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बहू की मौत में निचली अदालत ने सुनाई थी 7 साल की सजा
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
भिलाई नगर, 8 जून। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बहू की संदिग्ध मौत से जुड़े लगभग दो दशक पुराने मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी सास को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने वर्ष 2010 में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई 7 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा को निरस्त कर दिया।
शादी के छह माह बाद मौत
मामले के अनुसार सोनल नामक महिला का विवाह 18 जून 2006 को दुर्ग निवासी मनीष के साथ हुआ था। शादी के करीब छह माह बाद 21 दिसंबर 2006 को उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। घटना के बाद मृतका के परिजनों ने सास पर दहेज के लिए प्रताडि़त करने और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगाए थे।
10 से 15 लाख रुपये की मांग का आरोप
अभियोजन पक्ष का दावा था कि सास ने अपने बेटे के कोलकाता में नौकरी मिलने के बाद बहू को तब तक वहां भेजने से इनकार कर दिया था, जब तक वह मायके से 10 से 15 लाख रुपये नहीं ले आती।
आरोप यह भी था कि घटना वाले दिन सास ने बहू के साथ मारपीट कर उसे घर से निकाल दिया था, जिसके बाद उसने मायके पहुंचकर आत्महत्या कर ली।
निचली अदालत ने माना था दोषी
मामले की सुनवाई के बाद मार्च 2010 में दुर्ग की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने आरोपी सास को दोषी मानते हुए 7 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों को माना अपर्याप्त
न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि मृतका को मृत्यु से ठीक पहले दहेज की मांग को लेकर प्रताडि़त किया गया था। अदालत ने कहा कि गवाहों के बयान सामान्य पारिवारिक विवादों की ओर संकेत करते हैं, लेकिन दहेज उत्पीडऩ का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।
मेडिकल रिकॉर्ड ने बढ़ाई शंका
अदालत ने मेडिकल दस्तावेजों का भी उल्लेख किया, जिनमें प्रारंभिक जानकारी में महिला के बाथरूम में गिरकर घायल होने की बात दर्ज थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य चिकित्सा साक्ष्यों से भी यह स्पष्ट नहीं हो सका कि मौत आत्महत्या, हत्या या दुर्घटना का परिणाम थी।
गवाहों के बयानों पर भी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि मृतका के माता-पिता और भाई ने स्वीकार किया कि आरोपी सास ने उनके सामने कभी सीधे तौर पर दहेज की मांग नहीं की थी। उनके आरोप मुख्यत: मृतका से मिली जानकारी पर आधारित थे। ऐसे में अभियोजन पक्ष के आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो सके।
सत्र न्यायालय का फैसला निरस्त
हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया और पर्याप्त आधार के बिना दोषसिद्धि का आदेश पारित कर दिया। इसी आधार पर अदालत ने 17 मार्च 2010 के फैसले को निरस्त करते हुए आरोपी सास को सभी आरोपों से सम्मानपूर्वक बरी कर दिया है।


