राजपथ - जनपथ
हरियाली का शॉर्टकट, सेहत पर संकट
छत्तीसगढ़ विधानसभा में कल एक ऐसा मुद्दा उठा जो पर्यावरण और स्वास्थ्य पर सीधे असर करता है। प्राय: ऐसे विषय सदन के शोर में दब जाते हैं। मगर, इस बार रायपुर पश्चिम के भाजपा विधायक सुनील सोनी ने छातिम वृक्ष जिसे सप्तवर्णी या अल्स्टोनिया स्कॉलरिस कहते हैं, के रायपुर में बड़े पैमाने पर रोपे जाने पर सवाल उठाया।
रायपुर में छातिम के पेड़ साइंस कॉलेज से रोहिणीपुरम चौक तक की सडक़, हाईवे और डिवाइडरों पर लगाए गए थे। नगर निगम और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत हजारों पौधे रोपे गए। शहरों को स्मार्ट बनाने के नाम पर आसान रास्ता अपनाया गया। खूबसूरत सफेद फूल वाले, तेजी से बढऩे वाले और घनी छाया देने वाले पेड़। प्रदूषण नियंत्रण का दावा भी किया गया। लेकिन अफसरों ने अन्य राज्यों के अध्ययनों की ओर ध्यान नहीं दिया। वैसे यह पेड़ प्रदूषण सहन करने में सक्षम है, लेकिन इसके फूलों से निकलने वाला परागकण और तेज गंध अस्थमा, साइनस, श्वसन संक्रमण और एलर्जी का बड़ा कारण बन गया है। कोलकाता, नोएडा और मध्य प्रदेश के कई शहरों में यही अनुभव रहा। पश्चिम बंगाल में यह राज्य वृक्ष है, फिर भी नगर निगम ने नया रोपण बंद कर दिया है। वहां लाखों पौधे रोपे गए थे। कुछ साल पहले एक चक्रवात आया तो पराग साफ होने पर लोगों को राहत मिली। नोएडा के कई सेक्टरों में निवासियों ने इतनी शिकायतें कीं कि रोपण पर रोक लगानी पड़ी। मध्य प्रदेश ने तो पूरे राज्य में छातिम और एक अन्य वृक्ष कोनोकार्पस पर प्रतिबंध लगा रखा है।
इधर, पर्यावरण मंत्री ओपी चौधरी का जवाब अफसरों से तैयार किया गया लगा। जवाब में अन्य राज्यों में पड़े प्रभावों की जानकारी नहीं दी गई या अधूरी रखी गई। जबकि इस पर कई वैज्ञानिक शोध मौजूद हैं। इसके पराग से चूहों के मॉडल में अस्थमा जैसी सूजन होती है, कोलकाता के अध्ययन में 28 प्रतिशत एलर्जिक मरीजों में पॉजिटिव रिएक्शन देखने को मिला।
बेशक, औषधि की दृष्टि से यह पेड़ उत्कृष्ट है। इसकी छाल और पत्तियों में एंटी-अस्थमा, मलेरिया-रोधी गुण हैं। लेकिन शहर के बीचों-बीच हजारों की संख्या में लगाना और जगह-जगह फूल खिलाना अलग बात है। कहां लगाएं, कितनी संख्या में लगाएं, यह देखना जरूरी हो जाता है।
रायपुर को देश के सबसे प्रदूषित शहरों में गिना जाता रहा है। धूल के स्तर ने स्वास्थ्य को पहले ही चुनौती दी हुई है। ऐसे में एक और एलर्जी का कारक जोडऩा गलती है। स्मार्ट सिटी के अफसरों को लगता था कि तेज बढऩे वाला पेड़ तुरंत हरियाली ला देगा। अब जब विधानसभा में मुद्दा उठा है तो मंत्री ने भविष्य में छातिम पौधे नहीं लगाने का संकेत दिया है। पर विकल्प क्या होगा, इस पर भी बात होनी चाहिए। नीम, पीपल, बरगद, अमलतास, अर्जुन और जामुन जैसे पेड़ एपीटीआई यानि एयर पॉल्यूशन टॉरलेंस इंडेक्स में ऊंचा स्थान रखते हैं। ये प्रदूषण सोखते हैं, धूल पकड़ते हैं, छाया देते हैं और एलर्जी नहीं फैलाते। छत्तीसगढ़ की जलवायु में ये स्वाभाविक रूप से फलते-फूलते हैं। नीम तो कीट-नाशक भी है। पीपल ऑक्सीजन का खजाना है। छातिम हटाकर ये लगाए जाएं तो सिर्फ स्वास्थ्य नहीं सुधरेगा, बल्कि देर से सही हरियाली भी आएगी।
आंदोलनों को बड़ी चुनौती
नवा रायपुर में विधानसभा शिफ्ट होने के बाद उसके घेराव की परंपरा लगभग खत्म होती नजर आ रही है। पहले शहर के करीब स्थित पुराने विधानसभा भवन के कारण सत्र के दौरान राजनीतिक दलों और विभिन्न संगठनों द्वारा लगातार प्रदर्शन और घेराव होते थे। इन आंदोलनों को नियंत्रित करने में पुलिस को भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
नया विधानसभा भवन शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित है, जिससे वहां तक पहुंचकर धरना-प्रदर्शन करना आसान नहीं रह गया है। हाल ही में कांग्रेस ने अफीम कांड, गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों सहित कई मुद्दों पर विधानसभा घेराव का ऐलान किया था, लेकिन कार्यकर्ता शहर की सीमा से बाहर ही नहीं निकल पाए और प्रदर्शन शांति नगर के भारत माता चौक तक सिमट कर रह गया।
इसके उलट, पिछली सरकार के दौरान पुराने विधानसभा के पास भीम आर्मी के कार्यकर्ता निर्वस्त्र प्रदर्शन तक कर चुके थे, जिससे आंदोलनों की तीव्रता का अंदाजा लगाया जा सकता है। वहीं, हाल में तूता में अनशन कर रहे डीएड अभ्यर्थियों ने भी अवकाश के दिन विधानसभा घेराव की घोषणा की थी, लेकिन वे भी विधानसभा परिसर के आसपास तक नहीं पहुंच सके।
दरअसल, नवा रायपुर की भौगोलिक स्थिति भी आंदोलनों के लिए चुनौतीपूर्ण है। विधानसभा के आसपास कई किलोमीटर तक सुनसान सडक़ें हैं और चाय-पानी या ठहरने की सुविधाएं भी दूर-दूर तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में आंदोलनकारियों के लिए वहां जुटना और टिकना मुश्किल हो जाता है, जबकि पुलिस के लिए उन्हें नियंत्रित करना अपेक्षाकृत आसान हो गया।
नवा रायपुर में विधानसभा शिफ्ट होने के बाद उसके घेराव की परंपरा लगभग खत्म होती नजर आ रही है। पहले शहर के करीब स्थित पुराने विधानसभा भवन के कारण सत्र के दौरान राजनीतिक दलों और विभिन्न संगठनों द्वारा लगातार प्रदर्शन और घेराव होते थे। इन आंदोलनों को नियंत्रित करने में पुलिस को भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
नया विधानसभा भवन शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित है, जिससे वहां तक पहुंचकर धरना-प्रदर्शन करना आसान नहीं रह गया है। हाल ही में कांग्रेस ने अफीम कांड, गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों सहित कई मुद्दों पर विधानसभा घेराव का ऐलान किया था, लेकिन कार्यकर्ता शहर की सीमा से बाहर ही नहीं निकल पाए और प्रदर्शन शांति नगर के भारत माता चौक तक सिमट कर रह गया।
इसके उलट, पिछली सरकार के दौरान पुराने विधानसभा के पास भीम आर्मी के कार्यकर्ता निर्वस्त्र प्रदर्शन तक कर चुके थे, जिससे आंदोलनों की तीव्रता का अंदाजा लगाया जा सकता है। वहीं, हाल में तूता में अनशन कर रहे डीएड अभ्यर्थियों ने भी अवकाश के दिन विधानसभा घेराव की घोषणा की थी, लेकिन वे भी विधानसभा परिसर के आसपास तक नहीं पहुंच सके।
दरअसल, नवा रायपुर की भौगोलिक स्थिति भी आंदोलनों के लिए चुनौतीपूर्ण है। विधानसभा के आसपास कई किलोमीटर तक सुनसान सडक़ें हैं और चाय-पानी या ठहरने की सुविधाएं भी दूर-दूर तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में आंदोलनकारियों के लिए वहां जुटना और टिकना मुश्किल हो जाता है, जबकि पुलिस के लिए उन्हें नियंत्रित करना अपेक्षाकृत आसान हो गया।एक आईजी की प्रतिनियुक्ति बढ़ी,
दूसरे जाने की तैयारी में
छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस अफसर अभिषेक पाठक की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति एक वर्ष के लिए बढ़ा दी गई है। 2004 बैच के अफसर पाठक, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में आईजी पदस्थ हैं। उनके कार्यकाल में 10 मार्च 26 या आगामी आदेश तक वृद्धि की गई है। यहां बता दें कि इन्हें मिलाकर छत्तीसगढ़ कैडर के आठ आईपीएस केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत हैं। राज्य का केंद्रीय प्रतिनियुक्ति कोटा 31 अफसरों का है। यानी अभी और अफसरों के दिल्ली जाने के अवसर हैं।
वैसे हाल में डीआईजी संतोष कुमार सिंह की भी प्रतिनियुक्ति के आदेश जारी किए गए हैं। और आने वाले अप्रैल में एक और आईजी के जाने की प्रक्रिया अंतिम चरण में हैं। उनके केंद्रीय गुप्तचर ब्यूरो आईबी में जाने की चर्चा है। वे कुछ वर्ष पहले ही केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटे हैं।
विधानसभा में प्रदर्शन
विधानसभा के बजट सत्र का शुक्रवार को समापन हो गया। विभागों की अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान विपक्ष के पास सरकार को घेरने और अपनी बात मजबूती से रखने का अच्छा अवसर था, लेकिन वह इसका पूरा लाभ नहीं उठा सका। स्थिति यह रही कि मुख्यमंत्री के विभागों की अनुदान मांगें विपक्ष की गैरमौजूदगी में ही पारित हो गईं।
सत्र के दौरान सत्ता पक्ष के सुशांत शुक्ला और विपक्ष की चातुरी नंद का प्रदर्शन वरिष्ठ सदस्यों की तुलना में अधिक प्रभावी रहा। दोनों ही पहली बार विधायक बनकर सदन में पहुंचे हैं, लेकिन उनकी सक्रियता ने खासा ध्यान खींचा।
सुशांत शुक्ला सत्ता पक्ष के 'ओपनर बल्लेबाज' की तरह नजर आए। उन्होंने विपक्ष के हमलों का जवाब उसी अंदाज में दिया और कई मौकों पर अपनी ही सरकार के मंत्रियों को घेरकर मुद्दों पर निर्णय कराने में सफल रहे।
वहीं, कांग्रेस की महिला विधायक चातुरी नंद ने गोदावरी पावर को सोलर प्लांट के लिए दो सौ एकड़ से अधिक जमीन कौडिय़ों के दाम पर आवंटित करने के मामले में सरकार को कठघरे में खड़ा किया। उनके सवालों के बाद सरकार ने कलेक्टर से जांच कर रिपोर्ट मांगी है। अनुसूचित जाति वर्ग के गाड़ा समाज से आने वाली चातुरी नंद अपने क्षेत्र सरायपाली में अवैध शराब के खिलाफ मुखर रहीं और इसी सक्रियता के दम पर विधानसभा तक पहुंचीं। उन्हें उत्कृष्ट विधायक का सम्मान भी मिल चुका है। इसके अलावा पहली बार के विधायक ओमकार साहू, भाजपा की शकुंतला पोर्ते, कविता प्राण लहरे और अनुज शर्मा का प्रदर्शन भी सराहनीय रहा।


