विचार / लेख
-मोहम्मद हनीफ
बाबू और ब्यूरोक्रेट्स, चाहे वे कहीं से भी हों, काफ़ी पढ़े-लिखे होते हैं और थोड़े चालाक भी होते हैं। क़ानून की किताब से कोई बारीक सी बात निकालकर उसके पीछे पड़ जाते हैं।
उन्हें अपनी गलियों और मोहल्लों में हंसती-खेलती और कभी-कभी रोती जि़ंदगी नजऱ ही नहीं आती है।
वे अपने हाथ से लिखे कानून को भगवान का आदेश मानने लगते हैं।
भारत में आशा भोसले गुजऱ गई हैं। 92 साल की उम्र में उनका देहांत हुआ है। वह अपनी जि़ंदगी का पूरा आनंद लेकर गई हैं और कोई चार पीढिय़ों के लोग उनके गाए हुए गाने सुनते रहे हैं।
इधर पाकिस्तान में ख़बरें चलीं कि पेमरा (पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी) के बाबुओं ने नोटिस भेजे हैं कि आशा जी के जाने की ख़बर के साथ-साथ उनके गाने क्यों चलाए गए हैं।
अब पाकिस्तानी संस्थाओं की हरकतें देखकर गुस्सा नहीं आता लेकिन यह सुनकर सच में अंदर से निकला है, ‘ओए पेमरा वालों तुम कौन लोग हो?’
पाकिस्तान में बॉलीवुड का जुनून
इंडिया-पाकिस्तान में एक-दूसरे की फि़ल्मों और गानों पर बैन है।
वैसे तो बैन किताबों पर भी है, लेकिन ज़ाहिर है लोग किताबें कम पढ़ते हैं।
लेकिन गानों और फि़ल्मों को न कोई जंग रोक पाई है और न ही कोई बॉर्डर।
हमारे बुजुर्ग छतों पर चढक़र, दूरदर्शन का सिग्नल पकडक़र ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म देखने के लिए एंटेना घुमाते थे।
उसके बाद वीसीआर किराए पर लेकर ‘उमराव जान अदा’ देखते रहे हैं।
हमने वो जमाना भी देखा है, जब वहां मुंबई में कोई फिल्म रिलीज होती, चार घंटे बाद उसका कैमरा प्रिंट डीवीडी में कराची में मिल जाता था।
अगर किसी को मास्टर प्रिंट चाहिए होता था तो उसे कहा जाता कि तुम दो दिन इंतजार कर लो।
अब डिजिटल ज़माना है। किसी दुकान पर, किसी बाजार जाने की या किसी स्मगलिंग में जाने की ज़रूरत नहीं है।
अपने फोन पर, कंप्यूटर पर पाकिस्तान में बैठे लोग ‘धुरंधर’ देख भी रहे हैं और साथ ही उसमें गलतियां निकाल रहे हैं।
यह पेमरा के बाबू पता नहीं किस पाकिस्तान में पले-बढ़े हैं, वे तो आशा भोसले के गानों के लिए क़ानून की किताब खोलकर बैठ गए हैं।
आशा के गाने तो हमारे नाना-दादा भी सुनते रहे हैं , हमारे माता-पिता ने भी उन्हें गाया है और बच्चों को भी याद है।
शादियों में बैंड वाले ये गाने बजा लेते हैं। खुशी से लेकर जनाज़े/अंतिम संस्कार तक, हर मौके के लिए आशा का एक गाना मौजूद है।
‘पिया अब तो तू आजा’ गाने पर लोग नाचते रहे हैं, ‘दम मारो दम’ पर मस्ती करते रहे हैं।
किसकी जि़ंदगी में ऐसा समय नहीं आया, जब उसने यह न सोचा हो, ‘ये क्या जगह है दोस्तो, ये कौन सा दयार है।’
हमारी पूरी एक पीढ़ी दिल तुड़वा कर, तकिए में सिर छिपाकर रोती रही है और यह पूछती रही है, ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है।’
हर मूड के लिए, हर फीलिंग के लिए, हर डांसर के लिए, हर रोने वाले के लिए, हर सोचने वाले के लिए।।। आशा भोसले का कोई न कोई एक गाना मौजूद है।
उन्होंने 12 हज़ार से ज़्यादा गाने गाकर इस दुनिया को अलविदा कहा है और वो भी 20 से ज़्यादा भाषाओं में। युद्धों और झगड़ों के बावजूद, कई पाकिस्तानी गायकों के साथ भी उन्होंने गाने गाए हैं।
आशा भोसले इंडिया-पाकिस्तान में बांटने वाली बात नहीं हैं।
पता नहीं पेमरा के बाबुओं को किसी ने बताया है या नहीं कि आशा ने तब गाना शुरू किया था जब बंटवारा नहीं हुआ था, उस समय इंडिया और पाकिस्तान बने भी नहीं थे।
इन बाबुओं को कोई यह बात समझाए कि एक दिन आपने रिटायर होकर घर बैठ जाना है।
तब आपको जवानी याद आएगी और तब वहीं बैठकर आपने यही गाना है। ‘इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं।’ (bbc.com/hindi)


