विचार / लेख

आम आदमी पार्टी के आंतरिक विरोधाभास
22-May-2024 4:17 PM
आम आदमी पार्टी के आंतरिक विरोधाभास

डॉ. आर.के. पालीवाल

आम आदमी पार्टी अन्ना आंदोलन की नींव पर खड़ी होकर जितनी तेजी से धूमकेतु की तरह राजधानी दिल्ली के राजनैतिक आकाश पर नमूदार हुई थी इन दिनों उतनी ही तेजी से गर्त की तरफ बढ रही है। पहले अपने वरिष्ठ संस्थापक सदस्यों प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव आदि को किनारे करने और बाद में आशुतोष, कुमार विश्वास और साजिया इल्मी आदि के अलग होने के झटके को इस पार्टी ने जैसे तैसे झेल लिया था और दिल्ली के साथ साथ विधान सभा चुनाव में पंजाब को भी फतह कर लिया था।

दिल्ली और पंजाब का राजनीतिक माहौल कुछ अलग तरह का रहा है जहां शिक्षित और प्रगतिशील लोगों की संख्या अच्छी खासी है। साथ ही इन दोनों राज्यों ने कालांतर में कांग्रेस और भाजपा एवं उनके गठबंधन साथी अकाली दल के शासन की विफलताओं को लंबे समय तक झेला था इसलिए वहां तीसरे विकल्प के रूप में आम आदमी पार्टी तेजी से आगे बढ़ी थी। यदि यह दल अपनी आंतरिक कलह पर नियंत्रण रखकर धैर्य से कदम दर कदम आगे बढ़ता तो उत्तर और मध्य भारत में हरियाणा, राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसे भाजपा और कांग्रेस की लंबी सत्ता से निराश हो चुके राज्यों मे देर सवेर सत्ता प्राप्त कर सकता था, लेकिन फिलहाल इस पार्टी का निकट भविष्य अंधकारमय दिख रहा है।

    एक तो अरविंद केजरीवाल की कार्यशैली लोकतान्त्रिक नहीं है। वे संगठन और सरकार की असीमित शक्ति तो अपने पास रखना चाहते हैं और जिम्मेदारियां दूसरों के कंधे पर डालते हैं। दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया इसी चक्कर में लगभग साल भर से जमानत नहीं पा रहे हैं क्योंकि ऐसे समाचार हैं कि शराब नीति सहित अधिकांश सरकारी फाइलों पर उनके ही हस्ताक्षर होते थे और अरविन्द केजरीवाल सिफऱ् आदेश देते थे और मौखिक रूप से अपना निर्णय बताते थे। इसके अलावा कांग्रेस के जिस परिवार वाद की मुखालफत आम आदमी सहित अन्य पार्टियां करती रही हैं अरविंद केजरीवाल के जेल जाने पर उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल उसी तरह पार्टी के केंद्रीय मंच पर आ गई जैसे कभी लालू यादव के जेल जाने पर राबड़ी देवी आई थी और जिस तरह हेमंत सोरेन के जेल जाने पर उनकी पत्नी कल्पना सोरेन आगे आई हैं।

भ्रष्टाचार भी एक ऐसा बड़ा मुद्दा था जिसे खत्म करने के लिए अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों ने अन्ना हजारे की छत्रछाया में लोकपाल आंदोलन चलाया था। आज आम आदमी पार्टी के पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के अलावा शीर्ष पर बैठे अधिकांश वरिष्ठ नेता जेल जा चुके हैं और कुछ के सिर पर जेल जाने की तलवार लटक रही है। राजनीति में तमाम तरह की शुचिताओं और नैतिकता का नारा देने वाली आम आदमी पार्टी महात्मा गांधी के नाम और नारों के सहारे पहले आंदोलन और फिर राजनीति में घुसी थी।पंजाब के चुनाव आते आते उन्होंने अपने प्रचार प्रसार में गांधी को उसी तरह विस्मृत कर दिया जैसे अपने दल के वरिष्ठ संस्थापक साथियों को किया है। इन सब कारणों से आम आदमी पार्टी ने बहुत तेजी से अपनी विश्वसनीयता का ग्राफ कम किया है।

ऐसा लगता है कि इन दिनों आम आदमी पार्टी के खेमे में कुछ भी बेहतर नहीं घट रहा। हाल ही में आम आदमी पार्टी की राज्य सभा सांसद और दिल्ली महिला आयोग की भूतपूर्व अध्यक्ष स्वाति मालीवाल के साथ अरविंद केजरीवाल के सरकारी आवास पर उनके निजी सचिव रहे बिभव कुमार द्वारा की गई कथित हिंसा ने अरविंद केजरीवाल और उनके आवास की छवि भी धूमिल की है। भले ही आम आदमी पार्टी अब अपनी ही सांसद के आरोपों को भाजपा की साजिश बताकर चुनाव के समय इस मामले से बचना चाह रही हो लेकिन यह भी एक ऐसा दाग है जिसका साफ होना आसान नहीं है। कुल मिलाकर अरविंद केजरीवाल, उनकी पार्टी और उनके आवास का एक साथ अपराधों में उलझना इन सबके लिए बेहद अशुभ  है।


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