अंतरराष्ट्रीय
बीते दिनों इमरान ख़ान ने अपनी सरकार के खिलाफ़ अमेरिका पर साज़िश करने का आरोप लगाया था, इमरान खान के इस आरोप का जवाब अब अमेरिका ने दिया है.
अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा है कि 'अमेरिका पाकिस्तान के संवैधानिक और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का समर्थन करता है.'
नेड प्राइस ने सोमवार को प्रेस ब्रीफ़िंग में कहा, ‘’जैसा कि हमने पिछले सप्ताह कहा था, हम पाकिस्तान में संवैधानिक और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक सिद्धांतों का समर्थन करते हैं."
‘’हम एक राजनीतिक दल के विरोध में दूसरे राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करते. हम क़ानून के तहत समान न्याय के व्यापक सिद्धांतों, कानून के शासन के सिद्धांतों का समर्थन करते हैं.‘’
प्राइस ने इस बात पर ज़ोर देते हुए कहा कि पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में अमेरिका की ओर से हस्तक्षेप किए जाने और इमरान ख़ान सरकार को अस्थिर करने की कोशिशों के आरोप निराधार और झूठे हैं.
प्राइस ने कहा, " इस आरोप में कोई सच्चाई नहीं है."
दरअसल, इमरान ख़ान ने कहा था कि विपक्ष के साथ मिलकर अमेरिका ने उनके ख़िलाफ़ साज़िश रची है.
तीन अप्रैल को संसद भंग करने के ठीक एक दिन पहले इमरान खान ने हाथ में पकड़े एक काग़ज़ को लहराते हुए कहा था, "ये जो मैं आपको कह रहा हूं कि ये ऑफिशियल डॉक्यूमेंट है जिसमें कहा गया है कि विपक्ष अगर इमरान ख़ान को हटाएगा तो अमेरिका से ताल्लुक़ात अच्छे होंगे. जैसे ही आप (विपक्ष) इमरान खान को हटाएंगे हम (अमेरिका) आपको माफ़ कर देंगे."
इस दौरान उन्होंने शहबाज शरीफ़ पर निशाना साधते हुए कहा था कि उनकी (शहबाज शरीफ़) मिलीभगत इस साज़िश में है और शहबाज़ अमेरिका की 'ग़ुलामी' के लिए तैयार हैं.
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने रूस पर बूचा शहर में 300 आम नागरिकों की हत्या और प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है.
रूसियों के कब्ज़े में रहे बूचा शहर में कथित रूसी युद्ध अपराधों के सबूत मिले हैं.
हालांकि बीबीसी स्वतंत्र रूप से इन दावों की जांच नहीं कर पाया है.
ज़ेलेंस्की ने कहा, "कुछ भी रूस ने किया है हम उसकी जांच कर रहे हैं."
"वर्तमान में, केवल बूचा में तीन सौ से अधिक लोगों के मारे जाने और प्रताड़ित किए जाने की जानकारी सामने आई है. संभावित है कि जब पूरे शहर की जाँच पूरी हो जाएगी तो ये संख्या काफ़ी बड़ी हो सकती है और ये हालत केवल एक शहर के हैं."
उन्होंने कहा, ‘’पहले से ही जानकारी है कि बोरोडियांका और कुछ अन्य शहर जो रूसी सेना का कब्ज़े में थे वहां भी पीड़ितों की संख्या और अधिक हो सकती है.‘’
"कीएव, चेरयनीव और सूमी क्षेत्रों के ज़िले के कई गांवों जहां रूसियों का कब्ज़ा था वहां उन्होंने स्थानीय लोगों के साथ ऐसा बर्ताव किया है जो आज से 80 साल पहले नाज़ियों के कब्ज़े के दौरान भी नहीं देखा था."
वहीं दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर बूचा में नागरिकों की हत्या के मामले में आपराधिक मुकदमा चलाने को कहा है.
बाइडन ने कहा कि ‘’ये शख़्स क्रूर है.’’ साथ ही उन्होंने कहा कि अमेरिका रूस पर और भी प्रतिबंध लगाएगा. (bbc.com)
-उमरदराज़ नांगियाना
पाकिस्तान का सुप्रीम कोर्ट विपक्ष की याचिका पर अब मंगलावर को सुनवाई करेगा. विपक्ष ने प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को सत्ता से बाहर करने की कोशिश नाकाम किए जाने की कोशिश को कोर्ट में चुनौती दी है.
इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को इस मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए नोटिस जारी किया था.
पाकिस्तान के चीफ जस्टिस उमर अता बांदियाल ने सोमवार को कहा, "कोर्ट इस मामले में आज (सोमवार को) कोई वाजिब आदेश जारी नहीं करेगा."
इससे पहले विपक्षी पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने एक याचिका दायर कर कहा था कि मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के सभी 16 जजों की बेंच बनाई जानी चाहिए. लेकिन कोर्ट ने ये मांग खारिज कर दी.
कोर्ट ने कहा '' विपक्ष को अगर हम पर भरोसा नहीं है तो हमारे यहाँ मौजूद रहने का कोई मतलब नहीं.''
इस बीच, इमरान ख़ान ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री के लिए पाकिस्तान के पूर्व चीफ़ जस्टिस गुलज़ार अहमद का नाम राष्ट्रपति के पास भेजा है. रेडियो पाकिस्तान के मुताबिक राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी ने प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और नेशनल असेंबली में विपक्ष के नेता रहे शाहबाज़ शरीफ़ से कार्यवाहक प्रधानमंत्री के लिए ऐसा नाम मांगा है, जिस पर सहमति हो.
इस बीच इमरान ख़ान ने देश के लोगों से अपील की है कि वो मौजूदा राजनीतिक गतिरोध का विरोध करें. दूसरी तरफ विपक्ष ने भी इमरान ख़ान और उनके समर्थकों पर हमला बोला है.
इस बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने बयान जारी करके कहा है कि नई सरकार के गठन के बाद नए कार्यक्रमों को लेकर पाकिस्तान से बातचीत की जाएगी. फिलहाल जो कार्यक्रम चल रहे हैं, उन्हें नहीं रोका जाएगा. आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे पाकिस्तान को अभी तक आईएमएफ़ से तीन अरब डॉलर की मदद मिली है.
अब हर किसी की नज़र सुप्रीम कोर्ट पर है.
'गंभीर देशद्रोह' का आरोप
पाकिस्तान में रविवार को नेशनल असेंबली के डिप्टी स्पीकर क़ासिम सूरी ने प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव को असंवैधानिक बताकर ख़ारिज कर दिया. विपक्ष ने इसे लेकर संविधान के उल्लंघन का आरोप लगाया और उनके ख़िलाफ़ संविधान की धारा 6 के तहत कार्रवाई की मांग की.
क़ासिम सूरी ने अविश्वास प्रस्ताव को ख़ारिज करते हुए कहा, "अविश्वास प्रस्ताव संविधान और राष्ट्रीय संप्रभुता और स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ है. मैं ये प्रस्ताव रद्द करने की रूलिंग देता हूँ. सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी जाती है."
इसके बाद इमरान ख़ान ने देश को बधाई दी और कहा, ''राष्ट्रपति को एडवाइस जाने के बाद विधानसभा भंग हो जाएगी और फिर आगे जो भी प्रक्रिया है, अगले चुनाव या अंतरिम सरकार की अब शुरू हो जाएगी.''
उन्होंने कहा कि विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव वास्तव में बाहरी हस्तक्षेप के जरिए सरकार को गिराने की साज़िश थी, जिसे नाकाम कर दिया गया है.
हालांकि, विपक्ष के नेता शाहबाज़ शरीफ़ ने स्पीकर क़ासिम सूरी और प्रधानमंत्री इमरान ख़ान पर "गंभीर देशद्रोह" का आरोप लगाते हुए कहा, कि दोनों पर पाकिस्तान के संविधान के "अनुच्छेद छह" लगेगा. ये अनुच्छेद देशद्रोह के बारे में है.
बीबीसी ने यह पता लगाने की कोशिश की है, कि पाकिस्तान के संविधान की नज़र में देशद्रोह क्या है और देशद्रोही कौन होता है. देशद्रोह कौन तय करता है और देशद्रोही के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का अधिकार संविधान किसे देता है?फिर यह प्रक्रिया कैसे होती है? पाकिस्तान में इसके उदाहरण मौजूद हैं.
देशद्रोही कौन है?
पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 6 में कहा गया है कि "हर वो व्यक्ति देशद्रोही है, जो ताक़त के इस्तेमाल या किसी भी असंवैधानिक तरीक़े से पाकिस्तान के संविधान को निरस्त करता है, भंग करता है, निलंबित करता है या अस्थायी रूप से भी निलंबित करता है या ऐसा करने की कोशिश भी करता है, या ऐसा करने की साजिश में शामिल होता है."
यह संवैधानिक परिभाषा का वह रूप है जो संविधान में 18वें संशोधन के बाद सामने आया.
क़ानून विशेषज्ञ एसएम ज़फ़र के अनुसार, "देशद्रोह" शब्द का इस्तेमाल पहली बार 1973 के संविधान में किया गया था. हालांकि, उस समय देशद्रोह की धारणा में अठारहवें संशोधन के बाद बदलाव आया.
इसमें जो जोड़ा गया वह इस प्रकार था कि "संविधान को निलंबित या अस्थायी रूप से भी निलंबित करने वाला व्यक्ति या ऐसे व्यक्ति का समर्थन करने वाला व्यक्ति देशद्रोही होगा."
क्या नहीं हैदेशद्रोह?
एसएम ज़फ़र ने बीबीसी से कहा, "राष्ट्रीय हित के ख़िलाफ़ काम करने वाला व्यक्ति" संविधान के अनुसार देशद्रोह की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आता है. वह "राष्ट्रीय सुरक्षा" की श्रेणी में आता है जिसमें कई उप प्रावधान हो सकते हैं.
इनमें "सेना में बग़ावत भड़काना, क़ानून-व्यवस्था के हालात पैदा करना और दुश्मन देश के साथ मिलकर साज़िश करना" शामिल है.
"इस पर संविधान का अनुच्छेद 6 तब तक नहीं लग सकता, जब तक कि ये सब बातें संविधान को निरस्त करने के स्तर तक न पहुंच जाएं.
क़ानून के जानकार बाबर सत्तार इससे सहमत हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा कि देशद्रोह की संवैधानिक अवधारणा संविधान को निलंबित करने से जुडी हुई है. यानी अगर संविधान को निलंबित या निरस्त किया जाये.
इसका इतिहास भी यही है, इसलिए संविधान में देशद्रोह की अवधारणा को 1973 में शामिल किया गया था, क्योंकि इससे पहले सैन्य सरकारें आती रही थीं.
इसमें यह प्रावधान भी शामिल किया गया था कि कोई भी अदालत देशद्रोह के कृत्य की पुष्टि नहीं करेगी.
"देशद्रोह की इस संवैधानिक अवधारणा को बहुत ही सावधानीपूर्वक तैयार की गई है, इसलिए हम अक्सर ये सोचते हैं कि अगर कोई किसी संस्था के ख़िलाफ़ कुछ बोल देता है, तो वह देशद्रोह की श्रेणी में आ जाएगा. मुझे नहीं लगता कि यह सच है. '
देशद्रोही कौन घोषित करेगा?
दोनों विशेषज्ञ मानते हैं कि देशद्रोह का निर्धारण करना और उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करना सिर्फ़ और सिर्फ़ संघीय सरकार का अधिकार है. इस बात की जांच के बाद संघीय सरकार शिकायत दर्ज करती है.
इसे स्पष्ट करते हुए एसएम ज़फ़र ने कहा कि देशद्रोह की कार्रवाई गृह मंत्री द्वारा शुरू की जा सकती है, लेकिन इसका अंतिम फ़ैसला प्रधानमंत्री और उनकी संघीय कैबिनेट करती है.
देशद्रोह के मुक़दमे की कार्यवाही को स्पष्ट करते हुए बाबर सत्तार ने कहा कि साल 1973 के संविधान में देशद्रोह की अवधारणा को शामिल करने के बाद, एक क़ानून बनाया गया था, जिसमें कहा गया था, कि संघीय सरकार यह तय करेगी कि किसी व्यक्ति ने देशद्रोह किया है या नहीं.
इसके बाद मामले की सुनवाई के लिए एक विशेष अदालत का गठन किया जाएगा.
वो याद दिलाते हैं, ''जैसा कि हमने पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ मुक़दमे में देखा.''
देशद्रोही कैसे साबित होगा?
बाबर सत्तार का कहना है कि यह एक फ़ौजदारी का मुक़दमा होता है जिसमें मौत या उम्र क़ैद की सज़ा हो सकती है.
उनके मुताबिक, ''सबूत की ज़िम्मेदारी भी आरोप लगाने वाले, यानी सरकार पर होगी.''
एसएम ज़फ़र का कहना है कि देशद्रोह की संवैधानिक अवधारणा के मामले में सबूत सामने होते हैं.
अगर आने वाली सरकार ने जाने वाली सरकार का तख्ता संवैधानिक तरीक़े से नहीं पलटा है, तो इसका मतलब है कि संविधान निरस्त किया गया है. दूसरा यह कि जब वो सरकार में आकर कहे कि 'हमने संविधान को निरस्त कर दिया है तो यह दूसरी गवाही होती है.' (bbc.com)
-रजनी वैद्यनाथन
श्रीलंका में बेतहाशा बढ़ती मंहगाई और खराब आर्थिक हालात के कारण हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बाद केंद्रीय मंत्रिमडंल और केंद्रीय बैंक के गवर्नर ने इस्तीफ़ा दे दिया है.
राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे ने सभी दलों को नई सरकार में शामिल होने का न्योता दिया है.
लेकिन देश में गहराते आर्थिक संकट से परेशान होकर सड़कों पर उतरे लोगों का कहना है कि राष्ट्रपति राजपक्षे के इस्तीफ़ा देने तक उनका अभियान नहीं रुकेगा.
श्रीलंका में सड़कों पर उतरे लोगों के गुस्से और विरोध प्रदर्शनों के बीच बैनर और नारों में सिर्फ़ एक ही शख़्स का नाम सुनाई पड़ता है.
लोग कहते हैं, ''जाओ गोटा जाओ, जाओ गोटा जाओ.''
गोटा से यहां मतलब राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे से है. देश में कई लोग उन्हें मौजूदा हालात के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
देश में कर्फ़्यू के बाद भी अपने पति और दो बेटियों के साथ विरोध प्रदर्शन में पहुंची नाधी वांदुरगला कहती हैं, ''उन्हें चले जाना चाहिए, उन्होंने हमसे सबकुछ छीन लिया.''
उनके हाथ में एक पोस्टर था जिसमें ये जानकारी दी गई थी कि कैसे उनका परिवार एक अच्छी ज़िंदगी जी रहा था जो अब हर दिन दिक्कतें झेल रहा है. हर दिन 17 घंटे तक बिजली कटौती होती है, खाना पकाने के लिए गैस नहीं है और पेट्रोल के लिए लंबी लाइनें लगी रहती हैं.
उन्होंने बताया, ''अस्पतालों में दवाई नहीं है, स्कूल में परीक्षाओं के लिए कागज नहीं लेकिन राजनेताओं को हर दिन बिजली मिल रही है. उन्हें कभी गैस या तेल के लिए लाइन में नहीं लगना पड़ता.''
नाधी सत्ता में बैठे लोगों से बहुत ज़्यादा नाराज़ दिखीं.
वह कोई एक्टिविस्ट या ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे विरोध प्रदर्शन का अनुभव हो. वह शहर में काम करती हैं और राजनीति से दूर रहना ही पसंद करती हैं. लेकिन, मौजूदा सरकार के ख़िलाफ़ बने माहौल से सहमति रखते हुए वो इन विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा बनीं है.
राजपक्षे की नीतियों पर सवाल
श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम हो गया है जिसके कारण ये देश ईंधन भी नहीं खरीद पा रहा है. कोरोना महामारी के कारण देश का पर्यटन भी प्रभावित हुआ है. लेकिन, लोगों का ये भी मानना है कि गोटाभाया राजपक्षे इस संकट को ठीक से नहीं संभाल पाए.
विशेषज्ञों का कहना है कि 2019 में उनके चुने जाने के बाद से राजपक्षे की नीतियों मसलन करों में बड़ी कटौती और आयात पर प्रतिबंध जैसे फ़ैसलों ने इस संकट को और बढ़ा दिया है. विशेषज्ञों के मुताबिक उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मदद लेने में भी लापरवाही दिखाई.
वहीं, राष्ट्रपति राजपक्षे मौजूदा स्थितियों के लिए पिछली सरकारों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. लेकिन, नाधी की बेटी अंजाली का कहना है कि राजपक्षे को तुरंत इस्तीफ़ा देकर पूरी ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए.
लोगों में बढ़ते गुस्से के साथ डर भी दिखता है. ये माना जा रहा है कि राजपक्षे सरकार अपने ख़िलाफ़ उठती आवाजों को दबाने की कोशिश में जुट गई है.
रविवार को लगाया गया कर्फ़्यू लोगों को इकट्ठा होने से रोकने का एक तरीक़ा था. सोशल मीडिया ब्लैकआउट भी किया गया. वहीं, राष्ट्रपति के आदेश के तहत लोगों के बिना प्रशासन की अनुमति के सड़कों पर, पार्क, ट्रेन और समुद्र किनारे आने पर रोक लगा दी गई.
नाधी और अंजाली उन सैकड़ों लोगों में शामिल हैं जिन्होंने विरोध प्रदर्शन के लिए गिरफ़्तारी का ख़तरा उठाया.
अंजाली कहती हैं, ''मैं आज इसलिए आई हूं क्योंकि मेरे अधिकार छीने जा रहे हैं. हमारे पास अभी खोने के लिए कुछ नहीं है. उन्होंने कर्फ़्यू क्यों लगाया है? क्या ये हमारी सुरक्षा के लिए है? इसका कोई मतलब नहीं है.''
विरोध की आवाज़ दबाने का आरोप
रविवार को हुए विरोध प्रदर्शनों में शामिल विपक्ष के नता साजिथ प्रेमदासा ने कहा, ''मैं इन्हें तानाशाह, निरंकुश और कठोर कदम कहूंगा.''
प्रेमदासा और उनकी पार्टी के अन्य सदस्यों ने जब राजधानी कोलंबो के इंडिपेंडेंस स्क्वायर पर जाने की कोशिश की तो पुलिस बैरिकेड्स के पास उन्हें रोक दिया गया.
अपने बड़े भाई और प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के साथ सरकार चला रहे राष्ट्रपति राजपक्षे पर पहले भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन करने के आरोप लग चुके हैं.
महिंदा राजपक्षे दो बार श्रीलंका के राष्ट्रपति रह चुके हैं. वहीं, गोटाभाया राजपक्षे के विदेश मंत्री रहते उन पर श्रीलंका के गृह युद्ध के अंतिम चरण में मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप लगाए गए थे.
दोनों की छवि ऐसे नेताओं की है जो अपने ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ों को सख्ती के साथ दबाते हैं.
साल 2019 में श्रीलंका में ईस्टर के दिन चर्च में हुए बम विस्फोट के महीनों बाद राजपक्षे ने चुनाव में जीत हासिल की थी. उन्होंने लोगों को एक मजबूत शासन देने का वादा किया था.
राजपक्षे को वोट नहीं देने वालीं रोशिंता का कहना है, ''लोगों को लगा कि वो उन्हें सुरक्षा देंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वो हर चीज़ में नाकाम हुए हैं. मैं इस परिवार के कारण अपना देश बर्बाद होते नहीं देखना चाहती. वे सत्ता के इतने लालची हैं कि शायद अब भी कुर्सी पर बने रहेंगे.''
देशभर में हो रहे विरोध प्रदर्शन की आंच गुरुवार को राष्ट्रपति राजपक्षे के आवास तक पहुंच गई. राजधानी कोलंबो में उनके घर के बाहर हो रहा प्रदर्शन हिंसक हो उठा था.
पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोलों और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया. पुलिस ने दर्जनों प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों को गिरफ़्तार भी किया.
कोलंबो में यूरोपीय संघ के प्रतिनिधिमंडल ने ट्वीट करके श्रीलंका प्रशासन से ''लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने'' की मांग की. इसमें असहमति जताने और शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार भी शामिल है.
मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों का उत्पीड़न किया गया है.
गुरुवार के विरोध प्रदर्शनों के बाद देश में आपातकाल लगा दिया गया जिसने सुरक्षा बलों को गिरफ़्तारी और हिरासत की व्यापक शक्तियां दे दीं. प्रशासन ने कहा कि वो सुनिश्चित करेगा क़ानून व्यवस्था बनी रहे.
श्रीलंका के पश्चिमी प्रांत के अधिकारियों के मुताबिक शनिवार रात से रविवार के बीच उन्होंने कर्फ़्यू के उल्लंघन के लिए 600 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया है.
29 साल के विज्ञापनों की कॉपी लिखने वाले सथसारा कहते हैं, ''ज़िंदगी में पहली बार मैं विरोध प्रदर्शन में शामिल हुआ हूं. इस सबके साथ हम अपने सपने कैसे पूरे करेंगे.''
सथसारा कहते हैं, "रोजाना बिजली चली जाती है और बढ़ती महंगाई के कारण बैंक बैलेंस कम होता जा रहा है. हमें ऐसी सरकार दो जो ये सब संभाल सके. अभी की सरकार को हमारी कोई चिंता नहीं है."
सुचित्रा अपने 15 महीने के बच्चे के साथ विरोध प्रदर्शन में आए थे. उन्होंने कहा कि वो बिजली के बार-बार जाने से परेशान हो गए हैं. उनका बच्चा सो भी नहीं पाता है.
उन्होंने कहा, ''हमारे नेता सही नहीं हैं. उन्होंने देश को बुरे हाल में पहुंचा दिया है. उन्होंने अपने वादे पूरे नहीं किए. लोग अब और सहन नहीं कर सकते.'' (bbc.com)
पाकिस्तान में रविवार को जबर्दस्त सियासी सरगर्मी रही, न सिर्फ राजधानी इस्लामाबाद में राजनीतिक गतिविधियां हुई, बल्कि सूबा-ए-पंजाब में भी राजनीतिक ड्रामा देखने को मिला. पंजाब प्रांत की विधानसभा में रविवार को महिला विधायक एक दूसरे से भिड़ गईं. इसका वीडियो सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर शेयर हो रहा है. डॉन न्यूज द्वारा शेयर इस वीडियो में महिलाएं एक दूसरे से भिड़ती नजर आ रही हैं.
बता दें कि पंजाब पाकिस्तान का सबसे अहम राज्य है. रविवार को इस्लामाबाद में पाकिस्तान की संसद की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही इमरान खान ने पंजाब के गवर्नर चौधरी सरवर को बर्खास्त कर दिया था. इससे पहले वहां के सीएम उस्मान बुजदार ने इस्तीफा दे दिया था.
रविवार को पंजाब विधानसभा का सत्र सदन के नए नेता और मुख्यमंत्री का चुनाव करने के लिए बुलाया गया. लेकिन नेशनल असेंबली की तरह पंजाब विधानसभा में भी बिना वोटिंग के छह अप्रैल तक कार्यवाही स्थगित कर दी गई. सत्र के स्थगित होने के बाद सरकार और विपक्ष के विधायक एक-दूसरे से भिड़ गए जिसमें महिला विधायक भी शामिल थीं.
इस वीडियो में सत्ता पक्ष और विपक्ष की महिला विधायक आमने-सामने हैं और एक दूसरे को धकेलते और मुक्कों से मारती नजर आ रही हैं. सदन में हंगामा होता दिख रहा है और विधायक एक दूसरे पर चिल्ला रहे है.
डॉन न्यूज के अनुसार पीएमएल-क्यू के पीटीआई समर्थित चौधरी परवेज इलाही और पीएमएल-एन के हमजा शहबाज के साथ राज्य की विधानसभा को सदन के नए नेता का चुनाव करना था. इसी दौरान ये हंगामा हुआ.
बता दें कि पाकिस्तान में पूरा विपक्ष इमरान खान के खिलाफ एकजुट हो गया है. रविवार को पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में इमरान सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग होनी थी, लेकिन स्पीकर ने इस प्रस्ताव को ही खारिज कर दिया. जिसके बाद विपक्ष ने संसद में काफी हंगामा किया और अपना ही स्पीकर चुन लिया. दूसरी तरफ, इमरान खान की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने पाकिस्तान की संसद को भंग कर दिया. फिलहाल, पाकिस्तान की सरकार भंग हो गई है और इमरान खान बतौर केयरटेकर पीएम कमान संभाले हुए हैं. दूसरी तरफ मामला वहां की सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है.
कहते हैं कि अगर पड़ोस में सब ठीक चल रहा हो तो अपने घर में भी शांति बनी रहती है और अगर पड़ोस में अशांति और अनिश्चितता का माहौल हो तो घर में में चिंताएं बढ़ जाती हैं.
तो क्या पाकिस्तान में जारी सियासी संकट और श्रीलंका में चल रहे भीषण आर्थिक संकट से भारत को चिंता होनी चाहिए?
विशेषज्ञ कहते हैं कि श्रीलंका और पाकिस्तान में जारी संकट का भारत पर असर पड़ना लाज़िमी है.
श्रीलंका का संकट और भारत
ऐसा देखा गया है कि श्रीलंका में जब भी कोई संकट पैदा होता है या हिंसा होती है तो वहां की तमिल आबादी का तमिलनाडु में पलायन होता है.
श्रीलंका में दशकों तक जारी रहे गृहयुद्ध के दौरान हमने देखा है कि श्रीलंका के लाखों तमिल भाषी लोगों ने भारत आकर पनाह ली.
श्रीलंका में भारी बेरोज़गारी और आर्थिक संकट गहराने के बाद से वहां के तमिल नागरिक एक बार फिर भारत की ओर पलायन कर रहे हैं.
तमिलनाडु के लिए चिंता की वजह
ये तमिलनाडु के लिए एक चिंता का विषय है. 22 मार्च को रामेश्वरम तट पर दो जत्थों में आए 16 श्रीलंकाई तमिल इसका एक उदाहरण हैं.
भारत सरकार ने हाल में आने वाले श्रीलंकाई तमिलों की संख्या पर अब तक आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा है.
लेकिन सरकारी सूत्रों का अनुमान है कि श्रीलंका के हालात को देखते हुए भारत आने वाले शरणार्थियों की संख्या बढ़ेगी.
श्रीलंका के पास विदेशी मुद्रा की भारी कमी है. उसे 51 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज़ को चुकाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है.
कमरतोड़ महंगाई और बिजली कटौती के साथ-साथ श्रीलंका भोजन, ईंधन और अन्य ज़रूरी चीज़ों की भारी कमी का सामना कर रहा है.
लोगों में अशांति और बड़े पैमाने पर विरोध को देखते हुए श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने शुक्रवार को देश में आपातकाल लागू करने का एलान कर दिया था.
भारत की ओर से मदद का वादा
भारत ने श्रीलंका आर्थिक और ऊर्जा संकट से निपटने और ईंधन, भोजन और दवाओं की खरीद के लिए 1.5 अरब डॉलर से अधिक की वित्तीय सहायता दी है.
पिछले हफ़्ते अपनी तीन दिनों की श्रीलंका यात्रा के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने श्रीलंका की सरकार को भारत की सहायता जारी रखने का वादा किया.
उन्होंने एक ट्वीट में भारत के निरंतर सहयोग का आश्वासन दिया.
जयशंकर ने अपनी यात्रा के दौरान श्रीलंका के वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे के साथ भी बातचीत की थी. बासिल राजपक्षे आर्थिक संकट से निपटने के उपायों पर भारतीय पक्ष के साथ कोऑर्डिनेट कर रहे थे.
लेकिन चार अप्रैल को ख़बर आई कि राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने अपने भाई और वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे को बर्ख़ास्त कर दिया है.
श्रीलंका से आई कई रिपोर्टों में कहा गया है कि श्रीलंका ने एक अरब डॉलर के एक और क्रेडिट की मांग की है.
श्रीलंका की ताज़ा स्थिति
राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने वित्त मंत्री के पद पर अली साबरी को नियुक्त किया है. रविवार रात तक अली साबरी के पास देश के न्याय मंत्रालय की ज़िम्मेदारी थी.
पद से हटाए जाने से पहले बासिल राजपक्षे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से राहत पैकेज हासिल करने के लिए अमेरिका के दौरे पर जाने वाले थे.
देश के सत्तारूढ़ गठबंधन श्रीलंका पोदुजना पेरामुना (एसएलपीपी) गठबंधन में बासिल की भूमिका को लेकर नाराज़गी का भाव था.
पिछले महीने बासिल की सार्वजनिक तौर पर आलोचना करने की वजह से महिंदा राजपक्षे की कैबिनेट के कम से कम दो मंत्रियों को पद से बर्ख़ास्त कर दिया गया था.
रविवार की रात महिंदा राजपक्षे कैबिनेट के सभी 26 मंत्रियों ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.
इस बीच श्रीलंका के केंद्रीय बैंक के गवर्नर अजित निवार्ड ने भी अपने इस्तीफ़े की घोषणा कर दी है. आईएमएफ़ से राहत पैकेज हासिल करने के मुद्दे पर अजित निवार्ड को अपने अड़ियल रवैये के कारण कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था.
भारत-श्रीलंका व्यापार
भारत ने श्रीलंका में बिजली कटौती में संकट को कम करने के लिए 40,000 मीट्रिक टन डीज़ल की लगभग चार खेप भी भेजी है. इसके अलावा भारत जल्द ही 40,000 टन चावल की शिपमेंट भी भेज रहा है.
भारत अपने वैश्विक व्यापार के लिए कोलंबो बंदरगाह पर भी निर्भर है क्योंकि भारत के ट्रांस-शिपमेंट का 60 प्रतिशत इसी बंदरगाह द्वारा नियंत्रित किया जाता है.
भारत श्रीलंका के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदारों में से एक है. श्रीलंका से बड़ी संख्या में सैलानी भारत भी आते हैं.
भारत का श्रीलंका को सालाना लगभग 5 अरब डॉलर का निर्यात करता है, जो उसके कुल निर्यात का 1.3 फ़ीसदी है.
भारत ने देश में पर्यटन, रियल एस्टेट, विनिर्माण, संचार, पेट्रोलियम ख़ुदरा आदि के क्षेत्रों में भी निवेश किया है.
भारत श्रीलंका में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के सबसे बड़े स्रोतों में से एक है. देश की कुछ बड़ी कंपनियों ने श्रीलंका में निवेश भी कर रखा है.
हाल के वर्षों में श्रीलंका और चीन के बीच सहयोग बढ़ा है और चीन ने श्रीलंका में काफी बड़े प्रोजेक्ट्स में निवेश किया है. लेकिन श्रीलंका में ताज़ा संकट में चीन की मदद नज़र नहीं आ रही है
पाकिस्तान का संकट और भारत पर इसका असर
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के ज़ोरदार आलोचक रहे हैं.
लेकिन ये भी सच है कि वास्तविक सीमा पर तनाव 2021 के बाद से अपने सबसे निचले स्तर पर है.
भारतीय राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना इस्लामाबाद में एक नई सरकार पर कश्मीर में सफल संघर्ष विराम के निर्माण के लिए दबाव डाल सकती है.
पाकिस्तान इस समय राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है. पीएम इमरान ख़ान ने संसद भंग करने के बाद नए सिरे से चुनाव कराने की मांग की है. विपक्ष ने इस क़दम को देशद्रोह बताया है.
पीएम इमरान ख़ान का दावा है कि उन्हें हटाने के लिए विपक्ष ने अमेरिका के साथ मिलकर साज़िश रची है.
इमरान ख़ान ने रूस के यूक्रेन पर हमले की निंदा नहीं की जबकि पाकिस्तानी सेना चाहती कि वो यूक्रेन युद्ध में अमेरिका का पक्ष लें.
विशेषज्ञों के अनुसार, इससे न केवल पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों पर असर हुआ है बल्कि पाकिस्तान कूटनीतिक रूप से पश्चिमी देशों से भी अलग-थलग होता नज़र आ रहा है.
बीबीसी हिंदी के ट्विटर स्पेसेज़ प्रोग्राम में विश्लेषक स्वस्ति राव ने कहा कि पाकिस्तान को कूटनीतिक तौर पर दुनिया से अलग-थलग करने के लिए भारत को कुछ मेहनत नहीं करनी पड़ी, ये काम ख़ुद पाकिस्तान ने अपने लिए कर लिया है. (bbc.com)
श्रीलंका में भयंकर आर्थिक संकट के कारण हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद देश के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस्तीफ़ा दे दिया है. वहीं राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने विपक्षी दलों को भी मंत्रिमंडल में शामिल होने का प्रस्ताव दिया है. इसके साथ ही सोमवार को 4 मंत्रियों को पद की शपथ दिलाई गई है.
रविवार की रात मंत्रिमंडल के सभी 26 मंत्रियों ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. हालांकि, प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे और उनके भाई और राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने इस्तीफ़ा नहीं दिया है.
गौरतलब है कि इस नए मंत्रिमंडल में राष्ट्रपति ने अपने भाई और पिछली कैबिनेट में वित्त मंत्री रहे बासिल गोटाबाया को जगह नहीं दी है.
श्रीलंका के राष्ट्रपति कार्यालाय ने बयान जारी कर कहा है कि सोमवार को राष्ट्रपति ने संसद में प्रतिनिधित्व करने वाले सभी राजनीतिक दलों को मंत्री पद का प्रस्ताव दिया है ताकि देश की आर्थिक समस्या से निकलने में साथ मिलकर रास्ता ढूंढा जा सके.
बयान में कहा गया है, "राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने सभी राजनीतिक दलों को प्रस्ताव दिया है कि सब साथ आकर जारी राष्ट्रीय संकट का हल निकलने में मदद करें."
"राष्ट्र की ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए सभी नागरिकों और भविष्य की पीढ़ी के लिए साथ काम करने का वक़्त है."
इसके साथ ही चार नए मंत्रियों को शपथ दिलाई गई है. इनमें बासिल राजपक्षे की जगह अली साबरी को वित्त मंत्री बनाया गया है. वहीं जीएल पेइरिस को विदेश मंत्री, दिनेश गुनावर्दने को शिक्षा मंत्री, जॉन्सटन फ़र्नांडो को हाइवे मंत्री बनाया गया है.
इससे पहले श्रीलंका के सेंट्रल बैंक के गवर्नर अजित निवार्द कबराल ने राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को अपना इस्तीफा सौंप दिया है.
उन्होंने ट्वीट कर बताया, ''देश के सभी कैबिनेट मंत्रियों के इस्तीफ़े को देखते हुए मैंने भी बतौर गवर्नर अपना इस्तीफ़ा राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को दे दिया है.''
वहीं कई प्रदर्शनकारी राजपक्षे परिवार के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं और इस क़दम को अर्थहीन बता रहे हैं. रविवार को कई प्रदर्शनकारियों ने कर्फ़्यू को तोड़ा और कई शहरों में सड़कों पर उतरे.
साल 1948 में ब्रिटेन से आज़ादी मिलने के बाद यह देश गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है.
इस संकट के लिए विदेशी मुद्रा की कमी को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है जो तेल आयात के लिए इस्तेमाल होती है. अब देश में लगभग आधे दिन तक बिजली गुल रहती है, खाने, दवाएं और तेल की कमी है और लोगों का ग़ुस्सा चरम पर है.
इस्तीफ़े का कारण अभी तक नहीं पता
शिक्षा मंत्री और सदन के नेता दिनेश गुनावर्दने ने रविवार को पत्रकारों से कहा कि कैबिनेट मंत्रियों ने प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को इस्तीफ़ा दे दिया. उन्होंने इस सामूहिक इस्तीफ़े के कारण के बारे में कुछ नहीं बताया है.
उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे अपने छोटे भाई राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे से सोमवार को मुलाक़ात करेंगे.
गुनावर्दने ने कहा, "हमने देश की विस्तार से चर्चा की. देश में चल रहे तेल और ऊर्जा संकट का हल होगा."
प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के बेटे नमल राजपक्षे भी इस्तीफ़ा देने वाले मंत्रियों में शामिल हैं. उन्होंने ट्वीट किया है कि उन्हें उम्मीद है कि यह 'जनता और सरकार के लिए स्थायित्व' के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के फ़ैसलों में मदद करेगा.
रविवार को देशभर में हज़ारों लोग कर्फ़्यू को तोड़ते हुए सड़कों पर उतर आए थे. सरकार ने एक स्पेशल नोटिफ़िकेशन जारी करते हुए लोगों के सार्वजनिक सड़कों, पार्क, ट्रेनों या समुद्र के किनारे पर जाने पर रोक लगा दी थी. वो सिर्फ़ विशेष अनुमति के ही वहां जा सकते हैं.
इसके अलावा फ़ेसबुक, व्हाट्सऐप और ट्विटर जैसी सोशल मीडिया वेबसाइट पर भी प्रतिबंध लगाया गया है.
इन प्रदर्शनों से साफ़ हो गया है कि राजपक्षे की लोकप्रियता में काफ़ी गिरावट आई है. स्थिरता और देश के शासन को 'मज़बूत हाथ' में देने के वादे के बाद 2019 में पूर्ण बहुमत से उनकी सत्ता में वापसी हुई थी.
क्या हैं ज़मीनी हालात
कोलंबो में मौजूद बीबीसी संवाददाता रजनी वैद्यनाथन बताती हैं कि रविवार को अचानक शुरू हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान वो विपक्ष के नेता सजित प्रेमदासा से मिली थीं. शहर के इंडिपेंडेंस स्क्वेयर में घुसने की कोशिश कर रहे उन्हें और पार्टी के अन्य सदस्यों को पुलिस ने रोक दिया था.
उन्होंने कहा कि कर्फ़्यू और सोशल मीडिया बैन का फ़ैसला तानाशाही भरा, निरंकुश और कठोर है.
रजनी बताती हैं कि उन्होंने कर्फ़्यू को तोड़कर सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने वाले कई लोगों से बातचीत की.
आमतौर पर व्यस्त रहने वाली सड़क पर एक एशियाई रेस्टॉरेंट के बाहर सुचित्र भी दर्जनों प्रदर्शनकारियों में से एक थे.
सुचित्र अपने 15 महीने के बेटे के साथ उन्होंने बताया कि बिजली कटौती के साथ-साथ उन्हें कैसे दैनिक दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है.
"बिना बिजली के हमारे पंखे काम नहीं कर रहे हैं. इस गर्मी में बच्चे और हमारे लिए असंभव है कि हम सो सकें."
कोलंबो में सैकड़ों छात्रों के समूह में शामिल एक छात्रा अंजलि वांदुरगाला ने कहा, "मैं इसलिए बाहर निकली हूं क्योंकि मेरे अधिकार छीने जा रहे हैं और मैं बहुत ग़ुस्से में हूं."
उन्होंने पूछा, "उन्होंने कर्फ़्यू क्यों लगाया हुआ है? क्या यह हमें सुरक्षित रखने के लिए है? इसका कोई मतलब नहीं है."
फ़्रीलांस एडवर्टाइज़िंग कॉपी राइटर सथसारा कहते हैं कि यह पहली बार है जब उन्होंने प्रदर्शन किया है.
वो कहते हैं, "मैं फ़्रीलांसर हूं लेकिन मैं पैसे नहीं कमा पा रहा हूं क्योंकि कोई ग़ैस, बिजली नहीं है. मैं पूरी तरह टूट चुका हूं."
मुश्किलों में लोगों की ज़िंदगी
तेल और कुकिंग गैस के लिए लोग लंबी-लंबी लाइनों में लग रहे हैं और कई घंटों तक जारी रहने वाली बिजली कटौती को झेल रहे हैं.
सामूहिक विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार को देश में आपातकाल लगाना पड़ा है जिसके तहत सुरक्षाबलों को लोगों को गिरफ़्तार करने की ताक़त मिल जाती है.
देश की ख़तरनाक आर्थिक हालात के बीच जनवरी के मध्य में भारत ने आर्थिक सहायता दी थी जिससे अस्थाई तौर पर राहत मिली थी.
एक ओर राष्ट्रपति राजपक्षे के इस्तीफ़े की मांग की जा रही है वहीं दूसरी ओर ऑल पार्टी कैबिनेट के लिए भी आवाज़ उठी है लेकिन मुख्य विपक्षी दल ने संकेत दिए हैं कि वो नए मंत्रिमंडल में जगह नहीं चाहता है.
आर्थिक संकट के बीच राजपक्षे ने अपनी सरकार की कार्रवाई का बचाव किया है और कहा है कि विदेशी मुद्रा संकट के कारण आर्थिक संकट नहीं पैदा हुआ है बल्कि यह महामारी के कारण हुआ है क्योंकि इसके कारण पर्यटन पर ख़ासा असर पड़ा था. (bbc.com)
पाकिस्तान में इमरान ख़ान की सरकार को गिराने में विदेशी हाथ और देश की सुरक्षा को लेकर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बिलावल भुट्टो को इमरान सरकार में मंत्री रहे फ़वाद चौधरी ने जवाब दिया है.
बिलावट भुट्टो ने इस मुद्दे पर ट्वीट करते हुए लिखा- पूर्व पीएम इमरान ख़ान अपने विद्रोह को सही साबित करने के लिए 'विदेशी साज़िश' का इस्तेमाल कर रहे हैं. क्या पाकिस्तान की सेना इस पर स्पष्टीकरण देगी. उन्होंने आगे लिखा है कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक में नेशनल असेंबली के 197 सदस्यों को विदेशी साज़िश का हिस्सा होने के लिए गद्दार घोषित किया गया? क्या विदेश मंत्रालय या रक्षा मंत्रालय विदेशी साज़िश को लेकर किसी भी आधिकारिक पत्राचार को पेश कर सकता है?
बिलावल ने आगे लिखा है कि निश्चित रूप से इस स्तर की साज़िश का पता हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियाँ और अन्य संस्थाएँ लगा ली होतीं. इमरान का अहम पाकिस्तान के अधिक महत्वपूर्ण नहीं. इसके जवाब में इमरान सरकार में मंत्री रहे फ़वाद चौधरी ने लिखा- राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर चर्चा से पहले किसी बुद्धिमान व्यक्ति से सलाह कीजिए. अगर कोई जाँच हुई, जो आपको बहुत नुक़सान होगा. हम अब भी बहुत ख़ामोश हैं.
श्रीलंका में विपक्ष के नेता सजिथ प्रेमदासा ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मदद की गुहार लगाई है. आर्थिक संकट से गुज़र रहे श्रीलंका में इस समय राजनीतिक अस्थिरता का भी दौर चल रहा है.
श्रीलंका में प्रधनमंत्री को छोड़कर पूरी की पूरी कैबिनेट ने इस्तीफ़ा दे दिया है. वहाँ के सेंट्रल बैंक के गवर्नर ने भी त्यागपत्र दे दिया है. समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में सजिथ प्रेमदासा ने पीएम मोदी से अपील करते हुए कहा है- कृपया जितना अधिक संभव हो, उतनी मदद की कोशिश करिए. ये हमारी मातृभूमि है. हमें अपनी मातृभूमि को बचाने की आवश्यकता है.
भारत ने श्रीलंका में आर्थिक संकट शुरू होने के बाद काफ़ी मदद की है. भारत ने तेल, अनाज और दवाओं के रूप में श्रीलंका को मदद की ही है, इसके अलावा कर्ज़ भी दिया है. लेकिन श्रीलंका में फ़िलहाल हालात सुधरते नहीं दिख रहे हैं. वहाँ की सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) का दरवाज़ा भी खटखटाया है. (bbc.com)
श्रीलंका में जारी आर्थिक संकट के बीच देश के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने देश के सभी राजनीतिक दलों को देश के अब तक के सबसे बुरे आर्थिक संकट का समाधान तलाशने के लिए सरकार में शामिल होने का आमंत्रण दिया है.
उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से इस संकट का समाधान निकालने के लिए मिलकर काम करने की अपील की है.
इससे पहले श्रीलंका के सेंट्रल बैंक के गवर्नर अजित निवार्द कबराल ने राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को अपना इस्तीफा सौंप दिया है.
उन्होंने ट्वीट कर बताया, ‘’देश के सभी कैबिनेट मंत्रियों के इस्तीफ़े को देखते हुए मैंने भी बतौर गवर्नर अपना इस्तीफ़ा राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को दे दिया है.‘’
रविवार देर रात को श्रीलंका के सभी 26 कैबिनेट मंत्रियों तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया.
पत्रकारों से बात करते हुए देश के शिक्षा मंत्री और सदन के नेता दिनेश गुणावर्धना ने कहा कि कैबिनेट मंत्रियों ने प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया है.
लेकिन उन्होंने इस सामूहिक इस्तीफ़े का कोई कारण नहीं बताया.
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि देश में पैदा हुए आर्थिक संकट से सरकार के निबटने के ‘तरीके’ को लेकर मंत्रियों पर जनता की ओर से भारी दबाव था.
31 मार्च को गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने गोटाबाया राजपक्षे के निजी आवास का घेराव कर बस और सरकारी वाहनों में आग लगा दी थी. इसके बाद सरकार ने देश में आपातकाल घोषित कर दिया था. (bbc.com)
रूस ने बूचा नरसंहार में अपनी भूमिका से किया इनकार, सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाने की मांग रूस ने यूक्रेन में बूचा में नरसंहार के आरोपों से इनकार किया है.
रूस के रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी करके कहा है कि रूस बूचा से 30 मार्च को ही हट गया था. रूस ने इन आरोपों को एक और उकसावे की बात कही है.
दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने ट्वीट कर लिखा है कि उन्हें इन तस्वीरों से सदमा पहुँचा हैं. उन्होंने कहा है कि प्रभावी रूप से जवाबदेही तय करने के लिए ये ज़रूरी है कि एक स्वतंत्र जाँच की जाए.
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदोमीर ज़ेलेंस्की ने अपने वीडियो संदेश में कहा है कि आम नागरिकों की कथित हत्या के मामले में नई पाबंदियाँ रूस को सज़ा दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. दूसरी ओर यूक्रेन के विदेश मंत्री दिमित्री कुलेबा ने कहा है कि बूचा का नरसंहार जान-बूझकर किया गया है. उन्होंने कहा है कि रूस का लक्ष्य ये है कि वे यूक्रेन के जितने लोगों को मार सकते हैं, मारेंगे. हमें उन्हें रोकने की आवश्यकता है. कुलेबा ने मांग की है कि रूस पर जी-7 देश कड़ी पाबंदियाँ लगाएँ.
दूसरी ओर अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने कहा है कि वे बूचा और यूक्रेन के अन्य शहरों में रूसी सैनिकों की कथित अत्याचार की निंदा करते हैं. ब्लिंकेन ने कहा- हम इस मामले में जवाबदेही तय करने के लिए हर संसाधनों का इस्तेमाल करेंगे.
इस बीच भारत स्थित रूसी दूतावास ने एक के बाद एक कई ट्वीट करके यूक्रेन की भूमिका पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि जब तक रूस की सेना वहाँ थी, सब ठीक था. (bbc.com)
पाकिस्तानी गायिका अरूज आफ़ताब ने 2022 ग्रैमी अवॉर्ड्स में अपने गीत 'मोहब्बत' के लिए बेस्ट ग्लोबल म्यूज़िक परफ़ॉर्मेंस का अवॉर्ड जीत लिया है.
यह उनके कैरियर का पहला ग्रैमी अवॉर्ड है. अरूज आफ़ताब ग्रैमी के लिए नॉमिनेट होने वाली पहली पाकिस्तानी महिला हैं. अरूज आफ़ताब को बेस्ट न्यू आर्टिस्ट के लिए भी नॉमिनेट किया गया था.
'नागिन' की बीन वाली अमर धुन बनने की कहानी
अरूज आफ़ताब ने 64वें ग्रैमी अवॉर्ड्स के अवसर पर स्टेज से कहा, "मैंने यह रिकॉर्ड हर उस चीज़ के लिए बनाया है, जिसने मुझे तोड़ा और मुझे दोबारा इकठ्ठा किया. इसे सुनने और अपना बनाने के लिए आपका धन्यवाद."
एंजेलिक किडजू और बर्ना बॉय, फेमी कोटी, एंजेलिक किडजू, के साथ यू-यू मा और विज़केड फुट टीम इस श्रेणी के लिए नॉमिनेट उम्मीदवार थे.
याद रहे कि अरूज आफ़ताब उन चुनिंदा गायकों में से एक हैं, जिन्हें अमेरिकी म्यूज़िक इंडस्ट्री के बड़े पुरस्कार ग्रैमी अवॉर्ड्स 2022 के लिए नॉमिनेट किया गया था.
नॉमिनेशन पर प्रतिक्रिया
पाकिस्तान और अमेरिका में उनके नॉमिनेशन पर लगभग एक जैसी ही प्रतिक्रिया थी. कुछ लोग अरूज आफ़ताब के म्यूज़िक को वर्षों से सुन रहे हैं और कुछ के लिए ये नाम कोई ख़ास जाना पहचाना नहीं है.
ग्रैमी के लिए 'दि रिकॉर्डिंग एकेडमी' ने अरूज का नाम दो पुरस्कारों के लिए नॉमिनेट किया था. बेस्ट न्यू आर्टिस्ट के अलावा उनके गाने 'मोहब्बत' को बेस्ट ग्लोबल म्यूज़िक परफ़ॉर्मेंस अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट किया गया है.
अगर अरूज के जीवन को एक वाक्य में समेटा जाए, तो वह एक 37 वर्षीय पाकिस्तानी हैं, जिन्होंने अपने संगीत कैरियर की शुरुआत लाहौर से की, अमेरिका के बर्कले कॉलेज ऑफ़ म्यूज़िक से शिक्षा प्राप्त की, और अब तक उनकी तीन सोलो एल्बम आ चुकी हैं.
लेकिन असल में उनकी ज़िदगी की असली कहानी इससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प है.
18 साल की उम्र में इंटरनेट पर वायरल
सऊदी अरब में जन्मीं, अरूज आफ़ताब जब अपने माता-पिता के साथ लाहौर आईं, तो उन्होंने अपने संगीत कैरियर की शुरुआत एक कवर आर्टिस्ट के रूप में की थी. यानी वह किसी मशहूर गाने को अपने अंदाज़ में गाकर नया रंग देती थी.
18 साल की उम्र में, उनके ऐसे ही दो गाने, 'हलिलोया' और आमिर ज़की का 'मेरा प्यार', इंटरनेट पर वायरल हो गए, जिससे उन्हें शुरुआती तौर पर हौसला मिला.
अमेरिका के बर्कले कॉलेज से म्यूज़िक प्रोडक्शन और इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के दौरान वह न्यूयॉर्क आ गईं.
आबिदा परवीन के दरवाज़े पर दस्तक
अरूज को शास्त्रीय संगीत, ग़ज़ल और कव्वाली से बचपन से ही लगाव रहा है. 90 के दशक में लाहौर में उनके सभी दोस्त और रिश्तेदार उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान से प्रभावित थे और उनकी दुर्लभ रिकॉर्डिंग्स को बड़े शौक़ से सुनते थे.
साल 2010 में न्यूयॉर्क में सूफ़ी संगीत समारोह का मेला सज रहा था, तब अरूज को पता चला कि 'सूफ़ी संगीत की मल्लिका' आबिदा परवीन भी वहां परफ़ॉर्म करने वाली हैं.
पिचफार्क को दिए एक इंटरव्यू में, अरूज याद करती हैं, कि उन्होंने होटल में आबिदा परवीन का कमरा नंबर पता किया और बिन बुलाये उनके दरवाज़े पर दस्तक दे दी. आबिदा परवीन ने उन्हें ऑडिशन से पहचान लिया, हाथ पकड़ा और उन्हें कमरे में बुला लिया. और इस तरह दोनों हारमोनियम पर साथ गाने लगी.
एक बार अरूज ने आबिदा परवीन से पूछा, "मुझे अपनी ज़िंदगी में क्या करना चाहिए?"
अरूज स्वीकार करती हैं, कि वह अपने जीवन में उर्दू शायरी से काफ़ी प्रभावित हुई हैं. वह अपने संगीत को न्यू सूफ़ी सेमी-पाकिस्तानी क्लासिकल कहती हैं.
ओबामा भी उनके फ़ैन हैं
ग्रैमी में नॉमिनेशन के बाद से सोशल मीडिया पर अरूज को लेकर तरह-तरह के कमेंट हो रहे हैं. जहां ज़्यादातर लोग इस पर उन्हें मुबारकबाद दे रहे हैं, वहीं कुछ लोग ज़ाहिरी तौर पर उनके संगीत से ज़्यादा प्रभावित नज़र नहीं आ रहे हैं.
जबकि कुछ लोगों का मानना है, कि पाकिस्तानी कलाकारों की सराहना तभी होती है जब उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिलती है, जो सही नहीं है.
वैसे अरूज इससे पहले भी वैश्विक स्तर पर सभी की नज़रों में आ चुकी हैं. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उनका गाना 'मोहब्बत' अपनी आधिकारिक समर 2021 प्लेलिस्ट में शामिल किया था.
हफ़ीज़ होशियारपुरी की एक ग़ज़ल पर आधारित यह गाना अरूज के हिट गानों में से एक है, जिसे उनसे पहले मेहदी हसन गा चुके हैं.
सोशल मीडिया पर एक यूज़र ने व्यंग्य करते हुए कहा कि "एक आइडियल दुनिया में मेहदी हसन को ग्रैमी मिलना चाहिए था.
इसी बीच साल 2020 में अरूज को स्टूडिंग एकेडमी अवॉर्ड भी दिया गया था.
पिचफोर्क को दिए इंटरव्यू में अरूज ने कहा था, कि वह बचपन से ही ख़ुद को दूसरों से अलग मानती थीं. वह संगीत की शिक्षा हासिल करना चाहती थीं, जिसके लिए उन्हें लाहौर से बहुत दूर जाना पड़ता, जो बहुत महंगा साबित हो सकता था.
उनके माता-पिता भी संगीत के बहुत शौकीन थे, लेकिन एक बार उनके पिता ने कहा था, कि कुछ लोग सोचते हैं कि वे संगीत में जाना चाहते हैं लेकिन वास्तव में उन्हें केवल संगीत पसंद होता है.
"मुझे नहीं पता था कि क्या करना है और एक बार मैं एक गाना सुन रही थी और मैंने फ़ैसला किया कि मैं भी इसे दिल से गा सकती हूं. मैं दुनिया से थक चुकी थी."
उन्होंने यह भी बताया कि 2018 में उनके भाई और एक क़रीबी दोस्त की मौत का उनके जीवन और संगीत पर गहरा प्रभाव पड़ा.
उरूज ने ग्रैमी के लिए अपने नॉमिनेशन की ख़बर पर लिखा कि वह इस ख़बर से हैरान और ख़ुश हैं. इस खबर पर ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए सिंगर हदीका कयानी ने लिखा कि यह देश के लिए गर्व की बात है. यूज़र हारून शाहिद ने लिखा कि उन्हें बहुत ख़ुशी है कि एक पाकिस्तानी इस सम्मान तक पहुंचा है. (bbc.com)
जेरेमी बोवेन
बूचा, रूस के कीएव को घेरने और राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की की सरकार गिरा देने के सपनों का कब्रिस्तान है. ये वो जगह है जहां रूस के ये इरादे ज़मीदोज़ हो गए.
24 फरवरी को रूस के यूक्रेन पर हमला करने के दो से तीन दिन बाद ही यूक्रेनी सेना ने उन रूसी टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को नष्ट कर दिया था जो बूचा से कीएव की ओर बढ़ रहे थे.
कई यूक्रेनी सेना की ओर से इस काफ़िले को नष्ट कर दिया गया था. इस शहर से रूस की सेना को कीएव की ओर बढ़ने के लिए यूक्रेनी सेना ने नाकों चने चबवा दिए थे.
बीबीसी की टीम बूचा पहुंची, क्योंकि शुक्रवार को बूचा से रूस ने अपनी पूरी सेना वापस बुला ली, ये क़दम क्रेमलिन के उस 'शांत और तर्कसंगत' फ़ैसले का हिस्सा है जिसके तहत वह पूर्वी यूक्रेन में युद्ध पर केंद्रित करना चाहता है.
रूस कह रहा है कि मध्य यूक्रेन में उसने अपने युद्ध का मक़सद हासिल कर लिया है और उनके मक़सद में कभी भी कीएव पर कब्ज़ा करना शामिल नहीं रहा है.
लेकिन सच ये है कि यूक्रेन की तरफ़ से अप्रत्याशित रूप से मिली टक्कर और सुव्यवस्थित विरोध की रूस को उम्मीद नहीं थी और यही वजह है कि यूक्रेन ने रूस को राजधानी कीएव के बाहर ही रोक दिया. इस बात की तस्दीक़ रूस की बर्बाद हुई टैंकों और बख्तरबंद वाहनों के मलबे कर रहे हैं जो अब तक बूचा की सड़कों पर ही पड़े हुए हैं.
बूचा में हुआ क्या था?
युद्ध में दो या तीन सप्ताह बाद ही रूसी सेना ने अपना मूमेंटम यानी गति खो दी. बूका की सड़कों पर ये साफ़ नज़र आता है.
रूस के एयरबॉर्न फ़ोर्स के एलीट ट्रूप बख्तरबंद वाहनों में शहर तक आए थे. ये वाहन इतने हल्के थे कि इन्हें विमान के ज़रिए एक जगह दूसरी जगह ले जाया जा सता था. ये एलीट फोर्स के लोग बूचा से कुछ मील दूर होस्टोमेल हवाई अड्डे पर उतर कर यहां तक आए थे. इस हवाई अड्डे को रूसी अर्धसैनिकों ने अपने कब्ज़े में ले लिया था.
मलबे में तब्दील शहर
यहां सड़के संकरी और सीधी है, घात लगाने या छिप कर हमला करने के लिए एकदम आदर्श मानी जाती हैं. प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि यूक्रेन ने तुर्की से खरीदे गए बायरख़्तर अटैक ड्रोन से रूस के काफ़िले पर हमला किया. आस-पास के इलाकों में रहने वाले अन्य लोगों ने कहा कि यहां यूक्रेनी सेना के साथ-साथ रक्षा वॉलेंटियर भी मौजूद थे.
हालाँकि यूक्रेन इस काफ़िले को रोक सका, रूस के मुख्य वाहनों को नष्ट कर दिया गया लेकिन ये मलबे को हाथ तक नहीं लगाया गया है.
अभी भी 30 मिमी तोप के गोले घास पर पड़े हुए हैं, कई और भी गोलों के ख़तरनाक टुकड़े सड़कों पर पड़े हुए हैं.
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई रूस के युवा सैनिक भाग खड़े हुए तो कुछ पकड़े जाने पर अपनी जान की भीख मांगने लगे.
70 वर्षीय एक शख़्स खुद को अंकल हैरिशा बताता है. वह कहता है, '' "मुझे उनके लिए दुख हो रहा था. वे 18 से 20 साल के लड़के थे उनके आगे उनका पूरा जीवन पड़ा हुआ था."
ऐसा लगता है कि बूचा से बाहर निकलते रूसी सैनिकों में कोई दया नहीं थी. कम से कम 20 मृत रूसी सैनिक सड़कों पर पड़े हुए थे जब रूसी सेना ने बूचा का इलाका खाली किया. इनके हाथ पीछे की ओर बंधे हुए थे.
इस इलाके के मेयर ने बताया कि उन्होंने 280 लोगों का सामुहिक अंतिम संस्कार किया है.
इस इलाके में आम लोग जो ठहरे रहे उन्होंने बताया कि हमने रूसी सेना से बचने की कोशिश की. यहां बिलजी और गैस की सप्लाई नहीं थी तो हमने घरों के सामने आग जला कर उसी पर खाना बनाया
वॉलेंटियर लीव और जो जगहें युद्ध से प्रभावित नहीं थी वहां से मदद बूचा तक ला रहे थे.
मारिया नाम की एक महिला जिसके हाथ में प्लास्टिव का एक बैग था उसे दिखाते हुए कहा, ''बीते 38 दिनों में ये पहला ब्रेड है जो मैं खाने जा रही हूं.''
मारिया की बेटी लरीसा ने मुझे अपना सोवियत ज़माने की बनावट वाला अपार्टमेंट दिखाया.
बर्बादी का ये मंज़र आपको धीरे-धीरे होस्टोमेल एयरपोर्ट तक ले जाता है. रूसी सेना ने इस एयरपोर्ट को बेस की तरह इस्तेमाल किया था.
एयरपोर्ट पर बनाए गए विशाल हैंगर की छतों पर अब नुकीले छर्रों के ढेर सारे छेद नज़र आते हैं.
दुनिया का सबसे बड़ा परिवहन विमान यहां पहले ही नष्ट किया जा चुका है. इसका नाम था मार्रया, जिसका अर्थ होता है ख़्वाब. ये विमान टूटा हुआ पड़ा है, और इंजन के बड़े टुकड़े ज़मीन पर पड़े हुए हैं.
जो इस विमान के साथ हुआ है कुछ वैसा ही यूक्रेन के साथ हो रहा है. विमान यूक्रेन के गौरव का प्रतीक था, यूक्रेन की क्षमता के प्रतीक के रूप में इसे पेश किया गया था.
ये प्रतीक था दुनिया भर में यूक्रेन की बड़ी परियोजनाओं को सफलतापूर्क कर दिखाने के जज़्बे का.
श्रीलंका में भयंकर आर्थिक संकट के कारण हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद देश के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस्तीफ़ा दे दिया है. वहीं राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने विपक्षी दलों को भी मंत्रिमंडल में शामिल होने का प्रस्ताव दिया है. इसके साथ ही सोमवार को 4 मंत्रियों को पद की शपथ दिलाई गई है.
रविवार की रात मंत्रिमंडल के सभी 26 मंत्रियों ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. हालांकि, प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे और उनके भाई और राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने इस्तीफ़ा नहीं दिया है.
गौरतलब है कि इस नए मंत्रिमंडल में राष्ट्रपति ने अपने भाई और पिछली कैबिनेट में वित्त मंत्री रहे बासिल गोटाबाया को जगह नहीं दी है.
श्रीलंका के राष्ट्रपति कार्यालाय ने बयान जारी कर कहा है कि सोमवार को राष्ट्रपति ने संसद में प्रतिनिधित्व करने वाले सभी राजनीतिक दलों को मंत्री पद का प्रस्ताव दिया है ताकि देश की आर्थिक समस्या से निकलने में साथ मिलकर रास्ता ढूंढा जा सके.
बयान में कहा गया है, "राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने सभी राजनीतिक दलों को प्रस्ताव दिया है कि सब साथ आकर जारी राष्ट्रीय संकट का हल निकलने में मदद करें."
"राष्ट्र की ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए सभी नागरिकों और भविष्य की पीढ़ी के लिए साथ काम करने का वक़्त है."
इसके साथ ही चार नए मंत्रियों को शपथ दिलाई गई है. इनमें बासिल राजपक्षे की जगह अली साबरी को वित्त मंत्री बनाया गया है. वहीं जीएल पेइरिस को विदेश मंत्री, दिनेश गुनावर्दने को शिक्षा मंत्री, जॉन्सटन फ़र्नांडो को हाइवे मंत्री बनाया गया है.
इससे पहले श्रीलंका के सेंट्रल बैंक के गवर्नर अजित निवार्द कबराल ने राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को अपना इस्तीफा सौंप दिया है.
उन्होंने ट्वीट कर बताया, ''देश के सभी कैबिनेट मंत्रियों के इस्तीफ़े को देखते हुए मैंने भी बतौर गवर्नर अपना इस्तीफ़ा राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को दे दिया है.''
वहीं कई प्रदर्शनकारी राजपक्षे परिवार के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं और इस क़दम को अर्थहीन बता रहे हैं. रविवार को कई प्रदर्शनकारियों ने कर्फ़्यू को तोड़ा और कई शहरों में सड़कों पर उतरे.
इस संकट के लिए विदेशी मुद्रा की कमी को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है जो तेल आयात के लिए इस्तेमाल होती है. अब देश में लगभग आधे दिन तक बिजली गुल रहती है, खाने, दवाएं और तेल की कमी है और लोगों का ग़ुस्सा चरम पर है.
इस्तीफ़े का कारण अभी तक नहीं पता
शिक्षा मंत्री और सदन के नेता दिनेश गुनावर्दने ने रविवार को पत्रकारों से कहा कि कैबिनेट मंत्रियों ने प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को इस्तीफ़ा दे दिया. उन्होंने इस सामूहिक इस्तीफ़े के कारण के बारे में कुछ नहीं बताया है.
उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे अपने छोटे भाई राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे से सोमवार को मुलाक़ात करेंगे.
गुनावर्दने ने कहा, "हमने देश की विस्तार से चर्चा की. देश में चल रहे तेल और ऊर्जा संकट का हल होगा."
प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के बेटे नमल राजपक्षे भी इस्तीफ़ा देने वाले मंत्रियों में शामिल हैं. उन्होंने ट्वीट किया है कि उन्हें उम्मीद है कि यह 'जनता और सरकार के लिए स्थायित्व' के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के फ़ैसलों में मदद करेगा.
रविवार को देशभर में हज़ारों लोग कर्फ़्यू को तोड़ते हुए सड़कों पर उतर आए थे. सरकार ने एक स्पेशल नोटिफ़िकेशन जारी करते हुए लोगों के सार्वजनिक सड़कों, पार्क, ट्रेनों या समुद्र के किनारे पर जाने पर रोक लगा दी थी. वो सिर्फ़ विशेष अनुमति के ही वहां जा सकते हैं.
इसके अलावा फ़ेसबुक, व्हाट्सऐप और ट्विटर जैसी सोशल मीडिया वेबसाइट पर भी प्रतिबंध लगाया गया है.
इन प्रदर्शनों से साफ़ हो गया है कि राजपक्षे की लोकप्रियता में काफ़ी गिरावट आई है. स्थिरता और देश के शासन को 'मज़बूत हाथ' में देने के वादे के बाद 2019 में पूर्ण बहुमत से उनकी सत्ता में वापसी हुई थी.
क्या हैं ज़मीनी हालात
कोलंबो में मौजूद बीबीसी संवाददाता रजनी वैद्यनाथन बताती हैं कि रविवार को अचानक शुरू हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान वो विपक्ष के नेता सजित प्रेमदासा से मिली थीं. शहर के इंडिपेंडेंस स्क्वेयर में घुसने की कोशिश कर रहे उन्हें और पार्टी के अन्य सदस्यों को पुलिस ने रोक दिया था.
उन्होंने कहा कि कर्फ़्यू और सोशल मीडिया बैन का फ़ैसला तानाशाही भरा, निरंकुश और कठोर है.
रजनी बताती हैं कि उन्होंने कर्फ़्यू को तोड़कर सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने वाले कई लोगों से बातचीत की.
आमतौर पर व्यस्त रहने वाली सड़क पर एक एशियाई रेस्टॉरेंट के बाहर सुचित्र भी दर्जनों प्रदर्शनकारियों में से एक थे.
श्रीलंका में महंगाई की मार, कई परिवार भारत पहुँचे
सुचित्र अपने 15 महीने के बेटे के साथ उन्होंने बताया कि बिजली कटौती के साथ-साथ उन्हें कैसे दैनिक दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है.
"बिना बिजली के हमारे पंखे काम नहीं कर रहे हैं. इस गर्मी में बच्चे और हमारे लिए असंभव है कि हम सो सकें."
कोलंबो में सैकड़ों छात्रों के समूह में शामिल एक छात्रा अंजलि वांदुरगाला ने कहा, "मैं इसलिए बाहर निकली हूं क्योंकि मेरे अधिकार छीने जा रहे हैं और मैं बहुत ग़ुस्से में हूं."
उन्होंने पूछा, "उन्होंने कर्फ़्यू क्यों लगाया हुआ है? क्या यह हमें सुरक्षित रखने के लिए है? इसका कोई मतलब नहीं है."
फ़्रीलांस एडवर्टाइज़िंग कॉपी राइटर सथसारा कहते हैं कि यह पहली बार है जब उन्होंने प्रदर्शन किया है.
वो कहते हैं, "मैं फ़्रीलांसर हूं लेकिन मैं पैसे नहीं कमा पा रहा हूं क्योंकि कोई ग़ैस, बिजली नहीं है. मैं पूरी तरह टूट चुका हूं."
मुश्किलों में लोगों की ज़िंदगी
तेल और कुकिंग गैस के लिए लोग लंबी-लंबी लाइनों में लग रहे हैं और कई घंटों तक जारी रहने वाली बिजली कटौती को झेल रहे हैं.
सामूहिक विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार को देश में आपातकाल लगाना पड़ा है जिसके तहत सुरक्षाबलों को लोगों को गिरफ़्तार करने की ताक़त मिल जाती है.
देश की ख़तरनाक आर्थिक हालात के बीच जनवरी के मध्य में भारत ने आर्थिक सहायता दी थी जिससे अस्थाई तौर पर राहत मिली थी.
एक ओर राष्ट्रपति राजपक्षे के इस्तीफ़े की मांग की जा रही है वहीं दूसरी ओर ऑल पार्टी कैबिनेट के लिए भी आवाज़ उठी है लेकिन मुख्य विपक्षी दल ने संकेत दिए हैं कि वो नए मंत्रिमंडल में जगह नहीं चाहता है.
आर्थिक संकट के बीच राजपक्षे ने अपनी सरकार की कार्रवाई का बचाव किया है और कहा है कि विदेशी मुद्रा संकट के कारण आर्थिक संकट नहीं पैदा हुआ है बल्कि यह महामारी के कारण हुआ है क्योंकि इसके कारण पर्यटन पर ख़ासा असर पड़ा था. (bbc.com)
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी ने प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और नेशनल असेंबली में विपक्ष के नेता रहे शाहबाज़ शरीफ़ से कार्यवाहक प्रधानमंत्री के लिए ऐसा नाम मांगा है, जिस पर सहमति हो. रेडियो पाकिस्तान के मुताबिक़ राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी ने इमरान ख़ान और शाहबाज़ शरीफ़ को पत्र लिखा है. राष्ट्रपति अल्वी इमरान ख़ान और शाहबाज़ शरीफ़ की सलाह से कार्यवाहक प्रधानमंत्री की नियुक्ति करेंगे.
पत्र में ये भी लिखा गया है कि संसद भंग होने के तीन दिनों के अंदर अगर पीएम और विपक्ष के नेता में किसी नाम पर सहमति नहीं होती, तो वे दो लोगों के नाम एक संसदीय समिति के पास भेजेंगे. इस समिति में आठ सदस्य होंगे, जिनमें सत्ता और विपक्ष के बराबर-बराबर सदस्य होंगे. ये समिति कार्यवाहक पीएम का नाम तय करेगी.
राष्ट्रपति के आदेश के अनुसार जब तक कार्यवाहक पीएम की नियुक्ति नहीं हो जाती, इमरान ख़ान प्रधानमंत्री के पद पर बने रहेंगे. रविवार को पीएम इमरान ख़ान की सलाह पर राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी ने नेशनल असेंबली को भंग कर दिया था. इससे पहले नेशनल असेंबली में विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को डिप्टी स्पीकर ने संविधान के अनुच्छेद पाँच का हवाला देते हुए ख़ारिज कर दिया था. अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट के पास विचाराधीन है. (bbc.com)
पाकिस्तान में इमरान ख़ान ने रविवार को अपने विरोधियों समेत मुल्क़ की आवाम को चौंकाने का काम किया.
नेशनली असेंबली भंग करने, नए चुनाव करवाने की बात इमरान ख़ान ने जैसे ही की, पाकिस्तान के नेताओं से लेकर आम लोगों तक की प्रतिक्रियाएं आने लगीं.
विरोधी इमरान ख़ान के कदम को असंवैधानिक बता रहे हैं और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के स्वत: संज्ञान को उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसले आने और नए चुनाव से पहले फिलहाल पाकिस्तान में कार्यवाहक सरकार का गठन हो सकता है.
पाकिस्तान में लगातार हो रही इन सियासी हलचलों पर आम पाकिस्तानी क्या कह रहे हैं और सोशल मीडिया पर कैसी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं? चलिए आपको बताते हैं.
पाकिस्तानी सोशल मीडिया पर क्या बोले?
पाकिस्तान के सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं भी समर्थकों और आलोचकों के बीच बँटी हुई है. इमरान ख़ान के समर्थक खुशी का इज़हार कर रहे हैं. वहीं विरोधी आलोचना कर रहे हैं.
दो दिन पहले देश के नाम संबोधन में इमरान ख़ान ने आख़िरी गेंद तक खेलने की बात कही थी.
फिर अचानक जब असेंबली भंग करने की बात हुई तब ट्विटर पर नाएला इनायत ने तंज किया, ''मैं आख़िरी बॉल पर बॉल ही लेकर भाग जाऊंगा.''
इमरान ख़ान की पूर्व पत्नी रेहाम ख़ान ने ट्वीट किया, ''नए चुनाव करवाने की बात कहकर एक असंवैधानिक कदम को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. चुनाव करवाने का फ़ैसला इमरान नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करने का संवैधानिक हक उनके पास नहीं है. हर नियम को तोड़ने की सज़ा देकर उदाहरण पेश करना चाहिए.''
रेहाम ख़ान पहले भी कई मौक़ों पर इमरान ख़ान की आलोचना करती रही हैं. रेहाम ने ट्वीट किया, ''संविधान की कोई इज़्ज़त नहीं. न ही आंतरिक और बाहरी ख़तरों की कोई फिक्र. अब आप लोग जान गए होंगे कि मैं क्यों इस आदमी के साथ नहीं रह पाई.''
रेहाम ने ये भी लिखा, ''आज जो ख़ुशी मना रहे हैं, वो अपनी बेवकूफी भरी सोच का सबूत दे रहे हैं. जाहिल को पहचानिए.''
पाकिस्तानी क्रिकेटर मोहम्मद हफीज़ ने ट्वीट किया, ''पाकिस्तान ज़िंदाबाद. इमरान ख़ान आप हमेशा लेजेंड रहेंगे.''
पूर्व पाकिस्तानी क्रिकेटर वसीम अकरम ने इमरान ख़ान की हँसते हुई तस्वीर को ट्वीट करते हुए लिखा, ''द गेम चेंजर.''
पाकिस्तान में अचानक हुए फेरबदल के बाद इमरान ख़ान के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर ये तस्वीर पोस्ट की गई थी.
जाने-माने पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर ने ट्वीट किया, ''सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को कहा था कि इमरान ख़ान या राष्ट्रपति को ओर से दिए गए आदेश अदालत के फैसले पर निर्भर होंगे. लेकिन कार्यवाहक पीएम चुने जाने तक राष्ट्रपति खुद इमरान को प्रधानमंत्री के तौर पर जारी रखने को कह रहे हैं. ये अदालत की अवमानना है?''
इस पूरे मसले पर बालाकोट और 2019 में आमने-सामने आए भारत-पाकिस्तान की भी चर्चा हो रही है.
कुछ लोग ऐसे हैं, जो फरवरी 2019 में आसिफ गफ़्फ़ूर के उस बयान को शेयर कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि हम आपको चौंकाएंगे, हमारे सरप्राइज का इंतज़ार कीजिए. अरशद शरीफ इसे शेयर करते हुए लिखते हैं- सच्चा पाकिस्तानी हमेशा अपने दुश्मनों को चौंकाने का काम करता है.
सारा ने ट्वीट किया, ''पाकिस्तान इमरान ख़ान की अहसानमंद रहेगी. दिल खुश कर दिया. लूटेरों को ऐसा चांटा मारा.''
काफ़ी सारे पाकिस्तानी शाहबाज़ शरीफ़ की उदास और इमरान ख़ान की मुस्कुराती हुई तस्वीर पोस्ट करके लिख रहे हैं- दो तस्वीरें और दो अलग कहानियां. (bbc.com)
(सज्जाद हुसैन)
इस्लामाबाद, 4 अप्रैल। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने नेशनल असेंबली में अपने खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव से सफलतापूर्वक बच निकलने के बाद रविवार को विपक्ष के नेताओं का मजाक उड़ाया।
सदन के उपाध्यक्ष कासिम सूरी ने संयुक्त विपक्ष द्वारा पेश किए गए अविश्वास प्रस्ताव को अवैध घोषित करते हुए कहा कि उनके अनुसार इस प्रस्ताव का लक्ष्य किसी विदेशी ताकत के कहने पर सरकार को अपदस्थ करना था।
इसके कुछ ही मिनट बाद राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने प्रधानमंत्री खान की सिफारिश पर नेशनल असेंबली को भंग कर दिया।
खान ने अपने सांसदों से हंसते हुए कहा, ‘‘विपक्ष को अब भी समझ नहीं आ रहा कि आज क्या हुआ।’’
उन्होंने इस्लामाबाद में एक बैठक में सांसदों से कहा कि उन्होंने विपक्ष को हराने के अपने अंतिम फैसले को सार्वजनिक नहीं किया था, क्योंकि वह उन्हें अचंभित करना चाहते थे।
खान ने कहा, ‘‘विपक्ष को मौजूदा हालात के बारे में कुछ समझ नहीं आ रहा।’’
उन्होंने कहा कि पिछले सप्ताह राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक के दौरान एक ‘‘धमकी भरा पत्र’’ साझा किया गया था जिसे पाकिस्तान के राजदूत ने विदेश मंत्रालय को भेजा था। इस बैठक में सेना प्रमुख के साथ-साथ अन्य सभी सेवाओं के प्रमुख भी शामिल हुए थे।
खान ने कहा, ‘‘बैठक में इस पत्र की समीक्षा की गई और इस पर चर्चा की गई। इसके बाद निष्कर्ष निकाला गया कि यह पत्र वास्तव में धमकी भरा पत्र था।’’
उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिकी अधिकारियों ने उनकी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के असंतुष्ट सांसदों से मुलाकात की थी।
प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘विदेशी राजदूतों से मुलाकात करने में उनका क्या मतलब था? अविश्वास प्रस्ताव एक विदेशी षड्यंत्र था। यह सब जुड़ा हुआ है।’’ (भाषा)
(शिरीष बी प्रधान)
काठमांडू, 4 अप्रैल। भारत की अपनी यात्रा से रविवार को स्वदेश लौटे नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सीमा संबंधी मामलों पर चर्चा की और दोनों नेताओं ने मौजूदा तंत्र, वार्ता एवं कूटनीति के जरिए इन मामलों को सुलझाने पर सहमति जताई।
दोनों प्रधानमंत्रियों ने दोनों देशों के बीच निकट पड़ोसियों वाले संबंधों के विभिन्न अहम पहलुओं पर शनिवार को नयी दिल्ली में विस्तार से वार्ता की।
देउबा प्रधानमंत्री मोदी के निमंत्रण पर एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ तीन दिवसीय यात्रा पर शुक्रवार को नयी दिल्ली पहुंचे थे।
प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा रहे नेपाल के विदेश मंत्री नारायण खड़का ने रविवार को यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘द्विपक्षीय वार्ता और विचारों का आदान-प्रदान दोनों देशों के बीच सहयोगात्मक संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में फलदायी रहा।’’
खड़का ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत नेपाल के विकास के लिए हमेशा सोचता है और उन्होंने काठमांडू को उसके प्राथमिकी वाले क्षेत्रों में नयी दिल्ली से दी जाने वाली सहायता जारी रखने का भरोसा दिया।
उन्होंने कहा, ‘‘वार्ता के दौरान दोनों प्रधानमंत्रियों ने सीमा संबंधी मामलों पर चर्चा की और दोनों नेताओं ने इस प्रकार के मामलों से मौजूदा तंत्र, वार्ता एवं कूटनीति के जरिए निपटने पर सहमति जताई।’’
देउबा ने मोदी से एक द्विपक्षीय तंत्र की स्थापना के जरिए सीमा संबंधी मामलों को सुलझाने की शनिवार को सार्वजनिक रूप से अपील की थी। ऐसे में खड़का का यह बयान महत्व रखता है।
कुछ घंटे बाद विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने कहा कि सामान्य समझ यह थी कि मुद्दे का समाधान बातचीत के माध्यम से जिम्मेदार तरीके से करने की जरूरत है और इसके ‘‘राजनीतिकरण’’ से बचना चाहिए।
श्रृंगला ने कहा, ‘‘इस मुद्दे पर संक्षेप में चर्चा हुई। एक सामान्य समझ थी कि दोनों पक्षों को हमारे करीबी और मैत्रीपूर्ण संबंधों की भावना के साथ चर्चा और बातचीत के माध्यम से इसका जिम्मेदार तरीके से समाधान करने की जरूरत है और ऐसे मुद्दों के राजनीतिकरण से बचना चाहिए।’’
सीमा मुद्दे के राजनीतिकरण से बचने की आवश्यकता पर श्रृंगला की टिप्पणी महत्व रखती है क्योंकि 2020 में नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली ने बढ़ते घरेलू दबाव और उनके नेतृत्व को उत्पन्न चुनौती से मुकाबले के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल करने का प्रयास किया था।
नेपाल द्वारा 2020 में एक नया राजनीतिक मानचित्र प्रकाशित किए जाने के बाद भारत और नेपाल के बीच संबंधों में गंभीर तनाव आ गया था, जिसमें तीन भारतीय क्षेत्रों - लिंपियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख - को नेपाल के हिस्से के रूप में दिखाया गया था।
खड़का ने कहा कि दोनों नेताओं के बीच बातचीत के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, व्यापार और सीमा पार पारेषण लाइन के क्षेत्र में सहयोग, रेलवे लाइन निर्माण के माध्यम से सीमा पार संपर्क बढ़ाने, एकीकृत जांच चौकी के निर्माण और द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने जैसे मामलों पर मुख्य रूप से चर्चा हुई।
खड़का ने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री देउबा ने विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से भी मुलाकात की और इस दौरान उन्होंने आपसी हितों को बढ़ावा देने एवं द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की।’’
देउबा ने भारतीय व्यापार जगत के दिग्गजों से भी आर्थिक समृद्धि के लिए नेपाल में निवेश करने का आग्रह किया और आश्वासन दिया कि नेपाल सरकार देश में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए कानूनी और नीति स्तर के सुधार लाने के लिए प्रयासरत है।
मंत्री ने कहा, ‘‘इस यात्रा के दौरान नेपाली और भारतीय कारोबार जगत के लोगों को संवाद करने और विचारों का आदान-प्रदान करने का अवसर भी मिला।’’
खड़का ने कहा, ‘‘हमारा दृढ़ विश्वास है कि प्रधानमंत्री देउबा ने प्रधानमंत्री मोदी और दिल्ली में अन्य नेताओं एवं उच्च अधिकारियों के साथ जो उच्चस्तरीय वार्ता की, उससे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग एवं समझ को और मजबूत करने में मदद मिली।’’
प्रधानमंत्री देउबा ने प्रधानमंत्री मोदी को नेपाल आने का निमंत्रण दिया, जिसके जवाब में भारतीय नेता ने नेपाल की अपनी पिछली यात्राओं को याद किया और उचित समय पर फिर से यात्रा करने का आश्वासन दिया। (भाषा)
काठमांडू में राजनीतिक उथल-पुथल के बाद पिछले साल जुलाई में पांचवीं बार प्रधानमंत्री बनने के बाद देउबा की यह पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा थी। प्रधानमंत्री के रूप में अपने हर कार्यकाल में देउबा भारत की यात्रा कर चुके हैं। इससे पहले उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में 2017 में भारत की यात्रा की थी।
रविवार देर रात को श्रीलंका के सभी 26 कैबिनेट मंत्रियों ने देश में जारी अब तक के सबसे बुरे आर्थिक संकट के बीच तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया.
पत्रकारों से बात करते हुए देश के शिक्षा मंत्री और सदन के नेता दिनेश गुणावर्धना ने कहा कि कैबिनेट मंत्रियों ने प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया है.
लेकिन उन्होंने इस सामूहिक इस्तीफ़े का कोई कारण नहीं बताया.
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि देश में पैदा हुए आर्थिक संकट से सरकार के निबटने के ‘तरीके’ को लेकर मंत्रियों पर जनता की ओर से भारी दबाव था.
रविवार शाम को श्रीलंका की सड़कों पर आम लोगों का व्यापक विरोध प्रदर्शन देखा गया.
देश के मौजूदा हालात से नाराज़ जनता राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के इस्तीफ़ की मांग कर रही है.
31 मार्च को गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने गोटाबाया राजपक्षे के निजी आवास का घेराव कर बस और सरकारी वाहनों में आग लगा दी थी. इसके बाद सरकार ने देश में आपातकाल घोषित कर दिया था.
इसके बावजूद आम लोगों ने सोशल मीडिया के ज़रिए रविवार को विरोध प्रदर्शनों के लिए सड़कों पर उतरने का एलान किया. जिसके जवाब में सरकार ने 36 घंटे का कर्फ्यू लगा दिया.
रविवार शाम से ही राजनीतिक हलकों में बातें चल रही थीं कि आर्थिक संकट से निपटने के लिए राजपक्षे अंतरिम सरकार का विकल्प चुन सकते हैं. (bbc.com)
पाकिस्तान के संयुक्त विपक्ष का कहना है कि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने देश और संविधान के ख़िलाफ़ खुलेआम विद्रोह किया है, जिसकी सज़ा संविधान के अनुच्छेद 6 में निहित है.
एक संयुक्त बयान में विपक्ष ने कहा है कि विपक्ष स्पीकर समेत सरकार के सभी सदस्यों के रवैये की कड़ी निंदा करता है और उन्हें असंवैधानिक बताता है.
बयान में कहा गया है कि एकजुट विपक्ष ने सदन में अपना स्पष्ट बहुमत साबित कर दिया है.
विपक्ष ने स्थिति का संज्ञान लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के कदम की सराहना की और कहा है कि उम्मीद है कि फ़ैसला संविधान के अनुसार लिया जाएगा.
पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट की प्रतिक्रिया से मैं हैरान हूं: इमरान ख़ान
इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने एक ट्वीट में कहा है कि आम चुनाव की हमारी घोषणा पर पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) की प्रतिक्रिया से वो "आश्चर्यचकित" हैं.
इमरान ख़ान का कहना है, "उन्होंने (पीडीएम) ने आसमान सर पर उठाकर रखा था कि हमारी सरकार नाकाम हो गई और लोगों के बीच अपना समर्थन खो चुकी है तो फिर वो अब चुनाव से क्यों डरते हैं? डेमोक्रेट हमेशा समर्थन के लिए लोगों की ओर रुख करते हैं."
उन्होंने कहा कि क्या पीडीएम के लिए ये बेहतर नहीं है कि वो सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए एक विदेशी साजिश में मदद करने की बजाय चुनाव स्वीकार कर लें.
ट्विटर पर उन्होंने लिखा, "इमरान ख़ान, जो देश के सामने अपने अहंकार को आगे रखता है और इस साजिश में शामिल सभी साजिश में शामिल सभी लोग गंभीर देशद्रोह के दोषी हैं, जिन पर आर्टिकल 6 लागू होता है."
उन्होंने कहा, "पाकिस्तान के दुरुपयोग और संविधान की अपमान को ध्यान में रखा जाएगा."
अविश्वास प्रस्ताव के पीछे विदेशी हस्तक्षेप था: इमरान ख़ान
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली को भंग कर दिया गया है. इसके बाद अब इमरान ख़ान ने पार्टी नेताओं से बातचीत में कहा है कि पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति ने ये साफ कर दिया है कि अविश्वास प्रस्ताव में विदेशी हस्तक्षेप शामिल था.
उन्होंने कहा, "मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि जब मैं शाम को आया तो मुझे आप सभी से कहना था कि आप सब घबराएं नहीं, विपक्ष अब भी समझ नहीं पा रहा है कि क्या हुआ है."
उन्होंने कहा, "सभी सुरक्षा प्रमुख बैठे थे और उनके साथ कई लोग बैठे हुए थे, सामने एक पूरा संदेश था. पाकिस्तान के राजदूत और अमेरिका के प्रतिनिधि डोनाल्ड लो के बीच हुई बैठक पर ध्यान दें."
उन्होंने कहा, "बातचीत का जो ब्योरा जारी किया, उससे ये पुष्टि होती है कि पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की योजना देश के बाहर से बनाई गई थी. वो दूतावास के लोगों से मिल रहे थे, उनसे ऐसा क्या काम था."
इमरान ख़ान ने कहा, "कभी-कभी राजनीतिक दलों के नेताओं से देश की स्थिति के बारे में जानने के लिए मुलाक़ात की जाती है लेकिन उनसे मिलने का क्या मतलब था?"
इमरान ख़ान ने कहा, "मैं कल आपको ये नहीं बता सका था क्योंकि मुझे डर था कि उसकी वजह से विपक्ष आज घबराता नहीं."
बता दें कि इमरान ख़ान ने 2 अप्रैल को देश को संबोधित किया था और लोगों के सवालों के जवाब दिए थे.
इस मौके पर उन्होंने ये कहा था कि विपक्ष के साथ मिलकर अमेरिका ने उनके ख़िलाफ़ साजिश रची है.
पाकिस्तान के पंजाब सूबे में भी सियासी संकट
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने रविवार को पंजाब प्रांत के गवर्नर चौधरी सरवर को बर्ख़ास्त कर दिया और मुख्यमंत्री के चुनाव को टाल दिया गया है.
न्यूज़ एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, नेशनल असेंबली के रास्ते पर चलते हुए पंजाब विधानसभा के डिप्टी स्पीकर सरदार दोस्त मुहम्मद मजारी ने भी इमरान ख़ान की सरकार गिराने को लेकर विदेशी साजिश का हवाला दिया है और मुख्यमंत्री का चुनाव कराने से इनकार कर दिया. अब सत्र 6 अप्रैल तक के लिए टाल दिया गया है.
बाद में स्पीकर के कार्यालय की तरफ़ से बयान सामने आया कि सदन में हंगामे के कारण कार्यवाही स्थगित कर दी गई थी.
बता दें कि पंजाब के मुख्यमंत्री के चुनाव में मुक़ाबला पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ गठबंधन के चौधरी परवेज इलाही और संयुक्त विपक्ष के हमज़ा शहबाज़ के बीच है. हमज़ा, पीएमएल-एन अध्यक्ष और नेशनल असेंबली में विपक्ष के नेता शहबाज़ शरीफ़ के बेटे हैं.
इससे पहले, रविवार की सुबह प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने पंजाब के गवर्नर सरवर को हटाकर उनकी जगह उमर सरफ़राज़ चीमा को नियुक्त कर दिया था.
वहीं सरवर ने लाहौर में एक संवाददाता सम्मेलन में इमरान खान की सरकार पर उन पर असंवैधानिक और अवैध काम करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया है.चौधरी सरवर ने कहा कि पिछले कुछ दिनों से प्रधानमंत्री के सहयोगी उन्हें दो अप्रैल को विधानसभा की बैठक बुलाने और सरकार समर्थित मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की हार पर विधानसभा को भंग करने के लिए दबाव डाल रहे थे.
नेशनल असेंबली भंग करने के इमरान ख़ान के फ़ैसले पर सेना ने क्या कहा
पाकिस्तानी सेना के जनसंपर्क विभाग के प्रमुख मेजर जनरल बाबर इफ्तिखार ने नेशनल असेंबली में एक सवाल के जवाब में कहा है कि आज जो कुछ हुआ है उसका संगठन से कोई लेना-देना नहीं है. सेना का कहना है कि असेंबली भंग होने में सेना की कोई भूमिका नहीं है.
बता दें कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने प्रधानमंत्री इमरान खान के प्रस्ताव पर नेशनल असेंबली भंग करने की मंजूरी दे दी है.
इससे ठीक पहले शनिवार शाम को इमरान ख़ान ने देश को एक बार फिर संबोधित किया था और लोगों के सवालों के जवाब दिए थे. इस दौरान सेना पर किए गए एक सवाल को लेकर उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार को सेना से कोई दिक्कत नहीं है और वो सेना के तटस्थ रहने के फ़ैसले का सम्मान करते हैं.
इमरान ख़ान ने कहा था कि मौजूदा वक्त में पाकिस्तान को सेना और पाकिस्तान तहरीक़ ए इंसाफ़ पार्टी ही इकट्ठा रखे हुए है और पाकिस्तान को एक मजबूत सेना की ज़रूरत है. उन्होंने कहा, ''जो फौज़ को बुरा भला कहते हैं वो फौज़ का नहीं पाकिस्तान का बुरा कर रहे हैं. हमें ऐसी कोई चीज़ नहीं करनी चाहिए जो सेना को नुकसान पहुंचाए.''
नेशनल असेंबली का 'प्रतीकात्मक सत्र' समाप्त, अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 197 वोट
नेशनल असेंबली में मौजूद बीबीसी संवाददाता फरहत जावेद का कहना है कि नेशनल असेंबली में प्रतीकात्मक सत्र अब समाप्त हो गया है.
प्रतीकात्मक सत्र की अगुवाई कर रहे विपक्षी नेता अयाज सादिक ने कहा कि अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 197 वोट डाले गए हैं.
उधर, सुप्रीम कोर्ट के बाहर मौजूद बीबीसी संवाददाता शहज़ाद मलिक ने बताया है कि अदालत के कर्मचारी अब धीरे-धीरे आ रहे हैं और इमरान ख़ान हुकूमत के फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई शुरू होने की संभावना है.
अदालत के बाहर स्पेशल ब्रांच के सुरक्षाकर्मी तैनात हैं जो आमतौर पर अदालत में तब तैनात होते हैं जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को आना होता है.
शहजाद मलिक के मुताबिक पीपीपी महासचिव नैय्यर बुखारी के वकील इस समय कोर्ट के बाहर उनकी तरफ से एक याचिका लेकर पहुंचे हैं.
ये मुल्क से गद्दारी है: बिलावल भुट्टो
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ने कहा है कि पाकिस्तान नेशनल असेंबली के उपाध्यक्ष, अध्यक्ष, राष्ट्रपति और जिसने भी उन्हें अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान करने से रोका, उन्होंने देशद्रोह का अपराध किया है और ये असंवैधानिक कदम था.
पाकिस्तान के एक प्राइवेट टेलीविज़न चैनल जियो न्यूज़ से बात करते हुए उन्होंने कहा कि डिप्टी स्पीकर ने आज जो किया वह असंवैधानिक और गंभीर देशद्रोह की श्रेणी में आता है.
इस संबंध में हमारे वकील सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट तुरंत जवाब देगा. उन्होंने आगे कहा कि इस संबंध में नय्यर बुखारी, लतीफ खोसा पीपीपी की ओर से एक याचिका तैयार कर रहे हैं.
बिलावल भुट्टो ने कहा कि इमरान खान हार गए हैं लेकिन वह अपनी हार नहीं मान रहे हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट संविधान की सर्वोच्चता पर काम करेगा. हम पाकिस्तान को इमरान खान के जंगल के कानून का पालन नहीं करने देंगे.
पाकिस्तान राजनीतिक संकट की ओर, नेशनल असेंबली भंग, विपक्ष का रुख हमलावर
पाकिस्तान के पूर्व कानून मंत्री खालिद रांझा ने मौजूदा राजनीतिक हालात के बारे में कहा है कि इमरान ख़ान की सरकार का ये कदम अवैध है. खालिद रांझा ने कहा कि प्रधानमंत्री इमरान खान का नेशनल असेंबली भंग करने का सुझाव भी असंवैधानिक है.
उधर, बीबीसी संवाददाता हुमैरा कंवल ने नेशनल असेंबली के भीतर के हालात पर बताया है कि वहां सदन में एक प्रतीकात्मक सत्र हो रहा है जिसकी अध्यक्षता विपक्षी नेता अयाज सादिक़ कर रहे हैं. हालांकि सदन में सदस्यों की कुर्सी के पास लगी माइक बंद है और पांचवीं मंजिल पर नेशनल असेंबली के सभी कर्मचारी मौजूद हैं.
इस बीच पंजाब के पूर्व राज्यपाल चौधरी मुहम्मद सरवर को आज इमरान ख़ान हुकूमत ने बर्खास्त कर दिया. चौधरी मुहम्मद सरवर ने लाहौर में एक संवाददाता सम्मेलन में इमरान खान की सरकार पर उन पर असंवैधानिक और अवैध काम करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया है.
चौधरी सरवर ने कहा कि पिछले कुछ दिनों से प्रधानमंत्री के सहयोगी उन्हें दो अप्रैल को विधानसभा की बैठक बुलाने और सरकार समर्थित मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की हार पर विधानसभा को भंग करने के लिए दबाव डाल रहे थे.
चौधरी मुहम्मद सरवर ने दावा किया कि उनसे कहा गया था, "परवेज इलाही हार रहे हैं. आपको विधानसभा सत्र स्थगित कर देना चाहिए. अगर उन्हें 186 वोट नहीं मिले तो विधानसभा भंग कर दें."
राष्ट्रपति ने नेशनल असेंबली भंग करने की मंज़ूरी दी
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने प्रधानमंत्री इमरान खान के प्रस्ताव पर नेशनल असेंबली भंग करने की मंजूरी दे दी है.
राष्ट्रपति कार्यालय द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने नेशनल असेंबली को भंग करने की प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की सिफ़ारिश संविधान के अनुच्छेद 58 (1) के तहत मंज़ूर कर लिया है.
इमरान ख़ान ने की संसद भंग करने की सिफ़ारिश
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने रविवार को देश के नाम संबोधन में कहा कि उन्होंने राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी से असेंबली भंग करने की सिफ़ारिश की है और जनता अब चुनाव की तैयारी करे.
ये एलान उन्होंने नेशनल असेंबली में अपने ख़िलाफ़ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के ख़ारिज होने के बाद सोशल मीडिया पर किया है.
रविवार को प्रस्ताव पर वोटिंग से पहले सदन के डिप्टी स्पीकर क़ासिम सूरी, ने इसे असंवैधानिक बताते हुए ख़ारिज कर दिया. उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव को संविधान के अनुच्छेद 5 का उल्लंघन किया.
इसके बाद प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने देश को संबोधित करते हुए कहा है कि "देश की जनता चुनाव की तैयारी करे. किसी और को इस देश का भविष्य तय करने का अधिकार नहीं, बल्कि यहां के लोग इसे तय करेंगे."
"आज स्पीकर ने अविश्वास प्रस्ताव को ख़ारिज किया है, उसके लिए मैं पूरी कौम को मुबारकबाद देता हूं. कल से सब परेशान थे, मुझसे पूछ रहे थे, मैं उनसे कहना चाहता हूं कि घबराना नहीं है."
"आज स्पीकर ने जिस तरह अपनी संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल कर फ़ैसला लिया है, उसके बाद मैंने राष्ट्रपति को फ़ैसला सौंप दिया है कि वो संसद को भंग कर दें."
प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की सरकार के ख़िलाफ़ वोटिंग से पहले ही नेशनल असेंबली डिप्टी स्पीकर ने अविश्वास प्रस्ताव को ही असंवैधानिक बताते हुए ख़ारिज कर दिया. असेंबली का सत्र के डिप्टी स्पीकर क़ासिम ख़ान सूरी की अध्यक्षता में चल रहा था.
इसके तुरंत बाद, इमरान ख़ान सरकार में सूचना मंत्री फव्वाद चौधरी ने ट्वीट किया कि नेशनल असेंबली को भंग करने की प्रधानमंत्री की सलाह संविधान के अनुच्छेद 58 के तहत राष्ट्रपति डॉ. आरिफ़ अल्वी को भेज दी गई है.
पाकिस्तानी संविधान के अनुच्छेद 58 के अनुसार अगर प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को नेशनल असेंबली भंग करने की सलाह देता है तो राष्ट्रपति को उसे भंग करना होगा. राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री की ओर से सलाह दिए जाने के 48 घंटे बाद संसद ख़ुद-ब-ख़ुद भंग मानी जाएगी.
सरकार ने संविधान का उल्लंघन किया है: बिलावल भुट्टो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ने अविश्वास प्रस्ताव को रद्द कर देने और इसके बाद, प्रधानमंत्री इमरान खान की तरफ से नेशनल असेंबली को भंग करने के प्रस्ताव के बाद कहा है कि सरकार ने संविधान का उल्लंघन किया है."संयुक्त विपक्ष संसद से नहीं जायेगा। हमारे वकील सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं। हम सभी संस्थानों से, पाकिस्तान के संविधान की पवित्रता को बनाए रखने और इसकी रक्षा और बचाव करने की अपील करते हैं. (bbc.com)
उन्होंने इमरान ख़ान और उनके सहयोगियों को देशद्रोह का दोषी ठहराया.
ट्विटर पर उन्होंने लिखा, "इमरान ख़ान, जो देश के सामने अपने अहंकार को आगे रखता है और इस साजिश में शामिल सभी साजिश में शामिल सभी लोग गंभीर देशद्रोह के दोषी हैं, जिन पर आर्टिकल 6 लागू होता है."
उन्होंने कहा, "पाकिस्तान के दुरुपयोग और संविधान की अपमान को ध्यान में रखा जाएगा."
अविश्वास प्रस्ताव के पीछे विदेशी हस्तक्षेप था: इमरान ख़ान
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली को भंग कर दिया गया है. इसके बाद अब इमरान ख़ान ने पार्टी नेताओं से बातचीत में कहा है कि पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति ने ये साफ कर दिया है कि अविश्वास प्रस्ताव में विदेशी हस्तक्षेप शामिल था.
उन्होंने कहा, "मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि जब मैं शाम को आया तो मुझे आप सभी से कहना था कि आप सब घबराएं नहीं, विपक्ष अब भी समझ नहीं पा रहा है कि क्या हुआ है."
उन्होंने कहा, "सभी सुरक्षा प्रमुख बैठे थे और उनके साथ कई लोग बैठे हुए थे, सामने एक पूरा संदेश था. पाकिस्तान के राजदूत और अमेरिका के प्रतिनिधि डोनाल्ड लो के बीच हुई बैठक पर ध्यान दें."
उन्होंने कहा, "बातचीत का जो ब्योरा जारी किया, उससे ये पुष्टि होती है कि पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की योजना देश के बाहर से बनाई गई थी. वो दूतावास के लोगों से मिल रहे थे, उनसे ऐसा क्या काम था."
इमरान ख़ान ने कहा, "कभी-कभी राजनीतिक दलों के नेताओं से देश की स्थिति के बारे में जानने के लिए मुलाक़ात की जाती है लेकिन उनसे मिलने का क्या मतलब था?"
इमरान ख़ान ने कहा, "मैं कल आपको ये नहीं बता सका था क्योंकि मुझे डर था कि उसकी वजह से विपक्ष आज घबराता नहीं."
बता दें कि इमरान ख़ान ने 2 अप्रैल को देश को संबोधित किया था और लोगों के सवालों के जवाब दिए थे.
इस मौके पर उन्होंने ये कहा था कि विपक्ष के साथ मिलकर अमेरिका ने उनके ख़िलाफ़ साजिश रची है.
पाकिस्तान के पंजाब सूबे में भी सियासी संकट
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने रविवार को पंजाब प्रांत के गवर्नर चौधरी सरवर को बर्ख़ास्त कर दिया और मुख्यमंत्री के चुनाव को टाल दिया गया है.
न्यूज़ एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, नेशनल असेंबली के रास्ते पर चलते हुए पंजाब विधानसभा के डिप्टी स्पीकर सरदार दोस्त मुहम्मद मजारी ने भी इमरान ख़ान की सरकार गिराने को लेकर विदेशी साजिश का हवाला दिया है और मुख्यमंत्री का चुनाव कराने से इनकार कर दिया. अब सत्र 6 अप्रैल तक के लिए टाल दिया गया है.
बाद में स्पीकर के कार्यालय की तरफ़ से बयान सामने आया कि सदन में हंगामे के कारण कार्यवाही स्थगित कर दी गई थी.
बता दें कि पंजाब के मुख्यमंत्री के चुनाव में मुक़ाबला पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ गठबंधन के चौधरी परवेज इलाही और संयुक्त विपक्ष के हमज़ा शहबाज़ के बीच है. हमज़ा, पीएमएल-एन अध्यक्ष और नेशनल असेंबली में विपक्ष के नेता शहबाज़ शरीफ़ के बेटे हैं.
इससे पहले, रविवार की सुबह प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने पंजाब के गवर्नर सरवर को हटाकर उनकी जगह उमर सरफ़राज़ चीमा को नियुक्त कर दिया था.
वहीं सरवर ने लाहौर में एक संवाददाता सम्मेलन में इमरान खान की सरकार पर उन पर असंवैधानिक और अवैध काम करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया है.चौधरी सरवर ने कहा कि पिछले कुछ दिनों से प्रधानमंत्री के सहयोगी उन्हें दो अप्रैल को विधानसभा की बैठक बुलाने और सरकार समर्थित मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की हार पर विधानसभा को भंग करने के लिए दबाव डाल रहे थे.
नेशनल असेंबली भंग करने के इमरान ख़ान के फ़ैसले पर सेना ने क्या कहा
पाकिस्तानी सेना के जनसंपर्क विभाग के प्रमुख मेजर जनरल बाबर इफ्तिखार ने नेशनल असेंबली में एक सवाल के जवाब में कहा है कि आज जो कुछ हुआ है उसका संगठन से कोई लेना-देना नहीं है. सेना का कहना है कि असेंबली भंग होने में सेना की कोई भूमिका नहीं है.
बता दें कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने प्रधानमंत्री इमरान खान के प्रस्ताव पर नेशनल असेंबली भंग करने की मंजूरी दे दी है.
इससे ठीक पहले शनिवार शाम को इमरान ख़ान ने देश को एक बार फिर संबोधित किया था और लोगों के सवालों के जवाब दिए थे. इस दौरान सेना पर किए गए एक सवाल को लेकर उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार को सेना से कोई दिक्कत नहीं है और वो सेना के तटस्थ रहने के फ़ैसले का सम्मान करते हैं.
इमरान ख़ान ने कहा था कि मौजूदा वक्त में पाकिस्तान को सेना और पाकिस्तान तहरीक़ ए इंसाफ़ पार्टी ही इकट्ठा रखे हुए है और पाकिस्तान को एक मजबूत सेना की ज़रूरत है. उन्होंने कहा, ''जो फौज़ को बुरा भला कहते हैं वो फौज़ का नहीं पाकिस्तान का बुरा कर रहे हैं. हमें ऐसी कोई चीज़ नहीं करनी चाहिए जो सेना को नुकसान पहुंचाए.''
नेशनल असेंबली का 'प्रतीकात्मक सत्र' समाप्त, अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 197 वोट
नेशनल असेंबली में मौजूद बीबीसी संवाददाता फरहत जावेद का कहना है कि नेशनल असेंबली में प्रतीकात्मक सत्र अब समाप्त हो गया है.
प्रतीकात्मक सत्र की अगुवाई कर रहे विपक्षी नेता अयाज सादिक ने कहा कि अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 197 वोट डाले गए हैं.
उधर, सुप्रीम कोर्ट के बाहर मौजूद बीबीसी संवाददाता शहज़ाद मलिक ने बताया है कि अदालत के कर्मचारी अब धीरे-धीरे आ रहे हैं और इमरान ख़ान हुकूमत के फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई शुरू होने की संभावना है.
अदालत के बाहर स्पेशल ब्रांच के सुरक्षाकर्मी तैनात हैं जो आमतौर पर अदालत में तब तैनात होते हैं जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को आना होता है.
शहजाद मलिक के मुताबिक पीपीपी महासचिव नैय्यर बुखारी के वकील इस समय कोर्ट के बाहर उनकी तरफ से एक याचिका लेकर पहुंचे हैं.
ये मुल्क से गद्दारी है: बिलावल भुट्टो
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ने कहा है कि पाकिस्तान नेशनल असेंबली के उपाध्यक्ष, अध्यक्ष, राष्ट्रपति और जिसने भी उन्हें अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान करने से रोका, उन्होंने देशद्रोह का अपराध किया है और ये असंवैधानिक कदम था.
पाकिस्तान के एक प्राइवेट टेलीविज़न चैनल जियो न्यूज़ से बात करते हुए उन्होंने कहा कि डिप्टी स्पीकर ने आज जो किया वह असंवैधानिक और गंभीर देशद्रोह की श्रेणी में आता है.
इस संबंध में हमारे वकील सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट तुरंत जवाब देगा. उन्होंने आगे कहा कि इस संबंध में नय्यर बुखारी, लतीफ खोसा पीपीपी की ओर से एक याचिका तैयार कर रहे हैं.
बिलावल भुट्टो ने कहा कि इमरान खान हार गए हैं लेकिन वह अपनी हार नहीं मान रहे हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट संविधान की सर्वोच्चता पर काम करेगा. हम पाकिस्तान को इमरान खान के जंगल के कानून का पालन नहीं करने देंगे.
पाकिस्तान राजनीतिक संकट की ओर, नेशनल असेंबली भंग, विपक्ष का रुख हमलावर
पाकिस्तान के पूर्व कानून मंत्री खालिद रांझा ने मौजूदा राजनीतिक हालात के बारे में कहा है कि इमरान ख़ान की सरकार का ये कदम अवैध है. खालिद रांझा ने कहा कि प्रधानमंत्री इमरान खान का नेशनल असेंबली भंग करने का सुझाव भी असंवैधानिक है.
उधर, बीबीसी संवाददाता हुमैरा कंवल ने नेशनल असेंबली के भीतर के हालात पर बताया है कि वहां सदन में एक प्रतीकात्मक सत्र हो रहा है जिसकी अध्यक्षता विपक्षी नेता अयाज सादिक़ कर रहे हैं. हालांकि सदन में सदस्यों की कुर्सी के पास लगी माइक बंद है और पांचवीं मंजिल पर नेशनल असेंबली के सभी कर्मचारी मौजूद हैं.
इस बीच पंजाब के पूर्व राज्यपाल चौधरी मुहम्मद सरवर को आज इमरान ख़ान हुकूमत ने बर्खास्त कर दिया. चौधरी मुहम्मद सरवर ने लाहौर में एक संवाददाता सम्मेलन में इमरान खान की सरकार पर उन पर असंवैधानिक और अवैध काम करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया है.
चौधरी सरवर ने कहा कि पिछले कुछ दिनों से प्रधानमंत्री के सहयोगी उन्हें दो अप्रैल को विधानसभा की बैठक बुलाने और सरकार समर्थित मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की हार पर विधानसभा को भंग करने के लिए दबाव डाल रहे थे.
चौधरी मुहम्मद सरवर ने दावा किया कि उनसे कहा गया था, "परवेज इलाही हार रहे हैं. आपको विधानसभा सत्र स्थगित कर देना चाहिए. अगर उन्हें 186 वोट नहीं मिले तो विधानसभा भंग कर दें."
राष्ट्रपति ने नेशनल असेंबली भंग करने की मंज़ूरी दी
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने प्रधानमंत्री इमरान खान के प्रस्ताव पर नेशनल असेंबली भंग करने की मंजूरी दे दी है.
राष्ट्रपति कार्यालय द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने नेशनल असेंबली को भंग करने की प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की सिफ़ारिश संविधान के अनुच्छेद 58 (1) के तहत मंज़ूर कर लिया है.
इमरान ख़ान ने की संसद भंग करने की सिफ़ारिश
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने रविवार को देश के नाम संबोधन में कहा कि उन्होंने राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी से असेंबली भंग करने की सिफ़ारिश की है और जनता अब चुनाव की तैयारी करे.
ये एलान उन्होंने नेशनल असेंबली में अपने ख़िलाफ़ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के ख़ारिज होने के बाद सोशल मीडिया पर किया है.
रविवार को प्रस्ताव पर वोटिंग से पहले सदन के डिप्टी स्पीकर क़ासिम सूरी, ने इसे असंवैधानिक बताते हुए ख़ारिज कर दिया. उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव को संविधान के अनुच्छेद 5 का उल्लंघन किया.
इसके बाद प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने देश को संबोधित करते हुए कहा है कि "देश की जनता चुनाव की तैयारी करे. किसी और को इस देश का भविष्य तय करने का अधिकार नहीं, बल्कि यहां के लोग इसे तय करेंगे."
"आज स्पीकर ने अविश्वास प्रस्ताव को ख़ारिज किया है, उसके लिए मैं पूरी कौम को मुबारकबाद देता हूं. कल से सब परेशान थे, मुझसे पूछ रहे थे, मैं उनसे कहना चाहता हूं कि घबराना नहीं है."
"आज स्पीकर ने जिस तरह अपनी संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल कर फ़ैसला लिया है, उसके बाद मैंने राष्ट्रपति को फ़ैसला सौंप दिया है कि वो संसद को भंग कर दें."
प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की सरकार के ख़िलाफ़ वोटिंग से पहले ही नेशनल असेंबली डिप्टी स्पीकर ने अविश्वास प्रस्ताव को ही असंवैधानिक बताते हुए ख़ारिज कर दिया. असेंबली का सत्र के डिप्टी स्पीकर क़ासिम ख़ान सूरी की अध्यक्षता में चल रहा था.
अनुच्छेद 58 क्या कहता है?
इसके तुरंत बाद, इमरान ख़ान सरकार में सूचना मंत्री फव्वाद चौधरी ने ट्वीट किया कि नेशनल असेंबली को भंग करने की प्रधानमंत्री की सलाह संविधान के अनुच्छेद 58 के तहत राष्ट्रपति डॉ. आरिफ़ अल्वी को भेज दी गई है.
पाकिस्तानी संविधान के अनुच्छेद 58 के अनुसार अगर प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को नेशनल असेंबली भंग करने की सलाह देता है तो राष्ट्रपति को उसे भंग करना होगा. राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री की ओर से सलाह दिए जाने के 48 घंटे बाद संसद ख़ुद-ब-ख़ुद भंग मानी जाएगी.
सरकार ने संविधान का उल्लंघन किया है: बिलावल भुट्टो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ने अविश्वास प्रस्ताव को रद्द कर देने और इसके बाद, प्रधानमंत्री इमरान खान की तरफ से नेशनल असेंबली को भंग करने के प्रस्ताव के बाद कहा है कि सरकार ने संविधान का उल्लंघन किया है."संयुक्त विपक्ष संसद से नहीं जायेगा। हमारे वकील सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं। हम सभी संस्थानों से, पाकिस्तान के संविधान की पवित्रता को बनाए रखने और इसकी रक्षा और बचाव करने की अपील करते हैं. (bbc.com)
-विनीत खरे
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए राष्ट्रपति डॉ आरिफ़ अल्वी ने नेशनल असेंबली को भंग कर दिया है. रविवार को इमरान ख़ान ने हैरान करने वाला क़दम उठाते हुए राष्ट्रपति को संसद भंग करने की सलाह दी थी.
प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के खिलाफ़ वोटिंग से पहले ही नेशनल एसेंबली के डिप्टी स्पीकर क़ासिम सूरी ने अविश्वास प्रस्ताव को असंवैधानिक बताते हुए ख़ारिज़ कर दिया. डिप्टी स्पीकर सूरी ने कहा कि ये अविश्वास प्रस्ताव संविधान के अनुच्छेद 5 के ख़िलाफ़ है.
पाकिस्तान के राष्ट्रपति के कार्यालय से जारी बयान में कहा गया है, "पाकिस्तान के राष्ट्रपति डॉ आरिफ़ अल्वी ने प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के नेशनल असेंबली भंग करने की सलाह को मंज़ूरी दे दी है. ऐसा पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 58 (1) और 48 (1) के तहत किया गया है."
विपक्षी नेता सरकार के इस कदम से खासे नाराज़ हैं. शहबाज़ शरीफ़ ने विधानसभा भंग करने के प्रस्ताव को लेकर इमरान ख़ान पर ''गंभीर राजद्रोह'' का आरोप लगाया है.
इमरान ख़ान का आरोप है कि प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए विपक्ष अमरीका से मिला है. इस बारे में उन्होंने कथित चिट्ठी एक रैली में दिखाई थी और उसे सुबूत बताया था.
अमेरिका ने इन आरोपों से इनकार किया. सरकार के एक पूर्व मंत्री के मुताबिक़, चुनाव अगले 90 दिनों में होंगे.
बीबीसी ने डिप्टी स्पीकर और इमरान ख़ान के नेतृत्व वाली सरकार के कदम पर पाकिस्तान में संविधान के जानकारों से बात की.
सवाल ये है कि अगर इनको ये पता था कि इन्हें ये चिट्ठी सात मार्च को मिली थी, तो सात मार्च से लेकर 27 मार्च तक जब उन्होंने जलसे में इसे जेब से निकाला, तब तक क्यों नहीं दिखाया कि इसमें क्या लिखा है.
जिस मुल्क़ के ख़िलाफ़ ये बात कर रहे हैं उसने साफ़तौर पर इससे इनकार किया है. ये बिल्कुल बेहूदा किस्म की हरकत है जिससे इस मुल्क़ को फायदे की जगह बहुत नुकसान पहुंचेगा.
पाकिस्तान के 75 साल के इतिहास में आज तक ऐस कदम नहीं लिया गया. जिसके खिलाफ़ नो-कॉन्फ़िडेंस की मोशन पेश की जाती है, उसका इख़्तियार ख़त्म हो जाता है, उस वक्त तक जब तक वो कॉन्फ़िडेंस बहाल न कर ले.
पूरी दुनिया के साथ हमारे रिश्ते हैं, ताल्लुकात हैं. उस पर इसका असर पड़ेगा.
ये एक यूनिक तरह का कदम है. जिन मुल्क़ों में लोकतंत्र है, संविधान का ज़ोर है, ऐसे मुल्कों में मैंने इस तरह की बात नहीं सुनी.
मुझे यकीन है कि सुप्रीम कोर्ट इस कदम को ग़ैर-संवैधानिक करार दे देगा.
अगर ऐसा न हुआ तो आम लोग सड़कों पर निकलेंगे जिससे इस मुल्क को बहुत ज़्यादा नुकसान पहुंचेगा. इस मुल्क में जो अस्थिरता है, वो और बढ़ेगी.
आबिद साक़ी, पूर्व वाइस चेयरमैन, पाकिस्तान बार काउंसिल
डिप्टी स्पीकर का कदम पूरी तरह से ग़ैर-संवैधानिक है. उसकी ज़रूरत नहीं थी और वो अन्यायपूर्ण है. ये कदम लोकतंत्र के सभी कायदों के ख़िलाफ़ है.
इस कदम से उन्होंने (इमरान ख़ान ने) देश को संवैधानिक संकट में डाल दिया है. मामला बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है और ये अदालत में जाएगा.
प्रधानमंत्री ने असेंबली को भंग किए जाने की सलाह दे दी है. हालांकि, आर्टिकल 58 के तहत वो ऐसी सलाह नहीं दे सकते क्योंकि उनके खिलाफ़ नो-कॉन्फिडेंस की मोशन मूव हो चुका था.
और उसकी मौजूदगी में उनकी सिफ़ारिश संवैधानिक तौर पर अनुचित है. आर्टिकल 58 ये कहता है.
लेकिन अगर ऐसा हो जाए और राष्ट्रपति का आदेश आ जाए कि आर्टिकल 58 के तहत सब चीज़ें भंग कर दी गई हैं तो फिर ज़ाहिर है चीज़ें अलग दिशा में जाएंगी और आख़िरकार संविधान के संरक्षक के तौर पर सुप्रीम कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ेगा. मेरे ख्याल से इसके अलावा कोई विकल्प रह नहीं जाता.
एक तरफ़ स्पीकर की रूलिंग है, उसमें आमतौर पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, लेकिन सुप्रीम कोर्ट को जुडिशियल रिव्यू का इख़्तियार हासिल है.
जहां भी ऐसी स्थिति हो, आख़िरी फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट का होता है.
कुछ चीज़ें बेहद महत्वपूर्ण हैं. क्या नो-कॉन्फ़िडेंस मोशन लाने के बाद, क्या वो असेंबली को भंग करने की सलाह दे सकते हैं?
दूसरा सवाल ये कि जब नो-कॉन्फ़िडेंस मोशन का दिन था, या वोटिंग होने वाली थी, उस स्टेज पर बिनी किसी वजह के या किसी और बुनियाद के क्या तहरीर को खत्म किया जा सकता था?
सैद्धांतिक तौर पर, जो इमरान खान ने किया, उसका कोई भी संवैधानिक आधार नहीं है. जब नो-कॉन्फ़िडेंस मोशन का प्रोसेस शुरू हो जाए, तो उसे अपने अंजाम तक पहुंचने देना चाहिए था.
आएशा सिद्दीका, लेखक, लंदन
जो उन्होंने किया वो संवैधानिक तौर पर गलत है. विपक्ष सुप्रीम कोर्ट गई है. सुप्रीम कोर्ट को फ़ैसला लेना है.
मामला संवैधानिक तौर पर संगीन है. क्या डिप्टी स्पीकर नो-कॉन्फ़िडेंस वोट को इस तरह निरस्त कर सकते हैं या नहीं, मेरे ख़्याल से ये मामला सुलझना चाहिए.
जो बात समझ में आ रही है वो ये है कि असेंबली स्पीकर ने कहा कि ये नहीं होना चाहिए , तो उन्होंने ये सेशन डिप्टी-स्पीकर से करवाया है.
केपीके में जो चुनावी नतीजे आए हैं, उसे देखकर वो (इमरान) चाह रहे हैं कि चुनाव जल्द हों.
ऐसा लग रहा है कि इमरान खान चाह रहे हैं कि स्थिति का फ़ायदा उठाकर चुनाव में जाएं.
वो इतना संकट पैदा कर चुके हैं कि उन्हें उम्मीद बढ़ गई है कि लोग उन्हें वोट करेंगे, और मुझे ऐसा लगता है कि उनके इस प्रोपोगैंडा का थोड़ा कुछ असर पड़ेगा. (bbc.com)
कोलंबो, तीन अप्रैल (भाषा)। श्रीलंका में 36 घंटों के राष्ट्रव्यापी कर्फ्यू का उल्लंघन करने और बदहाल आर्थिक संकट के मद्देनजर सरकार-विरोधी रैली आयोजित करने पर पुलिस ने मध्य प्रांत के एक विश्वविद्यालय के छात्रों पर आंसू गैस के गोल दागे और पानी की बौछार कर उन्हें तितर-बितर करने का प्रयास किया।
वहीं, आर्थिक संकट का सामना कर रहे श्रीलंका को इस समस्या से उबारने के लिए सर्वदलीय कार्यवाहक सरकार के गठन की मांग जोर पकड़ने लगी है।
श्रीलंका अपने इतिहास के सबसे बुरे आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। पिछले कई सप्ताह से देश की जनता को ईंधन और रसोई गैस के लिए लंबी कतारों में खड़े होने के साथ-साथ आवश्यक वस्तुओं की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
राष्ट्रपति गोटाबायो राजपक्षे ने शुक्रवार की देर रात एक विशेष गज़ट अधिसूचना जारी करके श्रीलंका में एक अप्रैल से तत्काल प्रभाव से आपातकाल लगा दिया था। सरकार ने शनिवार शाम छह बजे से सोमवार तड़के छह बजे तक के लिए राष्ट्रव्यापी कर्फ्यू की घोषणा की है।
सरकार ने रविवार को सोशल मीडिया तक जनता की पहुंच को समाप्त करने के लिए इंटरनेट सेवा पर रोक लगाने का आदेश दिया था तथा लोगों के एक जगह इकट्ठा होने पर रोक लगा दी थी।
उधर, श्रीलंका सरकार ने व्हाट्सऐप, ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया मंचों पर लगाया गया प्रतिबंध रविवार को हटा दिया। देश में बदतर आर्थिक संकट को लेकर सरकार विरोधी प्रदर्शन से पहले देशव्यापी सार्वजनिक आपातकाल घोषित करने और 36 घंटे के कर्फ्यू के साथ ही सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
प्रतिबंध हटाए जाने के बारे में एक अधिकारी ने कहा कि फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, टोकटोक, स्नैपचैट, व्हाट्सऐप, वाइबर, टेलीग्राम और फेसबुक मैसेंजर की सेवाएं 15 घंटे के बाद बहाल कर दी गईं।
इन सेवाओं को पूरी तरह या आंशिक रूप से अवरुद्ध कर दिया गया था।
राजपक्षे के भतीजे एवं खेल मंत्री नमल राजपक्षे ने संवाददाताओं से कहा कि इंटरनेट सेवा पर प्रतिबंध अनुपयोगी है, क्योंकि बहुत सारे लोग सोशल मीडिया साइट से जुड़ने के लिए वीपीएन का इस्तेमाल करेंगे।
इससे पहले ‘कोलंबो पेज’ अखबार की खबर में कहा गया था कि इस कदम का उद्देश्य घंटों तक बिजली कटौती के बीच भोजन, आवश्यक वस्तुओं, ईंधन और दवाओं की कमी से जूझ रहे लोगों को राहत पहुंचाने में सरकार की नाकामी के विरोध में कोलंबो में लोगों को एकत्रित होने से रोकना है।
श्रीलंका में मुख्य विपक्षी दल समागी जन बलवेगया (एसजेबी) के सांसदों ने कर्फ्यू आदेशों की अवज्ञा करते हुए रविवार को यहां प्रदर्शन किया। विपक्षी दल के सांसद, देश में अब तक के सबसे खराब आर्थिक संकट के बीच आपातकाल और अन्य पाबंदियां लगाने के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे कदम का विरोध कर रहे हैं।
विपक्षी सांसद हर्षा डी सिल्वा ने कहा, ‘‘हम श्रीलंका में लोकतंत्र की रक्षा करेंगे।’’
विपक्षी सांसदों ने कोलंबो के इंडीपेंडेंस स्क्वायर की ओर मार्च करते हुए नारे लगाए और तख्तियां दिखायी, जिन पर लिखा था : ‘‘दमन बंद करो’’ और ‘‘गोटा घर जाओ’’।
पुलिस अधिकारियों ने स्क्वायर तक जाने वाले रास्तों पर अवरोधक लगा दिए। यह स्क्वायर 1948 में श्रीलंका की आजादी की याद में बनाया गया था।
इस बीच, स्थानीय मीडिया की खबर के अनुसार, श्रीलंकाई पुलिस ने कर्फ्यू का उल्लंघन करने पर देश के पश्चिमी प्रांत में 664 लोगों को गिरफ्तार किया। ये गिरफ्तारियां शनिवार रात 10 बजे से रविवार सुबह छह बजे के बीच चले अभियान के दौरान की गईं।
मध्य प्रांत में पेराडेनिया विश्वविद्यालय के सैकड़ों छात्र और शिक्षक देश के मौजूदा हालात के खिलाफ प्रदर्शन करने सड़क पर उतरे। हालांकि, पुलिस ने उन्हें तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े और पानी की बौछार की।
राजपक्षे ने अपनी सरकार के कदमों का बचाव करते हुए कहा है कि विदेशी मुद्रा का संकट उनके द्वारा नहीं पैदा किया गया है और आर्थिक मंदी काफी हद तक महामारी के कारण आयी है।
पुलिस ने बताया कि जबरदस्त बिजली कटौती के विरोध में राष्ट्रपति राजपक्षे के आवास के बाहर प्रदर्शन के दौरान 53 वर्षीय व्यक्ति बिज₨ली के खंभे पर चढ़ गया, जिससे वह करंट की चपेट में आ गया।
इस बीच, पूर्व मंत्री विमल वीरवानसा ने देश में जारी संकट से निपटने के लिए एक सर्वदलीय कार्यवाहक सरकार के गठन का आह्वान किया।
उन्होंने रविवार को संवाददाताओं से कहा कि इस बाबत राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के समक्ष प्रस्ताव पेश किया गया है, जिस पर दोनों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है।
वीरवानसा ने कहा कि उन्होंने पूर्व मंत्री उदय गमनपिला, वासुदेव एन और तिरन एलेस के साथ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ हुई बैठक में हिस्सा लिया।
पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी महेला जयवर्धने ने कहा कि श्रीलंका की अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण करने वाले चुनिंदा लोगों ने जनता का भरोसा खो दिया है और उन्हें हटना चाहिए।
उन्होंने एक बयान में कहा कि ये समस्याएं मानव-निर्मित हैं और इन्हें सही व योग्य लोगों द्वारा सुलझाया जा सकता है।
द हिंदू में छपी ख़बर के अनुसार, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि कोरोना वायरस के एक नए वेरिएंट का पता चला है जिसका नाम XE है. माना जा रहा है कि इस नए वेरिएंट के ट्रांसमिशन की दर काफ़ी ज़्यादा होगी.
डब्ल्यूएचओ ने अपने साप्ताहिक महामारी अपडेट में कहा कि 19 जनवरी को ब्रिट्रेन में इस रिकॉम्बिनेंट का पता चला था और तब से 600 से अधिक सीक्वेंस रिपोर्ट किए गए हैं, जिनकी पुष्टि हुई है.
डब्ल्यूएचओ ने अपने अपडेट में बताया कि प्रारंभिक अध्ययनों से संकेत मिला है कि XE वेरिएंट के संक्रमण की रफ्तार BA.2 वेरिएंट की तुलना में करीब 10 फीसदी अधिक है. हालांकि पुख्ता जानकारी के लिए और भी अध्ययन करने की ज़रूरत है.
डब्लूएचओ का कहना है कि अब तक कोविड-19 के तीन रिकॉम्बिनेंट स्ट्रेन का पता चला है, जिसमें से पहला- XD, दूसरा- XF और तीसरा- XE है. इनमें से पहले और दूसरे वेरिएंट डेल्टा और ओमिक्रॉन के कॉम्बिनेशन से पैदा हुए हैं, जबकि तीसरा ओमिक्रॉन सब-वेरिएंट का हाइब्रिड स्ट्रेन है. (bbc.com)
अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू में छपी ख़बर के अनुसार, श्रीलंका में बढ़ते आर्थिक संकट से निपटने में फ़ेल होती सरकार के विरोध में बड़े नागरिक विरोध प्रदर्शन की योजना के मद्देनज़र देश में वीकेंड पर कर्फ़्यू की घोषणा की गई है.
पुलिस का कहना है कि कर्फ़्यू शनिवार से लेकर सोमवार की सुबह तक लगा रहेगा.
इससे एक दिन पहले शुक्रवार को राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने देश में आपातकाल का एलान किया जिसमें सुरक्षा बलों को बिना वारंट के लोगों को हिरासत में लेने की छूट दी गई.
दरअसल गुरुवार को श्रीलंका के राष्ट्रपति आवास के बाहर हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन के बाद ये फ़ैसला लिया गया.
प्रदर्शनकारियों ने कोलंबो में राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के निजी आवास के पास बैरिकेड्स पर धावा बोल दिया था और वाहनों में आग लगा दी थी.
ये विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुआ था, लेकिन प्रदर्शन में शामिल होने वालों का दावा है कि जब पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे, पानी की बौछार की और लोगों को मारने लगी तब ये प्रदर्शन हिंसक हो गए. (bbc.com)


