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ठेका देने पर वन विभाग से न आया जवाब, हाईकोर्ट ने एकतरफा फैसले की दी चेतावनी
04-Feb-2021 9:44 PM
ठेका देने पर वन विभाग से न आया जवाब, हाईकोर्ट ने एकतरफा फैसले की  दी चेतावनी

'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 4 फरवरी।
वन विभाग के निर्माण कार्यों को ठेका प्रणाली से कराने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर आज सुनवाई हुई। कोर्ट के 4 हफ्ते में जवाब प्रस्तुत करने के आदेश के बावजूद सरकार की तरफ से 8 हफ्ते में भी जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया। इस पर बाद कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए एक हफ्ते का समय देते हुए हिदायत दी है कि अगर जवाब प्रस्तुत नहीं हुआ तो एकतरफा फैसला सुनाया जाएगा।

हाईकोर्ट में वन विभाग के इस फैसले के खिलाफ़ जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें निजी ठेके पर वहां के निर्माण कार्य कराये जायेंगे। याचिकाकर्ता का कहन है कि निजी हाथों में जंगल का काम देने से पेड़ों के साथ ही वन्य प्राणियों पर भी खतरा हो सकता है।

चीफ जस्टिस पीआर रामचंद्र मेनन व जस्टिस पीपी साहू की डिवीजन बेंच ने सरकार से 4 सप्ताह में जवाब मांगा था। जवाब नहीं देने पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कोर्ट ने कहा कि बेहद गंभीर विषय होने के बाद भी सरकार मामले में गंभीरता नही दिखा रही है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कुछ प्रमाण देते हुए बताया कि निजी ठेकेदारों को इसी दौरान वर्क ऑर्डर भी जारी कर दिये गये हैं जबकि कोर्ट में जवाब देने के लिये सरकार के पास समय नहीं है। कोर्ट ने कहा कि क्यों नहीं इन वर्क ऑर्डर पर रोक लगा दी जाए। इसके बाद सरकारी पक्ष के वकील से कोर्ट से जवाब के लिए और समय मांगा, जिस पर कोर्ट ने एक सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। 

कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताते हुए कहा है कि यदि जवाब प्रस्तुत नहीं होता है तो एकतरफा फैसला दिया जाएगा। 

उल्लेखनीय है कि बैकुंठपुर के चंद्रकांत पारगीर ने वकील जयप्रकाश शुक्ला के माध्यम से हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। इसमें कहा गया है कि 14 जुलाई 2020 को राज्य शासन की कैबिनेट ने वन विभाग के निर्माण कार्य विभागीय तौर पर कराने के बजाय ठेका पद्धति से कराने का फैसला लिया है। इसके तहत वन विभाग के निर्माण कार्य जैसे भवन, सड़क, एनिकट, स्टापडेम, तालाब, मचान, बैरियर सहित अन्य कार्य शामिल हैं। इस संदर्भ में 13 अगस्त को वन विभाग व 14 अक्टूबर 2020 को सीसीएफ ने आदेश जारी भी कर दिया है। विभागीय निर्माण निजी तौर पर कराने के पीछे रोजगार देने की बात कही गई है। याचिका में इस फैसले को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि शासन के इस फैसले व आदेश में यह उल्लेख नहीं है कि जंगलों में लगे पेड़-पौधों व वन्य प्राणियों की सुरक्षा कैसे की जाएगी। जंगलों का काम विभागीय तौर पर कराने की मंशा ही बाहरी लोगों की आवाजाही रोकना और जंगलों की सुरक्षा था। इस नए नियम से वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, वन सुरक्षा अधिनियम, सुप्रीम कोर्ट व केंद्र शासन  के दिशानिर्देशों का उल्लंघन होगा। पेड़ों की अवैध कटाई, वन्य प्राणियों का शिकार भी होने की आशंका है। याचिका में शासन और वन विभाग के इन आदेशों को निरस्त करने की मांग की गई है।


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