विचार / लेख

इलेक्टोरल बॉन्ड का पिटारा
19-Mar-2024 2:30 PM
इलेक्टोरल बॉन्ड का पिटारा

डॉ. आर.के. पालीवाल

इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार कर और लोकतंत्र में चुनावी पारदर्शिता के लिए इन बॉन्ड का तमाम ब्यौरा केंद्रीय चुनाव आयोग की वेबसाईट पर अपलोड कराने का आदेश देकर सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने देर आए दुरुस्त आए का मुहावरा चरितार्थ करते हुए एक धीर गंभीर फैसला कर ऐतिहासिक काम किया है। एक तरफ सरकार पारदर्शिता की बात करती है और भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की वकालत करती है और दूसरी तरफ़ चुनावी चंदे को उस आम जनता की नजरों से छिपाने की तरफदारी करती है जिसने अपना कीमती वोट देकर उसे इतना शक्तिशाली बनाया है।

सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती के बावजूद अभी तक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की तरफ से इलेटोरल बॉन्ड की आधी अधूरी सूचनाएं ही बाहर आई हैं। लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया को साफ सुथरी देखने के लिए प्रयास करने वाले संगठनों और पत्रकारों ने इसी आधी अधूरी सूचना के आधार पर जो विश्लेषण प्रस्तुत किए हैं वह चौंकाने वाले हैं। इन विश्लेषणों से जो निष्कर्ष निकल रहे हैं वह इंगित करते हैं कि इलेक्टोरल बॉन्ड की कालीन के नीचे कितनी ज्यादा गंदगी छिपी है। यही कारण है कि केंद्र सरकार इन बॉन्ड की सूचना को सार्वजनिक करने के खिलाफ थी और भारतीय जनता पार्टी के अधिकांश नेता इस मुद्दे पर मुखर नहीं हो पा रहे हैं। जहां तक विपक्षी दलों का सवाल है उनमें भी काफी राजनीतिक दल  ऐसे हैं जिन्हें इलेक्टोरल बॉन्ड का भारतीय जनता पार्टी से काफी कम ही सही लेकिन अच्छा खासा लाभ मिला है। जहां विपक्षी दलों की सरकार थी वहां की कंपनियों ने उन्हें भी चंदा दिया है इसलिए सारे विपक्षी दल भी इस मुद्दे पर सरकार को जोशो खरोस से नहीं घेर सकते। उदाहरण के तौर पर तृणमूल कांग्रेस जैसे पश्चिम बंगाल तक सीमित क्षेत्रीय राजनीतिक दल को भाजपा के बाद सबसे अधिक चंदा मिला है और उसकी चंदा राशि कांग्रेस से भी अधिक है।

इस मुद्दे पर अब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को भी कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। कपिल सिब्बल ने इस विवादित मुद्दे पर संघ की चुप्पी को आश्चर्यजनक बताया है। हाल ही में दुबारा संघ के सर कार्यवाह चुने गए दत्तात्रेय होसबोले ने इलेक्टोरल बॉन्ड को एक प्रयोग कहकर पल्ला झाड़ लिया। बडी चतुराई से उन्होने इसके पक्ष या विपक्ष में कुछ नहीं कहकर संघ की मु_ी बंद रखी है। संघ की चुप्पी से यह आभास होता है कि वह भी इसके पक्ष में खुलकर बोलने से कतरा रहा है। दूसरी तरफ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा मुखर है। केंद्रीय चुनाव आयोग के उस पत्र के जवाब में जिसमें राजनीतिक दलों से इलेक्टोरल बॉन्ड से प्राप्त धन की जानकारी मांगी है पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने लिखा है कि हमारा दल शुरु से इस योजना के खिलाफ था और सर्वोच्च न्यायालय में इसके खिलाफ हमने भी एक याचिका दायर की थी। हमारी पार्टी ने इसके लिए न कोई अकाउंट खोला और न इलेक्टोरल बॉन्ड से कोई चंदा लिया है। शायद मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी ही ऐसी प्रमुख पार्टी है जिसने इलेक्टोरल बॉन्ड को सिरे से खारिज किया है इसीलिए उसे इस योजना के खिलाफ पूरी मुखरता से बोलने का नैतिक अधिकार है। जहां तक अन्य राजनीतिक दलों की स्थिति है उनको इलेक्टोरल बॉन्ड से परहेज नहीं रहा और न उन्होंने कभी राजनीतिक चंदे की पवित्रता पर जोर दिया। उनके पेट का दर्द यह है कि केन्द्र में सत्ता पर काबिज दल भाजपा ने उनसे कई गुणा ज्यादा चंदा वसूल लिया। उदाहरण के तौर पर भाजपा को कांग्रेस से पांच गुणा ज्यादा चंदा मिला। यदि कांग्रेस को भी भाजपा के लगभग बराबर चंदा मिल जाता तो उसके पेट में मरोड़ नहीं उठती और उसका चेहरा भी भाजपा की तरह चमक जाता। चंदे की यह स्थिति केवल भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों की ही नहीं है। यही हालत क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की भी है। उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु में सत्ताधारी दल डी एम के को जो चंदा मिला है उसकी तुलना में विपक्षी दल ए ई ए डी एम के को नगण्य चंदा मिला है। इस परिपेक्ष्य में अधिकांश राजनीतिक दलों का रूदन नकली है। चंदे के इस धंधे पर मतदाताओं और विशेष रूप से प्रबुद्ध वर्ग को सबसे कड़ा प्रहार करना चाहिए क्योंकि यह हमारे लोकतंत्र को खोखला और बेहद प्रदूषित कर देगा।


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