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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : आए दिन पेट्रोलियम के बदलते-बढ़ते रेट बाजार को बुरी तरह अस्थिर कर रहे!
सुनील कुमार ने लिखा है
07-Jun-2026 4:57 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : आए दिन पेट्रोलियम के बदलते-बढ़ते रेट बाजार को बुरी तरह अस्थिर कर रहे!

पिछले कुछ दिनों में भारत में कई बार डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ गए, और कई बार रसोई गैस या कमर्शियल गैस के। इसके पहले कि राज्य सरकारें बसों का भाड़ा तय कर सकें, ऑटोरिक्शा का भाड़ा तय कर सकें, ईंधन के दाम एक बार फिर बढ़ जाते हैं। ऐसे में बस चलाने वाले कारोबारी सरकार का इंतजार किए बिना अपनी मर्जी से ही जितना चाहे उतना किराया बढ़ा दे रहे हैं। और माल परिवहन करने वाले ट्रकों सरीखे कारोबार पर तो पहले से ही कोई सरकारी काबू था नहीं। अब हालत यह होती है कि ट्रांसपोर्ट के कारोबार में ईंधन खर्च एक हिस्सा रहता है, पूरा का पूरा कारोबार सिर्फ ईंधन के खर्च पर टिका नहीं रहता। लेकिन जब दो फीसदी या चार फीसदी रेट पेट्रोल-डीजल का बढ़ जाता है, तो कारोबारी भाड़े को भी कम से कम उतना फीसदी तो बढ़ा ही देते हैं, और कई बार तो उससे कई गुना अधिक भी बढ़ा देते हैं। इसका कोई तर्क नहीं होता क्योंकि बस-ट्रक कारोबार में ईंधन के अलावा भी कई और चीजों का खर्च रहता है, और उन सबका भाव तो ईंधन जितना बढ़ा नहीं है। जहां पर सरकार की मर्जी रहती है, वहां पेट्रोलियम जैसी चीजों का दाम रातों-रात कितना भी बढ़ा दिया जाता है। इस देश में पेट्रोलियम के दाम तय करने का एकाधिकार सरकार, या पेट्रोलियम कंपनियों का है। ऐसे में जब हर कुछ दिनों में दाम बढ़ते हैं, तो बाजार अपने को उस रफ्तार से बदल नहीं पाता। नतीजा यह होता है कि दो सौ रूपए की बस टिकट 210 की हो जानी थी, लेकिन वह 240 कर दी जाती है।

इस देश में केन्द्र सरकार में पिछले एक दशक से अधिक से अंतरराष्ट्रीय बाजार से सस्ते में तेल पाया है। अर्थशास्त्रियों का अंदाज है कि जब तेल सरकार को पानी के भाव मिल रहा था, तब भी सरकार ने जनता को पेट्रोल-डीजल सस्ता नहीं दिया, गैस-सिलेंडर महंगा ही बनाए रखा। इसलिए उस पूरे दौर में जो लाखों करोड़, या दसियों लाख करोड़ की कमाई सरकार को हुई है, उससे सरकार के पास बचत का एक खजाना तो बना ही है। आज पहले रूस-यूक्रेन की जंग, और फिर ईरान पर अमरीकी-इजराइली हमलों को देखें, तो कुछ चीजें भारत सरकार की पहुंच से परे की हो सकती हैं, लेकिन यह बात कहीं से भी गले नहीं उतरतीं कि सरकार हर कुछ दिनों में अपनी मर्जी से रेट बढ़ाती चले। बाजार व्यवस्था को कच्चे माल के दाम का एक भरोसा लगता है। भारत में डीजल-पेट्रोल, और गैस के भाव तीन-तीन महीने में न सही, कम से कम एक महीने तक तो नहीं ही बढऩे चाहिए। अब मान लें कि सरकार यह तय कर ले कि हर महीने की एक तारीख को उस पूरे महीने के लिए पेट्रोलियम के दाम घोषित कर दिए जाएंगे, तो जो लोग बाजार में इसे कच्चे माल की तरह इस्तेमाल करते हैं, कारोबारी इस्तेमाल करते हैं, वे कम से कम एक महीने के लिए तो निश्ंिचत हो सकेंगे, और यह तय कर सकेंगे कि जून में समोसा कितने का बेचना है, बसों की टिकट इस महीने कितनी होगी, और जहां कहीं ऑटोरिक्शा मीटर से चलते हैं, वहां तय हो जाए कि प्रति किलोमीटर का भाड़ा इस महीने कितना होगा।

हम जो सुझा रहे हैं, उसमें सरकार को न किसी तरह की दिक्कत होगी, न ही सरकारी खजाने को किसी तरह का नुकसान होगा। पेट्रोलियम से होने वाली कमाई की तिजोरी खासी बड़ी रहती है, किसी महीने अगर सरकार को खरीदी में तेल कुछ महंगा मिला, तो उसकी भरपाई सरकार अगले महीने भाव बढ़ाकर भी कर सकती है। आज सडक़ किनारे कहीं पर कुछ खाएं-पिएं, तो उसके दाम कब कितने बढ़ जाते हैं, उसका ठिकाना नहीं रहता। ठेले-खोमचे वालों का तर्क रहता है कि गैस कब कितनी महंगी हो गई, उन्हें पता ही नहीं रहता, और उन्हें लागत निकालने के लिए रेट बढ़ाना पड़ता है। यही पेट्रोलियम रेट अगर तीन-तीन महीने में एक बार तय हो, तो सरकार पिछले तीन महीनों के अपने नफा-नुकसान को देखकर अगले तीन महीनों का रेट तय कर सकती है, क्योंकि यह कोई मौसमी सामान तो है नहीं, घर और बाजार दोनों की इसकी बारहमासी जरूरत रहती है, और सरकार बड़ी आसानी से पिछले तीन महीनों का अपना खाता देखकर एक बार अगले तीन महीनों के रेट तय कर सकती है।

अपने ही देश की जनता, और उस जनता से जुड़े हुए कारोबार को लेकर सरकार का एकाधिकारी रूख जब सनकी या मनमानी होने लगता है, तो जनता में एक अनिश्चितता छा जाती है। मानो यह कोई सरकारी कारोबार नहीं है, बल्कि सरकारी मिजाज है जो कि ट्रम्प के मिजाज की तरह कभी भी ऊपर-नीचे आता-जाता है। आम जनता तो अपने घर का, काम या पढ़ाई पर आवाजाही का, बजट बनाने की जरूरत रहती है। बाजार पेट्रोलियम या ऐसे दूसरे सामानों का रेट देखकर अपने सामानों की लागत निकालता है, और बिक्री का रेट तय करता है। यह सिलसिला हर दो-चार दिन में बदलने वाले रेट की वजह से ठीक से चल ही नहीं पाता। जिस तरह देश या प्रदेशों में टैक्स साल में एक बार, बजट में घोषित किया जाता है, और फिर वह अगले वित्तीय वर्ष में बारह महीने लागू होता है, तो उससे लोग अपना आगे का हिसाब-किताब लगा पाते हैं।

सरकार की यह जिम्मेदारी रहती है कि वह जनता की सहूलियत की बात करे, अपना रूख जनकल्याणकारी रखे। सरकार को मनमानी करने का अधिकार तो है, लेकिन मनमानी करने वाली सरकार जनकल्याणकारी नहीं मानी जाती। अभी एक दूसरे मोर्चे पर सरकार एक ठीक काम करने जा रही है कि खाना पकाने के तेल की पैकिंग का आकार सरकार तय कर रही है। आज हर कंपनी अलग-अलग कई तरह के नाप और वजन वाली पैकिंग में तेल बेच रही हैं। ग्राहकों को दो ब्रांड के बीच तुलना करने में मुश्किल रहती है, क्योंकि किसी एक में 8 सौ एमएल तेल है, तो दूसरे में 910 एमएल। सरकार ने पिछले दिनों सामानों की पैकिंग पर यह लिखवाना भी शुरू किया है कि पैकेट या बोतल जितने भी ग्राम की हो, उसके भीतर के सामान का प्रति ग्राम दाम कितना बढ़ रहा है। लेकिन यह तुलना भी किसी दुकान या बाजार में खड़े रहकर आसान नहीं रहती। इसलिए सरकार अब तेल से यह काम शुरू कर रही है कि उसकी पैकिंग का साइज सरकार तय करेगी। यह ग्राहकों की सहूलियत का काम है, और सरकार को बाकी सामानों के लिए भी ऐसे आकार तय करने चाहिए। आखिर ईयू ने योरप के देशों में बिकने वाले सारे मोबाइल फोन के लिए एक सरीखा चार्जर तय किया है, और वह लागू भी हो गया। अब योरप के किसी भी देश में मोबाइल बेचने वाली कंपनी को ऐसे ही मॉडल बनाने होंगे जिनकी बैटरी लोग बाजार से खरीदकर बदल सकें। ऐसी कई और शर्तें कारोबारियों पर लागू की गई हैं। भारत में जो कि पेट्रोलियम की सबसे बड़ी कारोबारी सरकार खुद है, उसे तीन महीने में एक बार रेट कम-ज्यादा करने का नियम बनाना चाहिए, एक तय तारीख को अगले तीन महीने का रेट घोषित हो जाए, ताकि लोग कुछ तो हिसाब-किताब तय कर सकें। महंगाई से परेशान जनता और बाजार इन दोनों के ऊपर अस्थिरता जले पर नमक की तरह साबित हो रही है, सरकार कम से कम नमक छिडक़ने से तो बच सकती है।

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