रायपुर

मज़दूर दिवस पर मेहनतकशों के योगदान को जसंमं ने याद किया
03-May-2026 8:20 PM
मज़दूर दिवस पर मेहनतकशों के योगदान को जसंमं ने याद किया

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

रायपुर, 3 मई। जन संस्कृति मंच द्वारा अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस के मौके पर  ‘मज़दूर जि़ंदाबाद’  कार्यक्रम आयोजित किया गया। जसंमं छत्तीसगढ़ की अध्यक्ष रूपेंद्र तिवारी ने कहा कि संगठित श्रम जब भी शोषण की बुनियाद पर सवाल खड़े करते हुए अधिकार की मांग करता है तब-तब सत्ता असहज हो उठती है. असली प्रश्न केवल रोटी का नहीं है बल्कि सम्मान, सुरक्षा और गरिमा का है जो हर श्रमिक का बुनियादी अधिकार है।

इस मौके पर जसम रायपुर के सदस्यों के  स्वागतोपचारिकता के बाद जन कवि वासुकी प्रसाद उन्मत्त  रेलवे में खलासी रहने के दौरान अपने अनुभव को सुनाया वहीं भागीरथी वर्मा ने बताया कि बोनस और छुट्टी की मांग करने पर कैसे उन्हें नौकरी से निकाल दिया था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और केस लडक़र अपना अधिकार हासिल किया और आज वे उसी फैक्ट्री में काम कर रहे हैं।  कार्यक्रम में   सुनीता शुक्ला ने जन कवि गोरख पाण्डेय के सुप्रसिद्ध गीत- तू हव श्रम के सुरुजवा हो... हम किरिनीयां तोहार की मार्मिक प्रस्तुति दी. समीक्षा नायर ने ब्रजमोहन के चर्चित गीत- अपना पसीना बहाने वाले भाई रे... उठ तेरी मेहनत को लूटे है कसाई रे...को गाकर समां बांधा. अजुल्का सक्सेना ने मज़दूर-किसान के कठिन  संघर्षों को दर्शाने वाली शमशेर बहादुर सिंह की सुप्रसिद्ध कविता-  फिर वह एक हिलोर उठी  की प्रस्तुति दी। कवियित्री नीलिमा मिश्रा ने चावड़ी पर बैठे मज़दूरों की दिनचर्या को दर्शाने वाली कविता  पढ़ी।

डॉ. संजू पूनम ने अपनी कविता में उस बारात का झकझोर देने वाला दृश्य प्रस्तुत किया जिसमें कोई सलमा पेट भरने के खातिर रोशनी को अपने सिर पर लादकर चलती है. कवि आलोक विमल ने अब मैं क्या करता हूं... और अब कुछ नहीं होता  जैसी कविता के जरिए यह बताने का प्रयास किया कि अन्याय के खिलाफ कोई सार्थक हस्तक्षेप रचनाशीलता के जरिए भी किया जा सकता है।  अजय शुक्ला ने अपनी कविता ‘आग़’ के माध्यम से यह बताया कि कभी आग से चूल्हे जलते थे. चेहरों पर चमक आती थी और भूख मिटती थी, लेकिन अब चौतरफा काली आग लगी हुई है जो बुझने का नाम नहीं ले रही है। कवि कमलेश्वर साहू ने भी अपनी रचना में मज़दूरों के साथ होने वाले अन्याय को लेकर आवाज़ उठाई. शायर जावेद नदीम और सुखनवर ने भी अपनी गज़़लों में मजदूरों के श्रम और सौंदर्य को याद किया।

युवा रचनाकार मोहद अल्तमश ने पीपल का पेड़ और कंटीली झाडिय़ों को ध्यान में रखकर लिखी गई कविता में यह बताने का प्रयास किया कि कांटे कुछ समय के लिए कोमल पत्तियों को लहूलुहान कर सकते हैं, लेकिन छांव देने वाले पेड़ कभी किसी को निराश नहीं करते।

कार्यक्रम के अंत में गुडग़ांव-मानेसर, नोएडा, फरीदाबाद, पानीपत में हुए आंदोलन की आड़ में बुद्धिजीवियों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं  की गिरफ्तारी को लेकर निंदा प्रस्ताव पारित किया गया। लेखिका सनियारा खान ने कार्यक्रम का कुशल संचालन आभार  राजकुमार सोनी ने प्रकट किया।

कार्यक्रम में जनवादी लेखक संघ छत्तीसगढ़ के महासचिव पीसी रथ, सामाजिक कार्यकर्ता अखिलेश एडगर, मोहित जायसवाल, जसंमं रायपुर के सचिव इंद्र कुमार राठौर, कथाकार और उपन्यासकार किशनलाल, सक्षम सिन्हा, पकंज सिन्हा, शायर इमरान अब्बास, वीना राठौर, संस्कृतिकर्मी निसार अली, चित्रकार सर्वज्ञ नायर और जीवेश प्रभाकर सहित अनेक प्रबुद्धजन मौजूद थे।


अन्य पोस्ट