग, दिव्यांग और महिला मतदाताओं के लिए हरसंभव सुविधाएं मुहैया कराई है। दूसरी ओर जिला प्रशासन के पहल पर रायपुर सहित अनेक शहरों में विभिन्न व्यापारिक प्रतिष्ठानों और अस्पतालों द्वारा मतदाताओं को अंगुली पर लगे अमिट स्याही का निशान दिखाने पर 15 से 50 फीसदी तक छूट देने की घोषणा की गई है।अलबत्ता अधिकाधिक मतदान के लिए तमाम सहूलियत देने के बावजूद क्या देश के मतदाता अपनी जवाबदेही का निर्वहन करेंगे?अहम सवाल यह भी कि आखिरकार मतदाताओं में मतदान के प्रति स्वप्रेरणा और कर्तव्य बोध क्यों जागृत नहीं हो पा रहा है? देश के संविधान में मतदान सबसे प्रमुख अधिकार है लेकिन हम अपने इस अधिकार के कर्तव्य के प्रति कितना जवाबदेह और सजग हैं? यह आज भी गंभीर चिंतन का विषय है।
गौरतलब है कि देश में 1952 से लगातार लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव हो रहे हैं परंतु जैसे-जैसे हमारा लोकतंत्र बुजुर्ग हो रहा है वैसे-वैसे मतदाताओं में चुनाव के प्रति बेरुखी बढ़ती जा रही है। चुनाव आयोग के तमाम जतन के बावजूद आज भी औसत मतदान 50 से 65 फीसदी तक ही सीमित है जबकि देश में साक्षरता का प्रतिशत काफी बढ़ चुका है। मतदान के प्रति उदासीनता का ही परिणाम है कि चुनावी राजनीति में धनबल, बाहुबल, धर्म , जाति, भाषा, परिवारवाद और क्षेत्रवाद हावी होने लगा है जिसके लिए निश्चित तौर पर मतदाता भी जवाबदेह हैं। राजनीतिक दल चुनाव में वोट हासिल करने के लिए धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र या मुफ्त योजनाओं का ‘ट्रंपकार्ड’ इस्तेमाल कर रहे हैं जिसके झांसे में मतदाता बड़ी आसानी से आ जाते हैं। मतदाताओं के प्रलोभन और स्वार्थ प्रेरित मतदान का नतीजा यह हो रहा है कि चुनाव के बाद आम आदमी से जुड़े शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी जैसे मुद्दे नेपथ्य में चले जाते हैं।
विचारणीय है कि देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए 1962 से ही आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू है बावजूद चुनावों में नफरती भाषणों, वोट के लिए प्रलोभन और धनबल की कुरीति लगातार जारी है। चुनाव आचार संहिता के तहत वोट के लिए मतदाताओं को प्रलोभन देना, रिश्वत देना,जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र के नाम पर वोट मांगना गैर कानूनी है लेकिन यह व्यवस्था अभी भी सिर्फ कागजी ही साबित हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के तमाम कोशिशों के बावजूद सियासी दलों द्वारा मुफ्त चुनावी रेवडिय़ां बांटने की होड़ मची हुई है जिसका खामियाजा चुनाव के बाद आम जनता को ही चुकाना पड़ रहा है। चुनाव जीतने के लिए किए जाने वाले मुफ्त घोषणाओं का सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है फलस्वरूप रोजगार और विकास योजनाएं ठंडे बस्ते में चली जाती है। अलबत्ता कई बार चुनाव के दौरान मतदाताओं से किए गए मुफ्त के वादे बाद में छलावा भी साबित हुए हैं। सरकारों को मुफ्त और रियायती योजनाओं को लागू करने के लिए कर्ज भी लेना पड़ता है फलस्वरूप महंगाई और टैक्स में बढ़ोतरी होती है जिसका बोझ आम मध्यमवर्गीय परिवारों पर ही पड़ता है। मतलब साफ है कि वोट के लिए मुफ्त बांटे जाने वाली सुविधाओं की कीमत बाद में मतदाता के जेब से ही वसूला जाता है। मतदाताओं को यह भी समझना होगा कि उनका वोट अनमोल है और इसका सौदा मुफ्त के स्कूटी, कंबल, साड़ी, कूकर, पंखा, सिलाई मशीन,सायकल, शराब या चंद रूपयों के एवज में नहीं किया जा सकता। बहरहाल मतदाताओं को ऐसे मुफ्त योजनाओं के बारे में चिंतन अवश्य करना चाहिए क्योंकि आज जो मुफ्त की रेवड़ी उन्हें मीठी लग रही है वह भविष्य में उनकी पीढ़ी के लिए नुकसानदायक भी साबित हो सकता है।
विचारणीय है कि किसी देश के लोकतंत्र और उनके नुमाइंदों को देखकर वहां के मतदाताओं के जिम्मेदारी की परख हो जाती है लिहाजा मतदाताओं को प्रत्याशी को धर्म, जाति या क्षेत्र के आधार पर नहीं बल्कि उसकी योग्यता और पृष्ठभूमि को देख कर वोट करना चाहिए। अलबत्ता आज आम भारतीय सोशल मीडिया से लेकर आम चर्चा में देश के राजनीतिक व्यवस्था और राजनेताओं पर खूब टीका टिप्पणियां करते हैं लेकिन वे स्वयं इस व्यवस्था को सुधारने की दिशा कितना जागरूक और जिम्मेदार हैं? इस सवाल पर चुप्पी ओढ़ लेते हैं। पचहत्तर साल पुराने लोकतंत्र में यदि हमारे राजनेता वैचारिक तौर पर परिपक्व नहीं हुए हैं तो इसमें भी कोई दोराय नहीं है कि देश का आम मतदाता भी अपने वोट के प्रति गंभीर और जागरूक नहीं है। मतदान के प्रति उदासीनता का ही परिणाम है कि चुनाव में 35 से 40 फीसदी मतदाता अभी भी वोट नहीं डाल रहे हैं।
यह हकीकत उस देश की है जहां कि जनता मुफ्त की चीजें हासिल करने के लिए अल सुबह दफ्तरों का लाइन लगा लेती है लेकिन मतदान के प्रति उनमें ऐसी जिजिविषा या उत्साह नहीं परिलक्षित होती। आंकड़ों पर गौर करें तो शहरों की अपेक्षा ग्रामीण इलाकों में मतदान हमेशा ज्यादा होता है। शहरी मतदाता जो अपने आपको सुशिक्षित और अभिजात्य समझते हैं वे मतदान के दिन को ‘इलेक्शन हॉलीडे’ मानकर सैर-सपाटे पर निकल जाते हैं। शहरी तबके का एक हिस्सा जिसमें युवा और महिलाएं शामिल हैं वे कतार में वोट डालने को अपना तौहीन समझते हैं। शहरी वर्ग की ऐसी मानसिकता लोकतंत्र के प्रति उनकी नागरिक कर्तव्यों की अवहेलना प्रदर्शित करती है लिहाजा इस जवाबदेही के प्रति जागरूकता आवश्यक है।
दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों में मजदूर, किसान और महिलाएं सबसे पहले अपना वोट डालकर काम पर निकलते हैं। छत्तीसगढ़ के नक्सलगढ़ समझे जाने वाले बस्तर के वोटिंग प्रतिशत पर गौर करें तो एक दौर वह भी था जब इस इलाके में चुनाव प्रचार और मतदान के दौरान गोलियों की तड़तड़ाहट व बमों के धमाके सुनाई पड़ती थी लेकिन अब यहां मतदान केंद्रों में ईवीएम की बीप सुनाई पड़ती है। राज्य के नक्सल प्रभावित इलाके के युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गो ने इस चुनाव में भी नक्सलियों के मतदान बहिष्कार की धमकी को धता बताकर सुबह से ही मतदान के लिए कतार पर खड़ा हो गए यह लोकतंत्र के लिए सुखद संदेश है। कुछ मतदाताओं की यह भी मानसिकता होती है कि मेरे एक वोट नहीं डालने से क्या फर्क पड़ेगा?देश और प्रदेश के चुनावी इतिहास पर गौर करें तो कुछ प्रत्याशियों के जीत-हार का फासला महज दहाई अंकों का रहा है। दूसरी ओर कुछ वोटर्स की यह भी दलील होती है कि चुनाव में कोई भी प्रत्याशी उनके अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं थे इसलिए उन्होंने वोट नहीं किया। ऐसे मतदाताओं को यह ज्ञात होना चाहिए कि ईवीएम में ‘नोटा’ यानि कोई भी प्रत्याशी उपयुक्त नहीं का भी विकल्प होता है लिहाजा इस पर भी बटन दबाया जा सकता है।
चुनाव के दौरान कुछ स्थानों पर मतदाताओं द्वारा अपने कतिपय मांगों को लेकर ‘मतदान बहिष्कार’ की खबरें सुनाई पड़ती है जो उचित नहीं है। नागरिकों को समझना चाहिए कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध का भी स्थान है लेकिन मतदान बहिष्कार इसका जरिया नहीं बन सकता। दूसरी ओर सच्चाई यह भी है कि ऐसे मतदाता जो मतदान नहीं करते अथवा स्वार्थ प्रेरित वोट करते हैं वे बाद में सरकार और व्यवस्था की आलोचना में आगे रहते हैं जो अनुचित है । उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में हर मतदाता का वोट अनिवार्य और महत्वपूर्ण है ताकि प्रजातांत्रिक व्यवस्था में ‘प्रजा’ की भूमिका सुनिश्चित हो। गौरतलब है कि देश में मतदान को अनिवार्य करने के लिए साल 2015 में लोकसभा में एक सांसद ने अनिवार्य मतदान कानून लागू करने संबंधी निजी विधेयक प्रस्तुत किया था जिसे 2022 में सरकार की असहमति के बाद उन्होंने वापस ले लिया था। दूसरी ओर 2015 में विधि आयोग ने भी अनिवार्य मतदान कानून का विरोध करते हुए इसे अव्यवहारिक बताया था। गौरतलब है कि दुनिया के 33 देशों में अनिवार्य मतदान कानून लागू हैं जिसके तहत चुनावों में वोट नहीं करने वाले नागरिकों के खिलाफ जुर्माने से लेकर अन्य दंड का प्रावधान है। अलबत्ता मतदान के लिए कानून की नहीं बल्कि नागरिक जवाबदेही की जरूरत है जो लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी सुनिश्चित करता है। प्रत्येक नागरिक को मतदान को अनिवार्य कर्त्तव्य मानना होगा तभी चुनावों की सार्थकता है।
उल्लेखनीय है कि भारत युवा आबादी के लिहाज से दुनिया का सबसे युवा देश हैं जहां की 65 फीसदी जनसंख्या युवाओं की है। इतिहास गवाह है कि दुनिया में जितने भी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव हुए हैं उसे युवाओं ने ही अंजाम दिया है। देश में 18 साल में मताधिकार प्राप्त है इस लिहाज से भारत में युवा मतदाताओं की निर्णायक आबादी है जो देश की राजनीति को नयी दशा और दिशा देने की ताकत रखते हैं। इस चुनाव में 30 करोड़ युवा मतदाता वोट डालेंगे यह आंकड़ा अमेरिका की कुल आबादी से ज्यादा है। बीते 75 सालों में युवा मतदाताओं की संख्या में पांच गुना से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है लेकिन युवावर्ग भी मतदान के प्रति जागरूक और गंभीर नहीं है। राजनीतिक पार्टियां चुनावी नतीजों को प्रभावित करने वाले इस ‘वोट बैंक’ को अपने पाले में लाने के लिए तमाम तरह की रणनीति अपना रहे हैं जिसमें धर्म और जाति की सियासत भी शामिल है। इसमें दो राय नहीं है कि युवाओं की बड़ी जनसंख्या धार्मिक और जातिवादी राजनीति के खिलाफ हैं और वे चुनाव सुधारों के पक्षधर भी हैं लेकिन उन्हें इस असहमति को वोट के जरिए प्रदर्शित करना चाहिए। अलबत्ता अ_ारह साल पूरे कर चुके युवाओं में अपने पहले मतदान के प्रति उदासीन होना देश के भविष्य के लिए उचित नहीं है। इस तथ्य की पुष्टि चुनाव आयोग के उस आंकड़े से होती है जिसके मुताबिक देश में 18 साल पूरे कर चुके केवल 38 फीसदी मतदाताओं ने ही पंजीकरण कराया है मतलब अभी भी 62 फीसदी युवाओं में अपने पहले मतदान के प्रति उत्सुकता नहीं
युवाओं को यह बात अपने जेहन में रखना होगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदान ही ऐसा साधन है जिसके जरिए लोगों को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, पारदर्शी प्रशासन और बेहतर रोजगार मुहैया कराया जा सकता है। युवाओं को इस बदलाव के लिए शत-प्रतिशत निष्पक्ष और स्वतंत्र मतदान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता सुनिश्चित करनी होगी। युवाओं की यह भी जवाबदेही है कि वे मतदान को केवल रस्म अदायगी न समझें बल्कि इसके प्रति अपने परिवार और समाज को भी जागरूक करें। मतदान लोकतंत्र का अनुष्ठान है इसलिए हर नागरिक का कर्तव्य है कि वे अपने साथ बुजुर्गों और दिव्यांगों का भी मतदान कराने का बीड़ा उठाएं ताकि वे भी लोकतंत्र के महापर्व का हिस्सा बन सकें।
डॉ. आर.के. पालीवाल
वैसे तो ऊपरी तौर पर रूस यूक्रेेन युद्ध दो पड़ोसी देशों के बीच हो रहा युद्ध दिखाई देता है लेकिन इस युद्ध में यूक्रेन के साथ अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो सैन्य संगठन के यूरोपीय देश भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं। इसे रूस और युक्रेन का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि कई दशक तक जुड़वा भाइयों की तरह सोवियत संघ की महाशक्ति के दो सबसे बड़े हिस्से रहे रूस और युक्रेन 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद आजाद देश बनने पर कई साल से तनावग्रस्त माहौल में रहने के बाद एक साल से ज्यादा समय से खूंखार जंग लड़ रहे हैं।
रूस अपने इस पड़ोसी के अमेरिका परस्त नाटो का हिस्सा बनने से नाराज है और युक्रेन रूस की दादागिरी सहने के बजाय यूरोप और अमेरिका के लोकतंत्र साथ रहने की जिद के कारण रूस की आंखों की किरकिरी बना हुआ है। यह कुछ कुछ भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव और युद्ध जैसा ही है। भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्धों में भी पाकिस्तान को अमेरिका का वैसा ही समर्थन मिलता था जैसा रूस के खिलाफ युद्धरत युक्रेन को मिल रहा है।
इसी तरह इजराइल और फिलिस्तीन के बीच जारी कई दशक पुरानी जंग भी पिछले कई सालों के सबसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है। फिलीस्तीन के गुरिल्ला हमलावरों ने इजराइल के अंदरूनी इलाकों में घुसकर जिस जंग की शुरुआत की थी उसने इजराइल को इतना भडक़ाया कि फिलिस्तीन में भारी तबाही के बाद उस पर यह आरोप भी लगा कि सीरिया में ईरान के दूतावास पर हुए हमले में इजराइल ने ही ईरान के शीर्ष कमांडरों को मारा है। सीरिया में हुई इस घटना ने ईरान को भी सीधे इजराइल के साथ युद्धरत कर दिया। अब यह युद्ध भी इजराइल और फिलीस्तीन तक सीमित नहीं रहा। दुनिया के दो संवेदनशील भागों मे चल रहे इन दो युद्धों में अमेरिका हर तरह से अपने मित्र राष्ट्र युक्रेन और इजराइल के साथ खड़ा है। अभी हाल ही में अमेरिकी सीनेट ने युक्रेन और इजराइल की मदद के लिए भारी भरकम आर्थिक सहायता को मंजूरी दी है। इस मदद के बाद युक्रेन और इजराइल और ज्यादा ताकत से अपने दुश्मन देशों से दो दो हाथ करने की तैयारी करेंगे।
युद्ध और आग की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह थोड़ी सी हवा मिलने पर तेजी से फैलते हैं। युद्ध में जब धर्म विशेष का तत्व शामिल हो जाता है तब उसके फैलने की आशंका कई गुणा बढ़ जाती है। इजराइल और फिलिस्तीन के युद्ध में यही खतरा सबसे ज्यादा है। इस युद्ध में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से इजराइल और फिलीस्तीन के साथ साथ सीरिया और ईरान का प्रवेश विशुद्ध रूप से धार्मिक आधार पर ही हुआ है जिसकी लपट अन्य इस्लामिक देशों तक भी फैल सकती है। इस दृष्टि से यह युद्ध रूस और युक्रेन के बीच चल रहे युद्ध से भी ज्यादा संवेदनशील है। इसलिए इसे रोकने के प्रयास ज्यादा तेज़ी से होने चाहिएं।
जिस समय पूरी दुनिया जलवायू परिर्वतन के भयावह दौर से जूझ रही है ऐसी स्थिति में कई बड़े देशों का युद्ध में शामिल होना जलवायू परिर्वतन के खतरे को ओर ज्यादा बढ़ाता है। एक तरफ युद्ध में इस्तेमाल होने वाले गोला बारूद से प्रकृति और पर्यावरण खराब होते हैं और दूसरी तरफ जिन संसाधनों का रचनात्मक उपयोग जलवायू परिर्वतन के दुष्प्रभावों को कम करने में हो सकता था उनका दुरुपयोग युद्ध के विध्वंश में होने से पर्यावरण के लिए आर्थिक संसाधनों की कमी होती है। दुर्भाग्य से युद्धरत देशों के शासक इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि प्रकृति और पर्यावरण से उन्हें कोई लेना देना नहीं है। ऐसी स्थिति में संयुक्त राष्ट्र संघ ही विश्व की बड़ी आबादी के लिए एकमात्र आशा की किरण दिखाई देता है। दुर्भाग्य से अभी इन युद्धों में संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रभावी हस्तक्षेप दिखाई नहीं दे रहा।
डॉ. आर.के. पालीवाल
वैसे तो ऊपरी तौर पर रूस यूक्रेेन युद्ध दो पड़ोसी देशों के बीच हो रहा युद्ध दिखाई देता है लेकिन इस युद्ध में यूक्रेन के साथ अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो सैन्य संगठन के यूरोपीय देश भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं। इसे रूस और युक्रेन का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि कई दशक तक जुड़वा भाइयों की तरह सोवियत संघ की महाशक्ति के दो सबसे बड़े हिस्से रहे रूस और युक्रेन 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद आजाद देश बनने पर कई साल से तनावग्रस्त माहौल में रहने के बाद एक साल से ज्यादा समय से खूंखार जंग लड़ रहे हैं।
रूस अपने इस पड़ोसी के अमेरिका परस्त नाटो का हिस्सा बनने से नाराज है और युक्रेन रूस की दादागिरी सहने के बजाय यूरोप और अमेरिका के लोकतंत्र साथ रहने की जिद के कारण रूस की आंखों की किरकिरी बना हुआ है। यह कुछ कुछ भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव और युद्ध जैसा ही है। भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्धों में भी पाकिस्तान को अमेरिका का वैसा ही समर्थन मिलता था जैसा रूस के खिलाफ युद्धरत युक्रेन को मिल रहा है।
इसी तरह इजराइल और फिलिस्तीन के बीच जारी कई दशक पुरानी जंग भी पिछले कई सालों के सबसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है। फिलीस्तीन के गुरिल्ला हमलावरों ने इजराइल के अंदरूनी इलाकों में घुसकर जिस जंग की शुरुआत की थी उसने इजराइल को इतना भडक़ाया कि फिलिस्तीन में भारी तबाही के बाद उस पर यह आरोप भी लगा कि सीरिया में ईरान के दूतावास पर हुए हमले में इजराइल ने ही ईरान के शीर्ष कमांडरों को मारा है। सीरिया में हुई इस घटना ने ईरान को भी सीधे इजराइल के साथ युद्धरत कर दिया। अब यह युद्ध भी इजराइल और फिलीस्तीन तक सीमित नहीं रहा। दुनिया के दो संवेदनशील भागों मे चल रहे इन दो युद्धों में अमेरिका हर तरह से अपने मित्र राष्ट्र युक्रेन और इजराइल के साथ खड़ा है। अभी हाल ही में अमेरिकी सीनेट ने युक्रेन और इजराइल की मदद के लिए भारी भरकम आर्थिक सहायता को मंजूरी दी है। इस मदद के बाद युक्रेन और इजराइल और ज्यादा ताकत से अपने दुश्मन देशों से दो दो हाथ करने की तैयारी करेंगे।
युद्ध और आग की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह थोड़ी सी हवा मिलने पर तेजी से फैलते हैं। युद्ध में जब धर्म विशेष का तत्व शामिल हो जाता है तब उसके फैलने की आशंका कई गुणा बढ़ जाती है। इजराइल और फिलिस्तीन के युद्ध में यही खतरा सबसे ज्यादा है। इस युद्ध में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से इजराइल और फिलीस्तीन के साथ साथ सीरिया और ईरान का प्रवेश विशुद्ध रूप से धार्मिक आधार पर ही हुआ है जिसकी लपट अन्य इस्लामिक देशों तक भी फैल सकती है। इस दृष्टि से यह युद्ध रूस और युक्रेन के बीच चल रहे युद्ध से भी ज्यादा संवेदनशील है। इसलिए इसे रोकने के प्रयास ज्यादा तेज़ी से होने चाहिएं।
जिस समय पूरी दुनिया जलवायू परिर्वतन के भयावह दौर से जूझ रही है ऐसी स्थिति में कई बड़े देशों का युद्ध में शामिल होना जलवायू परिर्वतन के खतरे को ओर ज्यादा बढ़ाता है। एक तरफ युद्ध में इस्तेमाल होने वाले गोला बारूद से प्रकृति और पर्यावरण खराब होते हैं और दूसरी तरफ जिन संसाधनों का रचनात्मक उपयोग जलवायू परिर्वतन के दुष्प्रभावों को कम करने में हो सकता था उनका दुरुपयोग युद्ध के विध्वंश में होने से पर्यावरण के लिए आर्थिक संसाधनों की कमी होती है। दुर्भाग्य से युद्धरत देशों के शासक इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि प्रकृति और पर्यावरण से उन्हें कोई लेना देना नहीं है। ऐसी स्थिति में संयुक्त राष्ट्र संघ ही विश्व की बड़ी आबादी के लिए एकमात्र आशा की किरण दिखाई देता है। दुर्भाग्य से अभी इन युद्धों में संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रभावी हस्तक्षेप दिखाई नहीं दे रहा।
6 अप्रैल 2024 को राजधानी तेल अवीव सहित इसराइल के कई हिस्सों में हजारों लोग प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन के लिए सडक़ों पर उतर आए।
बीते साल 7 अक्तूबर को हमास के लड़ाकों के इसराइल में हमले के बाद इस 6 महीने पूरे हो गए थे। इन प्रदर्शनों के जरिए इसराइली जनता, सरकार की कार्रवाई के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर कर रही थी।
इसराइल के अनुसार सात अक्तूबर को इसराइल पर हुए इस हमले के दौरान 1200 से अधिक इसराइली मारे गए थे और 250 लोगों का अपहरण कर लिया गया था जिनमें अधिकांश आम नागरिक थे।
प्रदर्शनकारी हमले से निपटने और बंधक बनाए गए 130 लोगों को छुड़ाने में सरकार की विफलता से नाराज़ थे। दुनिया के कई देश हमास के सैनिक धड़े को आतंकवादी संगठन घोषित कर चुके हैं।
कई लोग चाहते हैं कि इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू इस्तीफा दें और देश में चुनाव करवाए जाएं। विदेशी नेताओं की ओर से भी प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की गाजा में सैनिक कार्रवाई की आलोचना हो रही है।
गाजा में हमास द्वारा नियंत्रित स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार इसराइली हमले में लगभग 33000 फ़लस्तीनी मारे गए हैं। गाजा में बिगड़ती मानवीय स्थिति को लेकर भी चिंता व्यक्त की जा रही है जिसके चलते इसराइल का घनिष्ठ सहयोगी अमेरिका भी प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर युद्धविराम के लिए दबाव डाल रहा है।
अमेरिका ने यहां तक कह दिया है कि वो इसराइल को हथियार सप्लाई के लिए कुछ शर्तें लादने की सोच रहा है। मगर इसराइली प्रधानमंत्री ने संघर्ष विराम से इनकार कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने कहा है कि वो प्रधानमंत्री नेतन्याहू के गाजा मामले से निपटने के तरीके से सहमत नहीं हैं।
इसलिए इस हफ्ते दुनिया जहान में हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि इसराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू का नेतृत्व कितना सुरक्षित है?
बिन्यामिन नेतन्याहू के सत्ता तक पहुंचने का सफऱ
1949 में तेल अवीव में एक धर्मनिरपेक्ष इसराइली परिवार में जन्मे बिन्यामिन नेतन्याहू की परवरिश यरूशलम और अमेरिका में हुई थी। 1967 में इसराइल लौट कर वो सेना में भर्ती हो गए।
लगभग तीस साल बाद 1996 में 46 की उम्र में उन्होंने चुनाव में लिकुड पार्टी का नेतृत्व करते हुए जीत हासिल की और इसराइल के प्रधामंत्री बने।
यूके की ससेक्स यूनिवर्सिटी में आधुनिक इसराइल अध्ययन के प्रोफेसर डेविड टाल कहते हैं कि नेतन्याहू बहुत ही महत्वाकांक्षी व्यक्ति हैं जो राजनीतिक सहयोगियों का इस्तेमाल कर के आगे बढ़ते रहे हैं। वो हमेशा विचारधारा से अधिक प्राथमिकता अपने हितों को देते आए हैं।
‘वो राजनीतिक विचारधारा की बात तो करते हैं लेकिन उनकी हरकतें देख कर नहीं लगता कि वो उस विचारधारा के अनुसार काम करते हैं। जरूरत पडऩे पर अपने निजी हितों को साधने के लिए वो अपनी विचारधारा के सिद्धांतों से किनारा करने में हिचकिचाते भी नहीं हैं।’
सत्ता से बाहर जाकर फिर की थी नेतन्याहू ने वापसी
पहली बार सत्ता में आने के तीन साल बाद ही उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया गया। लेकिन 2009 में वो दोबारा सत्ता में लौटे और लगभग अगले दस सालों तक प्रधानमंत्री बने रहे। लेकिन फिर चुनावों के बाद उन्हें सत्ता से हाथ धोना पड़ा। 2022 में वो फिर चुनावी मैदान में उतरे। मगर इस बार एक महत्वपूर्ण बात यह हुई कि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के कई आरोप लगाए गए थे। जब चुनाव के नतीजे सामने आए तो उनकी लिकुड पार्टी बहुमत से दूर थी।
अब सरकार बनाने के लिए उन्हें ऐसे राजनीतिक सहयोगियों की जरूरत थी जो उनके साथ गठबंधन सरकार बनाने को तैयार हो जाएं। और उनके पास एक ही विकल्प था कि वो राष्ट्रवादी और अति दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों से साथ गठबंधन बनाएं।
इससे उन्हें ना सिर्फ संसद में बहुमत मिल सकता था बल्कि अपनी कानूनी मुश्किलों से बाहर निकलने का रास्ता भी मिल सकता था।
डेविड टाल ने कहा कि, ‘उनके जेल जाने की प्रबल संभावना थी। उनके लिए जेल जाने से बचने का एक रास्ता यह था कि वो न्यायपालिका की व्यवस्था को ही बदलकर अपने पक्ष में कर लें। अति दक्षिणपंथी दलों के साथ गठबंधन करने से इसराइल को क्या नुकसान होगा इससे कहीं ज़्यादा डर उन्हें जेल जाने का था।’
नेतन्याहू की यह गठबंधन सरकार इसराइल में अब तक की सबसे अधिक दक्षिणपंथी सरकार थी।
न्यायपालिका में बदलाव करने के उनके फैसले के खिलाफ जोरदार विरोध-प्रदर्शन हुए। मगर वो राजनीतिक दांव-पेचों के जरिए जेल जाने से बच गए हैं लेकिन उन्होंने पर्दे के पीछे एक और ज़्यादा खतरनाक राजनीतिक खेल शुरू कर दिया।
नेतन्याहू और हमास
भूमध्य सागर के करीब इसराइल और मिस्र की सीमा के बीच स्थित 20 लाख की आबादी वाला फिलीस्तीनी क्षेत्र गाजा साल 2007 से चरमपंथी गुट हमास के नियंत्रण में है। हमास इसराइल का अस्तित्व नहीं मानता और उसके खिलाफ सशस्त्र विद्रोह के प्रति कटिबद्ध है।
हमास के सैनिक धड़े को इसराइल, अमेरिका, यूके, यूरोपीय संघ सहित कई देश आतंकवादी घोषित कर चुके हैं। डेविड टाल कहते हैं कि इसके बावजूद बिन्यामिन नेतन्याहू कतर से हमास को मिलने वाले पैसों की सप्लाई को नजरअंदाज करते रहे।
डेविड टाल की राय है कि वो गाजा में हमास के फलने-फूलने के लिए हर संभव काम करते रहे। ऊपरी तौर पर वह कहते रहे कि वो हमास का अंत करना चाहते हैं लेकिन इसके लिए उन्होंने कुछ नहीं किया।
कुछ रिपोर्टों के अनुसार, 2019 में नेतन्याहू ने अपनी लिकुड पार्टी के कुछ नेताओं के सामने कहा था कि फिलीस्तीनी प्रशासन को पीछे धकेलने के लिए हमास की मदद करना हमारी रणनीति का हिस्सा है ताकि गाजा के फ़लस्तीनियों को वेस्ट बैंक (पश्चिम तट) के फिलीस्तीनियों से अलग रखा जा सके।
हाल में नेतन्याहू ने कहा था कि मानवीय संकट को टालने के लिए उन्होंने हमास को होने वाली पैसों की सप्लाई नहीं रोकी थी। लेकिन वास्तव में उन्हें इससे एक राजनीतिक फायदा यह हो रहा था कि इस धन से हमास और पश्चिम तट में उसके प्रतिद्वंदी फिलीस्तीनी गुट फतह के बीच दुश्मनी को हवा मिल रही थी। इसके चलते स्वतंत्र फिलीस्तीनी राष्ट्र के लिए हमास और फतह का साथ आना मुश्किल था।
नेतन्याहू और उनके गठबंधन के अति दक्षिणपंथी सदस्य स्वतंत्र फिलीस्तीनी राष्ट्र के खिलाफ हैं।
डेविड टाल ने बताया कि, ‘लिकुड पार्टी हमेशा से फिलीस्तीनी राष्ट्र को अपने लिए खतरा मानती रही है क्योंकि उसके अनुसार पश्चिम तट इसराइल का हिस्सा है। नेतन्याहू कहते रहे हैं कि वो फिलीस्तीनी राष्ट्र नहीं बनने देंगे।’ 7 अक्तूबर को हुए हमलों के बाद नेतन्याहू सरकार की जवाबी कार्रवाई पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजऱें हैं।
एक बड़ा काला दिन
7 अक्तूबर की सुबह हमास के कई हथियारबंद लड़ाके गज़ा की सीमा पार के इसराइल में घुस गये। इसराइल के अनुसार इन लड़ाकों ने इसराइल में कम से कम 1200 लोगों की हत्या की और 250 लोगों का अपहरण कर के गज़ा ले गए।
इस हमले के दौरान महिलाओं के साथ बलात्कार और यौन हमलों के सबूत बीबीसी ने देखे हैं। वॉशिंगटन स्थित ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट में सेंटर फॉर मिडिल ईस्ट पॉलिसी के निदेशक नेतन साक्स कहते हैं कि वो दिन इसराइल के इतिहास का सबसे काला दिन था। जर्मनी में यहूदियों के जनसंहार के बाद पहली बार एक दिन में इतने यूहूदी लोग मारे गए थे।
‘यह इसराइल के सुरक्षातंत्र की चौंकाने वाली विफलता थी। हमले के समय इसराइली नेतृत्व की प्रतिक्रिया भी उतनी ही चौंकाने वाली थी। हमले से निपटने की कोई तैयारी दिखाई नहीं दी। हालांकि उस समय इसराइल अंदरूनी उथल-पुथल में फंसा हुआ था उसके बावजूद भी इसराइल की विफलता समझ से बाहर है।’
इस हमले के बाद बिन्यामिन नेतन्याहू के प्रति लोगों के रवैये में क्या फर्कपड़ा?
नेतन साक्स का कहना है कि उस समय नेतन्याहू प्रधानमंत्री थे और इसराइल के पूरे सुरक्षातंत्र के नेता थे इसलिए उसकी विफलता का दोष भी उन्हीं को जाता है। हमले के फौरन बाद बिन्यामिन नेतन्याहू ने वादा किया कि वो इसराइली बंधकों को छुड़वाएंगे और हमास का खात्मा करेंगे। उन्होंने गज़ा पर हमला कर दिया मगर नेतन साक्स कहते हैं कि दोनों उद्देश्य एक साथ हासिल करना मुश्किल है।
‘हमास बंधकों को मानवीय ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहा है। बंधकों और गाजा की जनता को ख़तरे में डाले बिना उन तक पहुंचना मुश्किल है। इसलिए अब बंधकों को छुड़वाने के लिए हमास से समझौते के प्रयास चल रहे हैं। लेकिन इससे हमास को खत्म करने का उनका उद्देश्य खटाई में पड़ जाएगा।’
इसराइल को करना पड़ रहा है आलोचना का सामना
इस दौरान गाजा में हमले के चलते इसराइल को अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार इसराइल के हमले में अब तक 33000 लोग मारे गए हैं और भुखमरी की स्थिति पैदा हो सकती है। हाल में सात अंतरराष्ट्रीय सहायताकर्मियों के मारे जाने की वारदात की व्यापक निंदा हुई है। मगर क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय की राय का नेतन्याहू पर असर पड़ेगा?
नेतन साक्स ने कहा कि, ‘मुझे नहीं लगता कि नेतन्याहू और कई इसराइली लोग यह समझ पा रहे हैं कि पिछले 5-6 महीने में इसराइल की सामरिक स्थिति को कितना नुकसान पहुंचा है। वो नहीं जानते कि सामरिक रूप से यह कार्रवाई कितनी महंगी साबित होगी।’
बिन्यामिन नेतन्याहू जनता से आह्वान कर रहे हैं कि इस मुश्किल घड़ी में जनता को एकजुट होना चाहिए। मगर इस कार्रवाई का असर इसराइल के उन पश्चिमी देशों के साथ संबंध पर भी पड़ेगा जो उसे हथियार देते हैं।
विशेष संबंध
इस युद्ध से पहले अमेरिका इसराइल पर किस प्रकार का प्रभाव रखता था, दोनों के बीच विशेष संबंधों का क्या स्वरूप रहा है? यह समझने के लिए हमने बात की एरन डेविड मिलर से जो वॉशिंगटन स्थित कार्नेगी एंडोवमेंट फ़ॉर इंटनेशनल पीस में वरिष्ठ शोधकर्ता हैं।
वो कहते हैं कि अमेरिका इसराइल को हथियार देता है और संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसका बचाव करता है। अमेरिका के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के इसराइल के साथ घनिष्ठ संबंध रहे हैं। मगर दोनों देशों के बीच विशेष संबंधों का एक कारण यह है कि दोनों लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखते हैं।
‘मध्य पूर्व एक अत्यंत अस्थिर क्षेत्र है। वहां इसराइल एक मात्र लोकतांत्रिक शक्ति है। हालांकि वहां लोकतंत्र आदर्श तो नहीं है लेकिन अगर वहां लोकतंत्र नहीं होता तो उसका अमेरिका के साथ विशेष संबंध इतने लंबे समय तक कायम नहीं रहता।’
कुछ लोगों की राय है कि अमेरिका में पचास लाख से ज़्यादा यहूदी रहते हैं और यह भी अमेरिकी प्रशासन द्वारा इसराइल के समर्थन का एक कारण है। एरन मिलर के अनुसार उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह कारण है कि अमेरिका के इवैंजिलिकल ईसाई और यहूदियों के बीच साझा मूल्य और आस्थाएं हैं और वो इसराइल के समर्थक हैं।
वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडन इसराइल की गाजा में लड़ाई से आम नागरिकों को हो रहे जान-माल के नुकसान से नाराज हैं और उन्होंने इसराइल को चेतावनी दी है कि उसे अमेरिका से मिलने वाली सहायता इस बात पर निर्भर होगी कि वो गाजा में आम लोगों को सहायता पहुंचाने का रास्ता खोलने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है।
नेतन्याहू आरोपों को खारिज कर रहे हैं
एरन डेविड मिलर ने कहा,‘राष्ट्रपति बाइडन की नेतन्याहू के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है क्योंकि वो जानते हैं कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू अपने कानूनी मसले को इसराइल और अमेरिका के हितों से अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं।’
प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने उनके आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि इसराइली जनता उनके साथ है और जानती है कि उसके लिए क्या अच्छा है। राष्ट्रपति बाइडन ने संघर्ष विराम की अपील करते हुए कहा कि गाजा में मानवीय सहायता का रास्ता खोला जाए। इससे पहले उन्होंने हमास से भी बंधकों को रिहा करने की अपील की थी मगर उन्होंने सीधे तौर पर इसराइल को हथियार सप्लाई बंद करने की बात नहीं की।
एरन डेविड मिलर के अनुसार अमेरिका का इसराइल पर प्रभाव जरूर है मगर अमेरिकी राष्ट्रपति इसराइली प्रधानमंत्री के साथ सीधा संघर्ष नहीं चाहते क्योंकि इसके उलटे नतीजे भी आ सकते हैं और राजनीतिक दृष्टि से यह महंगा साबित हो सकता है।
इसराइल के प्रति अमेरिका का रवैया कड़ा हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ इसराइल में आम चुनाव दो साल बाद होने हैं मगर कई लोग जल्द चुनाव करवाने की बात भी कर रहे हैं।
नेतन्याहू को हटाने के प्रयास
यरूशलम स्थित दी इसराइली डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट की वरिष्ठ शोधकर्ता प्रोफेसर टमार हर्मन मानती हैं कि नेतन्याहू सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रहे अधिकांश लोग बड़े शहरों के मध्यवर्ग के धर्मनिरपेक्ष तबके के हैं। इन लोगों ने नेतन्याहू के न्यायपालिका में सुधार का भी विरोध किया था इसलिए नेतन्याहू उनके विरोध को राजनीतिक अवसरवाद बता कर अनदेखा कर सकते हैं। लेकिन अब उनके साथ वो लोग भी जुड़ रहे हैं जिनके प्रियजनों का अपहरण करके गाजा में बंदी बना कर रखा गया है।
‘बहुत लोग बंधकों की रिहाई के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से निराश और नाराज हैं इसलिए वो विरोध-प्रदर्शनों में शामिल हो गए हैं। लेकिन नेतन्याहू अब यह कह कर इसे खारिज कर सकते हैं कि यह लोग बंधकों की रिहाई के लिए नहीं बल्कि उनकी सरकार को गिराने के लिए विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।’
लेकिन क्या सरकार के भीतर उनके नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह हो सकता है? टमार हर्मन कहती हैं कि इसकी संभावना कम है क्योंकि 7 अक्तूबर के हमले के बाद नेतन्याहू ने मध्यपंथी नैशनल यूनिटी पार्टी के नेता बेनी गैन्ज को सरकार में शामिल कर लिया है।
‘नेतन्याहू को फिलहाल खतरा नहीं’
टमार हर्मन की राय है कि इससे सरकार में नेतन्याहू की स्थिति मजबूत हुई है क्योंकि नेशनल यूनिटी पार्टी पहले सरकार में शामिल होने को तैयार नहीं थी। उसके सरकार में शामिल होने से नेतन्याहू के नेतृत्व की वैधता बढ़ गयी है। गठबंधन सरकार में शामिल अति दक्षिणपंथी दल सत्ता में रहना चाहते हैं इसलिए वो भी फि़लहाल नेतन्याहू का साथ नहीं छोड़ेंगे यानी नेतन्याहू के नेतृत्व को फिलहाल वहां से कोई ख़तरा नहीं है।
फिलहाल तो गाजा में चल रही लड़ाई पर पूरा ध्यान केंद्रित है लेकिन इसराइल की लेबनान से लगी सीमा पर और ईरान के साथ भी संघर्ष सुलगने जा रहे हैं। अगर यह संघर्ष गाजा से बाहर फैल गया तो इसराइली जनता मतभेद भुलाकर एकजुट हो जाएगी।
टमार हर्मन ने कहा, ‘अगर ऐसा होता है तो पूरी स्थिति बदल जाएगी क्योंकि अगर उत्तर में लड़ाई छिड़ गई तो वो कहीं अधिक बड़ी होगी और सबके लिए अधिक ख़तरनाक होगी। और विरोध प्रदर्शन ख़त्म हो जाएंगे।’
तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर कि इसराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू का नेतृत्व कितना सुरक्षित है?
7 अक्तूबर के बाद इसराइल द्वारा गाजा में छेड़ी गई लड़ाई से उत्पन्न मानवीय संकट के चलते अब अमेरिका, यूके और जर्मनी इसराइल को बिना शर्त समर्थन देने के बारे में हिचकिचाने लगे हैं।
बिन्यामिन नेतन्याहू देश के भीतर भी विरोध का सामना कर रहे हैं। लेकिन वहां मध्यावधि चुनाव के लिए इतना काफी नहीं है।
नेतन्याहू एक चालाक राजनेता हैं और राजनीतिक चुनौतियों से निपटने में माहिर हैं इसलिए फिलहाल तो नहीं लगता कि उनके नेतृत्व को गंभीर खतरा है।(bbc.com/hindi)
दीपाली जगताप
ये करीब साल भर पहले की बात है। अप्रैल, 2023 में एक प्रेस कांफ्रेंस में उद्धव ठाकरे ने कहा था, ‘जिस दिन बाबरी मस्जिद गिरी थी, मैं बाला साहेब के पास गया था। उन्होंने बताया कि बाबरी मस्जिद गिर चुकी है। इसके बाद संजय राउत का फोन आया। बाला साहेब ने उनसे कहा था कि अगर बाबरी मस्जिद शिव सैनिकों ने गिरा दी है, तो उन्हें गर्व है।’
उद्धव ठाकरे के मुताबिक, ‘बाला साहेब ने ये भी कहा कि इन लोगों को बहादुरी दिखानी होगी। जब मुंबई में दंगे हुए थे, तब शिव सैनिकों ने इन गद्दारों को बचाया था।’ हालांकि, दूसरी तरफ अब उद्धव ठाकरे राज्य भर के मुस्लिम वोटरों से साथ आने की अपील करते नजऱ आ रहे हैं। उनकी बैठकों और दौरों में मुस्लिम समुदाय के मतदाताओं की भी अच्छी-खासी मौजूदगी रहती है।
उद्धव ठाकरे के साथ फि़लहाल 14 विधायक और छह सांसद हैं। ठाकरे गुट में एक भी मुस्लिम विधायक या सांसद नहीं है। लेकिन शिवसेना से सिल्लोड सीट से अब्दुल सत्तार विधायक हैं जो अब शिंदे गुट में हैं।
इस बीच, मौजूदा लोकसभा चुनाव में ठाकरे समूह या महाविकास अघाड़ी से एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं मिला है।
नए राजनीतिक प्रयोग से उद्धव ठाकरे को फायदा होगा?
ऐसे में सवाल यही है कि नए राजनीतिक प्रयोग से मौजूदा लोकसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे को कितना फायदा होने वाला है? और क्या कांग्रेस का यह पारंपरिक वोट बैंक उद्धव ठाकरे की ओर खिसक रहा है?
कुछ दिन पहले उद्धव ठाकरे ने मुंबई के शिवसेना भवन में माहिम दरगाह के कुछ पदाधिकारियों से मुलाकात की थी। उद्धव ठाकरे ने मुस्लिम समुदाय को यह समझाने की कोशिश की कि वह संविधान बचाना चाहते हैं। माहिम दरगाह के ट्रस्टी शाहनवाज ख़ान ने बीबीसी मराठी को बताया, ‘उन्होंने कहा था कि जैसे हमारी दुश्मनी मशहूर थी, वैसे हमारी दोस्ती भी मशहूर होगी।’
2019 के बाद यानी महाविकास अघाड़ी के अस्तित्व में आने के बाद से ही उद्धव ठाकरे ने मुस्लिमों यानी उस मतदाता वर्ग को अपने साथ लाने की कोशिशें शुरू कर दीं, जो आज तक शिवसेना के साथ कभी नहीं देखा गया था।
शिवसेना को हमेशा से कट्टर हिंदुत्व की राजनीति करने वाली पार्टी के रूप में जाना जाता है। विधानसभा के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों को छोडक़र, शिवसेना को बड़ी संख्या में मुस्लिम वोट नहीं मिले। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा लोकसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाता उद्धव ठाकरे की शिवसेना की ओर रुख करेंगे। आखिर इसके क्या कारण हैं?
मुस्लिम समुदाय से अपील
लोकसभा चुनाव में दो चरण के मतदान हो चुके हैं। चुनाव प्रचार भी अपने ज़ोरों पर है। लोकसभा सीट वाले क्षेत्रों में महाविकास अघाड़ी और महायुति की प्रचार बैठकें चल रही हैं। हर किसी की कोशिश, चाहे जो भी समुदाय हो, उसके मतदाताओं को आकर्षित करने की है।
शिवसेना में टूट के बाद शिवसेना का एक गुट बीजेपी के साथ है और दूसरा गुट कांग्रेस और पवार की एनसीपी के साथ है। ऐसे में यह तय है कि शिवसेना के वोटों का बंटवारा होगा। ऐसे में उद्धव ठाकरे राज्य के विभिन्न हिस्सों में मुस्लिम मतदाताओं से बातचीत कर रहे हैं।
इससे पहले राज्य में खासकर मुंबई और मराठवाड़ा में शिवसेना ने कट्टर हिंदुत्व विचारधारा का विस्तार किया था। इस कोशिश से कहा गया कि मराठी के साथ-साथ शिवसेना का हिंदुत्व वोट बैंक भी बना, अब उद्धव ठाकरे मुस्लिम वोटरों को अपनी तरफ़ करने की कोशिश कर रहे हैं।
माहिम की दरगाह मुंबई में प्रसिद्ध है। यह दक्षिण मध्य मुंबई निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है। इसी इलाके में शिवसेना का सेना भवन कार्यालय भी है। कुछ दिन पहले उद्धव ठाकरे ने माहिम के कुछ मुस्लिम मतदाताओं से सेना भवन में बातचीत की थी।
क्या कह रहे हैं चर्चा में शामिल लोग?
इस चर्चा में शामिल माहिम के वकील अकील अहमद ने बीबीसी मराठी से कहा, ‘मुस्लिम मतदाताओं ने हमेशा धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को वोट दिया है। आज भी मुस्लिम मतदाता उसी को वोट देंगे जो सभी के हित के लिए काम करेगा। हमलोग धर्म की राजनीति नहीं करते हैं। हम ऐसा प्रतिनिधि चाहते हैं जो संसद में हमारी आवाज़ उठा सके।’
माहिम दरगाह के कुछ पदाधिकारियों ने भी उद्धव ठाकरे से मुलाकात की। माहिम दरगाह के ट्रस्टी शाहनवाज ख़ान कहते हैं, ‘पहले की तुलना में अब शिवसेना कहीं ज़्यादा उदार है। इसलिए हमें उद्धव ठाकरे का समर्थन करना होगा। हम संविधान बचाना चाहते हैं।’
शाहनवाज़ ख़ान ये भी बताते हैं कि उद्धव ठाकरे ने मुस्लिम समुदाय को भरोसा दिलाते हुए कहा, ‘जैसे हमारी दुश्मनी बेहद मशहूर रही थी, वैसे ही हमारी दोस्ती भी मशहूर होगी। यक़ीन मानिए यह हम सभी के हक़ में होगा।’
इससे पहले पांच फरवरी को रायगढ़ जि़ले में मुस्लिम समुदाय की ओर से उद्धव ठाकरे को मराठी भाषा में कुरान उपहार में दिया गया था।
इस मौके पर बोलते हुए उन्होंने कहा था, ‘मुझे मराठी में कुरान दी गई, यही हमारा हिंदुत्व है। इसलिए किसी को भी हमारे हिंदुत्व पर संदेह नहीं करना चाहिए।’
इसके अलावा फरवरी में मुंबई के धारावी में शिवसेना की शाखा का दौरा करने के दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय की मौजूदगी देखी गई थी। इस पर काफी चर्चा भी हुई क्योंकि धारावी कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। इस दौरान संजय राउत ने कहा कि मुस्लिम समुदाय बड़ी संख्या में हमारी पार्टी के साथ हैं।
पहली बार मुस्लिम वोटरों का ठाकरे परिवार और उनकी शिवसेना को समर्थन, देखने को मिल रहा है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प है कि यह बदलाव कैसे हुआ या हो रहा है। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या यह समर्थन वास्तव में वोटों में दिखाई देगा?
शिव सेना की हिंदू धर्म की परिभाषा बदल गई है?
2022 में शिवसेना की दशहरा सभा में उद्धव ठाकरे ने कहा, ‘मेरे पास उनके लिए एक प्रश्न है। वास्तव में आपका हिंदुत्व क्या है? अन्य सभी धर्म गद्दार हैं, या जो भी देशभक्त है वह मेरा है, क्या यह आपका हिंदुत्व है?’
तो उद्धव ठाकरे पहले भी कई बार साफ़ कर चुके हैं कि उनका हिंदुत्व संकीर्ण हिंदुत्व नहीं है।
इतना ही नहीं बल्कि 2019 में उद्धव ठाकरे ने सम्मेलन के दौरान बयान दिया था कि उन्होंने धर्म को राजनीति के साथ मिलाकर गलती की है। इसके चलते 2019 में महा विकास अघाड़ी का प्रयोग सिर्फ सत्ता स्थापित करने तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि शिवसेना में बग़ावत के बाद उद्धव ठाकरे ने पार्टी को बढ़ाने के लिए कई अलग-अलग राजनीतिक प्रयोग करने शुरू कर दिए थे।
हालांकि शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे अपने भाषणों में हमेशा कट्टर हिंदू रुख पेश करते थे। 1987 में जब मुंबई के विले पारले के उपचुनाव में शिवसेना ने हिंदुत्व का रुख अपनाया तो बाला साहब के ऐसे ही एक बयान से विवाद हो गया।
बाला साहेब ठाकरे ने एक सभा में कहा था, ‘हम यह चुनाव हिंदुओं की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं। हमें मुस्लिम वोटों की परवाह नहीं है। यह देश हिंदुओं का है और उनका ही रहेगा।’
इस चुनाव में शिव सेना के उम्मीदवार रमेश प्रभु निर्वाचित हुए थे लेकिन मामला यह कहते हुए अदालत में चला गया कि वह भडक़ाऊ बयानों के कारण जीते हैं। बॉम्बे हाई कोर्ट ने बाला साहेब और रमेश प्रभु दोनों को इसके लिए दोषी पाया और नतीजे को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जगदीश सरन वर्मा ने मामले पर फैसला सुनाते हुए प्रभु और बालासाहेब ठाकरे के 29 नवंबर, 9 दिसंबर और 10 दिसंबर 1987 के भाषणों की जांच की। सज़ा के तौर पर 1995 से 2001 तक बाला साहेब का वोट देने का अधिकार छीन लिया गया।
उद्धव ठाकरे के ‘हिंदुत्व’ की अलग परिभाषा?
मराठवाड़ा में संभाजीनगर समेत कुछ जगहों पर शिवसेना ने अपना वर्चस्व कायम रखा है। इस बारे में बात करते हुए शिव सेना के ठाकरे गुट के दक्षिण मुंबई नेता पांडुरंग सकपाल कहते हैं, ‘बाला साहेब ठाकरे मुस्लिमों से नफऱत नहीं करते थे। बाला साहेब कहते थे कि हम हर धर्म से प्यार करते हैं। इसमें एक राष्ट्रीयता होनी चाहिए। हमारे शिवसेना प्रमुख ने एक मुस्लिम जोड़े को मातोश्री पर नमाज़ पढऩे की इजाज़त दी थी। आखऱिकार मानवता ही धर्म है।’
2019 तक उद्धव ठाकरे ने भी अपनी यही भूमिका बरकरार रखी। लेकिन 30 साल तक बीजेपी के साथ गठबंधन में रहने वाली शिवसेना ने गठबंधन तोडक़र कांग्रेस के साथ जाने का फैसला किया। बीजेपी ने भी उद्धव ठाकरे की आलोचना करते हुए कहा कि शिवसेना ने हिंदू धर्म छोड़ दिया है।
और तो और, शिवसेना विधायकों और सांसदों ने पार्टी में बग़ावत करते हुए कहा कि उद्धव ठाकरे ने बाला साहेब के विचारों को छोड़ दिया। और इसके बाद उद्धव ठाकरे ने यह नैरेटिव बनाना शुरू कर दिया कि उन्होंने हिंदुत्व नहीं छोड़ा है लेकिन हमारे और बीजेपी के पास हिंदुत्व की अलग-अलग परिभाषा है।
इस बारे में बात करते हुए 'जय महाराष्ट्र' नामक शिवसेना की जीवनी लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश अकोलकर कहते हैं कि उद्धव ठाकरे एक नए हिंदुत्व का प्रस्ताव रख रहे हैं।
अकोलकर का यह भी कहना है कि उद्धव ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि ‘धर्म को राजनीति से जोडऩा हमारी ग़लती थी।’
2022 के दशहरा मेले में, उद्धव ठाकरे ने यह संदेश देने की कोशिश की कि उनका हिंदुत्व किसी भी धर्म से नफऱत करने के बारे में नहीं है।
उन्होंने कहा, ‘औरंगजेब नाम का एक सिपाही कश्मीर में सेना में था। दो-चार साल पहले घर जाते समय उसका अपहरण कर लिया गया था और कुछ दिनों के बाद उसका शव सेना को मिला। यह स्पष्ट था कि उसे पीट-पीटकर मार डाला गया था।’
‘उसे किसने मारा था? आतंकवादियों ने। कौन धर्म से वह था? अपहरणकर्ता कौन थे, मैंने ये भी सुना कि उसका भाई उसकी हत्या का बदला लेने के लिए सेना में शामिल होने जा रहा था। क्या आप उसे इसलिए अस्वीकार कर देंगे क्योंकि वह मुस्लिम है?’
बाला साहेब से अलग है उद्धव ठाकरे की भूमिका?
शिवसेना की हिंदुत्व की बदलती परिभाषा के बारे में बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार संदीप प्रधान कहते हैं, ‘उद्धव ठाकरे को एहसास हुआ कि मोदी हिंदुत्व के आधार पर किसी अन्य नेता या पार्टी को बढऩे नहीं देंगे, या हिंदुत्व के मुद्दे पर किसी और को वोट लेने की अनुमति नहीं देंगे। उस समय, उद्धव ठाकरे ने हिंदुत्व की अपनी परिभाषा बदल दी, उन्होंने लोगों के सामने एक अलग हिंदुत्व लाने की कोशिश की है।’
तो क्या उद्धव ठाकरे की यह भूमिका बाला साहेब से भिन्न और अलग है?
इस बारे में बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश अकोलकर कहते हैं, ‘बाला साहेब की भूमिका अलग थी। मुस्लिम मतदाताओं और उनके बीच कोई संवाद नहीं था।
नागपुर सम्मेलन में उद्धव ठाकरे ने खुद स्वीकार किया कि उन्होंने धर्म और राजनीति को मिलाकर ग़लती की। इसलिए उन्होंने यह क़दम उठाया।’
‘2014 में जब मोदी ने बहुमत हासिल किया तभी भाजपा को एहसास हुआ कि उसे महाराष्ट्र में हिंदू सम्राट की ज़रूरत नहीं है और इसे उद्धव ठाकरे ने पहचान लिया था।’
मुस्लिम वोटरों का रुझान उद्धव ठाकरे के पक्ष में?
महाराष्ट्र में करीब 12 फ़ीसद मुस्लिम मतदाता हैं। मुंबई में मुसलमानों की आबादी करीब 22 फ़ीसद है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भले ही उद्धव ठाकरे मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनका पारंपरिक 'हिंदू वोट' उनके साथ रहेगा। इतना ही नहीं बीजेपी के साथ गठबंधन तोडऩे के बाद जो खालीपन आया है, उसे भरने की कोशिश उद्धव ठाकरे को करनी होगी और यह उनके लिए एक परीक्षा है।
मुंबई में दक्षिण मुंबई, दक्षिण-मध्य मुंबई, उत्तर-मध्य मुंबई, उत्तर-पश्चिम मुंबई और उत्तर-पूर्व मुंबई में मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या है। ठाकरे की शिवसेना के पास दक्षिण मुंबई और दक्षिण मध्य मुंबई निर्वाचन क्षेत्र हैं। अभी तक इस सीट पर शिवसेना बीजेपी गठबंधन को वोट मिलते रहे हैं। लेकिन अब जब बीजेपी उनके साथ नहीं है और शिव सेना के दो गुट हैं तो उद्धव ठाकरे के सामने गठबंधन में सहयोगी दलों के वोटों को अपनी तरफ़ मोडऩे की चुनौती है। मराठवाड़ा के विधानसभा क्षेत्रों में भी यही स्थिति है।
इस बारे में बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार समर खड़से कहते हैं, ‘केंद्र सरकार पिछले दस सालों में जिस तरह से चल रही थी और उसका लक्ष्य और नीतियां क्या थीं, यह एक अलग मुद्दा है। लेकिन पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, गोमांस मामले पर मॉब लिंचिंग और बुलडोजऱ नीति वाली पृष्ठभूमि में महाविकास अघाड़ी सरकार आई और मुस्लिम समुदाय को राहत मिली थी।’
लेकिन पहले शिवसेना को मुस्लिम वोट भी नहीं मिल रहे थे। श्रीकांत सरमालकर मुंबई के बेहरामपाड़ा बाग से शिवसेना के नगरसेवक चुने गए। रामदास कदम को खेड़ विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम वोट भी मिले।
भायखला से यशवंत जाधव और तत्कालीन विधायक यामिनी जाधव को भी मुस्लिम वोट मिले। समर खड़से का यह भी कहना है कि स्थानीय स्तर पर शिव सेना के नेटवर्क और काम के कारण मुस्लिम वोट शिवसेना को मिलते दिख रहे हैं।
वह कहते हैं, ‘मौजूदा स्थिति में तस्वीर यह है कि मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव कांग्रेस और एनसीपी की तुलना में मशाल चुनाव चिह्न की ओर अधिक होगा। क्योंकि उद्धव ठाकरे को बीजेपी के ख़िलाफ़ आक्रामक राजनीतिक लड़ाई लडऩे के लिए एक चेहरे के रूप में देखा जा रहा है।’
ठाकरे को किसका समर्थन मिल रहा है?
जहां महाविकास अघाड़ी में कांग्रेस, एनसीपी (शरद पवार समूह) और शिवसेना ठाकरे समूह बीजेपी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ रहे हैं, वहीं इन तीनों पार्टियों में तुलनात्मक रूप से उद्धव ठाकरे की आक्रामकता प्रमुख है।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश अकोलकर के मुताबिक यही कारण है कि बीजेपी विरोधी मतदाता उद्धव ठाकरे का समर्थन करते नजऱ आ रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘इस वक्त महाराष्ट्र में मोदी के खिलाफ जो शख्स डटकर खड़ा है, वह हैं उद्धव ठाकरे। कई बड़े नेता मोदी के कदमों से डरकर पाला बदल रहे हैं। लेकिन ठाकरे और पवार उनके खिलाफ डटकर खड़े हैं।’
शिवसेना को 12 से 14 विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम वोट मिलते थे, इसलिए यह पहली बार नहीं है कि ये वोट उद्धव ठाकरे को मिलेंगे, लेकिन वरिष्ठ पत्रकार संदीप प्रधान के मुताबिक, निश्चित रूप से उद्धव ठाकरे एक नया वोट बैंक साधने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, ''मुस्लिम मतदाता तय करते हैं कि उन्हें किसे वोट देना है और वे किसे वोट देना चाहते हैं। वे देखते हैं कि उद्धव ठाकरे दयनीय तरीके से बीजेपी की आलोचना कर रहे हैं। ’
वह आगे कहते हैं, ‘उद्धव ठाकरे को लगता है कि बीजेपी के आक्रामक वर्चस्ववाद का विरोध किया जाना चाहिए। प्रगतिशील सोच का एक वर्ग आज ठाकरे के पीछे खड़ा होगा और यह भी दिख रहा है कि इससे राय बदल जाएगी।’
कांग्रेस पर क्या असर होगा?
फिर सवाल उठता है कि अगर कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक ठाकरे के पास चला गया तो क्या इसका असर कांग्रेस पर पड़ेगा? इस पर बात करते हुए प्रधान कहते हैं, ‘यह तो स्पष्ट है कि इसका असर कांग्रेस पर पड़ेगा। राज्य में कांग्रेस कमजोर हो गई है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि उनका वोट बैंक कभी शिव सेना के पास आएगा। उस वोट बैंक को अपनी ओर मोडऩा ही ठाकरे का कौशल होगा।’
किसी ने नहीं सोचा होगा कि मुस्लिम मतदाता इतनी बड़ी संख्या में शिवसेना या ठाकरे परिवार का समर्थन करेंगे। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार मृणालिनी नानिवाडेकर को लगता है कि इसमें अस्वभाविक जैसा कुछ नहीं है।
उन्होंने कहा, ‘मुस्लिम वोट बहुत रणनीतिक हैं। वे विजयी घोड़े पर सवार नजऱ आते हैं। उन्हें लगता है कि मोदी अल्पसंख्यकों के मित्र नहीं हैं। इसके अलावा, मुस्लिम मतदाताओं को लगता है कि उद्धव ठाकरे ने महाविकास अघाड़ी सरकार बनाकर मोदी को सफलतापूर्वक चुनौती दी है।’
कोविड काल में उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। इस दौरान उद्धव ठाकरे ने कई बार समाज के माध्यम से लोगों से संवाद किया और ‘परिवार के मुखिया’ की पहचान हासिल की।
इस चुनाव में यह पहचान सत्ता में तब्दील होगी या नहीं, यह मतदान से ही तय होगा। (bbc.com/hindi)
चंदन कुमार जजवाड़े
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ शक्रवार को चुनावी मंच पर देखे गए हैं।
दोनों नेता मुंगेर सीट से चुनाव लड़ रहे जेडीयू के ललन सिंह के लिए प्रचार करने पहुँचे थे।
हालाँकि शुक्रवार को ही अररिया में हुई पीएम मोदी की सभा में नीतीश कुमार मौजूद नहीं रहे।
अररिया से बीजेपी उम्मीदवार प्रदीप सिंह मैदान में हैं।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर लिखा है कि क्या नीतीश कुमार एक बार फिर पलटी मारने की तैयारी कर रहे हैं या प्रधानमंत्री ख़ुद को बिहार की जातिगत गणना से दूर रख रहे हैं।
दरअसल नीतीश कुमार को लेकर ऐसी चर्चा बिहार में प्रधानमंत्री मोदी की नवादा रैली के बाद शुरू हुई।
7 अप्रैल को नवादा में मोदी और नीतीश एक साथ चुनावी मंच पर देखे गए थे। लेकिन नवादा के बाद बिहार में नरेंद्र मोदी की कुछ सभाओं में नीतीश कुमार मौजूद नहीं थे। उसके बाद से ही नीतीश कुमार के बीजेपी के साथ समीकरण पर कई तरह के सवाल सवाल किए जा रहे हैं।
बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा, ‘हमारे लिए नीतीश जी का पूरा सम्मान है जो आगे भी रहेगा, मुझे तो सूचना मिली है कि बीजेपी के लोगों ने ही नीतीश कुमार को मना किया है कि प्रधानमंत्री के साथ मंच पर न बैठें।’
हालाँकि इस मुद्दे पर कहा ये भी जा रहा है कि ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने एनडीए के सभी नेताओं को अलग-अलग चुनाव प्रचार करने को कहा है।
वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं, ‘बीजेपी के मन में यह डर भी हो सकता है कि उसे नीतीश के साथ से उनके एंटी इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी रुझान) को भी साझा करना पड़ सकता है, क्योंकि नीतीश कुमार कऱीब दो दशक से बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर मौजूद हैं।’
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को विपक्षी एकता का जनक भी माना जाता है। विपक्षी गठबंधन इंडिया में भले ही नीतीश के पास कोई पद नहीं था, लेकिन वो राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा के केंद्र में थे। विपक्ष की बैठकों में भी उनकी भूमिका काफ़ी अहम थी।
नीतीश इसी साल जनवरी के आखिर में विपक्ष का साथ छोडक़र एनडीए में शामिल हो गए थे।
पीएम मोदी के मंच से गायब नीतीश
इसी महीने नवादा में चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश कुमार ने पीएम की मौजूदगी में अपने भाषण में कई बार गलतियाँ की थीं।
नीतीश ने यहाँ तक कह दिया था कि लोग वोट देकर प्रधानमंत्री मोदी को ‘चार हज़ार लोकसभा’ सीटें देंगे।
अपने भाषण के बाद नीतीश कुमार प्रधानमंत्री मोदी के पाँव (घुटने) पकड़ते भी नजऱ आए थे। बिहार के सियासी गलियारों में यह तस्वीर चर्चा का एक विषय बन गई, जिसे बिहार में विपक्ष ने नीतीश के सम्मान के साथ भी जोड़ा था।
इसके बाद 16 अप्रैल को प्रधानमंत्री मोदी की गया और पूर्णिया में हुई चुनावी सभाओं में नीतीश कुमार मौजूद नहीं थे। जबकि आमतौर पर अपनी या अपने गठबंधन की सरकार वाले राज्य में प्रधानमंत्री की सभा में मुख्यमंत्री मौजूद होते हैं।
यहीं से नीतीश कुमार की एनडीए में स्थिति को लेकर चर्चा होने लगी।
नचिकेता नारायण कहते हैं ‘ललन सिंह और चिराग पासवान ने नवादा रैली के बाद कहा था कि पीएम ने एनडीए के सभी नेताओं को अलग-अलग रैली और सभाएँ करने को कहा है। यह लीपा पोती लग रही है। अगर ऐसा है तो कटिहार में नीतीश और अमित शाह एक साथ कैसे थे।’
21 अप्रैल को बीजेपी नेता अमित शाह की बिहार के कटिहार में चुनावी रैली हुई थी। उस रैली में नीतीश कुमार भी अमित शाह के साथ मौजूद थे।
हालाँकि शुक्रवार 26 अप्रैल को नरेंद्र मोदी की बिहार में दो चुनावी सभा हुई। यहाँ अररिया की सभा में एलजेपीआर के चिराग पासवान और एनडीए के कई नेता मोदी के साथ देखे गए, जबकि नीतीश कुमार इसमें मौजूद नहीं थे।
वहीं मुंगेर की सभा में नीतीश मोदी के साथ मंच पर मौजूद थे।
वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी दावा करते हैं, ‘नीतीश कुमार, मोदी जी से बड़े नेता रहे हैं, लेकिन वो जब बोलने लगते हैं तो काफ़ी लंभा भाषण हो जाता है। अब उनका भाषण जनता को अपील नहीं करता है। नीतीश कब क्या बोल देंगे यह भी पता नहीं चलता, इसलिए उनको मोदी के साथ मंच साझा करने से रोक दिया गया था।’
माना जाता है कि नीतीश और मोदी की चुनावी मंचों पर दूरी बनी रहने से वोटरों के मन में बीजेपी-जेडीयू के संबंधों को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं। पहले भी इन दोनों के बीच संबंधों में कई बार उतार चढ़ाव देखा गया है।
नीतीश और मोदी के रिश्ते
नीतीश कुमार पहली बार साल 1985 में बिहार विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने थे। नीतीश ने पहली बार साल 1989 में लोकसभा चुनाव जीता था और साल 1990 में वो पहली बार केंद्र सरकार में मंत्री भी बनाए गए थे।
नीतीश ने साल 2000 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, हालाँकि बहुमत ना होने से वह सरकार एक हफ़्ते भी नहीं चल पाई थी।
नीतीश बाद में केंद्र सरकार में कई विभागों के मंत्री रहे। कुछ वक्त को निकाल दिया जाए तो साल 2005 से बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश का ही कब्ज़ा है।
नरेंद्र मोदी साल 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बनाए गए थे। उसके बाद वो पहली बार विधानसभा के लिए चुने गए थे। यानी मोदी के मुकाबले चुनावी राजनीति में नीतीश कुमार ज़्यादा अनुभवी हैं।
साल 2002 नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उस समय राज्य के गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आग लगाई गई और उसके बाद गुजरात में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। उस समय नीतीश कुमार केंद्र सरकार में रेल मंत्री थे।
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद याद करते हैं, ‘नीतीश और मोदी के बीच पहली तल्ख़ी साल 2010 में आई थी। नीतीश ने पटना में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भोज का आयोजन किया था, लेकिन अख़बार में छपी एक तस्वीर से नीतीश इतने नाराज़ हुए थे कि उन्होंने भोज रद्द कर दिया।’
जून 2010 में पटना में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हो रही थी, जिसमें नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए थे।
उस वक्त अखबार में दिए गए एक विज्ञापन की तस्वीर में नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए दिखाया गया था।
कहा जाता है कि इस तस्वीर से नीतीश कुमार इतने नाराज हुए थे कि उन्होंने साल 2008 में कोसी बाढ़ राहत के तौर पर गुजरात सरकार से मिले 5 करोड़ रुपए भी लौटा दिए थे।
नीतीश कभी ‘एनडीए’ तो कभी ‘इंडिया’ में
साल 2009 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी देशभर में महज़ 116 सीटें जीत पाई थी। उस साल बिहार में एनडीए को 32 सीटों पर जीत मिली थी। इसमें जेडीयू ने 20 जबकि बीजेपी ने 12 सीटों पर जीत हासिल की थी।
साल 2010 के बिहार विधानसभा चुनावों में नीतीश जेडीयू को बिहार विधानसभा की 115 सीटों पर जीत दिलाने में सफल रहे थे। जबकि बीजेपी को भी 91 सीटों पर जीत मिली थी।
नीतीश कुमार के नाम पर इस तरह की चुनावी सफलता के रिकॉर्ड को देखते हुए साल 2013 में बीजेपी के नेता सुशील मोदी तक ने नीतीश कुमार को पीएम मैटेरियल बताया था।
लेकिन साल 2014 लोकसभा चुनावों के पहले नीतीश और मोदी के संबंधों में सबसे बड़ी दरार देखी गई थी। उस वक्त बीजेपी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया था। उसके बाद नीतीश कुमार एनडीए से बाहर हो गए थे।
नीतीश ने साल 2015 में कांग्रेस, आरजेडी और अन्य दलों के साथ बिहार में महागठबंधन बनाया था, लेकिन साल 2017 में महागठबंधन छोडक़र वापस एनडीए में चले गए।
नीतीश एक बार फिर साल 2022 में महागठबंधन में शामिल हुए और राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के खिलाफ विपक्षी एकता की मुहिम में लग गए। नीतीश की कोशिश के बाद ही साल 2023 के मध्य में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ बन पाया था।
हालाँकि उसके कुछ महीने बाद ही जनवरी 2024 में नीतीश कुमार विपक्षी गठबंधन को छोडक़र वापस एनडीए में शामिल हो गए थे।
सुरूर अहमद मानते हैं, ‘दरअसल मोदी और नीतीश कुमार के बीच शख्सियत की लड़ाई है। पीएम होने के कारण मोदी को सबसे अंत में बोलना होता है। नीतीश बहुत लंबा भाषण देते हैं, लेकिन समझदारी वाली बात नहीं कर रहे। मोदी जी लंबा भाषण सुनना नहीं चाहते हैं।’
जमीन पर असर
नीतीश कुमार ने एनडीए में ताज़ा वापसी के बाद लगातार दावा किया है कि वो अब बीजेपी का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। हालाँकि साल 2022 में जब नीतीश बीजेपी से दूर हुए थे तब भी उनका दावा था वो मरना पसंद करेंगे लेकिन बीजेपी के साथ जाना पसंद नहीं करेंगे।
उस दौरान बीजेपी के कई नेता भी दावा कर रहे थे कि अब नीतीश कुमार के लिए एनडीए के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हैं।
आँकड़ों के लिहाज से देखें तो नीतीश की एनडीए में वापसी से एनडीए स्थिति मजबूत हो सकती है, लेकिन कई ऐसे मुद्दे हैं जो हालात को पूरी तरह पलट भी सकते हैं।
नचिकेता नारायण मानते हैं कि साल 2014 को मोदी युग की शुरुआत के तौर पर देख सकते हैं जिसमें एनडीए की जीत ज़्यादा पक्की नजर आती थी। साल 2019 में भी पुलवामा जैसी घटना की वजह से एक मोदी की लहर दिख रही थी, जबकि इस बार ऐसा कुछ नहीं दिखता है।
नचिकेता नारायण कहते हैं, ‘मैं यह नहीं कह रहा कि इस बार एनडीए चुनाव हार ही रही है। लेकिन उसके प्रचार में फोकस नजर नहीं आता, इसलिए मंगलसूत्र की बात की जा रही है। इधर नीतीश की चमक भी फ़ीकी पड़ी है। यह स्थिति तेजस्वी के लिए भी वरदान साबित हो सकती है। उनको जनता की हमदर्दी भी मिल सकती है और वो नीतीश के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी से भी बच गए।’
शुक्रवार को मुंगेर की सभा में नीतीश कुमार भले ही मोदी के साथ मंच पर मौजूद थे, लेकिन माना जाता है कि मंच पर उनका उत्साह और अंदाज़ बदला हुआ नजऱ आ रहा था।
बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं, इनमें 39 सीटों पर साल 2019 के चुनावों में एनडीए ने जीत हासिल की थी।
बिहार में अब तक हुए दो चरण की वोटिंग में पिछले चुनावों के मुकाबले कम मतदान देखने को मिला है।
इसका क्या असर होगा? यह 4 जून को मतगणना के बाद स्पष्ट हो पाएगा। (bbc.com/hindi)
इन दिनों वैद्य और सेलिब्रिटीज़ अश्वगंधा का काफी गुणगान कर रहे हैं। यह औषधीय पौधा हजारों वर्षों से पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में उपयोग किया जाता रहा है। और कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों ने भी दर्शाया है कि तनाव, चिंता, अनिद्रा तथा समग्र स्वास्थ्य प्रबंधन में अश्वगंधा उपयोगी है। इन सबके चलते अश्वगंधा में जिज्ञासा स्वाभाविक है।
कहना न होगा कि अश्वगंधा सभी समस्याओं का कोई रामबाण इलाज नहीं है। इस बारे में न्यूयॉर्क स्थित प्रेस्बिटेरियन हॉस्पिटल की विशेषज्ञ चिति पारिख के अनुसार इसकी प्रभाविता व्यक्ति के लक्षण, शरीर की संरचना और चिकित्सा इतिहास के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। इसके अलावा इसके गलत उपयोग से प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकते हैं।
अश्वगंधा (Withaniasomnifera) जिसे इंडियन जिनसेंग या इंडियन विंटर चेरी के रूप में भी जाना जाता है, एक सदाबहार झाड़ी है जिसका उपयोग सदियों से विभिन्न स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओं के लिए किया जाता रहा है। पारिख इसे एक संतुलनकारी बताती हैं। संतुलनकारी या एडाप्टोजेन ऐसे पदार्थ होते हैं जो शरीर को तनाव के अनुकूल होने और संतुलन बहाल करने में मदद करते हैं, और साथ ही सूजन (शोथ) को कम करने, ऊर्जा बढ़ाने, चिंता को कम करने और नींद में सुधार करने में उपयोगी होते हैं।
ऐसा माना जाता है कि यह पौधा अपने सक्रिय घटकों (जैसे एल्केलॉइड, लैक्टोन और स्टेरॉइडल यौगिकों) के माध्यम से शरीर में तनाव प्रतिक्रिया को नियमित करने और शोथ को कम करने का काम करता है। नैसर्गिक रूप से पाए जाने वाले स्टेरॉइड यौगिक विदानोलाइड्स को एंटीऑक्सीडेंट और शोथ-रोधी प्रभावों का धनी माना जाता है। कई अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि विदानोलाइड्स के सांद्र अर्क सबसे प्रभावी होते हैं।
नॉर्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी के ओशर सेंटर फॉर इंटीग्रेटिव हेल्थ की मेलिंडा रिंग के अनुसार ये जैव-सक्रिय घटक कोशिका क्रियाओं को निर्देशित करने वाले संकेतक मार्गों को प्रभावित कर सकते हैं लेकिन इनकी सटीक क्रियाविधि को समझने के लिए अभी भी शोध चल रहे हैं।
कई छोटे पैमाने के शोध अश्वगंधा के लाभों का समर्थन करते हैं। भारत में 2021 के दौरान 491 वयस्कों पर किए गए सात अध्ययनों की समीक्षा में पाया गया कि जिन प्रतिभागियों ने अश्वगंधा का सेवन किया उनमें प्लेसिबो (औषधि जैसे दिखने वाले गैर-औषधि पदार्थ) लेने वालों की तुलना में तनाव और चिंता का स्तर काफी कम रहा। भारत में ही 372 वयस्कों पर किए गए पांच अध्ययनों की समीक्षा में नींद की अवधि और गुणवत्ता में मामूली लेकिन उल्लेखनीय सुधार देखा गया। यह खासकर अनिद्रा से पीडि़त लोगों के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हुआ।
इसके अलावा अश्वगंधा की पत्तियों में पाया जाने वाला ट्रायएथिलीन ग्लायकॉल संभावित रूप से त्र्रक्च्र रिसेप्टर्स को प्रभावित कर नींद को बढ़ावा देता है, जो तनाव या भय से जुड़ी तंत्रिका कोशिका गतिविधि को अवरुद्ध करके मस्तिष्क में एक शांत प्रभाव पैदा करता है। रिंग यह भी बताती हैं कि अश्वगंधा अर्क नींद से जागने पर बिना किसी गंभीर दुष्प्रभाव के मानसिक सतर्कता में सुधार करता है। कुछ अध्ययन गठिया, यौन स्वास्थ्य, पुरुषों में बांझपन, मधुमेह और एकाग्रता अवधि और स्मृति सुधार में अश्वगंधा को प्रभावी बताते हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश मामलों में और अधिक डैटा की आवश्यकता है।
सुरक्षितता के मामले में यू.एस. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की विशेषज्ञ बारबरा सी. सॉर्किन का सुझाव है कि अधिकांश लोगों के लिए लगभग तीन महीने तक अश्वगंधा का सेवन सुरक्षित है। लेकिन गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं, प्रोस्टेट कैंसर पीडि़तों और थायराइड हारमोन की दवाओं का सेवन करने वालों को सावधानी बरतनी चाहिए। अश्वगंधा संभवत: यकृत की समस्याएं पैदा कर सकता है, थायरॉइड ग्रंथि के कार्य को प्रभावित कर सकता है तथा थायरॉइड औषधियों व अन्य दवाओं के साथ अंतर्कि्रया भी कर सकता है। यकृत स्वास्थ्य और हारमोन के स्तर पर इसके प्रभाव को देखते हुए डेनमार्क में तो अश्वगंधा पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया है। लेकिन भारत में इसका काफी अधिक उपयोग किया जा रहा है।
चूंकि यू.एस. में अश्वगंधा जैसे आहार अनुपूरक का नियमन दवाओं की तरह नहीं किया जाता है, इसलिए अनुपूरकों के वास्तविक घटक और गुणवत्ता पता करना मुश्किल होता है। लेकिन कंज़्यूमरलैब जैसी स्वतंत्र प्रयोगशाला संस्थाएं उपभोक्ताओं को गुणवत्ता मानकों पर खरा उतरने वाले ब्रांड पहचानने में मदद कर सकती हैं।
बहरहाल, विशेषज्ञ अश्वगंधा के सेवन से पहले डॉक्टर से परामर्श लेने की सलाह देते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह आपकी स्वास्थ्य स्थितियों और दवाओं के साथ उपयुक्त है या नहीं। साथ ही इस बात का ख्याल रखें कि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’। (स्रोतफीचर्स)
भूख कई वजह से मर जाती है। पेट भरा हो या हमारा जी मिचलाए या उल्टी का जी हो तो खाने की इच्छा मर जाती है। क्या हर मामले में क्रियाविधि एक ही होती है या हर बार तंत्रिका तंत्र में कुछ अलग ही खिचड़ी पक रही होती है? सेल रिपोर्ट्स में प्रकाशित ताज़ा शोध में शोधकर्ताओं ने इसी सवाल का जवाब खोजा है। इसके लिए उन्होंने मॉडल के तौर पर चूहों को लिया और उनके मस्तिष्क में झांक कर देखा कि हर स्थिति में खाने के प्रति यह अनिच्छा ठीक कहां जागती है।
दरअसल पूर्व में हुए अध्ययन में बताया गया था कि पेट भर जाने और मितली होने, दोनों मामलों में खाने के प्रति अनिच्छा मस्तिष्क में एक ही जगह से नियंत्रित होती है - सेंट्रल एमिगडेला (CeA) के एक ही न्यूरॉन्स समूह (Pkco) से।
लेकिन मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर बायोलॉजिकल इंटेलिजेंस के वेन्यू डिंग को इस बात पर संदेह था। इस संदेह को दूर करने के लिए उन्होंने ऑप्टोजेनेटिक्स नामक प्रकाशीय तकनीक से लंबे समय से भूखे कुछ चूहों में इन न्यूरॉन्स को सक्रिय किया; ऐसा करने पर चूहों ने कुछ नहीं खाया जबकि वे एकदम भूखे थे। जब इन न्यूरॉन्स को ‘शांत’ कर दिया गया तो चूहे खाने लगे। और तो और, भोजन के दौरान ही इन न्यूरॉन्स को सक्रिय करने पर चूहों ने फिर खाना छोड़ दिया।
इससे शोधकर्ताओं को लगा कि यही न्यूरॉन्स मितली या जी मिचलाने जैसी अनुभूतियों में शामिल होंगे। इसलिए उन्होंने चूहों को मितली पैदा करने वाले रसायनों का इंजेक्शन लगाया और फिर उनके मस्तिष्क का स्कैन किया। पाया गया कि जब चूहों को मितली महसूस होती है तो CeA के मध्य भाग (CeM) के DLKv न्यूरॉन्स सक्रिय होते हैं। लेकिन ये न्यूरॉन्स तब सक्रिय नहीं हुए थे जब चूहों का पेट सामान्य रूप से भर गया था या उन्हें सामान्य रूप से तृप्ति का एहसास हुआ था। अर्थात मस्तिष्क में तृप्ति और मितली के कारण खाने की अनिच्छा दो अलग जगह से नियंत्रित होती है। फिर शोधकर्ताओं ने मितली से परेशान और भूखे चूहों में इन न्यूरॉन्स की गतिविधि को अवरुद्ध करके देखा। पाया कि मितली की समस्या होने के बावजूद चूहों ने खाना खा लिया।
मस्तिष्क में मितली या तृप्ति को नियंत्रित करने वाले स्थान के बारे में समझना अनियमित खानपान, जैसा मोटापे या क्षुधानाश (एनोरेक्सिया) में होता है, जैसी समस्या को समझने में महत्वपूर्ण हो सकता है।
यह इन समस्याओं को थामने के लिए ऐसे उपचार तैयार करने में मददगार हो सकता है जो भूख को दबाकर तृप्ति का एहसास दें लेकिन मितली का अहसास न जगाएं। दूसरी ओर, मितली के अहसास को दबाकर खाने की इच्छा जगाई जा सकती है। मितली कई तरह के कैंसर उपचारों का एक आम साइड-इफेक्ट है जिसके कारण खाने के प्रति अरुचि पीडि़त को पर्याप्त पोषण नहीं लेने देती, जिसके चलते शरीर और कमज़ोर होता जाता है।(स्रोतफीचर्स)


