राजपथ - जनपथ
राजधानी की नई पुलिसिंग
आखिरकार राजधानी रायपुर में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू हो गया। रायपुर भी उन 77 शहरों में शामिल हो गया जहां पुलिस कमिश्नरी सिस्टम है। आईपीएस के वर्ष-2004 बैच के अफसर डॉ. संजीव शुक्ला पुलिस कमिश्नर बनाए गए हैं। उनके साथ सात आईपीएस अफसरों की टीम भी है, जो कि एडिशनल कमिश्नर, डिप्टी कमिश्नर और असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर पदस्थ किए गए हैं।
पुलिस कमिश्नर के लिए कई नामों की चर्चा थी। इनमें से काफी सोच विचार के बाद डॉ. संजीव शुक्ला के नाम पर मुहर लगाई गई। डॉ. संजीव शुक्ला रायपुर के रहवासी हैं। वो यहां पले बढ़े हैं, और हरेक गली-मोहल्लों से परिचित हैं। उनकी साख अच्छी है, और वो अनुभव व कार्यक्षमता के मामले में आगे-पीछे बैच के अफसरों से ज्यादा प्रभावी माने जाते हैं।
डॉ. संजीव शुक्ला रायपुर एसपी रह चुके हैं। वो रायपुर, दुर्ग, रायगढ़, बिलासपुर और राजनांदगांव एसपी के अलावा आईजी बिलासपुर के पद पर काम कर चुके हैं। सीआईडी में रहते उन्होंने चिटफंड कंपनियों के खिलाफ जांच, और कार्रवाई की, और सेक्स सीडी कांड जैसे चर्चित मामलों को बेहतर ढंग से निपटाया। उन पर रायपुर में बतौर पुलिस कमिश्नर सिस्टम को प्रभावी बनाने की जिम्मेदारी है।
कमिश्नरी में बतौर एडिशनल कमिश्नर अमित तुकाराम कांबले, मयंक गुर्जर डिप्टी कमिश्नर (उत्तर), विकास कुमार डिप्टी कमिश्नर ट्रैफिक, राज नाला स्मृतिक डिप्टी कमिश्नर (क्राइम), उमेश प्रसाद गुप्ता डिप्टी कमिश्नर (मध्य), संदीप पटेल डिप्टी कमिश्नर (पश्चिम) और इशु अग्रवाल असिस्टेंट कमिश्नर की भी पोस्टिंग की गई है।
मयंक गुर्जर भी रायपुर में सीएसपी रह चुके हैं, और वो राज्य के अकेले एसपी स्तर के अफसर हैं, जिन्हें डीआईजी-आईजी कॉन्फ्रेंस में शामिल होने का मौका मिला था। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी थे। कुल मिलाकर कमिश्नरी में काबिल अफसरों की पोस्टिंग की गई है, ताकि सिस्टम बेहतर ढंग से काम कर सके। देखना है कि कमिश्नरी सिस्टम लागू होने के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली में क्या कुछ बदलाव आता है।
एफआईआर के लिए अनशन

कोरबा-दीपका में पदस्थ तहसीलदार बंदे राम भगत को अपनी ही शिकायत पर न्याय मांगने के लिए सारंगढ़ सिटी कोतवाली के सामने धरने पर बैठना पड़ा है। शिकायत के मुताबिक 20 जनवरी को उनके बेटे राहुल भगत के साथ कलेक्टर के गनमैन द्वारा की गई गाली-गलौज और मारपीट की है, जिसमें बेटे के कान का पर्दा फट गया। 48 घंटे बीतने के बावजूद पुलिस ने कोई एफआईआर दर्ज नहीं की, और थाना प्रभारी ने फोन तक नहीं उठाया।
दरअसल, गनमैन पुलिस विभाग का ही कर्मचारी होता है, भले ही उसका पद आरक्षक या प्रधान आरक्षक जैसा छोटा हो। लेकिन कलेक्टर के साथ 24 घंटे रहने से उसका रुतबा बढ़ जाता है। हो सकता है कि कलेक्टर ने एफआईआर दर्ज करने का कोई इशारा नहीं किया हो, और पुलिस ने खुद ही तय कर लिया कि कार्रवाई नहीं करनी है, ताकि ऊपरी स्तर के दबाव से बचा जा सके।
किताबों और घोषणाओं में तो गृह मंत्री और बड़े पुलिस अधिकारी कहते हैं कि किसी भी फरियादी की एफआईआर तुरंत दर्ज की जाए, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। थानेदार एफआईआर से बचते हैं क्योंकि उसके बाद विवेचना, केस डायरी, कोर्ट में पेशी जैसी कई प्रक्रियाएं शुरू हो जाती हैं, जो उनके लिए बोझ बन जाती हैं। इससे अपराध दर के आंकड़े भी प्रभावित होते हैं।
इस घटना के सामने से पिछले साल की एक और घटना याद आ गई। बिलासपुर शहर के सरकंडा थाने के टीआई तोप सिंह ने नायब तहसीलदार पुष्पराज मिश्रा के साथ मारपीट की, जो सीसीटीवी में कैद हो गई। राजस्व अधिकारियों ने विरोध किया, मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपा, और पुलिस ने सामूहिक अवकाश की धमकी दी। अंत में जांच की मांग हुई, लेकिन ठोस कार्रवाई का कोई रिकॉर्ड नहीं है।
मगर ये सब छोटे-छोटे मामले हैं। दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में आम लोगों केसाथ क्या होता होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। एनएचआरसी रिपोर्ट्स में कई मामले दर्ज हैं, जहां आदिवासी इलाकों में पुलिस ने मानवाधिकार उल्लंघनों की शिकायतों पर एफआईआर दर्ज करने से इनकार किया। उदाहरण के लिए, सोनी सोरी की शिकायत पर पुलिस ने जांच तक नहीं की, और एनकाउंटर मामलों में झूठी एफआईआर दर्ज कर मामले दबाने की कोशिश की गई। कुछ मामलों में पुलिस और सीआरपीएफ पर आरोप लगे, लेकिन सजा के बजाय सिर्फ मुआवजा दिया गया। नेलनार जंगल में तीन आदिवासियों की हत्या के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की और मजिस्ट्रेट जांच में भी लापरवाही बरती। एनएचआरसी ने परिवारों को मुआवजा दिया, लेकिन दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की सिफारिश नहीं की गई।
तो एक तहसीलदार के बेटे को गनमैन ने थप्पड़ मारा, कनपटी फट गई और एफआईआर के लिए पिता को अनशन करना पड़ रहा हो, तो इसे बहुत बड़ी बात है- कैसे कह दें?
रेलवे और सांसद

छत्तीसगढ़ के सांसद रेलवे अफसरों की कार्यप्रणाली से नाखुश हैं। इसका नजारा बिलासपुर में गुरुवार को दक्षिण पूर्व रेलवे के सांसदों की बैठक में देखने को मिला। दक्षिण पूर्व रेलवे के बिलासपुर डिवीजन में 9 सांसद हैं। इनमें मध्यप्रदेश और ओडिशा के सांसद भी हैं। मगर बैठक में चार सांसद ही थे बाकी पांच सांसदों ने अपने प्रतिनिधि भेजे थे।
बैठक की अध्यक्षता केन्द्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू ने की। चर्चा के दौरान सरगुजा सांसद चिंतामणि महाराज ने स्पोर्ट्स कोटे से नियुक्त एक कर्मचारी की अन्य जगह पर पोस्टिंग की सिफारिश की, तो रेलवे अफसर कह गए कि हमारे यहां ट्रांसफर-पोस्टिंग नियम से होता है। इससे चिंतामणि महाराज नाराज हो गए। राज्यसभा सदस्य देवेन्द्र प्रताप सिंह ने रेलवे अफसरों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि आप किस तरह नियम से काम करने का दावा कर रहे हैं, आपके चीफ इंजीनियर घूसखोरी के मामले में जेल में है।
देवेन्द्र प्रताप यहीं नहीं रूके, उन्होंने कह दिया कि यात्री सुविधाएं रेलवे की प्राथमिकता नहीं रह गई है। उन्होंने कहा कि उनके पूर्वजों ने 2 हजार एकड़ जमीन रेलवे को दान की थी। शर्त यह थी कि रायगढ़ से गुजरने वाली ट्रेनों का स्टॉपेज रायगढ़ में होगा। मगर ऐसा नहीं हो रहा है। रेलवे सिर्फ मालवाहक का काम कर रहा है। यात्रियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार हो रहा है।
उन्होंने यहां तक कह दिया कि इस तरह की बैठकों का कोई महत्व नहीं है। जहां कोई फैसले नहीं लिए जा सकते हैं। उन्होंने केंद्रीय रेल मंत्री से चर्चा करने की बात कही। देवेन्द्र प्रताप सिंह का बाकी सांसदों ने भी साथ दिया। इस पर केन्द्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू ने दखल देते हुए सांसदों की सिफारिश को प्राथमिकता देने के लिए कहा।


