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भाजपा ने पत्ता खोल दिया, कांग्रेस की नजर मुंगेली कलेक्टर के फैसले पर
लंबी विशेष रिपोर्ट : राजेश अग्रवाल
बिलासपुर, 11 अक्टूबर (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। भाजपा ने मरवाही उप-चुनाव के लिये डॉ. गंभीर सिंह की टिकट फाइनल कर दी। पार्टी ने स्थानीय कार्यकर्ताओं के रोष और वरिष्ठ नेताओं की पसंद में संतुलन बनाये रखने के लिये यह नाम चुना है। ‘छत्तीसगढ़’ ने कुछ दिन पहले ही बताया था कि भले ही चयन समिति को चार नामों का पैनल विचार के लिये भेजा गया है पर फाइनल डॉ. सिंह या पूर्व विधायक रामदयाल उइके के बीच ही होगा। भाजपा ने कांग्रेस से पहले अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी है, जैसा कि अक्सर होता रहा है। कांग्रेस में सात, आठ दावेदार हैं जिन पर विचार हो रहा है पर डॉ. केके ध्रुव के नाम पर मुहर लगने की संभावना ज्यादा है।
भाजपा ने जमीनी स्तर पर काम करने वाले स्थानीय कार्यकर्ताओं की जगह संसाधनों में मजबूत डॉ. सिंह का नाम आखिरकार फाइनल किया। कहने को सर्जन डॉ. सिंह भी मरवाही के ही पास लचकोनी खुर्द, धनपुर के निवासी हैं पर उनका कर्मक्षेत्र रायपुर है। सरकारी नौकरी छोडऩे के बाद उनका पूरा समय रायपुर के अपने निजी अस्पताल में बीतता है। वे समय-समय पर मरवाही इलाके में स्वास्थ्य शिविर लगाकर लोगों से जुड़े रहने की कोशिश करते रहे हैं। एक स्थानीय कार्यकर्ता ने बताया कि यहां तक तो ठीक है पर कई जटिल बीमारी से जूझने वाले मरीजों को वे अपने चिकित्सालय रायपुर बुला लेते हैं और वहां फिर जो बिल बनता है वह सेवा से सम्बन्धित नहीं है।
रायपुर में होने के कारण प्रदेश के बड़े भाजपा नेताओं से उनका लगातार सम्पर्क रहा और यही टिकट हासिल करने में मददगार रहा। भाजपा में दो और नामों की बड़ी चर्चा थी। पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 12 अक्टूबर 2018 में तानाखार-पाली के तत्कालीन विधायक रामदयाल उइके ने कांग्रेस छोड़ दी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के सामने भाजपा में वापस आ गये।
यह एक दिलचस्प घटना थी। उइके उस समय कांग्रेस के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्षों में एक थे। भाजपा में शामिल होने की वजह उन्होंने यह बताई कि कांग्रेस में आदिवासी नेताओं का मान-सम्मान नहीं है।
तब कांग्रेस महासचिव और छत्तीसगढ़ प्रभारी पी.एल. पुनिया ने कहा था- और कितना सम्मान देंगे, हर बार तो टिकट दी है और कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाया है।
तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने कहा- अच्छा है उइके ने पार्टी छोड़ दी, क्योंकि वे जिस दल में रहते हैं उसकी सरकार नहीं बनती। यह बात सच भी हो गई।
चार बार के विधायक उइके ने कांग्रेस की जगह भाजपा की टिकट पर फिर तानाखार विधानसभा से चुनाव लड़ा लेकिन हार गये। उनका मूल गांव बस्तीबगरा, मरवाही है। इसी आधार पर वे इस उप-चुनाव में मरवाही से टिकट मांग रहे थे। उनका नाम पैनल में भेजा गया।
बताते हैं कि भाजपा के चुनाव प्रभारी अमर अग्रवाल ने उनके लिये कोशिश भी की। पर वहां भाजपा कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में इस नाम का विरोध हो गया। समीरा पैकरा और अर्चना ध्रुव तथा उनके समर्थकों ने उइके और डॉ. गंभीर दोनों का विरोध किया। उइके का इसलिये कि वे बरसों कांग्रेस में रहे, डॉ. गंभीर का इसलिये क्योंकि वे पैदा तो मरवाही इलाके में हुए पर काम बाहर ही करते रहे। जो लोग पार्टी के लिये दिन-रात मेहनत करते हैं, उनको मौका मिले।
स्थानीय कार्यकर्ताओं के दबाव में पैकरा और अनिता पोर्ते का नाम भी पैनल में रखा गया पर शुरू से तय था कि यह सिर्फ सांकेतिक है। स्व. अजीत जोगी के प्रभामंडल के आगे अनिता पोर्ते बीते चुनाव में कोई चमत्कार दिखाने में कामयाब नहीं हो सकी, बावजूद इसके कि उनके पीछे एक वक्त के प्रभावशाली नेता स्व. भंवर सिंह पोर्ते का नाम जुड़ा है।
समीरा पैकरा भाजपा से अब तक लडऩे वाले किसी भी उम्मीदवार से ज्यादा वोट बटोरने वाली प्रत्याशी हैं। इस बार भी उन्हें आशा थी कि अब तक जो उन्होंने कमाया है उसका प्रतिफल टिकट के रूप में मिलेगा। समीरा पैकरा की पहचान जिला पंचायत की चुनी हुई प्रतिनिधि के अलावा यह भी है कि वे स्व. अजीत जोगी और अमित जोगी की जाति, जन्मतिथि आदि को लेकर अरसे से लड़ाई लड़ रही हैं। उसी तरह, जैसी लड़ाई नंदकुमार साय और संतकुमार नेताम लड़ रहे हैं। जोगी परिवार को जाति सम्बन्धी जांच और फैसलों से जो भी फर्क पड़ा वह कोर्ट की दखल के बाद हुआ।
यह अक्सर दिखाई देता था कि कोई न कोई सुराख भाजपा नेताओं ने सत्ता में रहते हुए छोड़ दिया जिससे कोई निर्णायक फैसला आने में देरी हो। समीरा पैकरा यह लड़ाई अकेले ही लड़ रही थी यह मानना सही नहीं होगा। कांग्रेस और भाजपा के अलग-अलग खेमों का मिश्रित विरोध और समर्थन इस मामले में रहा है।
अब जब डॉ. गंभीर सिंह की टिकट तय हो गई है, पैकरा, पोर्ते और उइके का उन्हें साथ मिलेगा या नहीं कहना मुश्किल है। डॉ. गंभीर को टिकट मिलने से उत्साहित एक भाजपा कार्यकर्ता ने दावा किया कि इस बार आपको जोगी चेन टूटा दिखेगा।
कांग्रेस जिस तरह से अमित जोगी, ऋचा जोगी को चुनाव लडऩे से रोक रही है पिछले चुनाव की तरह इस बार भी वह तीसरे स्थान पर रहेगी। अमित जोगी जब जीते तो स्व. अजीत जोगी का आशीर्वाद उनके साथ था। अब सिर्फ अमित उनके नाम के सहारे हैं। बड़ी बात उन्होंने यह कही कि डॉ. गंभीर संसाधनों में सबसे आगे दिखाई देंगे। कांग्रेस से वे कहीं भी पीछे नहीं रहेंगे। भाजपा कार्यकर्ता की यह बात कितना ठीक है इसका आकलन चुनाव परिणाम आने के बाद ही किया जा सकता है।
ऋचा ज्यादा ताकतवार होगी?
अमित जोगी की पत्नी और स्व. अजीत जोगी की बहू ऋचा जोगी के नाम से आदिवासी जाति प्रमाणपत्र जारी हुआ है। संत कुमार नेताम ने इस प्रमाण-पत्र की वैधता को चुनौती दी है। मुंगेली कलेक्टर ने उनकी शिकायत के आधार पर उन्हें जवाब देने के लिये बुलाया था। वहां वे नहीं पहुंच सकीं। बताया था कि विधिवत् नोटिस नहीं मिली।
अमित जोगी ने बयान जारी कर बताया है कि प्रमाणपत्र की ऐसी समीक्षा ही अवैध है। पर किसी कोने में चिंता भी है इसलिये वे जवाब देने के लिये पहुंच रहे हैं। अगली तारीख 12 अक्टूबर तय हुई है। राजस्व न्यायालयों में तारीखें देर की दी जाती है। पर यहां मरवाही स्क्रूटनी से ठीक पहले की तिथि तय की गई है। मरवाही के लोगों से बात करने पर यह मालूम हुआ कि अमित जोगी से ज्यादा ताकतवर उम्मीदवार ऋचा जोगी हो सकती है।
अमित जोगी का व्यवहार, बर्ताव बहुत लोगों को पसंद भी नहीं आता, पर स्व. अजीत जोगी की वजह से बर्दाश्त कर लिये जाते हैं। छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस को जिन लोगों ने छोड़ा है उनमें से अनेक लोगों ने साफ कहा है कि अजीत जोगी के नेतृत्व में काम करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी, पर अमित जोगी के साथ काम नहीं करेंगे।
ऋचा जोगी उनके मुकाबले नया चेहरा और महिला उम्मीदवार होंगी। अभी तक उन्होंने पूरे विवाद पर कुछ नहीं बोला है पर जब भी सामने आई है अपना सकारात्मक प्रभाव ही डाला है। वे अभी अभी मातृत्व पर है। अमित अपने पुत्र को अजीत जोगी का अवतार बता रहे हैं। चुनाव प्रचार में एक शिशु की मां ज्यादा असर डाल सकती है।
कांग्रेस की कोशिश, जोगी मैदान से बाहर हों
इंडियन एक्सप्रेस की खबर और अंतागढ़ उप-चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी का नाम वापस लेना ऐसी घटनाएं थीं जिन्होंने स्व. अजीत जोगी, अमित जोगी को कांग्रेस से बाहर किये जाने का रास्ता तय कर दिया। उस वक्त जोगी के समर्थन में कई नेता आ गये थे लेकिन बाद में उनमें से ज्यादातर लोगों की समझ में आया कि कांग्रेस ही ठीक है।
नजर दौड़ाने से मालूम हो सकता है कि इनमें वर्तमान मंत्रिमंडल के कुछ सदस्य भी थे। जोगी को बाहर करना कांग्रेस के लिये मुश्किल था। पर टर्निंग प्वाइंट रहा केन्द्रीय नेतृत्व को इस बात के लिये राजी कर लेना। जोगी के बाहर होने के बाद कांग्रेस को जो बम्पर जीत मिली है वह इतिहास में दर्ज हो गई है। कांग्रेस यह बताने में कामयाब रही कि जोगी का नया दल भाजपा की बी टीम है। उनके कुछ प्रत्याशी विधानसभा में जरूर पहुंच गये पर भाजपा की बुरी हालत के चलते सौदे का कोई मौका नहीं मिल पाया।
अब कांग्रेस की सरकार ने तीर पर तीर छोडऩा शुरू किया है। सबसे पहले गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही को नया जिला बना दिया गया। इसकी मांग लम्बे समय से थी। भाजपा सरकार ने बहुत से नये जिले बनाये पर इसे छोड़ दिया। इसकी वजह क्या थी, चाय पर चर्चा होती रही है। इसके बाद कांग्रेस ने मरवाही में सैकड़ों करोड़ की सौगात दी। डॉ. चरणदास महन्त की मंशा के अनुरूप कोरबा के विधायक व प्रदेश के राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल को यहां प्रभारी मंत्री बना दिया गया। आचार संहिता लागू होने के आखिरी दिन तक सौगातों का सिलसिला चलता रहा। इतने सब के बाद मतदाताओं को कैसे प्रभाव में लिया जायेगा, यह हालिया जब्ती, वीडियो क्लिपिंग्स वगैरह देखकर समझा जा सकता है।
बहुत से पिछले चुनाव बताते हैं कि किसी नेता की मौत के बाद उसके परिवार के लोगों के प्रति सहानुभूति जीत दिला देती है। संभावित प्रत्याशी अमित जोगी इसका भरपूर इस्तेमाल भी कर रहे हैं। अजीत जोगी और उनका अपना नवजात पोता चुनाव प्रचार का हिस्सा है। जोगी को लेकर एक अलग तरह की भक्ति की मरवाही के लोगों में है। उनकी उपलब्धियां उन्हें बहुत ऊंचाई तक ले गई पर जमीन से जुड़े रहे। उनका कोई विकल्प अब तक नहीं रहा। उनके इस प्रभाव का उनके जाने के बाद परिवार को लाभ मिल सकता है। पर, कांग्रेस के लिये भी यह चुनाव जीतना प्रतिष्ठा का सवाल है। बीते चुनाव में उनकी पार्टी के प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे। जब पूरा प्रदेश इस वक्त कांग्रेसमय है तो मरवाही क्यों छूटे? जिस जोगी नाम को पार्टी से बाहर करने में एड़ी-चोटी एक की गई उसका अस्तित्व पूरी तरह क्यों नहीं मिटा दिया जाना चाहिये?
तू डाल-डाल मैं पात-पात की तर्ज पर ऋचा जोगी अब आदिवासी होने का प्रमाणपत्र ले चुकी है। यह हैरान करती है कि विशाल बहुमत के बावजूद प्रशासन के निचले स्तर तक इस सरकार की पकड़ कमजोर है। एक कांग्रेस नेता का कहना है कि हमारी सरकार तो बन गई है पर अफसर हमें नहीं सुन रहे और परदे के पीछे खेल होता रहता है। वरना, इतनी आसानी से हमारी सरकार के रहते प्रमाण-पत्र जारी नहीं होता।
अब यह तय है कि छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस से अमित जोगी भी नामांकन भरेंगे और ऋचा जोगी भी। हाईकोर्ट ने स्व. अजीत जोगी की वह मांग खारिज कर दी थी कि उच्च-स्तरीय जाति छानबीन समिति की रिपोर्ट को निरस्त किया जाये लेकिन यह भी कहा था कि जब तक अंतिम सुनवाई न हो उन्हें प्रताडि़त करने वाली कोई कार्रवाई न हो। इसी वजह से सिविल लाइन थाने में उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है और न ही अमित जोगी का आदिवासी प्रमाण-पत्र निरस्त किया जा सका है। कांग्रेस और सत्ता की ओर से कोई कोशिश नहीं हुई कि हाईकोर्ट का यह आदेश निरस्त हो। अब जब चुनाव सिर पर है तो ऋचा जोगी के प्रमाण पत्र और अमित जोगी के प्रमाण पत्र पर उन्हें सवाल करने की याद आ रही है।
मरवाही में काम कर रहे कांग्रेस से जुड़े लोगों का कहना है कि जोगी का नाम काफी है। मरवाही की जनता एक बार तो उन्हें श्रद्धांजलि देगी। कोई तरीका ऐसा निकलता कि जोगी परिवार का कोई चुनाव न लड़ पाये, वही हमें जीत दिला सकती है। जोगी परिवार से कोई न लड़े तो हमें जीतने के लिये ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि सरकार ने काफी काम कर दिये हैं। लोगों को देखने से ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस और भाजपा से कई लोग कांग्रेस में आ गये, पर उसका कोई फायदा नहीं है। छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस में कई ऐसे लोग अब जुड़ गये जो जोगी के करीबी शिव नारायण तिवारी और ज्ञानेन्द्र उपाध्याय की वजह से अपनी जगह नहीं बना पा रहे थे।
डॉ. ध्रुव की संभावना
डॉ. कृष्ण कुमार ध्रुव मूलत: कोरबा जिले से हैं लेकिन बरसों से मरवाही क्षेत्र में ही सरकारी सेवा कर रहे हैं। ऐसी चर्चा रही कि विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरण दास महन्त ने उनके नाम को प्रस्तावित किया है। लेकिन दूसरी तरफ महंत के कुछ करीबी लोगों का कहना है कि महंतजी ने अभी दो दिन पहले पहली बार डॉ. ध्रुव को देखा है, और उनका चेहरा देखकर तो वे आगे भी उन्हें नहीं पहचान पाएंगे क्योंकि अभी जब वे महंतजी से पहली बार मिले, तो मास्क लगाया हुआ था। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि वे नौकरी करते हैं वही काम करें। वे कार्यकर्ताओं को जोड़े रखने का काम तो करते नहीं थे। जिन लोगों ने विपरीत परिस्थितियों में कांग्रेस को जिंदा रखा टिकट उनके बीच से तय की जानी चाहिये। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि कांग्रेस की तरफ से कोई प्रत्याशी नहीं, सत्ता और संगठन मैदान में होगा। लोग देख रहे हैं कि इलाके की जनता की भलाई कांग्रेस से जुड़े रहने में ही है।
फिलहाल मरवाही प्रदेश का अब तक का एक सबसे बड़ा विधानसभा उपचुनाव है जिससे कांग्रेस सरकार पर मतदाताओं की सोच भी साबित होगी, और जोगी परिवार का भविष्य भी तय हो जाएगा।


