राजनांदगांव

आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के सानिध्य में मंदिर निर्माण का भूमिपूजन
26-Dec-2023 3:27 PM
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के सानिध्य में मंदिर निर्माण का भूमिपूजन

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
राजनांदगांव, 26 दिसंबर।
आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महा मुनिराज की सानिध्य में सोमवार को जैन प्रतिष्ठाचार्य ब्रह्मचारी दीपक द्वारा गंज लाइन स्थित दिगंबर जैन मंदिर नेमिनाथ भगवान के नए भव्य जिनालय हेतु भूमि शुद्ध एवं भूमिपूजन का कार्य विधि विधान से मांगलिक मंत्रोचार्य के साथ संपन्न हुआ। 

दिगंबर जैन समाज के सूर्यकांत जैन ने बताया कि 25 दिसंबर को सुबह 7.30 बजे आचार्य श्री विद्यासागर महा मुनिराज के आशीर्वाद से भूमिपूजन कार्य के लिए चयनित श्रावक श्रेष्ठी सौधर्म इंद्र बनकर रविकांत जैन, अशोक झांझरी, पीसी जैन, सुदेश जैन, अमित जैन, नरेश जैन, सूर्यकांत जैन, अनिल बडक़ुल, शिरीष जैन द्वारा मांगलिक क्रियाएं करते प्रतिष्ठाचार्य के निर्देशन एवं आचार्य भगवान के सानिध्य अनुकंपा से मंगल कार्य का भूमिपूजन संपन्न हुआ। 

श्री जैन ने बताया कि श्वेतांबर जैन समाज के साधु श्रेष्ठ मनीष सागर जी महाराज का आगमन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के दर्शन एवं मंगल देशना सुनने दिगंबर जैन मंदिर प्रांगण में हुआ। उन्होंने आचार्य श्री के दर्शन करते आचार्य श्री जी को एवं उनके व्यक्तित्व को अपनी प्रेरणा बताते आचार्य श्री विद्यासागर महाराज से मार्गदर्शन एवं मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके पश्चात उपस्थित जनसमुदाय के आग्रह पर आचार्य श्री की मंगल देशना सभी को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि परोक्ष से प्रत्यक्ष की ओर जाने का पुरुषार्थ कमजोर नहीं होना चाहिए, एक बार पुरुषार्थ भले ही कमजोर हो, कोई बाधा नहीं, लेकिन वह सही दिशा की ओर हो यह महत्वपूर्ण है। आचार्य श्री ने दूध का उदाहरण देते कहा कि जब आप दूध को देखते हो तो क्या इसमें घी है, विश्वास करते हो, लेकिन दूध में घी छिपा हुआ है, लेकिन उसका दर्शन नहीं हो पाता, जब हम पुरुषार्थ करते हैं तो 12 घंटे नहीं निकल पाते कि दूध के रूप में परिवर्तन दही के रूप में हो जाता है और नवनीत की उपलब्धि हो जाती है। अभी भी आपको घी के दर्शन नहीं हुए, लेकिन जब उस नवनीत को तपाया जाता है तो उसमें जो विकार है, वह दूर होते चले जाते हैं, फिर आंख बंद भी कर लो तो उसकी गंध से ही सुगंधी दूर से ही महसूस हो जाती है। 

आचार्य श्री ने कहा कि यह जो एक श्रमण संस्कृति की परंपरा है वह नीचे से ऊपर की ओर जाने की है जैसे दूध कहता है कि मेरा स्वभाव दबने का नहीं है 12 घंटे में उसके स्वभाव में परिवर्तन हो जाता है। इस प्रकार आत्मा का स्वभाव उध्र्वगामी है । हम लोग उसके स्वभाव से वंचित हैं, वंचित ही रहे ऐसा कोई नियम नहीं है, पुरुषार्थ की परंपरा है यदि आप करोगे तो उस पुरुषार्थ की सुगंधी आपको निश्चित रूप से मिलेगी।

कार्यक्रम का संचालन चंद्रकांत जैन एवं भूमिपूजन के मांगलिक कार्य में प्रभात जैन और ताराचंद शास्त्री ने महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया। आहारचर्या के उपरांत आचार्य श्री प्रतिक्रमण एवं अन्य मांगलिकचर्या करने के उपरांत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का ससंघ विहार डोंगरगढ़ चंद्रगिरी के लिए हुआ। जिसमें रात्रि विश्राम कोपेडीह स्थित रथ मंदिर में हुआ।
 उक्त जानकारी सूर्यकांत जैन ने दी।

 


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