विचार / लेख

एक आत्मकथा का एक हिस्सा
30-Dec-2023 3:27 PM
एक आत्मकथा का एक हिस्सा

 द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

उन दिनों देश में बहुत कुछ घट रहा था लेकिन मेरे शहर में कुछ नहीं हो रहा था, जैसे पहिए थम से गए थे। अपना हाल भी वही था, अपनी मिठाई दूकान में बैठना, एम.ए.फायनल की तैयारी करना, ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’ और अमेरिकी पत्रिका ‘लाइफ’ पढऩा, सिनेमा देखना और अफसोस करना कि ‘अब तक कोई लडक़ी पटी नहीं।’

एम.ए.फायनल की परीक्षा आ गई, निपट गई, फिर ‘वायवा’ का समय आ गया। बाह्य परीक्षक वही, पिछले वर्ष वाले डॉ.रामरतन भटनागर! साक्षात्कार कक्ष में प्रवेश कर मैंने अभिवादन किया और घबराया हुआ कुर्सी पर बैठ गया। डॉ. भटनागर मुझे देख कर मुस्कुराए और उन्होंने पूछा, ‘कैसे हो?’

‘जी सर, ठीक हूँ।’

‘शादी हो गई ?’

‘नहीं हुई सर, बड़ी विचित्र समस्या आ गई है।’

‘कैसे ?’

‘मेरे पिताजी बड़े आदमी माने जाते हैं इसलिए साधारण परिस्थिति वाले अधिक ‘बजट’ के डर से हमारे घर प्रस्ताव लेकर आते नहीं, जिनका बजट अधिक है उनको जब यह मालूम पड़ता है कि लडक़ा मिठाई बेचने का धन्धा करता है तो वे बिदक जाते हैं। बेचारे किसी को क्या बताएंगे- ‘दामाद हलवाई है’ ?

‘फिर ?’

‘फिर क्या सर...लंगड़े-लूलों का ब्याह होता है, मेरी किस्मत में भी कोई न कोई तो होगी।’

‘ठीक है, आप जाइए।’

‘कुछ पूछेंगे नहीं सर?’ मैंने उनसे पूछा।

‘पिछले साल ही पूछ लिया था।’ उन्होंने मुझे प्यार भरी नजरों से देखा।

उन्होंने मुझे सौ में चौहत्तर अंक दिए, पिछले वर्ष से दो अंक कम। पता नहीं, मेरे साक्षात्कार में क्या कमी रह गई थी ?

एम.ए. भी पास हो गया। तब फिर वही समस्या कि अब क्या किया जाए? मेरे मन में आया पी.एच.डी. कर लिया जाए। प्राध्यापक राजेश्वर दयाल सक्सेना मेरे ‘गाइड’ हो गए और विषय तय हुआ, ‘स्वातन्त्रयोत्तर भारत की राजनीति का हिंदी साहित्य पर प्रभाव’। मैंने भारतीय राजनीति की उपलब्ध पुस्तकों का अध्ययन आरंभ कर दिया। मोहनदास करमचंद गांधी, जवाहरलाल नेहरु, अबुल कलाम आजाद, मानवेन्द्रनाथ रॉय, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण आदि अनेक शीर्ष राजनेताओं के विचार पढ़े तथा अन्य लेखकों की भी पुस्तकें खोजता और पढ़ता। हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं को भी साथ-साथ पढ़ता रहा लेकिन जितना भी पढ़ पाया, मुझे लगता था कि अभी तक शोध लिखने लायक नहीं पढ़ पाया हूँ, पूरी जानकारी के अभाव में कैसे लिखूं? उसी उधेड़बुन में मुझसे कुछ भी न लिखा गया, दो साल बीत गए और समय मेरे हाथों से तेजी से फिसल गया। वक्त के जहाज ने मेरा कोई लिहाज़ न किया, वह मुझे छोडक़र आगे बढ़ गया और मेरे सामने ऐसे हालात बना दिए कि मैं हाथ मलता ही रह गया। आप सोच रहे होंगे, आखिर ऐसा क्या हो गया? उसे बाद में बताऊंगा, पहले एक मजेदार वाकय़ा पढि़ए-

आप जब भी किसी नई जगह में जाते हैं तो पता करते हैं कि वहां देखने लायक क्या है? है न? यदि आप कभी बिलासपुर आकर पूछेंगे कि आपके शहर में देखने लायक क्या है तो मेरा जवाब होगा, ‘कुछ नहीं, परन्तु मिलने लायक एक विलक्षण व्यक्ति है, मधुकरराव चिपड़े।’

मधु चिपड़े ने बनारस विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण की थी और वे हस्तरेखा विज्ञान का अध्ययन कर के जब ट्रेन से बिलासपुर वापस आ रहे थे, उत्सुकतावश उन्होंने बगल में बैठे व्यक्ति का हाथ देखकर कहा, ‘अरे तुम तो किसी का मर्डर करके आ रहे हो, तुम्हें तो जेल में होना चाहिए।’ वह व्यक्ति अगले स्टेशन में चुपचाप उतर कर वहां से खिसक गया। हस्तरेखा विज्ञान में अद्भुत पकड़ के कारण कुछ ही समय बाद मधु चिपड़े की ख्याति बढ़ती गई और जनसामान्य अपनी समस्याओं के समाधान खोजने, अपना भविष्य जानने उनके पास आने लगे। अनुमानत: उन्होंने अपने जीवनकाल के 50 वर्षों तक लोगों के हाथ देखकर जनसेवा की और कभी किसी से एक पैसा नहीं लिया। उनकी प्रतिभा और ज्ञान के बारे में कितना लिखूं? फिलहाल समझने के लिए आपको यह बता रहा हूँ कि वे आधुनिक त्रिकालदर्शी थे।

एक दिन की बात है, उस समय मैं लगभग 20 वर्ष का था, मधु चिपड़े हमारी दूकान ‘पेन्ड्रावाला’ में आए तो मेरे बड़े भाई साहब ने उनसे कहा, ‘मधु भैया, जरा द्वारिका का हाथ देखिए, इसकी शादी कब होगी ?’

उन्होंने मेरी हस्तरेखाओं का अध्ययन किया और बोले, ‘क्या मजाक करते हो रूपनारायण ? इसकी तो शादी हो चुकी और इसका एक बच्चा भी है।’

बड़े भैया ने मुझे घूरकर देखा, मुझे काटो तो खून नहीं। कहाँ तो मैं जल-बिन-मछली की तरह एकाकी जीवन बिता रहा था और चिपड़ेजी ने ऐसी बात कह दी कि मेरे चरित्र पर प्रश्नचिन्ह लग गया। मैं चुप रह गया परन्तु बड़े भैया तुरंत बोले, ‘नहीं, अभी इसकी शादी नहीं हुई है और न ही इसके लिए रिश्ते ही आ रहे हैं।’

चिपड़ेजी बोले, ‘तो अब फिर आठ साल बाद होगी, इस बीच विवाह का कोई योग नहीं।’ मेरी जान पे जान आई और प्राण भी सूख गए। प्राण क्यों सूखे? आप समझ गए होंगे।

(आत्मकथा ‘न वो समझ सके न हम’ का एक अंश)


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