अंतरराष्ट्रीय
काबुल, 18 अप्रैल | अफगानिस्तान के बदघीस प्रांत में एक पुलिसकर्मी ने अपने तीन सहयोगियों पर गोली चला दी, जिससे उनकी मौत हो गई। एक अधिकारी ने रविवार को इसकी पुष्टि की। डिप्टी प्रांतीय पुलिस प्रमुख ख्वाजा मुराद खान ने समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने बताया कि यह घटना शनिवार की शाम प्रांतीय राजधानी काला-ए-नवा के उत्तर में मुकुर जिले के एक पुलिस चौकी पर हुई।
उन्होंने कहा कि शूटर हथियार और गोला-बारूद के साथ भाग गया और तालिबानी आतंकवादियों के साथ शामिल हो गया।
स्थानीय पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है और जल्द ही विवरण जारी किया जाएगा।
14 अप्रैल को, कुंदुज प्रांत में इसी तरह के एक अंदरूनी हमले में तीन पुलिस कर्मी मारे गए थे।(आईएएनएस)
टोक्यो, 18 अप्रैल | जापान के मियागी प्रान्त में भूकंप के झटके महसूस किए गए। इसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 5.8 मापी गई। अधिकारियों ने रविवार को यह जानकारी दी। समाचार एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार, जापान मौसम विज्ञान एजेंसी (जेएमए) ने कहा कि भूकंप सुबह 9.29 बजे आया, जिसका केंद्र अक्षांश में 38.3 डिग्री उत्तर व देशांतर में 141.9 डिग्री पूर्व में और 50 किमी की गहराई पर स्थित था।
जापानी भूकंपीय तीव्रता के पैमाने पर मियागी प्रान्त के कुछ हिस्सों भूकंप का स्तर 4 था। जबकि इसका अधिकतम स्तर 7 है।
भूकंप के सिलसिले में अभी तक सुनामी की कोई चेतावनी जारी नहीं की गई है। (आईएएनएस)
-उमर फ़ारूक़
अफ़ग़ान मुजाहिदीन के हाथों में स्ट्रिंगर मिसाइल आई तो अफ़ग़ानिस्तान-रूस युद्ध की तस्वीर ही बदल गई
गफ़्फ़ार ने अपनी तीन हमलावर टीमों को एक-दूसरे से कुछ दूरी पर त्रिकोणीय क्रम में रखा था. प्रशिक्षण के दौरान उन्हें यही सिखाया गया था. वे लंबे समय से घात लगाकर इंतज़ार कर रहे थे.
कुछ ही देर में जब उन्होंने कुछ रूसी, एमआई-24 हेलीकॉप्टरों को हवा में आते देखा तो उन्हें उनके सब्र का फल मिल गया. गफ़्फ़ार की टीम के सदस्यों में से एक ने हेलीकॉप्टर पर निशाना लगा कर ट्रिगर दबा दिया, लेकिन उस समय उनके होश उड़ गए, जब मिसाइल हेलीकॉप्टर से टकराने के बजाय सिर्फ 300 मीटर की दूरी पर ही ज़मीन पर जा गिरी.
मुजाहिदीन को प्रशिक्षित करने वाले पाकिस्तान के सेवानिवृत्त कर्नल महमूद अहमद ग़ाज़ी के अनुसार, ऑपरेशन विफल रहा, लेकिन इस मिसाइल की गूंज केवल अफ़ग़ानिस्तान के सैन्य ठिकानों में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में सुनी गई.
अफ़ग़ानिस्तान के युद्ध ग्रस्त क्षेत्र के अंदर सोवियत वायु सेना के खिलाफ स्टिंगर मिसाइल का यह पहला उपयोग था. इसके बाद जलालाबाद और काबुल के क्षेत्रों में रूसी और अफ़ग़ान हवाई यातायात को निलंबित कर दिया गया था.
अमेरिका निर्मित स्टिंगर मिसाइलों को संचालित करने और संभालने के लिए पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी, आईएसआई ने सबसे पहले दो सैन्य कमांडरों को प्रशिक्षित किया था. नंगरहार के रहने वाले एक सैन्य कमांडर गफ़्फ़ार और दूसरे काबुल के रहने वाले कमांडर दरवेश, ये दोनों गुलबुद्दीन हिकमतयार के हिज्ब-ए-इस्लामी समूह से जुड़े हुए थे.
वे दोनों धाराप्रवाह रूसी बोलने के साथ-साथ उर्दू और पश्तो में भी माहिर थे. आईएसआई ने दोनों कमांडरों को देश की राजधानी इस्लामाबाद और जुड़वां शहर रावलपिंडी को जोड़ने वाले क्षेत्र, फैज़ाबाद के ओजड़ी कैंप के स्टिंगर ट्रेनिंग स्कूल में दो सप्ताह तक प्रशिक्षण दिया. ट्रेनिंग के बाद पहले ऑपरेशन के लिए दोनो कमांडरों को जलालाबाद हवाई अड्डे की तरफ भेजा गया था.
आईएसआई के स्टिंगर ट्रेनिंग स्कूल के तत्कालीन प्रमुख और मुख्य प्रशिक्षक सेवानिवृत्त कर्नल महमूद अहमद ग़ाज़ी ने अपनी पुस्तक में लिखा है, "ये 25 सितंबर 1986 का दिन था, जब गफ़्फ़ार अपनी टीम के साथ जलालाबाद हवाई अड्डे के उत्तर पूर्व में, कुछ दूरी पर टीलेनुमा पहाड़ी की झाड़ियों और चट्टानों में घात लगाए बैठे थे."
क्या थी स्टिंगर मिसाइल
स्टिंगर कंधे पर रख कर सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल है, जिसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है.

यह अमेरिकी रक्षा उद्योग का एक उत्पाद था. अफ़ग़ान युद्ध के दौरान इस मिसाइल के उपयोग से रूसी वायु सेना के परखच्चे उड़ गए थे. स्टिंगर के आने से पहले, मुजाहिदीन के सैन्य अभियानों का बहुत कम प्रभाव पड़ रहा था. विशेषज्ञों का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान में रूसी सेना की हार का मुख्य कारण स्टिंगर्स ही थी.
सेवानिवृत्त कर्नल महमूद अहमद ग़ाज़ी, जो अफ़ग़ान मुजाहिदीन के लिए स्थापित स्टिंगर ट्रेनिंग स्कूल के प्रमुख थे, पाकिस्तान सेना की वायु रक्षा रेजिमेंट में एक अधिकारी थे. उन्हें आईएसआई टीम के प्रमुख के रूप में स्टिंगर के प्रशिक्षण के लिए वॉशिंगटन डीसी भी भेजा गया था.
उन्हें अमेरिका भेजने का मुख्य उद्देश्य अफ़ग़ानिस्तान में लड़ रही अफ़ग़ान मुजाहिदीन टीमों को स्टिंगर चलाने के लिए प्रशिक्षित करना और स्टिंगर के संचालन की कला में उन्हें माहिर करना था. ताकि स्टिंगर मिसाइलों की मदद से रूसी वायु सेना की शक्ति को ख़त्म कर दिया जाए.
अफ़ग़ानिस्तान में रूसी वायु सेना के ख़िलाफ़ स्टिंगर बेहद प्रभावी और कारगर साबित हुईं. स्टिंगर मिसाइलों के आगमन के बाद, रूसियों ने अफ़ग़ानिस्तान में ज़मीनी हमलों के लिए अपने लड़ाकू जहाज़ों का उपयोग करना शुरू कर दिया.
स्टिंगर्स के आने से पहले, अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध के दौरान रूसी और अफ़ग़ान सेनाओं को प्रतिद्वंदी वायु सेना का सामना नहीं करना पड़ता था. इसलिए अधिकांश रूसी हेलीकॉप्टरों का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में अफ़ग़ान मुजाहिदीन के ठिकानों पर ज़मीनी हमलों के लिए किया जाता था.
सेवानिवृत्त कर्नल महमूद अहमद ग़ाज़ी ने अपनी पुस्तक 'अफ़ग़ान वॉर एंड स्टिंगर सागा' में लिखा है कि "1986 में 36 लॉन्चर और 154 स्टिंगर मिसाइलों को अफ़ग़ानिस्तान भेजा गया था. इनमें से 37 स्टिंगर चलाए गए, जिनसे 26 रूसी जहाज़ गिराए गए थे."

1989 तक अफ़ग़ान जंग में, स्टिंगर के निशाने पर मार करने की दर में लगातार वृद्धि होती गई और आखिरकार रूसी अफ़ग़ानिस्तान से वापस चले गए.
आईएसआई स्टिंगर स्कूल 1993 तक सक्रिय रहा, उस दौरान पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व का ध्यान इसी पर केंद्रित रहा. जिसका सबूत इस बात से मिलता है कि उस समय के दो प्रधानमंत्रियों, मोहम्मद ख़ान जुनेजो और फिर बेनज़ीर भुट्टो ने उस स्कूल का दौरा किया था.
सेवानिवृत्त कर्नल ग़ाज़ी अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि प्रमुख अमेरिकी राजनेता और सीआईए के अधिकारी अक्सर इस स्कूल का दौरा करते थे.
ओजड़ी शिविर दुर्घटना
आईएसआई में अफ़ग़ान डेस्क के सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल महमूद अहमद ग़ाज़ी ने फ़ैज़ाबाद के ओजड़ी शिविर में एक साथी अधिकारी के कार्यालय में प्रवेश किया, तो उन्होंने अपने सहयोगी को चिंताजनक स्थिति में फील्ड फोन पर किसी को फोन मिलाते देखा.
ये 10 अप्रैल, 1988 को सुबह 9:30 बजे का समय था. ओजड़ी शिविर पाकिस्तान की शक्तिशाली खुफिया सेवा, आईएसआई का अलग-थलग और सुनसान सा स्थानीय कार्यालय और इंटेलिजेंस का अफ़ग़ान डेस्क का फिल्ड ऑफिस था. इसके विशाल परिसर के भीतर गोला-बारूद का गोदाम भी था.
लेफ्टिनेंट कर्नल महमूद अहमद ग़ाज़ी ने बाद में अपने संस्मरणों में लिखा था कि "फील्ड फोन का उपयोग करने वाले अधिकारी परेशान दिखाई दे रहे थे, क्योंकि उन्हें बारूद के गोदाम से कोई जवाब नहीं मिल रहा था. बारूद के गोदाम से कोई जवाब न मिलने का मतलब था कि कोई बहुत बड़ी गड़बड़ है."
कर्नल महमूद अहमद ग़ाज़ी ने लिखा है, कि "उन्होंने (फील्ड फोन का उपयोग करने वाले अधिकारी) मुझे बताया कि जहां गोला बारूद रखा जाता है, वहां से उन्होंने एक ज़ोरदार धमाके की आवाज़ सुनी है. इसी बीच मेजर बट दौड़ते हुए ऑफिस में दाखिल हुए और कहा कि बारूद के गोदाम में विस्फोट हो गया है. अफ़ग़ान डेस्क के प्रमुख ब्रिगेडियर अफज़ल जंजुआ और कर्नल इमाम (अफ़ग़ान मुजाहिदीन के प्रशिक्षक) समेत कार्यालय के सभी अधिकारी तुरंत गोदाम की तरफ दौड़ पड़े."
कर्नल ग़ाज़ी ने अपनी पुस्तक 'अफ़ग़ान वॉर एंड स्टिंगर सागा' में लिखा है कि जब हम बारूद के गोदाम पर पहुंचे, जो अफ़ग़ान डेस्क कार्यालय से केवल 200 मीटर की दूरी पर था, तो हमने ओजड़ी कैंप में कुछ अधिकारियों और सैनिकों को देखा. वो ओजड़ी कैंप के परिसर से बारूद से भरे ट्रक निकालने की कोशिश कर रहे थे. जब उन्हें ये अहसास हुआ कि किसी भी क्षण इससे बड़ा विस्फोट हो सकता है तब उन्होंने ट्रक निकलने का ये ऑपरेशन शुरू किया था.
सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल ग़ाज़ी ने लिखा, "गेट पर पहुंचने के बाद इन ट्रकों के ड्राइवर उस समय डर गए जब उन्होंने परिसर से निकलने वाला गेट बंद पाया. जैसे ही गेट पर तैनात सिक्योरिटी वालों को पता चला कि कुछ गड़बड़ है, तो उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया (एसओपी) के अनुसार सभी फाटकों को बंद कर दिया था. एक अन्य अधिकारी, मेजर रफाक़त, बारूद से भरे उन ट्रकों में से दस ट्रकों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने में कामयाब हो गए थे."
कर्नल ग़ाज़ी ने लिखा कि ''बारूद के गोदाम के पास पहुंचने पर, हमें एक भयानक दृश्य दिखाई दिया. गोला-बारूद गोदाम, जो छत तक हथियारों से भरा पड़ा था, आग की चपेट में था. गोदाम में कोई व्यक्ति नहीं था. ज़ाहिरी तौर पर कोई भी आग बुझाने की कोशिश नहीं कर रहा था. ऐसा लगता था कि गोदाम में जो लोग मौजूद थे, उन्होंने गलत प्राथमिकताएं अपनाई थीं. पहले आग को नियंत्रित करने के बजाय, वे प्राथमिक चिकित्सा और घायल लोगों को निकालने में लग गए थे. यह अनुभवहीनता और प्रशिक्षण की कमी का एक निश्चित संकेत था."
उन्होंने लिखा कि "हम सभी को महसूस हो गया था कि बड़ा विस्फोट होने में बस कुछ ही क्षण बाकी हैं जो बस होने वाला है. कर्नल इमाम ने तत्काल ख़तरे को महसूस किया, मुझे उनके शब्द याद हैं कि "बहुत देर हो गई, अब कुछ नहीं हो सकता."
वो लिखते हैं कि "अभी हम मुश्किल से 'जगह खाली करो' ही चिल्ला पाए थे, कि एक बड़ा विस्फोट हो गया."
ये भयानक विस्फोट जिस समय हुआ, वहां मौजूद किसी आईएसआई अधिकारी की तरफ से ऐसी सूचनाओं का सामने आना दुर्लभ ही होता है.
33 साल पहले रावलपिंडी और इस्लामाबाद के संगम पर स्थित आईएसआई के फील्ड ऑफिस में से एक, ओजड़ी कैंप में हुए इस धमाके की वजह से, रॉकेट, मिसाइल और कई अन्य तरह के गोला-बारूद आवासीय और व्यापारिक क्षेत्रों पर बारिश की तरह बरस रहे थे. इस धमाके की भयावह याद लोगों के दिमागों से अभी तक नहीं मिटी.
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अफ़ग़ान युद्ध पूरे जोरों पर था और पाकिस्तान की आईएसआई, अमेरिका की सीआईए की मदद से अफ़ग़ान विद्रोहियों को हथियार, गोला-बारूद, प्रशिक्षण और धन मुहैया करा रही थी. आईएसआई इस्लामाबाद और रावलपिंडी को मिलाने वाले स्थान पर स्थित, ओजड़ी शिविर का इस्तेमाल हथियार और गोला बारूद जमा करने के तौर पर कर रही थी.
लेफ्टिनेंट कर्नल महमूद अहमद ग़ाज़ी के संस्मरणों से पता चलता है कि शहर के बीचों-बीच गोला बारूद के इस गोदाम के निर्माण का विचार, आईएसआई के तत्कालीन महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अख्तर अब्दुल रहमान का था.
कर्नल ग़ाज़ी के अनुसार, जनरल रहमान ने आईएसआई के भीतर यह धारणा बनाने की कोशिश की, कि ओजड़ी कैंप में धमाका नुक़सान पहुंचाने का ऑपरेशन था. ताकि वो खुद पर होने वाली इस आलोचना का रुख मोड़ सकें कि आखिर शहर के बीचों-बीच इतनी बड़ी मात्रा में गोला बारूद क्यों जमा किया गया था.
सेवानिवृत्त कर्नल ग़ाज़ी लिखते हैं कि "हर तरह के हथियार को मिला कर कुल दस हज़ार टन का भंडार था जो हवा में उड़ रहा था, स्टिंगर हवा में उड़ रही थीं. हजारों रॉकेट, एंटी टैंक माइन्स (टैंक तबाह करने वाली बारूदी सुरंगें), रिकाइलज़, राइफल्स (छोटी तोपों) के गोले और हलके हथियारों की लाखों गोलियों का क़हर हर तरफ बरस रहा था. यह एक पागलखाना था."
कर्नल ग़ाज़ी के अनुसार, इस विस्फोट में कई आईएसआई अधिकारी, एक दर्जन से अधिक अफ़ग़ान मुजाहिदीन के साथ मारे गए थे. जो उस समय स्टिंगर ट्रेनिंग स्कूल में प्रशिक्षण ले रहे थे. यह स्कूल उसी परिसर में स्थित था.
उन दिनों, यह व्यापक रूप से माना जाता था कि ओजड़ी कैंप धमाके में रूसियों का हाथ था. ताकि अफ़ग़ानिस्तान को स्टिंगर की आपूर्ति में देरी हो या फिर आपूर्ति निलंबित हो जाये. लेकिन सेवानिवृत्त कर्नल ग़ाज़ी एक अलग ही कहानी बताते हैं.
स्टिंगर मिसाइलों के बारे में अफ़वाहें, कॉन्स्पिरेसी थ्योरी और सच
ज्वाइंट चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ़ कमेटी (तीनों सशस्त्र सेनाओं के प्रमुखों की कमिटी) के तत्कालीन अध्यक्ष जनरल अख्तर अब्दुल रहमान ने 10 अप्रैल, 1988 की शाम को ओजड़ी कैंप का दौरा किया था. उस समय आग पर काबू पाया जा चुका था.
कर्नल ग़ाज़ी के अनुसार, उन्होंने परिसर में मौजूद आईएसआई अधिकारियों से बात की. "जनरल रहमान ने अधिकारियों से कहा कि उन्हें लगता है कि यह कार्रवाई जान-बूझकर की गई है. क्योंकि सभी गोला-बारूद जो हमारे पास था वो बहुत कारगर साबित हुआ था और पिछले छह से सात वर्षों में कभी भी ऐसी रिपोर्ट नहीं हुई. यह जनरल अख्तर का विचार था कि शहर के अंदर इतने बड़े पैमाने पर गोला-बारूद के गोदाम का निर्माण किया जाये.
"कम्युनिकेशन करने वाले हमारे लोगों ने शहरी क्षेत्रों के पास इस बारूद गोदाम के निर्माण पर कई बार आपत्ति जताई थी. लेकिन जनरल अख्तर ने इन आपत्तियों को सख़्ती के साथ खारिज कर दिया था. उनकी प्राथमिकताएं वास्तव में बहुत अलग थीं. कर्नल गाज़ी के अनुसार, आईएसआई और सेना के हलकों में तनाव था, कुछ लोग इस विस्फोट को जान-बूझकर की गई कार्रवाई बता रहे थे और कुछ लोग इसे दुर्घटना बता रहे थे. लेकिन जनरल आलोचना का रुख़ मोड़ना चाहते थे. क्योंकि शहर के अंदर गोदाम बनाने का विचार उनका था. इसलिए उनकी आलोचना भी हो रही थी. जनरल ज़िया ने भी उस शाम को जब प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया, तो उनका भी वही कहना था."
ओजड़ी कैंप की घटना को समझाने के लिए उन दिनों कुछ कॉन्स्पिरेसी थ्योरी भी चल रही थीं. उनमे से एक थ्योरी यह थी कि शायद अफ़ग़ान मुजाहिदीन में से, किसी ने चोरी से कुछ स्टिंगर मिसाइलें ईरानियों को बेच दी थीं. लेकिन कुछ लोगों का कहना था कि पाकिस्तान की सेना में से किसी ने यह काम किया था. क्योंकि अमेरिका की सैन्य विशेषज्ञों की एक टीम शिविर का दौरा करने वाली थी, ताकि मिसाइलों की संख्या की जांच की जा सके.
सेवानिवृत्त कर्नल ग़ाज़ी ने इस थ्यौरी के बारे में सीधे तौर पर अपनी पुस्तक में तो कुछ नहीं लिखा. लेकिन वह इस दुर्घटना के बारे में दो तथ्य बताते हैं कि उन्हें इस कॉन्स्पिरेसी थ्योरी के बारे में पता था.
सबसे पहले, सेवानिवृत्त कर्नल ग़ाज़ी आईएसआई की अफ़ग़ान डेस्क में स्टिंगर मिसाइलों की संख्या का विवरण देते हैं: "पाकिस्तान को अमेरिका से कुल 487 लांचर और 2288 स्टिंगर मिसाइलें मिली थीं. इनमें से, 10 अप्रैल, 1988 को प्रसिद्ध ओजड़ी शिविर विस्फोट में 122 लॉन्चर और 281 स्टिंगर नष्ट हो गए थे, जिसके बाद हमारे पास केवल 365 लांचर और 2007 मिसाइलें बची थीं. इनमें से, 336 लांचर और 1969 मिसाइलों का इस्तेमाल मुजाहिदीन ने किया था और बाकी अमेरिका को वापस कर दिये गये थे."
संभवतः इस बयान से, कर्नल ग़ाज़ी उस कॉन्स्पिरेसी थ्योरी का खंडन करना चाहते थे कि आईएसआई में से किसी ने ईरानियों को स्टिंगर बेच दी थीं.
सेवानिवृत्त कर्नल ग़ाज़ी की स्टिंगर कहानी में ईरानियों का भी उल्लेख है. अपनी पुस्तक में, उन्होने 1987 में घटी एक घटना के बारे में बताया है. जब समूह के कमांडर यूनुस खालिस हेलमंद नदी के किनारे यात्रा करते हुए, भटक कर ईरानी क्षेत्र में चले गए थे. इसके बाद ईरानी सेना ने उन्हें पकड़ लिया था और स्टिंगर मिसाइलों को ज़ब्त कर लिया था. पाकिस्तानी विदेश कार्यालय ने ईरानी सरकार पर दबाव डाला लेकिन इसके बावजूद ईरानी सरकार ने मिसाइलों को वापस करने से इनकार कर दिया.
"'उसी साल (1987) में एक बार फिर खालिस के एक कमांडर (जिसे चार लॉन्चर और 16 स्टिंगर दिए गए थे) ने, हेलमंद प्रांत से गुज़रने वाली हेलमंद नदी के तेज़ बहाव के कारण ईरान के रास्ते यात्रा करने का फैसला किया, हालांकि, उन्हें ऐसा करने की सख्त मनाही थी. उन्हें किसी भी कीमत पर ईरानी क्षेत्र में प्रवेश नहीं करना था. ईरानी क्षेत्र से गुज़रते हुए उन सभी को गार्ड ने पकड़ लिया और यह आखिरी बार था, जब हमने स्टिंगर मिसाइलों को देखा था. मुजाहिदीन के समूह को बाद में रिहा कर दिया गया था, लेकिन ईरानियों ने इन मिसाइलों और लॉन्चरों को कभी वापिस नहीं लौटाया."
कमांडरों और उनके साथियों को पाकिस्तान लाया गया उनसे आईएसआई और अमेरिकी सीआईए अधिकारियों दोनों ने पूछताछ की थी. सीआईए अधिकारियों ने कमांडर और उसके सहयोगियों पर झूठ का पता लगाने वाली मशीनों का भी इस्तेमाल किया था. लेकिन सेवानिवृत्त कर्नल ग़ाज़ी के अनुसार, सीआईए ने आईएसआई को अपने निष्कर्षों के बारे में नहीं बताया.
'अफ़ग़ान युद्ध के निर्णायक हथियार'
5 जुलाई, 1989 को, वॉशिंगटन पोस्ट ने अमेरिकी सेना के एक विशेष अध्ययन के बारे में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. जिसमें अमेरिकियों ने यह निष्कर्ष निकाला था कि अमेरिका निर्मित स्टिंगर मिसाइलों के उपयोग ने अफ़ग़ान युद्ध का पासा पलटने में एक निर्णायक भूमिका निभाई थी.
अमेरिकी सेना की इस विशेष रिपोर्ट के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान में रूस के खिलाफ लड़ रहे अफ़ग़ान गुरिल्लाओं ने अमेरिका में निर्मित इन विमान भेदी मिसाइलों की मदद से "युद्ध की प्रकृति को बदल दिया था और ये युद्ध के निर्णायक हथियार साबित हुए थे."
रिपोर्ट के अनुसार, मुजाहिदीन ने 340 मिसाइलें दागीं, जिनसे 269 रूसी जहाज़ों को गिराया गया था. ये प्रदर्शन अमेरिकी मानकों से असामान्य रूप से अधिक था. मिसाइलों के अपने लक्ष्य को सटीक रूप से निशाना बनाने की क्षमता 79 प्रतिशत थी.
अध्ययन में अफ़ग़ान युद्ध के आखिरी तीन वर्षों का विश्लेषण किया गया. ताकि यह देखा और परखा जा सके कि सितंबर 1986 में शुरू हुए युद्ध में स्टिंगर के उपयोग की वजह से, रूस और अफ़ग़ान युद्ध की रणनीति में क्या बदलाव आया और इसके क्या परिणाम निकले.
इस अध्ययन से यह पता चला कि विमानों के ईंधन को सूंघते हुए उनका पीछा करने वाली इस मिसाइल के आने से 'लड़ाई की प्रकृति में एक दम से बदलाव आया'. यह बात भी आमने आई कि पहली मिसाइल लॉन्च होने के एक महीने के भीतर सोवियत-अफ़ग़ान हवाई हमलों की कार्रवाई बंद हो गई थी.
वॉशिंगटन पोस्ट को प्राप्त दस्तावेज़ के सारांश के अनुसार, "स्टिंगर के आने से पहले, केवल रूसी स्थिर और गतिशील पंख वाले लड़ाकू जेट ही हर दिन जीतते थे. सितंबर 1986 में, युद्ध की शैली में नाटकीय रूप से बदलाव आया. क्योंकि इससे पहले (सोवियत-अफ़ग़ान) हवाई जंगी मुठभेड़ प्रभावी नहीं होती थी, फौजी दस्तों की बिना रोक टोक आवाजाही और रसद की आपूर्ति सामान्य थी.
वॉशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के सन्दर्भ के अनुसार, "रक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों ने संदेह व्यक्त किया था कि विश्वसनीय आंकड़े प्राप्त किए जाएं. क्योंकि जिन गुरिल्लाओं का इंटरव्यू लिया गया था, वे अपनी लड़ाकू शक्ति का प्रभाव जमाने के लिए, शायद मार गिराए जाने वाले जहाज़ों की वास्तविक संख्या न बता रहे हों."
"इसके अलावा, दागी गई मिसाइलों की संख्या 340 बताई गई थी, जो सितंबर 1986 और फरवरी (1988) के अंत तक चलने वाले प्रतिरोध के दौरान भेजी गई लगभग 1,000 मिसाइलों की संख्या से कम थीं." (bbc.com)
चीन की मुख्य भूमि के कई लोग उन्हें 'गद्दार' मानते हैं, जबकि हांगकांग में लोग उन्हें नायक के रूप में देखते हैं.
सच चाहे जो हो लेकिन ये तो तय है कि जिम्मी लाई आसानी से झुकने वाले शख़्स नहीं हैं.
हांगकांग के 73 साल के यह अरबपति व्यवसायी वहां के लोकतंत्र समर्थक आंदोलन की मुख्य आवाज़ों में शामिल रहे हैं.
पिछले साल के इस आंदोलन में शामिल होने के लिए उन्हें शुक्रवार को 14 महीने की जेल की सजा सुनाई गई है.
जिम्मी लाई के लिए जीवन में हालांकि ऐसी समस्या न तो पहली बार आई है और न ही यह सबसे गंभीर है.

विवादास्पद राष्ट्रीय सुरक्षा कानून
असल में चीन की सरकार के प्रति आलोचना का रुख रखने वाले इस व्यवसायी को पहले भी कई परेशानियों का सामना करना पड़ा है.
फरवरी से हिरासत में बंद लाई पर छह और आरोप लगाए गए हैं. इनमें से दो हांगकांग के नए और विवादास्पद राष्ट्रीय सुरक्षा कानून से जुड़े हैं.
इसके तहत इन पर आरोप है कि वे तख़्तापलट और अलगाववादी गतिविधियों में शामिल हुए थे.
यदि ये आरोप साबित हो गए तो इस अरबपति को उम्रक़ैद तक की सजा हो सकती है.
इस मामले के पहले, कुछ सालों के दौरान लाई की हत्या की कई नाकाम कोशिशें हो चुकी हैं. उनके घर और कंपनी मुख्यालय पर नक़ाबपोशों द्वारा बम भी फेंके गए हैं.
इसके बाद भी कोई उन्हें हांगकांग की सीमित आजादी का बचाव करने से नहीं रोक पाया.
क्योंकि जिम्मी लाई का मानना है कि चीन की मुख्य भूमि से हांगकांग की सीमित आज़ादी को ख़तरा है.
इस तरह के अपने व्यवहार के लिए वे अपनी सोच को जिम्मेदार मानते हैं.
हिरासत में जाने के पहले बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में पिछले साल उन्होंने कहा था, "मैं पैदाइशी विद्रोही हूं. मेरा चरित्र बहुत ही विद्रोही किस्म का है."
लेकिन उनके जन्म के कुछ महीनों बाद यानी 1949 में कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आते ही उनके परिवार का सारा वैभव ख़त्म हो गया.
ऐसे में 12 साल की उम्र में वे भागकर हांगकांग आ गए. इसके लिए उन्होंने मछली पकड़ने की नाव का सहारा लिया. उस पर छिपकर वे हांगकांग पहुंच गए.
वहां उन्होंने कढ़ाई-बुनाई जैसे कई छोटे-छोटे काम किए. उन्होंने अंग्रेजी भी सीखी और एक दिन कपड़ों के अंतरराष्ट्रीय ब्रांड जियोर्डानो की स्थापना करने में सफल रहे.
इस तरह हांगकांग के कई मशहूर रईसों की तरह छोटी नौकरी करते हुए करोड़ों डॉलर का साम्राज्य खड़ा करने में वे भी सफल रहे.

हांगकांग में मशहूर
उनकी निजी संपत्ति के एक अरब डॉलर से अधिक होने का अनुमान है. जियोर्डानो एक बड़ी कामयाबी थी.
लेकिन 1989 में जब चीन ने तियानमेन चौक पर लोकतंत्र की मांग करने वालों को कुचलने के लिए अपने टैंक भेजे तब लाई लोकतंत्र के मुखर समर्थक के रूप में खुलकर सामने आए.
इसके बाद उन्होंने चीन की सरकार के ख़िलाफ़ एक कॉलम लिखा जिसमें नरसंहार की आलोचना की गई.
इसके साथ उन्होंने एक प्रकाशन कंपनी की भी नींव रखी जो जल्द ही हांगकांग में मशहूर हो गई.
बीजिंग ने मुख्य भूमि में मौज़ूद उसके सभी स्टोर को बंद करने की धमकी दी.
नायक या गद्दार
इसके बाद उन्होंने प्रकाशन कंपनी को बेचकर लोकतंत्र समर्थक कई लोकप्रिय प्रकाशनों को शुरू किया.
इनमें डिजिटल पत्रिका 'नेक्स्ट' और 'ऐप्पल डेली' अख़बार भी शामिल हैं. ये हांगकांग के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले प्रकाशनों में शामिल हैं.
हांगकांग की स्थानीय मीडिया में चीन का भय लगातार बढ़ रहा है लेकिन लाई ने चीनी प्रशासन की आलोचना करने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी.
इस वजह से हांगकांग के कई नागरिकों के लिए जिम्मी लाई एक हीरो बन गए.
लेकिन चीन की मुख्य भूमि के लोग उन्हें गद्दार समझते हुए इन्हें देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा मानते हैं.
हांगकांग की आज़ादी
बीजिंग ने जब जून 2020 में हांगकांग का नया राष्ट्रीय सुरक्षा कानून पारित किया थो.
उस समय जिम्मी लाई ने बीबीसी को बताया था कि यह कानून हांगकांग के लिए 'मौत की सजा' जैसा है.
उन्होंने चेतावनी दी थी कि इस कानून के लागू होने के बाद हांगकांग चीन जैसा भ्रष्ट हो जाएगा.
उन्होंने कहा कि बिना कानून के शासन के दुनिया के वित्तीय केंद्र के रूप में हांगकांग का जो महत्व है, वह पूरी तरह से ख़त्म हो जाएगा.
अपने प्रशंसकों के लिए जिम्मी लाई एक बहादुर इंसान हैं जिसने हांगकांग की आज़ादी की रक्षा के लिए बहुत जोख़िम उठाए हैं.
कारोबारी हित
उनकी गिरफ़्तारी के बाद ट्विटर पर उनके एक प्रशंसक ने लिखा, "लाई के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान है. यह साहसी इंसान उन कुछ चुनिंदा लोगों में है जिन्होंने अपने सिद्धांतों को कमजोर किए बिना अपने कारोबारी हितों को बरकरार रखा है."
अपने मुखर और स्टाइलिश स्वभाव के लिए मशहूर लाई ने इस साल के शुरू में तब के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से हांगकांग की मदद करने का अनुरोध किया था.
उन्होंने कहा था कि केवल ट्रंप ही हांगकांग को चीन से बचा सकते हैं. उनके अख़बार ऐप्पल डेली ने एक फ्रंट पेज लेटर लिखा, "श्रीमान राष्ट्रपति, कृपया हमारी मदद करें."
बहरहाल न तो उनका प्रभाव और न ही उनकी दौलत उन्हें सजा से बचा सका.
बीते शुक्रवार को सजा सुनाते समय जज ने कहा, "हर किसी को अपने कामों का नतीजा भोगना होता है, चाहे कोई भी हो."
यह फ़ैसला सुनकर भी जिम्मी लाई शांत दिख रहे थे.
ऐसा नहीं लगा कि वे सजा सुनकर आश्चर्यचकित हो गए हों. आख़िरकार वे बीजिंग को झुका पाने में सफल क्यों नहीं हुए?
इसका जवाब पिछले साल बीबीसी को दिए उनके इंटरव्यू में हो सकता है. तब उन्होंने कहा था, "अगर वे आप में डर पैदा कर सकते हैं तो यह आपको कंट्रोल करने का सबसे सस्ता और प्रभावी तरीका है. लेकिन वे जानते हैं कि डराने-धमकाने से अब लोग नहीं डरने वाले.'' (bbc.com)
कोविड-19 महामारी से दुनियाभर में मरने वालों की संख्या की 30 लाख के आंकड़े को पार कर गई है.
अमेरिका की जॉन्स हॉपकिंस विश्वविद्यालय के मुताबिक अमेरिका, भारत और ब्राज़ील सबसे अधिक संक्रमण वाले देश हैं.
इन तीन देशों के आंकड़े को मिलाकर मरने वालों की संख्या 10 लाख से ज़्यादा है.
समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक पिछले हफ़्ते हर दिन दुनियाभर में औसतन 12 हज़ार मौतें हुईं
हालांकि मुमकिन है कि आधिकारिक आंकड़े दुनियाभर के सही हालात नहीं दिखा रहे.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रॉस एडहॉनम गीब्रिएसुस ने शुक्रवार को चेतावनी देते हुए कहा था कि, “मामले और मरने वालों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है.”
उन्होंने कहा था कि “दुनियाभर” में हर हफ़्ते आने वाले नए मामलों की संख्या पिछले दो महीनों में तक़रीबन दोगुनी हो गई है.
कुछ हफ़्ते पहले तक, भारत में महामारी अपेक्षाकृत नियंत्रण में थी. जनवरी और फरवरी के अधिकांश दिनों में मामले 20,000 से नीचे थे – 130 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए ये आंकड़ा बहुत कम था.लेकिन फिर संक्रमण तेजी से बढ़ने लगा. शनिवार को लगातार तीसरे दिन रिकॉर्ड मामले दर्ज किए गए.
शनिवार को 2,34,000 से अधिक मामले सामने आए.ब्राजील कुल मामलों की संख्या के मामले में तीसरे और मृत्यु के मामले में दूसरे स्थान पर है. वो अभी भी महामारी को नियंत्रण में लाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वहां के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक शुक्रवार को बीते 24 घंटों में 85,000 से अधिक नए मामलों सामने आए और 3,305 लोगों की मौत हो गई.
दुनियाभर के 165 देशों में कोरोनवायरस टीकों की 86 करोड़ से अधिक खुराक दी जा चुकी है. हालांकि,डॉ. टेड्रोस ने शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों से कहा कि "वैक्सीन इक्विटी (समान रूप से सभी को वैक्सीन देना) हमारे समय की चुनौती है - और हम असफल हो रहे हैं.
कुछ देशों ने अपनी आबादी के मुताबिक ज़्यादा वैक्सीन का करार कर लिया है या फिर अपने लोगों को दे दिया है. (bbc.com)
रूस ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिका के 10 राजनयिकों को निष्कासित कर दिया है और आठ वरिष्ठ अधिकारियों को ब्लैकलिस्ट कर दिया है.
रूस ने जिन अमेरिकी लोगों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी है उनमें अमेरिकी जाँच एजेंसी एफ़बीआई के निदेशक और अमेरिका के अटॉर्नी जनरल शामिल हैं.
अमेरिका ने एक दिन पहले रूस के कई अधिकारियों के ख़िलाफ़ ऐसी ही कार्रवाई की थी जिसके बाद रूस ने कहा था कि वो भी इसका जवाब देगा.
दोनों देशों ने ये क़दम ऐसे वक़्त उठाया है, जब दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति है. रूस बड़ी संख्या में अपने सैनिकों को यूक्रेन की सीमा के पास जमा कर रहा है.
वहीं अमेरिका अपने लड़ाकू जहाज़ों को ब्लैक सी की ओर भेज रहा है जिसके बाद रूस ने उसे चेतावनी दी है.
शत्रुतापूर्ण गतिविधियाँ
इस तनाव के बीच गुरुवार को अमेरिका ने रूस पर साइबर हमले और दूसरी शत्रुतापूर्ण गतिविधियाँ करने की बात करते हुए उसके ख़िलाफ़ प्रतिबंधों की घोषणा की और 10 राजनयिकों को निष्कासित कर दिया.
अमेरिका का कहना था कि उसने प्रतिबंध का मक़सद रूस की 'हानिकारक विदेशी गतिविधियों' की रोकथाम करना है.
उसने एक बयान में कहा कि पिछले वर्ष 'सोलरविन्ड्स' की बड़ी हैकिंग के पीछे रूसी ख़ुफ़िया एजेंसियों का हाथ था. उसने साथ ही रूस पर 2020 के अमेरिकी चुनाव में हस्तक्षेप करने का भी आरोप लगाया है.
पिछले महीने अमेरिका ने रूस के सात अधिकारियों के ख़िलाफ़ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के आलोचक एलेक्सी नवेलनी को ज़हर देने के मामले में कार्रवाई की थी. रूस इन सभी आरोपों से इनकार करता है.
हालाँकि इन सब के बीच इस सप्ताह अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ एक शिखर बैठक करने का भी प्रस्ताव रखा.
रूस ने कहा कि वो इसे एक सकारात्मक पहल के तौर पर देखता है और इसपर विचार कर रहा है.
रूस ने किन पर लगाया प्रतिबंध?
रूस ने अमेरिका के 10 राजनयिकों को देश छोड़कर जाने का आदेश दिया है. उसने साथ ही आठ अन्य अधिकारियों के प्रवेश पर भी पाबंदी लगा दी है.
इनमें शामिल हैंः
अमेरिकी अटॉर्नी जनरल मेरिक गारलैंड
एफ़बीआई निदेशक क्रिस्टोफ़र रे
अमेरिकी घरेलू नीति प्रमुख सुज़ैन राइस
रूस ने साथ ही पोलैंड के पाँच राजनयिकों को भी देश छोड़ने के लिए कह दिया है. इससे पहले पोलैंड ने भी रूस के पाँच अधिकारियों को निष्कासित किया था.
अमेरिका ने गुरुवार को 10 रूसी राजनयिकों को निष्कासित करने के साथ 32 अधिकारियों और संस्थाओं के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की थी. उसने उनपर पिछले साल हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने और भ्रामक जानकारियाँ फैलाने का आरोप लगाया था.
अमेरिका ने साथ ही अपने वित्तीय संस्थानों पर भी जून से रूबल में कारोबार करने वाले बॉण्ड ख़रीदने पर पाबंदी लगा दी थी.
बाइडन और रूस
जो बाइडन ने फ़रवरी में विदेश नीति पर अपना पहला भाषण देते हुए कहा था कि रूस का सामना किया जाएगा. उन्होंने कहा था, रूस की आक्रामक हरकतों से अमेरिका में उलट-पुलट होने का वक़्त चला गया है.
2014 में रूस के क्रीमिया पर कब्ज़े के समय बाइडन अमेरिका के उपराष्ट्रपति थे और तब ओबामा-बाइडन सरकार पर कुछ नहीं करने का आरोप लगा था. मगर हाल के दिनों में जो बाइडन ने रूस को यूक्रेन में आक्रामक रवैये के लिए रूस को चेतावनी दी है. रूस वहाँ सीमा के इलाक़ों में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है.
इससे पहले डोनल्ड ट्रंप रूसी राष्ट्रपति पुतिन की आलोचना करने से बचते रहे थे.
पिछले महीने एक रिपोर्ट में अमेरिकी खुफ़िया एजेसियों ने ये निष्कर्ष दिया कि रूसी राष्ट्रपति ने शायद ट्रंप को दूसरी बार राष्ट्रपति चुनाव में मदद पहुँचाने के लिए ऑनलाइन मदद करने का निर्देश दिया था.
लेकिन कार्नेगी मॉस्को सेंटर के मुताबिक ट्रंप ने इसके बावजूद रूस के ख़िलाफ़ रिकॉर्ड 40 से ज़्यादा प्रतिबंध लगाए. साल 2018 में उन्होंने 60 रूसी राजनयिकों को निष्कासित भी किया था.
सैन फ्रांसिस्को, 17 अप्रैल | एनएसए के मुखबिर एडवर्ड स्नोडेन द्वारा बनाई गई एनएफटी (नॉन-फंजिबल टोकन) की कलाकृति 5.4 मिलियन से अधिक में बेची गई है। 'स्टे फ्री' शीर्षक वाली कलाकृति राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) के सामूहिक निगरानी कानून का उल्लंघन करते हुए एक अमेरिकी अदालत के फैसले की संपूर्णता को जोड़ती है, जिसमें मुखबिर के प्रतिष्ठित चित्र के साथ कानून का उल्लंघन किया गया था।
इस फंड का प्रेस फाउंडेशन की स्वतंत्रता को फायदा मिलेगा, जिसके राष्ट्रपति स्नोडेन हैं।
उन्होंने कहा, "क्रिप्टोग्राफी के उभरते एप्लिकेशन हमारे अधिकारों का समर्थन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह नीलामी प्रेस स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने और जनता की सेवा करने के लिए, एन्क्रिप्शन के मूल्यवान और गोपनीयता-रक्षा के उपयोग को बढ़ावा देगी।"
2013 में, स्नोडेन ने अमेरिकी खुफिया जानकारी के इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के तरीकों को लीक किया था, जिसमें विदेशी नेताओं पर अवैध रूप से नाम आना शामिल था।
अमेरिकी संघीय अधिकारियों के दंडात्मक परिणामों का उल्लंघन करते हुए, स्नोडेन ने रूस सहित कुछ देशों को शरण के लिए अनुरोध भी किया था।
1 अगस्त 2014 को, उन्हें तीन साल के लिए रूस में रहने की अनुमति मिली थी, जिसे बाद में एक और तीन साल के लिए बढ़ा दिया गया।
अमेरिका में, स्नोडेन को जासूसी अधिनियम का उल्लंघन करने के दो मामलों का सामना करना पड़ा है।
वह प्रत्येक काउंट पर 10 साल तक की जेल जाने का जोखिम उठा सकते हैं।
अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि, स्नोडेन बार-बार राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं।
स्नोडेन ने ट्वीट कर कहा कि, 'हमारे पास एक विजेता, हमारा दोस्त इंटरनेट।' मैं उन सभी के लिए एक बहुत विशेष धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने पिछले 24 घंटों में इसका पालन किया।"
एनएफटी लोगों को अद्वितीय डिजिटल वस्तुओं के स्वामित्व को खरीदने और बेचने की अनुमति देता है और ब्लॉकचेन का उपयोग करके उनके मालिक होने का ट्रैक रखता है। एनएफटी का मतलब है 'गैर-फंजिबल टोकन', और इसमें तकनीकी रूप से कुछ भी डिजिटल हो सकता है, जिसमें ड्रॉइंग, कलाकृति, ट्वीट, एनिमेटेड जीआईएफ, गाने या यहां तक की वीडियो गेम भी शामिल हैं।(आईएएनएस)
अबूजा, 17 अप्रैल | आतंकी समूह बोको हराम के सदस्यों ने इस सप्ताह की शुरुआत में नाइजीरिया के पूर्वोत्तर शहर दमसाक पर हमला किया, जिसमें 18 लोग मारे गए और 21 अन्य घायल हो गए। एक शीर्ष अधिकारी ने यह जानकारी दी। समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, बोर्नो राज्य के गवर्नर बाबागाना उमरा जुलुम ने शुक्रवार को पत्रकारों से हमले की पुष्टि करते हुए यह जानकारी दी।
जुलुम ने कहा, "संयुक्त राष्ट्र मानवीय केंद्र, निजी आवासीय घर, एक पुलिस स्टेशन, एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र क्षतिग्रस्त हुई चीजों में शामिल है।
उन्होंने कहा कि नुकसान का जायजा लेने और शहर में आतंकवाद रोधी अभियानों में शामिल सुरक्षा अधिकारियों के साथ बातचीत करने के लिए उन्होंने दमसाक का दौरा किया।
बोको हराम 2009 से पूर्वोत्तर नाइजीरिया में एक इस्लामवादी राज्य स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। (आईएएनएस)
जेनेवा, 17 अप्रैल | दक्षिण-पूर्व ट्यूनीशिया के तट पर एक नाव के पलटने से कम से कम 41 लोगों की मौत हो गई। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) और प्रवासियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय संगठन(आईओएम) ने एक संयुक्त बयान में यह जानकारी दी। समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने शुक्रवार को जारी बयान में कहा कि तीन सर्वाइवर को बचा लिया गया है और तलाश का प्रयास जारी है।
प्रारंभिक जानकारी के आधार पर, संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने कहा कि मरने वाले सभी लोग उप-सहारा अफ्रीका के थे।
बयान में कहा गया है, "जीवन की इस दुखद क्षति ने एक बार फिर केंद्रीय भूमध्यसागर में सरकार के नेतृत्व वाली खोज और बचाव कार्यो को बढ़ाने की जरूरत को रेखांकित किया, जहां इस साल अब तक 290 लोगों को अपनी जान गंवाई पड़ी है।" (आईएएनएस)
जर्मनी की छवि चीजों को प्रभावी तरीके से पूरा करने की है. हालांकि इसके विपरीत भी कई प्रमाण मौजूद हैं. बावजूद इसके यह छवि बनी हुई है. जर्मन इतिहास में दक्षता ने अहम भूमिका निभाई. लेकिन इसके परिणाम हमेशा सकारात्मक नहीं रहे.
डॉयचे वैले पर क्रिस्टीना बुराक की रिपोर्ट
अंतरसांस्कृतिक सलाहकार क्रिस्टिना रॉटगर्स जब अपने अंतरराष्ट्रीय छात्रों और व्यावसायिक दोस्तों के साथ काम करती हैं, तो वे एक स्टीरियोटाइप एसोसिएशन गेम खेलते हुए शुरुआत करती हैं. जब वे उन लोगों से जर्मनी के बारे में उनकी धारणा के बारे में पूछती हैं, तो वे लोग विश्वस्त तरीके से बताते हैं कि जर्मनी एक मशीन की तरह दक्ष या प्रभावी देश है.
जर्मन दक्षता, शक्ति धारण के साथ एक अंतरराष्ट्रीय स्टीरियोटाइप या रूढ़िबद्ध धारणा है. यह अन्य जर्मन मूल्यों से इतनी मजबूती के साथ बंधा हुआ है कि इसे अलग करना मुश्किल है. इतिहास में यदि जाएं तो पता चलता है कि दक्षता की जड़ें काफी गहरी हैं और कैसे इसकी उत्पत्ति हुई. यह भी पता चलता है कि समय के साथ इस धारणा ने कैसे जन्म लिया.
जर्मनी की सदियों पुरानी प्रतिष्ठा
दक्षता को इस तरह से परिभाषित किया जा सकता है कि किसी मनचाही वस्तु को कम से कम संसाधन का इस्तेमाल करके प्राप्त करना. इस मामले में जर्मनी की प्रतिष्ठा सदियों पुरानी है और इसकी जड़ें दोहरी हैं.
'द शॉर्टेस्ट हिस्ट्री ऑफ जर्मनी' पुस्तक के लेखक और इतिहासकार जेम्स हॉव्स इसकी जड़ें मध्यकालीन युग में देखते हैं, जब पश्चिमी राइनलैंड की विदेशों में ख्याति व्यावसायिक दक्षता के लिए थी और यह ख्याति यहां उच्चस्तरीय गुणवत्ता की वस्तुओं के निर्माण की वजह से थी. डीडब्ल्यू से बातचीत में हॉव्स कहते हैं, "मेंज के घड़ी बनाने वाले और जोलिंगन के शस्त्र निर्माता पूरे मध्य काल के दौरान मशहूर रहे."
पूर्वी जर्मन राज्य प्रशा एक अलग तरह की ही दक्षता का स्रोत समझा जाता था. यह थी प्रशासनिक और सैन्य दक्षता. साल 1750 तक फ्रेडरिक महान के शासन काल में प्रशा ने एक प्रभावी नौकरशाही और सैन्य शक्ति विकसित कर ली थी.
जैसे-जैसे प्रशा ने अपने नियंत्रण को बढ़ाया और आखिरकार 1871 में जर्मन साम्राज्य को एक करते हुए उसे अपने अधीन कर लिया, उसने इन प्रणालियों और प्रथाओं को भी फैलाया. इसके कर-आधारित पब्लिक स्कूल और दक्ष सेना ने दुनिया के अन्य देशों को भी आधुनिक बनने के लिए प्रेरित किया. कई देशों ने तो इसी आधार पर अपने यहां संस्थाओं का निर्माण किया.
19वीं सदी के प्रशा राज्य में भी नौकरशाही और सेना के लिए मूल्यों की एक रणनीतिक सूची तैयार की गई जिसमें तमाम चीजों के अलावा समय की पाबंदी, मितव्ययिता, कर्तव्यपालन और कर्मठता जैसे तत्व भी शामिल थे. हालांकि दक्षता को एक अकेले मूल्य के तौर पर नहीं देखा गया है लेकिन यह वही मूल्य हैं जो कि एक दक्ष राष्ट्र को बनाने के लिए जरूरी हैं.
इन मूल्यों को 'प्रशियन गुणों' के तौर पर जाना गया. हालांकि इतिहासकार और बर्लिन में मोसेस मेंडेलसोन सेंटर फॉर यूरोपियन-जुइश स्टडीज के संस्थापक डायरेक्टर जूलियस शोएप्स कहते हैं कि उन्हें विभिन्न समूहों के बीच खुद को स्थापित करने में काफी समय लगा. उनके मुताबिक, "प्रशियन मूल्यों की यह चर्चा 19वीं सदी में तभी शुरू हुई जब इस बारे में उनसे बात की जाने लगी."
जब ब्रिटिश पर्यटकों ने 19वीं सदी के मध्य में प्रशा के नियंत्रण वाले राइनलैंड की यात्रा शुरू की, तो उन्होंने प्रशा की समृद्धि और योग्यता के इतिहास से भी लोगों को परिचित कराया. हॉव्स के मुताबिक, उनकी रिपोर्ट्स में हमेशा टिप्पणी की जाती थी कि वहां कैसे हर चीज बेहतर तरीके से काम करती है. मसलन, ट्रेन कैसे समय से चलती है, सीमा पर मौजूद कर्मचारी कितने चुस्त होते हैं, होटल कितने साफ-सुथरे रहते हैं इत्यादि.
बीसवीं सदी में भी आर्थिक गुणवत्ता और एक संगठित राज्य के दोहरे गुण ने जर्मन दक्षता की छवि को बरकरार रखा. साल 1930 तक 'ऑर्डनुंग' का विचार जर्मनी की अंतरराष्ट्रीय पहचान बन गया. ऑर्डनुंग नियम-कानून और गंभीर दृष्टिकोण का ऐसा सम्मिश्रण था, जो कि सैद्धांतिक रूप से दक्षता में योगदान कर सकता था. साल 1934 में तत्कालीन राष्ट्रपति पाउल फॉन हिंडरबुर्ग की तस्वीर अपने कवर पेज पर प्रकाशित करते हुए टाइम पत्रिका ने लिखा था "Ordnung muss sein" अर्थात "व्यवस्था होना अनिवार्य है". द न्यूयॉर्क टाइम्स तो साल 1930 में ही इस मुहावरे का जिक्र 'विश्व प्रसिद्ध' के तौर पर कर चुका था.
स्विमिंग सूट उठाओ...
ये 1950 के दशक की एक लोकप्रिय जर्मन धुन से टेक था. गर्म पानी, नीला आसमान और अंतहीन धूप लाखों जर्मनों को उत्तरी सागर के समुद्र तटों की ओर आकर्षित कर रहा था. और जिनके घर के आसपास कोई समुद्र तट नहीं होता, वे पड़ोस की सबसे नजदीकी झील या सार्वजनिक पूल में तैरने चले जाते थे. लोग हजारों वर्षों से पानी से रोमांचित होते रहे हैं और हर युग की अपनी स्नान संस्कृति रही है.
एक 'भयानक' दक्षता
साल 1982 में सोशल डेमोक्रेट राजनेता ऑस्कर लैफोंटेन ने कहा था कि प्रशियन मूल्यों (जिनका प्रचार उस वक्त के पश्चिमी जर्मनी के चांसलर हेलमुट श्मिट भी कर रहे थे) के साथ एक व्यक्ति "यातना गृह का संचालन भी कर सकता है."
इतिहासकार शोएप्स के मुताबिक, नाजी पार्टी ने वास्तव में प्रशियन मूल्यों का भी कुछ हद तक चुनाव किया था. वे कहते हैं, "आत्मविश्वास अहंकार में बदल गया, सुव्यवस्था नीचतापूर्ण पाखंड में बदल गई और किसी के कर्तव्यों का निर्वहन विशुद्ध अमानवीयता में बदल गया. हो सकता है कि तथाकथित प्रशियन गुणों ने नाजी शासन और उसकी व्यवस्थित हत्या के तहत अधिनायकवादी राज्य बनाए रखने में मदद की हो."
कोलंबस विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर फ्रैंकलिन मिक्सन श्रम और औद्योगिक संस्थानों के मामलों के जानकार हैं और "ए टेरिबल एफिशिएंसी: एंटरप्रेन्युरियल ब्यूरोक्रेट्स एंड द नाजी होलोकॉस्ट" पुस्तक के लेखक भी हैं. इस पुस्तक में उन्होंने बताया है कि नाजी नौकरशाही के दौरान व्यवहार कुशलता को कैसे सम्मानित और प्रोत्साहित किया गया. किस तरह से अक्सर सीधे और अनौपचारिक आदेश के तहत विध्वंसात्मक कार्रवाइयां की गईं. मिक्सन कहते हैं, "नाजी जो कर रहे थे वह प्रोत्साहन था, नौकरशाही से जुड़े लोगों का अपने हिसाब से इस्तेमाल कर रहे थे, जो कि उनके कार्यों का हिस्सा नहीं था."
जर्मन चांसलर के 15 साल
हॉव्स कहते हैं कि दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के तत्काल बाद, जर्मन लोगों को ऐसे लोगों के तौर पर देखा गया जो कि अविश्वसनीय तरीके से अमानवीय थे. 50 और 60 के दशक में जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था बढ़ती गई, पश्चिमी जर्मनी की पहचान अपने उद्योगों और गुणवत्तापूर्ण चीजों के उत्पादन से होने लगी. इस उत्पादन प्रक्रिया ने जर्मन दक्षता की प्रतिष्ठा को एक बार फिर स्थापित कर दिया. यह अलग बात है कि ऋण में कमी, मुद्रा सुधार, सस्ता श्रम जैसे कुछ कारकों ने इस छवि को कुछ हद तक धूमिल किया.
जर्मनी ने एकीकरण के बाद आई आर्थिक मंदी से खुद को बचाए रखा और आज भी अपने उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों के जरिए हर क्षेत्र में जर्मन दक्षता को कायम रखा है, न सिर्फ बाजार और उद्योग में बल्कि सरकार और यहां तक राष्ट्रीय फुटबॉल टीम में भी.
दक्षता: विशेषता और रूढ़िवादी धारणा
दक्षता को भले ही एक गुण के तौर पर देखा जा रहा हो लेकिन जर्मनी में आज यह वास्तविकता से काफी दूर है. अक्षमता के तमाम उदाहरण यहां मौजूद हैं. मसलन, नया बर्लिन हवाई अड्डा बनाने में 9 साल का समय लग गया और मौजूदा समय में कोविड संक्रमण से निबटने में नौकरशाही कागजी कार्रवाइयों में ही व्यस्त रही और आज टीकाकरण की प्रक्रिया भी बेहद धीमी गति से चल रही है.
सीनियर पॉलिसी एडवाइजर आंद्रे फॉन शूमन कहते हैं कि इन सबके बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जर्मनी दक्षता संबंधी इस स्टीरियोटाइप को बनाए रखने में सफल रहा है. वे कहते हैं कि रूढ़िवादी धारणाएं बहुत लंबे समय तक जिंदा रहती हैं और उनमें बदलाव बहुत ही धीमी गति से होता है. उनका कहना है कि रूढ़िवादी धारणा या मान्यता तभी खत्म हो सकती है जब इसका समर्थन करने वाले उदाहरण बहुत कम रह जाएं और उसका खंडन करने वाले उदाहरण ही लोगों को दिखते रहें.
ऐतिहासिक कारणों से जर्मनी एक संघीय गणराज्य है. लेकिन इस व्यवस्था के कई नुकसान भी हैं. इस बात को कोविड महामारी से लड़ने के संदर्भ में खासतौर पर देखा जा सकता है.
डॉयचे वैले पर मथियास फॉन हाइन की रिपोर्ट
यूरोप के दिल में बसा देश जिसे हम जर्मनी के नाम से जानते हैं, उसका एक समृद्ध और विविधतापूर्ण इतिहास रहा है. इस देश में संघीय व्यवस्था किसी न किसी रूप में सदियों से बनी हुई है. पड़ोसी देश फ्रांस के विपरीत, जो कि मध्य काल में ही केंद्रीय सरकार और सैन्य गढ़ का क्षेत्र बन गया था, राइन नदी के पूर्व में स्थानीय राजा और सामंत साझी भाषा और संस्कृति के बावजूद शासन कर रहे थे और यह कहीं ज्यादा निराशाजनक था.
जर्मन संघवाद के ऐतिहासिक संदर्भ को जानने से पहले उन 16 राज्यों की भूमिका को समझना जरूरी है जिन्होंने जर्मनी को आधुनिक संघीय गणराज्य बनाने का काम किया.
ऐसे बना जर्मनी
जर्मन क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से कई रियासतों यानी शाही घरानों, ब्रेमेन जैसे छोटे शहरी राज्यों और प्रशा जैसे कुछ बड़े साम्राज्यों से मिलकर बना है. बाद में, कई और छोटे-बड़े राज्य इसमें शामिल हुए जो अपने अधिकारों, मुद्राओं और सीमा शुल्क का दावा करते हैं.
आज जर्मनी के रूप में जाना जाने वाला पूरा क्षेत्र सदियों तक किसी भी एक केंद्रीय सत्ता के अधीन नहीं रहा, बल्कि कई संप्रभु शासकों द्वारा शासित होता रहा. ये लोग पहले पवित्र रोमन साम्राज्य के प्रति निष्ठावान बने रहे और बाद में जर्मन साम्राज्य के प्रति निष्ठावान हो गए.
इसके बदले में सम्राट ने इन्हें विदेशी युद्धों में स्वामिभक्ति का इनाम दिया और अपने राज्य का इस हद तक विस्तार करने की अनुमति दी कि स्थानीय संप्रभु शासक विदेश नीति जैसे अंतरराष्ट्रीय मामलों में भी स्वतंत्र रूप से कार्य करने में सक्षम थे.
साम्राज्य का पुनर्निर्माण
राजाओं और सम्राटों की समाप्ति और वाइमार गणराज्य के अधीन कुछ अनिश्चित वर्षों के बाद जर्मनी की संघीय परंपरा को पहली बार नाजियों ने तोड़ा. नाजी शासन ने 30 जनवरी 1933 को सत्ता संभालने के तुरंत बाद स्थानीय राज्यों को संघीय नियंत्रण में ले लिया.
ठीक एक साल बाद 30 जनवरी 1934 को राज्यों के सभी अधिकारों को समाप्त करते हुए 'साम्राज्य के पुनर्गठन का कानून' लाया गया. संघीय स्वशासन निकायों की जगह 'इंपीरियर गवर्नर्स' बना दिए गए जो कि सीधे तौर पर बर्लिन में नाजी सरकार के अधीन होते थे और उसके निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य थे.
लोकतंत्र का पुनर्गठन
मित्र देशों की जीत सुनिश्चित हो जाने के बाद द्वितीय विश्व युद्ध के विजेता देशों ने इस बात पर मंथन शुरू कर दिया कि युद्ध के बाद जर्मनी का शासन कैसे चलेगा. इस बात पर आम सहमति थी कि फ्यूरर अडोल्फ हिटलर के अधीन शक्ति का संकेंद्रण नाजी तानाशाही शासन की तमाम बुराइयों में से एक अहम बुराई थी और भविष्य में इस तरह सत्ता के संकेंद्रण को रोका जाना चाहिए.
इसलिए, युद्ध के बाद हुए सम्मेलनों में मित्र राष्ट्रों ने तय किया कि राज्यों की शक्ति को फिर से स्थापित किया जाए, जिन्हें नाजी शासन में खत्म कर दिया गया था. इस दौरान, युद्ध से पहले मौजूद तमाम राज्यों के अलावा युद्ध के दौरान की परिस्थितियों की वजह से कई नए राज्यों का भी उदय हुआ.
पूर्वी जर्मनी का केंद्रीकृत तंत्र
पूर्वी राज्य पहले सोवियत संघ के अधीन थे. बाद में पूर्वी जर्मनी के ये राज्य साम्यवादी हो गए और औपचारिक रूप से इन्हें जर्मन डिमॉक्रेटिक रिपब्लिक (जीडीआर) कहा जाने लगा. संघीय राज्य साल 1945 में 'सोवियत सैन्य प्रशासन' द्वारा बनाए गए कानून के तहत गठित किए गए थे लेकिन साल 1952 में जीडीआर ने उन्हें समाप्त कर दिया.
'समाजवादी प्रशासनिक तंत्र' के गठन के लिए राज्यों को अपनी शक्ति जिला और काउंटी प्रशासन को सौंपनी थी. संघवाद को पूर्वी बर्लिन में शासन कर रही सोशलिस्ट यूनिटी पार्टी की केंद्रीकृत शक्ति को भी रास्ता देना था.
नाजी शासन के पतन के बाद पहली बार और एकमात्र स्वतंत्र रूप से चुनी गई जीडीआर संसद के सामने सबसे बड़ा काम पुराने राज्यों को बहाल करना था. यह काम 22 जुलाई 1990 को हुआ जब जीडीआर पश्चिमी जर्मनी के संघीय तंत्र में शामिल हो गया. तीन महीने बाद दोनों देश आधिकारिक रूप से एकीकृत हो गए.
पश्चिम में संघवाद की वास्तविकता
पश्चिमी जर्मनी में जर्मन संघीय गणराज्य के निर्माता किसी भी केंद्रीय शासन के अधीन शक्ति के पूरी तरह संकेंद्रण को रोकने के इच्छुक नहीं थे. जर्मन संविधान, जिस पर साल 1949 में बॉन में हस्ताक्षर किए गए थे, में संसदीय परिषद ने राज्यों के अधिकारों के संरक्षण और गारंटी को खासा महत्व दिया है.
राज्यों को तब भी यह अधिकार था और आज भी है कि वो केंद्रीय सरकार के फैसलों पर सवाल उठा सकें और उनका विरोध कर सकें. केंद्र और राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारों का होना आपसी नियंत्रण की इसी गारंटी का नतीजा है. साल 1990 में एकीकरण के बाद पहले का पूर्वी जर्मनी भी संघीय गणराज्य के इसी मूल कानून के तहत आ गया.
परिवर्तन का विरोध
लेकिन शुरू से ही ऐसी कई आशंकाएं और संरचनात्मक दोष थे जो कि जर्मन संघवाद के सामने बड़ी समस्या बनकर खड़ी थीं. राज्यों के आकार और उनकी आर्थिक शक्ति में पहले भी और आज भी बहुत असमानता है. आधुनिक जर्मनी में जनसंख्या में अमसमानता भी एक बहुत बड़ा मुद्दा है. नॉर्थ राइन वेस्टफेलिया की जनसंख्या जहां एक करोड़ सत्तर लाख है वहीं ब्रेमेन राज्य की जनसंख्या मुश्किल से सात लाख है.
साल 1950 में मित्र देशों ने भी राज्यों के बंटवारे में बदलाव की जरूरत महसूस की थी और संघीय सरकार से इस बारे में कार्रवाई करने को कहा था. लेकिन राज्यों के पुनर्गठन और उनके सीमा निर्धारण की कोई कोशिश सफल नहीं हो पाई. साल 1996 में इस तरह की एक कोशिश हुई जब दो सीमावर्ती राज्यों बर्लिन और ब्रांडनबुर्ग में एकीकरण के लिए जनमतसंग्रह कराया गया. लेकिन लोगों ने इसके खिलाफ मतदान किया.
साल 1970 तक संघीय सरकार और राज्य सरकारों के बीच शक्ति विभाजन को पुनर्गठित करने की कई कोशिशें हुईं लेकिन न तो संवैधानिक सुधारों पर बना सरकारी आयोग और न ही साल 1990 में जर्मन संसद द्वारा बनाए गए संवैधानिक आयोग प्रभावी बदलावों पर कोई सहमति बनाने में कामयाब हो सके.
संघवादी सुधार
कई लोग अब भी मानते हैं कि संघवाद में सुधार अभी भी महत्वपूर्ण है. जर्मनी के आनुपातिक निर्वाचन प्रणाली के तहत गठबंधन सरकारें आदर्श हैं. इसका मतलब यह हुआ कि सभी 16 राज्य और एक संघीय सरकार का एक ही समय में अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ एक केंद्रीकृत सरकार बनाना लगभग असंभव है.
इस तरह की कुछ समस्याओं का हल निकालने के लिए चांसलर अंगेला मैर्केल के नेतृत्व में साल 2006 में एक सुधार पैकेज पारित किया गया. इस प्रस्ताव में संघीय गठबंधन के मध्य-दक्षिणपंथी क्रिश्चियन डैमोक्रेट्स, बवेरिया के क्रिश्चियन सोशल यूनियन और मध्य-वामपंथी सोशल डैमोक्रेट्स ने हिस्सा लिया था. इसके तहत राज्यों से उनकी शक्तियां छीन ली गईं लेकिन उन्हें निरंतर मजबूत बने रहने की गारंटी भी दी गई. यह प्रस्ताव शिक्षा नीति पर भी लागू होता है जो कि पूरी तरह से राज्य स्तर पर ही नियंत्रित होता था.
राज्यों के पास सिविल सेवा, दंड प्रणाली और पर्यावरण कानूनों पर अधिकार बरकरार रखा गया है या फिर उन्हें और ताकत दी गई है. कुल मिलाकर, राज्यों के अनुमोदन वाले कानूनों की संख्या आधे से भी कम या यूं कहें कि एक तिहाई कर दी गई है.
कई बार ऐसा लगता है कि जर्मन संघवाद राज्यों के प्रधानमंत्रियों को उनकी स्वाधीनता की रक्षा करते हुए मध्यकालीन राजाओं की तरह से काम करने की अनुमति देता है. लेकिन यह भी सही है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से लेकर अब तक संघवाद ही जर्मनी की सफलता का मूल मंत्र रहा है. बिना इसके, युद्ध के बाद न तो एक करोड़ से ज्यादा शरणार्थियों का एकीकरण संभव था और न ही साल 1990 में जर्मन एकीकरण के बाद की परिस्थितियों का सफल प्रबंधन.
अगर आपको लगता है कि लॉकडाउन में पार्टी नहीं हो रही या ड्रग्स का इस्तेमाल नहीं हो रहा, तो यह गलत है. कोरोना के बावजूद जर्मनी में कई टन कोकेन की खपत हो रही है. शिपिंग कंटेनरों में छिपाकर इसे अटलांटिक पार कराया जा रहा है.
पढ़ें डॉयचे वैले पर पीटर हिले की रिपोर्ट
लगभग हर रात उनके कई दोस्त उनसे मिलने आते हैं. यह बर्लिन में लगे लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन है. वह कहते हैं, "लॉकडाउन की वजह से लोग ऊब चुके हैं. यह नरक जैसा लगने लगा है. और जब लोग ऊब जाते हैं, तो क्या करते हैं? कुछ ऐसा जिससे उन्हें मजा आए."
घर पर कोकेन वाली पार्टी
महामारी से पहले आलेक्जांडर और उनके दोस्त बार में मिलते थे जहां वे छिपकर कोकेन का इस्तेमाल करते थे. वह बताते हैं, "अगर आपके ग्रुप में आठ लोग हैं, तो ऐसा नहीं होता कि सभी लोग एक बार में ही बाथरूम जाते हैं. लेकिन जब आप घर पर होते हैं, तो आप सारा सामान टेबल पर रखते हैं, आठ लाइन बनाते हैं और सभी एक ही समय में कुछ न कुछ लेते हैं. ऐसे में लोग ज्यादा कोकेन का इस्तेमाल करते हैं."
कोराना महामारी के दौरान ड्रग्स का इस्तेमाल किस तरह से बढ़ गया है, इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है. आने-जाने पर लगी पाबंदी, सीमा बंद होने और एयरपोर्ट पर आवाजाही कम होने से कोकेन के व्यापार से जुड़े आपराधिक गिरोह का काम मुश्किल होना चाहिए था. विशेषज्ञों को शुरू में उम्मीद थी कि इन हालातों में ड्रग्स के अवैध व्यापार में कमी आएगी और इससे खपत में भी गिरावट होगी. हालांकि, शायद ऐसा नहीं हुआ है.
आलेक्जांडर कहते हैं कि ड्रग्स की सप्लाई में किसी तरह की समस्या नहीं हो रही है. बस एक फोन कॉल कीजिए और 20 से 30 मिनट के अंदर 'कोकेन टैक्सी' आपके घर के दरवाजे पर आ जाएगी. आपको कभी भी 45 मिनट से ज्यादा इंतजार करने की जरूरत नहीं पड़ती. यह खाना पहुंचाने वाली सेवाओं की तरह हो गया है. कीमत भी पहले की तरह ही है. साथ ही कोकेन की क्वॉलिटी पहले की तुलना में बेहतर हो गई है.
रेने मात्सके इसकी पुष्टि कर सकते हैं. उनका काम उन 'कोकेन टैक्सियों' की आवाजाही को कम करना या उस पर रोक लगाना है जो आलेक्जांडर के पास पहुंचते हैं. मात्सके जर्मनी के सबसे बड़े बंदरगाह शहर हैम्बर्ग में सीमा शुल्क जांच कार्यालय के प्रमुख हैं. उन्होंने डॉयचे वेले को बताया, "कोकेन को अक्सर बड़े बंदरगाहों के जरिये ही लाया जाता है."
हैम्बर्ग बंदरगाह पर हर दिन 23 हजार से ज्यादा शिपिंग कंटेनर पहुंचते हैं. मात्सके के कर्मचारी विशेष रूप से संदिग्ध कंटेनरों को बाहर निकालते हैं. इनमें अधिकांश वे कंटेनर होते हैं जो दक्षिण अमेरिका से आते हैं. ये एक ऐसे रास्ते से आते हैं जिसका इस्तेमाल ज्यादातर संदिग्ध और अवैध कारोबार करने वाली कंपनियां करती हैं. हैम्बर्ग के सीमा शुल्क अधिकारी इन कंटेनरों की जांच एक्स-रे मशीन से करते हैं.
कभी-कभी वे स्पोर्ट्स बैग में कोकेन पाते हैं, कभी-कभी यह चावल या जानवरों के भोजन के बैग के बीच छिपा होता है. मात्सके कहते हैं, "अभी हम जितनी मात्रा में कोकेन जब्त कर रहे हैं, उतनी पहले कभी नहीं देखी गई. पिछले दो साल में हम दस टन से ज्यादा कोकेन जब्त कर चुके हैं. इससे पहले हम पूरे देश में एक साल में तीन या पांच टन कोकेन जब्त करते थे."
मार्च में मात्सके ने अब तक की सबसे ज्यादा मात्रा में जब्त की गई कोकेन के बारे में जानकारी दी. जब्त की गई कोकेन की मात्रा 16 टन थी. यह कोकेन प्रोटीन के कैन में छिपाकर लाई जा रही थी. इससे पहले यूरोप में कभी भी एक बार में इतनी मात्रा में कोकेन जब्त नहीं की गई थी.
कारोबार के लिए अच्छा है यूरोप
इनसाइट क्राइम संगठन के निदेशक जेरेमी मैकडरमॉट कहते हैं कि वर्तमान में यूरोप कोकेन के तस्करों के लिए सबसे आकर्षक बाजार है. डॉयचे वेले के साथ इंटरव्यू में वे 'कोकेन पाइपलाइन टू यूरोप' की बात करते हैं, "कीमतें बहुत अधिक हैं और जोखिम अमेरिका की तुलना में बहुत कम हैं." जेरेमी और उनकी टीम कोलंबिया के मेडेलिन में दक्षिण अमेरिका में होने वाले संगठित अपराध का विश्लेषण करती है.
जेरेमी कहते हैं, "ड्रग्स की समस्या से निपटने के लिए अमेरिका हर साल अरबों डॉलर खर्च करता है. उन्होंने नशीले पदार्थों से निपटने के लिए एक अलग आर्मी तैनात की है. इसकी वजह से ड्रग्स कारोबारियों के लिए यूरोप में कारोबार करना आसान हो गया है." जेरेमी का मानना है कि यूरोप में कोकेन का बाजार बढ़ता रहेगा, खासकर पूर्वी यूरोप में.
जेरेमी कहते हैं, "कोलंबिया, बोलीविया और पेरू जैसे देशों में कोकेन का उत्पादन उच्च स्तर पर बना हुआ है. इसकी वजह यह है कि इन देशों से यूरोप पहुंचने के कई रास्ते हैं. कोलंबिया से ब्राजील में स्थित एक बंदरगाह इन लोकप्रिय रास्तों में से एक है. वहां से यूरोप जाने वाले एक कंटेनर में कोकेन रखा जाता होगा. इसमें एक अलग तरह की आपराधिक संरचना होगी, जिसमें बंदरगाह और सीमा शुल्क के भ्रष्ट अधिकारी शामिल हो सकते हैं."
जेरेमी आगे बताते हैं कि यूरोप पहुंचने पर दूसरे क्रू के लोग इन कंटेनर को रिसीव करते हैं और उसे किसी सुरक्षित जगह पर रख देते हैं. रॉटरडैम और एंटवर्प के बंदरगाहों पर यह ज्यादा होता है. वे कहते हैं, "यहां से संगठित अपराध में शामिल लोग कोकेन को बंदरगाह से दूर सुरक्षित जगह पर ले जाएंगे. इस कोकेन के कई मालिक होते हैं और इसे कई जगहों पर ले जाया जाता है."
हिंसा के लिए तैयार
इस तरीके से ये ड्रग्स छोटे डीलरों और आलेक्जांडर जैसे ग्राहकों तक पहुंचता है. पुर्तगाल के लिस्बन स्थित यूरोपियन मॉनिटरिंग सेंटर फॉर ड्रग एंड ड्रग एडिक्शन (ईएमसीडीडीए) का अनुमान है कि करीब एक करोड़ बीस लाख लोग यूरोपियन कोकेन का इस्तेमाल करते हैं. ईएमसीडीडीए के लॉरेंट लैनियल कहते हैं कि यूरोप में पिछले कई सालों से कोकेन का चलन बढ़ रहा है. उन्होंने डॉयचे वेले को बताया, "हमें यूरोप में ज्यादा भ्रष्टाचार और ज्यादा हिंसा के लिए तैयार रहना चाहिए."
जब्त की गई कोकेन की मात्रा को देखते हुए लैनियल का कहना है कि यह मान लेना चाहिए कि ड्रग्स गिरोह बंदरगाहों और हवाई अड्डों पर कर्मचारियों को रिश्वत दे रहे हैं. वे कहते हैं, "यूरोप में कानून का पालन कराने वालों और न्याय के क्षेत्र से जुड़े लोगों में भी भ्रष्टाचार के संकेत मिले हैं." लैनियल का मानना है कि यूरोप में प्रशासन और राजनीति से जुड़े कुछ लोग पहले से ही कोकेन व्यापार से मुनाफा कमा रहे हैं.
लैनियल कहते हैं कि जितना ज्यादा कोकेन यूरोप में आता है, उतना ज्यादा पैसा दांव पर होता है. इससे अलग-अलग गिरोहों के बीच हिंसा बढ़ जाती है. उन्होंने नीदरलैंड्स में शिपिंग कंटेनरों में टॉर्चर की घटनाओं का संदर्भ दिया और कहा कि इससे साफ पता चल रहा है कि यह कारोबार यूरोप में कितने क्रूर तरीके से संगठित अपराध के तौर पर चल रहा है. मात्सके कहते हैं कि हैम्बर्ग में ड्रग्स की तलाशी के दौरान गोलीबारी की घटनाएं भी हुई हैं. तलाशी के दौरान शक्तिशाली हथियार भी मिले हैं. सीमा शुल्क और पुलिस अधिकारियों को भी धमकी दी जा रही है.
समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत
देशों को किस तरह से कार्रवाई करनी चाहिए? क्या उस तरह से ड्रग्स के खिलाफ लड़ना चाहिए जैसे अमेरिका लड़ रहा है? इस सवाल पर इनसाइट क्राइम से जुड़े जेरेमी मैकडरमॉट को लगता है कि यह सही तरीका नहीं है, "इसके लिए आपको समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है. दमनकारी नीतियों और गिरफ्तारियों से कुछ नहीं होने वाला है. ऐसा करने के लिए जर्मनी को यूरोप के अन्य देशों, अमेरिका और लैटिन अमेरिका के देशों के साथ मिलकर काम करना होगा. आपको सिविल सोसायटी को मजबूत करना होगा. कोकेन के किसानों को सम्मानजनक और कानूनी विकल्प देना होगा. यदि आप हैम्बर्ग में कंटेनरों की तलाशी करके ड्रग्स के कारोबार को रोकने की कोशिश कर रहे हैं, तो इसकी संभावना काफी कम है कि आप इस कारोबार को नियंत्रित कर पाएंगे."
कोकेन का इस्तेमाल करने वाले आलेक्जांडर खुद को इस लंबी कड़ी का सबसे अंतिम छोर मानते हैं, "अगर मैं कोकेन का इस्तेमाल करना छोड़ देता हूं, तो इससे ज्यादा कुछ नहीं बदलने वाला है. एक बार कोकेन अगर यहां पहुंच जाती है, तो यह मारे गए सुअर की तरह है. अगर मैं इसे नहीं भी खाता हूं, तो भी यह मर तो चुका होता है.” (dw.com)
कोविड 19 का असर सिर्फ शारीरिक तौर पर ही नहीं पड़ता. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक नए अध्ययन में पता चला है यह संक्रमण लोगों को मानसिक तौर भी बीमार बना सकता है. लोग डिप्रेशन का शिकार हो सकते हैं.
पढ़ें डॉयचे वैले पर कार्ला ब्लाइकर की रिपोर्ट
सांस लेने में तकलीफ, स्वाद और सुगंध का पता न चलना और शारीरिक कमजोरी. ये कुछ ऐसे लक्षण हैं जो पिछले एक साल में कोरोना वायरस से संक्रमित हुए लोगों में देखे गए हैं. जर्मनी के कोलोन शहर की रहने वाली डॉक्टर कैरोलिन ने डॉयचे वेले को बताया कि वह अपनी उम्र से बड़े करीबियोंऔर ऐसे अन्य लोगों को लेकर चिंतित हैं जिनके ऊपर इस महामारी का ज्यादा असर पड़ सकता है. 39 वर्षीय कैरोलिन कहती हैं, "मैंने सोचा कि मैं जवान हूं. मुझे पहले से कोई समस्या नहीं है. मैं एथलेटिक हूं. अगर मैं संक्रमित भी होती हूं, तो शायद मेरे साथ ज्यादा बुरा नहीं होगा. मैं निजी तौर पर कोरोना संक्रमण को लेकर डरी हुई नहीं थी."
जनवरी में कैरोलिन कोरोना वायरस की चपेट में आ गईं. शुरुआत में गंभीर लक्षण नहीं दिखे. बस हल्का बुखार, सिरदर्द और खांसी थी. लेकिन बाद में जो लक्षण उभर कर सामने आए, उसकी उम्मीद कैरोलिन को उम्मीद नहीं थी. वे लक्षण थे पैनिक अटैक और डिप्रेशन.
तीन में एक रोगी मानसिक बीमारी का शिकार
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का एक अध्ययन 'द लैंसेट सकाइट्री' जर्नल में प्रकाशित हुआ है. इस अध्ययन में पाया गया कि कैरोलिन अकेली नहीं हैं जो कोरोना की वजह से मानसिक तौर पर बीमार हुईं. शोधकर्ताओं ने 2,36,000 से अधिक कोरोना से पीड़ित रोगियों के इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड्स की जांच की. इनमें ज्यादातर रोगी अमेरिका के थे. इस जांच में यह बात सामने आई कि कोरोना वायरस से संक्रमित होने के छह महीने के भीतर 34 प्रतिशत रोगियों में किसी न किसी तरह की मानसिक बीमारी दिखी.
हालांकि, स्ट्रोक और डिमेंशिया के मामले काफी कम देखे गए. 17 प्रतिशत कोरोना रोगियों में चिंता से जुड़ी परेशानी देखी गई. वहीं, 14 प्रतिशत में मनोदशा से जुड़ी परेशानी देखी गई, जैसे कि डिप्रेशन.
ऑक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं ने मरीजों के दो समूहों पर अध्ययन किया. इनमें एक समूह इन्फ्लूएंजा वालों का था और दूसरा ऐसे रोगियों का जिन्हें सांस लेने से जुड़ी परेशानी (कोरोना को छोड़कर) थी. यह इसलिए था ताकि पक्का किया जा सके कि इन लोगों के बीच कोरोना महामारी से पीड़ित लोगों जैसी समस्याएं नहीं है.
ऑक्सफोर्ड के पॉल हैरिसन ने डॉयचे वेले को बताया, "हमारा डाटा समस्या के स्तर पर ध्यान आकर्षित करता है. यह इस विचार को दिखाता है कि कोरोना का असर लोगों पर काफी ज्यादा होता है, भले ही वे अस्पताल में भर्ती हों या नहीं." हैरिसन इस अध्ययन के मुख्य लेखक हैं.
कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बावजूद कैरोलिन कभी अस्पताल में भर्ती नहीं हुई. लेकिन वह कोरोना संक्रमण के दौरान और बाद में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर रूप से जूझती रही. इसकी शुरुआत कोरोना संक्रमण के जांच के समय से ही हो गई थी. वह अकेले कोलोन में अंधेरे पार्किंग गैरेज में स्थित एक परीक्षण केंद्र में गईं थी. वह एहतियात के तौर पर मरीजों के साथ काम करने से पहले टेस्ट करा लेना चाहती थीं. उन्हें पूरी उम्मीद थी कि उनकी टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आएगी. लेकिन जब उनका रिजल्ट पॉजिटिव आया, तो वह हैरान रह गईं.
कैरोलिन कहती हैं, "यह और बदतर हो गया. मेरे शारीरिक लक्षण बुरे नहीं थे. मैं मानसिक तौर पर परेशानियों का सामना कर रही थी." अपने परिवार में सिर्फ कैरोलिन ही कोरोना वायरस से संक्रमित हुई थीं. इसलिए, उन्हें अपने पति और बच्चों से पूरी तरह अलग रहना था. वह बिना दवा के सो नहीं पा रही थीं. उन्होंने कहा कि वह पहले की तुलना में ज्यादा भयभीत और उदास हो गई थीं.
कैरोलिन कहती हैं, "मैं सोचती रहती थी कि तुम उस बीमारी से पीड़ित हो जिससे लोग मर रहे हैं. मैं अचानक रात में उठ जाती थी और डर जाती थी. लगता था कि मुझे स्ट्रोक आ रहा है. मैं हिल नहीं सकती थी. सपने और वास्तविक दुनिया के बीच फंस गई थी. मैं पहले कभी इस तरह से भयभीत नहीं हुई थी."
अमेरिका के वर्जिनिया में रहने वाले 29 साल के लॉरेंस भी कोरोना महामारी से पहले मानसिक तौर पर बीमार नहीं हुए थे. अमेरिका में जब कोरोना तेजी से फैलने लगा, तो लॉरेंस भी चिंतित रहने लगे. उन्होंने डॉयचे वेले को बताया, "उस स्थिति तक तो उसे मैनेज किया जा सकता था." इसके बाद कोरोना की वजह से उनकी सास की मौत हो गई. दिसंबर में लॉरेंस और उनकी पत्नी कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए. इससे उनके फेफड़ों पर असर पड़ा.
लॉरेंस कहते हैं, "इसके बाद से मुझे अस्थमा है. जब मुझे सांस लेने में समस्या आनी शुरू हुई, तो मुझे पैनिक अटैक आने लगे. ऐसा मुझे पहले कभी नहीं हुआ था." लॉरेंस हर समय चिंतित रहते हैं और अपने काम पर भी ध्यान नहीं दे पाते. करीब एक महीने के संघर्ष के बाद लॉरेंस आखिरकार अपना इलाज कराने डॉक्टर के पास पहुंचे. वे कहते हैं, "मैं नहीं कह सकता कि यह सीधे तौर पर कोरोना से जुड़ा हुआ था या नहीं लेकिन मैं काफी ज्यादा चिंतित रहने लगा था और आखिरकार मुझे डॉक्टर की मदद लेनी पड़ी."
दूसरी ओर, कैरोलिन को अपनी बहन से मदद मिली. कैरोलिन की बहन मनोचिकित्सक हैं. हालांकि, कैरोलिन भी अपनी चिंता की सही वजह का पता नहीं लगा सकीं. वह कहती हैं, "मैं पक्के तौर पर नहीं बता सकती कि यह सामान्य स्थिति की वजह से हुआ या क्वारंटाइन की वजह से. यह भी नहीं पता कि मेरा इलाज कैसे हुआ. या क्या यह बीमारी के कारण ही हुआ था."
कोरोना को गंभीरता से लेने के अन्य कारण
प्रोफेसर हैरिसन कहते हैं, "दोनों बातें संभव हो सकती हैं. आपको कोरोना संक्रमण है इस तनाव से निपटना, अलग रहना, नौकरी, अपना भविष्य और अपने स्वास्थ्य के बारे में चिंता करना. इन सब वजहों से चिंता और डिप्रेशन हो सकता है."
हैरिसन के अन्य निष्कर्षों से कुछ हद तक इस बात की पुष्टि होती है कि कोरोना वायरस से संक्रमित रोगियों में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति के लिए ज्यादातर बाहरी परिस्थितियां जिम्मेदार हैं. हल्के लक्षण और गंभीर लक्षण, दोनों तरह के रोगियों के बीच चिंता और डिप्रेशन की समस्या लगभग एक समान संख्या में देखी गई.
हैरिसन कहते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर असर को देखते हुए अब कोरोना से और अधिक सतर्क रहने की जरूरत है. हैरिसन अनुरोध करते हैं, "सभी लोग वैक्सीन लें. मेरे हिसाब से कोरोना की तुलना में वैक्सीन में खतरा कम है. और अगर आपको अलग रहने को कहा जाता है, तो मैं आपको सलाह दूंगा कि आप वही करें जो आपसे कहा जाता है. हम तभी बेहतर होंगे." (dw.com)
-करिश्मा वासवानी
बीते सप्ताहांत पर चीन के बड़े अरबपति ई-कॉमर्स बिजनेस कंपनी अलीबाबा पर चीन की सरकार ने 2.8 बिलियन डॉलर का जुर्माना लगाया, कंपनी पर आरोप लगाया गया कि कंपनी ने सालों से बाज़ार में अपनी जगह और क़द का दुरुपयोग किया.
सोमवार को अलीबाबा की सहयोगी कंपनी एंट डिजिटल पेमेंट फ़र्म ने चीनी नियामकों के दबाव में कंपनी की 'नई योजना की घोषणा' की जिसके तहत ये कंपनी एक टेक फ़र्म की तुलना में एक बैंक की तरह कार्य करेगी.
मंगलवार को चीन की 34 टेक कंपनियों के प्रमुखों को चीनी नियामक के अधिकारियों ने समन किया और चेताया कि अलीबाबा इन कंपनियों के लिए एक सबक़ है.
इन कंपनियों को एक महीने का वक़्त दिया गया है ताकि वे 'सोचें-समझें' और प्लेटफ़ॉर्म कंपनियों के लिए बनाए गए चीन के नए नियमों का अनुपालन करें.
ऐसे में अलीबाबा पर जुर्माना लगाना और उसे सरेआम फटकार लगाना अन्य टेक कंपनियों के लिए एक चेतावनी की तरह थी.
अलीबाबा की जाँच में सरकारी अधिकारियों ने पाया है कि उसने व्यापारियों को व्यापार करने या प्रतिद्वंद्वी प्लेटफार्मों पर अपना प्रमोशन करने से रोका और बाज़ार में अपनी स्थिति का सालों तक दुरुपयोग किया.
इसके एवज़ में कंपनी की साल 2019 में हुई कुल घरेलू आय का चार फ़ीसद हिस्सा जुर्माने के तौर पर कंपनी को देना होगा.
इस इंडस्ट्री की बाक़ी कंपनियों ने बीबीसी संवाददाता को बताया कि इस वक़्त वे 'काफ़ी चिंता' में हैं और उन्हें डर है कि अगला निशाना वो होंगे.
टेंसेंट, जेडी डॉट कॉम, माइचुन, बाइटडांस और पिनडुओडुओ जैसी कंपनियां सभी अलीबाबा को देखते हुए अब काफ़ी सोच-समझ क़दम रख रही हैं.
अलीबाबा पर लगने वाला जुर्माना चीन की तेज़ी से बढ़ती टेक इंडस्ट्री पर अधिक से अधिक लगाम लगाने की कोशिश है. कई लोगों के लिए ये एक अच्छा संकेत है और वे मानते है कि बाज़ार अब परिपक्व हो गया है.
चीन की टेक विश्लेषक और पॉडकास्ट टेक बज़ चाइना की को-होस्ट रुई मा कहती हैं, ''यदि आप क़ानूनों को पढ़ते हैं, तो पाएंगे कि चीनी नियामक इस इंडस्ट्री को विनियमित करने की कोशिश कर रही है, तेज़ी से आगे बढ़ती इस इंडस्ट्री के लिए ये कोशिश तेज़ी से की जा रही है.''
''अब ये लोग ना सिर्फ़ मार्केट शेयर के लिए एल्गेरिदम का इस्तेमाल कर रहे हैं बल्कि इस प्लेटफ़ॉर्म की अर्थव्यवस्था को भी समझने की कोशिश में लगे हैं जैसा कि अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाएं करती हैं. ''
लेकिन इसे राजनितिक क़दम के तौर पर देखा जा रहा है.
इन कंपनियों ने चीनी लोगों के लिए एक वर्चुअल दुनिया बना दी है और लोगों की ज़िंदगियों पर इनका गहरा असर भी है. लेकिन ऐसा ही असर लोगों की ज़िंदगियों पर कम्युनिस्ट पार्टी का भी है ऐसे में टेक कंपनी और पार्टी के बीच सीधे प्रतिस्पर्धा का माहौल बन गया है.
चीन के वित्तीय हलक़ों के सूत्रों ने बताया है कि उन्हें संदेह है कि जैक मा के पिछले साल दिए गए पारंपरिक बैंकिंग क्षेत्र को ख़ारिज करने वाले भाषण ने "बीजिंग के कई शीर्ष नेताओं को नाराज़ किया था.''
इस भाषण के बाद जैक मा की कंपनी अलीबाबा और एंट ग्रुप की सरकारी मीडिया ने आलोचना की थी, इसके बाद जैक मा और उनकी टीम को समन किया गया था और बहुप्रतिक्षित एंट ग्रुप के शेयर मार्केट लॉन्च को भी रद्द कर दिया गया था.
इस पूरे मामले पर क़रीब से नज़र रखने वाले लोगों ने बीबीसी संवाददाता से बताया है कि जैक मा ने जो कुछ भी अपने उस भाषण में कहा था वह उन्हें काफ़ी मंहगा पड़ा.
इस सप्ताह हुई निवेशकों की एक बैठक में अलीबाबा के एग्ज़िक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट जो साई ने कहा कि ''नियामकों की ओर से जो हुआ...ये हमें एक स्क्रूटनी जैसा महसूस हुआ और हम इस मुद्दे को भुलाकर आगे बढ़ गए हैं. ये एक वैश्विक ट्रेंड हैं जहां नियामकों को लगता है कि प्रतिस्पर्धा अनुचित है वह उस दिशा में जाँच करते हैं.''
'अनियमित' ढंग से आगे बढ़ा चीनी टेक बाज़ार
चीनी टेक कंपनियों का जन्म और विकास ऐसे समय में हुआ जब इससे जुड़े कोई नियम-क़ायदे नहीं थे.
ये पूरा सेक्टर बिना किसी क़ानून के संचालित किया जा रहा था. लंबे वक़्त तक सरकार ने इसे बढ़वा भी दिया.
चीनी क़ानूनों की जानकार और हांगकांग विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफ़ोसर एंजेला झांग बताती हैं कि चीन की सरकार ने नए ऐसे बिज़नेस और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए स्कीम भी लॉन्च की थी.
वह कहती हैं, ''पहले नियामकों का रवैया ढीला था, उन लोगों ने ऐसे नियम बनाए जो टेक कंपनियों के प्रति थोड़े नरम थे.''
लेकिन अब मामला बदल रहा है अब चीन ने इन कंपनियों पर लगाम लगाने की कोशिश तेज़ कर दी है.
प्रोफ़ेसर झांग का कहना है कि चीन इस क्षेत्र में लगाम लगाने का इच्छुक है लेकिन वह अर्थव्यवस्था के सुनहरे मौक़े को ख़त्म नहीं करना चाहेगा.
वह कहती हैं, ''चीन में एक कहावत है- चूज़ों को मारकर बंदर को डराना. इस मामले में यही हो रहा है, यहां अलीबाबा को अन्य कंपनियों के लिए एक उदाहरण की तरह पेश किया गया है और उन्हें एक सबक़ सिखाया गया है.''
यक़ीनन चीन का नेतृत्व चाहता है कि देश आर्थिक रूप से समृद्ध हो और वृद्धि इनका मुख्य उद्देश्य भी है.
अलीबाबा के अनुभव से बाक़ी टेक कंपनियों के लिए ये तय होगा कि वह आगे से नियामकों के बनाए नियमों पर चले और उनके क़ाबू में रहें.
रुई मा भी इससे सहमत दिखती हैं. वह कहती हैं कि नियमों के आने से छोटी कंपनियों को बढ़ने में मदद मिलेगी जिसे अब तक इस दुनिया के बड़े खिलाड़ी आगे बढ़ने नहीं दे रहे थे.
वह कहती हैं, ''छोटी कंपनिया नए नियमों के समर्थन में हैं, उन्हें लगता है कि इससे नई और छोटी कंपनियों को आगे बढ़ने का मौक़ा मिलेगा जो इससे पहले नहीं मिलता था." (bbc.com)
ब्रिटेन में पुलिस से जुड़े एक बिल के विरोध में प्रदर्शनों का दौर जारी है. ये विरोध प्रदर्शन किसी एक संगठन ने आयोजित नहीं किए हैं बल्कि ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया माध्यमों के जरिए कई मानवाधिकार संगठनों ने शुरु किए हैं.
डॉयचे वैले पर स्वाति बक्शी की रिपोर्ट-
लंदन में अप्रैल के शुरू में आयोजित किल द बिल प्रदर्शन में पुलिस ने 100 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया. इससे पहले मार्च में ब्रिस्टल शहर में हुए प्रदर्शनों में पुलिस के साथ झड़पों की खबरें आती रही हैं. प्रदर्शनों का ताजा दौर शनिवार 17 अप्रैल को आयोजित हो रहा है जब लंदन, बाथ, बर्मिंघम, ब्राइटन, कार्डिफ, ब्रिस्टल और मैनचेस्टर समेत ब्रिटेन के कईं दूसरे शहरों में प्रदर्शनकारी एकजुट होंगे. लॉकडाउन खुलने के बाद किल द बिल प्रदर्शनों का ये पहला आयोजन है और इसमें पहले से कहीं ज्यादा लोगों की हिस्सेदारी की उम्मीद है.
मानवाधिकार, श्रमिक अधिकार, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए काम करने वाली संस्थाओं ने इन प्रदर्शनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी की है. प्रदर्शनकारियों की दलील है कि पुलिस को बेहद ताकतवर बनाने वाला ये बिल विरोध-प्रदर्शन के अधिकारों का हनन करता है और सरकार को इस पर दोबारा सोचना चाहिए. बीते कुछ महीनों के दौरान ब्रिटेन और यूरोप में तमाम मसलों पर विरोध-प्रदर्शन आयोजित हुए. ब्लैक लाइव्स मैटर से जुड़े प्रदर्शन, फ्रांस में सुरक्षा कानूनों के विरोध में हुआ प्रदर्शन या फिर लॉक डाउन के विरोध में हुए प्रदर्शन हों, ये सवाल बराबर बना रहा कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कारगर उपाय क्या होने चाहिए और पुलिस किस हद तक जा सकती है. ब्रिटेन के इस बिल में विरोध प्रदर्शनों पर नियंत्रण समेत पुलिस की भूमिका को मजबूत बनाने के प्रावधान है.
क्या कहता है बिल
पुलिस, क्राइम, सेंटेंसिंग एंड कोर्ट बिल, 300 पन्नों का एक अहम और विवादित बिल है जिसमें पुलिस, अपराध और सजा से जुड़े व्यापक प्रस्ताव रखे गए हैं. इसमें गंभीर अपराधों के लिए सजा को कड़ा करने, सजा खत्म होने से पहले जेल से रिहाई की नीति का अंत करने समेत कई सिफारिशें हैं. प्रस्तावित कानून का एक हिस्सा पुलिस और पुलिस की ताकतों से जुड़ा है, जिसमें प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के अधिकार दिए जाने की बात है और इन्हीं पर विरोध हो रहा है. मौजूदा कानूनों के मुताबिक, पुलिस नागरिक प्रदर्शनों को तब तक रोक नहीं सकती जब तक वह ये साबित ना कर दे कि किसी प्रदर्शन से जान-माल और संपत्ति को भयंकर खतरा है या फिर आम जनजीवन के बुरी तरह प्रभावित होने की संभावना है. नया कानून पुलिस को ये अधिकार देता है कि यदि वो किसी प्रदर्शन को आम जीवन के लिए रुकावट मानती है तो उसके खिलाफ कदम उठा सके. उदाहरण के लिए पुलिस को प्रदर्शन का वक्त और आवाज की सीमा तय करने का हक होगा.
बिल के अन्य विवादास्पद पहलुओं में ये प्रस्ताव भी है कि यदि प्रदर्शन के दौरान किसी स्मारक या मूर्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है तो जिम्मेदार व्यक्ति को दस साल तक की सजा हो सकती है. गौरतलब है कि ब्लैक लाइव्स मैटर प्रदर्शनों के दौरान ब्रिस्टल में एक दास व्यापारी एडवर्ड कोलस्टन की मूर्ति को तोड़ा गया था. सरकार की तरफ से लगातार कहा जाता रहा है कि ये बिल पुलिस की सक्रिय भूमिका और आम लोगों की सुविधा का ध्यान रखने की कोशिश है. पिछले हफ्ते संसद में बोलते हुए, गृह मंत्री प्रीति पटेल ने साफ किया कि "अधिकारियों को प्रदर्शनकारियों और आम जनजीवन के बीच संतुलन कायम की करने की जरूरत है.”
विरोध की शुरूआत
पुलिस का बर्ताव यूं तो ब्रिटेन समेत दुनिया भर में बहस का मुद्दा है लेकिन ये बिल अचानक विवाद का मसला बना एक तैंतीस वर्षीय महिला सैरा एवरर्ड की मौत के बाद. एवरर्ड 3 मार्च को लंदन के एक इलाके से लापता हो गईं और बाद में उनका शव बरामद हुआ. उनकी हत्या के मामले में एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ मामला तय हुआ. एवरर्ड की याद में 12 मार्च को एक कैंडिल लाइट सभा आयोजित की गई थी जिसे पुलिस ने तितर बितर कर दिया. वजह थी कोविड लॉकडाउन और लोगों के जमा होने की मनाही के नियम.
पुलिस ने हिंसा का विरोध कर रही महिलाओं को रोका और गिरफ्तारियां की. इस मामले में पुलिस की कड़ी आलोचना हुई और अधिकारियों के बर्ताव की जांच की जा रही है. ये घटनाएं, पुलिस और अपराध बिल पर संसद में हुई बहस से चंद रोज पहले हुई और पुलिस की ताकत और उसके बर्ताव का विरोध, किल द बिल प्रदर्शनों का आधार बन गया. महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘सिस्टर्स अनकट' का कहना है ”पुलिस बिल प्रदर्शनों को आपराधिक घोषित करते हुए उन्हें रोकने का अधिकार देता है. वही पुलिस जो अभी प्रदर्शनकारियों को मारती है, वो आगे और भी ताकतवर हो कर ज्यादा हिंसक व्यवहार करेगी.”
ये विवादास्पद बिल संसद के निचले सदन में शुरूआती प्रक्रिया पार कर चुका है. फिलहाल कमेटी स्तर पर इस बिल के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत, सुझाव और बहस का दौर शुरू होगा जिसके बाद बिल वापिस निचले सदन मे चर्चा के लिए रखा जाएगा, लेकिन ये सारी प्रक्रिया फिलहाल इस साल के अंत तक के लिए टाल दी गई है. (dw.com)
पिछले कुछ महीने ताइवान के लिए चुनौती और चिंता भरे रहे हैं. जहां चीन ने बार-बार ताइवान के संप्रभु हवाई क्षेत्र में अतिक्रमण कर ताकत दिखाई है, वहीं ताइवान को अमेरिका और जापान समेत कई देशों का समर्थन भी मिला है.
डॉयचे वैले पर राहुल मिश्र की रिपोर्ट-
इस हफ्ते तेजी से बदलते वैश्विक घटनाक्रम में ताइवान चर्चा में रहा है. अमेरिका के दौरे पर गए जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा की राष्ट्रपति जो बाइडेन से बातचीत में ताइवान बड़ा मुद्दा है. बाइडेन प्रशासन का एक अनौपचारिक शिष्टमंडल अभी अभी ताइवान का दौरा कर वापस गया है. बाइडेन प्रशासन के प्रतिनिधियों की इस यात्रा पर चीन ने कड़ी आपत्ति भी जताई और अमेरिका से कहा कि ताइवान से संबंधों की पींग बढ़ा कर अमेरिका आग से खेलने की गलती कर रहा है.
दरअसल, 2016 में राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन के सत्ता में आने के बाद से ही चीन ताइवान को लेकर कड़ा रुख अपना रहा है. त्साई इंग-वेन सरकार ने 1992 में अंतर-जलडमरूमध्य संबंधों को लेकर हुई सहमति को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, लिहाजा चीन ने ताइवान के साथ संपर्क बंद कर दिए.
चीनी दबाव के कारण ताइवान को मुख्य रूप से विश्व स्वास्थ्य असेम्बली से भी हटा दिया गया. इसकी वजह यह भी रही कि ताइवान ने चीनी ताइपे नाम से इस सम्मेलन में भाग लेने से इनकार कर दिया था. त्साई इंग-वेन की नीतियों से भड़के चीन ने पिछले कुछ वर्षों में ताइवान के सहयोगियों को एक एक कर उससे दूर करने की कोशिश भी की है. जाहिर है इस बात से ताइवान परेशान है लेकिन उसने चीन की इस आक्रामक नीति के आगे घुटने नहीं टेके हैं. और इसी वजह से चीन और ताइवान के बीच तनाव और सैन्य तनातनी भी बढ़ गयी है.
चीन के लिए ताइवान के हवाई क्षेत्र में विमान वाहक भेजना अब आम बात हो गई है. इस हफ्ते, चीन ने एक ही दिन में ताइवान के एडीआईजेड में 25 लड़ाकू विमानों और परमाणु-सक्षम बमों सहित विमानों को भेजा जो अब तक की सबसे बड़ी संख्या है. कोविड महामारी के बीच ताइवान की बढ़ती लोकप्रियता और चीन के प्रति देशों के असंतोष ने चीन को कूटनीतिक और मानसिक तौर पर असुरक्षित बना दिया है जिसका असर उसके विदेशनीति व्यवहार में बदलाव में साफ दिखता है.
ट्रंप प्रशासन के सख्त रवैए से हलकान हुए चीन को उम्मीद थी कि शायद डेमोक्रेट सरकार आए तो बात पहले जैसी सामान्य हो जाए लेकिन ऐसा हो नहीं हुआ. जो बाइडेन के सत्ता में आने के बाद तो चीन के लिए स्थिति बद से बदतर होती दिख रही है. आर्थिक, जलवायु और पर्यावरण के मुद्दों के अलावा सैन्य सहयोग और सामरिक मामलों पर भी बाइडेन आक्रामकता में ट्रंप से फिलहाल तो कहीं कम नहीं दिख रहे और इस बात ने चीन को झुंझला कर रख दिया है.
चीन को लेकर अमेरिकी प्रशासन की पैनी रणनीति और नीयत दोनों की झलक हमें तब देखने को मिली जब चीन की बढ़ती आक्रामकता पर अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन का मुखर बयान आया कि चीन को पश्चिमी प्रशांत में यथास्थिति बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. अलास्का में विफल वार्ता के वक्त भी यह साफ हो गया था.
रहा सवाल नीयत का, तो बाइडेन प्रशासन के शिष्टमंडल भेजने का अनुमान किसी को भी नहीं था. इस शिष्टमंडल में पूर्व सीनेटर क्रिस डोड और पूर्व उप सचिव रिचर्ड आर्मिटेज और जेम्स स्टाइनबर्ग जैसे कई अनुभवी नेता शामिल थे. जाहिर है बाइडेन प्रशासन ताइवान को लेकर सजग है और चीन को लेकर चौकन्ना भी. इस तरह के कूटनीतिक संदेश दरअसल इसी काम के लिए होते हैं.
चीन की आक्रामकता से निबटने की तैयारी
ताइवान सरकार भी अमेरिका के इस कदम से संतुष्ट दिखती है. राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन ने भी कहा कि अमेरिका और ताइवान इंडो-पैसिफिक में स्थिरता, शांति और समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए सहयोग करेंगे. ताइवान के राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता जेवियर चांग ने कहा कि अमेरिकी कदम ताइवान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच चट्टान की तरह मजबूत रिश्तों का परिचायक है. लेकिन ताइवान के लिए यह परेशानियों का अंत नहीं है क्योंकि चीन अनौपचारिक यात्रा का कड़ा जवाब दे रहा है. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने इस यात्रा की निंदा की और अमेरिका से कहा कि वह ताइवान के अधिकारियों के साथ किसी भी रूप में आधिकारिक बातचीत को तुरंत रोक दे और ताइवान से संबंधित मुद्दे पर समझदारी से पेश आए.
जापानी प्रधानमंत्री सुगा की अमेरिका यात्रा भी इस मामले में महत्वपूर्ण है. दोनों देशों के नेताओं का संयुक्त बयान ताइवान में बढ़ रहे तनाव और इलाके की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है. ताइवान जलडमरूमध्य में संघर्ष किसी भी देश के हित में नहीं है. सभी देशों को यह समझना होगा. चीन की बढ़ती आक्रामकता से निपटने के लिए ताइवान, अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच सामरिक सहयोग और इस बात की प्रतिबद्धता जरूरी कदम है. लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि चीन का ध्यान इस बात की ओर भी दिलाया जाए कि युद्ध किसी भी पार्टी के लिए अच्छी खबर नहीं होगा.
वेलिंगटन, 16 अप्रैल | न्यूजीलैंड में गाड़ी चलाते समय मोबाइल इस्तेमाल करना पड़ेगा भारी पड़ेगा और जेब भी ज्यादा ढीली होगी। शुक्रवार को परिवहन मंत्रालय द्वारा जारी बयान के अनुसार, न्यूजीलैंड में 30 अप्रैल से ड्राइविंग करते समय मोबाइल फोन का उपयोग करते हुए पकड़े गए लोगों के लिए 80 न्यूजीलैंड डॉलर से 150 न्यूजीलैंड डॉलर बढ़ाएगा। सिन्हुआ समाचार एजेंसी ने बयान में कहा कि परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों से पता चला है कि 2015 से 2019 के बीच सड़क दुर्घटना में 22 लोगों की मौत हुई है और 73 गंभीर रूप से घायल हुए हैं।
परिवहन मंत्री माइकल वुड ने कहा कि इस आंकड़े के कम होने की संभावना थी क्योंकि दुर्घटनाग्रस्त होने पर पुलिस को फोन के इस्तेमाल का पता लगाना हमेशा मुश्किल होता है।
वुड ने कहा, सुरक्षा हमारी सर्वोच्च परिवहन प्राथमिकताओं में से एक है, लेकिन अभी भी बहुत से लोग ड्राइविंग करते समय फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं।
ड्राइविंग के दौरान मोबाइल चलाते हुए पकड़े पर 20 डिमेरिट प्वाइंट मिलेंग, अगर दो साल में 100 डिमेरिट प्वाइंट हो जाएंगे तो तीन महीने के लिए लाइसेंस कर दिया जाएगा।
परिवहन मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि यह मौजूदा नियमों में बढ़ोत्तरी की गई है, जिसमें ड्राइविंग के दौरान ड्राइवर भी फोन का उपयोग नहीं कर सकता है, एक हाथ से मोबाइल चलाना, कॉल करना, फोन रिसीव करना, फोन काटना, मैसेज भेजना या मेल भेजना, वीडियो बनाना, भेजना, देखना या किसी अन्य तरीके से संवाद करने के लिए सख्त नियम बनाए गये हैं।
लेकिन इसमें कुछ अपवाद हैं जैसे कि नेविगेशन ऐप का उपयोग करना जब फोन कार से जुड़ा होता है। (आईएएनएस)
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि वो चाहते हैं कि सभी अमेरिकी सैनिक 11 सितंबर से पहले अफ़ग़ानिस्तान से वापस आ जाएं. उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप की एक मई 2021 की समयसीमा को आगे बढ़ा दिया है.
बाइडन ने कहा है, 'अब अमेरिका के सबसे लंबे युद्ध को समाप्त करने का समय आ गया है.'
ये युद्ध साल 2001 में शुरू हुआ था.
अमेरिका ने कितने सैनिक अफ़ग़ानिस्तान भेजे थे?
अमेरिका ने तालिबान को सत्ता से बाहर करने के लिए अक्तूबर 2001 में अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया था. अमेरिका का आरोप था कि अफ़ग़ानिस्तान ओसामा बिन लादेन और अल-क़ायदा से जुड़े दूसरे लोगों को पनाह दे रहा है. अमेरिका इन्हें ही सितंबर 2001 के हमले के लिए ज़िम्मेदार मानता है.
अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान से लड़ने के लिए अरबों डॉलर ख़र्च किए और बड़ी संख्या में सैनिक भेजे. अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में पुनर्निर्माण पर भी भारी ख़र्च किया है.
पिछले साल दिसंबर तक अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या चार हज़ार ही रह गई थी. इस साल सैनिकों की संख्या और भी कम हो गई है.
हालांकि अमेरिका के अधिकारिक डाटा में स्पेशल ऑपरेशन फ़ोर्सेज़ और दूसरी अस्थाई यूनिटों की सही संख्या ज़ाहिर नहीं की जाती है.
युद्ध के दौरान एक समय अमेरिकी सैनिकों की संख्या एक लाख दस हज़ार तक पहुँच गई थी.
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वहीं अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी के लिए निजी सुरक्षा कॉंट्रेक्टर भी अच्छी ख़ासी तादाद में काम कर रहे हैं. अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च के मुताबिक़ साल 2020 की अंतिम तिमाही में 7800 अमेरिकी नागरिक अफ़ग़ानिस्तान में थे.
अमेरिकी सेना ने जब अपना ध्यान आक्रामक कार्रवाइयों के बजाए अफ़ग़ानिस्तानी सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण में लगाया तो अमेरिका के ख़र्च में भारी गिरावट आई.
अमेरिकी सरकार के डाटा के मुताबिक़ साल 2010 से 2012 के बीच जब अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या एक लाख को पार कर गई थी, अफ़ग़ान युद्ध पर अमेरिका का सालाना ख़र्च सौ अरब डॉलर को पार कर गया था.
वहीं 2018 में सालाना ख़र्च 45 अरब डॉलर था. उस साल रक्षा मंत्रालय के एक शीर्ष अधिकारी ने अमेरिकी कांग्रेस को ये जानकारी दी थी.
अमेरिका के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक़ अफ़ग़ानिस्तान युद्ध पर अक्तूबर 2001 से सितंबर 2019 के बीच 778 अरब डॉलर ख़र्च हुए.
इसके अलावा अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय संस्था यूएस एजेंसी फ़ॉर इंटरनेशनल डेवेलपमेंट (यूएसएड) के ज़रिए अफ़ग़ानिस्तान में विकास परियोजनाओं पर 44 अरब डॉलर ख़र्च किए हैं.
अमेरिका के अधिकारिक डाटा के मुताबिक़ साल 2001 से 2019 के बीच अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में कुल 822 अरब डॉलर ख़र्च किए. हालांकि इन आंकड़ों में पाकिस्तान में ख़र्च किया गया पैसा शामिल नहीं हैं.
अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में अपने सैन्य अभियानों के लिए पाकिस्तान को एक अड्डे की तरह इस्तेमाल किया है.
अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में अमरीकी ख़र्च पर ब्राउन यूनिवर्सिटी में साल 2019 में हुए एक शोध के मुताबिक़ अमेरिका ने लगभग 978 अरब डॉलर ख़र्च किए हैं. ब्राउन यूनिवर्सिटी के आकलन में वित्तीय वर्ष 2020 के लिए जारी की गई रक़म भी शामिल है.
इस शोध में ये भी कहा गया है कि ख़र्च का सही आकलन करना मुश्किल है क्योंकि सरकार के अलग-अलग विभागों में ख़र्चों की गणना अलग-अलग तरह से की जाती है. समय के साथ तरीक़े बदलते भी हैं जिससे भी आकलन पर असर होता है.
इतना पैसा गया कहां है?
अफ़ग़ानिस्तान में अधिकतर पैसा चरमपंथ विरोधी अभियानों और सैनिकों की ज़रूरतों पर ख़र्च किया गया है जिसमें उनका खाना-पीना, मेडिकल केयर, विशेष वेतन और रहने की व्यवस्था आदि शामिल हैं.
हालांकि, अधिकारिक डाटा से पता चलता है कि साल 2002 के बाद से अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में पुनर्निर्माण गतिविधियों पर 143.27 अरब डॉलर ख़र्च किए हैं.
इनमें से लगभग आधा पैसा अफ़ग़ानिस्तान के सुरक्षा बलों पर ख़र्च किया गया है जिसमें अफ़ग़ान नेशनल आर्मी और पुलिस बल शामिल हैं.
लगभग 36 अरब डॉलर अफ़ग़ान सरकार और विकास योजनाओं के लिए दिए गए हैं. इसके अलावा ड्रग तस्करी के ख़िलाफ़ और मानवीय मदद पर भी ख़र्चा हुआ है.
इतने सालों के दौरान कुछ पैसा भ्रष्टाचार, घोटालों और दुरुपयोग में भी बर्बाद हुआ है.
अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के पुनर्निर्माण प्रयासों पर नज़र रखने वाली एजेंसी ने अक्तूबर 2020 में अमेरीकी कांग्रेस में पेश अपनी रिपोर्ट में बताया था कि मई 2009 से दिसंबर 2019 के बीच अफ़ग़ानिस्तान में 19 अरब डॉलर का नुक़सान भी हुआ.
और युद्ध की मानवीय क़ीमत का क्या?
2001 में तालिबान के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू होने के बाद से 2300 से अधिक अमेरिकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में जान गंवा चुके हैं जबकि 20660 सैनिक लड़ाई के दौरान घायल भी हुए हैं.
लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के नागरिकों और सुरक्षा बलों के नुक़सान के सामने अमेरिकी आंकड़ें कुछ भी नहीं हैं.
राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने साल 2019 में कहा था कि उनके राष्ट्रपति बनने के पाँच सालों के भीतर अफ़ग़ानिस्तानी सुरक्षा बलों के 45 हज़ार से अधिक जवानों ने अपनी जान गंवाई है.
ब्राउन यूनिवर्सिटी के साल 2019 के शोध के मुताबिक़ अक्तूबर 2001 में युद्ध शुरू होने के बाद से 64100 से अधिक अफ़ग़ानिस्तानी सैनिक और पुलिसकर्मी मारे गए हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र के मिशन के मुताबिक साल 2009 में आंकड़े इकट्ठा करने की शुरुआत के बाद से अब तक 111000 से अधिक अफ़ग़ानिस्तान नागरिक मारे गए हैं. (bbc.com)
नई दिल्ली, 16 अप्रैल | इंग्लैंड और राजस्थान रॉयल्स (आरआर) के ऑलराउंडर बेन स्टोक्स भारत से शुक्रवार को स्वदेश पहुंचेंगे और उंगली में लगी चोट के ऑपरेशन कराने के बाद 12 सप्ताह तक एक्शन से दूर रहेंगे। गुरुवार को हुए सीटी स्कैन और रिपीट एक्स-रे से पता चला कि स्टोक्स की बाईं तर्जनी फ्रैक्चर हो गई है। सोमवार को लीड्स में उनकी सर्जरी होगी।
पंजाब किंग्स के खिलाफ आरआर के शुरूआती मैच के दौरान स्टोक्स को चोट तब लगी जब वह वेस्टइंडीज के बल्लेबाज क्रिस गेल का कोच डीप प्वाइंट में लपका था लेकिन इस दौरान वह चोटिल हो गए थे।
पूरे आईपीएल सीजन को मिस करने के अलावा, स्टोक्स को अब न्यूजीलैंड के खिलाफ इंग्लैंड की टेस्ट सीरीज से भी बाहर रहना होगा, जो 2 जून से शुरू हो रही है।
स्टोक्स ने शुरू में मैदान के बाहर से सहारा देने के लिए बाकी सीजन के लिए आरआर के साथ रहने का इरादा बनाया था।(आईएएनएस)
इस्लामाबाद, 16 अप्रैल | फ्रांस में पिछले साल पैगंबर के चित्र प्रकाशित करने के मुद्दे के खिलाफ कट्टरपंथी इस्लामवादी समूह के कार्यकर्ता हिंसक विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं, इस आशंका के साथ पाकिस्तान में शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर रोक लगा दी गई है। डीपीए समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के विवादास्पद ईशनिंदा कानूनों का समर्थन करने वाला समूह तहरीक-ए-लब्बैक के समर्थकों ने सोमवार को शुरू हुए घातक विरोध प्रदर्शनों के बीच सड़कों पर जाम लगा दिया।
उनकी मांग है कि पिछले साल नबी के चित्रण वाले कार्टून के प्रकाशन के मुद्दे पर 20 अप्रैल तक फ्रांसीसी राजदूत को निष्कासित करने के सरकार पहले किए गए अपने वादे को पूरा करे।
देश में हो रहे इन विरोध प्रदर्शनों में दो पुलिस अधिकारियों सहित कम से कम पांच लोगों की मौत हो गई है। हिंसा के माहौल को देखते हुए इस्लामाबाद में फ्रांसीसी दूतावास से कहा गया है कि वह फ्रांस के नागरिकों से अस्थायी रूप से पाकिस्तान छोड़ने की अपील करें।
एक अधिकारी ने डीपीए को बताया, सोशल मीडिया को कुछ घंटे के लिए ब्लॉक कर दिया गया है ताकि प्रदर्शनकारी जुम्मे की नमाज के वक्त कोई हंगामा खड़ा न कर सके।
राजधानी इस्लामाबाद सहित पूरे देश में फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और टिकटॉक की सेवाएं ब्लॉक हैं।
दरअसल, राजनीतिक दल, इस्लामी समूह और तालिबान जैसे आतंकवादी संगठन अपने अनुयायियों के साथ जुड़ने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मो पर बहुत अधिक भरोसा करते हैं।
(आईएएनएस)
तेल अवीव, 16 अप्रैल | इजरायल में बाहर मास्क पहनने के नियम को रविवार से हटा दिया जाएगा। स्वास्थ्य मंत्री यूली एडेलस्टीन ने गुरुवार को घोषणा की। समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, एडेलस्टीन ने गुरुवार को एक बयान में कहा कि उन्होंने मंत्रालय के महानिदेशक, हेजी लेवी को प्रतिबंध को रद्द करने के आदेश पर हस्ताक्षर करने का निर्देश दिया था।
मंत्रालय द्वारा सिफारिश पर निर्णय लिया गया था कि, कोविड -19 के मरीजों की संख्या कम होने के कारण अब इजरायल में बाहर मास्क पहनने की जरुरत नहीं है।
उन्होंने हालांकि कहा कि मास्क अभी भी घर के अंदर पहनने की आवश्यकता होगी।
एडेलस्टीन ने कहा, इजराइल में सफल टीकाकरण के कारण मरीजों की संख्या काफी कम है और इसलिए आगे नागरिकों के लिए प्रतिबंधों को और कम कर सकते हैं।
इजरायल ने देश में महामारी की शुरूआत के एक महीने बाद अप्रैल 2020 की शुरूआत में घर के बाहर फेस मास्क पहनना अनिवार्य किया था।
फेस मास्क न पहनने पर पहली बार जुर्माना 200 नए शेकेल ( 61) पर लगाया गया था, जिसे जुलाई 2020 में 500 शेकेल कर दिया गया था। (आईएएनएस)
नई दिल्ली. पाकिस्तान में ट्विटर, फेसबुक, यूट्यूब, वॉट्सऐप, टिकटॉक और टेलीग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को बैन कर दिया गया है. इन सोशल मीडिया ऐप्स पर सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक रोक लगा दी गई है. शुक्रवार को पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने यह जानकारी दी. पाकिस्तान के मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तान टेलीकम्युनिकेशन अथॉरिटी ने दिशा-निर्देश देते हुए इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बैन कर दिया है. पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने PTA को दिशानिर्देश देते हुए इन ऐप्स को ब्लॉक करने का आदेश दिया.
गौरतलब है कि इन सोशल मीडिया वेबसाइट्स और ऐप्स को 11 बजे से 3 बजे तक के लिए ब्लॉक करने का आदेश दिया गया है. हालांकि अभी तक इसकी वजह नहीं पता है कि ब्लॉक क्यों किया गया है. बता दें, पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान में तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान की तरफ से प्रदर्शन किए जा रहे हैं. बताया जा रहा है कि इसी प्रोटेस्ट की वजह से पाकिस्तान में सोशल मीडिया को ब्लॉक करने का फैसला लिया गया है. सोशल मीडिया बैन से पहले पाकिस्तानी TV चैनल्स से तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान के प्रोटेस्ट की कवरेज को भी बैन कर दिया गया है. Dawn की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान टेलीकॉम अथॉरिटी के चेयरमैन ने कहा है कि उनसे इस मैटर पर तत्काल ऐक्शन लेने को कहा गया है.
दरअसल पाकिस्तान में फ्रांस के खिलाफ कई धार्मिक संगठन प्रदर्शन कर रहे हैं. इनमें TLP भी शामिल है जिसे वहां बैन कर दिया गया है. फ्रांस के खिलाफ प्रदर्शन फ्रांस में पैंगबर मुहम्मद के कार्टून बनाए जाने को लेकर हो रहा है. इसी बीच फ्रांस ने भी अपने सिटिजन्स को पाकिस्तान छोड़ने का आदेश दिया है.
वॉशिंगटन, 16 अप्रैल | अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा 22 अप्रैल को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से स्पेसएक्स क्रू ड्रैगन की दूसरी उड़ान को लॉन्च करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। क्रू—2 को फ्लोरिडा में स्थित केनेडी स्पेस सेंटर के लॉन्च कॉम्प्लेस 39ए से 22 अप्रैल को स्थानीय समयानुसार सुबह 6 बजकर 11 मिनट पर चार अंतरिक्ष यात्रियों के साथ लॉन्च किया जाएगा।
नासा ने अपने दिए एक बयान में कहा है, इस मिशन में स्पेसक्राफ्ट कमांडर और पायलट की जिम्मेदारी नासा के ही अंतरिक्ष यात्री शेन क्रिम्ब्राह और मेगन मैकआर्थर पर है। इनके अलावा मिशन में जाक्सा (जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी) के अंतरिक्ष यात्री अकिहिको होशिदे और ईएसए (यूरोपीय स्पेस एजेंसी) के अंतरिक्ष यात्री थॉमस पेस्केट भी शामिल रहेंगे। ये स्पेस स्टेशन पर मिशन स्पेशलिस्ट की जिम्मेदारी को निभाएंगे।
यह मिशन नासा की छह प्रमाणित क्रू मिशनों में से दूसरा है, जिसमें स्पेसएक्स एजेंसी के कमर्शियल क्रू प्रोग्राम के एक हिस्से के रूप में उड़ान भरेगा। क्रू—1 को पिछले साल नवंबर में सफलतापूर्वक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में लॉन्च किया गया था। (आईएएनएस)
जर्मनी अपनी दोहरी शिक्षा प्रणाली के लिए जाना जाता है. इसके तहत स्कूली शिक्षा के बाद किशोरों को व्यावसायिक प्रशिक्षण मिलता है. कोरोना महामारी के दौरान बहुत से किशोर प्रशिक्षण से वंचित हैं.
डॉयचे वैले पर महेश झा की रिपोर्ट-
कोरोना महामारी का असर यूं तो दुनिया भर में हुआ है, लेकिन जर्मनी में अर्थव्यवस्था के कुछ इलाके इसके खास चपेट में आए हैं. इसका असर पर्यटन, संस्कृति और रेस्तरां जैसे इलाकों में कारोबार और नौकरी पर हुआ है. इसका प्रभाव बहुत से नौजवानों के भविष्य पर भी पड़ा है, जिन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण की जगह नहीं मिल रही है. आने वाले महीनों में जर्मनी में स्कूली साल खत्म हो रहा है और व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए नया साल शुरू हो रहा है. इस मौके पर पर जो आंकड़े सामने आए हैं उसके अनुसार 2019 के मुकाबले 2020 में व्यावसायिक प्रशिक्षण के कॉन्ट्रैक्ट में करीब 10 फीसदी की कमी देखी गई.
सांख्यिकी कार्यालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार यह कमी अभूतपूर्व है. सांख्यिकी कार्यालय का कहना है कि हालांकि पिछले सालों में व्यावसायिक प्रशिक्षण की सीटों में कमी होती रही है, लेकिन पिछले साल जितनी कमी हुई है उतनी कभी नहीं हुई. पिछले साल 4,65,000 किशोरों ने व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए कॉन्ट्रैक्ट किया. सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार उनमें दो तिहाई संख्या पुरुषों की थी. पिछले साल व्यावसायिक प्रशिक्षण की सीटें पाने में महिलाएं पुरुषों से और पीछे रही हैं. उनकी संख्या में 10.2 प्रतिशत की कमी आई.
जर्मनी के विभिन्न प्रांतों में व्यावसायिक प्रशिक्षण में कमी से पता चलता है कि किस प्रांत में अर्थव्यवस्था की क्या हालत है. हैम्बर्ग और जारलैंड में कमी साढ़े 12 प्रतिशत से ज्यादा रही है, जबकि राजधानी बर्लिन से सटे ब्रांडेनबुर्ग में सिर्फ 2.8 प्रतिशत. यह इसलिए भी है कि कृषि क्षेत्र में हालत उतनी खराब नहीं रही. उसमें एक साल पहले के मुकाबले 500 ज्यादा किशोरों को प्रशिक्षण का मौका मिला. उद्योग और व्यापार में 12 प्रतिशत की कमी और कारीगरी में 6.6 प्रतिशत की. कोरोना महामारी का असर खासकर उद्योग और व्यापार पर पड़ा है.
व्यावसायिक प्रशिक्षण का मकसद किशोरों को सैद्धांतिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण के साथ काम के लिए तैयार करना है. दो से तीन साल के व्यावसायिक प्रशिक्षण के दौरान ट्रेनी को तनख्वाह भी मिलती है. 2018 में ट्रेनी की औसत मासिक आय 908 यूरो थी. सबसे अच्छी तनख्वाह वाले व्यवसायों में शिप मैकेनिक, नर्स, राजमिस्त्री और बीमा क्लर्क आते हैं जिन्हें पहले साल करीब 1100 और तीसरे साल में 1500 यूरो से ज्यादा मिलता है. इन नौकरियों में सालाना तनख्वाह 35 से 40 हजार यूरो होती है.
जर्मनी की दोहरी शिक्षा प्रणाली अपने आप में अनूठी है जिसे देश में कम बेरोजगारी दर के लिए जिम्मेदार माना जाता है. तीन साल व्यावसायिक ट्रेनिंग के कारण देश में हमेशा प्रशिक्षित कुशल कर्मी उपलब्ध रहते हैं. जर्मनी के मिटेलश्टांड के नाम से विख्यात छोटे और मझौले उद्यम इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं क्योंकि देश के 10 में 8 ट्रेनी इन्हीं उद्यमों में ट्रेनिंग पाते हैं. इस सिस्टम की वजह से जर्मनी में 2019 में 15 से 24 साल के युवाओं में बेरोजगारी दर सिर्फ 5.8 प्रतिशत थी, जबकि यूरोप में यह दर 15 प्रतिशत थी. ग्रीस और स्पेन जैसे देशों में यह 30 प्रतिशत से ज्यादा है.
व्यावसायिक प्रशिक्षण एक तरह से नौकरी पाने की गारंटी है. 2018 में 71 प्रतिशत ट्रेनी को उन्हीं कंपनियों में नौकरी मिल गई जहां वे ट्रेनिंग पा रहे थे. श्रम बाजार शोध संस्थान के अनुसार 94 प्रतिशत ट्रेनी को तीन महीने के अंदर नौकरी मिल जाती है. जर्मनी में करीब 30 लाख छोटे और मझौले उद्यम हैं. देश के करीब 15 लाख ट्रेनीशिप में 80 प्रतिशत ट्रेनिंग इन्हीं उद्यमों में दी जाती है. प्रशिक्षण का बड़ा खर्च 70 प्रतिशत तक भी वही उठाते हैं. लेकिन उन्हें प्रशिक्षित कर्मचारियों की भर्ती पर कोई खर्च नहीं करना पड़ता क्योंकि 10 में सात ट्रेनी उन्ही कंपनियों में नौकरी कर लेते हैं.
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एक वित्तीय कंपनी के लिए सरकार में लॉबिंग के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल करने के आरोपों से घिरे ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के खिलाफ संसदीय जांच नहीं होगी.
डॉयचे वैले पर स्वाति बक्शी की रिपोर्ट-
ग्रीनसिल कैपिटल नाम की एक कंपनी के हक में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों की लामबंदी के मामले में कैमरन फंस गए हैं. उनके खिलाफ लेबर पार्टी ने संसदीय जांच की योजना रखी लेकिन प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन ने अपने सांसदों से इसके खिलाफ वोट करने को कहा और प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया गया.
बॉरिस जॉनसन ने एक सरकारी वकील नाइजल बोर्डमैन को इस मामले में स्वतंत्र पुनरावलोकन का जिम्मा दिया है. बोर्डमैन अपनी सरकारी भूमिका से अलग रहकर ग्रीनसिल मामले के वित्तीय पहलुओं और लॉबिंग की जांच पूरी करेंगे. लेबर पार्टी ने इसे सत्ताधारी कंजरवेर्टिव पार्टी के भ्रष्टाचार की लीपा-पोती करार दिया है. डेविड कैमरन ने रविवार को एक लंबा बयान जारी करके कहा कि उन्होंने कोई नियम नहीं तोड़ा है लेकिन इतना जरूर है कि उन्हें "सिर्फ औपचारिक तरीकों से संवाद करना चाहिए था ताकि भ्रामक प्रचार की कोई गुंजाइश ना रहे."
क्या है ग्रीनसिल कंपनी का मामला?
इस ताजा विवाद के केंद्र में है ग्रीनसिल कैपिटल और उसकी नींव रखने वाले लेक्स ग्रीनसिल जो उस वक्त डेविड कैमरन के सलाहकार थे, जब वे प्रधानमंत्री पद पर थे. इसके चलते ग्रीनसिल की तमाम सरकारी महकमों में पहुंच बनी जिसके चलते उनकी कंपनी को जबरदस्त आर्थिक फायदा हुआ. हालांकि इस साल मार्च में यह कंपनी ठप हो गई. संडे टाइम्स अखबार की खोजी रिपोर्ट के मुताबिक ग्रीनसिल उस दौर में बनी ऐसी नीतियों के मुख्य कर्ताधर्ता रहे हैं, जिनसे छोटी कंपनियों को तुरत-फुरत में सरकारी सहायता मुहैया कराई जा सके. उनकी अपनी कंपनी ग्रीनसिल कैपिटल भी लाभ पाने वाली ऐसी कंपनियों में शामिल है.
2016 में अपना पद छोड़ने के बाद डेविड कैमरन साल 2018 में ग्रीनसिल से जुड़ गए. आरोप है कि उन्होंने ब्रिटेन के चांसलर ऋषि सुनक को लिखित संदेश भेजे और कई आला अधिकारियों और मंत्रियों तक अपनी पहुंच का इस्तेमाल करते हुए ग्रीनसिल कैपिटल को कोविड कॉरपोरेट वित्तीय सुविधा के तहत तात्कालिक सरकारी मदद दिलवाई.
ऋषि सुनक के संदेशों को बाद में सार्वजनिक किया गया, तो पता चला कि अप्रैल 2019 में उन्होंने डेविड कैमरन को कहा था कि वे उन्हें वित्तीय सुविधा का पूरा लाभ देने के लिए अपनी विभागीय टीम पर दबाव बना रहे हैं. कैमरन ग्रीनसिल कैपिटल से सलाहकार के तौर पर जुड़े और उन्हें इससे लाखों पाउंड का फायदा होने की बात कही जा रही है. 2019 में कैमरन ने ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री मैट हैनकॉक और ग्रीनसिल के बीच एक निजी बातचीत भी करवाई.
इसके अलावा यह बात भी सामने आई है कि 2018 में ग्रीनसिल ने सप्लाई चेन फाइनैंस सेवा के जरिये राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा यानी एनएचएस से जुड़ा एक कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने में भी सफलता पाई. सप्लाई चेन फाइनैंस सेवा देने वाली कंपनियां एक निश्चित फीस के बदले किसी कंपनी के बिलों का भुगतान तुरंत करने में सहायता करती है.
ग्रीनसिल की सरकारी मंत्रालयों में पैठ और अधिकारियों से संबंधों की परतें धीरे धीरे खुल रही हैं. सांठगांठ का यह संकट इस मंगलवार से और गहराता नजर आया जब यह बात सामने आई कि वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी बिल क्रॉदर्स ने अपना पद छोड़ने से पहले ही ग्रीनसिल कैपिटल के सलाहकार के तौर पर काम करना शुरु कर दिया. चौंकाने वाली बात यह भी है कि उन्हें यह भूमिका निभाने के लिए आधिकारिक सहमति मिली हुई थी.
लॉबिंग के मायने और सवाल
ब्रिटेन में लॉबिंग राजनैतिक प्रक्रिया का मान्य हिस्सा है और सांसदों की लामबंदी आम बात है. लॉबिंग का मतलब है किसी नीति या जनहित के मसले पर सरकारी रुख को प्रभावित करने के लिए लामबंदी. इसके लिए लिखित सामग्री, ईमेल या सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि इसके लिए कायदे-कानून तय हैं ताकि सांसदों में भ्रष्ट आचरण और सरकारी महकमों में पहुंच का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए ना किया जाए. ब्रिटिश संसद की वेबसाइट के मुताबिक कोई भी व्यक्ति अपने सांसदों और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्यों को लामबंद कर सकता है. लॉबिंग करने वालों में व्यवसाय, चैरिटी, दबाव गुट, ट्रेड यूनियन और औद्योगिक प्रतिनिधि शामिल हैं.
वर्तमान नियमों के मुताबिक ब्रिटेन में मंत्री और अहम प्रशासनिक अधिकारी पद छोड़ने के बाद दो साल तक लॉबिंग की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हो सकते. औपचारिक रूप से लॉबिंग करने वाले व्यक्तियों का नाम एक रजिस्टर में दर्ज किया जाता है. डेविड कैमरन ने 2016 में प्रधानमंत्री पद से विदा ली और ग्रीनसिल के साथ 2018 में जुड़े. वे एक स्वतंत्र लॉबिस्ट या किसी लॉबिंग कंपनी के लिए काम नहीं कर रहे थे, बल्कि ग्रीनसिल का हिस्सा थे. इसलिए रजिस्टर में नाम दर्ज करने की बात भी उन पर लागू नहीं हुई.
ग्रीनसिल कैपिटल मामले में लॉबिंग से जुड़े कई अनसुलझे सवाल तो हैं लेकिन मामला कहीं अधिक पेचीदा है. उदाहरण के तौर पर लेक्स ग्रीनसिल डेविड कैमरन की सरकार में इतने भीतर तक पहुंच बनाने में कामयाब कैसे होते चले गए. एक सवाल यह भी है कि सरकार को एनएचएस से जुड़े भुगतान के लिए सप्लाई चेन फिनैंस सेवा लेने की जरूरत क्यों पड़ गई. ऋषि सुनक के संदेश और भूमिका पर सवालिया निशान हैं, तो एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी का अपने पद पर रहते हुए एक निजी कंपनी में काम करना, आला सरकारी अधिकारियों और निजी हितों के बीच गहरी सांठ-गांठ की चिंताजनक स्थिति की ओर इशारा करता है.
उम्मीद जताई गई है कि नाइजल बोर्डमैन ग्रीनसिल मामले में हुए वित्तीय फैसलों और लॉबिंग की प्रक्रिया पर अपनी रिपोर्ट जून के अंत तक देंगे. हालांकि लॉबिंग सरकारी महकमों और पूंजीवादी फायदों के उलझे तारों को यह रिपोर्ट सुलझा देगी, ऐसी उम्मीद बेमानी है.(dw.com)


