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एक लेखक से आगे इंसान के रूप में अधिक सीखने-समझने की जरूरत
15-Apr-2026 6:55 PM
एक लेखक से आगे इंसान के रूप में  अधिक सीखने-समझने की जरूरत

-जसिंता केरकेट्टा

हर समाज के भीतर स्त्रियां दरअसल दलित हैं। दलित मतलब दमित, शोषित, दोयम दजऱ्ा। सवर्ण समाज के भीतर भी बहुत सी स्त्रियां दमित और शोषित हैं। व्यवस्था की नींव में चुन दी गईं। इसलिए जब वे पूरे आक्रोश के साथ कविता में प्रतिरोध करती हैं, तब दलित और आदिवासी स्त्रियों को उनकी पीड़ा समझ में आती है। बहुत से पुरुषों को भी, जो इंसान के रूप में स्त्री-पुरुष से परे अपने भीतर वही संघर्ष कर रहे हैं। अपने भीतर और बाहर उस पीड़ा को दलित समाज, आदिवासी समुदाय और इंसान होने की जद्दोजहद में दूसरी जाति के कुछ लोगों ने भी अपने भीतर महसूस किया है। ऐसे में प्रतिरोध की हर पंक्ति के साथ उनका खड़ा होना स्वाभाविक ही है। तब भी हमेशा आत्ममंथन की ज़रूरत बनी रहती है। सामूहिक रूप से भी और अकेले भी।

सवर्ण समाज के भीतर स्त्रियां इंसान के रूप में न स्वीकारे जाते हुए दूसरे तरह से दमित हैं। इसे सह जाने के एवज में मुआवजे के रूप में ज़रूर उन्हें प्रिविलेज भी मिलता है। इन सब संघर्ष के अलग-अलग रूप हैं, तब भी दलितों की पीड़ा की तरह वह एहसास, अनुभव उन्हें कभी नहीं हो सकेगा। उस आक्रोश के भीतर भी स्त्री या पुरुष के रूप में सवर्ण होने का भाव कहीं गहरे बना ही रहेगा। और वह अनायास ही भाषा, व्यवहार में चला आएगा। कई बार बहुत सतर्कता के बाद भी, थोड़ी सी नींद और बेखय़ाली के बीच ही। दरअसल समाज व्यक्ति के भीतर निश्चित रूप से रहता है और अपनी भाषा भी बोलता रहता है, चाहे वह एक स्त्री हो या पुरुष। इसलिए साधारण बोलचाल में, प्रकट रूप में, छिपे हुए रूप में, हंसी में और कभी-कभी व्यंग्य में भी अक्सर यह सब कुछ स्पष्ट रूप से दिखाई पडऩे लगता है। और वह दृश्य-अदृश्य रूप से शोषित समाज को बार-बार अपमानित महसूस भी कराता है। जो भाषा सवर्ण समाज और पुरुष दोहराते हैं, उसे सवर्ण स्त्री के लिए भी उसी तरह दोहरा देने में कोई हिचक नहीं होती। यह स्वत: ही होता है। आवेग में, प्रतिरोध में, व्यापक भलाई की चाहत में या कभी-कभी बेहोश प्रेम में भी। पर जीवन भर, पीढ़ी दर पीढ़ी अपमान भरे शब्द सुनने वाले कोई दलित समाज या आदिवासी समुदाय की कोई स्त्री या पुरुष भी उस वाक्य को क्या उसी तरह दोहरा सकता है? बहुत रातों तक यह सोचने पर लगा, यह कोई नहीं कर सकता।

यह भी ध्यान देने की बात है कि हर बात में जो कानून की बात करते हैं, वह जानते ही हैं कि देश में 1989 में अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत सुप्रीम कोर्ट ने जातिसूचक संबोधन और अपमान दोनों पर पाबंदी लगाई है। इसे दंडनीय भी माना है। इन सबको ध्यान रखने की जिम्मेदारी लेखक, कवि के ऊपर भी है। और उस समाज के ऊपर भी जिससे कोई लेखक, कवि बोलते, देखते, सुनते हुए उसे आत्मसात भी करता है। और उन लोगों को भी यह ध्यान रखने की ज़रूरत है, जो समूह की शक्ति का उपयोग कर किसी व्यक्ति की आलोचना करने, सुधार की गुंजाइश रखने के बदले दंड देने, भय को बनाए रखने के वर्चस्ववादी ढांचे की तरफ जाने को ही आसान रास्ता समझते हैं। बदलाव का यही एकमात्र ढांचा देख पाते हैं।

याद आता है। कुछ साल पहले एक आदिवासी लेखक ने आदिवासी स्त्रियों के प्रति जब दूसरी जाति के पुरुष द्वारा उपयोग की गई भाषा को हूबहू वैसे ही रख देने की कोशिश की थी, तब पूरा आदिवासी समाज सन्न रह गया था। इतना आहत हुआ कि उन्होंने उनकी किताब जला दी, उनके किताब पर बैन लगाने की मांग की। और इससे उनकी नौकरी भी प्रभावित हुई। निश्चित रूप से आदिवासी समाज के भीतर भी अलग तरह से स्त्रियों पर नियंत्रण और शोषण मौजूद है, पर भाषा की दृष्टि से ऐसी भाषा का उपयोग जैसा लेखक के हिंदी अनुवाद में था, सबको हिला देने वाली भाषा थी, जिसका आदिवासी समाज अभ्यस्त नहीं रहा है।

ऐसे समय में जब आग बहुत फैल गई थी, तब मैंने एक लेखक के प्रति, व्यक्ति के प्रति आदिवासी समाज के उस सामूहिक आवेग और हमलों का विरोध किया। और भी आदिवासी युवा ने ऐसा ही किया। पर लेखक की उन पंक्तियों का हिंदी अनुवाद पढक़र सारी रात सो नहीं सकी। सुबह व्यक्तिगत रूप से लेखक को कहा कि कोई लेखक कितना भी अच्छा लिखता हो। कितनी भी ज़रूरी बात अपनी किताबों में दजऱ् करता हो, तब भी एक लेखक से आगे इंसान के रूप में उसके और अधिक सीखने, समझने, महसूस करने की जरूरत हमेशा बनी ही रहती है। लिखते, पढ़ते, बोलते हुए भी इंसान के रूप में अधिक कोमलता और अपने शब्दों में भी उतनी ही संवेदनशीलता की ओर ही हमें अंतत: जाना होगा।

उस दिन महसूस हुआ कि सच बोलना तो किसी को नींद और नशे में ले जाने के लिए नहीं होता। न ही व्यक्ति को, न ही समुदाय और किसी समाज को। सच अक्सर आदमी को व्यक्तिगत और समाज को सामूहिक रूप से भी उसके भीतर के नींद और नशे को तोडऩे, झकझोरने के लिए ही है, ताकि टूटने की पीड़ा के बाद कोई इंसान कोमलता से उग सके। जहां व्यक्ति और समाज दोनों ही अपने भीतर के अहंकार की कठोरता से बाहर निकल सके। कोई समाज, समुदाय इतना कोमल हो सके, उसके भीतर इतनी सहजता, स्वीकार्यता, धैर्य पैदा हो, जहां हमेशा कुछ नया उगने और पुराना ढह जाने का सिलसिला बना रह सके। और शिद्दत से यह महसूस होता है कि बहुत कोमल होते जाना ही सुंदर इंसान होते जाना है। प्रकृति के बहुत करीब होते जाना, उसके एक हिस्से की तरह होना।

एक लेखक, कवि को भी लेखक या कवि होने से अधिक कोमल इंसान होने के रास्ते में जाने का ही आत्म संघर्ष करते रहना होगा। अभिव्यक्ति की अच्छी शैली, शब्द, मंच, लोगों की स्वीकृति, पुरस्कार से भी आगे जाकर। स्त्री या पुरुष होने से भी आगे जाकर। इंसान के रूप में अपनी चेतन, अवचेतन सारी मानसिक स्थितियों को समझते हुए। यह ध्यान रखते हुए कि हर काल में समाज में घोर निराशा, व्यंग्य, अपमान, वर्चस्व, हिंसा का दौर भले ही क्यों न हो, तब भी हम धैर्य के साथ मानवता और प्रकृति के पक्ष में खड़े होकर उसी को सुंदर बनाने वाले जीवन दर्शन की बात कर सकें।


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