विचार / लेख

प्राचीन अवधारणा को पुन: स्थापित करने की आवश्यकता
15-Sep-2025 9:16 PM
प्राचीन अवधारणा को पुन: स्थापित करने की आवश्यकता

-संजीव शुक्ला

हमारी उम्र के अधिकांश लोगों ने अपना बचपन मोहल्ले में बिताया है, हममें आज भी वह मोहल्ला संस्कृति जीवित है ।

हम जब स्कूल में पढ़ा करते थे तब पूरे मोहल्ले में एक दो घरों में ही फ़ोन होता था और सारा मोहल्ला उनके नंबर को पीपी नंबर के रूप में अपने सारे परिचितों और रिश्तेदारों को दिया करता था यहाँ तक की कुछ उत्साही लोग अपने विजिटिंग कार्ड में भी पड़ोसी के नंबर को पीपी नंबर के रूप में लिख दिया करते थे। रोज-मोहल्ले के किसी ना किसी घर के लिए फोन उनके यहाँ आते वे अपने सब कम छोड़ पड़ोसी को बुलाने जाते और पड़ोसी को घर में बैठकर बात करने की सुविधा ही नहीं देते बल्कि एक टुकड़ा मीठा, कुछ ना हो तो गुड़ और पानी पिला कर विदा करते।

हम बचपन में रायपुर ब्राह्मण पारा में रहते थे पूरे मोहल्ले में सिर्फ दिलीप बैस जी के यहाँ ही टीवी हुआ करता था पूरा मोहल्ला शनिवार  को फूल खिले हैं गुलशन गुलशन शुक्रवार को चित्रहार और रविवार को टीवी पर आने वाली हिंदी फि़ल्म देखने उनके घर जाया करता था , घर वाले सबके लिए दरी बिछा कर बैठ कर कार्यक्रम देखने का पूरा इंतजाम ख़ुशी ख़ुशी किया करते थे ।

इन दोनों प्रसंगों को मैं आज इस संदर्भ में याद कर रहाँ हूँ कि पहले मोहल्ले की संस्कृति कितनी जीवंत और मिलनसार हुआ करती थी, लोगों में कितना धैर्य और आत्मीयता हुआ करती थी। फिर हम धीरे धीरे मोहल्ले से निकल कर कॉलोनी में , फिर गेटेट कॉलोनी में, फिर फ्लैट में शिफ्ट होते गए और साथ ही साथ हमारी नजदिकयाँ कम होती गई, धीरज चुकता गया गया और हमे पता ही नहीं चला कब हम मोहल्ले से परिवार और परिवार से एकल परिवार तक का सफर पूरा कर लिए।

पहले जहाँ हम धैर्य से पूरे मोहल्ले को एडजस्ट कर अपने में समा लेते थे वहीं अब एक पति पत्नी में भी एडजस्टमेट की समस्या हो रही है दो बच्चों को आपस में एडजस्ट करने की समस्या है। बच्चे अपना कमरा अपना बाथरूम भी किसी अन्य के साथ एक दिन के लिए भी शेयर करने को तैयार नहीं है। आज जब हम घर के सदस्य साथ बैठते हैं तो सिर्फ भौतिक रूप से एक साथ होते है किंतु व्यस्त सभी अपने अपने मोबाइल में होते हैं। फेसबुक इंस्टा में हमारे हजारों मित्र हैं किंतु एक भी मित्र ऐसा नहीं है जिसके साथ बैठ कर मन की, दुख-सुख की बात कर ले। हम सभी एक दूसरे से बात चर्चा करने के लिए नहीं बल्कि अपनी बात को सहीं सिद्ध करने के लिए, बहस करने के लिए करते हैं । हमारा धैर्य इतना कम हो गया है कि हम दो लोग भी एक दूसरे को स्वीकार करने में असमर्थ हो रहे हैं ।

मुझे लगता है कि यह सब एक दिन में नहीं हुआ यह सब हमारी जीवन शैली में हुए बदलाव का परिणाम है । हमारे समाज और परिवार की जीवनशैली ऐसी हुआ करती थी कि बिना किसी प्रयास के हम एक दूसरे को समझ पाते धैर्य से एक दूसरे को एडजस्ट कर पाते थे और इन सबसे आगे एक दूसरे के सुख दुख में दिल से शामिल हो पाते थे। आज समाज में जो एकाकीपन और डिप्रेशन की समस्या है उसके मूल में हमारी वर्तमान जीवनशैली और समाज एवं परिवार नाम की संस्था का विघटन ही है। इस पर गंभीरता से विचार कर परिवार और समाज की अपनी प्राचीन अवधारणा को पुन: स्थापित करने की आवश्यकता है। आइये इसके लिए ख़ुद भी कोशिश करें और अपने बच्चों को भी यह संस्कार दें।


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