सरगुजा

भारतीय संस्कृति में परिवार और कुटुम्ब की भावना निहित
11-Dec-2022 7:50 PM
भारतीय संस्कृति में परिवार और कुटुम्ब की भावना निहित

संत गहिरा गुरु विवि में  व्याख्यानमाला

अंबिकापुर,11 दिसंबर। संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय, सरगुजा अंबिकापुर के विश्वविद्यालय शिक्षण विभाग में विश्व मानवाधिकार दिवस के उपलक्ष्य में  विधिक अध्ययन विभाग द्वारा एक दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया । कार्यक्रम के अन्तर्गत विधिक अध्ययन की छात्र-छात्राओं के द्वारा विविध आयोजन प्रस्तुत किया गया। तदुपरांत प्रयोजनमूलक हिंदी विभाग के अध्यक्ष  डॉ. राजकुमार उपाध्याय मणि ने ‘भारतीय संस्कृति में मानवाधिकार की जड़ें’ विषय पर विस्तृत व्याख्यान दिया।

कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए विधिक अध्ययन विभाग के अध्यक्ष समन नारायण उपाध्याय ने 1945 की विभेदकारी-शोषणकारी परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के द्वारा आज ही के दिन 10 दिसम्बर को की गई मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा पर प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि मानवाधिकार एक विदेशी अवधारणा है, जो कि विदेशी भूमि में विद्यमान दमनकारी नीतियों के विरोध में प्रतिपादित की गई थी। जबकि भारत  की विधि व्यवस्था में प्रारम्भ से ही मानवाधिकार के अवयव विद्यमान थे। 

कार्यक्रम के मुख्यवक्ता डॉ. राजकुमार उपाध्याय मणि ने अपना विचार देते हुए कहा कि- मानवाधिकार की रक्षा के लिए शक्ति संपन्न होना बहुत आवश्यक है। भारतीय संस्कृति में मानवाधिकार की भावना मानव की रक्षा ही नहीं, अपितु प्रत्येक जीव की रक्षा के लिए भी सन्निहित है। दुनिया की सबसे बड़ी लड़ाई राम रावण का युद्ध या कुरुक्षेत्र का युद्ध मानव मूल्यों की रक्षा, मानव धर्म की रक्षा और स्त्री अस्मिता की रक्षा के लिए ही किया गया था।

उन्होंने कहा कि जब तक दूसरों के अधिकारों का हनन किया जाता रहेगा, तब तक मानवता हारती रहेगी। इसलिए मानवता की रक्षा के लिए वर्तमान में मानवाधिकार एक कानून के रूप में स्थापित है। भारतीय संस्कृति धर्म और मूल्यों के लिए जानी जाती है, जिसमें मानवाधिकार के मूल्य और उसके अधिकार  मिलते हैं। उन्होंने अनेक ऐतिहासिक पौराणिक उदाहरणों और प्रसंगों के द्वारा मानवाधिकार के संदर्भ में बताया।

 उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति ही यह कहती है कि अयं निज: परोवेति गणना लघु चेतसाम। उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुंबकम। भारतीय संस्कृति में परिवार और कुटुम्ब की भावना निहित है। परिवार में अधिकार की बात नहीं होती है। सेवा और कर्तव्य की भावना होती है। उन्होंने कहा कि जिस संस्कृति में ‘मातृवत परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत’  की भावना  होगी, वहां मानवाधिकार सशक्त बना रहेगा।

कार्यक्रम का संचालन  वर्षा, जयश्री, यास्मीन ने किया और संचालन पुष्यमित्र मल्तियार ने किया। इस कार्यक्रम में उषा अग्रवाल, अंकिता केशरी, डॉ. अभिषेक उपाध्याय आदि शिक्षक और राकापतिम, आकांक्षा आदि अनेक छात्र उपस्थित रहे।इसकी जानकारी विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. राजकुमार उपाध्याय मणि ने दी है।


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