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'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 8 जून। कोरबा जिले में वर्ष 2013 में हुए छह वर्षीय मासूम के अपहरण, फिरौती और हत्या के आरोपी को हाईकोर्ट से बरी किए जाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। पीड़ित पक्ष की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने की। सुप्रीम कोर्ट 25 नवंबर 2025 को दिए गए हाईकोर्ट के उस फैसले की वैधता पर विचार करेगा, जिसमें आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था।
मामला 16 मई 2013 का है। कोरबा जिले के उरगा थाना क्षेत्र निवासी मुकेश कुमार बैरागी ने अपने छह वर्षीय पुत्र भूपेश उर्फ अप्पू के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। अगले दिन परिवार को मोबाइल फोन पर 10 लाख रुपये की फिरौती मांगने का कॉल आया। पुलिस ने कॉल डिटेल और तकनीकी जांच के आधार पर कुदुरमाल गांव निवासी अरुण कुमार वैष्णव उर्फ चंकी को गिरफ्तार किया था।
अभियोजन के अनुसार आरोपी ने बच्चे का अपहरण करने के बाद पकड़े जाने के डर से उसकी गला घोंटकर हत्या कर दी थी और शव को एक स्टोर रूम में छिपा दिया था। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि फिरौती मांगने के लिए इस्तेमाल किया गया सिम कार्ड फर्जी दस्तावेजों के आधार पर जारी किया गया था। इस मामले में सिम विक्रेता सोहनलाल गुप्ता के खिलाफ भी धोखाधड़ी और जालसाजी की धाराओं में अलग से मामला दर्ज किया गया था।
मामले की सुनवाई के बाद सत्र न्यायालय ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 364ए और 302 के तहत आजीवन कारावास, धारा 363 के तहत सात वर्ष तथा धारा 201 के तहत पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
हालांकि बाद में हाईकोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि आरोपी के कथित मेमोरेंडम के आधार पर शव बरामदगी का विश्वसनीय दस्तावेजी प्रमाण रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं था। कॉल डिटेल रिकॉर्ड के साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत नहीं किया गया था। इसके अलावा मोबाइल नंबर और सिम कार्ड को आरोपी से जोड़ने वाले पर्याप्त और ठोस साक्ष्य भी नहीं मिले। अदालत ने माना कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला पूर्ण और अखंड रूप से स्थापित नहीं हो सकी।
पीड़ित पक्ष द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है।


