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बम्हनी में डेढ़ हजार साल पुराने आमलक-द्वारपाल की प्रतिमाएं, नक्काशीदार स्तंभ
15-Jun-2026 1:54 PM
बम्हनी में डेढ़ हजार साल पुराने आमलक-द्वारपाल की प्रतिमाएं, नक्काशीदार स्तंभ

 खेत समतल करने के दौरान जेसीबी से मिट्टी हटाते पथरीले टीले से 15 सदी पूर्व का इतिहास निकल आया, पुरातत्व टीम पहुंची
 ‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
महासमुंद,15 जून।
महासमुंद जिले के ग्राम बम्हनी में गौठान के पास खेत समतल करने के दौरान जेसीबी से मिट्टी हटाते समय पथरीले टीले से 15 सदी पूर्व का इतिहास निकल आया। गांव में 8वीं से 11वीं शताब्दी के बीच के मंदिर अवशेष, आमलक, द्वारपाल की मूर्तियां और नक्काशीदार स्तंभ मिले हैं। ग्रामीणों की सजगता से यह अमूल्य धरोहर मलबे में बदलने से बच गई। पुरातत्व विभाग ने प्रारंभिक जांच में माना है कि यह स्थल विश्व प्रसिद्ध सिरपुर के समकालीन ही नहीं, बल्कि उससे भी पुराना हो सकता है।

जानकारी मिली है कि दो-तीन दिन पहले बम्हनी गांव के पथर्रा क्षेत्र में किसान अपने खेत को समतल करवा रहा था। टीले का एक हिस्सा जेसीबी से काटा जा रहा था तभी मिट्टी के ढेर के साथ लाल ईंटों की दीवार, नक्काशीदार पत्थर और खंडित मूर्तियां निकलने लगीं।

इसकी जानकारी गांव में फैली तो सरपंच रूपा ध्रुव, खिलावन यादव एवं अन्य ग्रामीणों ने काम रूकवाया। खिलावन यादव ने बताया कि जेसीबी वाला जेसीबी और आगे बढ़ाता तो सब मूर्तियां चूर-चूर हो जातीं। हमने मना किया और तुरंत सरपंच को बुलाया। सरपंच ने तत्काल रायपुर पुरातत्व विभाग को सूचना दी। खबर मिलते ही संस्कृति विभाग हरकत में आया।
ग्रामीणों की सूचना पर संज्ञान लेते हुए डिप्टी डायरेक्टर पुरातत्व प्रतापचंद पारख और पुरातत्वविद प्रभात कुमार सिंह की टीम बम्हनी पहुंची। टीम ने पाया कि सतह से निकले अवशेष 8वीं से 11वीं शताब्दी के हैं, लेकिन निर्माण शैली और ईंटों का आकार देखकर लगता है कि मूल मंदिर 6वीं से 8वीं शताब्दी का भी हो सकता है।
टीम ने बताया कि कलेक्टर महासमुंद को रिपोर्ट भेजकर स्थल को संरक्षित क्षेत्र घोषित कराया जाएगा। अवैध खुदाई पर धारा 144 के तहत रोक लगेगी। जेसीबी से निकाले गए आमलक, मूर्तियां और स्तंभ अभी खुले में पड़े हैं। इन्हें गांव में ही अस्थायी शेड बनाकर सुरक्षित किया जाएगा। जिला पुरातत्व संघ और राज्य विभाग की संयुक्त टीम वैज्ञानिक तरीके से खुदाई करेगी। ड्रोन सर्वे से पूरे क्षेत्र का मैप बनेगा।
टीम में शामिल अफसरों ने संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल से ग्रामीणों की बात कराई। जिसमें संस्कृति मंत्री ने मोबाइल पर ग्रामीणों को आश्वासन दिया कि बम्नेश्वर नाथ मंदिर परिसर को विकसित कर बम्हनी को पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाएगा। ग्रामीणों ने मांग की है कि यहां व्यवस्थित खुदाई कर पूरे नगर को उजागर किया जाए। उन्होंने बताया कि पुरखों के पास पंच देवरी थी। अब इसका प्रमाण मिला है। बताए अनुसार यहां राजा का किला है और इसे सहेजने की आवश्यकता है।
पुरातत्व अधिकारी प्रभात कुमार सिंह ने बताया कि यहां दो मंदिरों के स्पष्ट प्रमाण मिल गए हैं। दो विशाल आमलक, स्तंभों के टुकड़े, द्वारपाल की प्रतिमा और गर्भगृह के हिस्से मिले हैं। टीला अभी भी साबूत है, जिससे साफ  है कि मुख्य मंदिर का बड़ा हिस्सा जमीन के नीचे दबा है।
ग्रामीणों ने टीम को बताया कि बम्हनी को बुजुर्गों के बताए अनुसार पंच देवरी कहा जाता है। मान्यता है कि यहां पांच देवस्थान थे, जो अब पुरातात्विक प्रमाणों से सच साबित हो रहा है। जिसमें से पहला पथर्रा टीला चिडिय़ा मार्ग पर है। जहां वर्तमान में अवशेष मिले इसे मुख्य मंदिर माना जा रहा है।
गांव के ही एक अन्य खेत में एक दूसरा मंदिर दबा मिला है। ग्रामीणों ने बताया कि जुताई में यहां भी पत्थर निकलते हैं। तीसरा बम्नेश्वर नाथ महादेव जो गांव का मौजूदा जागृत शिव मंदिर है, जो पंचकोसी यात्रा का प्रमुख पड़ाव है। चौथा शीतला दुर्गा से मंदिर जो बस्ती के भीतर स्थित प्राचीन मंदिर है और पांचवा स्थान किल्ला पारा है। जहां आज भी प्राचीन नगर का प्रवेश द्वार मौजूद है। इस द्वार पर महामाया माता की मूर्ति स्थापित है।
ग्रामीणों का दावा है कि किल्ला पारा से परदेवरी तक फैला यह पूरा इलाका एक प्राचीन नगर था। लोरिक चंदा की प्रेम गाथा भी इसी क्षेत्र से जुड़ी बताई जा रही है। लाल ईंटों और बलुआ के पत्थर का उपयोग निर्माण में किया गया है। यहां की नक्काशी की शैली सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर से मिलती है।


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