विचार / लेख
भारत में बीते दिनों कई न्यूज प्लेटफॉर्मों और न्यूज कंटेंट क्रिएटरों के सोशल मीडिया अकाउंटों पर पाबंदी लगा दी गई। प्रेस क्लब ने इसे ‘ऑनलाइन सेंसरशिप’ करार देते हुए ‘मनमाना और संविधान का उल्लंघन’ करने वाला बताया है।
डॉयचे वैले पर आदर्श शर्मा का लिखा-
राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया है कि भारत सरकार के निर्देश पर कई न्यूज प्लेटफॉर्मों, न्यूज कॉटेंट क्रिएटरों, इन्फ्लूएंसरों और अन्य अकाउंटों पर पाबंदी लगाई गई है। उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा, ‘4पीएम का यूट्यूब चैनल बंद किया गया। फेसबुक ने नेशनल दस्तक, मॉलिटिक्स और राजीव निगम का अकाउंट बंद कर दिया। कश्मीर के ग्रेटर कश्मीर, राइजिंग कश्मीर समेत कई अकाउंटों को मेटा ने बंद किया है। ट्विटर पर एक्टिविस्ट संदीप और डॉक्टर निमो यादव के अकाउंटों को भी बंद किया गया।’
योगेंद्र यादव ने बीजेपी शासित केंद्र सरकार पर ‘पोस्टमैन’ को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। यहां पोस्टमैन से उनका आशय उन डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों से है, जो जनता तक खबरें पहुंचाते हैं। योगेंद्र यादव ने कहा, ‘सोशल मीडिया अब इस सरकार के खिलाफ हो रहा है और सरकार डर रही है। घबराई हुई, बौखलाई हुई, डरी हुई सरकार क्या करती है, पोस्टमैन को पकडऩे की कोशिश करती है कि तुम्हें (ये काम) नहीं करने देंगे।’
‘डिजिटल प्लेटफॉर्मों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही सरकार’
न्यूज प्लेटफॉर्म ‘मॉलिटिक्स’ ने इस मुद्दे पर 2 अप्रैल को ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया। इसमें शामिल हुए 'आम आदमी पार्टी' के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि अगर सभी यूट्यूब चैनलों पर इस तरह की निगरानी शुरू हो गई, तो कोई भी सही खबर नहीं दिखा पाएगा। उन्होंने आरोप लगाया, ‘सरकार पहले ही टीवी मीडिया को नियंत्रित कर चुकी है और अब डिजिटल प्लेटफॉर्मों को भी नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है।’
संदीप सिंह का एक्स अकाउंट भी भारत में बंद कर दिया गया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने हाथों में जंजीर बांधकर इसका विरोध कियासंदीप सिंह का एक्स अकाउंट भी भारत में बंद कर दिया गया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने हाथों में जंजीर बांधकर इसका विरोध किया
इससे पहले संजय सिंह ने भी संसद में यह मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पूंजीपतियों को फायदा पहुंचा रही है और उसके विरोध में उठती आवाजों को निशाना बना रही है।
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने भी इस मुद्दे को संसद में उठाया। उन्होंने भी आरोप लगाया कि सरकार की आलोचना को देश की आलोचना बना दिया गया है, ‘मेरे देश और मेरी सरकार में फर्क है। ये फर्क 75 साल पहले भी था और ये फर्क 75 साल बाद भी रहना चाहिए।’
‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ ने भी इस विषय पर चिंता जाहिर करते हुए कहा, ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर सरकार की आलोचना करने वाले कंटेंट को निशाना बनाते हुए जारी किए गए टेकडाउन आदेशों पर गहरी चिंता व्यक्त करता है, जहां क्रिएटरों को ब्लॉक कर दिया गया है या उनका कंटेंट हटा दिया गया है।’
प्रेस क्लब ने इस कार्रवाई को ‘ऑनलाइन सेंसरशिप’ करार देते हए कहा कि यह ‘मनमानी और संविधान का उल्लंघन’ करने वाली है।
‘बिना किसी नोटिस के बंद कर दिया गया फेसबुक पेज’
न्यूज प्लेटफॉर्म ‘मॉलिटिक्स’ के फेसबुक अकाउंट को करीब 4,48,000 लोग फॉलो करते थे। मॉलिटिक्स की डिप्टी एडिटर निवेदिता शांडिल्य के मुताबिक, 28 मार्च को रात 2 बजे के बाद मेटा की ओर से नोटिफिकेशन आया, ‘सूचना प्रौद्योगिकी कानून 2000 के सेक्शन 79(3)(बी) के तहत, भारत सरकार/कानून प्रवर्तन से मिले नोटिस के आधार पर भारत में आपके कंटेंट तक पहुंच को रोक दिया गया है।’
निवेदिता ने डीडब्ल्यू हिंदी को बताया कि इससे पहले मॉलिटिक्स को सरकार या मेटा की ओर से कोई नोटिस नहीं मिला था और अचानक ही उनके अकाउंट को भारत में बैन कर दिया गया। निवेदिता के मुताबिक, पेज को बैन करने के पीछे कोई वजह भी नहीं बताई गई है। उन्होंने बताया कि मॉलिटिक्स की टीम इस कार्रवाई के खिलाफ कानूनों विकल्पों पर विचार कर रही है और दिल्ली हाईकोर्ट जाने की योजना बना रही है।
12 साल पुराना फेसबुक पेज झटके में बंद हुआ
‘नेशनल दस्तक’ नाम का न्यूज प्लेटफॉर्म चलाने वाले शंभू कुमार सिंह बताते हैं कि उनका फेसबुक पेज करीब 12 साल पुराना था और सरकार के निर्देश पर उसे डाउन कर दिया गया। फेसबुक पर नेशनल दस्तक को करीब 14 लाख लोग फॉलो करते थे।
शंभू कुमार ने डीडब्ल्यू हिंदी से बातचीत में कहा कि नेशनल दस्तक के जरिए हाशिये पर मौजूद समुदायों की आवाज उठाई जाती थी, जिनमें एससी-एसटी, ओबीसी वर्ग, महिलाएं और किसान शामिल हैं।
उन्होंने बताया कि मॉलिटिक्स की तरह, उनका पेज भी अचानक भारत में बंद कर दिया गया और इस कार्रवाई से पहले उन्हें किसी भी तरह का कोई नोटिस नहीं भेजा गया था। उन्होंने कहा कि वे कोई संस्थागत मीडिया हाउस नहीं हैं, उनके लिए कोई कानूनी या आर्थिक सहायता उपलब्ध नहीं है, इसलिए वे फिलहाल कोर्ट जाने के बारे में नहीं सोच रहे हैं बल्कि फेसबुक की शर्तों को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।
इस मामले पर सरकार की ओर से आधिकारिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है। डीडब्ल्यू हिंदी ने सोशल मीडिया अकाउंटों पर पाबंदी के मुद्दे पर भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से टिप्पणी का अनुरोध किया था, लेकिन खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला। (dw.com/hi)


